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गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

बस यूं हीं----------- चन्द उधार के चुटकुले

बहुत दिनों से या तो कुछ लिखने का ही मन नहीं कर रहा था।या फिर अगर मन मारकर लिखने भी बैठा तो  गम्भीर विषय ही सूझा। इसलिए  पिछली दो चार पोस्टें गंभीर सामाजिक विषयों पर ही लिखी गई। अचानक आज पुरानी ईमेल चैक कर रहा था तो उनमे एक मेल दिखाई दी,जिसके जरिए किसी अंजान शख्स नें ढेर सारे चुटकुले भेजे हुए थे। पढने पर बढिया लगे तो सोचा कि क्यूं न आप लोगों के साथ बांट कर मूड को थोडा हल्का कर लिया जाए। तो फिर लीजिए, उन्ही मे से चन्द उधार के चुटकुले झेलिए और हमारे साथ आप भी थोडा सा मुस्कुरा लीजिए.:-----
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                                             चोर की इन्सानियत
एक चोर एक घर में चोरी करने गया। तिजोरी पर लिखा था - तिजोरी को तोड़ने की जरूरत नहीं है। 123 नंबर लंगाकर सामने वाला लाल बटन दबाओ, तिजोरी खुल जाएगी।

जैसे ही चोर ने बटन दबाया, अलार्म बजने लगा और पुलिस आ गई।

जाते-जाते चोर ने घर के मालिक से कहा -----"लानत है तुम पर! आज तुम्हारे कारण मेरा इंसानियत से विश्वास उठ गया है ".....
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                                            स्त्री की कर्तव्यनिष्ठा
इंटेलिजेंस ब्यूरो में एक उच्च पद हेतु भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी। अंतिम तौर पर केवल तीन उम्मीदवार बचे थे जिनमें से किसी एक का चयन किया जाना था। इनमें दो पुरुष थे और एक महिला।
फाइनल परीक्षा के रूप में कर्तव्य के प्रति उनकी निष्ठा की जांच की जानी थी। पहले आदमी को एक कमरे में ले जाकर परीक्षक ने कहा - ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।'' फिर उसने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा - ''उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।''
''मैं अपनी पत्नी को किसी भी हालत में गोली नहीं मार सकता''- आदमी ने कहा।
''तो फिर तुम हमारे किसी काम के नहीं हो। तुम जा सकते हो।'' - परीक्षक ने कहा।

अब दूसरे आदमी को बुलाया गया। ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।'' कहकर परीक्षक ने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा - ''उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।'' आदमी उस कमरे में गया और पांच मिनट बाद आंखों में आंसू लिये वापस आ गया। ''मैं अपनी प्यारी पत्नी को गोली नहीं मार सका। मुझे माफ कर दीजिये। मैं इस पद के योग्य नहीं हूं।''

