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सोमवार, 30 नवंबर 2009

नारी मुक्ति का ये प्रपन्च.."सशक्तिकरण"

हमने जब से ब्लागिंग की दुनिया में कदम रखा है, बस तभी से यही देखने में आ रहा है कि जिधर देखो उधर ही नारी के कष्टों, उसके पहनावे, शरीर रचना और उसके अधिकारों की कथाएँ बाँची जा रही है, लेकिन हमें ये बात बडी अजीब सी लगी कि "नारीमुक्ति-नारीमुक्ति" की चीखो चिल्लाहट में पुरूष की समस्याओं की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा। जब कि हकीकत में समस्याएं दोनों ओर हैं। जब तक दोनों पक्ष की समस्याएं अलग अलग रहेंगी ओर नारी अपनी सुविधा, सुख और अधिकार की पुकार में पुरूष को भूली रहेगी ओर जब तक पुरूष नारी की उपेक्षा करता रहेगा, तब तक गृ्हस्थ जीवन और सामाजिक स्थिति दोनों ही निराशाजनक, निरानन्द और नि:सत्व रहने वाली है। आप बेशक नारी मुक्ति के नाम पर भले ही लाख चीखते चिल्लाते रहें । बताईये क्या एक की कठिनाईयों को अतिरंजित करके, दूसरे को गाली देने से समाज सुखी हो सकता है ?--- नहीं हो ही नहीं सकता ओर न ही इससे नारी की ही दशा में कुछ सुधार हो सकता है । होगा तो दोनों की समस्याओं को समझने ओर एक दूसरे के प्रति उदार दृ्ष्टि रखने से ही।

आज देखिए पारिवारिक जीवन कितने निरानन्द हो रहे हैं। घर की चारदिवारियों में समाज की न जाने कितनी समस्याएं उठती हैं ओर डूब जाती हैं,न जाने कितना करूण क्रन्दन, न जाने कितना अविश्वास, न जाने कितना आक्रोश इनमें एकत्र हैं। हमें कुछ शिक्षा ही इस प्रकार की दी जा रही है कि पश्चिम जो कुछ हमारे कानों में डालता जाता है, उसे हम तोते की तरह से रटते और उगल देते हैं। कुछ रटी शब्दावलियाँ, कुछ ढले हुए तर्क और सिर्फ ओर सिर्फ अपने अधिकारों की बातें----बस ले देकर यही हमारी पूंजी है। चाहे कोई पत्रिका उठाकर देख लीजिए या फिर नारी मुक्ति का झंडा लिए फिरने वाले चिट्ठों को पढ लीजिए, स्त्रियों के विषय में वही चन्द बातें हैं, जो हमारे दिलों से नहीं बल्कि मुँह से मशीन की भान्ती निकलती हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि नारी की दशा सुधारने के फार्मूले देने वालों और देने वालियाँ न सिर्फ दाम्पत्य जीवन को बर्बाद करने पे तुली हुई हैं वरन परिवार एवं समाज के बीच की कर्तव्यश्रृंखला भी शिथिल की जा रही है।

देखा जाए तो आज की इस वर्तमान सभ्यता ने हमारे सारे नैतिक अंकुश ढीले कर दिए हैं। उसने मानव जीवन से कर्तव्य का भाव, धर्म का भाव समाप्त कर डाला है। त्याग एवं आत्मनियन्त्रण की अपेक्षा भोग, अधिक से अधिक भोग की अकांक्षा मन में पैदा कर दी गई है। आधुनिक युग के कर्कश स्वर नें और आधुनिक सभ्यता के बाह्य तथा कृ्त्रिम युग आकर्षण नें नारी के दया, स्नेह एवं मातृ्त्व जैसे नैसर्गिक गुणों को हमारी आँखों से ओझल कर दिया है। आज धीरे धीरे वे सब नियन्त्रण और बन्धन टूटते जा रहे हैं, जिनके कारण स्त्री-पुरूष के आपसी सम्बंधों के अन्दर कर्तव्य और धर्म का एक नियोजक सूत्र हमारे जीवन को बाँधता एवं उचित मार्ग पर चलाता था। आज हम ऊपर-ऊपर देखते हैं, ऊपर-ऊपर की बातें करते हैं, इसलिए कहीं न कहीं नारी अपने सही स्थान से च्युत होती जा रही है।

