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बुधवार, 31 दिसंबर 2008

नव वर्ष की आप सबको हार्दिक शुभकामनाऎं

आपको एवं आपके समस्त मित्र/अमित्र इत्यादी सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऎं.
ईश्वर से कामना करता हूं कि इस नूतन वर्ष में सब लोग एक सुदृड राष्ट्र एवं समाज के निर्माण मे अपनी महती भूमिका का भली भांती निर्वहण कर सकें.

नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाऎं
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मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

उपहार

वन विभाग के दफ्तर में बडे साहब अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने पलट रहे थे, कि तभी उनका मातहत हथकडी में जकडे दो लोगों को लेकर अन्दर दाखिल हुआ.

‘‘साहब, हम लोगों ने जंगल में इन दो शिकारियों को बन्दूकों सहित गिरफ्तार किया है। इनके पास से मारा गया एक हिरन भी बरामद हुआ है। अब आपका हमारे लिए क्या हुक्म है?’’ वन विभाग के उस रक्षक ने अपने अधिकारी से पूछा।

‘‘वैरी गुड! बडे साहब ने कहा’’ फिलहाल इन दोनों को वन चौकी के लाक–अप में डाल दो। फिर वन्य जीव रक्षा अधिनियम के अन्तर्गत इन पर गम्भीर धाराएँ लगाकर मुकदमा चलेगा तथा कड़ी सजा दिलाई जाएगी।

‘‘और..साहब, उस मारे गए हिरन का क्या किया जाए ?’’ वन विभाग के रक्षक ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘‘अब ये भी मुझे ही बताना पडेगा ” बडे साहब ने आँखें निकालीं
ठीक से काँट–छाँट कर कुछ गोश्त तो यहाँ पहुँचा देना तथा बाकी तुम सब आपस में बाँट लेना।

ओर हाँ, ध्यान रहे, उसकी खाल जरा सँभाल के उतारना, वह खराब नहीं होनी चाहिए।
मैंने पंडित जी को पूजा के आसन के लिए उपहार स्वरूप एक सुन्दर मृगछाला देने का वचन दिया हुआ है।’’

रविवार, 28 दिसंबर 2008

विंडोज xp का नया बिहारी संस्करण

माइक्रोसाफ्ट ने विंडोज एक्स.पी का बिहारी संस्करण लांच किया है.ओर विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि चिट्ठाजगत पर हरियाणवी भाषा की बढती लोकप्रियता देखकर वर्ष 2009 में हरियाणवी संस्करण भी मार्कीट में उतारणे पर विचार किया जा रहा है.
सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि कंपनी में इसके ब्रांड अंबैसटर हेतु "ताऊ" का नाम भी तय कर लिया गया है.
(किसी भी भाषा/जाति/व्यक्ति अथवा प्रदेश के सम्मान को ठेस पहुंचाने की हमारी कोई भी मंशा नहीं है, पाठकों से अनुरोध है कि कृप्या आप इस पोस्ट को केवल हास्य/मनोरंजन के तौर पर ही लें)

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

दर्द और मजबूरी

सिर्फ तीन लोग ही थे उस परिवार में.वो,उसकी पत्नि शान्ती और एक जवान लेकिन बेरोजगार बेटा.यूं तो कहने को वो एक सरकारी विभाग में चपरासी की नौकरी करता था.लेकिन किराये के मकान में रहते हुए किसी तरह बडी मुश्किल से ही परिवार का गुजारा चल पाता था.

आज जैसे ही वो डयूटी से आकर घर के एक कोने में पडी कुर्सी पर बैठने लगा तो दर्द के मारे मुंह से एक आह सी निकल पडी.
‘‘अरी! रमेश की मां, अब नहीं मुझसे बसों में उतरा–चढ़ा जाता, घुटने तो अब बिल्कुल ही जवाब देने लगे हैं। ड्यूटी पर जाकर बैठना भी बडा दूभर लगता है। अब तो डाक्टरों ने भी कह दिया, भई आराम करो। ज्यादा चलना–फिरना ठीक नहीं, बेआरामी से हालत बिगड़ सकती है।’’

‘‘अपना तो ईश्वर भी बैरी हुआ पडा है,अगर लड़का कहीं छोटे–मोटे काम पर अटक गया होता तो जैसे–तैसे गुजारा कर लेते।’’ रामलाल की बात सुनकर पत्नी के ह्र्दय की पीड़ा बाहर आने लगी।

