आपको एवं आपके समस्त मित्र/अमित्र इत्यादी सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऎं.
ईश्वर से कामना करता हूं कि इस नूतन वर्ष में सब लोग एक सुदृड राष्ट्र एवं समाज के निर्माण मे अपनी महती भूमिका का भली भांती निर्वहण कर सकें.
नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाऎं
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बुधवार, 31 दिसंबर 2008
मंगलवार, 30 दिसंबर 2008
उपहार
वन विभाग के दफ्तर में बडे साहब अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने पलट रहे थे, कि तभी उनका मातहत हथकडी में जकडे दो लोगों को लेकर अन्दर दाखिल हुआ.
‘‘साहब, हम लोगों ने जंगल में इन दो शिकारियों को बन्दूकों सहित गिरफ्तार किया है। इनके पास से मारा गया एक हिरन भी बरामद हुआ है। अब आपका हमारे लिए क्या हुक्म है?’’ वन विभाग के उस रक्षक ने अपने अधिकारी से पूछा।
‘‘वैरी गुड! बडे साहब ने कहा’’ फिलहाल इन दोनों को वन चौकी के लाक–अप में डाल दो। फिर वन्य जीव रक्षा अधिनियम के अन्तर्गत इन पर गम्भीर धाराएँ लगाकर मुकदमा चलेगा तथा कड़ी सजा दिलाई जाएगी।
‘‘और..साहब, उस मारे गए हिरन का क्या किया जाए ?’’ वन विभाग के रक्षक ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘‘अब ये भी मुझे ही बताना पडेगा ” बडे साहब ने आँखें निकालीं
ठीक से काँट–छाँट कर कुछ गोश्त तो यहाँ पहुँचा देना तथा बाकी तुम सब आपस में बाँट लेना।
ओर हाँ, ध्यान रहे, उसकी खाल जरा सँभाल के उतारना, वह खराब नहीं होनी चाहिए।
मैंने पंडित जी को पूजा के आसन के लिए उपहार स्वरूप एक सुन्दर मृगछाला देने का वचन दिया हुआ है।’’
‘‘साहब, हम लोगों ने जंगल में इन दो शिकारियों को बन्दूकों सहित गिरफ्तार किया है। इनके पास से मारा गया एक हिरन भी बरामद हुआ है। अब आपका हमारे लिए क्या हुक्म है?’’ वन विभाग के उस रक्षक ने अपने अधिकारी से पूछा।
‘‘वैरी गुड! बडे साहब ने कहा’’ फिलहाल इन दोनों को वन चौकी के लाक–अप में डाल दो। फिर वन्य जीव रक्षा अधिनियम के अन्तर्गत इन पर गम्भीर धाराएँ लगाकर मुकदमा चलेगा तथा कड़ी सजा दिलाई जाएगी।
‘‘और..साहब, उस मारे गए हिरन का क्या किया जाए ?’’ वन विभाग के रक्षक ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘‘अब ये भी मुझे ही बताना पडेगा ” बडे साहब ने आँखें निकालीं
ठीक से काँट–छाँट कर कुछ गोश्त तो यहाँ पहुँचा देना तथा बाकी तुम सब आपस में बाँट लेना।
ओर हाँ, ध्यान रहे, उसकी खाल जरा सँभाल के उतारना, वह खराब नहीं होनी चाहिए।
मैंने पंडित जी को पूजा के आसन के लिए उपहार स्वरूप एक सुन्दर मृगछाला देने का वचन दिया हुआ है।’’
रविवार, 28 दिसंबर 2008
विंडोज xp का नया बिहारी संस्करण
माइक्रोसाफ्ट ने विंडोज एक्स.पी का बिहारी संस्करण लांच किया है.ओर विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि चिट्ठाजगत पर हरियाणवी भाषा की बढती लोकप्रियता देखकर वर्ष 2009 में हरियाणवी संस्करण भी मार्कीट में उतारणे पर विचार किया जा रहा है.
सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि कंपनी में इसके ब्रांड अंबैसटर हेतु "ताऊ" का नाम भी तय कर लिया गया है.
(किसी भी भाषा/जाति/व्यक्ति अथवा प्रदेश के सम्मान को ठेस पहुंचाने की हमारी कोई भी मंशा नहीं है, पाठकों से अनुरोध है कि कृप्या आप इस पोस्ट को केवल हास्य/मनोरंजन के तौर पर ही लें)
सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि कंपनी में इसके ब्रांड अंबैसटर हेतु "ताऊ" का नाम भी तय कर लिया गया है.
(किसी भी भाषा/जाति/व्यक्ति अथवा प्रदेश के सम्मान को ठेस पहुंचाने की हमारी कोई भी मंशा नहीं है, पाठकों से अनुरोध है कि कृप्या आप इस पोस्ट को केवल हास्य/मनोरंजन के तौर पर ही लें)
बुधवार, 24 दिसंबर 2008
दर्द और मजबूरी
सिर्फ तीन लोग ही थे उस परिवार में.वो,उसकी पत्नि शान्ती और एक जवान लेकिन बेरोजगार बेटा.यूं तो कहने को वो एक सरकारी विभाग में चपरासी की नौकरी करता था.लेकिन किराये के मकान में रहते हुए किसी तरह बडी मुश्किल से ही परिवार का गुजारा चल पाता था.
आज जैसे ही वो डयूटी से आकर घर के एक कोने में पडी कुर्सी पर बैठने लगा तो दर्द के मारे मुंह से एक आह सी निकल पडी.
‘‘अरी! रमेश की मां, अब नहीं मुझसे बसों में उतरा–चढ़ा जाता, घुटने तो अब बिल्कुल ही जवाब देने लगे हैं। ड्यूटी पर जाकर बैठना भी बडा दूभर लगता है। अब तो डाक्टरों ने भी कह दिया, भई आराम करो। ज्यादा चलना–फिरना ठीक नहीं, बेआरामी से हालत बिगड़ सकती है।’’
‘‘अपना तो ईश्वर भी बैरी हुआ पडा है,अगर लड़का कहीं छोटे–मोटे काम पर अटक गया होता तो जैसे–तैसे गुजारा कर लेते।’’ रामलाल की बात सुनकर पत्नी के ह्र्दय की पीड़ा बाहर आने लगी।
‘‘मैंने तो अब रिटायरमैंट के कागज भेज ही देने हैं। बहुत कर ली नौकरी, अब जब शरीर ही इज़ाजत नहीं देता तो..।’’ रामलाल ने अपनी बात जारी रखी।
‘‘वह तो ठीक है...मगर...’’ पत्नी ने अपने मन की चिन्ता को और उजागर करना चाहा।
‘‘अगर–मगर कर क्या करें? चाहता तो मैं खुद भी नहीं, लेकिन...अब क्या करूं।’’
‘‘मैं तो कहती हूं कि धीरे–धीरे यूँ ही जाते रहो। तीन साल पड़े हैं रिटायरमैंट में।
क्या पता अगर कहीं तुम्हे कुछ हो गया, तो बाद में नौकरी तो मिल जाएगी लड़के को,इतना पढने के बाद भी बेकार बैठा है।’’
यह सुनते ही रामलाल का चेहरा एकदम पीला पड़ गया।
ओर पत्नी की आँखों से झर–झर आँसू बहने लगे, जिन्हे वो मुंह फेर कर छुपाने की कौशिश करने लगी।
आज जैसे ही वो डयूटी से आकर घर के एक कोने में पडी कुर्सी पर बैठने लगा तो दर्द के मारे मुंह से एक आह सी निकल पडी.
‘‘अरी! रमेश की मां, अब नहीं मुझसे बसों में उतरा–चढ़ा जाता, घुटने तो अब बिल्कुल ही जवाब देने लगे हैं। ड्यूटी पर जाकर बैठना भी बडा दूभर लगता है। अब तो डाक्टरों ने भी कह दिया, भई आराम करो। ज्यादा चलना–फिरना ठीक नहीं, बेआरामी से हालत बिगड़ सकती है।’’
‘‘अपना तो ईश्वर भी बैरी हुआ पडा है,अगर लड़का कहीं छोटे–मोटे काम पर अटक गया होता तो जैसे–तैसे गुजारा कर लेते।’’ रामलाल की बात सुनकर पत्नी के ह्र्दय की पीड़ा बाहर आने लगी।
‘‘मैंने तो अब रिटायरमैंट के कागज भेज ही देने हैं। बहुत कर ली नौकरी, अब जब शरीर ही इज़ाजत नहीं देता तो..।’’ रामलाल ने अपनी बात जारी रखी।
‘‘वह तो ठीक है...मगर...’’ पत्नी ने अपने मन की चिन्ता को और उजागर करना चाहा।
‘‘अगर–मगर कर क्या करें? चाहता तो मैं खुद भी नहीं, लेकिन...अब क्या करूं।’’
‘‘मैं तो कहती हूं कि धीरे–धीरे यूँ ही जाते रहो। तीन साल पड़े हैं रिटायरमैंट में।
क्या पता अगर कहीं तुम्हे कुछ हो गया, तो बाद में नौकरी तो मिल जाएगी लड़के को,इतना पढने के बाद भी बेकार बैठा है।’’
यह सुनते ही रामलाल का चेहरा एकदम पीला पड़ गया।
ओर पत्नी की आँखों से झर–झर आँसू बहने लगे, जिन्हे वो मुंह फेर कर छुपाने की कौशिश करने लगी।
स्वपन और यथार्थ
वह एक बहुत ही खुशनुमा सुबह थी। पूरब की लाली और मन्द हवा में झूमते वृक्ष उसे अच्छे लगे। उसने काले सफेद बादलों को देखा और इठलाते हुए आगे बढ़ गया । तभी उसे लगा कि बादलों के साथ–साथ वह भी उड़ रहा है। धूल का उड़ना उसे अच्छा लगा। उसे कलरव करते पक्षी और रंग–बिरंगे फूलों के इर्द–गिर्द इतराती तितलियां अधिक मोहक लगीं। आज उसने उस मरियल से कुत्ते को भी नहीं मारा।
फिर उसने खुद को उस खेल के मैदान में पाया। वह खुशी से तालियां बजाने लगा। तभी अचानक एक गेंद आकर उसके पांव पर लगी। वह धन्य हो गया। आज पहली बार उसने क्रिकेट की गेंद को छुआ था।
सुन्दर झील को देखते हुए वह उस रेलवे फाटक के पास पहुंचा। आज उसकी प्रसन्नता का कोई ओर–छोर नहीं था उस छोटी–सी रेलगाड़ी को इतने करीब से गुजरते देखकर। उसमें सवार यात्रियों की वह कल्पना करने लगा। तभी उसे लगा कि उसने धुएं को पकड़ लिया है। धुंए ने उससे कहा, ‘‘ऐ, मुझे मत पकड़ों। तुम्हारे कोमल हाथ गन्दे हो जाएगे।’’
उसने अपने काले और खुरदरे हाथों को देखा। तभी किसी की पुकार सुन उसकी तन्द्रा टूटी। दूर ईट की भट्ठी से उसका बाप उसे बुला रहा था।
फिर उसने खुद को उस खेल के मैदान में पाया। वह खुशी से तालियां बजाने लगा। तभी अचानक एक गेंद आकर उसके पांव पर लगी। वह धन्य हो गया। आज पहली बार उसने क्रिकेट की गेंद को छुआ था।
सुन्दर झील को देखते हुए वह उस रेलवे फाटक के पास पहुंचा। आज उसकी प्रसन्नता का कोई ओर–छोर नहीं था उस छोटी–सी रेलगाड़ी को इतने करीब से गुजरते देखकर। उसमें सवार यात्रियों की वह कल्पना करने लगा। तभी उसे लगा कि उसने धुएं को पकड़ लिया है। धुंए ने उससे कहा, ‘‘ऐ, मुझे मत पकड़ों। तुम्हारे कोमल हाथ गन्दे हो जाएगे।’’
उसने अपने काले और खुरदरे हाथों को देखा। तभी किसी की पुकार सुन उसकी तन्द्रा टूटी। दूर ईट की भट्ठी से उसका बाप उसे बुला रहा था।
सोमवार, 15 दिसंबर 2008
गलती का एहसास
बहुत दिन हो गए थे, वह अपने पिता से नहीं बोला था। रहते तो दोनों एक ही घर में थे, लेकिन दोनों में कोई भी बातचीत नहीं होती थी।
इस बारे में परिवार के दूसरे सदस्यों को भी पता था। एक दिन उस के दादा जी ने पूछ ही लिया, ‘‘बेटा, तू अपने पिता से क्यों नहीं बोलता? आदमी के तो मां–बाप ही सब कुछ होते हैं।बेचारा तेरे लिए ही तो कमा रहा है,अखिर उसने क्या कुछ अपने साथ ले जाना है।’’
दादा जी की बात सुनकर वह बोला, ‘‘बाऊ जी! आपकी सब बातें ठीक हैं। मुझे कौन सा कोई गिला–शिकवा है। मैं तो उन्हें केवल एहसास करवाना चाहता हूँ। वे भी दफ्तर से आकर सीधे अपने कमरे में चले जाते हैं, तुम्हारे साथ एक भी बात नहीं करते।
अब आप ही बताएं कि क्या ये उचित है?
इस बारे में परिवार के दूसरे सदस्यों को भी पता था। एक दिन उस के दादा जी ने पूछ ही लिया, ‘‘बेटा, तू अपने पिता से क्यों नहीं बोलता? आदमी के तो मां–बाप ही सब कुछ होते हैं।बेचारा तेरे लिए ही तो कमा रहा है,अखिर उसने क्या कुछ अपने साथ ले जाना है।’’
दादा जी की बात सुनकर वह बोला, ‘‘बाऊ जी! आपकी सब बातें ठीक हैं। मुझे कौन सा कोई गिला–शिकवा है। मैं तो उन्हें केवल एहसास करवाना चाहता हूँ। वे भी दफ्तर से आकर सीधे अपने कमरे में चले जाते हैं, तुम्हारे साथ एक भी बात नहीं करते।
अब आप ही बताएं कि क्या ये उचित है?
आखिर किसकी जिम्मेदारी ?
आखिर जिस का डर था, वही हुआ. काले कोट वाला टिकट–निरीक्षक यमदूत की तरह सामने खड़ा था,ओर टिकिट दिखाने का इशारा करने लगा। मैने टिकट निकाला तो देखते ही बोला, ‘‘यह तो साधारण दर्ज़े का टिकट है। स्लीपर क्लास में क्यों बैठे हो?’’
‘‘साधारण दर्ज़े के तो दो ही डिब्बे हैं। दोनों ठसाठस भरे हैं, जहां पैर रखने की भी जगह नहीं है। स्लीपर क्लास में जगह थी,सो इसी में चढ गए। वैसे भी दिल्ली के आगे तो इसमें आरक्षण भी नहीं होता।’’मैंने स्पष्टीकरण दिया।
‘‘मै ये सब नहीं जानता, कोई बहाना नहीं चलेगा। स्लीपर क्लास का किराया व जुर्माना मिला कर तीन सौ बीस रूपए हुए, जल्दी निकालो।’’ टिकट–निरीक्षक उतावला होने लगा ।
‘‘सभी के पास साधारण दर्ज़े का टिकट है।’’
‘‘तुम अपनी बात करो।’’टिकिट निरीक्षक कुछ भी सुनने को तैयार न था। विवश होकर मैंने जेब में हाथ डाला लेकिन वहाँ से पर्याप्त रकम नहीं मिली,ओर मैं दूसरी जेब खंगालने लगा। पैसे मिलने में देर होती देख, वह सामने बैठे बुजुर्ग का टिकट देखने लगा।
‘‘तुम्हारा टिकट भी साधारण दर्ज़े का है। तुम भी निकालो तीन सौ बीस रूपए।’’
‘‘मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, देने के लिए।’’ बुजुर्ग की आवाज दमदार थी।
‘‘जु्र्माना नहीं दोगे तो सजा भी हो सकती है,वो भी 3 महीने की’’टिकिट निरीक्षक ने पीछे खड़े सिपाही की ओर देखते हुए धमकी दी।
‘‘किस जुर्म में?’’
‘‘साधारण दर्ज़े के टिकट पर स्लीपर क्लास में सफर करने के लिए।’’
‘‘मुझे आप साधारण दर्जे में सीट दिला दो।’’
‘‘यह मेरी जिम्मेदारी नहीं।’’
‘‘रेलवे ने मुझे यह टिकट किस लिए जारी किया है?’’
‘‘यह टिकट केवल इस गाड़ी के साधारण दर्ज़े में सफर करने की इजाजत देता है। सीट मिलना जरूरी नहीं है।’’टिकिट निरीक्षक ने एक–एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।
‘‘क्या मैं गाड़ी की छत पर बैठ कर सफर कर सकता हूँ?’’
‘‘छत पर बैठ कर सफर करना तो इससे भी बड़ा जुर्म हैं।’’
‘‘क्या मैं दरवाजे के सथ लटक कर सफर कर सकता हूँ?’’
‘‘नहीं, रेलवे ऐसा करने की इजाजत नहीं देती।’’
बुजुर्ग एकदम गुस्से मे अपनी सीट् से उठा और उसने टिकट–निरीक्षक का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे गाड़ी में वो स्थान बता दो जहाँ बैठ कर मैं इस टिकट पर सफर कर सकता हूँ।’’
निरीक्षक को कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने किसी तरह बुजुर्ग से अपना हाथ छुड़ाया और वापस चला गया। तीन सौ बीस रूपए के नोट हाथ में पकड़े मैं बुजुर्ग को देखता रह गया।
‘‘साधारण दर्ज़े के तो दो ही डिब्बे हैं। दोनों ठसाठस भरे हैं, जहां पैर रखने की भी जगह नहीं है। स्लीपर क्लास में जगह थी,सो इसी में चढ गए। वैसे भी दिल्ली के आगे तो इसमें आरक्षण भी नहीं होता।’’मैंने स्पष्टीकरण दिया।
‘‘मै ये सब नहीं जानता, कोई बहाना नहीं चलेगा। स्लीपर क्लास का किराया व जुर्माना मिला कर तीन सौ बीस रूपए हुए, जल्दी निकालो।’’ टिकट–निरीक्षक उतावला होने लगा ।
‘‘सभी के पास साधारण दर्ज़े का टिकट है।’’
‘‘तुम अपनी बात करो।’’टिकिट निरीक्षक कुछ भी सुनने को तैयार न था। विवश होकर मैंने जेब में हाथ डाला लेकिन वहाँ से पर्याप्त रकम नहीं मिली,ओर मैं दूसरी जेब खंगालने लगा। पैसे मिलने में देर होती देख, वह सामने बैठे बुजुर्ग का टिकट देखने लगा।
‘‘तुम्हारा टिकट भी साधारण दर्ज़े का है। तुम भी निकालो तीन सौ बीस रूपए।’’
‘‘मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, देने के लिए।’’ बुजुर्ग की आवाज दमदार थी।
‘‘जु्र्माना नहीं दोगे तो सजा भी हो सकती है,वो भी 3 महीने की’’टिकिट निरीक्षक ने पीछे खड़े सिपाही की ओर देखते हुए धमकी दी।
‘‘किस जुर्म में?’’