दरअसल हमारा समाज को देखने का दृ्ष्टिकोण ही गलत है। नारी आज पीडिता है, वंचिता है पर पुरूष भी कोई कम दुखी और लुटा-पिटा नहीं है। दुखी दोनों हैं; पीडित दोनों हैं। दोनों ही अतृ्प्त, आशंकित और परिताप से भरे हुए, सस्ती और बनावटी भावनाओं के शिकार हैं । और इसका कारण सिर्फ इतना है कि दोनों ही स्थानच्युत (misplaced) हैं! दोनों ही अपने व्यक्तित्व और गौरव के प्रति अंधे और मूर्छित हैं।
जीवन का सही मायनों में अर्थ है कि स्त्री-पुरूष जीवन की मर्यादा में एक दूसरे के सच्चे सहायक हों; दोनों एक दूसरे में जो सर्वश्रेष्ठ है, उसे जागृ्त करें ---दोनों एक दूसरे को उठा सकें। दोनों के जीवन को आवृ्त, प्रच्छन्न लक्ष्य एवं सत्व को प्रकाश मिले। लेकिन यह सब सिर्फ आपसी प्रेम से ही संभव है। वह प्रेम, जिसमें एक दूसरे के प्रति सहानुभूति हो और गहरी उदारता हो; जिनमें हम एक दूसरे की बुराईयों की ओर यूं देखें कि मानों कि वें अपनी ही बुराईयाँ हों। जहाँ प्रेम पर बलात्कार न हो, व्यक्तित्व पर जबरदस्ती का बोझ न हो; एक दूसरे के सुख के लिए (सही मायनों में अपने सुख के लिए) अधिकार माँगने की अपेक्षा आत्मार्पण, कर्तव्य पालन पर जोर हो। बिना इन सब बातों कें, चाहे लाख नारी मुक्ति का झंडा उठाए खडे रहें----न तो दाम्पत्य जीवन ही सुखकर हो सकता है ओर न ही समाज में स्त्री की दशा में तनिक भी सुधार हो सकता है----हाँ, पश्चिमी समाज की देखादेखी नारी मुक्ति के नाम पर परिवारों को तोडने का ही हमने अपना उदेश्य बना रखा हो तो फिर इन सब उपरोक्त कही बातों का कोई महत्व नहीं----फिर तो ये नारी मुक्ति की झंडाबरदार जो भी कर रहीं हैं, वो सही हैं। 


एक छोटा सा, और चन्द शब्दों में, इसका हल यही है कि पुरूष-पुरूष बना रहे और नारी- नारी। लेकिन आज तो दोनों ही एक दूसरे की नकल करने में लगे हुए हैं। स्त्री स्वतंत्रता की घोषनाओं  और अपनी सम्पूर्ण वाग्मिता के बीच आज की नारी पुरूष का अनुकरण-मात्र  है। वह एक ओर तो अपने व्यक्तित्व की रक्षा की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर नारी से पुरूष बनने की राह पर बढती चली जा रही है। उसकी दृ्ष्टि अपनी अन्त:गरिमा पर नहीं वरन पुरुष के आचरण,क्रियाकलापों, उसकी उच्छृंख्लता पर है। और इसका अर्थ उसने यह समझा कि वह भी पुरूष के पथ पर अधिकाधिक तीव्र गति से भागने लगी है। वो ये नहीं जानती कि ये अंधी दौड उसे एक ऎसी दिशा में लिए जा रही है, जहाँ आगे चलकर उसका स्वयं का अस्तित्व ही लुप्त हो जाने वाला है। पुरूष बनने के चक्कर में वो अपने स्त्रीत्व को ही समाप्त करने पर तुली हुई है। शायद उसने यह मान लिया है कि पुरूष की नकल करने से ही स्त्री की दशा में सुधार हो सकता है।