‘‘मैंने तो अब रिटायरमैंट के कागज भेज ही देने हैं। बहुत कर ली नौकरी, अब जब शरीर ही इज़ाजत नहीं देता तो..।’’ रामलाल ने अपनी बात जारी रखी।

‘‘वह तो ठीक है...मगर...’’ पत्नी ने अपने मन की चिन्ता को और उजागर करना चाहा।

‘‘अगर–मगर कर क्या करें? चाहता तो मैं खुद भी नहीं, लेकिन...अब क्या करूं।’’

‘‘मैं तो कहती हूं कि धीरे–धीरे यूँ ही जाते रहो। तीन साल पड़े हैं रिटायरमैंट में।

क्या पता अगर कहीं तुम्हे कुछ हो गया, तो बाद में नौकरी तो मिल जाएगी लड़के को,इतना पढने के बाद भी बेकार बैठा है।’’

यह सुनते ही रामलाल का चेहरा एकदम पीला पड़ गया।
ओर पत्नी की आँखों से झर–झर आँसू बहने लगे, जिन्हे वो मुंह फेर कर छुपाने की कौशिश करने लगी।

स्वपन और यथार्थ

वह एक बहुत ही खुशनुमा सुबह थी। पूरब की लाली और मन्द हवा में झूमते वृक्ष उसे अच्छे लगे। उसने काले सफेद बादलों को देखा और इठलाते हुए आगे बढ़ गया । तभी उसे लगा कि बादलों के साथ–साथ वह भी उड़ रहा है। धूल का उड़ना उसे अच्छा लगा। उसे कलरव करते पक्षी और रंग–बिरंगे फूलों के इर्द–गिर्द इतराती तितलियां अधिक मोहक लगीं। आज उसने उस मरियल से कुत्ते को भी नहीं मारा।

फिर उसने खुद को उस खेल के मैदान में पाया। वह खुशी से तालियां बजाने लगा। तभी अचानक एक गेंद आकर उसके पांव पर लगी। वह धन्य हो गया। आज पहली बार उसने क्रिकेट की गेंद को छुआ था।

सुन्दर झील को देखते हुए वह उस रेलवे फाटक के पास पहुंचा। आज उसकी प्रसन्नता का कोई ओर–छोर नहीं था उस छोटी–सी रेलगाड़ी को इतने करीब से गुजरते देखकर। उसमें सवार यात्रियों की वह कल्पना करने लगा। तभी उसे लगा कि उसने धुएं को पकड़ लिया है। धुंए ने उससे कहा, ‘‘ऐ, मुझे मत पकड़ों। तुम्हारे कोमल हाथ गन्दे हो जाएगे।’’

उसने अपने काले और खुरदरे हाथों को देखा। तभी किसी की पुकार सुन उसकी तन्द्रा टूटी। दूर ईट की भट्ठी से उसका बाप उसे बुला रहा था।

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

गलती का एहसास

बहुत दिन हो गए थे, वह अपने पिता से नहीं बोला था। रहते तो दोनों एक ही घर में थे, लेकिन दोनों में कोई भी बातचीत नहीं होती थी।

इस बारे में परिवार के दूसरे सदस्यों को भी पता था। एक दिन उस के दादा जी ने पूछ ही लिया, ‘‘बेटा, तू अपने पिता से क्यों नहीं बोलता? आदमी के तो मां–बाप ही सब कुछ होते हैं।बेचारा तेरे लिए ही तो कमा रहा है,अखिर उसने क्या कुछ अपने साथ ले जाना है।’’

दादा जी की बात सुनकर वह बोला, ‘‘बाऊ जी! आपकी सब बातें ठीक हैं। मुझे कौन सा कोई गिला–शिकवा है। मैं तो उन्हें केवल एहसास करवाना चाहता हूँ। वे भी दफ्तर से आकर सीधे अपने कमरे में चले जाते हैं, तुम्हारे साथ एक भी बात नहीं करते।

अब आप ही बताएं कि क्या ये उचित है?

आखिर किसकी जिम्मेदारी ?