‘‘साधारण दर्ज़े के टिकट पर स्लीपर क्लास में सफर करने के लिए।’’
‘‘मुझे आप साधारण दर्जे में सीट दिला दो।’’
‘‘यह मेरी जिम्मेदारी नहीं।’’
‘‘रेलवे ने मुझे यह टिकट किस लिए जारी किया है?’’
‘‘यह टिकट केवल इस गाड़ी के साधारण दर्ज़े में सफर करने की इजाजत देता है। सीट मिलना जरूरी नहीं है।’’टिकिट निरीक्षक ने एक–एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।
‘‘क्या मैं गाड़ी की छत पर बैठ कर सफर कर सकता हूँ?’’
‘‘छत पर बैठ कर सफर करना तो इससे भी बड़ा जुर्म हैं।’’
‘‘क्या मैं दरवाजे के सथ लटक कर सफर कर सकता हूँ?’’
‘‘नहीं, रेलवे ऐसा करने की इजाजत नहीं देती।’’
बुजुर्ग एकदम गुस्से मे अपनी सीट् से उठा और उसने टिकट–निरीक्षक का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे गाड़ी में वो स्थान बता दो जहाँ बैठ कर मैं इस टिकट पर सफर कर सकता हूँ।’’
निरीक्षक को कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने किसी तरह बुजुर्ग से अपना हाथ छुड़ाया और वापस चला गया। तीन सौ बीस रूपए के नोट हाथ में पकड़े मैं बुजुर्ग को देखता रह गया।
रविवार, 14 दिसंबर 2008
बाबा जी की कृपा
राधा जिसके विवाह को हुए चार साल बीत चुके थे, किन्तु विधाता का खेल देखिए कि बेचारी की अभी तक गोद सूनी ही थी.
आस पडोस,नाते रिश्तेदारों में सुगबुगाहट होने लगी. बांझ, निपूति, अपशकुनी जैसे अलंकारों से उसे नवाजा जाने लगा.
उसने भी दवा-बूटी,पूजा-पाठ,व्रत-उपवास सब करके देख लिया,लेकिन कोई आस नहीं जगी.
उसकी सास जो कि एक 'बाबा' जी की अनन्य भक्त थी, उनके पास चलने के लिए उसे अक्सर मजबूर किया करती।
‘‘बहू! मेरी भी इच्छा है कि मैं अपने इकलौते बेटे के घर बच्चा देखूं। आखिर खानदान को चलाने वाला भी तो कोई होना चाहिए’’
एक दिन सास के ज्यादा मजबूर करने पर राधा ने हाँ कर दी। डरी–सहमी राधा अपनी सास के साथ बाबा जी के डेरे जा पहुँची। काफी समय इंतजार करने के बाद अंदर कमरे में दर्शनों के लिए बुलाया गया। बाबा के साथ उसकी सास ने कुछ बातचीत की। इतने में बाबा के शिष्यों ने ना मालूम उसे किस चीज का धुआँ देना शुरू कर दिया। पता नहीं धुएँ में क्या मिला हुआ था कि उसकी आँखें धीरे–धीरे बंद होनी शुरू हो गई। बेहोशी छाने लगी ओर आखों के सामने नीले–पीले रंग तैरने लगे।
राधा जब होश में आई तो उसे अपना सिर भारी भारी लगा। बदन टूटता सा महसूस हुआ आंखे खोलकर देखा तो कमरे में हल्का सा अंधेरा था। उसने मिचमिचाती आँखों को जोर लगा कर खोलने की कोशिश की। अपने आप को नग्न अवस्था में पाकर, उसकी एकदम चीख निकल गई। उसने चकराते सिर से जल्दी–जल्दी कपड़े पहने और बाहर निकल आई। उसकी सास घुटनों में सिर दिए बैठी थी, रोती आँखों से अपनी सास की तरफ घूरकर देखा। सास ने उसे गले लगा लिया तो राधा सुबक सुबक कर रोने लगी।
‘‘हिम्मत कर बेटी औरत को औलाद की खातिर पता नहीं क्या क्या सहना पडता हैं। तेरा पति भी तो बाबा जी की कृपा से ही हुआ है।’’
बर्फ हुई राधा धड़ाम से धरती पर गिर पड़ी।
आस पडोस,नाते रिश्तेदारों में सुगबुगाहट होने लगी. बांझ, निपूति, अपशकुनी जैसे अलंकारों से उसे नवाजा जाने लगा.
उसने भी दवा-बूटी,पूजा-पाठ,व्रत-उपवास सब करके देख लिया,लेकिन कोई आस नहीं जगी.
उसकी सास जो कि एक 'बाबा' जी की अनन्य भक्त थी, उनके पास चलने के लिए उसे अक्सर मजबूर किया करती।
‘‘बहू! मेरी भी इच्छा है कि मैं अपने इकलौते बेटे के घर बच्चा देखूं। आखिर खानदान को चलाने वाला भी तो कोई होना चाहिए’’
एक दिन सास के ज्यादा मजबूर करने पर राधा ने हाँ कर दी। डरी–सहमी राधा अपनी सास के साथ बाबा जी के डेरे जा पहुँची। काफी समय इंतजार करने के बाद अंदर कमरे में दर्शनों के लिए बुलाया गया। बाबा के साथ उसकी सास ने कुछ बातचीत की। इतने में बाबा के शिष्यों ने ना मालूम उसे किस चीज का धुआँ देना शुरू कर दिया। पता नहीं धुएँ में क्या मिला हुआ था कि उसकी आँखें धीरे–धीरे बंद होनी शुरू हो गई। बेहोशी छाने लगी ओर आखों के सामने नीले–पीले रंग तैरने लगे।
राधा जब होश में आई तो उसे अपना सिर भारी भारी लगा। बदन टूटता सा महसूस हुआ आंखे खोलकर देखा तो कमरे में हल्का सा अंधेरा था। उसने मिचमिचाती आँखों को जोर लगा कर खोलने की कोशिश की। अपने आप को नग्न अवस्था में पाकर, उसकी एकदम चीख निकल गई। उसने चकराते सिर से जल्दी–जल्दी कपड़े पहने और बाहर निकल आई। उसकी सास घुटनों में सिर दिए बैठी थी, रोती आँखों से अपनी सास की तरफ घूरकर देखा। सास ने उसे गले लगा लिया तो राधा सुबक सुबक कर रोने लगी।
‘‘हिम्मत कर बेटी औरत को औलाद की खातिर पता नहीं क्या क्या सहना पडता हैं। तेरा पति भी तो बाबा जी की कृपा से ही हुआ है।’’
बर्फ हुई राधा धड़ाम से धरती पर गिर पड़ी।
शनिवार, 13 दिसंबर 2008
कुछ हरियाणवी चुटकले
1. एक बार एक सेठ की दुकान में चोरी हो गई । सेठ ने थाने में रपट लिखवा दी ।
अगले दिन सेठ की दुकान पर तीन सिपाही आ पहुंचे और पूछताछ करने लगे । फिर एक सिपाही ने एक बोरी में से थोड़े भुने हुए चने उठाये और खाने लगा । दूसरे ने थोड़ी मूंगफली की मुट्ठी भर ली और तीसरे ने पतासे खाने शुरु कर दिये ।
थोड़ी देर बात थाणेदार आया और सेठ से बोला - सेठ, कितने का नुकसान हुआ ?
सेठ ने जवाब दिया - जी, नुकसान खतम कित हुया सै, ईबै तै होण ए लाग रहया सै !!
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2. एक बार एक बनिये की छोरी(लडकी) के ब्याह में फेरे करवाण खातिर कोई पंडित ना मिल्या । जब कित्तै तैं पंडित का जुगाड़ ना हुया तै छोरी आळे एक जिम्मेदार जाट नै ले आये । जाट नै फेरे शुरु करवा दिये ।
तीन फेरे होण पाच्छै जाट बोल्या - भाइयो, रस्म तै पूरी हो-गी, छोरी की विदाई करवाओ ।
छोरे आळे बाराती बोले - जी, फेरे तै सात होया करैं,अर इभी तो तीन ही होए हैं ।
जाट बोल्या - भाई, बात इसी सै, जे उसनै रुकणा होगा तै तीन फेरयां में भी कित्तै ना जावै । अर जै इसनै भाजणा ए सै, तै चाहे पच्चीस फेरे करवा ल्यो !!
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3. एक बार एक सेठ के घर में सांप घुस गया । सेठ ने चिल्लाना शुरू किया, लोग इकट्ठे हो गए । एक जाट गया अन्दर लाठी ले कर । उसके घुसते ही सेठ बाहर आया और दरवाजे की कुंडी बंद कर दी ।
लोग बोले - सेठ ये क्या किया ?
सेठ बोल्या - दो दुश्मन भीतर सैं - एक तै मरै ए गा !!
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4. एक बार एक बीमे का एजेन्ट गाहक बणावन खातिर एक गाम में चल्या गया और लाग्या एक ताऊ नै बीमे की पोलिसी समझावण । बोल्या - ताऊ, या पोलिसी इसी सै अक जै तू मर-ग्या तै तेरे घर आळां नै इतने पैसे मिल-ज्यांगे । अर या एक और पोलिसी इसी सै अक जै तू मर ग्या, तै जितने का बीमा सै, उसतैं दुगुने पैसे मिल ज्यांगे ... अर एक या नई पोलिसी सै जिसमैं तीन गुणे पैसे मिल ज्यांगे ।
ताऊ कै आया गुस्सा, अर बोल्या - "भाई, तेरी सारी पोलिसी ठीक सैं - तू आपणी या किताब तै बंद कर दे, अर कोई इसी पोलिसी बता दे अक मर तै बीमे का एजेंट जावै और पैसे हम नै मिल जावैं !!
अगले दिन सेठ की दुकान पर तीन सिपाही आ पहुंचे और पूछताछ करने लगे । फिर एक सिपाही ने एक बोरी में से थोड़े भुने हुए चने उठाये और खाने लगा । दूसरे ने थोड़ी मूंगफली की मुट्ठी भर ली और तीसरे ने पतासे खाने शुरु कर दिये ।
थोड़ी देर बात थाणेदार आया और सेठ से बोला - सेठ, कितने का नुकसान हुआ ?
सेठ ने जवाब दिया - जी, नुकसान खतम कित हुया सै, ईबै तै होण ए लाग रहया सै !!
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2. एक बार एक बनिये की छोरी(लडकी) के ब्याह में फेरे करवाण खातिर कोई पंडित ना मिल्या । जब कित्तै तैं पंडित का जुगाड़ ना हुया तै छोरी आळे एक जिम्मेदार जाट नै ले आये । जाट नै फेरे शुरु करवा दिये ।
तीन फेरे होण पाच्छै जाट बोल्या - भाइयो, रस्म तै पूरी हो-गी, छोरी की विदाई करवाओ ।
छोरे आळे बाराती बोले - जी, फेरे तै सात होया करैं,अर इभी तो तीन ही होए हैं ।
जाट बोल्या - भाई, बात इसी सै, जे उसनै रुकणा होगा तै तीन फेरयां में भी कित्तै ना जावै । अर जै इसनै भाजणा ए सै, तै चाहे पच्चीस फेरे करवा ल्यो !!
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3. एक बार एक सेठ के घर में सांप घुस गया । सेठ ने चिल्लाना शुरू किया, लोग इकट्ठे हो गए । एक जाट गया अन्दर लाठी ले कर । उसके घुसते ही सेठ बाहर आया और दरवाजे की कुंडी बंद कर दी ।
लोग बोले - सेठ ये क्या किया ?
सेठ बोल्या - दो दुश्मन भीतर सैं - एक तै मरै ए गा !!
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4. एक बार एक बीमे का एजेन्ट गाहक बणावन खातिर एक गाम में चल्या गया और लाग्या एक ताऊ नै बीमे की पोलिसी समझावण । बोल्या - ताऊ, या पोलिसी इसी सै अक जै तू मर-ग्या तै तेरे घर आळां नै इतने पैसे मिल-ज्यांगे । अर या एक और पोलिसी इसी सै अक जै तू मर ग्या, तै जितने का बीमा सै, उसतैं दुगुने पैसे मिल ज्यांगे ... अर एक या नई पोलिसी सै जिसमैं तीन गुणे पैसे मिल ज्यांगे ।
ताऊ कै आया गुस्सा, अर बोल्या - "भाई, तेरी सारी पोलिसी ठीक सैं - तू आपणी या किताब तै बंद कर दे, अर कोई इसी पोलिसी बता दे अक मर तै बीमे का एजेंट जावै और पैसे हम नै मिल जावैं !!
सोमवार, 8 दिसंबर 2008
हमसा बेहया कोई नहीं !
एक दिन वह था कि हम सारे जहां में फर्द थे.
एक दिन यह है कि हमसा बेहया कोई नहीं
शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008
कुत्तों का सामाजिक विकास (व्यंग्य)
पिछले कईं दिनों से चिट्ठाजगत पर कुतों के विषय में चल रही चर्चा को देखते हुए, सोचा कि इस महान जीव के विषय में अपनी 'कुक्कुरमति' द्वारा मैने जो भी ज्ञान उपार्जित किया है,उसे आपसे सांझा कर ही लेता हूं.
कुत्तों का समाजिक विकास
कुत्ता वास्तव में एक ऎतिहासिक प्राणी है, किन्तु आधुनिक युग मे प्रवृत्ति के हिसाब से इस प्राणी का जितना अभूतपूर्व विकास हुआ है। उतना तो शायद मनुष्य का भी नहीं हुआ है.इंसानो के साथ रहते हुए कुछ तो अपने को कुत्ता ही नहीं समझते। उनका अपना अहंकार होता है। उनकी अपनी चाल होती है। वे आपकी तरफ़ देखेंगे तो कुछ इस तरह जैसे यह उनकी कृपा है कि वे आपको देख रहे हैं।वे कुत्तों में अपने को आर्य समझते हैं।
रंग-रूप,कद-काठी के अतिरिक्त प्रकृति के आधार पर कुतों को दो भागों में बांटा जा सकता है.
एक वो जो काटते हैं-कुतों की यह प्रजाति मुख्यत: पुलिस विभाग में पाई जाती है,जिनका अपना हि एक भिन्न प्रकार का स्वाभिमान होता है.हर रास्ता चलते प्राणी पर गुर्राना ओर अपनी ताकत का अहसास कराना ईनका मौलिक अधिकार माना जाता है.
ईश्वर की तरफ़ से प्राप्त सबसे अनूठे उपहार अपनी घ्राणशक्ति का भी सबसे अधिक उपयोग यही प्रजाति करती हैं।साधारण मनुष्य तो इनके सामने अपने आप को पूर्णत: दीन-हीन अवस्था मे महसूस करता है.खानपान के मामले मे यह प्रजाति थोडी पेटू टाईप की होती है, आप इन्हे सर्वाहारा भी कह सकते है.इनकी पाचन क्षमता बहुत ही विलक्षण होती है,क्यों कि इस पृथ्वी की ऎसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसका भक्षण करने मे ये अपने आप को असमर्थ पाते हों.
किन्तु समाजिक स्तर पर अभी यह विकासशील प्रजाति है.
दूसरे वो जो केवल भौंकते है- कुत्तों मे यह पूर्णत: विकसित प्रजाति मानी जाती है.सीमित साधनों के बावजूद् जितनी उन्नति इस प्रजाति ने की है, उतनी तो निश्चित तौर पर मनुष्य जाति ने भी नहीं की है.पहले कुते को इंसान का वफादार सेवक तथा रक्षक समझा जाता था,किन्तु शनै: शनै: इनकी 'कुत्तापंती' का ऎसा विकास हुआ कि आज इनकी रक्षा का दायित्व मनुष्य जाति को सौंपा जाता है.
इस तरह के कुत्ते मुख्यत: राजनीती में पाए जाते है.इनकी विकास क्षमता का आंकलन आप इसी बात से लगा सकतें हैं कि इनमे से कुछ तो किसी राज्य विशेष के मुख्यमन्त्री पद पर शोभायमान हो चुके हैं. वास्तव मे ऎसी अविश्वसनीय उन्नति का 'राज' केवलमात्र इनकी 'भौंकन-क्षमता' मे ही निहित है.इनकी इसी 'भौंकन कला' के वशिभूत होकर मानव जाति इनके पीछे चलने में, अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है.
किन्तु स्वभावत: ये थोडे (या अधिकतर)दम्भी एवं अहंकारी होते है., तथा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने,एवं मनुष्य जाति को उनकी हीनता का अहसास कराने हेतु समय-समय पर उन्हे प्रताडित भी करते रहते हैं.
कुतों में मुख्यत: पाया जाने वाला वफादारी नामक गुण, जिसके आधार पर कुता वास्तव में कुत्ता कहलाने का अधिकारी है, उस गुण का शनै: शनै: इनमे पूर्णत: ह्रास होता चला गया.
आज जैसे-जैसे इन्सान अपनी 'इन्सानियत'से दूर होता जा रहा है,वैसे ही इन्होने भी अपनी 'कुत्तानियत' का परित्याग कर दिया है.
कुत्तों का समाजिक विकास
कुत्ता वास्तव में एक ऎतिहासिक प्राणी है, किन्तु आधुनिक युग मे प्रवृत्ति के हिसाब से इस प्राणी का जितना अभूतपूर्व विकास हुआ है। उतना तो शायद मनुष्य का भी नहीं हुआ है.इंसानो के साथ रहते हुए कुछ तो अपने को कुत्ता ही नहीं समझते। उनका अपना अहंकार होता है। उनकी अपनी चाल होती है। वे आपकी तरफ़ देखेंगे तो कुछ इस तरह जैसे यह उनकी कृपा है कि वे आपको देख रहे हैं।वे कुत्तों में अपने को आर्य समझते हैं।
रंग-रूप,कद-काठी के अतिरिक्त प्रकृति के आधार पर कुतों को दो भागों में बांटा जा सकता है.
एक वो जो काटते हैं-कुतों की यह प्रजाति मुख्यत: पुलिस विभाग में पाई जाती है,जिनका अपना हि एक भिन्न प्रकार का स्वाभिमान होता है.हर रास्ता चलते प्राणी पर गुर्राना ओर अपनी ताकत का अहसास कराना ईनका मौलिक अधिकार माना जाता है.