लेकिन वो ये नहीं समझ रही कि ये बिल्कुल गलत रास्ता है, भयानक है। जब तक नारी यह अनुभव नहीं करती कि वह पुरूष को निश्चिंतता और आनन्द देने वाली मात्र नहीं है ओर न ही उसके पदचिन्हों पर चल कर उसका कुछ भला होने वाला है, बल्कि सही मायनों में तो समाज को संस्कार प्रदान करने वाली भी नारी ही है; जब तक वो यह नहीं समझती कि वह सिर्फ "रमणी" नहीं है, रमणी से कहीं पहले एक "माता" है, जिसने युगों से सभ्यता का दीपक लेकर उसे बुझने से बचाते हुए अपनी यात्रा जारी रखी है, उसने मानव जाति को दया, ममता, मृ्दुलता और स्नेह का दान दिया है, तब तक नारी मुक्ति के नाम पर किया जा रहा ये सारा प्रपन्च ही हेय है, तब तक कुछ नहीं होने वाला।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें.....:)

पिछले दो एक दिनों पहले की बात है कि जब एक रात हम अपनी मित्र मंडली के साथ किसी गूढ वार्तालाप में व्यस्त थे । खैर उस वार्तालाप का तो कोई निष्कर्ष नहीं निकला लेकिन बैठे बैठे हमारे मन में जरूर एक प्रेरणा सी जग उठी---कि चलें अपनी बीती जिन्दगी का कुछ लेखा जोखा ही मिला लिया जाए । जब मिलाने बैठे तो पता चला कि अपनी तो आधी जिन्दगी यूँ ही निकल गई---अपना खुद का तो कोई मतलब हल हुआ नहीं बल्कि आज तक दूसरे लोग ही अपना मतलब साध कर चलते बने ।
हम तो वहीं के वहीं रह गए--जहाँ से अपनी जीवन यात्रा आरम्भ की थी । यानि की ढाक के वही तीन पात ।
फिर सोचा--चलो खैर जो बीत गया सो बीत गया, उसे भूलकर अब कुछ आगे की सुध ले ली जाए ।
बस उस दिन से मन में ठान ली कि अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें । लेकिन फिर सोचा कि भई आखिर हम करेंगें क्या ? आखिर कुछ करने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए कि नहीं । इधर उधर कुछ लोगों पर नजर दौडाई--जो कि अपने जीवन में कुछ कर चुके और अब तक कर ही रहे हैं ।
सबसे पहले याद आए श्री मधु फोडा जी, जो कि कभी किसी जमाने में नेताओं के सभा सम्मेलनों में पहले पहुँचकर दरिया बिछाया करते थे ओर बाद में वहीं खडे रहकर उनका भाषण सुना करते थे । लेकिन ऊपर वाले की कुछ ऎसी कृ्पा हुई कि दरियाँ बिछाने से शुरू हुआ उनका ये सफर आज मुख्यमन्त्री की कुर्सी तक पहुँच चुका है । वैसे तो इससे आगे का उनका लक्ष्य केन्द्र की सरकार में शामिल होने ओर वहाँ बैठकर देश सेवा करने का था...पर कुछ ग्रह दशा ऎसी खराब शुरू हुई कि एक घोटले में नाम आ गया ओर हाथ से मुख्यमन्त्री की कुर्सी भी जाती रही । लेकिन  उनका कहना है कि अगर सी.बी.आई वालों नें बख्श दिया तो एक दिन आपको इसी देश का प्रधानमन्त्री बन कर दिखाएंगें । वैसे हमारी अन्तरात्मा कह रही है कि उनकी ये इच्छा भी पूरी हो ही जाएगी ।  इन्हे याद करते ही हमारे मन में भी उत्साह का एक इन्जैक्शन सा लग गया ।



