पिछले दो दिनों से तबियत कुछ नासाज चल रही है. इसलिए नैट से जरा दूरी बनी रही. आज आए तो ही मालूम चल पाया कि इन दो दिनों में पुल से कितना पानी बह चुका है. खैर, बहना तो पानी का स्वभाव ठहरा. वो तो बहेगा ही. आप चाहे लाख जतन कर लें, चाहे कैसे भी बन्ध लगा लें, लेकिन वो फिर भी अपने बहने का रास्ता खोज ही लेगा. बहना तो उसका धर्म ठहरा तो वो अपना धर्म निभाएगा ही, चाहे मार्ग कैसा भी जटिलताओं भरा क्यों न हो. कोई इन्सान थोडे ही है कि अपने धर्म को लात मार बैठे.
पता नहीं आपने कभी इस बारे में सोचा है या नहीं, पर देखा जाए तो बात वास्तव में सोचने की ही है. धर्म के बारे में आपने कभी तो सोचा होगा. आत्मा या परमात्मा भी कभी अपके सोचने का विषय रहा होगा. जीवन-मृत्यु, अज्ञान, पाखंड, विश्वास-अन्धविश्वास जैसी चीजों नें भी कभी आपको सोचने के लिए मजबूर किया होगा. मतलब यह कि और भी कईं विषय होंगें, जिनके बारे में आपने सोचा होगा-----चाहे मन मारे ही सोचा हो.
लेकिन मैं तो कहता हूँ कि इतना कुछ सोचने पर भी आपने कुछ नहीं सोचा, क्योंकि जो कुछ भी आपने सोचा, वह सोचा न सोचा एक बराबर है. इसलिए कि आपने शायद यह कभी नहीं सोचा कि अपने बारे में भी कभी फुरसत से सोचा जाये, कभी सोचा भी होगा तो उतनी गम्भीरता से नहीं सोचा होगा. क्यों कि अपने बारे में एक बार भी तनिक गम्भीरता से सोचा होता तो शायद जीवन में फिर दोबारा से सोचने की कभी नौबत ही न आती. इसी सिलसिले में एक कहानी याद आ गई. एक बार गुरू द्रोणाचार्य नें पांडव और कौरवादि अपने शिष्यों की धनुर्विद्या की परीक्षा लेने के लिए सामने वृक्ष पर एक मिट्टी का पक्षी रख दिया और अपने सभी शिष्यों को प्रत्यंचा चढाकर निशाना साधने का आदेश देकर पूछा कि तुम्हे सामने कौन-कौन सी वस्तुएँ दिखाई दे रही हैं. किसी नें पेड कहा, तो किसी नें पत्ते, आकाश आदि अन्य सभी चीजों का ब्यौरा सुना दिया. लेकिन जब अर्जुन से पूछा गया तो उसने बताया कि मुझे तो सिर्फ पक्षी ही दिखाई दे रहा है. आप सोचकर देखें तो आपको पता चल जाएगा कि अर्जुन का वास्तविक अभिप्राय यह था-----" मैं देख रहा हूँ कि मुझे क्या देखते रहना है" गर्ज यह कि जो कुछ हम सोचते हैं, उसे सोचना कहा जाए तो वास्तविकता में वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्योंकि गाय भैंसों की जुगाली से लेकर स्टीफन हाकिंस जैसों और अणु-परमाणु वगैरह वगैरह की अदभुतता सोचते हुए भी क्या कभी आप अपने बारे में सोचते हैं?--नहीं, बिल्कुल नहीं सोचते होगें. आँखिन सबको देखिया, आँखि न देखी जाये !
मेरा मानना है कि जहाँ इन्सान के सामने उसके विचारों के खोखलेपन का प्रश्न तनकर कुतुबमीनार की तरह खडा हो जाता है, वहाँ सोचने और नोचने की शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है. लेकिन मेरा विषय इस प्रकार के सोचने से सम्बन्धित नहीं है. अज्ञानी कहे जाने पर बाहर से उसका विरोध करते हुए भी यदि आप अपने भीतर एक अज्ञानी की हरकतों का आभास पाकर दार्शनिक मुद्रा अपनायें और यह सोचने की चेष्टा करें कि वास्तव में आप अज्ञानी हैं या नहीं, तब भी वह मेरे विषय से बाहर है.