ईश्वर की तरफ़ से प्राप्त सबसे अनूठे उपहार अपनी घ्राणशक्ति का भी सबसे अधिक उपयोग यही प्रजाति करती हैं।साधारण मनुष्य तो इनके सामने अपने आप को पूर्णत: दीन-हीन अवस्था मे महसूस करता है.खानपान के मामले मे यह प्रजाति थोडी पेटू टाईप की होती है, आप इन्हे सर्वाहारा भी कह सकते है.इनकी पाचन क्षमता बहुत ही विलक्षण होती है,क्यों कि इस पृथ्वी की ऎसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसका भक्षण करने मे ये अपने आप को असमर्थ पाते हों.
किन्तु समाजिक स्तर पर अभी यह विकासशील प्रजाति है.
दूसरे वो जो केवल भौंकते है- कुत्तों मे यह पूर्णत: विकसित प्रजाति मानी जाती है.सीमित साधनों के बावजूद् जितनी उन्नति इस प्रजाति ने की है, उतनी तो निश्चित तौर पर मनुष्य जाति ने भी नहीं की है.पहले कुते को इंसान का वफादार सेवक तथा रक्षक समझा जाता था,किन्तु शनै: शनै: इनकी 'कुत्तापंती' का ऎसा विकास हुआ कि आज इनकी रक्षा का दायित्व मनुष्य जाति को सौंपा जाता है.
इस तरह के कुत्ते मुख्यत: राजनीती में पाए जाते है.इनकी विकास क्षमता का आंकलन आप इसी बात से लगा सकतें हैं कि इनमे से कुछ तो किसी राज्य विशेष के मुख्यमन्त्री पद पर शोभायमान हो चुके हैं. वास्तव मे ऎसी अविश्वसनीय उन्नति का 'राज' केवलमात्र इनकी 'भौंकन-क्षमता' मे ही निहित है.इनकी इसी 'भौंकन कला' के वशिभूत होकर मानव जाति इनके पीछे चलने में, अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है.
किन्तु स्वभावत: ये थोडे (या अधिकतर)दम्भी एवं अहंकारी होते है., तथा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने,एवं मनुष्य जाति को उनकी हीनता का अहसास कराने हेतु समय-समय पर उन्हे प्रताडित भी करते रहते हैं.
कुतों में मुख्यत: पाया जाने वाला वफादारी नामक गुण, जिसके आधार पर कुता वास्तव में कुत्ता कहलाने का अधिकारी है, उस गुण का शनै: शनै: इनमे पूर्णत: ह्रास होता चला गया.
आज जैसे-जैसे इन्सान अपनी 'इन्सानियत'से दूर होता जा रहा है,वैसे ही इन्होने भी अपनी 'कुत्तानियत' का परित्याग कर दिया है.
बुधवार, 3 दिसंबर 2008
कुछ हरियाणवी चुटकले
1.
एक बार एक चौधरी साहब छोरी देखन चले गए .
आपने छोरे खातर . छोरी जमीं घनी काली थी . चोधरी
साहब के कोन्या पसंद आई . छोरी का बाबू बोल्या चोधरी
साहब छोरी नै पसंद कर जाओ . कार दे देवां गे दहेज़ मै .
चोधरी साहब बोल्ये -- भाई तू तो कार दे कै डिगा देगा .
जै यो खरना म्हारे चला गया तो आगली पीडी में म्हारी
छोरी ट्रक दिए पाछे भी ना ब्याई जावै
2.
एक बार एक मुक्कदमे में ताई गवाह बना दी ! ताई जा के खड़ी होई, अर् दोनू वकील भी ताई के गाम के ई थे !
वकील बोल्या " ताई तू मन्ने जाने है ?
ताई" हाँ तू रामफूल का है ना. तेरा बाबु घणा सूधा आदमी था पर तू कत्ति निक्कमा एक नम्बर का झूठा . झूठ बोल बोल कै तूं लोग नै ठगे है नरे झूठे गवाह बना के तू केस जीते है . तेरे तें तो सारे लोग परेशान हैं तेरी लुगाई भी परेशान हो के तन्ने छोड़ कै चली गयी !
वकील बेचारा चुप. उसनै थोडी देर मैं दूसरे वकील कानी ईसारा करया अर फेर पुछया " तू इसने जाने है ?"
ताई बोली " हाँ यो रूल्दू का छोरा है. इसके बाबु ने निरे रूपिये खर्च करके यो पढाया अर् इसने कख नही सिखया सारी उमर छोरिया पाछै हांडे गया. इसका चक्कर तेरी बहू गेल भी था ! आज ताहि इसने एक भी मुक्कादमा नही जित्या है!
जनता हांसन लग गयी जज बोल्या "आर्डर आर्डर "
अर् दोनू वकील बुलाये और कहन लगया " जे थाम दोनुवा में तै किसे नै भी या पूछ ली के या मन्ने जाने है तो मैं थारे गोली मरवा दयूंगा.
3.
एक बै एक किसान रहट में बैल जोड़कर पानी निकाल रहा था .
बैल अपने आप चारो तरफ़ गोल गोल घूम रहे थे और किसान आँख बंद कर पेड़ के नीचे लेटा हुआ था .
तभी उधर से एक वकील साहब गुजरे . वो किसान से बोले .
वकील बोल्या --तुम यहाँ पेड़ के नीचे लेटे हो तुम्हे कैसे पता चलता है कि बैल पानी निकाल रहे है, वो खड़े भी हो सकते है . और तुम सोचोगे वो चल रहे है .
किसान बोल्या -- भाई मैं इतना पागल कौणी, मणै घंटी बाँध राखी सै उनके गले में . जै वे रुकेंगे
तो घंटी बाजनी बंद हो ज्या गी और मने बेरा लाग ज्या गा .
वकील फेर बोल्या -- अरे जै वे बैल एक जगह खड़े हो कै नाड हिलान लाग गे तै फेर ताने क्यूकर बेरा
लगेगा की खड़े सै के रुक रे सै .
किसान बोल्या --- भाई वे इसा काम कोन्या करैं . वे बैल सै वकील कोन्या
एक बार एक चौधरी साहब छोरी देखन चले गए .
आपने छोरे खातर . छोरी जमीं घनी काली थी . चोधरी
साहब के कोन्या पसंद आई . छोरी का बाबू बोल्या चोधरी
साहब छोरी नै पसंद कर जाओ . कार दे देवां गे दहेज़ मै .
चोधरी साहब बोल्ये -- भाई तू तो कार दे कै डिगा देगा .
जै यो खरना म्हारे चला गया तो आगली पीडी में म्हारी
छोरी ट्रक दिए पाछे भी ना ब्याई जावै
2.
एक बार एक मुक्कदमे में ताई गवाह बना दी ! ताई जा के खड़ी होई, अर् दोनू वकील भी ताई के गाम के ई थे !
वकील बोल्या " ताई तू मन्ने जाने है ?
ताई" हाँ तू रामफूल का है ना. तेरा बाबु घणा सूधा आदमी था पर तू कत्ति निक्कमा एक नम्बर का झूठा . झूठ बोल बोल कै तूं लोग नै ठगे है नरे झूठे गवाह बना के तू केस जीते है . तेरे तें तो सारे लोग परेशान हैं तेरी लुगाई भी परेशान हो के तन्ने छोड़ कै चली गयी !
वकील बेचारा चुप. उसनै थोडी देर मैं दूसरे वकील कानी ईसारा करया अर फेर पुछया " तू इसने जाने है ?"
ताई बोली " हाँ यो रूल्दू का छोरा है. इसके बाबु ने निरे रूपिये खर्च करके यो पढाया अर् इसने कख नही सिखया सारी उमर छोरिया पाछै हांडे गया. इसका चक्कर तेरी बहू गेल भी था ! आज ताहि इसने एक भी मुक्कादमा नही जित्या है!
जनता हांसन लग गयी जज बोल्या "आर्डर आर्डर "
अर् दोनू वकील बुलाये और कहन लगया " जे थाम दोनुवा में तै किसे नै भी या पूछ ली के या मन्ने जाने है तो मैं थारे गोली मरवा दयूंगा.
3.
एक बै एक किसान रहट में बैल जोड़कर पानी निकाल रहा था .
बैल अपने आप चारो तरफ़ गोल गोल घूम रहे थे और किसान आँख बंद कर पेड़ के नीचे लेटा हुआ था .
तभी उधर से एक वकील साहब गुजरे . वो किसान से बोले .
वकील बोल्या --तुम यहाँ पेड़ के नीचे लेटे हो तुम्हे कैसे पता चलता है कि बैल पानी निकाल रहे है, वो खड़े भी हो सकते है . और तुम सोचोगे वो चल रहे है .
किसान बोल्या -- भाई मैं इतना पागल कौणी, मणै घंटी बाँध राखी सै उनके गले में . जै वे रुकेंगे
तो घंटी बाजनी बंद हो ज्या गी और मने बेरा लाग ज्या गा .
वकील फेर बोल्या -- अरे जै वे बैल एक जगह खड़े हो कै नाड हिलान लाग गे तै फेर ताने क्यूकर बेरा
लगेगा की खड़े सै के रुक रे सै .
किसान बोल्या --- भाई वे इसा काम कोन्या करैं . वे बैल सै वकील कोन्या
रविवार, 30 नवंबर 2008
मिलिए देश के भावी प्रधानमंत्री से

आज की ताजा खबर
मुम्बई में हुए आतंकवादी हमलों के संदर्भ में आज शाम प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी नहीं जाएंगे।
भाजपा का कहना है कि श्री आडवाणी राजस्थान में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं इसलिए उनका इस बैठक के लिए आना संभव नहीं।
भाजपा के एक अन्य नेता, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी इस बैठक में शामिल नहीं होंगे।
वाह रे लौह पुरुष, धिक्कार है तुझ पे और तेरी राष्ट्रवादी पार्टी पर, राजनीति चमकाने के लिये तुझे और तेरी पार्टी के हि दूसरे तेरे जैसे नपुंसकों के पास, मुम्बई जाने का टाईम था. ओर सरकार को कोसने का भी तुम लोगों के पास पूरा टाईम होता है,
आज जब अपने राजनीतिक स्वार्थों का त्याग करके देश की समस्त राजनीतिक पार्टियों को सरकार का सहयोग करना चाहिये, ये महाशय चुनाव प्रचार ओर भविष्य् में प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने मे व्यस्त है.
सुना है, सरदार ने हिजड़ो की फौज बनाई है
अपन तो आज बहौत खुश हैं। आप भी खुश हो जाइए। हम सुरक्षित हैं, आप सुरक्षित हैं। अगले 3-4 महीनों के लिए हम सब को जीवनदान मिल गया है। क्योंकि आम तौर एक धमाके के बाद 3-4 महीने तो शांति रहती ही है। क्या हुआ जो 3-4 महीने बाद फिर हम करोड़ों लोगों में से 50, 100 या 200 के परिवारों पर कहर टूटेगा। बाकी तो बचे रहेंगे। दरअसल सरकार का गणित यही है। हमारे पास मरने के लिए बहुत लोग हैं। चिंता क्या है। नपुंसक सरकार की प्रजा होने का यह सही दंड है।
पूरी दुनिया में आतंकवादियों को इससे सुरक्षित ज़मीन कहां मिलेगी। सच मानिए, ये हमले अभी बंद नहीं होंगे और कभी बंद नहीं होंगे।
कयूं कि यहां आतंकवाद से निपटने की रणनीति भी अपने चुनावी समीकरण के हिसाब से तय की जाती है।
आप कल्पना कर सकते हैं110 करोड़ लोगों का भाग्यनियंता, देश का सबसे शक्तिशाली (कम से कम पद के मुताबिक,दम के मुताबिक नहीं) व्यक्ति कायरों की तरह ये कहता है कि आतंकवाद पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक स्थायी कोष बना देना चाहिए।
हर आतंकवादी हमले के बाद टेलीविजन चैनलों पर दिखने वाला गृहमंत्री का निरीह, बेचारा चेहरा फिर प्रकट हुआ। शिवराज पाटिल ने कहा कि उन्हे इस आतंकवादी हमले की जानकारीपहले से थी। धन्य हो महाराज!आपकी तो चरणवंदना होनी चाहिए.
लेकिन इन सब बातों का मतलब ये भी नहीं कि आतंकवाद की सभी घटनाओं के लिए केवल मनमोहन सिंह की सरकार ही दोषी है। मेरा तो मानना है कि सच्चा दोषी समाज है, हम खुद हैं। क्योंकि हम खुद ही इन हमलों और मौतों के प्रति इतनी असंवेदनशील हो गए हैं कि हमें ये ज़्यादा समय तक विचलित नहीं करतीं। सरकारें सच पूछिए तो जनता का ही अक्श होती हैं जो सत्ता के आइने में जनता का असली चेहरा दिखाती हैं। भारत की जनता ही इतनी स्वकेन्द्रित हो गई है कि सरकार कोई भी आए, ऐसी ही होगी। हम भारतीय इतिहास का वो सबसे शर्मनाक हादसा नहीं भूल सकते ,जब स्वयं को राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि बताने वाली बी.जे.पी. सरकार का विदेश मंत्री तीन आतंकवादियों को लेकर कंधार गया था। इस निर्लज्ज तर्क के साथ कि सरकार का दायित्व अपहरण कर लिए गए एक हवाईजहाज में बैठे लोगों को बचाना था। तो क्या उसी सरकार के विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री और स्वयं को लौहपुरुष कहलवाने के शौकीन माननीय (?)लाल कृष्ण आडवाणी उन हर हत्याओं की ज़िम्मेदारी लेंगे, जो उन तीन छोड़े गए आतंकवादियों के संगठनों द्वारा की जा रही है।
वाह री राष्ट्रवादी पार्टी, धिक्कार है।
अब क्या कहें, सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की हो या मनमोहन सिंह की, आतंकवाद हमारी नियति है। ये तो केवल भूमिका बन रही है, हम पर और बड़ी विपत्तियां आने वाली हैं।क्यूं कि 2020 तक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे इस देश की हुकूमत चंद कायर और सत्तालोलुप नपुंसक कर रहे हैं।
पूरी दुनिया में आतंकवादियों को इससे सुरक्षित ज़मीन कहां मिलेगी। सच मानिए, ये हमले अभी बंद नहीं होंगे और कभी बंद नहीं होंगे।
कयूं कि यहां आतंकवाद से निपटने की रणनीति भी अपने चुनावी समीकरण के हिसाब से तय की जाती है।
आप कल्पना कर सकते हैं110 करोड़ लोगों का भाग्यनियंता, देश का सबसे शक्तिशाली (कम से कम पद के मुताबिक,दम के मुताबिक नहीं) व्यक्ति कायरों की तरह ये कहता है कि आतंकवाद पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक स्थायी कोष बना देना चाहिए।
हर आतंकवादी हमले के बाद टेलीविजन चैनलों पर दिखने वाला गृहमंत्री का निरीह, बेचारा चेहरा फिर प्रकट हुआ। शिवराज पाटिल ने कहा कि उन्हे इस आतंकवादी हमले की जानकारीपहले से थी। धन्य हो महाराज!आपकी तो चरणवंदना होनी चाहिए.
लेकिन इन सब बातों का मतलब ये भी नहीं कि आतंकवाद की सभी घटनाओं के लिए केवल मनमोहन सिंह की सरकार ही दोषी है। मेरा तो मानना है कि सच्चा दोषी समाज है, हम खुद हैं। क्योंकि हम खुद ही इन हमलों और मौतों के प्रति इतनी असंवेदनशील हो गए हैं कि हमें ये ज़्यादा समय तक विचलित नहीं करतीं। सरकारें सच पूछिए तो जनता का ही अक्श होती हैं जो सत्ता के आइने में जनता का असली चेहरा दिखाती हैं। भारत की जनता ही इतनी स्वकेन्द्रित हो गई है कि सरकार कोई भी आए, ऐसी ही होगी। हम भारतीय इतिहास का वो सबसे शर्मनाक हादसा नहीं भूल सकते ,जब स्वयं को राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि बताने वाली बी.जे.पी. सरकार का विदेश मंत्री तीन आतंकवादियों को लेकर कंधार गया था। इस निर्लज्ज तर्क के साथ कि सरकार का दायित्व अपहरण कर लिए गए एक हवाईजहाज में बैठे लोगों को बचाना था। तो क्या उसी सरकार के विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री और स्वयं को लौहपुरुष कहलवाने के शौकीन माननीय (?)लाल कृष्ण आडवाणी उन हर हत्याओं की ज़िम्मेदारी लेंगे, जो उन तीन छोड़े गए आतंकवादियों के संगठनों द्वारा की जा रही है।
वाह री राष्ट्रवादी पार्टी, धिक्कार है।
अब क्या कहें, सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की हो या मनमोहन सिंह की, आतंकवाद हमारी नियति है। ये तो केवल भूमिका बन रही है, हम पर और बड़ी विपत्तियां आने वाली हैं।क्यूं कि 2020 तक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे इस देश की हुकूमत चंद कायर और सत्तालोलुप नपुंसक कर रहे हैं।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2008
सब टैम-टैम की बात है
एक बार अपने ताऊ का हरिद्वार जा कै गगां स्नान करण का मूड बन गया. जब वो जाने कि तैयारी करने लगा तो सारे गाव को खबर हो गई.गाव मे एक ब्राह्मण भी रहता था नाम था पडिंत राधेश्याम , जिसकी एक बहुत बुरी आद्त थी कि गांव से कोई भी कही बाहर जाता तो वो कुछ न कुछ लाने की फरमाईश जरुर कर देता.
उसे जब पता लगा कि ताऊ हरिद्वार जा रहा है तो सीधा पहुच गया ताऊ के घर और बोला "ताऊ हरद्वार जा रिया है तो एक धरम का काम हि कर दियो, तन्नै पुण्य मिलेगा".
ताऊ का मत्था तो पडित को देखते हि ठणक गया था, फिर भी बोल्या " हां पंडित जी, बोलो क्या करणा है".
पडित "ताऊ आते हुए एक शंख् लेता आईयो, इब तक गाव के मदिर मे शंख् नही है"
ताऊ ने चाहे मजबूरी मे ही सही, लेकिन हां कर दी.
फिर हरिद्वार गया और जिदगी मे चोरी-ठगी-बेईमानी करके जो पाप कमाये थे, उन्हे गंगा स्नान करके पुण्यो मे तबदील किया और वापिस घर को चल दिया.
