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गुरुवार, 21 मई 2009

(कु) संगति का असर.....:)

 अब तक अपनी जिन्दगी के हम 35 बसन्त देख चुके हैं किन्तु आज तक जीवन में कभी ऎसा महसूस नहीं हुआ, जैसा कि पिछले कुछेक दिनों से हो रहा है। हमें तो लगने लगा है कि शायद हमारी मति भ्रष्ट हो चुकी है
अभी परसों की ही बात है, बैठे बैठे मन में विचार आया कि चलो कोई नईं ढंग की पोस्ट ही लिख ली जाए। वैसे यहां बहुत से लोग शायद ये भी सोच रहे होंगे कि पहले क्या कभी ढंग की पोस्ट लिखी है, जो अब की बार लिखोगे .:)। लेकिन खैर जैसा भी है, कभी किसी हलवाई को अपनी मिठाई की बुराई करते सुना है। और तो और जब एक सब्जी वाला भी कभी अपनी सब्जी को खराब नहीं कहता (चाहे कैसी भी गली सडी क्यूं न हो) तो भई हम तो फिर भी एक ब्लागर हैं। हम अपने लिखे को खराब कैसे कह सकते हैं। अब पढने वाला चाहे लाख बुराई करता रहे-----हमारी बला से।
Computing

 खैर छोडिए, मुद्दे की बात की जाए। हां तो हम परसों जब एक नई पोस्ट लिखने बैठे, जो कि भ्रूण हत्या जैसे एक गंभीर सामाजिक विषय पर आधारित थी। जिसका कि हमने शीर्षक भी अपने दिमाग में सोच के रख लिया था। लेकिन ये क्या! हम लिखना कुछ चाहें,लिखा कुछ जाए.......... कहां तो कन्या भ्रूण हत्या पर लिखने बैठे थे ओर कहां दिमाग में वफा, अश्क, लम्हे,जुबां, मयखाना जैसे शब्द गूंजने लगे। एक दो बार दिमाग से इन शब्दों को परे झटकने का प्रयास किया, सीट से उठकर दो चार मिनट चहलकदमी भी की। लेकिन जब दोबारा से लिखने बैठे तो फिर वही हाल। दिमाग सोच सोच कर परेशान कि आखिर ये हो क्या रहा है। जब सोचने समझने की बिल्कुल भी ताकत न रही तो लैपटाप उठा कर साईड में रख दिया। धर्मपत्नि को कह कर तेज मसाले वाली कडक चाय बनवाई। चाय पीते पीते अचानक से दिमाग की घण्टी बजने लगी, कि हो न हो जरूर ये सब संगति का असर है।  शायर, कवि बिलागर भाईयों (बहनें भी) की कविताएं/गजलें पढ पढ कर दिमाग में काव्यरसिकता छाने लगी है।  कबीर दास जी सच कह गए हैं कि "कबीरा संगत साधु की, कभी न निष्फल जाए"
अब भाई लोगों की (कु) संगति का ये असर हुआ कि हम पिछले तीन दिनों से बेफालतू की तुकबन्दी  करने में ही उलझे हुए हैं। बार बार लिखे जा रहे हैं, मिटाए जा रहे हैं। लेकिन इतनी सर खपाई का ये नतीजा जरूर निकला कि हम इन तीन दिनों में 2- 4 लाईनों की तुकबन्दी करने में सफल हो गए।

अब जब चन्द लाईनें लिख ही ली हैं तो फिर उन्हे कोई सुनने वाला भी तो चाहिए कि नहीं। बस इसी उधेडबुन में खोए हम कोई मुर्गा फंसने की राह देख रहे थे। तभी शाम को अचानक से बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के भाई मुफलिस जी का आना हो गया। हमने भी आव देखा न ताव , बस दुआ सलाम करते ही झट से उन्हे पकाना शुरू कर दिया। अभी मुश्किल से कोई दो लाईनें ही सुना पाए थे कि मुफलिस जी उठ खडे हुए। बोले कि कोई काम याद आ गया है, इसलिए अभी जाना पडेगा। फिर किसी दिन आराम से बैठकर महफिल जमाते हैं।

अब मुफलिस जी तो पल्लू  छुडा के भाग लिए और साथ ही हमारे भी ज्ञान चक्षु खुल गए कि भई, ये काम अपने बस का नहीं.....अपनी तो पंडिताई भली जिसमे यूं किसी की मिन्नतें तो नहीं करनी पडती। बस हींग लगे न फटकरी और रंग चौखा

किसी ने सच ही कहा है कि इन्सान कवि या शायर तब ही बन पाता है, जब कि उसमे सामने वाले को पकड के रखने का (अव) गुण विकसित हो चुका हो.:)। लेकिन शायद ऊपर वाले ने हमें इस (दुर)गुण से नवाजा ही नहीं।

खैर चलते चलते आप खुद पढ लीजिए कि आप लोगों की (कु) संगति में रह कर कैसी ऊलजलूल तुकबन्दी को अंजाम दिया है। लेकिन ध्यान रहे-----कि हूटिंग करना मना है।
जिन्दगी
फर्ज की लहरों पे अब तक डौल रही है जिन्दगी
 रिश्तों के पलडे में खुद को तौल रही है जिन्दगी !!