फिर याद आए एक अन्य सज्जन ----श्रीमान चालू चक्रम जी । भई क्या कमाल के दृ्ड प्रतिज्ञ इन्सान हैं । पैसा कमाने के मैदान में उतरे तो कर्म-कुकर्म की ओर से आँखें ही मूँद ली । कुछ समय पहले तक कोयले की दलाली किया करते थे---लेकिन बिना अपना मुँह काला कराए न जाने कितनों का काला,पीला,हरा,नीला कर चुके हैं । इन्होने तो इस कहावत को भी मिथ्या सिद्ध कर डाला कि "कोयले की दलाली में मुँह काला"  । एक बार किसी बडी सी कम्पनी वाले से इनकी दोस्ती हो गई तो उसने इनके गुणों को पहचान कर इन्हे अपनी कम्पनी में मैनेजर की नौकरी पर रख लिया । आज ये उस कम्पनी के मालिक हैं और वो बेचारा मालिक इन्ही की कम्पनी में नौकरी कर रहा है । वाह रे भाग्य्!
इन्हे याद करके हमें बडा आत्मिक बल मिला ।


एक भद्र पुरूष ओर याद आए---श्री श्री 10008 बाबा बोल बचन जी महाराज । बचपन में पढाई लिखाई की ओर तो कुछ ध्यान था नहीं बस सारा सारा दिन नशेडियों के साथ बैठकर सुल्फे की चिलम का आनन्द लिया करते थे । इनकी हरकतों से दुखी होकर एक दिन बाप नें घर से निकाल बाहर किया तो राह चलते साधुओं की टोली में शामिल हो गए । वहाँ मुफ्त में चिलम पीते और बाबा लोगों की लंगोटियाँ धोते दिन बडे मजे में कट रहे थे। वहीं उनके बीच रहकर किसी तरह से पुराणों,शास्त्रों की दो चार कथा-कहानियाँ याद करके बस जैसे तैसे लुढकते लुढकते बाबा जी हो गए । साधु लोगों के चरण छूने के प्रताप से आज महाराज, गुरूदेव जैसी  उपाधियों से विभूषित हैं, अलग अलग शहरों में चार-छ: आश्रम खोल रखें हैं, गाडियाँ हैं, चारों ओर भक्तों की भीड लगी रहती है । लोग गले में इनकी तस्वीर जडे लाकेट पहने घूम रहे हैं । इनकी बचपन से ही एकमात्र अभिलाषा थी कि कभी लोग इनके पैर छूँए----आज इनकी ये अभिलाषा पूरी हो चुकी है । बस लगन की बात है :)


भई हम तो इन सब लोगों के कृ्तज्ञ हैं और शपथ लेकर कहते हैं कि हम भी अब कुछ हो के ही रहेंगें । बस भगवान हमें थोडी सी निर्लज्जता बख्श दे ।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