रास्ते मे अपने गाव के नजदीक पहुच कर उसे याद आया कि बाह्ममण ने शखं मंगवाया था, वो तो ल्याणा भूल ही गया. इब के करूं, कहीं ब्राह्म्ण नाराज हो कै कोई श्राप-श्रूप ना दे दै. (वैसे ब्राह्ममण का श्राप बहुत जल्दी फलिभूत होता है, अगर आपने आज मेरे ईस चिठ्ठे पर टिप्पणि ना की तो फिर .........)
अब ताऊ बेचारा बडा परेशान हो गया, उसे कोई समाधान नजर नही आया. ईधर-ऊधर नजर दौडाई तो कुछ दूर आगे उसे मरे हुये जानवरों के कंकाल पडे दिखाई दिये.अचानक उसकी नजर एक गधे के कंकाल पर पडी, जिसकी खोपडी का आकार बिल्कुल शंख जैसा था.
अब विपरीत बुद्धि ताऊ ने सोचा कि बाह्मण ने क्या कभी शंख देखा है, यही ले चलता हूं, ये तो दिखता भी बिल्कुल शंख जैसा है
अब उसने उस खोपडी को उठाया, उसे अच्छी तरह पानी से धोकर, एक साफ से कपडे में लपेटकर अपने पास रख लिया और चल पडा गांव की ओर .
पहुंचते हि पंडित के पास गया और बोला" ले भाई पंडित तेरा शंख, बहोत हि मुसकिल ते मिल्या है"
अब अगले दिन बाह्ममण ने शंख को तिलक लगाया फिर लाल कपडे मे लपेटकर अपने भगवान के सामने रख दिया ओर पूजा-पाठ करके बजाने लगा.
लग्या फूंक पे फूंक मारण, अब अगर वो शंख होता तो बजता. बेचारे पंडित के तो फूंक मार मार के पसीने छूट गये.
उठाया शंख ओर पहुंच गया ताऊ के घर. बोला "रे ताऊ! यो कैसा शंख ले आया, यो सुसरा तो बजता ही कोणी, फूंक मारते-मारते मेरे तो फेफडे दुखण लाग गे"
ताऊ बोल्या " सब टाईम-टाईम की बात है पंडित जी, जब ईसका टैम था ना,तो गांव को सारी सारी रात सोण ना देवे था, अब इस मैं वो बात नही रही,ईब तो इसने कपडे मे लपेट कै ही रक्ख ल्यो"
उसे जब पता लगा कि ताऊ हरिद्वार जा रहा है तो सीधा पहुच गया ताऊ के घर और बोला "ताऊ हरद्वार जा रिया है तो एक धरम का काम हि कर दियो, तन्नै पुण्य मिलेगा".
ताऊ का मत्था तो पडित को देखते हि ठणक गया था, फिर भी बोल्या " हां पंडित जी, बोलो क्या करणा है".
पडित "ताऊ आते हुए एक शंख् लेता आईयो, इब तक गाव के मदिर मे शंख् नही है"
ताऊ ने चाहे मजबूरी मे ही सही, लेकिन हां कर दी.
फिर हरिद्वार गया और जिदगी मे चोरी-ठगी-बेईमानी करके जो पाप कमाये थे, उन्हे गंगा स्नान करके पुण्यो मे तबदील किया और वापिस घर को चल दिया.
रास्ते मे अपने गाव के नजदीक पहुच कर उसे याद आया कि बाह्ममण ने शखं मंगवाया था, वो तो ल्याणा भूल ही गया. इब के करूं, कहीं ब्राह्म्ण नाराज हो कै कोई श्राप-श्रूप ना दे दै. (वैसे ब्राह्ममण का श्राप बहुत जल्दी फलिभूत होता है, अगर आपने आज मेरे ईस चिठ्ठे पर टिप्पणि ना की तो फिर .........)
अब ताऊ बेचारा बडा परेशान हो गया, उसे कोई समाधान नजर नही आया. ईधर-ऊधर नजर दौडाई तो कुछ दूर आगे उसे मरे हुये जानवरों के कंकाल पडे दिखाई दिये.अचानक उसकी नजर एक गधे के कंकाल पर पडी, जिसकी खोपडी का आकार बिल्कुल शंख जैसा था.
अब विपरीत बुद्धि ताऊ ने सोचा कि बाह्मण ने क्या कभी शंख देखा है, यही ले चलता हूं, ये तो दिखता भी बिल्कुल शंख जैसा है
अब उसने उस खोपडी को उठाया, उसे अच्छी तरह पानी से धोकर, एक साफ से कपडे में लपेटकर अपने पास रख लिया और चल पडा गांव की ओर .
पहुंचते हि पंडित के पास गया और बोला" ले भाई पंडित तेरा शंख, बहोत हि मुसकिल ते मिल्या है"
अब अगले दिन बाह्ममण ने शंख को तिलक लगाया फिर लाल कपडे मे लपेटकर अपने भगवान के सामने रख दिया ओर पूजा-पाठ करके बजाने लगा.
लग्या फूंक पे फूंक मारण, अब अगर वो शंख होता तो बजता. बेचारे पंडित के तो फूंक मार मार के पसीने छूट गये.
उठाया शंख ओर पहुंच गया ताऊ के घर. बोला "रे ताऊ! यो कैसा शंख ले आया, यो सुसरा तो बजता ही कोणी, फूंक मारते-मारते मेरे तो फेफडे दुखण लाग गे"
ताऊ बोल्या " सब टाईम-टाईम की बात है पंडित जी, जब ईसका टैम था ना,तो गांव को सारी सारी रात सोण ना देवे था, अब इस मैं वो बात नही रही,ईब तो इसने कपडे मे लपेट कै ही रक्ख ल्यो"
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
ये वक्त नही है रोने का.
ये वक्त नही है रोने का
ये वक्त है 'एक' होने का
मुम्बई हमले में विदेशी हाथ: प्रधानमंत्री
हमारा देश राजनीतिक ईच्छाशक्ति मे सचमुच नपुंसक ही साबित हुआ है.अरे अमेरिका से ही कुछ सीख लो 9/11 के बाद उनके देश में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ क्यों की उन्होने आतंकवादियों के आकाओं तक को सबक सीखा दिया. आप से तो एक अफ़ज़ल गुरु को फाँसी नहीं दी जाती तो ठोस क़दम क्या उठाओगे. भगवान के लिए वोटों की राजनीति बंद किजिए और देश के बारे मे कुछ सोचिए. देश ही नहीं रहेगा तो राज़ किस पे करोगे.अब जाने से पहले एक बार तो अपनी दृढ़ ईच्छाशक्ति का परिचय देते जाईये, ताकि हम भी फक्ख्र से कह सके कि हमारी रीढ मे पानी अभी बाकी है
पाटिल ने 2 वर्ष पूर्व दी थी चेतावनी :समाचार
...तो हमारे ग्रहमंत्री जी तो भविष्यवक्ता भी हैं ? यदि यह बात इनको दो साल से मालूम थी तो इन्होने क्या क़दम उठाए? इसका ठीकरा भी हिंदू दलों पर फोड़ दो, सब कुछ जानते हुए भी ग्रहमंत्री द्वारा कोई क़दम नही उठाया जाना क्या साबित करता है? कुछ करो केंद्र सरकार, नही तो देश की जनता तुम्हे कभी माफ़ नही करेगी.
प्रेरणा :- रामपुरिया का हरियाण्वी ताऊनामा
ये वक्त है 'एक' होने का
मुम्बई हमले में विदेशी हाथ: प्रधानमंत्री
हमारा देश राजनीतिक ईच्छाशक्ति मे सचमुच नपुंसक ही साबित हुआ है.अरे अमेरिका से ही कुछ सीख लो 9/11 के बाद उनके देश में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ क्यों की उन्होने आतंकवादियों के आकाओं तक को सबक सीखा दिया. आप से तो एक अफ़ज़ल गुरु को फाँसी नहीं दी जाती तो ठोस क़दम क्या उठाओगे. भगवान के लिए वोटों की राजनीति बंद किजिए और देश के बारे मे कुछ सोचिए. देश ही नहीं रहेगा तो राज़ किस पे करोगे.अब जाने से पहले एक बार तो अपनी दृढ़ ईच्छाशक्ति का परिचय देते जाईये, ताकि हम भी फक्ख्र से कह सके कि हमारी रीढ मे पानी अभी बाकी है
पाटिल ने 2 वर्ष पूर्व दी थी चेतावनी :समाचार
...तो हमारे ग्रहमंत्री जी तो भविष्यवक्ता भी हैं ? यदि यह बात इनको दो साल से मालूम थी तो इन्होने क्या क़दम उठाए? इसका ठीकरा भी हिंदू दलों पर फोड़ दो, सब कुछ जानते हुए भी ग्रहमंत्री द्वारा कोई क़दम नही उठाया जाना क्या साबित करता है? कुछ करो केंद्र सरकार, नही तो देश की जनता तुम्हे कभी माफ़ नही करेगी.
प्रेरणा :- रामपुरिया का हरियाण्वी ताऊनामा
रविवार, 23 नवंबर 2008
ईमानदारी का ईनाम
एक बड़े व्यापारिक संस्थान की शाखा का कार्यालय पास ही के उपनगर में था जहां कार्यालय में एक कर्मचारी ओटो रिक्शा से आता था। उसे दैनिक भत्ते के सिवाय ओटो का भाड़ा भी दिया जाता था। भाड़ा चालीस रूपए के आस-पास बनता था। मगर कर्मचारियों ने परस्पर तय कर लिया था। जो भी आये जाये वह खर्च का सौ रूपये का ही वाउचर बनाएगा। बाकी बचा रूपया अपनी जेब के हवाले कर देगा। इसमें वाउचर मंजूर करने वाले अधिकारी का भी प्रतिशत बंधा था। कर्मचारी और अधिकारी की सांठ-गांठ थी।ये समझो कि दसों उंगलियॉं घी में और सिर कढ़ाई में था.
हर तीन माह बाद यह डयूटी बदलती रहती थी। थोडे दिनों बाद एक निकम्मे (ईमानदार) कर्मचारी की डयूटी लगी तो उसने चालीस रूपए खर्च का वाउचर बनाया।
निचले वर्ग के अधिकारी ने कहा कि वाउचर तो सौ रूपए का बनता था है। क्या तुम इतना भी नहीं जानते?
सर! मैंने तो ओटो का भाड़ा चालीस रूपए ही दिया है। मैं अधिक भाड़ा कैसे ले सकता हूं? अधिकारी के बार-बार समझाने पर भी वह अपनी बात पर अडिग रहा। अनीति का धन लेना यानी कंपनी के साथ धोखा। बचपन में मां ने नीति का ही पाठ पढ़ाया था। अधिकारी उससे ज्यादा न उलझा।
उसने प्रतिष्ठान के बड़े अफसर से मुलाकात करनी चाही। अपने केबिन से बाहर निकल ही रहा था कि द्वार पर खडे दो-चार कर्मचारियों ने कहा, 'क्यों, यार, हमारे पेट पर लात मारते हो?' वाउचर सौ रूपए का बनाते तो तुम्हारा क्या घिस जाता? मगर उसने सुनी अनसुनी कर दी। सीधा बड़े साहब के केबिन में गया। सारी घटना कह सुनाई। बड़े साहब ने तो उसकी ईमानदारी की भूरि भूरि प्रशंसा की।
उसी शाम को चपरासी द्वारा पीले रंग का लिफाफा मिला। उसमें लिखा था। प्रतिष्ठान को आपकी जरूरत नहीं है। और वो बेचारा हाथ मे लिफाफा पकडे माँ (को)के बताए नीति वचनो को कोसने लगा.
हर तीन माह बाद यह डयूटी बदलती रहती थी। थोडे दिनों बाद एक निकम्मे (ईमानदार) कर्मचारी की डयूटी लगी तो उसने चालीस रूपए खर्च का वाउचर बनाया।
निचले वर्ग के अधिकारी ने कहा कि वाउचर तो सौ रूपए का बनता था है। क्या तुम इतना भी नहीं जानते?
सर! मैंने तो ओटो का भाड़ा चालीस रूपए ही दिया है। मैं अधिक भाड़ा कैसे ले सकता हूं? अधिकारी के बार-बार समझाने पर भी वह अपनी बात पर अडिग रहा। अनीति का धन लेना यानी कंपनी के साथ धोखा। बचपन में मां ने नीति का ही पाठ पढ़ाया था। अधिकारी उससे ज्यादा न उलझा।
उसने प्रतिष्ठान के बड़े अफसर से मुलाकात करनी चाही। अपने केबिन से बाहर निकल ही रहा था कि द्वार पर खडे दो-चार कर्मचारियों ने कहा, 'क्यों, यार, हमारे पेट पर लात मारते हो?' वाउचर सौ रूपए का बनाते तो तुम्हारा क्या घिस जाता? मगर उसने सुनी अनसुनी कर दी। सीधा बड़े साहब के केबिन में गया। सारी घटना कह सुनाई। बड़े साहब ने तो उसकी ईमानदारी की भूरि भूरि प्रशंसा की।
उसी शाम को चपरासी द्वारा पीले रंग का लिफाफा मिला। उसमें लिखा था। प्रतिष्ठान को आपकी जरूरत नहीं है। और वो बेचारा हाथ मे लिफाफा पकडे माँ (को)के बताए नीति वचनो को कोसने लगा.
आखिर ये भूख कब मिटेगी (आईये थोडा चिन्तन करें)
ज्यादा पुराना किस्सा नही है, यही कोई दो साल की बात है ,मुझे अपने परिचित मित्र के विवाह पर आयोजित आशीर्वाद समारोह पर भोज का निमंत्रण मिला था। समय तो 9 बजे अंकित था पर मै घर से ही घंटे- डेढ़ घंटे बाद समारोह स्थल के लिए रवाना हुआ.
विद्युत का जगमगाता प्रकाश दूर से ही आकर्षित कर रहा था। प्रवेश द्वार पर चूनड़ी का साफा बांधे, बंद गले का जोधपुरी कोट पहने एक सज्जन खड़े थे। उनके पास ही खडी थी, आभूषणों में सजी धजी महिला, शायद उनकी पत्नी। जो भी आ रहा था, वह उन्हें आशीर्वाद का लिफाफा देकर भीतर प्रवेश कर रहा था। लिफाफों से उनके कोट की दोनों जेबें लबालब भरी थीं।
मैने उन्हें ही अपने मित्र का पिता समझ, अपना आशीर्वाद का लिफाफा दे दिया। लम्बी नाल से गलियारे में बिछे कालीन को जूतों से खटाखट से दबाते जैसे ही भीतर पहूंचा, मंच पर दोनों आसन खाली दिखे। सामने कुसिर्यों पर अवश्य महिलाऐं जमीं थीं। कुछ दूर आगे बगल में भोजन पर भीड़ टूटी पड़ी थी।
मुझे वहां से यथा शीघ्र निपटकर दूसरी जगह आवश्यक रूप से पहुंचना था। इसलिए मैने सीधे पहुंच भोजन किया और बाहर आ जैसे ही गाड़ी स्टार्ट की, मेरे कानों में आवाज आई, बारात आ गई - बारात आ गई। मै सोच में पड़ गया। क्या वे मित्र के पिता नहीं थे? क्या वधू पक्ष के भोजन को ही उन्होंने अपना स्वरूचि भोज मान मित्रों को वहीं आमंत्रित किया है।
मेरे माथे पर बल् पड़ गये। सोचने लगा कि कब तक होता रहेगा वधू पक्ष का इस तरह शोषण। पढ़ी लिखी लड़की देकर भी इस पुरूष- प्रधान समाज में लड़की का पिता कब तक छला जाता रहेगा। मित्र ने अपना भार दूसरे के कंधे पर डाल दिया। कैसा जमाना आ गया है। यह कहते-कहते मैने अपना माथा ठोक लिया। एक बार तो सोचा कि लौट चलूं और मित्र को इस सबके लिए उलाहना भी दूं। लेकिन द्वार पर खडा वह लड़की का पिता समझेगा कि दुबारा खाने के लिए आ गया। इसी उहापोह में मेरी गाड़ी गंतव्य की ओर बढ़ती रही। मै सोचता रहा कि, क्या कन्या भ्रूण-हत्या इसीलिए होती है? क्या इसीलिए युवा लड़किया आत्महत्या कर लेती हैं? क्या इसीलिये विधवाए अपनी बच्चियों को लेकर कुओं में कूद जीवित समाधि ले लेती हैं? कब रूकेगी लड़के वालों की यह भूख? कब मिलेगा लड़कियों को उचित सम्मान?
गाड़ी गंतव्य पर पहुंच चुकी थी। फाटक लगाते हुए मैने यह सोच कर् संतोष की सांस ली कि जिसे आशीर्वाद चाहिये था, उसे ही मैने आशीर्वाद दिया है.
बताईए आप क्या सोचते हैं ?
विद्युत का जगमगाता प्रकाश दूर से ही आकर्षित कर रहा था। प्रवेश द्वार पर चूनड़ी का साफा बांधे, बंद गले का जोधपुरी कोट पहने एक सज्जन खड़े थे। उनके पास ही खडी थी, आभूषणों में सजी धजी महिला, शायद उनकी पत्नी। जो भी आ रहा था, वह उन्हें आशीर्वाद का लिफाफा देकर भीतर प्रवेश कर रहा था। लिफाफों से उनके कोट की दोनों जेबें लबालब भरी थीं।
मैने उन्हें ही अपने मित्र का पिता समझ, अपना आशीर्वाद का लिफाफा दे दिया। लम्बी नाल से गलियारे में बिछे कालीन को जूतों से खटाखट से दबाते जैसे ही भीतर पहूंचा, मंच पर दोनों आसन खाली दिखे। सामने कुसिर्यों पर अवश्य महिलाऐं जमीं थीं। कुछ दूर आगे बगल में भोजन पर भीड़ टूटी पड़ी थी।
मुझे वहां से यथा शीघ्र निपटकर दूसरी जगह आवश्यक रूप से पहुंचना था। इसलिए मैने सीधे पहुंच भोजन किया और बाहर आ जैसे ही गाड़ी स्टार्ट की, मेरे कानों में आवाज आई, बारात आ गई - बारात आ गई। मै सोच में पड़ गया। क्या वे मित्र के पिता नहीं थे? क्या वधू पक्ष के भोजन को ही उन्होंने अपना स्वरूचि भोज मान मित्रों को वहीं आमंत्रित किया है।
मेरे माथे पर बल् पड़ गये। सोचने लगा कि कब तक होता रहेगा वधू पक्ष का इस तरह शोषण। पढ़ी लिखी लड़की देकर भी इस पुरूष- प्रधान समाज में लड़की का पिता कब तक छला जाता रहेगा। मित्र ने अपना भार दूसरे के कंधे पर डाल दिया। कैसा जमाना आ गया है। यह कहते-कहते मैने अपना माथा ठोक लिया। एक बार तो सोचा कि लौट चलूं और मित्र को इस सबके लिए उलाहना भी दूं। लेकिन द्वार पर खडा वह लड़की का पिता समझेगा कि दुबारा खाने के लिए आ गया। इसी उहापोह में मेरी गाड़ी गंतव्य की ओर बढ़ती रही। मै सोचता रहा कि, क्या कन्या भ्रूण-हत्या इसीलिए होती है? क्या इसीलिए युवा लड़किया आत्महत्या कर लेती हैं? क्या इसीलिये विधवाए अपनी बच्चियों को लेकर कुओं में कूद जीवित समाधि ले लेती हैं? कब रूकेगी लड़के वालों की यह भूख? कब मिलेगा लड़कियों को उचित सम्मान?
