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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नए साल में हम आपसी मतभेदों को भुलाकर अपनी प्रतिभा को अमूल्य विस्तार दें!!!!!!!!!!!

आज हम वर्तमान के इस माहौल का अवलोकन करें तो पाएंगें कि चाहे घर-परिवार हो, चाहे समाज या फिर ये चिट्ठाजगत, हम लोग अपना कितना बहुमूल्य समय और ऊर्जा व्यर्थ के आपसी विवादों, मतभेदों तथा झगड़ों में यूँ ही व्यर्थ में गवाँते चले जा रहे हैं। आखिर ये झगड़े क्यों? एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति किसलिए ?

एक बार हम आपसी झगड़ों, विवादों, मतभेदों को दरकिनार कर देखे तो सही कि हमारी क्षमता,प्रतिभा का कितना अमूल्य विस्तार होता है और फिर इसी क्षमता का उपयोग सामाजिक जागरूकता, ज्ञान विस्तार और दूसरों का दुःख-दर्द कम करने में लगाए तो शायद इससे बढकर प्रतिभा का सदुपयोग हो ही नहीं सकता । आईये नूतन वर्ष के इस प्रथम दिवस पर हम सब मिलकर यही प्रार्थना करें कि नववर्ष में सभी मनुष्यों में आपसी प्रेम, सदभाव एवं सहयोग की निरन्तर वृ्द्धि हो। चहुँ ओर सुख, समृ्द्धि और सम्पन्नता का वास हो। सबके जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैले, सबके ह्रदयों में शान्ती का वास हो............सबकी मंगलकामनाऎँ परिपूर्ण हों!!  

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् ।।

( सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। ) 

 इसी मंगलकामना के साथ आप सब को नववर्ष की हार्दिक 
 शुभकामनाऎँ!!!!!!!!!!!!!

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

बाबा लोगो का ब्लागिंग दर्शन और कलयुगी नीतिज्ञान :)


समीरानन्द आश्रम में तीनों बाबा जी समाधिस्थ अवस्था में बैठे हुए हैं । बिल्कुल अपने ध्यान में निमग्न...कुछ खबर नहीं कि संसार में क्या हो रहा है, और संसार में वे हैं भी या नहीं । ये दोनों काफी देर तक उनके सामने बैठे रहे..इतने में ही, न जाने कब की लगी  स्वामी ललितानन्द महाराज की समाधी टूटी । बाबा जी ने बडी ही दया दृ्ष्टि से इन लोगों की ओर देखा । इन लोगों नें भी श्रद्धाभाव से चरणस्पर्शपूर्वक उन्हे प्रणाम किया ।"बच्चा!- तुम लोग कौन हो और कहाँ से आए हो ?"
मुरारी लाल:- ":महाराज्! हम तो बस चिट्ठाकारी कीट हैं, हम दोनों "ब्लागनगर" के रहने वाले हैं। आप लोगों की बडी महिमा सुनी है,इसलिए दर्शनों के लिए आए हैं ।"
"बोलो बच्चा! कहो कोई समस्या आन पडी है क्या?"
महफूज:- "महाराज्! समस्या तो ऎसी कुछ नहीं । बस हम तो आपके दर्शनों के अभिलाषी थे, ब्लागिरी के मोह को त्याग कर आत्मिक शान्ती की खोज में आप लोगों के द्वारे आए हैं "
"न्! बच्चा न्! अभी तुम लोगों की आयु इन बखेडों में पडने की नहीं है । अभी तुम बस ब्लागिंग की ओर ध्यान दो।"
मुरारी लाल:- "बाबा! ब्लागिंग में क्या खाक ध्यान दें। दिनरात मगजमारी करनी पडती है, तब जाकर हफ्ते दस दिन में एक पोस्ट का जुगाड हो पाता है। हम लोग हर रोज कम से कम सौं लोगों के चिट्ठे पर जाकर टिप्पणियाँ करते है, तब जाकर बदले में हम लोगो को अपनी पोस्ट पर मुश्किल से पाँच सात टिप्पणियाँ मिल पाती हैं। ऊपर से फालतू में सारा दिन कम्पयूटर पे खिटर-पिटर करते रहो, न कुछ कमाई न धंधा"।
बाबा ललितानन्द:- "धैर्य रखो बच्चा ! एक दिन तुम्हारा भी वक्त जरूर आएगा, जब तुम्हे अपनी हर पोस्ट पर सैकंडों टिप्पणियाँ मिला करेंगी, रही बात कमाई कि तो वो भी जल्द शुरू हो ही जाएगी । अवधिया जी और पाबला जी जैसे तकनीकदक्ष ब्लागर इसकी खोज में प्रयासरत हैं"।
 मुरारी:- महाराज्! ब्लागर बनने का वास्तविक अधिकारी कौन है"?
बाबा ललितानन्द:-"जो संसार में किसी काम के लायक न रहें"
मुरारी:- "बुद्धिमान ब्लागर कौन है।"
बाबा ललितानन्द :- "जो दो विरोधी विचार आधारित पोस्टों पर "बिल्कुल सही कहा आपने" लिखकर टिप्पणी करना जानता हो"
मुरारी:-"मूर्ख ब्लागर की परिभाषा क्या है?"
बाबा ललितानन्द:- "जो गोलमोल बात न कह करके अपने ह्र्दय के भाव सब पर सरलता से प्रकट कर दे "
मुरारी:- "सच्चे ब्लागर का सबसे बडा गुण क्या है" ?
बाबा ललितानन्द:-" सुबह शाम गुरूदेव्! गुरूदेव्! कहकर अपने से वरिष्ठ ब्लागरों की चापलूसी और आत्म गौरव का अभाव"
मुरारी:- "सिद्धहस्त ब्लागर किसे कहना चाहिए" ?
बाबा ललितानन्द:- "जिसे दूसरे के लिखे लेखों, कविताओं,कहानियों को चुराने में तनिक भी शर्म का अनुभव न हो "
मुरारी:-"हिन्दी ब्लागिंग का प्रचार प्रसार कैसे होगा"?
बाबा ललितानन्द:- "रोमन भाषा में अधिकाधिक टिप्पणियाँ करने से"
मुरारी:- "हिन्दी ब्लागिंग में सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है"?
बाबा ललितानन्द:-"जो अभी तक स्वयम रचनाकार की भी समझ में न आई हो"


इतना कहकर बाबा ने अपनी दृ्ष्टि मुरारी लाल से हटाकर अब महफूज अली की ओर की---- "हाँ तुम बोलो बच्चा! तुम्हे क्या कष्ट है? क्या तुम भी मुरारी लाल की तरह ब्लाग ज्ञान के उद्देश्य से आए हो" ?
महफूज:- "नहीं महाराज्! ब्लागिंग में तो अपने को कोई दिक्कत परेशानी नहीं है । बल्कि आपकी कृ्पा से अपनी ब्लागिरी की दुकान तो चकाचक चल रही है, हर पोस्ट पर सौं पचास टिप्पणियाँ तो बडे आराम से बिना कुछ किए ही मिल जाती हैं"।
बाबा ललितानन्द:- " तो बच्चा, फिर तुम्हारे इस मुख मंडल पर ये उदासी क्यूं है?"
महफूज:- "बाबा! मेरी क्या बताऊँ! मेरी समस्या कुछ अलग है । दरअसल बात ये है कि जब से मेरी प्रेमिका रामप्यारी नें मुझे छोडकर सन्यास ग्रहण किया है, बस तब से मेरी आत्मा बहुत अशान्त रहती है । अब तो मन करता है कि मैं भी सब कुछ छोडछाड कर बस सन्यासी बन जाऊँ । मैं तो दुनियादारी का मोह त्याग कर बस आपके पास परम सत्य की खोज में आया हूँ। मन में कुछ भ्रम हैं, जिनका आपसे निवारण चाहता हूँ "
बाबा ललितानन्द:- "कहो! तुम्हें क्या भ्रम है बच्चा?"
महफूज :- "मुक्ति" कैसे प्राप्त होती है ?
बाबा ललितानन्द जी:- "आँख,कान बन्द करके खूब मोटा पैसा कमाने से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है"।
महफूज:- "महाराज्! "परोपकार" क्या है?"
बाबा ललितानन्द जी:- "खूब आनन्द से रहना और पाखंड पूर्वक स्वार्थ साधना ही "परोपकार" है। "
तभी बाबा समीरानन्द और बाबा ताऊआनन्द जी भी समाधि से उठ खडे हुए । बाबा जी का एक भक्त उन्हे सुल्फा भरी हुई चिलम पकडा गया और ये दोनों बारी बारी से लम्बे लम्बे कश खीँचने लगे । जब चिलम से निवृ्त हुए तो सामने बैठे इन दोनों की ओर हल्की सी निगाह डालकर बाबा ललितानन्द की ओर प्रश्नवाचक दृ्ष्टि से देखने लगे। उन्होने भी उनकी दृ्ष्टि के आशय को समझने में देर न लगाई ओर कहने लगे "गुरूदेव्! ये दोनों ब्लागजगत से आए दुखी ब्लागर हैं, आत्मिक शान्ती की खोज में यहाँ आए हैं।"
मुरारी लाल और महफूज दोनों नें ही बडे ही श्रद्धाभाव से बाबा लोगों के चरणों में अपना शीश झुकाया । बाबा लोगों नें भी झट से आशीर्वाद दे डाला  "आयुष्मान भव:, दूधो नहाओ, पूतो फलो"
"तुम्हारा कल्याण हो वत्स"
बाबा समीरानन्द :- "कहो वत्स्! क्या शंका है तुम्हारी ?"
महफूज:- "महाराज्! स्वर्ग कहां है ?"
बाबा समीरानन्द:- "सिविल लाईन्स तथा माडल टाऊन की कोठियों और मल्टीप्लैक्स में "
महफूज:- "ओर नरक किस जगह है" ?
बाबा ताऊआनन्द:- "जो लोग अपनी सनातन संस्कृ्ति पर गर्व करते हैं, उन लोगो के घरों में "
महफूज:- "धर्म" क्या है ?
बाबा समीरानन्द:- "संसार की सब से सस्ती और निकृ्ष्ट वस्तु का नाम ही धर्म है"
महफूज:- "इन्सान को धर्म का पालन कब करना चाहिए ?"
बाबा ताऊआनन्द:- " मृ्त्यु के समय----जीवन समाप्ति में जब एक आध दिन रह जाए, यानि कि जब यमदूत प्राण लेने को दरवाजे पर खडा हो, तब"
महफूज:- "जीवन की सफलता किसमें है ?"
बाबा ताऊआनन्द:- "ढोंग रचने और ऎश करने में "
महफूज:- "सच्चा ज्ञानी कौन है?"
बाबा समीरानन्द:- " दसँवी में 33 प्रतिशत नम्बर लेकर भी जो अफसर की कुर्सी पर बैठा फर्स्ट डिवीजन बी.ए., एम.ए. पास को धमका रहा है" 
महफूज:- "सबसे बडा सत्यवादी कौन है?"
बाबा ललितानन्द:- नेता, वकील और हिन्दी ब्लागर"
महफूज:- "मनुष्य जीवन का उदेश्य क्या है?"
बाबा ताऊआनन्द:- "कमजोरों को सताना और अपने से बलवान से दब जाना ।"
महफूज:- "महाराज्! आज आपने मेरी सारी संशयनिवृ्ति कर दी, अब जाकर मेरी आत्मा को परम शान्ती प्राप्त हुई है । मेरे ह्रदय की उद्विग्नता दूर हो गई,! आप मुझे जो आदेश देंगें, अब मैं वही करूँगा"।
मुरारी:- "धन्य गुरूवर, धन्य् ! आज आप लोगों के दर्शन कर मेरे नेत्र और उपदेश सुनकर मेरे कान पवित्र हो गये । अब तो मैं आपके पाद-पंकंजो की सेवा कर अपना जीवन संवारना चाहता हूँ"।