आखिर जिस का डर था, वही हुआ. काले कोट वाला टिकट–निरीक्षक यमदूत की तरह सामने खड़ा था,ओर टिकिट दिखाने का इशारा करने लगा। मैने टिकट निकाला तो देखते ही बोला, ‘‘यह तो साधारण दर्ज़े का टिकट है। स्लीपर क्लास में क्यों बैठे हो?’’
‘‘साधारण दर्ज़े के तो दो ही डिब्बे हैं। दोनों ठसाठस भरे हैं, जहां पैर रखने की भी जगह नहीं है। स्लीपर क्लास में जगह थी,सो इसी में चढ गए। वैसे भी दिल्ली के आगे तो इसमें आरक्षण भी नहीं होता।’’मैंने स्पष्टीकरण दिया।
‘‘मै ये सब नहीं जानता, कोई बहाना नहीं चलेगा। स्लीपर क्लास का किराया व जुर्माना मिला कर तीन सौ बीस रूपए हुए, जल्दी निकालो।’’ टिकट–निरीक्षक उतावला होने लगा ।
‘‘सभी के पास साधारण दर्ज़े का टिकट है।’’
‘‘तुम अपनी बात करो।’’टिकिट निरीक्षक कुछ भी सुनने को तैयार न था। विवश होकर मैंने जेब में हाथ डाला लेकिन वहाँ से पर्याप्त रकम नहीं मिली,ओर मैं दूसरी जेब खंगालने लगा। पैसे मिलने में देर होती देख, वह सामने बैठे बुजुर्ग का टिकट देखने लगा।
‘‘तुम्हारा टिकट भी साधारण दर्ज़े का है। तुम भी निकालो तीन सौ बीस रूपए।’’
‘‘मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, देने के लिए।’’ बुजुर्ग की आवाज दमदार थी।
‘‘जु्र्माना नहीं दोगे तो सजा भी हो सकती है,वो भी 3 महीने की’’टिकिट निरीक्षक ने पीछे खड़े सिपाही की ओर देखते हुए धमकी दी।
‘‘किस जुर्म में?’’
‘‘साधारण दर्ज़े के टिकट पर स्लीपर क्लास में सफर करने के लिए।’’
‘‘मुझे आप साधारण दर्जे में सीट दिला दो।’’
‘‘यह मेरी जिम्मेदारी नहीं।’’
‘‘रेलवे ने मुझे यह टिकट किस लिए जारी किया है?’’
‘‘यह टिकट केवल इस गाड़ी के साधारण दर्ज़े में सफर करने की इजाजत देता है। सीट मिलना जरूरी नहीं है।’’टिकिट निरीक्षक ने एक–एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।
‘‘क्या मैं गाड़ी की छत पर बैठ कर सफर कर सकता हूँ?’’
‘‘छत पर बैठ कर सफर करना तो इससे भी बड़ा जुर्म हैं।’’
‘‘क्या मैं दरवाजे के सथ लटक कर सफर कर सकता हूँ?’’
‘‘नहीं, रेलवे ऐसा करने की इजाजत नहीं देती।’’
बुजुर्ग एकदम गुस्से मे अपनी सीट् से उठा और उसने टिकट–निरीक्षक का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे गाड़ी में वो स्थान बता दो जहाँ बैठ कर मैं इस टिकट पर सफर कर सकता हूँ।’’
निरीक्षक को कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने किसी तरह बुजुर्ग से अपना हाथ छुड़ाया और वापस चला गया। तीन सौ बीस रूपए के नोट हाथ में पकड़े मैं बुजुर्ग को देखता रह गया।

रविवार, 14 दिसंबर 2008

बाबा जी की कृपा

राधा जिसके विवाह को हुए चार साल बीत चुके थे, किन्तु विधाता का खेल देखिए कि बेचारी की अभी तक गोद सूनी ही थी.
आस पडोस,नाते रिश्तेदारों में सुगबुगाहट होने लगी. बांझ, निपूति, अपशकुनी जैसे अलंकारों से उसे नवाजा जाने लगा.
उसने भी दवा-बूटी,पूजा-पाठ,व्रत-उपवास सब करके देख लिया,लेकिन कोई आस नहीं जगी.
उसकी सास जो कि एक 'बाबा' जी की अनन्य भक्त थी, उनके पास चलने के लिए उसे अक्सर मजबूर किया करती।
‘‘बहू! मेरी भी इच्छा है कि मैं अपने इकलौते बेटे के घर बच्चा देखूं। आखिर खानदान को चलाने वाला भी तो कोई होना चाहिए’’