गाड़ी गंतव्य पर पहुंच चुकी थी। फाटक लगाते हुए मैने यह सोच कर् संतोष की सांस ली कि जिसे आशीर्वाद चाहिये था, उसे ही मैने आशीर्वाद दिया है.
बताईए आप क्या सोचते हैं ?
शनिवार, 22 नवंबर 2008
हरियाणे का जुगाड़ू जाट
भाई जाट जुगाड़ी आदमी हो सै. किते न किते तै सारी बातां का जुगाड़ कर लिया करै .
एक बै एक जाट और एक बामण का छोरा एक एक ऊंट ले के जंगल में घुमण जा रे थे.
रस्ते मैं जाट के छोरे के ऊंट की नकेल टूट गी. ऊंट उसनै तंग करण लाग गया.
वो बामण के छोरे तै बोल्या भाई यो जो तनै गात(शरीर)कै तागा (जनेऊ ) बांद रख्या सै, यो मने दे दे.
यो ऊंट मनै दुखी कर रहा सै .
बामण का बोलूया- न भाई यो जनेऊ तै हमारा धरम सै, में ना दू .
वो दुखी सुखी हो कै, रोन्दे-कल्पदे घरां आगे .
आते ही जाट का छोरा आपने बापू तै बोल्या — बापू आज जंगल मै इस बामण के ने मेरी गल्या इसा काम करया . एक तागा माँग्या था वो भी न दिया . आगे इन तै वयवहार कोन्या राखना.यो तो बड़े मतलबी सैं .
उसका बापू बोल्या — अरे इसका बापू भी इसा ऐ था . तेरी बैहन के ब्याह आले दिन तेरी बैहन् होगी बिमार्
तै मने बामण ताहि न्यू कही, के भाई एक बै तू फेरयां के उपर आपनी छोरी नै बिठा दे एक घंटे खातर.
ड़ौली गेलै घाल तै मैं आपनी छोरी ने दयुन्गा , पर भाई यो बामण मान्या ही कोनी .
छोरा बोल्या — फेर के हुआ बापु .
बापु बोल्या - अरे होना के था फेर एक घंटे खातर तेरी माँ फेरया पै बठयाणी पड़ी
एक बै एक जाट और एक बामण का छोरा एक एक ऊंट ले के जंगल में घुमण जा रे थे.
रस्ते मैं जाट के छोरे के ऊंट की नकेल टूट गी. ऊंट उसनै तंग करण लाग गया.
वो बामण के छोरे तै बोल्या भाई यो जो तनै गात(शरीर)कै तागा (जनेऊ ) बांद रख्या सै, यो मने दे दे.
यो ऊंट मनै दुखी कर रहा सै .
बामण का बोलूया- न भाई यो जनेऊ तै हमारा धरम सै, में ना दू .
वो दुखी सुखी हो कै, रोन्दे-कल्पदे घरां आगे .
आते ही जाट का छोरा आपने बापू तै बोल्या — बापू आज जंगल मै इस बामण के ने मेरी गल्या इसा काम करया . एक तागा माँग्या था वो भी न दिया . आगे इन तै वयवहार कोन्या राखना.यो तो बड़े मतलबी सैं .
उसका बापू बोल्या — अरे इसका बापू भी इसा ऐ था . तेरी बैहन के ब्याह आले दिन तेरी बैहन् होगी बिमार्
तै मने बामण ताहि न्यू कही, के भाई एक बै तू फेरयां के उपर आपनी छोरी नै बिठा दे एक घंटे खातर.
ड़ौली गेलै घाल तै मैं आपनी छोरी ने दयुन्गा , पर भाई यो बामण मान्या ही कोनी .
छोरा बोल्या — फेर के हुआ बापु .
बापु बोल्या - अरे होना के था फेर एक घंटे खातर तेरी माँ फेरया पै बठयाणी पड़ी
बुधवार, 19 नवंबर 2008
राशन कार्ड़ छोटा होता चला गया (व्यग्यं)
मेरी टेबिल पर दो कार्ड पड़े हैं- इसी डाक से आया दिवाली ग्रीटिंग कार्ड और दुकान से लौटा राशन कार्ड. ग्रीटिंग कार्ड में किसी ने शुभेच्छा प्रगट की है कि मैं सुख और समृद्धि प्राप्त करूँ. अभी अपने शुभचिन्तक बने हुए हैं जो सुख दिए बिना चैन नहीं लेंगे. दिवाली पर कम से कम उन्हें याद तो आती है कि इस आदमी का सुखी होना अभी बकाया है. वे कार्ड भेज देते हैं कि हम तो सुखी हैं ही, अगर तुम भी हो जाओ, तो हमें फिलहाल कोई एतराज़ नहीं. मेरा राशन कार्ड मेरे सुख की कामना कर रहा है. मगर राशन कार्ड बताता है कि इस हफ़्ते से गेहूँ की मात्रा आधी हो गयी है. राशन कार्ड मे ग्रीटिंग कार्ड को काट दिया. ऐसा तमाचा मारा कि खूबसूरत ग्रीटिंग कार्डजी के कोमल कपोल रक्तिम हो गए.शुरु से ही राशन कार्ड इस ग्रीटिंग कार्ड की ओर गुर्राकर देख रहा था. जैसे ही मैं ग्रीटिंग कार्ड पढ़कर खुश हुआ, राशन कार्ड ने उसकी गर्दन दबाकर कहा- क्यों बे साले, ग्रीटिंग कार्ड के बच्चे, तू इस आदमी को सुखी करना चाहता है? जा, इसका गेहूँ आधा कर दिया गया. बाकी काला-बाज़ार से खरीदे या भूखा रहे. बेचारा ग्रीटिंग कार्ड दीनता से मेरी ओर देख रहा है. मैं क्या करूँ? झूठों की रक्षा का ठेका मुझे थोड़े ही मिला है. जिन्हें मिला है उनके सामने हाथ जोड़ो. मेरे राशन कार्ड को तेरी झूठ बर्दाश्त नहीं हुई. इन हालात में सुख का झूठी आशा लेकर तू क्यों आया? ग्रीटिंग कार्ड राष्ट्रसंघ के शान्ति प्रस्तावों की तरह सुन्दर पर प्रभावहीन है. राशन कार्ड खुरदरा और बदसूरत है, पर इसमें अनाज है. मेरे लिए यही सत्य है. और इस रंगीन चिकनाहट में सत्यहीन औपचारिक शुभेच्छा है. ग्रीटिंग कार्ड सत्य होता अगर इसके साथ एक राशन कार्ड भी भेजा गया होता और लिखा होता- हम चाहते हैं कि तुम सुख प्राप्त करो. इस हेतु हम एक मरे हुए आदमी के नाम से जाली राशन कार्ड बनवाकर भेज रहे हैं. जब तक धाँधली चले सस्ता अनाज लेते जाना और सुखी रहना. पकड़े जाने पर हमारा नाम मत बताना. संकट के वक्त शुभचिंतक का नाम भूल जाना चाहिए. मित्रों से तो मैं कहना चाहता हूँ कि ये कार्ड ने भेजें. शुभकामना इस देश में कारगर नहीं हो रही हैं. यहाँ राम-जन्मभूमी, गोरक्षा का जुलूस सात लाख का होता है और मनुष्य रक्षा का सिर्फ एक लाख का. दुनिया भर में शुभकामना बोझ हो गयी है. पोप की शुभकामना से एक बम कम नहीं गिरता. मित्रों की ही इच्छा से कोई सफल, सुखी और समृद्ध कैसे हो जाएगा? सफलता के महल का प्रवेश द्वार बंद है. इसमें पीछे के नाबदान से ही घुसा जा सकता है. जिन्हें घुसना है नाक पर रुमाल रखकर घुस जाते हैं. पास ही इत्र सने रुमालों के ठेले खड़े हैं. रुमाल खरीदो, नाक पर रखो और नाबदान(गंदीजगह) में से घुस जाओ सफलता और सुख के महल में. एक आदमी खड़ा देख रहा है. कोई पूछता है- घुसते क्यों नहीं? वह कहता है- एक नाक होती तो घुस जाते. हमारा तो हर रोम एक नाक है. कहाँ-कहाँ रुमाल लपेटें. एक डर भी है. सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त भी हो जाए, तो पता नहीं कितने लोग बुरा मान जाएँ. संकट में तो शत्रु भी मदद कर देते हैं. मित्रता की सच्ची परीक्षा संकट में नहीं, उत्कर्ष में होती है. जो मित्र के उत्कर्ष को बर्दाश्त कर सके, वही सच्चा मित्र होता है. संकट में तपी हुई मित्रता उत्कर्ष में खोटी निकलती मैंने देखी है. एक बेचारे की चार कविताएँ छप गईं, तो चार मित्र टूट गए. आठ छपने पर पूरे आठ टूट गये. दो कवि सम्मेलनों में जमने से एक स्थानीय कवि के कवि-मित्र रूठ गए. तीसरे कवि सम्मेलन में जब वह ‘हूट’ हुआ, तब जाकर मित्रता अपनी जगह लौटी. ग्रीटिंग कार्डों पर अपना भरोसा नहीं.पिछले 58 सालों से इस देश को ग्रीटिंग कार्डों के सहारे हि चलाया गया है. अम्बार लग गए हैं. हर त्योहार पर देशवासियों को ग्रीटिंग कार्ड दिए जाते हैं- 15 अगस्त और 26 जनवरी पर, संसद के अधिवेशन पर, पार्टी के सम्मेलन पर. बढ़िया सुनहले रंगों के मीठे शब्दों के ग्रीटिंग्स- देशवासियों, बस इस साल तुम सुखी और समृद्ध हो जाओ. ग्रीटिंग कार्डों के ढेर लगे हैं, मगर राशन कार्ड छोटा होता जाता है
अब आप हि बताऐं कि इसमें कितनी सच्चाई है....
(श्री हरिशंकर परसाई जी)
अब आप हि बताऐं कि इसमें कितनी सच्चाई है....
(श्री हरिशंकर परसाई जी)
सोमवार, 17 नवंबर 2008
परनिंदा से बड़ा कोई सुख नहीं ( परनिंदा परम सुखदायक )
निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है। निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं। निंदा पायरिया का तो शर्तिया इलाज है। संतों को परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वे स्वनिंदा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं। ‘मौसम कौन कुटिल खल कामी’- यह संत की विनय और आत्मग्लानि नहीं है, टॉनिक है। संत बड़ा कांइया होता है। हम समझते हैं, वह आत्मस्वीकृति कर रहा है, पर वास्तव में वह विटामिन और प्रोटीन खा रहा है। स्वास्थ्य विज्ञान की एक मूल स्थापना तो मैंने कर दी। अब डॉक्टरों का कुल इतना काम बचा कि वे शोध करें कि किस तरह की निंदा में कौन से और कितने विटामिन होते हैं, कितना प्रोटीन होता है। मेरा अंदाज है, स्त्री संबंधी निंदा में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है और शराब संबंधी निंदा में विटामिन बहुत होते हैं। मेरे सामने जो स्वस्थ सज्जन बैठे थे, वे कह रहे थे- आपको मालूम है, वह आदमी शराब पीता है?
मैंने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फिर कहा- वह शराब पीता है। निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है। वे तीन बार बात कह चुके और मैं चुप रहा, तीन जूते उन्हें लग गए। अब मुझे दया आ गई। उनका चेहरा उतर गया था। मैंने कहा- पीने दो। वे चकित हुए। बोले पीने दो, आप कहते हैं पीने दो?मैंने कहा- हां, हम लोग न उसके बाप हैं, न शुभचिंतक। उसके पीने से अपना कोई नुकसान भी नहीं है। उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे उस बात को फिर-फिर रेतते रहे। तब मैंने लगातार उनसे कुछ सवाल कर डाले- आप चावल ज्यादा खाते हैं या रोटी? किस करवट सोते हैं? जूते में पहले दाहिना पांव डालते हैं या बायां? स्त्री के साथ रोज संभोग करते हैं या कुछ अंतर देकर?
अब वे ‘हीं-हीं’ पर उतर आए। कहने लगे- ये तो प्राईवेट बातें हैं, इनसे क्या मतलब। मैंने कहा- वह क्या खाता-पीता है, यह उसकी प्राईवेट बात है। मगर इससे आपको जरूर मतलब है। किसी दिन आप उसके रसोईघर में घुसकर पता लगा लेंगे कि कौन-सी दाल बनी है और सड़क पर खड़े होकर चिल्लाएंगे- वह बड़ा दुराचारी है। वह उड़द की दाल खाता है। तनाव आ गया। मैं पोलाइट हो गया- छोड़ो यार, इस बात को। वेद में सोमरस की स्तुति में 60-62 मंत्र हैं। सोमरस को पिता और ईश्वर तक कहा गया है। कहते हैं- तुमने मुझे अमर बना दिया। यहां तक कहा है कि अब मैं पृथ्वी को अपनी हथेलियों में लेकर मसल सकता हूं।(ऋषि को ज्यादा चढ़ गई होगी।) चेतन को दबाकर राहत पाने या चेतना का विस्तार करने के लिए सब जातियों के ऋषि किसी मादक द्रव्य का उपयोग करते थे।
चेतना का विस्तार। हां, कई की चेतना का विस्तार देख चुका हूं। एक संपन्न सज्जन की चेतना का इतना विस्तार हो जाता है कि वे रिक्शेवाले को रास्ते में पान खिलाते हैं, सिगरेट पिलाते हैं, और फिर दुगने पैसे देते हैं। पीने के बाद वे ‘सुसंस्कृत, सभ्य, सदाचारी,मानवीय इत्यादि -इत्यादि" पता नहीं क्या कुछ हो जाते हैं। कभी-कभी रिक्शेवाले को बिठाकर खुद रिक्शा चलाने लगते हैं। वे यों भी भले आदमी हैं। पर कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते। मानवीयता उन पर जगाधरी नंबर 1 देसी दारु के "सुरुर"की तरह चढ़ती-उतरती है।
मैंने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फिर कहा- वह शराब पीता है। निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है। वे तीन बार बात कह चुके और मैं चुप रहा, तीन जूते उन्हें लग गए। अब मुझे दया आ गई। उनका चेहरा उतर गया था। मैंने कहा- पीने दो। वे चकित हुए। बोले पीने दो, आप कहते हैं पीने दो?मैंने कहा- हां, हम लोग न उसके बाप हैं, न शुभचिंतक। उसके पीने से अपना कोई नुकसान भी नहीं है। उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे उस बात को फिर-फिर रेतते रहे। तब मैंने लगातार उनसे कुछ सवाल कर डाले- आप चावल ज्यादा खाते हैं या रोटी? किस करवट सोते हैं? जूते में पहले दाहिना पांव डालते हैं या बायां? स्त्री के साथ रोज संभोग करते हैं या कुछ अंतर देकर?
अब वे ‘हीं-हीं’ पर उतर आए। कहने लगे- ये तो प्राईवेट बातें हैं, इनसे क्या मतलब। मैंने कहा- वह क्या खाता-पीता है, यह उसकी प्राईवेट बात है। मगर इससे आपको जरूर मतलब है। किसी दिन आप उसके रसोईघर में घुसकर पता लगा लेंगे कि कौन-सी दाल बनी है और सड़क पर खड़े होकर चिल्लाएंगे- वह बड़ा दुराचारी है। वह उड़द की दाल खाता है। तनाव आ गया। मैं पोलाइट हो गया- छोड़ो यार, इस बात को। वेद में सोमरस की स्तुति में 60-62 मंत्र हैं। सोमरस को पिता और ईश्वर तक कहा गया है। कहते हैं- तुमने मुझे अमर बना दिया। यहां तक कहा है कि अब मैं पृथ्वी को अपनी हथेलियों में लेकर मसल सकता हूं।(ऋषि को ज्यादा चढ़ गई होगी।) चेतन को दबाकर राहत पाने या चेतना का विस्तार करने के लिए सब जातियों के ऋषि किसी मादक द्रव्य का उपयोग करते थे।
चेतना का विस्तार। हां, कई की चेतना का विस्तार देख चुका हूं। एक संपन्न सज्जन की चेतना का इतना विस्तार हो जाता है कि वे रिक्शेवाले को रास्ते में पान खिलाते हैं, सिगरेट पिलाते हैं, और फिर दुगने पैसे देते हैं। पीने के बाद वे ‘सुसंस्कृत, सभ्य, सदाचारी,मानवीय इत्यादि -इत्यादि" पता नहीं क्या कुछ हो जाते हैं। कभी-कभी रिक्शेवाले को बिठाकर खुद रिक्शा चलाने लगते हैं। वे यों भी भले आदमी हैं। पर कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते। मानवीयता उन पर जगाधरी नंबर 1 देसी दारु के "सुरुर"की तरह चढ़ती-उतरती है।
एक और चेतना का विस्तार मैंने देखा था। एक शाम ज्ञान पाण्डेय के घर हम लोग बैठे थे(मानसिक हलचल वाले ज्ञान पाण्डेय नहीं।) वे तो दुग्धपान करते हैं . यह रोडवेज के अपने कवि ज्ञान पाण्डेयहैं। उनके एक सहयोगी की चेतना का विस्तार कुल डेढ़ पेग में हो गया और वे अंग्रेजी बोलने लगे। कबीर ने कहा है- ‘मन मस्त हुआ तब क्यों बोले’। यह क्यों नहीं कहा कि मन मस्त हुआ तब अंग्रेजी बोले। नीचे होटल से खाना उन्हीं को खाना था। हमने कहा- अब इन्हें मत भेजो। ये अंग्रेजी बोलने लगे। पर उनकी चेतना का विस्तार जरा ज्यादा ही हो गया था। कहने कहने लगे- नो सर, नो सर, आई शैल ब्रिंग ब्यूटीफुल मुर्गा। ‘अंग्रेजी’ भाषा का कमाल देखिए। थोड़ी ही पढ़ी है, मगर खाने की चीज को खूबसूरत कह रहे हैं। जो भी खूबसूरत दिखा, उसे खा गए। यह भाषा रूप में भी स्वाद देखती है। रूप देखकर उल्लास नहीं होता, जीभ में पानी आने लगता है। ऐसी भाषा साम्राज्यवाद के बड़े काम की होती है। कहा- इंडिया इज ए ब्यूटीफुल कंट्री। और छुरी-कांटे से इंडिया को खाने लगे। जब आधा खा चुके, तब देशी खाने वालों ने कहा, अगर इंडिया इतना खूबसूरत है, तो बाकी हमें खा लेने दो। तुमने ‘इंडिया’ खा लिया। बाकी बचा ‘भारत’ हमें खाने दो। अंग्रेज ने कहा- अच्छा, हमें दस्त लगने लगे हैं। हम तो जाते हैं। तुम खाते रहना। यह बातचीत 1947 में हुई थी। हम लोगों ने कहा- अहिंसक क्रांति हो गई। बाहर वालों ने कहा- यह ट्रांसफर ऑफ पॉवर है- सत्ता का हस्तांतरण। मगर सच पूछो तो यह ‘ट्रांसफर ऑफ डिश’ हुआ- थाली उनके सामने से इनके सामने आ गई। वे देश को पश्चिमी सभ्यता के सलाद के साथ खाते थे। ये लोकतंत्र के अचार के साथ खाते हैं।
ये ससुरी राजनीति फिर बीच में गई। छोडि़ए जनाब । बात शराब की हो रही थी। इस संबंध में जो शिक्षाप्रद बातें ऊपर कहीं हैं, उन पर कोई अमल करेगा, तो अपनी ‘रिस्क’ पर। नुकसान की जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी। मगर बात शराब की भी नहीं, उस पवित्र आदमी की हो रही थी, जो मेरे सामने बैठा किसी के दुराचार पर चिंतित था। मैं चिंतित नहीं था, इसलिए वह नाराज और दुखी था। मुझे शामिल किए बिना वह मानेगा नहीं। वह शराब से स्त्री पर आ गया- और वह जो है न, फलानी स्त्री से उसके अनैतिक संबंध हैं।
मैंने कहा- हां, यह बड़ी खराब बात है।
उसका चेहरा अब खिल गया। बोला- है न?