यूं तो,हर तरफ दिख रही है भीड इस जमाने की
पर कहीं कुछ अपना सा, टटोल रही है जिन्दगी !!

हर शख्स चेहरे पे इक नकाब पहने फिर रहा 
पर धीरे-धीरे सबके पर्दे खोल रही है जिन्दगी !!

आज तलक उलझा हुआ हूं उन्ही चन्द सवालों में
"अब भी कईं जवाब हैं बाकी" बोल रही है जिन्दगी !!

सोमवार, 18 मई 2009

प्रतिभा संसाधनों की मौहताज नहीं होती

हिन्दुस्तान के दिल यानी दिल्ली में सडक के किनारे चाय बेचता हुआ यह व्यक्ति आपको किसी भी दूसरे चाय वाले की तरह ही नजर आएगा। परन्तु ये कोई जरूरी तो नहीं कि जो दिखता है, वह असल में वैसा ही हो। इस चाय वाले का नाम है लक्ष्मण राव। लेकिन आप हैरान रह जाएंगें, जब आपको पता चलेगा कि ये कोई मामूली चाय वाला नहीं बल्कि एक साहित्यकार है, जिनकी अब तक कुल 18 पुस्तकें छप चुकी हैं। किसी ने सच ही कहा है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।

दिल्ली में आईटीओ के नजदीक चाय की दुकान चलाने वाले 53 वर्षीय लक्ष्मण राव का 'भारतीय साहित्य कला प्रकाशन' नाम से स्वयं का प्रकाशन संस्थान भी है। लक्ष्मण राव बताते हैं कि मैं पिछले 28 या 29 सालों से लघु कहानियां, नाटक और उपन्यास लिख रहा हूं। उन्होंने बताया कि मैने अपनी पहली किताब सन 1979 में लिखी थी, जिसका शीर्षक था  "नई दुनिया की नई कहानी" जिसमें मैंने अपने जीवन के सारे संघर्षो और चुनौतियों का चित्रण किया है।

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक गरीब किसान परिवार में जन्मे लक्ष्मण राव को हिंदी साहित्य से विशेष लगाव रहा है। उन्होंने 1973 में मुंबई विश्वविद्यालय से हिंदी माध्यम में 10वीं की शिक्षा पूरी की। इन्हे बचपन से गुलशन नंदा के उपन्यासों से विशेष लगाव रहा है।

लक्ष्मण ने कहा कि वह जीवन के शुरुआती दौर में लेखक बनना नहीं चाहते थे, पर एक घटना ने उन्हे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। एक छोटा बच्चा, जो नदी में नहाने गया था, डूब कर मर गया और इस घटना ने उन्हे इतना उद्वेलित किया कि अपनी भावनाओं को एक शक्ल देने के लिए उन्होंने किताबों का सहारा लिया। हालांकि घर के कमजोर आर्थिक हालात की वजह से उन्हे अपनी पढ़ाई दसवीं कक्षा के बाद छोड़नी पड़ी। आजीविका के लिए उन्होंने कुछ समय के लिए स्थानीय मिल और निर्माण स्थलों पर भी काम किया। पर फिर वह 1975 में दिल्ली आ गए। दिल्ली में दरियागंज इलाके में किताब बाजार को देखकर उनका शौक एक बार फिर जाग उठा। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार के माध्यम से स्नातक की डिग्री ली। अपनी जमा पूंजी से उन्होंने एक चाय की दुकान खोली और तब से वह किताबें लिखने में जुट गए। हालांकि उन्हे किसी प्रकाशक से कोई सहायता नहीं मिली। तब उन्होंने सोचा कि वह अपनी किताबों को खुद ही लिखेंगे, प्रकाशित करेगे और खुद ही बेचेंगे। लक्ष्मण राव गर्व से कहते है, मेरी कुछ किताबों को आप सार्वजनिक पुस्तकालयों और स्कूली पुस्तकालयों में भी देख सकते है।
www.hamarivani.com
रफ़्तार