एक दिन सास के ज्यादा मजबूर करने पर राधा ने हाँ कर दी। डरी–सहमी राधा अपनी सास के साथ बाबा जी के डेरे जा पहुँची। काफी समय इंतजार करने के बाद अंदर कमरे में दर्शनों के लिए बुलाया गया। बाबा के साथ उसकी सास ने कुछ बातचीत की। इतने में बाबा के शिष्यों ने ना मालूम उसे किस चीज का धुआँ देना शुरू कर दिया। पता नहीं धुएँ में क्या मिला हुआ था कि उसकी आँखें धीरे–धीरे बंद होनी शुरू हो गई। बेहोशी छाने लगी ओर आखों के सामने नीले–पीले रंग तैरने लगे।

राधा जब होश में आई तो उसे अपना सिर भारी भारी लगा। बदन टूटता सा महसूस हुआ आंखे खोलकर देखा तो कमरे में हल्का सा अंधेरा था। उसने मिचमिचाती आँखों को जोर लगा कर खोलने की कोशिश की। अपने आप को नग्न अवस्था में पाकर, उसकी एकदम चीख निकल गई। उसने चकराते सिर से जल्दी–जल्दी कपड़े पहने और बाहर निकल आई। उसकी सास घुटनों में सिर दिए बैठी थी, रोती आँखों से अपनी सास की तरफ घूरकर देखा। सास ने उसे गले लगा लिया तो राधा सुबक सुबक कर रोने लगी।

‘‘हिम्मत कर बेटी औरत को औलाद की खातिर पता नहीं क्या क्या सहना पडता हैं। तेरा पति भी तो बाबा जी की कृपा से ही हुआ है।’’
बर्फ हुई राधा धड़ाम से धरती पर गिर पड़ी।

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

कुछ हरियाणवी चुटकले

1. एक बार एक सेठ की दुकान में चोरी हो गई । सेठ ने थाने में रपट लिखवा दी ।

अगले दिन सेठ की दुकान पर तीन सिपाही आ पहुंचे और पूछताछ करने लगे । फिर एक सिपाही ने एक बोरी में से थोड़े भुने हुए चने उठाये और खाने लगा । दूसरे ने थोड़ी मूंगफली की मुट्ठी भर ली और तीसरे ने पतासे खाने शुरु कर दिये ।

थोड़ी देर बात थाणेदार आया और सेठ से बोला - सेठ, कितने का नुकसान हुआ ?

सेठ ने जवाब दिया - जी, नुकसान खतम कित हुया सै, ईबै तै होण ए लाग रहया सै !!
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2. एक बार एक बनिये की छोरी(लडकी) के ब्याह में फेरे करवाण खातिर कोई पंडित ना मिल्या । जब कित्तै तैं पंडित का जुगाड़ ना हुया तै छोरी आळे एक जिम्मेदार जाट नै ले आये । जाट नै फेरे शुरु करवा दिये ।

तीन फेरे होण पाच्छै जाट बोल्या - भाइयो, रस्म तै पूरी हो-गी, छोरी की विदाई करवाओ ।

छोरे आळे बाराती बोले - जी, फेरे तै सात होया करैं,अर इभी तो तीन ही होए हैं ।

जाट बोल्या - भाई, बात इसी सै, जे उसनै रुकणा होगा तै तीन फेरयां में भी कित्तै ना जावै । अर जै इसनै भाजणा ए सै, तै चाहे पच्चीस फेरे करवा ल्यो !!
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3. एक बार एक सेठ के घर में सांप घुस गया । सेठ ने चिल्लाना शुरू किया, लोग इकट्ठे हो गए । एक जाट गया अन्दर लाठी ले कर । उसके घुसते ही सेठ बाहर आया और दरवाजे की कुंडी बंद कर दी ।

लोग बोले - सेठ ये क्या किया ?