" जाओ, बालको! अब अपने ब्लाग की सुध लो और हमारे बताए विधान द्वारा अपनी ब्लागिरी चमकाने के साथ साथ अपने लोक परलोक को भी सुधारते जाओ । बस तुम अपने इस जीवन मे ही मुक्ति के अधिकारी बनकर निसंदेह स्वर्ग को जाओगे। ओर हाँ, भक्तजनों के सहयोग से आश्रम का निर्माण कार्य प्रगति पर है । उसमें अपना योगदान देकर शर्मा जी से उसकी रसीद जरूर लेते जाना ।  अच्छा! चलते हैं, अब हम लोगो की समाधि का समय हो गया हैं ।"
तीनों बाबा आशीर्वाद की मुद्रा बनाए आश्रम के भीतरी भाग में बने अपने अपने वातानुकूलित कक्ष की ओर प्रस्थान कर गये ।
हरि बोल.......

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

ब्लागवाणी पर ये क्या आ रहा है------"रिपोर्ट की गई हमला साईट"

लगता है कि आजकल हिन्दी ब्लागिंग की ग्रहदशा कुछ ठीक नहीं चल रही । मुश्किल से ऎसा कोई दिन निकलता होगा, जो कि सही सलामत गुजर जाए वर्ना तो हर रोज कुछ न कुछ लगा ही रहता है । आज ओर एक नया बखेडा खडा हो गया । आप ये न सोचिए कि मैं किसी आपसी विवाद/मतभेद की बात कर रहा हूँ । विवाद और हिन्दी ब्लागिंग का तो अब आपस में चोली दामन का साथ हो गया है बल्कि अब तो विवादों/मतभेदों से भी कहीं आगे नौबत आपस में जूतमपैजार तक आ चुकी है। लेकिन ये सब तो ऎसे ही चलता रहने वाला है ।
मैं यहाँ बात कर रहा हूँ  एक समस्या की जिसने कि मुझे आज दिनभर से परेशान कर रखा है । पहले तो सुबह से ही चिट्ठाजगत साईट नहीं खुल रही थी ओर बाद दोपहर में ब्लागवाणी ने भी काम करना बन्द कर दिया है ।  हम तो जैसे ही ब्लागवाणी की साईट को खोलने का प्रयास करते हैं तो सामने स्क्रीन पर एक ही मैसेज दिखाई पडता है  "रिपोर्ट की गई हमला साईट" । अब किसी को पता हो कि ये सब क्यूँ हो रहा है? कैसे हो रहा है? किस लिए हो रहा है? तो भई जरा बताने की कृ्पा करें । 


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

ये ईमेल सही है या स्पैम ?

आज सुबह हमारे मेलबाक्स मे एक ऎसी ईमेल आई है, जिसके बारे में हम ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि ये ईमेल सही है या कि स्पैम । वैसे हमारी छट्ठी इन्द्री तो यही कह रही है कि अवश्य ही ये मेल कचरा बाक्स में डालने लायक है । फिर ख्याल आया कि भई कलयुग है, आज के जमाने में तो अपनी आत्मा की आवाज तक का कोई भरोसा नहीं, क्या पता कब गुमराह कर दे । इसलिए सोचा कि चलो आप लोगों से ही पता कर लेते हैं,क्या पता ये ईमेल सही ही हो । तो आप लोगों में से किसी को इसके बारे में जानकारी हो तो कृ्प्या मार्गदर्शन करें । कहीं ऎसा न हो कि हम इसे कचरा पेटी में डाल दें ओर बाद में पता चले कि ये तो जरूरी थी ।



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सोमवार, 30 नवंबर 2009

नारी मुक्ति का ये प्रपन्च.."सशक्तिकरण"

हमने जब से ब्लागिंग की दुनिया में कदम रखा है, बस तभी से यही देखने में आ रहा है कि जिधर देखो उधर ही नारी के कष्टों, उसके पहनावे, शरीर रचना और उसके अधिकारों की कथाएँ बाँची जा रही है, लेकिन हमें ये बात बडी अजीब सी लगी कि "नारीमुक्ति-नारीमुक्ति" की चीखो चिल्लाहट में पुरूष की समस्याओं की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा। जब कि हकीकत में समस्याएं दोनों ओर हैं। जब तक दोनों पक्ष की समस्याएं अलग अलग रहेंगी ओर नारी अपनी सुविधा, सुख और अधिकार की पुकार में पुरूष को भूली रहेगी ओर जब तक पुरूष नारी की उपेक्षा करता रहेगा, तब तक गृ्हस्थ जीवन और सामाजिक स्थिति दोनों ही निराशाजनक, निरानन्द और नि:सत्व रहने वाली है। आप बेशक नारी मुक्ति के नाम पर भले ही लाख चीखते चिल्लाते रहें । बताईये क्या एक की कठिनाईयों को अतिरंजित करके, दूसरे को गाली देने से समाज सुखी हो सकता है ?--- नहीं हो ही नहीं सकता ओर न ही इससे नारी की ही दशा में कुछ सुधार हो सकता है । होगा तो दोनों की समस्याओं को समझने ओर एक दूसरे के प्रति उदार दृ्ष्टि रखने से ही।

आज देखिए पारिवारिक जीवन कितने निरानन्द हो रहे हैं। घर की चारदिवारियों में समाज की न जाने कितनी समस्याएं उठती हैं ओर डूब जाती हैं,न जाने कितना करूण क्रन्दन, न जाने कितना अविश्वास, न जाने कितना आक्रोश इनमें एकत्र हैं। हमें कुछ शिक्षा ही इस प्रकार की दी जा रही है कि पश्चिम जो कुछ हमारे कानों में डालता जाता है, उसे हम तोते की तरह से रटते और उगल देते हैं। कुछ रटी शब्दावलियाँ, कुछ ढले हुए तर्क और सिर्फ ओर सिर्फ अपने अधिकारों की बातें----बस ले देकर यही हमारी पूंजी है। चाहे कोई पत्रिका उठाकर देख लीजिए या फिर नारी मुक्ति का झंडा लिए फिरने वाले चिट्ठों को पढ लीजिए, स्त्रियों के विषय में वही चन्द बातें हैं, जो हमारे दिलों से नहीं बल्कि मुँह से मशीन की भान्ती निकलती हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि नारी की दशा सुधारने के फार्मूले देने वालों और देने वालियाँ न सिर्फ दाम्पत्य जीवन को बर्बाद करने पे तुली हुई हैं वरन परिवार एवं समाज के बीच की कर्तव्यश्रृंखला भी शिथिल की जा रही है।

देखा जाए तो आज की इस वर्तमान सभ्यता ने हमारे सारे नैतिक अंकुश ढीले कर दिए हैं। उसने मानव जीवन से कर्तव्य का भाव, धर्म का भाव समाप्त कर डाला है। त्याग एवं आत्मनियन्त्रण की अपेक्षा भोग, अधिक से अधिक भोग की अकांक्षा मन में पैदा कर दी गई है। आधुनिक युग के कर्कश स्वर नें और आधुनिक सभ्यता के बाह्य तथा कृ्त्रिम युग आकर्षण नें नारी के दया, स्नेह एवं मातृ्त्व जैसे नैसर्गिक गुणों को हमारी आँखों से ओझल कर दिया है। आज धीरे धीरे वे सब नियन्त्रण और बन्धन टूटते जा रहे हैं, जिनके कारण स्त्री-पुरूष के आपसी सम्बंधों के अन्दर कर्तव्य और धर्म का एक नियोजक सूत्र हमारे जीवन को बाँधता एवं उचित मार्ग पर चलाता था। आज हम ऊपर-ऊपर देखते हैं, ऊपर-ऊपर की बातें करते हैं, इसलिए कहीं न कहीं नारी अपने सही स्थान से च्युत होती जा रही है।

दरअसल हमारा समाज को देखने का दृ्ष्टिकोण ही गलत है। नारी आज पीडिता है, वंचिता है पर पुरूष भी कोई कम दुखी और लुटा-पिटा नहीं है। दुखी दोनों हैं; पीडित दोनों हैं। दोनों ही अतृ्प्त, आशंकित और परिताप से भरे हुए, सस्ती और बनावटी भावनाओं के शिकार हैं । और इसका कारण सिर्फ इतना है कि दोनों ही स्थानच्युत (misplaced) हैं! दोनों ही अपने व्यक्तित्व और गौरव के प्रति अंधे और मूर्छित हैं।
जीवन का सही मायनों में अर्थ है कि स्त्री-पुरूष जीवन की मर्यादा में एक दूसरे के सच्चे सहायक हों; दोनों एक दूसरे में जो सर्वश्रेष्ठ है, उसे जागृ्त करें ---दोनों एक दूसरे को उठा सकें। दोनों के जीवन को आवृ्त, प्रच्छन्न लक्ष्य एवं सत्व को प्रकाश मिले। लेकिन यह सब सिर्फ आपसी प्रेम से ही संभव है। वह प्रेम, जिसमें एक दूसरे के प्रति सहानुभूति हो और गहरी उदारता हो; जिनमें हम एक दूसरे की बुराईयों की ओर यूं देखें कि मानों कि वें अपनी ही बुराईयाँ हों। जहाँ प्रेम पर बलात्कार न हो, व्यक्तित्व पर जबरदस्ती का बोझ न हो; एक दूसरे के सुख के लिए (सही मायनों में अपने सुख के लिए) अधिकार माँगने की अपेक्षा आत्मार्पण, कर्तव्य पालन पर जोर हो। बिना इन सब बातों कें, चाहे लाख नारी मुक्ति का झंडा उठाए खडे रहें----न तो दाम्पत्य जीवन ही सुखकर हो सकता है ओर न ही समाज में स्त्री की दशा में तनिक भी सुधार हो सकता है----हाँ, पश्चिमी समाज की देखादेखी नारी मुक्ति के नाम पर परिवारों को तोडने का ही हमने अपना उदेश्य बना रखा हो तो फिर इन सब उपरोक्त कही बातों का कोई महत्व नहीं----फिर तो ये नारी मुक्ति की झंडाबरदार जो भी कर रहीं हैं, वो सही हैं। 