मैंने कहा- हां खराब बात यह है कि उस स्त्री से अपना संबंध नहीं है।
वह मुझसे बिल्कुल निराश हो गया। सोचता होगा, कैसा पत्थर आदमी है यह कि इतने ऊंचे दर्जे के ‘स्कैंडल’ में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा। वह उठ गया। और मैं सोचता रहा कि लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिए बनवाते हैं, मगर वास्तव में खिड़की अंदर झांकने के लिए होती है। कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की इच्छा मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं। आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलता होगा और वह पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका संबंध किससे चल रहा है। किसी स्त्री और पुरुष के संबंध में जो बात अखरती है, वह अनैतिकता नहीं है, बल्कि यह है कि हाय उसकी जगह हम नहीं हुए। ऐसे लोग मुझे चुंगी के दरोगा मालूम होते हैं। हर आते-जाते ठेले को रोककर झांककर पूछते हैं- तेरे भीतर क्या छिपा है?
एक स्त्री के पिता के पास हितकारी लोग जाकर सलाह देते हैं- उस आदमी को घर में मत आने दिया करिए। वह चरित्रहीन है। वे बेचारे वास्तव में शिकायत करते हैं कि पिताजी, आपकी बेटी हमें ‘चरित्रहीन’ होने का चांस नहीं दे रही है। उसे डांटिए न कि हमें भी थोड़ा चरित्रहीन हो लेने दे। जिस आदमी की स्त्री-संबंधी कलंक कथा वह कह रहा था, वह भला आदमी है- ईमानदार, सच्चा, दयालु, त्यागी। वह धोखा नहीं करता, कालाबाजारी नहीं करता, किसी को ठगता नहीं है, घूस नहीं खाता, किसी का बुरा नहीं करता। एक स्त्री से उसकी मित्रता है। इससे वह आदमी बुरा और अनैतिक हो गया। बड़ा सरल हिसाब है अपने यहां आदमी के बारे में निर्णय लेने का। कभी सवाल उठा होगा समाज के नीतिवानों के बीच के नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदमी का निर्णय कैसे किया जाए। वे परेशान होंगे। बहुत सी बातों पर आदमी के बारे में विचार करना पड़ता है, तब निर्णय होता है। तब उन्होंने कहा होगा- ज्यादा झंझट में मत पड़ो। मामला सरल कर लो। सारी नैतिकता को समेटकर टांगों के बीच में रख लो।
(उधार की पोस्ट )
ये ससुरी राजनीति फिर बीच में गई। छोडि़ए जनाब । बात शराब की हो रही थी। इस संबंध में जो शिक्षाप्रद बातें ऊपर कहीं हैं, उन पर कोई अमल करेगा, तो अपनी ‘रिस्क’ पर। नुकसान की जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी। मगर बात शराब की भी नहीं, उस पवित्र आदमी की हो रही थी, जो मेरे सामने बैठा किसी के दुराचार पर चिंतित था। मैं चिंतित नहीं था, इसलिए वह नाराज और दुखी था। मुझे शामिल किए बिना वह मानेगा नहीं। वह शराब से स्त्री पर आ गया- और वह जो है न, फलानी स्त्री से उसके अनैतिक संबंध हैं।
मैंने कहा- हां, यह बड़ी खराब बात है।
उसका चेहरा अब खिल गया। बोला- है न?
मैंने कहा- हां खराब बात यह है कि उस स्त्री से अपना संबंध नहीं है।
वह मुझसे बिल्कुल निराश हो गया। सोचता होगा, कैसा पत्थर आदमी है यह कि इतने ऊंचे दर्जे के ‘स्कैंडल’ में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा। वह उठ गया। और मैं सोचता रहा कि लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिए बनवाते हैं, मगर वास्तव में खिड़की अंदर झांकने के लिए होती है। कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की इच्छा मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं। आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलता होगा और वह पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका संबंध किससे चल रहा है। किसी स्त्री और पुरुष के संबंध में जो बात अखरती है, वह अनैतिकता नहीं है, बल्कि यह है कि हाय उसकी जगह हम नहीं हुए। ऐसे लोग मुझे चुंगी के दरोगा मालूम होते हैं। हर आते-जाते ठेले को रोककर झांककर पूछते हैं- तेरे भीतर क्या छिपा है?
एक स्त्री के पिता के पास हितकारी लोग जाकर सलाह देते हैं- उस आदमी को घर में मत आने दिया करिए। वह चरित्रहीन है। वे बेचारे वास्तव में शिकायत करते हैं कि पिताजी, आपकी बेटी हमें ‘चरित्रहीन’ होने का चांस नहीं दे रही है। उसे डांटिए न कि हमें भी थोड़ा चरित्रहीन हो लेने दे। जिस आदमी की स्त्री-संबंधी कलंक कथा वह कह रहा था, वह भला आदमी है- ईमानदार, सच्चा, दयालु, त्यागी। वह धोखा नहीं करता, कालाबाजारी नहीं करता, किसी को ठगता नहीं है, घूस नहीं खाता, किसी का बुरा नहीं करता। एक स्त्री से उसकी मित्रता है। इससे वह आदमी बुरा और अनैतिक हो गया। बड़ा सरल हिसाब है अपने यहां आदमी के बारे में निर्णय लेने का। कभी सवाल उठा होगा समाज के नीतिवानों के बीच के नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदमी का निर्णय कैसे किया जाए। वे परेशान होंगे। बहुत सी बातों पर आदमी के बारे में विचार करना पड़ता है, तब निर्णय होता है। तब उन्होंने कहा होगा- ज्यादा झंझट में मत पड़ो। मामला सरल कर लो। सारी नैतिकता को समेटकर टांगों के बीच में रख लो।
शनिवार, 15 नवंबर 2008
भोलाराम का जीव
ऐसा कभी नहीं हुआ था. धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान ‘अलॉट' करते आ रहे थे. पर ऐसा कभी नहीं हुआ था.सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे. गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी. आखिर उन्होंने खीझ कर रजिस्टर इतने जोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई. उसे निकालते हुए वे बोले - "महाराज, रिकार्ड सब ठीक है. भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा."
धर्मराज ने पूछा - "और वह दूत कहाँ है?" "महाराज, वह भी लापता है."
इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बदहवास वहाँ आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे - "अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?" यमदूत हाथ जोड़ कर बोला - "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया. आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया. पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम का देह त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की. नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्यों ही वह मेरी चंगुल से छूट कर न जाने कहाँ गायब हो गया. इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला." धर्मराज क्रोध से बोला - "मूर्ख ! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया." दूत ने सिर झुका कर कहा - "महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी. मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके. पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया." चित्रगुप्त ने कहा- "महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है. लोग दोस्तों को कुछ चीज़ भेजते हैं और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते हैं. होजरी के पार्सलों के मोजे रेलवे अफसर पहनते हैं. मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं. एक बात और हो रही है. राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं. कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद खराबी करने के लिए तो नहीं उड़ा दिया?" धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा - "तुम्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गई. भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?" इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए. धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले - "क्यों धर्मराज, कैसे चिन्तित बैठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?" धर्मराज ने कहा - "वह समस्या तो कब की हल हो गई. नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं. कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाईं. बड़े बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया. ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मजदूरों की हाजिरी भर कर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गए ही नहीं. इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं. वह समस्या तो हल हो गई, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गई है. भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई. उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया. इस ने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला. अगर ऐसा होने लगा, तो पाप पुण्य का भेद ही मिट जाएगा." नारद ने पूछा - "उस पर इनकमटैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो." चित्रगुप्त ने कहा - "इनकम होती तो टैक्स होता. भुखमरा था." नारद बोले - "मामला बड़ा दिलचस्प है. अच्छा मुझे उसका नाम पता तो बताओ. मैं पृथ्वी पर जाता हूँ." चित्रगुप्त ने रजिस्टर देख कर बताया - "भोलाराम नाम था उसका. झुमरीतलैया शहर के नरकपुरा मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था. उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की. उम्र लगभग साठ साल. सरकारी नौकर था. पाँच साल पहले रिटायर हो गया था. मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इस लिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था. इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया. आज पाँचवाँ दिन है. बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है तो उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को निकाल दिया होगा. इस लिए आप को परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा." मां-बेटी के सम्मिलित क्रन्दन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गए. द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगाई - "नारायण! नारायण!" लड़की ने देखकर कहा- "आगे जाओ महाराज." नारद ने कहा - "मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछ-ताछ करनी है. अपनी मां को जरा बाहर भेजो, बेटी!" भोलाराम की पत्नी बाहर आई. नारद ने कहा - "माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?" "क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी. पाँच साल हो गए, पेंशन पर बैठे. पर पेंशन अभी तक नहीं मिली. हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है. इन पाँच सालों में सब गहने बेच कर हम लोग खा गए. फिर बरतन बिके. अब कुछ नहीं बचा था. चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दी." नारद ने कहा - "क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी." "ऐसा तो मत कहो, महाराज ! उम्र तो बहुत थी. दो अढाई हज़ार रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं कर के गुजारा हो जाता. पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली." दुःख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं. वे अपने मुद्दे पर आए, "मां, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उन का विशेष प्रेम था, जिस में उन का जी लगा हो?" पत्नी बोली - "लगाव तो महाराज, बाल बच्चों से ही होता है." "नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है. मेरा मतलब है, किसी स्त्री..." स्त्री ने गुर्रा कर नारद की ओर देखा. बोली - "अब कुछ मत बको महाराज ! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो. जिंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा."नारद हँस कर बोले - "हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है. यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है. अच्छा, माता मैं चला."
स्त्री ने कहा - "महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं. कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उन की रुकी हुई पेंशन मिल जाए. इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए." नारद को दया आ गई थी. वे कहने लगे - "साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं. फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूंगा." वहाँ से चल कर नारद सरकारी दफ़्तर पहुँचे. वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं. उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला - "भोलाराम ने दरख्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी." नारद ने कहा - "भई, ये बहुत से ‘पेपर-वेट' तो रखे हैं. इन्हें क्यों नहीं रख दिया?" बाबू हँसा - "आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती. दरख्वास्तें ‘पेपरवेट' से नहीं दबतीं. खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए." नारद उस बाबू के पास गए. उस ने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पांचवे के पास. जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा - "महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए. अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा. आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए. उन्हें खुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा." नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे. बाहर चपरासी ऊँघ रहा था. इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं. बिना ‘विजिटिंग कार्ड' के आया देख साहब बड़े नाराज हुए. बोले - "इसे कोई मन्दिर वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?" नारद ने कहा - "कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है." "क्या काम है?" साहब ने रौब से पूछा. नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया. साहब बोले- "आप हैं बैरागी. दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते. असल में भोलाराम ने गलती की. भई, यह भी एक मन्दिर है. यहाँ भी दान पुण्य करना पड़ता है. आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं. भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं. उन पर वज़न रखिए." नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई. साहब बोले - "भई, सरकारी पैसे का मामला है. पेंशन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है. देर लग ही जाती है. बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है. जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है. हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर..." साहब रुके. नारद ने कहा - "मगर क्या?" साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "मगर वज़न चाहिए. आप समझे नहीं. जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है. मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है. यह मैं उसे दे दूंगा. साधु-सन्तों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं." नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराए. पर फिर संभल कर उन्होंने वीणा टेबिल पर रख कर कहा - "यह लीजिए. अब जरा जल्दी उसकी पेंशन ऑर्डर निकाल दीजिए." साहब ने प्रसन्न्ता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घण्टी बजाई. चपरासी हाजिर हुआ. साहब ने हुक्म दिया - बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ. थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख्वास्तों से भरी फ़ाइल ले कर आया. उसमें पेंशन के कागजात भी थे. साहब ने फ़ाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा - "क्या नाम बताया साधु जी आपने?" नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है. इसलिए जोर से बोले - "भोलाराम!" सहसा फ़ाइल में से आवाज आई - "कौन पुकार रहा है मुझे. पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?" नारद चौंके. पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए. बोले - "भोलाराम ! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?" "हाँ ! आवाज आई." नारद ने कहा - "मैं नारद हूँ. तुम्हें लेने आया हूँ. चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है." आवाज आई - "मुझे नहीं जाना. मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों पर अटका हूँ. यहीं मेरा मन लगा है. मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता."
( व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई जी)
धर्मराज ने पूछा - "और वह दूत कहाँ है?" "महाराज, वह भी लापता है."
इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बदहवास वहाँ आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे - "अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?" यमदूत हाथ जोड़ कर बोला - "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया. आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया. पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम का देह त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की. नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्यों ही वह मेरी चंगुल से छूट कर न जाने कहाँ गायब हो गया. इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला." धर्मराज क्रोध से बोला - "मूर्ख ! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया." दूत ने सिर झुका कर कहा - "महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी. मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके. पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया." चित्रगुप्त ने कहा- "महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है. लोग दोस्तों को कुछ चीज़ भेजते हैं और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते हैं. होजरी के पार्सलों के मोजे रेलवे अफसर पहनते हैं. मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं. एक बात और हो रही है. राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं. कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद खराबी करने के लिए तो नहीं उड़ा दिया?" धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा - "तुम्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गई. भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?" इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए. धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले - "क्यों धर्मराज, कैसे चिन्तित बैठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?" धर्मराज ने कहा - "वह समस्या तो कब की हल हो गई. नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं. कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाईं. बड़े बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया. ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मजदूरों की हाजिरी भर कर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गए ही नहीं. इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं. वह समस्या तो हल हो गई, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गई है. भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई. उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया. इस ने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला. अगर ऐसा होने लगा, तो पाप पुण्य का भेद ही मिट जाएगा." नारद ने पूछा - "उस पर इनकमटैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो." चित्रगुप्त ने कहा - "इनकम होती तो टैक्स होता. भुखमरा था." नारद बोले - "मामला बड़ा दिलचस्प है. अच्छा मुझे उसका नाम पता तो बताओ. मैं पृथ्वी पर जाता हूँ." चित्रगुप्त ने रजिस्टर देख कर बताया - "भोलाराम नाम था उसका. झुमरीतलैया शहर के नरकपुरा मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था. उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की. उम्र लगभग साठ साल. सरकारी नौकर था. पाँच साल पहले रिटायर हो गया था. मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इस लिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था. इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया. आज पाँचवाँ दिन है. बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है तो उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को निकाल दिया होगा. इस लिए आप को परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा." मां-बेटी के सम्मिलित क्रन्दन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गए. द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगाई - "नारायण! नारायण!" लड़की ने देखकर कहा- "आगे जाओ महाराज." नारद ने कहा - "मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछ-ताछ करनी है. अपनी मां को जरा बाहर भेजो, बेटी!" भोलाराम की पत्नी बाहर आई. नारद ने कहा - "माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?" "क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी. पाँच साल हो गए, पेंशन पर बैठे. पर पेंशन अभी तक नहीं मिली. हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है. इन पाँच सालों में सब गहने बेच कर हम लोग खा गए. फिर बरतन बिके. अब कुछ नहीं बचा था. चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दी." नारद ने कहा - "क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी." "ऐसा तो मत कहो, महाराज ! उम्र तो बहुत थी. दो अढाई हज़ार रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं कर के गुजारा हो जाता. पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली." दुःख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं. वे अपने मुद्दे पर आए, "मां, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उन का विशेष प्रेम था, जिस में उन का जी लगा हो?" पत्नी बोली - "लगाव तो महाराज, बाल बच्चों से ही होता है." "नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है. मेरा मतलब है, किसी स्त्री..." स्त्री ने गुर्रा कर नारद की ओर देखा. बोली - "अब कुछ मत बको महाराज ! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो. जिंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा."नारद हँस कर बोले - "हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है. यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है. अच्छा, माता मैं चला."