गले का पट्टा

तकनीकी विकास के मामले में जापानियों का लोहा तो आज पूरा विश्व मान रहा है । इनके द्वारा किए जा रहे नित नये आविष्कार देखने सुनने को मिल ही जाते हैं । कभी कभी तो इनके आविष्कार इतने अजीबोगरीब होते हैं कि देख सुनकर हँसी भी आती है ओर इनकी कल्पनाशीलता, खोजी दिमाग की दाद भी देनी पडती है ।
 कुछ दिन पहले हमने कहीं पढा था कि जापान में आदमी तो आदमी कुत्तों के भौंकने पर भी प्रतिबंध लग चुका है । इसके लिए उन्होने एक विशेष प्रकार के पट्टे का आविष्कार किया है जो कि कुत्ते को पहना दिया जाए तो जब भी वो भौंकने के लिए मुँह खोले तो पट्टे में लगा यन्त्र बिजली का एक जोरदार झटका मारता है, बेचारा कुता घबराहट में भौंकना भूलकर तुरन्त अपना मुँह वापिस बन्द कर लेता है । क्या कमाल की चीज इजाद की है भई इन जापानियों नें । मेरा तो यह मानना है कि इन पट्टों की जापान से ज्यादा जरूरत तो यहाँ भारत में हैं । ससुरे जितने भी ये सडकछाप नेता हैं, जो कि समय असमय, मतलब बिना मतलब के लाऊडस्पीकर पर बोलते हुए ऊबते नहीं, या फिर मन्दिरों के पंडित, मस्जिदों के मौलवी, गुरूद्वारों में बैठे वो पाठी जो सुबह सुबह ऊपर वाले के कान के पर्दे खोलने के चक्कर में लोगों को बहरा बनाने पर तुले हुए हैं । जिन्हे न तो ये फिर्क कि बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं या कि इनके शोर से किसी बीमार अस्वस्थ आदमी पर क्या बीतती होगी । बस ये लोग तो ऊपर वाले को बहरा मानकर दिन रात बस उसके कान के पर्दे खोलने में लगे हुए हैं । मैं तो कहता हूँ कि भारत सरकार को जापान से ये पट्टे आयात कर ही लेने चाहिएं और जिस प्रकार से घर घर जाकर बच्चों को 2 बून्द पिलाने का पोलियो उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है, ठीक वैसे ही एक पट्टा अभियान चलाए और चुन चुनकर इन सभी भौंकूओं के गले में पट्टा बाँध दिया जाए । इससे एक तो इनका भौंकना बन्द हो जाएगा ओर दूसरे हम लोग भी कुछ चैन की साँस ले पाएंगें।

वैसे जो लोग बेचारे अपनी बीवी की चपर-चपर से कुछ ज्यादा ही दुखी हैं, उनके लिए भी ये बडे काम की चीज हो सकती है :)