एक छोटा सा, और चन्द शब्दों में, इसका हल यही है कि पुरूष-पुरूष बना रहे और नारी- नारी। लेकिन आज तो दोनों ही एक दूसरे की नकल करने में लगे हुए हैं। स्त्री स्वतंत्रता की घोषनाओं  और अपनी सम्पूर्ण वाग्मिता के बीच आज की नारी पुरूष का अनुकरण-मात्र  है। वह एक ओर तो अपने व्यक्तित्व की रक्षा की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर नारी से पुरूष बनने की राह पर बढती चली जा रही है। उसकी दृ्ष्टि अपनी अन्त:गरिमा पर नहीं वरन पुरुष के आचरण,क्रियाकलापों, उसकी उच्छृंख्लता पर है। और इसका अर्थ उसने यह समझा कि वह भी पुरूष के पथ पर अधिकाधिक तीव्र गति से भागने लगी है। वो ये नहीं जानती कि ये अंधी दौड उसे एक ऎसी दिशा में लिए जा रही है, जहाँ आगे चलकर उसका स्वयं का अस्तित्व ही लुप्त हो जाने वाला है। पुरूष बनने के चक्कर में वो अपने स्त्रीत्व को ही समाप्त करने पर तुली हुई है। शायद उसने यह मान लिया है कि पुरूष की नकल करने से ही स्त्री की दशा में सुधार हो सकता है।

लेकिन वो ये नहीं समझ रही कि ये बिल्कुल गलत रास्ता है, भयानक है। जब तक नारी यह अनुभव नहीं करती कि वह पुरूष को निश्चिंतता और आनन्द देने वाली मात्र नहीं है ओर न ही उसके पदचिन्हों पर चल कर उसका कुछ भला होने वाला है, बल्कि सही मायनों में तो समाज को संस्कार प्रदान करने वाली भी नारी ही है; जब तक वो यह नहीं समझती कि वह सिर्फ "रमणी" नहीं है, रमणी से कहीं पहले एक "माता" है, जिसने युगों से सभ्यता का दीपक लेकर उसे बुझने से बचाते हुए अपनी यात्रा जारी रखी है, उसने मानव जाति को दया, ममता, मृ्दुलता और स्नेह का दान दिया है, तब तक नारी मुक्ति के नाम पर किया जा रहा ये सारा प्रपन्च ही हेय है, तब तक कुछ नहीं होने वाला।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें.....:)

पिछले दो एक दिनों पहले की बात है कि जब एक रात हम अपनी मित्र मंडली के साथ किसी गूढ वार्तालाप में व्यस्त थे । खैर उस वार्तालाप का तो कोई निष्कर्ष नहीं निकला लेकिन बैठे बैठे हमारे मन में जरूर एक प्रेरणा सी जग उठी---कि चलें अपनी बीती जिन्दगी का कुछ लेखा जोखा ही मिला लिया जाए । जब मिलाने बैठे तो पता चला कि अपनी तो आधी जिन्दगी यूँ ही निकल गई---अपना खुद का तो कोई मतलब हल हुआ नहीं बल्कि आज तक दूसरे लोग ही अपना मतलब साध कर चलते बने ।
हम तो वहीं के वहीं रह गए--जहाँ से अपनी जीवन यात्रा आरम्भ की थी । यानि की ढाक के वही तीन पात ।
फिर सोचा--चलो खैर जो बीत गया सो बीत गया, उसे भूलकर अब कुछ आगे की सुध ले ली जाए ।
बस उस दिन से मन में ठान ली कि अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें । लेकिन फिर सोचा कि भई आखिर हम करेंगें क्या ? आखिर कुछ करने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए कि नहीं । इधर उधर कुछ लोगों पर नजर दौडाई--जो कि अपने जीवन में कुछ कर चुके और अब तक कर ही रहे हैं ।
सबसे पहले याद आए श्री मधु फोडा जी, जो कि कभी किसी जमाने में नेताओं के सभा सम्मेलनों में पहले पहुँचकर दरिया बिछाया करते थे ओर बाद में वहीं खडे रहकर उनका भाषण सुना करते थे । लेकिन ऊपर वाले की कुछ ऎसी कृ्पा हुई कि दरियाँ बिछाने से शुरू हुआ उनका ये सफर आज मुख्यमन्त्री की कुर्सी तक पहुँच चुका है । वैसे तो इससे आगे का उनका लक्ष्य केन्द्र की सरकार में शामिल होने ओर वहाँ बैठकर देश सेवा करने का था...पर कुछ ग्रह दशा ऎसी खराब शुरू हुई कि एक घोटले में नाम आ गया ओर हाथ से मुख्यमन्त्री की कुर्सी भी जाती रही । लेकिन  उनका कहना है कि अगर सी.बी.आई वालों नें बख्श दिया तो एक दिन आपको इसी देश का प्रधानमन्त्री बन कर दिखाएंगें । वैसे हमारी अन्तरात्मा कह रही है कि उनकी ये इच्छा भी पूरी हो ही जाएगी ।  इन्हे याद करते ही हमारे मन में भी उत्साह का एक इन्जैक्शन सा लग गया ।



फिर याद आए एक अन्य सज्जन ----श्रीमान चालू चक्रम जी । भई क्या कमाल के दृ्ड प्रतिज्ञ इन्सान हैं । पैसा कमाने के मैदान में उतरे तो कर्म-कुकर्म की ओर से आँखें ही मूँद ली । कुछ समय पहले तक कोयले की दलाली किया करते थे---लेकिन बिना अपना मुँह काला कराए न जाने कितनों का काला,पीला,हरा,नीला कर चुके हैं । इन्होने तो इस कहावत को भी मिथ्या सिद्ध कर डाला कि "कोयले की दलाली में मुँह काला"  । एक बार किसी बडी सी कम्पनी वाले से इनकी दोस्ती हो गई तो उसने इनके गुणों को पहचान कर इन्हे अपनी कम्पनी में मैनेजर की नौकरी पर रख लिया । आज ये उस कम्पनी के मालिक हैं और वो बेचारा मालिक इन्ही की कम्पनी में नौकरी कर रहा है । वाह रे भाग्य्!
इन्हे याद करके हमें बडा आत्मिक बल मिला ।


एक भद्र पुरूष ओर याद आए---श्री श्री 10008 बाबा बोल बचन जी महाराज । बचपन में पढाई लिखाई की ओर तो कुछ ध्यान था नहीं बस सारा सारा दिन नशेडियों के साथ बैठकर सुल्फे की चिलम का आनन्द लिया करते थे । इनकी हरकतों से दुखी होकर एक दिन बाप नें घर से निकाल बाहर किया तो राह चलते साधुओं की टोली में शामिल हो गए । वहाँ मुफ्त में चिलम पीते और बाबा लोगों की लंगोटियाँ धोते दिन बडे मजे में कट रहे थे। वहीं उनके बीच रहकर किसी तरह से पुराणों,शास्त्रों की दो चार कथा-कहानियाँ याद करके बस जैसे तैसे लुढकते लुढकते बाबा जी हो गए । साधु लोगों के चरण छूने के प्रताप से आज महाराज, गुरूदेव जैसी  उपाधियों से विभूषित हैं, अलग अलग शहरों में चार-छ: आश्रम खोल रखें हैं, गाडियाँ हैं, चारों ओर भक्तों की भीड लगी रहती है । लोग गले में इनकी तस्वीर जडे लाकेट पहने घूम रहे हैं । इनकी बचपन से ही एकमात्र अभिलाषा थी कि कभी लोग इनके पैर छूँए----आज इनकी ये अभिलाषा पूरी हो चुकी है । बस लगन की बात है :)


भई हम तो इन सब लोगों के कृ्तज्ञ हैं और शपथ लेकर कहते हैं कि हम भी अब कुछ हो के ही रहेंगें । बस भगवान हमें थोडी सी निर्लज्जता बख्श दे ।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

गले का पट्टा

तकनीकी विकास के मामले में जापानियों का लोहा तो आज पूरा विश्व मान रहा है । इनके द्वारा किए जा रहे नित नये आविष्कार देखने सुनने को मिल ही जाते हैं । कभी कभी तो इनके आविष्कार इतने अजीबोगरीब होते हैं कि देख सुनकर हँसी भी आती है ओर इनकी कल्पनाशीलता, खोजी दिमाग की दाद भी देनी पडती है ।
 कुछ दिन पहले हमने कहीं पढा था कि जापान में आदमी तो आदमी कुत्तों के भौंकने पर भी प्रतिबंध लग चुका है । इसके लिए उन्होने एक विशेष प्रकार के पट्टे का आविष्कार किया है जो कि कुत्ते को पहना दिया जाए तो जब भी वो भौंकने के लिए मुँह खोले तो पट्टे में लगा यन्त्र बिजली का एक जोरदार झटका मारता है, बेचारा कुता घबराहट में भौंकना भूलकर तुरन्त अपना मुँह वापिस बन्द कर लेता है । क्या कमाल की चीज इजाद की है भई इन जापानियों नें । मेरा तो यह मानना है कि इन पट्टों की जापान से ज्यादा जरूरत तो यहाँ भारत में हैं । ससुरे जितने भी ये सडकछाप नेता हैं, जो कि समय असमय, मतलब बिना मतलब के लाऊडस्पीकर पर बोलते हुए ऊबते नहीं, या फिर मन्दिरों के पंडित, मस्जिदों के मौलवी, गुरूद्वारों में बैठे वो पाठी जो सुबह सुबह ऊपर वाले के कान के पर्दे खोलने के चक्कर में लोगों को बहरा बनाने पर तुले हुए हैं । जिन्हे न तो ये फिर्क कि बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं या कि इनके शोर से किसी बीमार अस्वस्थ आदमी पर क्या बीतती होगी । बस ये लोग तो ऊपर वाले को बहरा मानकर दिन रात बस उसके कान के पर्दे खोलने में लगे हुए हैं । मैं तो कहता हूँ कि भारत सरकार को जापान से ये पट्टे आयात कर ही लेने चाहिएं और जिस प्रकार से घर घर जाकर बच्चों को 2 बून्द पिलाने का पोलियो उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है, ठीक वैसे ही एक पट्टा अभियान चलाए और चुन चुनकर इन सभी भौंकूओं के गले में पट्टा बाँध दिया जाए । इससे एक तो इनका भौंकना बन्द हो जाएगा ओर दूसरे हम लोग भी कुछ चैन की साँस ले पाएंगें।