स्त्री ने कहा - "महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं. कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उन की रुकी हुई पेंशन मिल जाए. इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए." नारद को दया आ गई थी. वे कहने लगे - "साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं. फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूंगा." वहाँ से चल कर नारद सरकारी दफ़्तर पहुँचे. वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं. उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला - "भोलाराम ने दरख्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी." नारद ने कहा - "भई, ये बहुत से ‘पेपर-वेट' तो रखे हैं. इन्हें क्यों नहीं रख दिया?" बाबू हँसा - "आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती. दरख्वास्तें ‘पेपरवेट' से नहीं दबतीं. खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए." नारद उस बाबू के पास गए. उस ने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पांचवे के पास. जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा - "महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए. अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा. आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए. उन्हें खुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा." नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे. बाहर चपरासी ऊँघ रहा था. इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं. बिना ‘विजिटिंग कार्ड' के आया देख साहब बड़े नाराज हुए. बोले - "इसे कोई मन्दिर वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?" नारद ने कहा - "कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है." "क्या काम है?" साहब ने रौब से पूछा. नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया. साहब बोले- "आप हैं बैरागी. दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते. असल में भोलाराम ने गलती की. भई, यह भी एक मन्दिर है. यहाँ भी दान पुण्य करना पड़ता है. आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं. भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं. उन पर वज़न रखिए." नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई. साहब बोले - "भई, सरकारी पैसे का मामला है. पेंशन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है. देर लग ही जाती है. बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है. जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है. हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर..." साहब रुके. नारद ने कहा - "मगर क्या?" साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "मगर वज़न चाहिए. आप समझे नहीं. जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है. मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है. यह मैं उसे दे दूंगा. साधु-सन्तों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं." नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराए. पर फिर संभल कर उन्होंने वीणा टेबिल पर रख कर कहा - "यह लीजिए. अब जरा जल्दी उसकी पेंशन ऑर्डर निकाल दीजिए." साहब ने प्रसन्न्ता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घण्टी बजाई. चपरासी हाजिर हुआ. साहब ने हुक्म दिया - बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ. थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख्वास्तों से भरी फ़ाइल ले कर आया. उसमें पेंशन के कागजात भी थे. साहब ने फ़ाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा - "क्या नाम बताया साधु जी आपने?" नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है. इसलिए जोर से बोले - "भोलाराम!" सहसा फ़ाइल में से आवाज आई - "कौन पुकार रहा है मुझे. पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?" नारद चौंके. पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए. बोले - "भोलाराम ! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?" "हाँ ! आवाज आई." नारद ने कहा - "मैं नारद हूँ. तुम्हें लेने आया हूँ. चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है." आवाज आई - "मुझे नहीं जाना. मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों पर अटका हूँ. यहीं मेरा मन लगा है. मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता."
शुक्रवार, 14 नवंबर 2008
आओ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाये (थोड़ा व्यंग्य, थोड़ा चिंतन)
गुरु-- "चेला, हिन्दू-मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते।"
चेला-- "क्यों गुरुदेव?"
गुरु-- "दोनों में बड़ा अन्तर है।"
चेला-- "क्या अन्तर है?"
गुरु-- "उनकी भाषा अलग है...हमारी अलग है।"
चेला-- "क्या हिन्दी, कश्मीरी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, मलयालम, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बंगाली आदि भाषाएँ मुसलमान नहीं बोलते...वे सिर्फ़ उर्दू बोलते हैं?"
गुरु-- "नहीं...नहीं, भाषा का अन्तर नहीं है...धर्म का अन्तर है।"
चेला-- "मतलब दो अलग-अलग धर्मों के मानने वाले एक देश में नहीं रह सकते?"
गुरु-- "हाँ...भारतवर्ष केवल हिन्दुओं का देश है।"
चेला-- "तब तो सिखों, ईसाइयों, जैनियों, बौद्धों, पारसियों, यहूदियों को इस देश से निकाल देना चाहिए।"
गुरु-- "हाँ, निकाल देना चाहिए।"
चेला-- "तब इस देश में कौन बचेगा?"
गुरु-- "केवल हिन्दू बचेंगे...और प्रेम से रहेंगे।"
चेला-- "उसी तरह जैसे पाकिस्तान में सिर्फ़ मुसलमान बचे हैं और प्रेम से रहते हैं?"
(जाने माने व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई जी के अनमोल खजाने से)
चेला-- "क्यों गुरुदेव?"
गुरु-- "दोनों में बड़ा अन्तर है।"
चेला-- "क्या अन्तर है?"
गुरु-- "उनकी भाषा अलग है...हमारी अलग है।"
चेला-- "क्या हिन्दी, कश्मीरी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, मलयालम, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बंगाली आदि भाषाएँ मुसलमान नहीं बोलते...वे सिर्फ़ उर्दू बोलते हैं?"
गुरु-- "नहीं...नहीं, भाषा का अन्तर नहीं है...धर्म का अन्तर है।"
चेला-- "मतलब दो अलग-अलग धर्मों के मानने वाले एक देश में नहीं रह सकते?"
गुरु-- "हाँ...भारतवर्ष केवल हिन्दुओं का देश है।"
चेला-- "तब तो सिखों, ईसाइयों, जैनियों, बौद्धों, पारसियों, यहूदियों को इस देश से निकाल देना चाहिए।"
गुरु-- "हाँ, निकाल देना चाहिए।"
चेला-- "तब इस देश में कौन बचेगा?"
गुरु-- "केवल हिन्दू बचेंगे...और प्रेम से रहेंगे।"
चेला-- "उसी तरह जैसे पाकिस्तान में सिर्फ़ मुसलमान बचे हैं और प्रेम से रहते हैं?"
(जाने माने व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई जी के अनमोल खजाने से)
विकसित देश की पहचान
गुरु : विकसित देश की कोई पहचान बताओ बेटा !
चेला : विकसित देश विकासशील देशों को दान देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला: फिर कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला: फिर ब्याज के साथ कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला: और फिर ब्याज ही कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला : और फिर विकसित देशों को विकसित मान लेते हैं।
चेला : विकसित देश विकासशील देशों को दान देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला: फिर कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला: फिर ब्याज के साथ कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला: और फिर ब्याज ही कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
चेला : और फिर विकसित देशों को विकसित मान लेते हैं।
गुरु : विकसित देशों की कोई ओर पहचान बताओ बेटा !
चेला: विकसित देशों में मानसिक रोगी अधकि होते हैं।
गुरु : क्यों? शारीरिक रोगी क्यों नहीं होते?
चेला : क्योंकि शरीर पर तो उन्होंने अधिकार कर लिया है मन पर कोई अधिकार नहीं हो पाया है।
चेला: विकसित देशों में मानसिक रोगी अधकि होते हैं।
गुरु : क्यों? शारीरिक रोगी क्यों नहीं होते?
चेला : क्योंकि शरीर पर तो उन्होंने अधिकार कर लिया है मन पर कोई अधिकार नहीं हो पाया है।
गुरु : कोई और पहचान बेटा !
चेला : विकसित देशों में तलाक़ें बहुत होती हैं।
गुरु : क्यों?
चेला : क्योंकि प्रेम बहुत होते हैं।
गुरु : प्रेम विवाह के बाद तलाक़ क्यों हो जाती है?
चेला : दूसरा प्रेम करने के लिए।
चेला : विकसित देशों में तलाक़ें बहुत होती हैं।
गुरु : क्यों?
चेला : क्योंकि प्रेम बहुत होते हैं।
गुरु : प्रेम विवाह के बाद तलाक़ क्यों हो जाती है?
चेला : दूसरा प्रेम करने के लिए।
गुरु : कुछ और ?
चेला : विकसित देशों में बूढ़े अलग रहते हैं।
गुरु : और जवान?
चेला : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : और अधेड़?
चेला : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : तब वहां साथ-साथ कौन रहता है?
चेला : सब अपने-अपने साथ रहते हैं।
चेला : विकसित देशों में बूढ़े अलग रहते हैं।
गुरु : और जवान?
चेला : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : और अधेड़?
चेला : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : तब वहां साथ-साथ कौन रहता है?
चेला : सब अपने-अपने साथ रहते हैं।
चेला : विकसित देशों में इंसान जानवरों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्योंकि जानवर इंसान से बड़ा प्यार करते हैं। इसी लिए ना ?
चेला : नहीं गुरुदेव ! इस लिए की वहां इंसान को इंसान का और जानवर को जानवर का प्यार नही मिलता
गुरु :इसका मतलब बहुत जल्द अब हम भी विकासशील से विकसित देशों की कतार में खड़े होने जा रहे हैं
आइये स्वागत करें नए विकसित भारत का ...........
(श्री हरिशंकर परसाई जी)
शरीफों का मोहल्ला (कृप्या इसे व्यंग्य न समझें)
एक बाड़ा था। बाड़े में तेरह किराएदार रहते थे। मकान मालिक चौधरी साहब पास ही एक बंगले में रहते थे। एक नए किराएदार आए। वे डिप्टी कलेक्टर थे। उनके आते ही उनका इतिहास भी मुहल्ले में आ गया था। वे इसके पहले ग्वालियर में थे। वहां दफ्तर की लेडी टाइपिस्ट को लेकर कुछ मामला हुआ था। वे साल भर सस्पैंड रहे थे। यह मामला अखबार में भी छपा था। मामला रफा-दफा हो गया और उनका तबादला इस शहर में हो गया। डिप्टी साहब के इस मकान में आने के पहले ही उनके विभाग का एक आदमी मुहल्ले में आकर कह गया था कि यह बहुत बदचलन, चरित्रहीन आदमी है। जहां रहा, वहीं इसने बदमाशी की। यह बात सारे तेरह किराएदारों में फैल गई। किरदार आपस में कहते- यह शरीफ आदमियों का मोहल्ला है। यहां ऐसा आदमी रहने आ रहा है। चौधरी साहब ने इस आदमी को मकान देकर अच्छा नहीं किया। कोई कहते- बहू-बेटियां सबके घर में हैं। यहां ऐसा दुराचारी आदमी रहने आ रहा है। भला शरीफ आदमी यहां कैसे रहेंगे। डिप्टी साहब को मालूम था कि मेरे बारे में खबर इधर पहुंच चुकी है। वे यह भी जानते थे कि यहां सब लोग मुझसे नफरत करते हैं। मुझे बदमाश मानते हैं। वे इस माहौल में अड़चन महसूस करते थे। वे हीनता की भावना से ग्रस्त थे। नीचा सिर किए आते-जाते थे। किसी से उनकी दुआ-सलाम नहीं होती थी। इधर मुहल्ले के लोग आपस में कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन आ बसा है। डिप्टी साहब का सिर्फ मुझसे बोलचाल का संबंध स्थापित हो गया था। मेरा परिवार नहीं था। मैं अकेला रहता था। डिप्टी साहब कभी-कभी मेरे पास आकर बैठ जाते। वे अकेले रहते थे। परिवार नहीं लाए थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा- ये जो मिस्टर दास हैं, ये रेलवे के दूसरे पुल के पास एक औरत के पास जाते हैं। बहुत बदचलन औरत है।
दूसरे दिन मैंने देखा, उनकी गर्दन थोड़ी सी उठी है। मुहल्ले के लोग आपस में कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन आ गया। दो-तीन दिन बाद डिप्टी साहब ने मुझसे कहा- ये जो मिसेज चोपड़ा हैं, इनका इतिहास आपको मालूम है? जानते हैं इनकी शादी कैसे हुई? तीन आदमी इनसे फंसे थे। इनका पेट फूल गया। बाकी दो शादीशुदा थे। चोपड़ा को इनसे शादी करनी पड़ी। दूसरे दिन डिप्टी साहब का सिर थोड़ा और ऊंचा हो गया। मुहल्ले वाले अभी भी कह रहे थे- शरीफों के मुहल्ले में कैसा बदचलन आदमी आ बसा। तीन-चार दिन बाद फिर डिप्टी साहब ने कहा- श्रीवास्तव साहब की लड़की बहुत बिगड़ गई है। ग्रीन होटल में पकड़ी गई थी एक आदमी के साथ। डिप्टी साहब का सिर और ऊंचा हुआ। मुहल्ले वाले अभी भी कह रहे थे- शरीफों के मुहल्ले में यह कहां का बदचलन आ गया। तीन-चार दिन बाद डिप्टी साहब ने कहा- ये जो पांडे साहब हैं, अपने बड़े भाई की बीवी से फंसे हैं। सिविल लाइंस में रहता है इनका बड़ा भाई। डिप्टी साहब का सिर और ऊंचा हो गया था। मुहल्ले के लोग अभी भी कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन कहां से आ गया। डिप्टी साहब ने मुहल्ले में लगभग हर एक के बारे में कुछ पता लगा लिया था। मैं नहीं कह सकता कि यह सब सच था या उनका गढ़ा हुआ। आदमी वे उस्ताद थे। ऊंचे कलाकार। हर बार जब वे किसी की बदचलनी की खबर देते, उनका सिर और ऊंचा हो जाता। अब डिप्टी साहब का सिर पूरा तन गया था। चाल में अकड़ आ गई थी। लोगों से दुआ सलाम होने लगी थी। कुछ बात भी कर लेते थे। एक दिन मैंने कहा- बीवी-बच्चों को ले आइए न। अकेले तो तकलीफ होती होगी। डिप्टी साहब ने कहा- अरे साहब, शरीफों के मुहल्ले में मकान मिले तभी तो लाऊंगा बीवी-बच्चों को।
दूसरे दिन मैंने देखा, उनकी गर्दन थोड़ी सी उठी है। मुहल्ले के लोग आपस में कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन आ गया। दो-तीन दिन बाद डिप्टी साहब ने मुझसे कहा- ये जो मिसेज चोपड़ा हैं, इनका इतिहास आपको मालूम है? जानते हैं इनकी शादी कैसे हुई? तीन आदमी इनसे फंसे थे। इनका पेट फूल गया। बाकी दो शादीशुदा थे। चोपड़ा को इनसे शादी करनी पड़ी। दूसरे दिन डिप्टी साहब का सिर थोड़ा और ऊंचा हो गया। मुहल्ले वाले अभी भी कह रहे थे- शरीफों के मुहल्ले में कैसा बदचलन आदमी आ बसा। तीन-चार दिन बाद फिर डिप्टी साहब ने कहा- श्रीवास्तव साहब की लड़की बहुत बिगड़ गई है। ग्रीन होटल में पकड़ी गई थी एक आदमी के साथ। डिप्टी साहब का सिर और ऊंचा हुआ। मुहल्ले वाले अभी भी कह रहे थे- शरीफों के मुहल्ले में यह कहां का बदचलन आ गया। तीन-चार दिन बाद डिप्टी साहब ने कहा- ये जो पांडे साहब हैं, अपने बड़े भाई की बीवी से फंसे हैं। सिविल लाइंस में रहता है इनका बड़ा भाई। डिप्टी साहब का सिर और ऊंचा हो गया था। मुहल्ले के लोग अभी भी कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन कहां से आ गया। डिप्टी साहब ने मुहल्ले में लगभग हर एक के बारे में कुछ पता लगा लिया था। मैं नहीं कह सकता कि यह सब सच था या उनका गढ़ा हुआ। आदमी वे उस्ताद थे। ऊंचे कलाकार। हर बार जब वे किसी की बदचलनी की खबर देते, उनका सिर और ऊंचा हो जाता। अब डिप्टी साहब का सिर पूरा तन गया था। चाल में अकड़ आ गई थी। लोगों से दुआ सलाम होने लगी थी। कुछ बात भी कर लेते थे। एक दिन मैंने कहा- बीवी-बच्चों को ले आइए न। अकेले तो तकलीफ होती होगी। डिप्टी साहब ने कहा- अरे साहब, शरीफों के मुहल्ले में मकान मिले तभी तो लाऊंगा बीवी-बच्चों को।
(अगर किसी सज्जन व्यक्ति के पास किराये हेतु मकान उपलब्ध हो तो कृप्या डिप्टी साहेब से सम्पर्क करें, किन्तु ये विशेष शर्त है कि मोहल्ला शरीफों का होना चाहिए)
गुरुवार, 13 नवंबर 2008
बारात की वापसी
बारात में जाना कई कारण से टालता हूँ । मंगल कार्यों में हम जैसी चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है। महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिये। किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गये थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है। उनका यह शोध है कि महाभारत का युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती। और अगर कृष्णमेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता। सारे युद्ध प्रौढ़ कुंवारों के अहं की तुष्टि के लिए होते हैं। 1948 में तेलंगाना में किसानों का सशस्त्र विद्रोह देश के वरिष्ठ कुंवारे विनोवस भावे के अहं की तुष्टि के लिए हुआ था। उनका अहं भूदान के रूप में तुष्ट हुआ। .......... अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न माया राम के मन में उस दिन नागपुर में बड़ा मौलिक विचार जागा था। कहने लगे, " बस, अब तुमलोगों की बारात में जाने की इच्छा है। " हम लोगों ने कहा - ' अब किशोरों जैसी बारात तो होगी नही। अब तो ऐसी बारात ऐसी होगी- किसी को भगा कर लाने के कारण हथकड़ी पहने हम होंगे और पीछे चलोगे तुम जमानत देने वाले। ऐसी बारात होगी। चाहो तो बैण्ड भी बजवा सकते हो।" ......... विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है। विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है। लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने मे जा रही है। पाव ताकत छिपाने मे जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में ... बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, - तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा। यह बात मैंने उस दिन एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के वार्षिकोत्सव में कही थी। कहा था, “तुम लोग क्रांतिकारी तरुण-तरुणियां बनते हो। तुम इस देश की आधी ताकत को बचा सकते हो। ऐसा करो जितनी लड़कियां विश्वविद्यालय में हैं, उनसे विवाह कर डालो। अपने बाप को मत बताना। वह दहेज मांगने लगेगा। इसके बाद जितने लड़के बचें, वे एक-दूसरे की बहन से शादी कर लें। ऐसा बुनियादी क्रांतिकारी काम कर डालो और फिर जिस सिगड़ी को जमीन पर रखकर तुम्हारी मां रोटी बनाती है, उसे टेबिल पर रख दो, जिससे तुम्हारी पत्नी सीधी खड़ी होकर रोटी बना सके। बीस-बाईस सालों में सिगड़ी ऊपर नहीं रखी जा सकी और न झाडू में चार फुट का डंडा बांधा जा सका। अब तक तुम लोगों ने क्या खाक क्रांति की है।” छात्र थोड़े चौंके। कुछ ही-ही करते भी पाये गये। मगर कुछ नहीं। एक तरुण के साथ सालों मेहनत करके मैंने उसके खयालात संवारे थे। वह शादी के मंडप में बैठा तो ससुर से बच्चे की तरह मचलकर बोला, “बाबूजी, हम तो वेस्पा लेंगे, वेस्पा के बिना कौर नहीं उठायेंगे।” लड़की के बाप का चेहरा फक। जी हुआ, जूता उतारकर पांच इस लड़के को मारूं और पच्चीस खुद अपने को। समस्या यों सुलझी कि लड़की के बाप ने साल भर में वेस्पा देने का वादा किया, नेग के लिए बाजार से वेस्पा का खिलौना मंगाकर थाली में रखा, फिर सबा रुपया रखा और दामाद को भेंट किया। सबा रुपया तो मरते वक्त गोदान के निमित्त दिया जाता है न। हां, मेरे उस तरुण दोस्त की प्रगतिशीलता का गोदान हो रहा था। बारात यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ , खासकर लौटते वक्त जब बाराती बेकार बोझ हो जाता है । अगर जी भर दहेज न मिले, तो वर का बाप बरातियों को दुश्मन समझता है। मैं सावधानी बरतता हूँ कि बारात की विदा के पहले ही कुछ बहाना करके किराया लेकर लौट पड़ता हूँ।
एक बारात की वापसी मुझे याद है।
हम पांच मित्रों ने तय किया कि शाम ४ बजे की बस से वापस चलें। पन्ना से इसी कम्पनी की बस सतना के लिये घण्टे-भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुंच जायेंगे। हममें से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था, इसलिये वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं बस डाकिन है। बस को देखा तो श्रद्धा उभर पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदीयों के अनुभव के निशान लिये हुए थी। लोग इसलिए सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!