अब अंतिम उम्मीदवार के रूप में केवल महिला बची थी। उन्होंने उसे भी बंदूक पकड़ाई और उसी कमरे की तरफ इशारा करते हुये कहा - ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगी चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो। उस कमरे में तुम्हारा पति बैठा है। जाओ और जाकर उसे गोली से उड़ा दो।'' महिला ने बंदूक ली और कमरे के अंदर चली गई। कमरे के अंदर घुसते ही फायरिंग की आवाजें आने लगीं । लगभग 11 राउंड फायर के बाद कमरे से चीखपुकार, उठापटक की आवाजें आनी शुरू हो गईं। यह क्रम लगभग पन्द्रह मिनटों तक चला उसके बाद खामोशी छा गई।
लगभग पांच मिनट बाद कमरे का दरवाजा खुला और माथे से पसीना पोंछते हुये महिला बाहर आई। बोली - ''तुम लोगों ने मुझे बताया नहीं कि बंदूक में कारतूस नकली हैं। मजबूरन मुझे उसे पीट-पीट कर मारना पड़ा।''
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                                            सस्ता समाधान
एक आदमी मनोचिकित्सक के पास गया । बोला -''डॉक्टर साहब मैं बहुत परेशान हूं। जब भी मैं बिस्तर पर लेटता हूं, मुझे लगता है कि बिस्तर के नीचे कोई है। जब मैं बिस्तर के नीचे देखने जाता हूं तो लगता है कि बिस्तर के ऊपर कोई है। नीचे, ऊपर, नीचे, ऊपर यही करता रहता हूं। सो नहीं पाता । कृपा कर मेरा इलाज कीजिये नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगा।''
डॉक्टर ने कहा - ''तुम्हारा इलाज लगभग दो साल तक चलेगा। तुम्हें सप्ताह में तीन बार आना पड़ेगा। अगर तुमने मेरा इलाज मेरे बताये अनुसार लिया तो तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे।''
मरीज - ''पर डॉक्टर साहब, आपकी फीस कितनी होगी ?''
डॉक्टर - ''सौ रूपये प्रति मुलाकात''
गरीब आदमी था। फिर आने को कहकर चला गया।
लगभग छ: महीने बाद वही आदमी डॉक्टर को सड़क पर घूमते हुये मिला ।
''क्यों भाई, तुम फिर अपना इलाज कराने क्यों नहीं आये ?'' मनोचिकित्सक ने पूछा।
''सौ रूपये प्रति मुलाकात में इलाज करवाऊं ? मेरे पड़ोसी ने मेरा इलाज सिर्फ बीस रूपये में कर दिया'' आदमी ने जवाब दिया।
''अच्छा! वो कैसे ?''
''दरअसल वह एक बढ़ई है। उसने मेरे पलंग के चारों पाए सिर्फ पांच रूपये पाए के हिसाब से काट दिये।''
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                                          विज्ञान का अन्तिम सत्य
एक जीवविज्ञानी मेंढ़कों के व्यवहार का अध्ययन कर रहा था। वह अपनी प्रयोगशाला में एक मेंढ़क लाया, उसे फर्श पर रखा और बोला - ''चलो कूदो !'' मेंढ़क उछला और कमरे के दूसरे कोने में पहुंच गया। वैज्ञानिक ने दूरी नापकर अपनी नोटबुक में लिखा - ''मेंढ़क चार टांगों के साथ आठ फीट तक उछलता है।''
फिर उसने मेंढ़क की अगली दो टांगें काट दी और बोला - ''चलो कूदो, चलो !'' मेंढ़क अपने स्थान से उचटकर थोड़ी दूर पर जा गिरा। वैज्ञानिक ने अपनी नोटबुक में लिखा - ''मेंढ़क दो टांगों के साथ तीन फीट तक उछलता है।''
इसके बाद वैज्ञानिक ने मेंढ़क की पीछे की भी दोनों टांगे काट दीं और मेंढ़क से बोला - ''चलो कूदो!''
मेंढ़क अपनी जगह पड़ा था। वैज्ञानिक ने फिर कहा - ''कूदो! कूदो! चलो कूदो!'' पर मेंढ़क टस से मस नहीं हुआ।
वैज्ञानिक ने बार बार आदेश दिया पर मेंढ़क जैसा पड़ा था वैसा ही पड़ा रहा ।
वैज्ञानिक ने अपनी नोटबुक में अंतिम निष्कर्ष लिखा - ''चारों टांगें काटने के बाद मेंढ़क बहरा हो जाता है।''
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो

ईश्वर द्वारा निर्मित इस प्रकृति का अपना एक पूर्ण चक्र है -----जिसका सिर्फ एक ही नियम है कि एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो। इस वर्तुल को तोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन हम लोग क्या कर रहे हैं कि, बस सिर्फ और सिर्फ लिये चले जा रहे हैं,देना तो हम लोगों नें सीखा ही नहीं। इसीलिए धीरे-धीरे आज सारे प्राकृ्तिक जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती निरन्तर विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं, झीलें, तालाब खत्म हो  रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इतनी बुरी तरह से बिगाड़ चुके हैं कि भविष्य में इस पर रह ही नहीं पाएंगे,अपितु जीने के लिए हमें किसी और नए ग्रह की खोज करनी पडेगी ।

देखा जाए तो इस स्थिति के लिए आधुनिक विज्ञान भी कोई कम दोषी नहीं है। उसका रवैया भी सदैव विजेता वाला ही रहा है। विज्ञान ये सोचता है कि धरती और आकाश से दोस्ती कैसी, उस पर तो बस विजय हासिल करनी है। हमने कुदरत से खिलवाड किया , किसी नदी का मुहाना मोड़ दिया, किसी पहाड़ का कुछ हिस्सा काट लिया, किसी प्रयोगशाला में चन्द रसायनिक क्रियाएं संपन्न कर ली और बस समझने लगे कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