वैसे जो लोग बेचारे अपनी बीवी की चपर-चपर से कुछ ज्यादा ही दुखी हैं, उनके लिए भी ये बडे काम की चीज हो सकती है :)

रविवार, 15 नवंबर 2009

भारतवर्ष के बारे में कुछ रोचक तथ्य



भारतवर्ष के बारे में कुछ रोचक तथ्य
  • इतिहास के अनुसार, आज तक भारतवर्ष ने किसी भी अन्य देश पर हमला नहीं किया है।
  • जब अनेक संस्कृतियों 5000 साल पहले ही घुमंतू वनवासी थी, भारतीय सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की।
  • शतरंज के खेल का आविष्कार भारतवर्ष द्वारा ही किया गया है।
  • बीज गणित, त्रिकोण मिति और कलन का अध्‍ययन भारत में ही आरंभ हुआ था।
  • ‘स्‍थान मूल्‍य प्रणाली’ और ‘दशमलव प्रणाली’ का विकास भारत में 100 BC में हुआ था।
  • विश्‍व का प्रथम ग्रेनाइट मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में बृहदेश्‍वर मंदिर है। इस भव्‍य मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़े से बनें हैं, इसका निर्माण चोलवंशीय राजा के राज्‍य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 AD और 1009 AD के दौरान) किया गया था।
  • भारत विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और विश्‍व का छठवां सबसे बड़ा देश तथा प्राचीन सभ्‍यताओं में से एक है।
  • सांप सीढ़ी का खेल तेरहवीं शताब्‍दी में कवि संत ज्ञान देव द्वारा तैयार किया गया था इसे मूल रूप से मोक्षपट कहते थे। इस खेल में सीढियां वरदानों का प्रतिनिधित्‍व करती थीं जबकि सांप अवगुणों को दर्शाते थे। इस खेल को कौडियों तथा पांसे के साथ खेला जाता था। आगे चल कर इस खेल में कई बदलाव किए गए, परन्‍तु इसका अर्थ वहीं रहा अर्थात अच्‍छे काम लोगों को स्‍वर्ग की ओर ले जाते हैं जबकि बुरे काम दोबारा जन्‍म के चक्र में डाल देते हैं।
  • दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान हिमाचल प्रदेश के चायल नामक स्‍थान पर है। इसे समुद्री सतह से 2444 मीटर की ऊंचाई पर भूमि को समतल बना कर 1893 में तैयार किया गया था।
  • भारत में विश्‍व भर से सबसे अधिक संख्‍या में डाक घर स्थित हैं।
  • विश्‍व का सबसे बड़ा नियोक्‍ता भारतीय रेल है, जिसमें पंद्रह लाख से अधिक व्यक्ति काम करते हैं।
  • विश्‍व का सबसे पहला विश्‍वविद्यालय 700 BC में तक्षशिला में स्‍थापित किया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर से आकर अध्‍ययन  करते थे। नालंदा विश्‍वविद्यालय चौथी शताब्‍दी में स्‍थापित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
  • आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्‍सा शाखा है। शाखा विज्ञान के जनक माने जाने वाले चरक में 2500 वर्ष पहले आयुर्वेद का समेकन किया था।
  • भारत 17वीं शताब्‍दी के आरंभ तक ब्रिटिश राज्‍य आने से पूर्व विश्व का सबसे सम्‍पन्‍न देश था। क्रिस्‍टोफर कोलम्‍बस ने भारत की सम्‍पन्‍नता से आकर्षित हो कर ही भारत आने का समुद्री मार्ग खोजना चाहा, लेकिन गलती से भारत की अपेक्षा अमेरिका पहुँच गया।
  • नौवहन की कला और नौवहन का जन्‍म 6000 वर्ष पहले सिंध नदी में हुआ था। दुनिया का सबसे पहला नौवहन संस्‍कृ‍त शब्‍द नव गति से उत्‍पन्‍न हुआ है। शब्‍द नौ सेना भी संस्‍कृत शब्‍द नोउ से हुआ।
  • भास्‍कराचार्य ने खगोल शास्‍त्र के कई सौ साल पहले पृथ्‍वी द्वारा सूर्य के चारों ओर चक्‍कर लगाने में लगने वाले सही समय की गणना की थी। उनकी गणना के अनुसार सूर्य की परिक्रमा में पृथ्‍वी को 365.258756484 दिन का समय लगता है।(लेकिन श्रेय विदेशी ले गए)
  • भारतीय गणितज्ञ बुधायन द्वारा ‘पाई’ का मूल्‍य ज्ञात किया गया था और उन्‍होंने जिस संकल्‍पना को समझाया उसे ही आज हम पाइथागोरस का प्रमेय कहते हैं। उन्‍होंने इसकी खोज छठवीं शताब्‍दी में की, जो यूरोपीय गणितज्ञों से काफी समय पहले की गई थी।( मूल खोजकर्ता का आज कोई नाम भी नहीं जानता, लेकिन सारी दुनिया समझती है कि ये पाईथागोरस की खोज है)
  • बीज गणित(Algebra), त्रिकोण मिति और कलन का उद्भव भी भारत में हुआ था। चतुष्‍पद समीकरण का उपयोग 11वीं शताब्‍दी में श्री धराचार्य द्वारा किया गया था। ग्रीक तथा रोमनों द्वारा उपयोग की गई की सबसे बड़ी संख्‍या 106 थी जबकि हिन्‍दुओं ने 10*53 जितने बड़े अंकों का उपयोग (अर्थात 10 की घात 53), के साथ विशिष्‍ट नाम 5000 BC के दौरान किया। आज भी उपयोग की जाने वाली सबसे बड़ी संख्‍या टेरा: 10*12 (10 की घात12) है। (कहीं कोई श्रेय नहीं )
  • सुश्रुत को शल्‍य चिकित्‍सा (Surgery) का जनक माना जाता है। लगभग 2600 वर्ष पहले सुश्रुत और उनके सहयोगियों ने मोतियाबिंद, कृत्रिम अंगों को लगना, शल्‍य क्रिया द्वारा प्रसव, अस्थिभंग जोड़ना, मूत्राशय की पथरी, प्‍लास्टिक सर्जरी और मस्तिष्‍क की शल्‍य क्रियाएं आदि की।
  • निश्‍चेतक(Anesthesia) का उपयोग भारतीय प्राचीन चिकित्‍सा विज्ञान में भली भांति ज्ञात था। शारीरिकी, भ्रूण विज्ञान, पाचन, चयापचय, शरीर क्रिया विज्ञान, इटियोलॉजी, आनुवांशिकी और प्रतिरक्षा विज्ञान आदि विषय भी प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पाए जाते हैं।
  • भारत से 90 देशों को सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है।
  • भारत में 4 धर्मों का जन्‍म हुआ – हिन्‍दु धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म ओर सिक्‍ख धर्म, जिनका पालन दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा करता है।
  • भारत में 3,00,000 मस्जिदें हैं जो किसी अन्‍य देश से अधिक हैं, यहां तक कि मुस्लिम देशों से भी अधिक।
  • भारत में सबसे पुराना यूरोपियन चर्च और सिनागोग कोचीन शहर में है। इनका निर्माण क्रमश: 1503 और 1568 ईस्वी में किया गया था।
  • ज्‍यू और ईसाई व्‍यक्ति भारत में क्रमश: 200 BC और 52 AD से निवास करते हैं।
  • विश्‍व में सबसे बड़ा धार्मिक भवन अंगकोरवाट, हिन्‍दु मंदिर है, जो कम्‍बोडिया में 11वीं शताब्‍दी के दौरान बनाया गया था।
  • तिरुपति शहर में बना विष्‍णु मंदिर 10वीं शताब्‍दी के दौरान बनाया गया था, यह विश्‍व का सबसे बड़ा धार्मिक गंतव्‍य है। रोम या मक्‍का धामिल स्‍थलों से भी बड़े इस स्‍थान पर प्रतिदिन औसतन 30 हजार श्रद्धालु आते हैं और लगभग 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रति दिन चढ़ावा चढता है।
  • भारत द्वारा श्रीलंका, तिब्‍बत, भूटान, अफगानिस्‍तान और बंगलादेश के 3,00,000 से अधिक शरणार्थियों को सुरक्षा दी जा रही है, जो धार्मिक और राजनैतिक अभियोजन के फलस्‍वरूप वहां से निकल गए/निकाल दिए गए हैं।
  • युद्ध कलाओं का विकास सबसे पहले भारत में किया गया और ये बौद्ध धर्म प्रचारकों द्वारा पूरे एशिया में फैलाई गई।
  • योग कला का उद्भव भारत में हुआ है और यहां 5,000 वर्ष से अधिक समय से मौजूद हैं। 
आज भारत सरकार की अधिकारिक वैबसाईट(http://bharat.gov.in) देखने का मौका मिला तो वहाँ  इस प्रकार की एक सूची दिखाई दी, तो सोचा कि आप लोगों के साथ बाँटी जाए । कम से कम इसी बहाने अपने देश के उज्जवल पक्ष से परिचित हो गर्वोंन्वित तो हुआ ही जा सकता है ।

सोमवार, 2 नवंबर 2009

चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत .........