बस-कम्पनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमनें उनसे पूछा-यह बस चलती है? वह बोले-चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी। हमनें कहा-वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने-आप चलती है यह? उन्होंने कहा-हां जी और कैसे चलेगी?
गज़ब हो गया। ऐसी बस अपने-आप चलती है!
हम आगा-पीछा करने लगे। पर डाक्टर मित्र ने कहा-डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नई-नवेली बसों से ज़्यादा विशवनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी। हम बैठ गये। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे, जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आखें कह रही थी - आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है सो जायेगा - राजा, रंक, फ़कीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।
इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा लगा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। कांच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फौरन खिड़की से दूर सरक गये। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था हमारी सीट के नीचे इंजन है।
बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि गांधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दुसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता, सीट बॉडी को छोड़ कर आगे निकल गयी। कभी लगता कि सीट को छोड़ कर बॉडी आगे भागे जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेद-भाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हमपर बैठी है।
एकाएक बस रूक गयी। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस कम्पनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएंगे, जैसे मां बच्चे के मुंह में दूध की शीशी लगाती है।
बस की रफ्तार अब पन्द्रह-बीस मील हो गयी थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फेल हो सकता है, स्टीयरींग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ हरे-हरे पेड़ थे, जिन पर पंछी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इन्तज़ार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।
एकाएक फिर बस रूकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं, पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया था। कम्पनी के हिस्सेदार कह रहे थे - बस तो फर्स्ट क्लास है जी! ये तो इत्तफाक की बात है। क्षीण चांदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गयी हो। हमें ग्लानी हो रही थी कि इस बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अन्त्येष्टी करनी पड़ेगी।
हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गयी थी।
धीरे-धीरे वृद्धा की आखों की ज्योति जाने लगी। चांदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती - निकल जाओ बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।
एक पुलिया के उपर पहुंचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। बस बहुत ज़ोर से हिलकर थम गयी। अगर स्पीड में होती तो उछल कर नाले में गिर जाती। मैंने उस कम्पनी के हिस्सेदार की तरफ श्रद्धा भाव से देखा। वह टायरों क हाल जानते हैं, फिर भी जान हथेली पर ले कर इसी बस से सफर करते हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान-भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते, तो देवता बांहें पसारे उसका इन्तज़ार करते। कहते - वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।
दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी - पन्ना, क्या, कहीं भी, कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ज़िन्दगी इसी बस में गुज़ारनी है और इससे सीधे उस लोक की ओर प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गये। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गये। चिन्ता जाती रही। हंसी मज़ाक चालू हो गया।
ठण्ड बढ़ रही थी । खिड़कियाँ खुली ही थीं। डाक्टर ने कहा - ' गलती हो गयी। 'कुछ' पीने को ले आता तो ठीक रहता । ' एक गाँव पर बस रुकी तो डाक्टर फौरन उतरा । ड्राइवर से बोला - 'जरा रोकना ! नारियल ले आऊँ । आगे मढ़िया पर फोड़ना है । डाक्टर झोपड़ियों के पीछे गया और देशी शराब की बोतल ले आया । छागलों मे भर कर हम लोगों ने पीना शुरु किया ।
इसके बाद किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। पन्ना से पहले ही सारे मुसाफिर उतर चुके थे । बस कम्पनी के हिस्सेदार शहर के बाहर ही अपने घर पर उतर गये। बस शहर मे अपने ठिकाने पर रुकी। कम्पनी के दो मालिक रजाइयों मे दुबके बैठे थे। रात का एक बजा था। हम पाँचों उतरे। मैं सड़क के किनारे खड़ा रहा। डाक्टर भी मेरे पास खड़ा हो कर बोतल से अंतिम घूँट लेने लगा। बाकि तीन मित्र बस-मालिकों पर झपटे। उनकी गर्म डाँट हम सुन रहे थे। पर वे निराश लौटे। बस-मालिकों ने कह दिया था, सतना की बस तो चार- पाँच घण्टे पहले जा चुकी थी। अब लौटती होगी। अब तो बस सवेरे ही मिलेगी।
आसपास देखा, सारी दुकानें, होटल बन्द। ठण्ड कड़ाके की। भूख भी खूब लग रही थी। तभी डाक्टर बस-मालिकों के पास गया। पाँचेक मिनट मे उनके साथ लौटा तो बदला हुआ था। बड़े अदब से मुझसे कहने लगा," सर, नाराज़ मत होइए। सरदार जी कुछ इंतजाम करेंगे। सर,सर उन्हें अफ़सोस है कि आपको तक़लीफ़ हुई। "
अभी डाक्टर बेतकुल्लफी से बात कर रहा था और अब मुझे 'सर' कह रहा है। बात क्या है? कही ठर्रा ज्यादा असर तो नहीं कर गया। मैने कहा, "यह तुमने क्या 'सर-सर' लगा रखी है ? "
उसने वैसे ही झुक कर कहा, " सर, नाराज़ मत होइए ! सर, कुछ इंतजाम हुआ जाता है। "
मुझे तब भी कुछ समझ में नही आया। डाक्टर भी परेशान था कि मैं कुछ समझ क्यों नही रहा हूँ। वह मुझे अलग ले गया और समझाया, " मैने इन लोगों से कहा है कि तुम संसद सदस्य हो। इधर जांच करने आए हो।मैं एक क्लर्क हूँ, जिसे साहब ने एम. पी. को सतना पहुँचाने के लिए भेजा है। मैने इनसे कहा कि सरदारजी, मुझ गरीब की तो गर्दन कटेगी ही, आपकी भी लेवा-देई हो जायेगी। वह स्पेशल बस से सतना भेजने का इंतजाम कर देगा। ज़रा थोड़ा एम. पी. पन तो दिखाओ। उल्लू की तरह क्यों पेश आ रहे हो। "
मैं समझ गया कि मेरी काली शेरवानी काम आ गयी है। यह काली शेरवानी और ये बड़े बाल मुझे कोई रुप दे देते हैं। नेता भी दिखता हूँ, शायर भी और अगर बाल सूखे -बिखरे हों तो जुम्मन शहनाईवाले का भी धोखा हो जाता है।
मैने मिथ्याचार का आत्मबल बटोरा और लौटा तो ठीक संसद सदस्य की तरह। आते ही सरदारजी से रोब से पूछा, " सरदारजी, आर. टी. ओ. से कब तक इस बस को चलाने का सौदा हो गया है? "
सरदारजी घबरा उठे। डाक्टर खुश कि मैने फर्स्ट क्लास रोल किया है।
रोबदार संसद सदस्य का एक वाक्य काफ़ी है, यह सोंचकर मैं दूर खड़े होकर सिगरेट पीने लगा। सरदारजी ने वहीं मेरे लिये कुर्सी डलवा दी। वह डरे हुए थे और डरा हुआ मैं भी था। मेरा डर यह था कि कहीं पूछताछ होने लगी कि मैं कौन संसद सदस्य हूँ तो क्या कहूँगा। याद आया कि अपने मित्र महेशदत्त मिश्र का नाम धारण कर लूँगा। गाँधीवादी होने के नाते, वह थोड़ा झूठ बोलकर मुझे बचा ही लेंगे।
मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। झूठ यदि जम जाये तो सत्य से ज्यादा अभय देता है। मैं वहीं बैठे-बैठे डाक्टर से चीखकर बोला, " बाबू , यहाँ क्या कयामत तक बैठे रहना पड़ेगा? इधर कहीं फोन हो तो जरा कलेक्टर को इत्तिला कर दो। वह ग़ाड़ी का इंतजाम कर देंगे। "
डाक्टर वहीं से बोला, " सर, बस एक मिनट! जस्ट ए मिनट सर !" थोड़ी देर बाद सरदारजी ने एक नयी बस निकलवायी। मुझे सादर बैठाया गया। साथियों को बैठाया। बस चल पड़ी।
मुझे एम. पी. पन काफी भाड़ी पड़ रहा था। मैं दोस्तों के बीच अजनबी की तरह अकड़ा बैठा था। डाक्टर बार बार 'सर' कहता था और बस का मालिक 'हुज़ूर'।
सतना में जब रेलवे के मुसाफिरखाने मे पहुँचे तब डाक्टर ने कहा, " अब तीन घण्टे लगातार तुम मुझे 'सर' कहो। मेरी बहुत तौहीन हो चुकी है।" ....
(यह श्री हरिशंकर परसाई जी की एक चुनिन्दा व्यंग्य रचना है,जिसे आप सब के आनन्द प्राप्ति हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ)
एक बारात की वापसी मुझे याद है।
हम पांच मित्रों ने तय किया कि शाम ४ बजे की बस से वापस चलें। पन्ना से इसी कम्पनी की बस सतना के लिये घण्टे-भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुंच जायेंगे। हममें से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था, इसलिये वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं बस डाकिन है। बस को देखा तो श्रद्धा उभर पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदीयों के अनुभव के निशान लिये हुए थी। लोग इसलिए सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!
बस-कम्पनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमनें उनसे पूछा-यह बस चलती है? वह बोले-चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी। हमनें कहा-वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने-आप चलती है यह? उन्होंने कहा-हां जी और कैसे चलेगी?
गज़ब हो गया। ऐसी बस अपने-आप चलती है!
हम आगा-पीछा करने लगे। पर डाक्टर मित्र ने कहा-डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नई-नवेली बसों से ज़्यादा विशवनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी। हम बैठ गये। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे, जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आखें कह रही थी - आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है सो जायेगा - राजा, रंक, फ़कीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।
इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा लगा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। कांच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फौरन खिड़की से दूर सरक गये। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था हमारी सीट के नीचे इंजन है।
बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि गांधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दुसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता, सीट बॉडी को छोड़ कर आगे निकल गयी। कभी लगता कि सीट को छोड़ कर बॉडी आगे भागे जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेद-भाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हमपर बैठी है।
एकाएक बस रूक गयी। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस कम्पनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएंगे, जैसे मां बच्चे के मुंह में दूध की शीशी लगाती है।
बस की रफ्तार अब पन्द्रह-बीस मील हो गयी थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फेल हो सकता है, स्टीयरींग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ हरे-हरे पेड़ थे, जिन पर पंछी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इन्तज़ार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।
एकाएक फिर बस रूकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं, पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया था। कम्पनी के हिस्सेदार कह रहे थे - बस तो फर्स्ट क्लास है जी! ये तो इत्तफाक की बात है। क्षीण चांदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गयी हो। हमें ग्लानी हो रही थी कि इस बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अन्त्येष्टी करनी पड़ेगी।
हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गयी थी।
धीरे-धीरे वृद्धा की आखों की ज्योति जाने लगी। चांदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती - निकल जाओ बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।
एक पुलिया के उपर पहुंचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। बस बहुत ज़ोर से हिलकर थम गयी। अगर स्पीड में होती तो उछल कर नाले में गिर जाती। मैंने उस कम्पनी के हिस्सेदार की तरफ श्रद्धा भाव से देखा। वह टायरों क हाल जानते हैं, फिर भी जान हथेली पर ले कर इसी बस से सफर करते हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान-भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते, तो देवता बांहें पसारे उसका इन्तज़ार करते। कहते - वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।
दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी - पन्ना, क्या, कहीं भी, कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ज़िन्दगी इसी बस में गुज़ारनी है और इससे सीधे उस लोक की ओर प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गये। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गये। चिन्ता जाती रही। हंसी मज़ाक चालू हो गया।
ठण्ड बढ़ रही थी । खिड़कियाँ खुली ही थीं। डाक्टर ने कहा - ' गलती हो गयी। 'कुछ' पीने को ले आता तो ठीक रहता । ' एक गाँव पर बस रुकी तो डाक्टर फौरन उतरा । ड्राइवर से बोला - 'जरा रोकना ! नारियल ले आऊँ । आगे मढ़िया पर फोड़ना है । डाक्टर झोपड़ियों के पीछे गया और देशी शराब की बोतल ले आया । छागलों मे भर कर हम लोगों ने पीना शुरु किया ।
इसके बाद किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। पन्ना से पहले ही सारे मुसाफिर उतर चुके थे । बस कम्पनी के हिस्सेदार शहर के बाहर ही अपने घर पर उतर गये। बस शहर मे अपने ठिकाने पर रुकी। कम्पनी के दो मालिक रजाइयों मे दुबके बैठे थे। रात का एक बजा था। हम पाँचों उतरे। मैं सड़क के किनारे खड़ा रहा। डाक्टर भी मेरे पास खड़ा हो कर बोतल से अंतिम घूँट लेने लगा। बाकि तीन मित्र बस-मालिकों पर झपटे। उनकी गर्म डाँट हम सुन रहे थे। पर वे निराश लौटे। बस-मालिकों ने कह दिया था, सतना की बस तो चार- पाँच घण्टे पहले जा चुकी थी। अब लौटती होगी। अब तो बस सवेरे ही मिलेगी।
आसपास देखा, सारी दुकानें, होटल बन्द। ठण्ड कड़ाके की। भूख भी खूब लग रही थी। तभी डाक्टर बस-मालिकों के पास गया। पाँचेक मिनट मे उनके साथ लौटा तो बदला हुआ था। बड़े अदब से मुझसे कहने लगा," सर, नाराज़ मत होइए। सरदार जी कुछ इंतजाम करेंगे। सर,सर उन्हें अफ़सोस है कि आपको तक़लीफ़ हुई। "
अभी डाक्टर बेतकुल्लफी से बात कर रहा था और अब मुझे 'सर' कह रहा है। बात क्या है? कही ठर्रा ज्यादा असर तो नहीं कर गया। मैने कहा, "यह तुमने क्या 'सर-सर' लगा रखी है ? "
उसने वैसे ही झुक कर कहा, " सर, नाराज़ मत होइए ! सर, कुछ इंतजाम हुआ जाता है। "
मुझे तब भी कुछ समझ में नही आया। डाक्टर भी परेशान था कि मैं कुछ समझ क्यों नही रहा हूँ। वह मुझे अलग ले गया और समझाया, " मैने इन लोगों से कहा है कि तुम संसद सदस्य हो। इधर जांच करने आए हो।मैं एक क्लर्क हूँ, जिसे साहब ने एम. पी. को सतना पहुँचाने के लिए भेजा है। मैने इनसे कहा कि सरदारजी, मुझ गरीब की तो गर्दन कटेगी ही, आपकी भी लेवा-देई हो जायेगी। वह स्पेशल बस से सतना भेजने का इंतजाम कर देगा। ज़रा थोड़ा एम. पी. पन तो दिखाओ। उल्लू की तरह क्यों पेश आ रहे हो। "
मैं समझ गया कि मेरी काली शेरवानी काम आ गयी है। यह काली शेरवानी और ये बड़े बाल मुझे कोई रुप दे देते हैं। नेता भी दिखता हूँ, शायर भी और अगर बाल सूखे -बिखरे हों तो जुम्मन शहनाईवाले का भी धोखा हो जाता है।
मैने मिथ्याचार का आत्मबल बटोरा और लौटा तो ठीक संसद सदस्य की तरह। आते ही सरदारजी से रोब से पूछा, " सरदारजी, आर. टी. ओ. से कब तक इस बस को चलाने का सौदा हो गया है? "
सरदारजी घबरा उठे। डाक्टर खुश कि मैने फर्स्ट क्लास रोल किया है।
रोबदार संसद सदस्य का एक वाक्य काफ़ी है, यह सोंचकर मैं दूर खड़े होकर सिगरेट पीने लगा। सरदारजी ने वहीं मेरे लिये कुर्सी डलवा दी। वह डरे हुए थे और डरा हुआ मैं भी था। मेरा डर यह था कि कहीं पूछताछ होने लगी कि मैं कौन संसद सदस्य हूँ तो क्या कहूँगा। याद आया कि अपने मित्र महेशदत्त मिश्र का नाम धारण कर लूँगा। गाँधीवादी होने के नाते, वह थोड़ा झूठ बोलकर मुझे बचा ही लेंगे।
मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। झूठ यदि जम जाये तो सत्य से ज्यादा अभय देता है। मैं वहीं बैठे-बैठे डाक्टर से चीखकर बोला, " बाबू , यहाँ क्या कयामत तक बैठे रहना पड़ेगा? इधर कहीं फोन हो तो जरा कलेक्टर को इत्तिला कर दो। वह ग़ाड़ी का इंतजाम कर देंगे। "
डाक्टर वहीं से बोला, " सर, बस एक मिनट! जस्ट ए मिनट सर !" थोड़ी देर बाद सरदारजी ने एक नयी बस निकलवायी। मुझे सादर बैठाया गया। साथियों को बैठाया। बस चल पड़ी।
मुझे एम. पी. पन काफी भाड़ी पड़ रहा था। मैं दोस्तों के बीच अजनबी की तरह अकड़ा बैठा था। डाक्टर बार बार 'सर' कहता था और बस का मालिक 'हुज़ूर'।
सतना में जब रेलवे के मुसाफिरखाने मे पहुँचे तब डाक्टर ने कहा, " अब तीन घण्टे लगातार तुम मुझे 'सर' कहो। मेरी बहुत तौहीन हो चुकी है।" ....
(यह श्री हरिशंकर परसाई जी की एक चुनिन्दा व्यंग्य रचना है,जिसे आप सब के आनन्द प्राप्ति हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ)
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