सेठ बोल्या - दो दुश्मन भीतर सैं - एक तै मरै ए गा !!
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4. एक बार एक बीमे का एजेन्ट गाहक बणावन खातिर एक गाम में चल्या गया और लाग्या एक ताऊ नै बीमे की पोलिसी समझावण । बोल्या - ताऊ, या पोलिसी इसी सै अक जै तू मर-ग्या तै तेरे घर आळां नै इतने पैसे मिल-ज्यांगे । अर या एक और पोलिसी इसी सै अक जै तू मर ग्या, तै जितने का बीमा सै, उसतैं दुगुने पैसे मिल ज्यांगे ... अर एक या नई पोलिसी सै जिसमैं तीन गुणे पैसे मिल ज्यांगे ।

ताऊ कै आया गुस्सा, अर बोल्या - "भाई, तेरी सारी पोलिसी ठीक सैं - तू आपणी या किताब तै बंद कर दे, अर कोई इसी पोलिसी बता दे अक मर तै बीमे का एजेंट जावै और पैसे हम नै मिल जावैं !!

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

हमसा बेहया कोई नहीं !




एक दिन वह था कि हम सारे जहां में फर्द थे.

 
 
 
 
 
 
     
एक दिन यह है कि हमसा बेहया कोई नहीं
एक दिन वह था कि अपनी शान पर देते थे जान 
एक दिन यह है कि हमसा बेहया कोई नहीं

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

कुत्तों का सामाजिक विकास (व्यंग्य)

पिछले कईं दिनों से चिट्ठाजगत पर कुतों के विषय में चल रही चर्चा को देखते हुए, सोचा कि इस महान जीव के विषय में अपनी 'कुक्कुरमति' द्वारा मैने जो भी ज्ञान उपार्जित किया है,उसे आपसे सांझा कर ही लेता हूं.
                     कुत्तों का समाजिक विकास

कुत्ता वास्तव में एक ऎतिहासिक प्राणी है, किन्तु आधुनिक युग मे प्रवृत्ति के हिसाब से इस प्राणी का जितना अभूतपूर्व विकास हुआ है। उतना तो शायद मनुष्य का भी नहीं हुआ है.इंसानो के साथ रहते हुए कुछ तो अपने को कुत्ता ही नहीं समझते। उनका अपना अहंकार होता है। उनकी अपनी चाल होती है। वे आपकी तरफ़ देखेंगे तो कुछ इस तरह जैसे यह उनकी कृपा है कि वे आपको देख रहे हैं।वे कुत्तों में अपने को आर्य समझते हैं।

रंग-रूप,कद-काठी के अतिरिक्त प्रकृति के आधार पर कुतों को दो भागों में बांटा जा सकता है.

एक वो जो काटते हैं-कुतों की यह प्रजाति मुख्यत: पुलिस विभाग में पाई जाती है,जिनका अपना हि एक भिन्न प्रकार का स्वाभिमान होता है.हर रास्ता चलते प्राणी पर गुर्राना ओर अपनी ताकत का अहसास कराना ईनका मौलिक अधिकार माना जाता है.

ईश्वर की तरफ़ से प्राप्त सबसे अनूठे उपहार अपनी घ्राणशक्ति का भी सबसे अधिक उपयोग यही प्रजाति करती हैं।साधारण मनुष्य तो इनके सामने अपने आप को पूर्णत: दीन-हीन अवस्था मे महसूस करता है.खानपान के मामले मे यह प्रजाति थोडी पेटू टाईप की होती है, आप इन्हे सर्वाहारा भी कह सकते है.इनकी पाचन क्षमता बहुत ही विलक्षण होती है,क्यों कि इस पृथ्वी की ऎसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसका भक्षण करने मे ये अपने आप को असमर्थ पाते हों.
किन्तु समाजिक स्तर पर अभी यह विकासशील प्रजाति है.

दूसरे वो जो केवल भौंकते है- कुत्तों मे यह पूर्णत: विकसित प्रजाति मानी जाती है.सीमित साधनों के बावजूद् जितनी उन्नति इस प्रजाति ने की है, उतनी तो निश्चित तौर पर मनुष्य जाति ने भी नहीं की है.पहले कुते को इंसान का वफादार सेवक तथा रक्षक समझा जाता था,किन्तु शनै: शनै: इनकी 'कुत्तापंती' का ऎसा विकास हुआ कि आज इनकी रक्षा का दायित्व मनुष्य जाति को सौंपा जाता है.

इस तरह के कुत्ते मुख्यत: राजनीती में पाए जाते है.इनकी विकास क्षमता का आंकलन आप इसी बात से लगा सकतें हैं कि इनमे से कुछ तो किसी राज्य विशेष के मुख्यमन्त्री पद पर शोभायमान हो चुके हैं. वास्तव मे ऎसी अविश्वसनीय उन्नति का 'राज' केवलमात्र इनकी 'भौंकन-क्षमता' मे ही निहित है.इनकी इसी 'भौंकन कला' के वशिभूत होकर मानव जाति इनके पीछे चलने में, अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है.