कभी कभी सोचता हूँ कि पता नहीं ईश्वर ने कुछ लोगों को ऎसा क्यों बनाया है,जिन्हे कि आप चाहे लाख समझा लें, लेकिन फिर भी करेंगें वो लोग वही,जो कि उनके दिमाग में पहले ही कूट कूटकर भरा जा चुका है । इन्सान का मुखौटा पहनकर घूम रहे ये भेडिए पता नहीं समाज को किस ओर ले जाना चाहते हैं । 

रहिमन लाख भली करौ, इनका जिद्द न जाए
राग सुनत, पय पियतहू, सांप सहजहि घर खाए ।।


हर पोस्ट में गारी मिलत हैं, लोग रहे चिल्लाहिं
रहिमन करूए लिखन कौ, चहियत यही सजाहिं ।।


आप न काहू काम के, डार,पात,फल मूर
औरन को रोकत फिरैं, आपहूं वृ्क्ष बबूर ।।


रहिमन ऎसे लोगन ते, तजो बैर औ प्रीत
चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत ।।

रविवार, 20 सितंबर 2009

भगवान हजरत मोहम्मद की जय.......पैगम्बर रामचन्द्र की जय!!!!!!

इस लेख को पढने वाले सभी पाठकों विशेष रूप से मुसलमान भाईयों को एक बात मैं पहले ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इसे पढते समय कृ्प्या इस दृ्ष्टिकोण से न सोचें कि यह एक हिन्दू द्वारा लिखा गया है।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि कहीं आप लोग ये न सोचें कि मैं किसी धर्म विशेष की तरफदारी कर रहा हूँ। आप सब से निवेदन है कि कृ्प्या एक बार खुले दिमाग से विचार करके देखें कि आखिर हमारें में ऎसी कौन सी कमियाँ हैं,जिससे कि इस देश,दुनिया और समाज के साथ ही साथ अब इस ब्लागजगत में भी हिन्दू और मुसलमान के नाम पर आपस में दूरियाँ बढती चली जा रही हैं, क्यूं हम दूसरे के धर्म का सम्मान न करके सिर्फ अपनी ही अपनी हाँकने में लगे हुए हैं।
एक सच्चे धार्मिक व्यक्ति का यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि वो महापुरूषों,संतो-महात्माओं के वचनों का पालन करे,उनके दिखाए मार्ग का अनुसारण करे,अब वो महापुरूष चाहे किसी भी धर्म,जाति,सम्प्रदाय से संबंध क्यों न रखते हों। वैसे भी सत्पुरूष धर्मों और जातियों के बंधन से परे होते हैं---- उनकी शिक्षाएं,उनके विचारों को किसी धर्म,देश या काल के बन्धन में नहीं बाँधा जा सकता,उनके विचार सब के लिए उतने ही उपयोगी हैं,जितने कि उस धर्म विशेष के मानने वाले के लिए-----हजरत मोहम्मद जितना आपके हैं,उतने ही मेरे भी हैं। अब यदि मैं "जय मोहम्मद,जय मोहम्मद" कहूँ तो क्या कोई मुझे रोक सकता हैं---हर्गिज नहीं। ये मेरी इच्छा है कि मैं अपने ईश्वर को किस रूप में ध्याता हूँ। ऎसा करने से मुझे न तो कोई कुरआन रोक सकती है,न गीता और न ही इस देश का कानून।
एक बात ओर (जैसा कि मैने पहले भी कहा है) कि किसी भी व्यक्ति के लिए महापुरूषों,सन्तों की आज्ञा,उनके वचन शिरोधार्य होने चहिए--------आप हजरत साहब और कुरआन के फरमाबर्दार हैं,होना भी चाहिए;लेकिन कुरआन में शायद ये कहीं नही लिखा होगा कि आप लोग अपने धर्म का प्रचार करने के लिए दूसरे धर्म के धर्मग्रन्थों का आश्रय लें,उनसे तुलना करें। होना तो ये चाहिए कि हम अपने धर्मग्रंथों की शिक्षाओं पर अमल करते हुए पहले स्वयं उन्हे अपने व्यवहार में सम्मिलित करें,फिर बाकी समाज को भी उससे अवगत कराया जाए ताकि समाज भी उनसे लाभान्वित हो सके। ये नहीं कि अपने धर्म को बडा दिखाने के उदेश्य से हम लोग अन्य दूसरे धर्मों से उसकी तुलना करने बैठ जाएं।  अब हजरत साहब नें अपनी जिन्दगी में सैंकंडों,हजारों बार ये कहा है कि "मैं एक मामूली आदमी हूँ" तो क्या उनका हुक्म मानने के नाम पर आप लोग उन्हें मामूली आदमी ही मानने लगेंगें। चलिए हजरत तो ईश्वर के दूत थे, आपके सामने कोई उच्च पद प्राप्त या फिर कोई ऊंची शख्सियत का व्यक्ति आए और शालीनता दिखाते हुए कहे कि भई मैं तो एक नाचीज,अदना सा आदमी हूँ तो क्या आप लोग उनके व्यक्तित्व अनुसार व्यवहार न करते हुए उन्हे नाचीज और अदना इन्सान मान लेंगें?। अगर नहीं तो फिर हमें इस देश के दूसरे पैगम्बरों(श्रीराम,कृ्ष्ण,बुद्ध,नानक इत्यादि) को भी उसी दृ्ष्टि से देखना चाहिए,जिस दृ्ष्टि से हम हजरत मोहम्मद साहब को देखते हैं।

 मैं आप लोगों से सिर्फ इतना जानना चाहूंगा कि क्या आप इस्लाम के इस फरमान को नहीं मानते  कि "दुनिया के सभी मजहब सच्चे है"हर मुल्क और हर कौम में अल्लाह नें अपने पैगम्बर भेजे हैं। तो फिर ऎसी हालत में हजरत रामचन्द्र जी या हजरत कृ्ष्ण जी कहने में आप लोगों को क्या ऎतराज है।  मुहम्मद साहब की जय बोलते हैं तो फिर रामचन्द्र जी की जय बोलने में किसी को क्या बुराई है? भई इससे तो आपसी मोहब्बत ही बढेगी और मोहब्बत जैसे धर्म के आगे तो दुनिया के सभी धर्म फीके हैं।

जब इस्लाम मानता है कि हर कौम और मजहब के पैगम्बर अल्लाह के ही भेजे गए पैगम्बर हैं और हिन्दू भी मानता है कि जगत की समस्त विभूतियाँ ईश्वर का अंश हैं तो इस प्रकार आपके मजहब के मुताबिक राम,कृ्ष्ण,बुद्ध,महावीर वगैरह भी अल्लाह के पैगम्बर हैं और हिन्दी धर्म के मुताबिक ईसा,मुहम्मद वगैरह "ईश्वर के अंश" हैं,बल्कि हिन्दू धर्म नें तो अपना ढाँचा ही ऎसा बना लिया है कि जो जो हिन्दूस्तान में आकर बसता जाए,वो अपनी विशेषताएं रखते हुए भी हिन्दू मजहब कहलाता जाए। हिन्दू धर्म के इस ढाँचे का फायदा उठाकर क्यों न देश के धार्मिक झगडों,विवादों,तनावों को दफनाकर आपसी प्रेम और सौहार्द का वातावरण निर्मित किया जाए.......तो फिर इस नेक काम की आज से ही शुरूआत करते हुए हम भी बोलते हैं कि "भगवान हजरत मोहम्मद की जय"  और आप भी बोलिए कि "पैगम्बर रामचन्द्र जी की जय"

बुधवार, 19 अगस्त 2009

प्रेम विवाह

पत्नि:- "हे राम्! तुमसे लव मैरिज करके तो मेरी दुनिया ही उजड गई। लगता है शायद मेरी बुद्धि पर ही पत्थर पड गये थे जो मैने ऎसा कदम उठाया।"
पति:-" किसी दुनिया उजड गई? तुम्हारी या मेरी?"
पत्नि:- "तुम्हारी क्या खराब हुई! परिवार छूटा मेरा; बन्धन में फँसी मैं; पोजीशन गिरी मेरी। शादी के बाद तो तुम्हारी आँखे ही बदल गई।"
पति"- "क्या आँखें बदली मैने?"
पत्नि:- " क्या नहीं बदला? शादी से पहले जितना प्रेम दिखाते थे,आज उसका सौवाँ हिस्सा भी करते हो? बस हर बात पर हाथ चलाना और आँखें दिखाना जरूर सीख लिया तुमने।"
पति:- "तो! तुम क्या चाहती हो कि सारी जिन्दगी मैं तुम्हारे इशारों पर नाचता फिरूँ?"
पत्नि:- जो काम जिन्दगी भर नहीं कर सकते थे,उसका ढोंग चार दिनों के लिए क्यूं किया था? झूठे वादे करके मुझे क्यूं अपने जाल में फंसाया तुमने?"
पति:- " क्या झूठा ढोंग मेरा था? तुमने कोई ढोंग नहीं किया?  कहाँ गई वह इज्जत? कहाँ गया वो प्रेम,आदर-सत्कार? कहाँ गई वह मुस्कुराहट? सब कुछ तो खत्म हो गया!  अब तो मैं सिर्फ कमाकर लाने और तुम्हारा बोझा ढोने वाला एक बैल बन कर रह गया हूँ।"
पत्नि:- बैल? बैल नहीं बल्कि तुम तो एक साँड हो,जिसे कि सिर्फ फुँकारे मारने आते हैं। अब जीवन में मुस्कुराहट रह ही कहाँ गई है जो चेहरे पे दिखाई दे। मेरा जीवन तो तुमने झुलसा ही डाला है।"
पति:- "ऎसी क्या आग लगा दी मैने कि तुम्हारा जीवन झुलस गया?"
पत्नि:- इतना कुछ हो जाने के बाद भी तुम ये पूछते हो कि कैसी आग लगा दी! तुमसे शादी करके मैने अपने घर वालों की नाराजगी मौल ली। अब यहाँ तुम से ओर तुम्हारी माँ से सारा दिन जल कटी सुनने को मिलती है;कुत्ते जैसी जिन्दगी बना डाली तुमने मेरी। कहाँ अपने मायके में राज किया करती थी,लेकिन आज तुमने पैसे पैसे के लिए मौहताज कर दिया है।देख लेना अब छोडूंगी नहीं मैं तुम्हे। "
 पति:- क्या करोगी? तलाक ही दे दोगी न !"
पत्नि:- " यह तो भाग्य में अब बदा ही है। लेकिन उससे पहले तुम्हारी भी जिन्दगी मैने नरक न बना दी तो कहना!"
पति:- "अच्छा! तो अब तुम मेरी जिन्दगी नरक बनाओगी!"
पत्नि:- "जब तुमने मेरी जिन्दगी में आग लगा डाली है तो क्या उसका थोडा सा सेंक भी तुम्हे नहीं लगेगा?  तुमने मेरा परिवार मुझसे छुडा दिया; मुझे न इधर का छोडा ओर न उधर का और अब इस घर में भी आग लगा डाली। अब मेरे पास जलने के सिवाय ओर कोई रास्ता भी कहाँ है,सो जलूंगी ओर खूब जलूंगी;इतना जलूंगी कि उसकी लपटों में जलाने वाला भी खुद जल जाये।"
यह कहती,अपने बाल नौंचती हुई कमरे के बाहर निकल जाती है और पति महाश्य अपना सिर पीटता हुआ धम से जमीन पर गिर पडता है।
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समयाभाव के कारण बहुत दिनों से कोई पोस्ट ही नहीं लिखी जा रही थी। यूँ भी मेरा ध्यान अधिकतर अपने ज्योतिष की सार्थकता नामक ब्लाग पर ही केन्द्रित रहता है। यहाँ तो, अगर कभी कुछ मन किया तो लिख लिया,वर्ना छुट्टी। आज इस पोस्ट में प्रेमविवाह के परिणामस्वरूप आगामी गृ्हस्थ जीवन में यदाकदा निर्मित हो जाने वाली विषम स्थितियों को चित्रित करने का प्रयास किया है,अगली पोस्ट में इसी प्रसंग को आप एक नये नजरिये से देखेंगे।