आप प्लास्टिक को ही देखिए। उसे बना कर सोचने लगे कि कमाल है! ये तो न जलता है, न गीला होता है, न जंग लगती है - कितनी महान उपलब्धि है। उपयोग के बाद उसे फेंक देना भी कितना सुविधाजनक है। जिस भी पदार्थ,जीव-जन्तु,पशु-पक्षी,मनुष्य,पेड-पौधे इत्यादि की रचना प्रकृ्ति नें की है,अगर आप उन्हे वापस जमीन में डाल दो तो वह पुन: अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं।लेकिन अगर प्लास्टिक को जमीन में गाड़ दो और बरसों बाद खोदो तो भी वैसा का वैसा ही पाओगे।क्योंकि प्रकृ्ति प्लास्टिक जैसे मनुष्य निर्मित किसी पदार्थ को आत्मसात नहीं करती। लेकिन हम लोग हैं कि अपनी इन महान उपलब्धियों के दंभ में चूर स्वयं अपने ही हाथों विनाश के बीज बोए चले जा रहे हैं । अब इन बीजों से उत्पन फसल कैसी होगी,हमारे पास ये सोचने का भी समय नहीं है। बस चले जा रहे हैं---------विज्ञान के रथ पर सवार होकर कुदरत पर विजय हसिल करने को।

पर्यावरण का अर्थ है संपूर्ण का विचार करना। भारतीय मनीषा हमेशा 'पूर्ण' का विचार करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। सीमित दृष्टि पूर्णता का विचार नहीं कर सकती। एक बढ़ई सिर्फ पेड़ के बारे में सोचता है। उसे लकड़ी की गुणवत्ता की जानकारी है। पेड़ की और कोई उपयोगिता उसे मालूम नहीं है कि वे किस तरह बारिश होने में अपना योगदान देते हैं ,वे किस तरह मिट्टी को बांध कर रखते हैं। उसे तो बस सिर्फ अपनी लकड़ी से मतलब है।वैसी ही सीमित सोच ले कर हम अपने जंगलों को काटते चले गए और अब भुगत रहे हैं। अब आक्सीजन की कमी महसूस हो रही है। वृक्ष न होने से पूरा वातावरण ही अस्तव्यस्त होता जा रहा है। मौसम का क्रम बदलने लगा है। सावन के महीने में सूखा पड रहा है, सर्दियों में पसीने छूटने लगे हैं। और वायु प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं।इसे पढकर बहुत से मेरे जैसे लोग ये भी सोच रहे होंगे कि हमें इन सब से क्या लेना!मान लो, अगर कुछ समस्याएं उत्पन हों भी रही हैं तो सारी दुनिया के लिए ही तो हो रही हैं,कौन सा हमें अकेले को परेशानी उठानी पड रही है। अब जैसे बाकी दुनिया जियेगी,वैसे ही हम भी जी लेंगे।

सुना है कि किसी जमाने में एक राजा था । उसने एक दिन देखा कि खेत-खलिहानों में पक्षी आते हैं और अनाज खा जाते हैं। वह सोचने लगा कि ये अदना से पंछी पूरे राज्य में लाखों दाने खा जाते होंगे। इसे रोकना होगा। तो उसने राज्य में ऐलान कर दिया कि जो भी पक्षियों को मारेगा उसे इनाम दिया जाएगा। बस ईनाम के लालच में राज्य के सारे नागरिक शिकारी हो गए और देखते ही देखते पूरा राज्य पक्षी विहीन हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उत्सव मनाया गया कि आज उन्होंने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

किन्तु अगले ही वर्ष गेहूँ की फसल पूरी तरह से नदारद थी। क्योंकि मिट्टी में जो कीड़े थे और जो टिड्डियां थीं, उन्हें वे पक्षी खाते थे और अनाज की रक्षा करते थे। इस बार उन्हें खाने वाले पक्षी नहीं रहे, सो, कीडे-मकोडों नें पूरी फसल चट कर डाली।किसी विद्वान के बताने पर राजा के बात समझ में आई और उसके बाद उसे विदेशों से पक्षी मंगवाने पडे।

यह सृष्टि परस्पर निर्भर है। उसे किसी भी चीज से रिक्त करने की कोशिश बेहद खतरनाक है। न हम पूर्णत: स्वतंत्र हैं, और न ही परतंत्र । यहाँ हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे लिए सहोदर के समान है। हमें इन सबके साथ ही जीने का सलीका सीखना होगा।
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रफ़्तार