रविवार, 15 नवंबर 2009

भारतवर्ष के बारे में कुछ रोचक तथ्य



भारतवर्ष के बारे में कुछ रोचक तथ्य
  • इतिहास के अनुसार, आज तक भारतवर्ष ने किसी भी अन्य देश पर हमला नहीं किया है।
  • जब अनेक संस्कृतियों 5000 साल पहले ही घुमंतू वनवासी थी, भारतीय सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की।
  • शतरंज के खेल का आविष्कार भारतवर्ष द्वारा ही किया गया है।
  • बीज गणित, त्रिकोण मिति और कलन का अध्‍ययन भारत में ही आरंभ हुआ था।
  • ‘स्‍थान मूल्‍य प्रणाली’ और ‘दशमलव प्रणाली’ का विकास भारत में 100 BC में हुआ था।
  • विश्‍व का प्रथम ग्रेनाइट मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में बृहदेश्‍वर मंदिर है। इस भव्‍य मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़े से बनें हैं, इसका निर्माण चोलवंशीय राजा के राज्‍य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 AD और 1009 AD के दौरान) किया गया था।
  • भारत विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और विश्‍व का छठवां सबसे बड़ा देश तथा प्राचीन सभ्‍यताओं में से एक है।
  • सांप सीढ़ी का खेल तेरहवीं शताब्‍दी में कवि संत ज्ञान देव द्वारा तैयार किया गया था इसे मूल रूप से मोक्षपट कहते थे। इस खेल में सीढियां वरदानों का प्रतिनिधित्‍व करती थीं जबकि सांप अवगुणों को दर्शाते थे। इस खेल को कौडियों तथा पांसे के साथ खेला जाता था। आगे चल कर इस खेल में कई बदलाव किए गए, परन्‍तु इसका अर्थ वहीं रहा अर्थात अच्‍छे काम लोगों को स्‍वर्ग की ओर ले जाते हैं जबकि बुरे काम दोबारा जन्‍म के चक्र में डाल देते हैं।
  • दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान हिमाचल प्रदेश के चायल नामक स्‍थान पर है। इसे समुद्री सतह से 2444 मीटर की ऊंचाई पर भूमि को समतल बना कर 1893 में तैयार किया गया था।
  • भारत में विश्‍व भर से सबसे अधिक संख्‍या में डाक घर स्थित हैं।
  • विश्‍व का सबसे बड़ा नियोक्‍ता भारतीय रेल है, जिसमें पंद्रह लाख से अधिक व्यक्ति काम करते हैं।
  • विश्‍व का सबसे पहला विश्‍वविद्यालय 700 BC में तक्षशिला में स्‍थापित किया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर से आकर अध्‍ययन  करते थे। नालंदा विश्‍वविद्यालय चौथी शताब्‍दी में स्‍थापित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
  • आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्‍सा शाखा है। शाखा विज्ञान के जनक माने जाने वाले चरक में 2500 वर्ष पहले आयुर्वेद का समेकन किया था।
  • भारत 17वीं शताब्‍दी के आरंभ तक ब्रिटिश राज्‍य आने से पूर्व विश्व का सबसे सम्‍पन्‍न देश था। क्रिस्‍टोफर कोलम्‍बस ने भारत की सम्‍पन्‍नता से आकर्षित हो कर ही भारत आने का समुद्री मार्ग खोजना चाहा, लेकिन गलती से भारत की अपेक्षा अमेरिका पहुँच गया।
  • नौवहन की कला और नौवहन का जन्‍म 6000 वर्ष पहले सिंध नदी में हुआ था। दुनिया का सबसे पहला नौवहन संस्‍कृ‍त शब्‍द नव गति से उत्‍पन्‍न हुआ है। शब्‍द नौ सेना भी संस्‍कृत शब्‍द नोउ से हुआ।
  • भास्‍कराचार्य ने खगोल शास्‍त्र के कई सौ साल पहले पृथ्‍वी द्वारा सूर्य के चारों ओर चक्‍कर लगाने में लगने वाले सही समय की गणना की थी। उनकी गणना के अनुसार सूर्य की परिक्रमा में पृथ्‍वी को 365.258756484 दिन का समय लगता है।(लेकिन श्रेय विदेशी ले गए)
  • भारतीय गणितज्ञ बुधायन द्वारा ‘पाई’ का मूल्‍य ज्ञात किया गया था और उन्‍होंने जिस संकल्‍पना को समझाया उसे ही आज हम पाइथागोरस का प्रमेय कहते हैं। उन्‍होंने इसकी खोज छठवीं शताब्‍दी में की, जो यूरोपीय गणितज्ञों से काफी समय पहले की गई थी।( मूल खोजकर्ता का आज कोई नाम भी नहीं जानता, लेकिन सारी दुनिया समझती है कि ये पाईथागोरस की खोज है)