वास्तविकता यह है कि हम आप सभी सोचते हैं, किसी गधे को भी एक विशेष दृष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य की सराहना करने के बारे में सोचते रहने से आप एक दार्शनिक कहला सकते हैं. पर मेरा संकेत इस सोचने की ओर नहीं है. ईश्वर की कृपा से आप अच्छे खासे दो पैरों वाले मनुष्य है------डार्विन के अनुसार बन्दर के एकदम "नूतनतम संस्करण"---और फिर मनुष्य होने के नाते आपके पास एक सिर भी तो है, ये अलग बात है कि उस सिर में विधाता नें कुछ भरा हो या न हो. वैसे इस दिशा में भी सोचना लाजिमी है, चाहे फिर आपका सोचना किसी की बडी नाक से टक्कर खा-खाकर पीछे उछलता रहे, चाहे कहीं किसी के लिखे हुए पर ही क्यों न अटक जाए. जब तक आप बे-सिर-पैर नहीं हैं और जब तक अपने जैसे सिर-पैर वालों में रहने का आपको जन्मसिद्ध अधिकार है, तबतक यह सब चलता ही रहेगा, लेकिन इतना सोचने पर भी कुछ सोचना बाकी रह जाता है. जैसे यह पोस्ट पढकर किसी अज्ञानी पर तरस खाकर आपका सोचना लाजिमी है. इस पर यदि आपको यह सोच हो जाये कि आप भी यदि "समझदारी" के भूत को अपने वश में कर लेते तो हम जैसों से कहीं अधिक समझदार होते, तो भी आश्चर्य के लिए गुंजाईश बाकी न रहती.
हाँ तो मैं कह रहा था कि इतना सब सोच लेने पर भी कुछ सोचना हमेशा बाकी रह जाता है. आप पूछेंगें कैसे ? पोस्ट पढते-पढते, ध्यान में न रहने के कारण अगर कहीं पूछना भूल भी जाएं तो भी मैं कहूँगा कि सोचते समय आँख और कान बन्द रक्खे जाएं तो आपको खुद ब खुद समझ में आ जाएगा कि जिसे आप आजतक सोचना समझ रहे थे, दरअसल वो सोच थी ही नहीं, सोचने का सिर्फ एक नाटक भर था. असली सोच तो इससे आगे शुरू होती है. जिसके बारे में हम आजतक कभी सोच ही नहीं पाये.
चलिए छोडिये, आप भी सोचेंगें कि कहां की सोच बैठे. लेकिन बात हकीकत में सोचने की ही है. चाहे सोचकर आप बेशक उसे अनसोचा कर दें. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में सोचा है, वह किसी "सोचनीय" स्थिति वाले व्यक्ति के बारे में सोचकर ही. लेकिन अब वह ख्यालों से ओझल हो चला है, इसलिए आगे क्या लिखूँ यह सोचने लगा तो फिर सोचता ही रह जाऊँगा. अब बताईये, आपने क्या सोचा ? :-)
चलते चलते:--
इस पोस्ट को लिखने के बाद जब हमने अपने एक मित्र को पढवाया और उनसे इसके बारे में जानना चाहा कि उन्हे ये पोस्ट कैसी लगी, तो मियाँ झट से बोल उठे---" अजी पोस्ट क्या है, निरा एकदम से कूडा है". यहाँ हमसे तनिक गलती हो गई, क्योंकि वो मित्र ठहरे महागम्भीर प्रकृ्ति वाले जीव. उन्हे ये नहीं मालूम कि ब्लागिंग में "ब्रिलियन्ट नोन्सेन्स" जैसी शैली में कुछ हास्य वगैरह भी लिखा जाता है. :-)
ad
बस यूँ हीं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बस यूँ हीं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
शनिवार, 7 अगस्त 2010
चूल्हे पडे ब्लागिंग बाबा !!! -----(खटराग कथा)
| एक ब्लागिंग व्यसनी पति और उसकी पत्नि के मध्य होने वाले आपसी खटराग की बानगी देखिए, लेकिन आप लोग कहीं ऎसा वैसा भ्रम न पाल बैठें, सो पहले ही क्लियर किए देते हैं कि ये कोई हमारी आपबीती नहीं है :):------ इस खटराग कथा के नायक है मिश्राजी, जो दिन भर कम्पयूटर के आगे बैठे बस ब्लागिंग धर्म का निर्वहण करने में ही जुटे हैं.....इनकी बेचारी धर्मपत्नि जो कि इनके इस ब्लागोन्माद से बुरी तरह से आजिज आ चुकी है, चिढती, कुढती हुई सी इन्हे भोजन के लिए बुलाने आती है.”अजी अब तो खाना खा लीजिए, यूँ ही कब तक कम्पयूटर के आगे बैठे आँखें फुडवाते रहोगे” Technorati टैग्स: {टैग-समूह}बस यूँ ही,ब्लागिंग कथा |