बुधवार, 29 जुलाई 2009

राज भाटिया जी को मातृ शोक!!

कल दोपहर के समय जब ताऊ का फोन आया तो उन्ही से पता चला कि अपने राज भाटिया जी इण्डिया आए हुए हैं। क्यों कि कुछ दिनों पहले उनकी माता जी का देहान्त हो चुका है और वो आज ही उनकी अस्थियों को व्यास नदी में विसर्जित करने के लिए अमृ्तसर के लिए निकल चुके हैं। जब भाटिया जी को फोन लगाया तो पता चला कि वो कुछ ही देर में लुधियाना पहुँचने वाले हैं। बस तुरत फुरत में उनसे कुछ पलों के लिए रास्ते में ही मिलना हो पाया,क्यों कि हिन्दु मान्यताओं के अनुसार अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए जाते समय रास्ते में कहीं ठहराव नहीं किया जाता। इसलिए घर न आ पाने की उनकी इस विवशता को समझते हुए बीच रास्ते में ही मुलाकात हो पाई। ब्लाग के माध्यम से लगभग पिछले एक वर्ष से जब से उनसे परिचय हुआ है,मैने उनसे एक बडा आत्मीय सा रिश्ता अनुभव किया है। मेरे मन में उनके प्रति जो एक छवि निर्मित हो चुकी थी,मिलने पर उन्हे बिल्कुल हूबहू वैसा ही पाया। बेहद मिलनसार,भले एवं सज्जन व्यक्ति।।
उनसे मिलने की मन में एक इच्छा तो थी,लेकिन मुलाकात इस प्रकार से ऎसे दुखद मौके पर होगी,इस प्रकार की आशा नहीं की थी। 
ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो उनकी माता जी की आत्मा को शान्ती प्रदान करे और उनके परिवार को इस दुख की घडी में साहस प्रदान करे।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

आखिर दस लाख का सवाल है भई!!!!!!!!

एक प्रतियोगिता जिसमे भाग ले रहे हैं 12 प्रतियोगी।जिसमें जीतने वाले को ईनाम के रूप में मिलेंगे पूरे 10 लाख रूपये। जी हाँ पूरे 10 लाख!। वैसे दस लाख बहुत बडी रकम होती है न!!जिसके भाग्य में विजेता बनना लिखा होगा उसकी तो जैसे लाटरी ही खुल जाएगी।इन रूपयों से आप अपने लिए कोई गाडी खरीद सकते हैं,मकान ले सकते हैं और चाहे तो बीवी बच्चों को (या किसी ओर को!)लेकर कहीं घूमने जा सकते हैं। यानि कि दस लाख रूपयों में आपकी बहुत सारी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं। यार दोस्तों,मुहल्ले,नाते-रिश्तेदारों में नाम होगा वो अलग। सभी आपके भाग्य को सराहेंगे कि भई मुकद्दर हो तो इन जैसा। क्या किस्मत पाई है-पूरे दस लाख रूपये जीत कर आए हैं। माना कि इनमे से कुछ ईर्ष्या करने,जलने भुनने वाले लोग भी होंगे। लेकिन ये तो एक अच्छी बात है, समाज में जब तक सौ पचास लोग अपने से ईर्ष्या करने वाले न हों तो तब तक आदमी के स्टेटस का पता भी नहीं चलता।जब कुछ पास में होगा तभी तो जलने वाले होंगे न। जिसके पल्ले कुछ है ही नहीं उससे भला कौन जलेगा।

खैर जाने दीजिए लोगों का तो काम ही जलना है,उन्हे जलने दीजिए। हाँ तो हम कहाँ थे? हाँ याद आया हम बात कर रहे थे प्रतियोगिता की जिसके विजेता को मिलेंगे पूरे 10 लाख रूपये। ये दस लाख का जिक्र होते ही पता नहीं क्यूं मुझे बार बार चक्कर सा आने लगता है, शायद बहुत बडी रकम है न इसलिए। वैसे भी हमने अपनी सारी जिन्दगी में दस लाख रूपये इकट्ठे देखे कहाँ हैं सो चक्कर आना तो जायज है:)।
आप लोग भी सोच रहे होंगे कि ये क्या दस लाख-दस लाख लगा रखी है; पूरी बात तो बता ही नहीं रहे। खैर चलिए बताए देते हैं तनिक धीरज तो रखिए भाई। हाँ तो ये दस लाख रूपये आप भी जीत सकते हैं वो भी बडी  आसानी से, बिना कुछ खास मेहनत किए।
जैसा कि मैने आपको बताया कि एक प्रतियोगिता है जिसमें 12 लोग भाग लेंगे, उनमे से 11 लोगों को हरा कर जो आखिरी प्रतियोगी बच जाएगा, वो ईनाम के पूरे 10 लाख रूपये(लो जी फिर से चक्कर आने लगे!) अपने घर ले जाएगा।
क्या कहा! उसके लिए हमें करना क्या होगा?।
अरे बता रहे हैं भाई! तनिक धीरज नाम की भी कोई चीज होती है कि नाहीं। 10 लाख क्या ऎसे फोकट में ही मिल जाएगा, उसके लिए कछु न कछु तो करना ही पडेगा न।
हाँ तो चलिए बताए देते हैं कि आपको क्या करना होगा। प्रतियोगिता में कईं राउण्ड होंगें। हरेक राऊण्ड मे से एक हारने वाला प्रतियोगी बाहर निकलता जाएगा। आखिर में जो बचेगा वो बन जाएगा लखपति.पूरे दस लाखपति।

सबसे पहले राउण्ड में आप लोगों के सामने एक प्लास्टिक का बडा सा भगोना टाईप कोई बर्तन रखा जाएगा। जिसमे होगा लाल लाल टमाटरों का सूप। सूप का नाम सुनकर आपके मुँह में पानी काहे आने लग पडा भाई। तनिक ठहरिए अपनी जीभ को कन्ट्रोल में रखिए और आगे भी सुन लीजिए। हाँ तो सुनिए, टमाटरों के सूप में होंगे ढेर सारे बाल। आपको क्या करना है कि अपने हाथ पीठ पीछे बाँधकर उस भगोने में से वो बालामृ्त पेय अपने मुँह में भरकर पास में ही रखे दूसरे वाले एक भगोने में डालना है। यानि कि बिना हाथों का प्रयोग किए सिर्फ मुँह के जरिए उस भगोने को पूरा का पूरा खाली करना है। बारी बारी से सभी प्रतियोगियों को वो भगोना खाली करना पडेगा लेकिन न तो वो बर्तन बदला जाएगा और न ही वो बालों वाला टमाटो सूप।
क्या कहा! ये तो सब का मुँह से निकला जूठन है, हम नहीं करेंगे।
अरे भाई ऎसा काहे सोचते हो। एक दूसरे का जूठन से तो आपस में प्रेम बढ्ता है। फिर दस लाख रूपयों का भी तो सवाल है।
लो जी आगे की सुनिये, अगले राऊण्ड में आपको एक बडी सी जिन्दा मछली दी जाएगी जिसे आपको अपने दातोँ से छीलकर छोटे छोटे टुकडों में बाँटना होगा।
अरे! आप तो फिर से बिदकने लगे। क्या कहा! ये तो जानवरों का काम है।
अजी छोडिए,आप भी इक्कीसवीं सदी में रह के न जाने कौन से जमाने की बात कर रहे हैं। जब बिना ब्याह किए ही लडका-लडकी इकट्ठे रह सकते हैं, फैशन के नाम पर कपडों का त्याग करके नंगा रहा जा सकता है तो फिर आप ये इत्ता सा काम करने में काहे बिदक रहे हैं भाई। वैसे भी, दस लाख क्या ऎसे ही फोकट में मिल जाएंगे। खैर छोडिए आप आगे सुनिए।
तीसरे राऊण्ड में आपको ज्यादा कुछ खास नहीं करना है। आपको एक हाथ में गोबर लेकर ( जित्ता जोर से खींचकर मार सकते हैं) सामने वाले के मुँह का निशाना बाँधकर मारना है। अगर आपका निशाना सही लग गया तो समझिए आप अगले राऊण्ड के लिए पास वर्ना घर जाकर पहले निशाना लगाने की प्रैक्टिस कीजिए। तब अगली बार भाग लीजिएगा।
अभी आपको तीन राऊण्ड के बारे में बता दिया है। अगर आप यहाँ तक पहुँच गए तो बाकी के राऊण्ड के बारे में भी आपको आगे बता दिया जाएगा। वैसे चिन्ता मत कीजिए आगे भी कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है। बहुत ही आसान है जैसे कि जिन्दा कीडे मकोडे खाना वगैरह वगैरह।
क्या कहा! ये तो पाप है!
लो कल्लो बात। भई आप ऎसा क्यूँ सोचते हैं। आप ये जानिए कि ऎसा करके एक तरह से आप पुण्य का ही काम कर रहे हैं।
कैसे?
भाई मेरे कीडे मकोडों की जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है। आप तो एक तरह से इन्हे इस कीट योनि से मुक्ति प्रदान कर रहे हैं। है न पुण्य का काम्! बस आँख मूंदकर और अपने भगवान का (या फिर शैतान का) नाम लेकर झट से मुँह में डाल लीजिएगा। वैसे भी इनमे कोन सी कोई हड्डी वगैरह होती है।
क्या कहा! आप इसमें हिस्सा नहीं लेंगे।
अजी छोडिए! नहीं भाग लेना तो न सही। हम कौन सा आपके भरोसे बैठे हैं।भाई मेरे ये आज का इण्डिया है, यहाँ  बिना ढूँढे भी हजारों-लाखों मिल जाएंगे जो कि चन्द पैसों के लिए जूठन,गोबर और कीडे-मकोडे तो क्या आदमी का माँस भी खा जाएँ। यहाँ तो फिर भी दस लाख रूपयों का सवाल है।