  • बीज गणित(Algebra), त्रिकोण मिति और कलन का उद्भव भी भारत में हुआ था। चतुष्‍पद समीकरण का उपयोग 11वीं शताब्‍दी में श्री धराचार्य द्वारा किया गया था। ग्रीक तथा रोमनों द्वारा उपयोग की गई की सबसे बड़ी संख्‍या 106 थी जबकि हिन्‍दुओं ने 10*53 जितने बड़े अंकों का उपयोग (अर्थात 10 की घात 53), के साथ विशिष्‍ट नाम 5000 BC के दौरान किया। आज भी उपयोग की जाने वाली सबसे बड़ी संख्‍या टेरा: 10*12 (10 की घात12) है। (कहीं कोई श्रेय नहीं )
  • सुश्रुत को शल्‍य चिकित्‍सा (Surgery) का जनक माना जाता है। लगभग 2600 वर्ष पहले सुश्रुत और उनके सहयोगियों ने मोतियाबिंद, कृत्रिम अंगों को लगना, शल्‍य क्रिया द्वारा प्रसव, अस्थिभंग जोड़ना, मूत्राशय की पथरी, प्‍लास्टिक सर्जरी और मस्तिष्‍क की शल्‍य क्रियाएं आदि की।
  • निश्‍चेतक(Anesthesia) का उपयोग भारतीय प्राचीन चिकित्‍सा विज्ञान में भली भांति ज्ञात था। शारीरिकी, भ्रूण विज्ञान, पाचन, चयापचय, शरीर क्रिया विज्ञान, इटियोलॉजी, आनुवांशिकी और प्रतिरक्षा विज्ञान आदि विषय भी प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पाए जाते हैं।
  • भारत से 90 देशों को सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है।
  • भारत में 4 धर्मों का जन्‍म हुआ – हिन्‍दु धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म ओर सिक्‍ख धर्म, जिनका पालन दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा करता है।
  • भारत में 3,00,000 मस्जिदें हैं जो किसी अन्‍य देश से अधिक हैं, यहां तक कि मुस्लिम देशों से भी अधिक।
  • भारत में सबसे पुराना यूरोपियन चर्च और सिनागोग कोचीन शहर में है। इनका निर्माण क्रमश: 1503 और 1568 ईस्वी में किया गया था।
  • ज्‍यू और ईसाई व्‍यक्ति भारत में क्रमश: 200 BC और 52 AD से निवास करते हैं।
  • विश्‍व में सबसे बड़ा धार्मिक भवन अंगकोरवाट, हिन्‍दु मंदिर है, जो कम्‍बोडिया में 11वीं शताब्‍दी के दौरान बनाया गया था।
  • तिरुपति शहर में बना विष्‍णु मंदिर 10वीं शताब्‍दी के दौरान बनाया गया था, यह विश्‍व का सबसे बड़ा धार्मिक गंतव्‍य है। रोम या मक्‍का धामिल स्‍थलों से भी बड़े इस स्‍थान पर प्रतिदिन औसतन 30 हजार श्रद्धालु आते हैं और लगभग 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रति दिन चढ़ावा चढता है।
  • भारत द्वारा श्रीलंका, तिब्‍बत, भूटान, अफगानिस्‍तान और बंगलादेश के 3,00,000 से अधिक शरणार्थियों को सुरक्षा दी जा रही है, जो धार्मिक और राजनैतिक अभियोजन के फलस्‍वरूप वहां से निकल गए/निकाल दिए गए हैं।
  • युद्ध कलाओं का विकास सबसे पहले भारत में किया गया और ये बौद्ध धर्म प्रचारकों द्वारा पूरे एशिया में फैलाई गई।
  • योग कला का उद्भव भारत में हुआ है और यहां 5,000 वर्ष से अधिक समय से मौजूद हैं। 
आज भारत सरकार की अधिकारिक वैबसाईट(http://bharat.gov.in) देखने का मौका मिला तो वहाँ  इस प्रकार की एक सूची दिखाई दी, तो सोचा कि आप लोगों के साथ बाँटी जाए । कम से कम इसी बहाने अपने देश के उज्जवल पक्ष से परिचित हो गर्वोंन्वित तो हुआ ही जा सकता है ।

सोमवार, 2 नवंबर 2009

चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत .........

कभी कभी सोचता हूँ कि पता नहीं ईश्वर ने कुछ लोगों को ऎसा क्यों बनाया है,जिन्हे कि आप चाहे लाख समझा लें, लेकिन फिर भी करेंगें वो लोग वही,जो कि उनके दिमाग में पहले ही कूट कूटकर भरा जा चुका है । इन्सान का मुखौटा पहनकर घूम रहे ये भेडिए पता नहीं समाज को किस ओर ले जाना चाहते हैं । 

रहिमन लाख भली करौ, इनका जिद्द न जाए
राग सुनत, पय पियतहू, सांप सहजहि घर खाए ।।


हर पोस्ट में गारी मिलत हैं, लोग रहे चिल्लाहिं
रहिमन करूए लिखन कौ, चहियत यही सजाहिं ।।


आप न काहू काम के, डार,पात,फल मूर
औरन को रोकत फिरैं, आपहूं वृ्क्ष बबूर ।।


रहिमन ऎसे लोगन ते, तजो बैर औ प्रीत
चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत ।।
www.hamarivani.com
रफ़्तार