रविवार, 1 अगस्त 2010
हमारे ज्ञान की परिधि कितनी सीमित है-----(संडे ज्ञान)
हमारे ज्ञान की परिधि कितनी सीमित है--- कि, कईं बार तो हम बिल्कुल सामान्य सी छोटी मोटी बातें भी नहीं जानते। जैसे कि पक्षियों में गरूड नहीं बल्कि बाज की गति सबसे तेज होती है। हिरण की आँखे बडी मानी जाती है लेकिन वास्तव में घोडे की आँखे उससे अधिक बडी होती हैं। तेज धूप में संसार के हरेक प्राणी को पसीना आता है लेकिन कुत्ता ऎसा जानवर है जिसे चाहे सारा दिन धूप में खडा करके रखा जाए लेकिन फिर भी उसे पसीना नहीं आएगा। स्तनपायी प्राणियों के शरीर पर बाल होते हैं लेकिन गेन्डा इसका अपवाद है जो स्तनपायी होने पर भी बिना बालों का जीव है। वृ्क्षों में बरगद के पेड को दीर्धजीवी माना जाता है लेकिन सबसे अधिक दिन जैतून का पेड जीवित रहता है।
मेंडक के पैदा होते समय दुम होती है, पैर नहीं लेकिन मरते समय उसके पैर रहते हैं दुम नहीं। हँस के बारे में किम्बदन्ति है कि वो मिले हुए दूध-पानी में से दूध पी लेता है और पानी छोड देता है, साथ ही यह भी कहा जाता है कि वो मोती खाता है लेकिन यह दोनों ही किम्बदन्तियाँ बिल्कुल मिथ्या हैं। हँस भी अन्य पक्षियों की तरह ही कीडे मकोडे तथा बीज इत्यादि का भक्षण करता है।
स्वाती नक्षत्र में वर्षा होने से सीप में मोती, केले से कपूर और बाँस में वंशलोचन पैदा होता है, यह मान्यता सर्वथा कपोल कल्पित है जिसमें सच्चाई का नाममात्र भी अंश नहीं। दस बीस भाषाओं और दर्जन दो दर्जन मजहबों के अतिरिक्त किसे पता है कि संसार में 3064 भाषाएं बोली जाती हैं और 900 से अधिक मत-मतान्तर हैं।
हमारा सामान्य ज्ञान कितना स्वल्प है!---- इस बात का पता इससे चलता है कि अपनी मान्यता प्राप्त जानकारियों में कितनी उपहासास्पद मान्यताएं भरी पडी हैं और हम लोग कितनी मिथ्या धारणाएं संजोएं बैठे हैं।
मेंडक के पैदा होते समय दुम होती है, पैर नहीं लेकिन मरते समय उसके पैर रहते हैं दुम नहीं। हँस के बारे में किम्बदन्ति है कि वो मिले हुए दूध-पानी में से दूध पी लेता है और पानी छोड देता है, साथ ही यह भी कहा जाता है कि वो मोती खाता है लेकिन यह दोनों ही किम्बदन्तियाँ बिल्कुल मिथ्या हैं। हँस भी अन्य पक्षियों की तरह ही कीडे मकोडे तथा बीज इत्यादि का भक्षण करता है।
स्वाती नक्षत्र में वर्षा होने से सीप में मोती, केले से कपूर और बाँस में वंशलोचन पैदा होता है, यह मान्यता सर्वथा कपोल कल्पित है जिसमें सच्चाई का नाममात्र भी अंश नहीं। दस बीस भाषाओं और दर्जन दो दर्जन मजहबों के अतिरिक्त किसे पता है कि संसार में 3064 भाषाएं बोली जाती हैं और 900 से अधिक मत-मतान्तर हैं।
हमारा सामान्य ज्ञान कितना स्वल्प है!---- इस बात का पता इससे चलता है कि अपनी मान्यता प्राप्त जानकारियों में कितनी उपहासास्पद मान्यताएं भरी पडी हैं और हम लोग कितनी मिथ्या धारणाएं संजोएं बैठे हैं।
गुरुवार, 26 नवंबर 2009
अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें.....:)
पिछले दो एक दिनों पहले की बात है कि जब एक रात हम अपनी मित्र मंडली के साथ किसी गूढ वार्तालाप में व्यस्त थे । खैर उस वार्तालाप का तो कोई निष्कर्ष नहीं निकला लेकिन बैठे बैठे हमारे मन में जरूर एक प्रेरणा सी जग उठी---कि चलें अपनी बीती जिन्दगी का कुछ लेखा जोखा ही मिला लिया जाए । जब मिलाने बैठे तो पता चला कि अपनी तो आधी जिन्दगी यूँ ही निकल गई---अपना खुद का तो कोई मतलब हल हुआ नहीं बल्कि आज तक दूसरे लोग ही अपना मतलब साध कर चलते बने ।