वैसे तो मैं टेलीवीजन जैसी बीमारी से बिल्कुल ही दूर रहने वाला प्राणी हूँ। ज्यादा से ज्यादा कभी महीने बीस दिन में समाचार सुनने का मन किया तो देख लिया वर्ना नहीं। परसों समाचारों के लिए जैसे ही टी.वी देखने का मन बना तो देखा कि बेटा अपने कमरे में बैठा बडा मग्न होकर कोई कार्यक्रम देख रहा है। मन में उत्सुकता हुई कि देखूँ तो सही कि ये इतने ध्यान से कौन सा कार्यक्रम देख रहा है। मैने पूछा कि बेटा क्या देख रहे हो? तो झट से बोला कि पिता जी देखिए बहुत बढिया प्रोगाम आ रहा है, इसमें जीतने वाले को दस लाख रूपये ईनाम में मिलेंगे। मैंने लगभग दस पन्द्रह मिन्ट उसके साथ बैठकर वो प्रोग्राम देखा होगा कि बस इतने में ही दिमाग भन्ना गया। क्या देखता हूँ कि प्रतियोगीयों को कभी जूठन खाने का कहा जा रहा है,कभी मुँह पर गोबर मलना तो कभी जिन्दा मछली खाने को और प्रतियोगी भी अपने अपने क्रम से बडी आसानी से हँसते मुस्कुराते हुए किए जा रहे हैं। सारे के सारे प्रतियोगी अच्छे घरों के दिखाई दे रहे थे,जिनमें लडके-लडकियाँ दोनो शामिल थे। सिर्फ 15 मिन्ट ही वो कार्यक्रम देखा होगा कि गुस्से से दिमाग ऎसा भन्नाया कि सबसे पहला काम ये किया कि झट से केबल की तार निकालकर साईड मे इकट्ठी करके रखी। कल केबल वाले को बोलकर कनैक्शन भी कटवा दिया।

लेकिन कल से एक बात जो दिमाग से निकल ही नहीं रही कि आखिर इन्सान पैसों के लिए क्या कुछ कर सकता है। हम लोग देखते हैं कि अक्सर मीडिया को दोष दिया जाता है कि वो समाज को पतन की ओर मोड रहा है।लेकिन मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि जो लोग इनाम के लालच में ऎसे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं उनकी बुद्धि क्या घास चरने चली जाती है। कल को कोई चैनल ऎसा कार्यक्रम बनाए जिसमें कि प्रतियोगिओं को इन्सान का माँस खाना पडे,मल-मूत्र का सेवन करना पडे तो इसका मतलब कि लोग तो वो भी करने को तैयार हो जाएंगे। 
हे प्रभु! पता नहीं इन्सान क्या से क्या बनता जा रहा है। किसी ने शायद सच कहा है कि पैसा इन्सान से कुछ भी करा सकता है।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

पीर पराई जानिए!!!!!!!!

श्रावण मास में की जाने वाली कांवड यात्रा से तो हरेक व्यक्ति भली भान्ती परिचित है। एक अलग ही पहचान और महत्व है इस यात्रा का। पाप नाशिनी गंगा और भगवान भोलेनाथ के प्रति असीम मानवीय श्रद्धा का प्रतीक है ये कांवड यात्रा।

इसी कांवड के प्रसंग में ही एक प्राचीन कथानक स्मरणीय है------एक बार संत एकनाथ जी गंगोत्री से कांवड़ लेकर, रामेश्वर की ओर पैदल यात्रा करते हुये जा रहे थे। साथ में हीं उनके कई संगी-साथी भी चल रहे थे। रास्ते में उन्हे एक ऐसे स्थान से गुजरना हुआ जहाँ कि पानी का अत्यन्त अभाव था। चलते चलते एक जगह उन्होने देखा कि बीच रास्ते में एक गदहा प्यास से व्याकुल होकर तड़प रहा है। राह चलते लोग उसे देखते और आगे निकल जाते। एकनाथ जी उस रास्ते से जाते समय यह नज़ारा देखकर शास्त्रों की, संतो की यह बात याद करने लगे कि "हर प्राणी में ईश्वर का वास है। यह देह ही देवालय है और इस देह में यह चेतन देव ही शिव है। जब गदहे के रुप में यह चेतन देव तड़प रहे हैं तो इन्हें इस हालत में छोड़कर मैं रामेश्वर कैसे जा सकता हूँ? मैं तो अपने शिव को यहीं मनाऊँगा।" ऐसा सोचकर वह हर-हर महादेव कहते हुए गंगाजल गदहे के मुँह में डालने लगे। उनके सभी संगी-साथियों और राह चलते अन्य लोगों ने भी बहुत समझाया कि अरे! क्यूँ मूर्खों वाला काम रहे हो। ये तो गदहा है। मर भी जायेगा तो क्या फर्क पड़ जाएगा ? लेकिन एकनाथ तो सच्चे संत थे। हर जीव में ईश्वर का दर्शन करते थे। और चमत्कार यह हुआ कि उसी गदहे के मुख में उन्हें साक्षात भगवान भोलेनाथ के दर्शन हो गए।

इस प्रसंग को लिखने का मेरा प्रयोजन आप सब को सिर्फ ये याद दिलाना है कि किसी का दिल दुखाकर,किसी का अपमान करके की गई भक्ति, पूजन कभी सफल नहीं हो सकती। किसी दुखी/पीड़ित की उपेक्षा करना तो एक तरह से ईश्वर का ही अपमान है। इसलिए चाहे हम मंदिरों/मस्जिदों/गुरूद्वारों में जितने मर्जी शीश झुका लें,सुबह शाम घण्टे-घडियाल बजा लें किन्तु जब तक किसी के दुख को देखकर हमारा अन्तरमन द्रवित नहीं जो जाता, हमारे ह्र्दय में दया का भाव जागृ्त नहीं हो जाता तो हमारा भजन-पूजन, दान-पुण्य करना सब व्यर्थ है।
एक निवेदन:- यदि अपने आसपास आपको कोई रोगी,लाचार,गरीब व्यक्ति मिले तो उसकी यथासंभव मदद करने की चेष्टा करें ओर जो बेचारे बेजुबान पशु-पक्षी भूख प्यास और गर्मी से व्याकुल होकर प्राण त्यागने को विवश हो रहे हैं, उनके लिए भी हमारा कुछ कर्तव्य बनता है।यदि हम सिर्फ इतना ही करने में सक्षम हो सकें तो यही हमारे लिए ईश्वर की सबसे बडी पूजा होगी।

जय भोले नाथ............

गुरुवार, 25 जून 2009

चन्द लतीफे..........

 तन्दरूस्ती का राज
हाल ही में हमारे पड़ोस में एक बूढ़े सज्जन रहने को आये । काफी खुशमिजाज और जवांदिल लगते थे।

एक दिन मैंने उनसे पूछा - आप उम्र के लिहाज से काफी तन्दुरुस्त और खुश दिखते हैं । आपके सुखी जीवन का राज क्या है ?

- मैं रोज तीन पैकेट सिगरेट पीता हूं । शाम को व्हिस्की का अध्दा और बढ़िया मसालेदार खाना खाता हूं। और हां, व्यायाम तो मैं कभी नहीं करता।

- कमाल है । मैं आश्चर्य से भर गया।
मैंने फिर पूछा - वैसे आपकी उम्र क्या होगी ?

- छब्बीस साल ।
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फिजूल खर्ची
एक जापानी महिला अपनी सहेली के साथ सिंगापुर की सड़कों से गुजर रही थी। तभी एक महिला ने अपने प्रेमी को खिड़की के बाहर धक्का दिया जो नीचे रखे कूड़ेदान में जा गिरा।

यह देखकर जापानी महिला ने अपनी सहेली से कहा - ये सिंगापुरी महिलाएं बहुत फिजूलखर्च होती हैं।

- वो कैसे ? सहेली ने पूछा ।

- अब देखो न ! यह आदमी अभी और चार-पांच साल इसके काम आ सकता था।
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तरक्की की सीढी
बॉस ने अपने एक कर्मचारी को ऑफिस में बुलाया और कहा - मि. गोपाल, तुमने एक साल पहले यह कंपनी बतौर क्लर्क ज्वाइन की थी। चार महीने के भीतर ही तुम्हारा प्रमोशन मैनेजर के पद पर हो गया। उसके चार महीने बाद तुम कंपनी के वाइस-चेयरमेन पद तक पहुंच गए। मेरे विचार से अब समय आ गया है कि तुम इस कंपनी का पूरा भार ग्रहण कर लो और मैं रिटायरमेंट ले लूं।

- जी । कर्मचारी ने कहा।

- तुम इस संबंध में कुछ कहना चाहते हो।

- जी हां। मैं आपको थैंक्यू कहना चाहता हूं।

- बस सिर्फ थैंक्यू ? और कुछ नहीं कहना ।

- ओह सॉरी ! थैंक्यू पापा ........ !
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त्रासदी
एक मंत्रीजी एक स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे । बच्चों से बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा कि क्या कोई बच्चा त्रासदी को उदाहरण देकर समझा सकता है।

एक छोटे बच्चा खड़ा हुआ और बोला - यदि किसी बच्चे को सड़क पार करते समय कोई कार कुचल दे तो यह एक त्रासदी होगी।

- नहीं बेटे .... । मंत्री जी ने टोका - यह तो एक दुर्घटना कही जाएगी।

एक दूसरे बच्चे ने बताया - यदि कोई स्कूल बस पुल से गिर जाए और उसमें बैठे सभी लोग मारे जाएं तो यह एक त्रासदी होगी।