किन्तु स्वभावत: ये थोडे (या अधिकतर)दम्भी एवं अहंकारी होते है., तथा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने,एवं मनुष्य जाति को उनकी हीनता का अहसास कराने हेतु समय-समय पर उन्हे प्रताडित भी करते रहते हैं.
कुतों में मुख्यत: पाया जाने वाला वफादारी नामक गुण, जिसके आधार पर कुता वास्तव में कुत्ता कहलाने का अधिकारी है, उस गुण का शनै: शनै: इनमे पूर्णत: ह्रास होता चला गया.

आज जैसे-जैसे इन्सान अपनी 'इन्सानियत'से दूर होता जा रहा है,वैसे ही इन्होने भी अपनी 'कुत्तानियत' का परित्याग कर दिया है.

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

कुछ हरियाणवी चुटकले

1.
एक बार एक चौधरी साहब छोरी देखन चले गए .
आपने छोरे खातर . छोरी जमीं घनी काली थी . चोधरी
साहब के कोन्या पसंद आई . छोरी का बाबू बोल्या चोधरी
साहब छोरी नै पसंद कर जाओ . कार दे देवां गे दहेज़ मै .
चोधरी साहब बोल्ये -- भाई तू तो कार दे कै डिगा देगा .
जै यो खरना म्हारे चला गया तो आगली पीडी में म्हारी
छोरी ट्रक दिए पाछे भी ना ब्याई जावै

2.
एक बार एक मुक्कदमे में ताई गवाह बना दी ! ताई जा के खड़ी होई, अर् दोनू वकील भी ताई के गाम के ई थे !
वकील बोल्या " ताई तू मन्ने जाने है ?
ताई" हाँ तू रामफूल का है ना. तेरा बाबु घणा सूधा आदमी था पर तू कत्ति निक्कमा एक नम्बर का झूठा . झूठ बोल बोल कै तूं लोग नै ठगे है नरे झूठे गवाह बना के तू केस जीते है . तेरे तें तो सारे लोग परेशान हैं तेरी लुगाई भी परेशान हो के तन्ने छोड़ कै चली गयी !
वकील बेचारा चुप. उसनै थोडी देर मैं दूसरे वकील कानी ईसारा करया अर फेर पुछया " तू इसने जाने है ?"
ताई बोली " हाँ यो रूल्दू का छोरा है. इसके बाबु ने निरे रूपिये खर्च करके यो पढाया अर् इसने कख नही सिखया सारी उमर छोरिया पाछै हांडे गया. इसका चक्कर तेरी बहू गेल भी था ! आज ताहि इसने एक भी मुक्कादमा नही जित्या है!
जनता हांसन लग गयी जज बोल्या "आर्डर आर्डर "
अर् दोनू वकील बुलाये और कहन लगया " जे थाम दोनुवा में तै किसे नै भी या पूछ ली के या मन्ने जाने है तो मैं थारे गोली मरवा दयूंगा.

3.
एक बै एक किसान रहट में बैल जोड़कर पानी निकाल रहा था .
बैल अपने आप चारो तरफ़ गोल गोल घूम रहे थे और किसान आँख बंद कर पेड़ के नीचे लेटा हुआ था .
तभी उधर से एक वकील साहब गुजरे . वो किसान से बोले .
वकील बोल्या --तुम यहाँ पेड़ के नीचे लेटे हो तुम्हे कैसे पता चलता है कि बैल पानी निकाल रहे है, वो खड़े भी हो सकते है . और तुम सोचोगे वो चल रहे है .
किसान बोल्या -- भाई मैं इतना पागल कौणी, मणै घंटी बाँध राखी सै उनके गले में . जै वे रुकेंगे
तो घंटी बाजनी बंद हो ज्या गी और मने बेरा लाग ज्या गा .
वकील फेर बोल्या -- अरे जै वे बैल एक जगह खड़े हो कै नाड हिलान लाग गे तै फेर ताने क्यूकर बेरा
लगेगा की खड़े सै के रुक रे सै .
किसान बोल्या --- भाई वे इसा काम कोन्या करैं . वे बैल सै वकील कोन्या
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रफ़्तार