हम तो वहीं के वहीं रह गए--जहाँ से अपनी जीवन यात्रा आरम्भ की थी । यानि की ढाक के वही तीन पात ।
फिर सोचा--चलो खैर जो बीत गया सो बीत गया, उसे भूलकर अब कुछ आगे की सुध ले ली जाए ।
बस उस दिन से मन में ठान ली कि अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें । लेकिन फिर सोचा कि भई आखिर हम करेंगें क्या ? आखिर कुछ करने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए कि नहीं । इधर उधर कुछ लोगों पर नजर दौडाई--जो कि अपने जीवन में कुछ कर चुके और अब तक कर ही रहे हैं ।
सबसे पहले याद आए श्री मधु फोडा जी, जो कि कभी किसी जमाने में नेताओं के सभा सम्मेलनों में पहले पहुँचकर दरिया बिछाया करते थे ओर बाद में वहीं खडे रहकर उनका भाषण सुना करते थे । लेकिन ऊपर वाले की कुछ ऎसी कृ्पा हुई कि दरियाँ बिछाने से शुरू हुआ उनका ये सफर आज मुख्यमन्त्री की कुर्सी तक पहुँच चुका है । वैसे तो इससे आगे का उनका लक्ष्य केन्द्र की सरकार में शामिल होने ओर वहाँ बैठकर देश सेवा करने का था...पर कुछ ग्रह दशा ऎसी खराब शुरू हुई कि एक घोटले में नाम आ गया ओर हाथ से मुख्यमन्त्री की कुर्सी भी जाती रही । लेकिन उनका कहना है कि अगर सी.बी.आई वालों नें बख्श दिया तो एक दिन आपको इसी देश का प्रधानमन्त्री बन कर दिखाएंगें । वैसे हमारी अन्तरात्मा कह रही है कि उनकी ये इच्छा भी पूरी हो ही जाएगी । इन्हे याद करते ही हमारे मन में भी उत्साह का एक इन्जैक्शन सा लग गया ।
फिर याद आए एक अन्य सज्जन ----श्रीमान चालू चक्रम जी । भई क्या कमाल के दृ्ड प्रतिज्ञ इन्सान हैं । पैसा कमाने के मैदान में उतरे तो कर्म-कुकर्म की ओर से आँखें ही मूँद ली । कुछ समय पहले तक कोयले की दलाली किया करते थे---लेकिन बिना अपना मुँह काला कराए न जाने कितनों का काला,पीला,हरा,नीला कर चुके हैं । इन्होने तो इस कहावत को भी मिथ्या सिद्ध कर डाला कि "कोयले की दलाली में मुँह काला" । एक बार किसी बडी सी कम्पनी वाले से इनकी दोस्ती हो गई तो उसने इनके गुणों को पहचान कर इन्हे अपनी कम्पनी में मैनेजर की नौकरी पर रख लिया । आज ये उस कम्पनी के मालिक हैं और वो बेचारा मालिक इन्ही की कम्पनी में नौकरी कर रहा है । वाह रे भाग्य्!
इन्हे याद करके हमें बडा आत्मिक बल मिला ।
एक भद्र पुरूष ओर याद आए---श्री श्री 10008 बाबा बोल बचन जी महाराज । बचपन में पढाई लिखाई की ओर तो कुछ ध्यान था नहीं बस सारा सारा दिन नशेडियों के साथ बैठकर सुल्फे की चिलम का आनन्द लिया करते थे । इनकी हरकतों से दुखी होकर एक दिन बाप नें घर से निकाल बाहर किया तो राह चलते साधुओं की टोली में शामिल हो गए । वहाँ मुफ्त में चिलम पीते और बाबा लोगों की लंगोटियाँ धोते दिन बडे मजे में कट रहे थे। वहीं उनके बीच रहकर किसी तरह से पुराणों,शास्त्रों की दो चार कथा-कहानियाँ याद करके बस जैसे तैसे लुढकते लुढकते बाबा जी हो गए । साधु लोगों के चरण छूने के प्रताप से आज महाराज, गुरूदेव जैसी उपाधियों से विभूषित हैं, अलग अलग शहरों में चार-छ: आश्रम खोल रखें हैं, गाडियाँ हैं, चारों ओर भक्तों की भीड लगी रहती है । लोग गले में इनकी तस्वीर जडे लाकेट पहने घूम रहे हैं । इनकी बचपन से ही एकमात्र अभिलाषा थी कि कभी लोग इनके पैर छूँए----आज इनकी ये अभिलाषा पूरी हो चुकी है । बस लगन की बात है :)भई हम तो इन सब लोगों के कृ्तज्ञ हैं और शपथ लेकर कहते हैं कि हम भी अब कुछ हो के ही रहेंगें । बस भगवान हमें थोडी सी निर्लज्जता बख्श दे ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)