- नहीं ... नहीं ... । मंत्री जी ने कहा - यह त्रासदी नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी अपूरणीय क्षति कही जाएगी।

- क्या और कोई बच्चा बता सकता है ? मंत्रीजी ने बच्चों से पूछा ।

आखिरकार एक बच्चा उठा और बोला - यदि आप अपने परिवार सहित एक हेलीकॉप्टर में जा रहे हों और आतंकवादी उसे बम से उड़ा दें तो यह एक त्रासदी होगी।

- शाबाश ! बहुत बढ़िया उदाहरण है । अच्छा बेटे, क्या तुम समझा सकते हो कि तुम इसे त्रासदी क्यों कह सकते हो ? मंत्रीजी ने खुश होते हुए पूछा ।

बच्चे ने समझाया - देखिए, यह दुर्घटना तो कही नहीं जा सकती और बहुत बड़ी क्षति तो कैसे भी नहीं ............ !
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गुरुवार, 21 मई 2009

(कु) संगति का असर.....:)

 अब तक अपनी जिन्दगी के हम 35 बसन्त देख चुके हैं किन्तु आज तक जीवन में कभी ऎसा महसूस नहीं हुआ, जैसा कि पिछले कुछेक दिनों से हो रहा है। हमें तो लगने लगा है कि शायद हमारी मति भ्रष्ट हो चुकी है
अभी परसों की ही बात है, बैठे बैठे मन में विचार आया कि चलो कोई नईं ढंग की पोस्ट ही लिख ली जाए। वैसे यहां बहुत से लोग शायद ये भी सोच रहे होंगे कि पहले क्या कभी ढंग की पोस्ट लिखी है, जो अब की बार लिखोगे .:)। लेकिन खैर जैसा भी है, कभी किसी हलवाई को अपनी मिठाई की बुराई करते सुना है। और तो और जब एक सब्जी वाला भी कभी अपनी सब्जी को खराब नहीं कहता (चाहे कैसी भी गली सडी क्यूं न हो) तो भई हम तो फिर भी एक ब्लागर हैं। हम अपने लिखे को खराब कैसे कह सकते हैं। अब पढने वाला चाहे लाख बुराई करता रहे-----हमारी बला से।
Computing

 खैर छोडिए, मुद्दे की बात की जाए। हां तो हम परसों जब एक नई पोस्ट लिखने बैठे, जो कि भ्रूण हत्या जैसे एक गंभीर सामाजिक विषय पर आधारित थी। जिसका कि हमने शीर्षक भी अपने दिमाग में सोच के रख लिया था। लेकिन ये क्या! हम लिखना कुछ चाहें,लिखा कुछ जाए.......... कहां तो कन्या भ्रूण हत्या पर लिखने बैठे थे ओर कहां दिमाग में वफा, अश्क, लम्हे,जुबां, मयखाना जैसे शब्द गूंजने लगे। एक दो बार दिमाग से इन शब्दों को परे झटकने का प्रयास किया, सीट से उठकर दो चार मिनट चहलकदमी भी की। लेकिन जब दोबारा से लिखने बैठे तो फिर वही हाल। दिमाग सोच सोच कर परेशान कि आखिर ये हो क्या रहा है। जब सोचने समझने की बिल्कुल भी ताकत न रही तो लैपटाप उठा कर साईड में रख दिया। धर्मपत्नि को कह कर तेज मसाले वाली कडक चाय बनवाई। चाय पीते पीते अचानक से दिमाग की घण्टी बजने लगी, कि हो न हो जरूर ये सब संगति का असर है।  शायर, कवि बिलागर भाईयों (बहनें भी) की कविताएं/गजलें पढ पढ कर दिमाग में काव्यरसिकता छाने लगी है।  कबीर दास जी सच कह गए हैं कि "कबीरा संगत साधु की, कभी न निष्फल जाए"
अब भाई लोगों की (कु) संगति का ये असर हुआ कि हम पिछले तीन दिनों से बेफालतू की तुकबन्दी  करने में ही उलझे हुए हैं। बार बार लिखे जा रहे हैं, मिटाए जा रहे हैं। लेकिन इतनी सर खपाई का ये नतीजा जरूर निकला कि हम इन तीन दिनों में 2- 4 लाईनों की तुकबन्दी करने में सफल हो गए।

अब जब चन्द लाईनें लिख ही ली हैं तो फिर उन्हे कोई सुनने वाला भी तो चाहिए कि नहीं। बस इसी उधेडबुन में खोए हम कोई मुर्गा फंसने की राह देख रहे थे। तभी शाम को अचानक से बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के भाई मुफलिस जी का आना हो गया। हमने भी आव देखा न ताव , बस दुआ सलाम करते ही झट से उन्हे पकाना शुरू कर दिया। अभी मुश्किल से कोई दो लाईनें ही सुना पाए थे कि मुफलिस जी उठ खडे हुए। बोले कि कोई काम याद आ गया है, इसलिए अभी जाना पडेगा। फिर किसी दिन आराम से बैठकर महफिल जमाते हैं।

अब मुफलिस जी तो पल्लू  छुडा के भाग लिए और साथ ही हमारे भी ज्ञान चक्षु खुल गए कि भई, ये काम अपने बस का नहीं.....अपनी तो पंडिताई भली जिसमे यूं किसी की मिन्नतें तो नहीं करनी पडती। बस हींग लगे न फटकरी और रंग चौखा

किसी ने सच ही कहा है कि इन्सान कवि या शायर तब ही बन पाता है, जब कि उसमे सामने वाले को पकड के रखने का (अव) गुण विकसित हो चुका हो.:)। लेकिन शायद ऊपर वाले ने हमें इस (दुर)गुण से नवाजा ही नहीं।

खैर चलते चलते आप खुद पढ लीजिए कि आप लोगों की (कु) संगति में रह कर कैसी ऊलजलूल तुकबन्दी को अंजाम दिया है। लेकिन ध्यान रहे-----कि हूटिंग करना मना है।
जिन्दगी
फर्ज की लहरों पे अब तक डौल रही है जिन्दगी
 रिश्तों के पलडे में खुद को तौल रही है जिन्दगी !!

यूं तो,हर तरफ दिख रही है भीड इस जमाने की
पर कहीं कुछ अपना सा, टटोल रही है जिन्दगी !!

हर शख्स चेहरे पे इक नकाब पहने फिर रहा 
पर धीरे-धीरे सबके पर्दे खोल रही है जिन्दगी !!

आज तलक उलझा हुआ हूं उन्ही चन्द सवालों में
"अब भी कईं जवाब हैं बाकी" बोल रही है जिन्दगी !!

सोमवार, 18 मई 2009

प्रतिभा संसाधनों की मौहताज नहीं होती

हिन्दुस्तान के दिल यानी दिल्ली में सडक के किनारे चाय बेचता हुआ यह व्यक्ति आपको किसी भी दूसरे चाय वाले की तरह ही नजर आएगा। परन्तु ये कोई जरूरी तो नहीं कि जो दिखता है, वह असल में वैसा ही हो। इस चाय वाले का नाम है लक्ष्मण राव। लेकिन आप हैरान रह जाएंगें, जब आपको पता चलेगा कि ये कोई मामूली चाय वाला नहीं बल्कि एक साहित्यकार है, जिनकी अब तक कुल 18 पुस्तकें छप चुकी हैं। किसी ने सच ही कहा है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।

दिल्ली में आईटीओ के नजदीक चाय की दुकान चलाने वाले 53 वर्षीय लक्ष्मण राव का 'भारतीय साहित्य कला प्रकाशन' नाम से स्वयं का प्रकाशन संस्थान भी है। लक्ष्मण राव बताते हैं कि मैं पिछले 28 या 29 सालों से लघु कहानियां, नाटक और उपन्यास लिख रहा हूं। उन्होंने बताया कि मैने अपनी पहली किताब सन 1979 में लिखी थी, जिसका शीर्षक था  "नई दुनिया की नई कहानी" जिसमें मैंने अपने जीवन के सारे संघर्षो और चुनौतियों का चित्रण किया है।

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक गरीब किसान परिवार में जन्मे लक्ष्मण राव को हिंदी साहित्य से विशेष लगाव रहा है। उन्होंने 1973 में मुंबई विश्वविद्यालय से हिंदी माध्यम में 10वीं की शिक्षा पूरी की। इन्हे बचपन से गुलशन नंदा के उपन्यासों से विशेष लगाव रहा है।

लक्ष्मण ने कहा कि वह जीवन के शुरुआती दौर में लेखक बनना नहीं चाहते थे, पर एक घटना ने उन्हे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। एक छोटा बच्चा, जो नदी में नहाने गया था, डूब कर मर गया और इस घटना ने उन्हे इतना उद्वेलित किया कि अपनी भावनाओं को एक शक्ल देने के लिए उन्होंने किताबों का सहारा लिया। हालांकि घर के कमजोर आर्थिक हालात की वजह से उन्हे अपनी पढ़ाई दसवीं कक्षा के बाद छोड़नी पड़ी। आजीविका के लिए उन्होंने कुछ समय के लिए स्थानीय मिल और निर्माण स्थलों पर भी काम किया। पर फिर वह 1975 में दिल्ली आ गए। दिल्ली में दरियागंज इलाके में किताब बाजार को देखकर उनका शौक एक बार फिर जाग उठा। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार के माध्यम से स्नातक की डिग्री ली। अपनी जमा पूंजी से उन्होंने एक चाय की दुकान खोली और तब से वह किताबें लिखने में जुट गए। हालांकि उन्हे किसी प्रकाशक से कोई सहायता नहीं मिली। तब उन्होंने सोचा कि वह अपनी किताबों को खुद ही लिखेंगे, प्रकाशित करेगे और खुद ही बेचेंगे। लक्ष्मण राव गर्व से कहते है, मेरी कुछ किताबों को आप सार्वजनिक पुस्तकालयों और स्कूली पुस्तकालयों में भी देख सकते है।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

बस यूं हीं----------- चन्द उधार के चुटकुले

बहुत दिनों से या तो कुछ लिखने का ही मन नहीं कर रहा था।या फिर अगर मन मारकर लिखने भी बैठा तो  गम्भीर विषय ही सूझा। इसलिए  पिछली दो चार पोस्टें गंभीर सामाजिक विषयों पर ही लिखी गई। अचानक आज पुरानी ईमेल चैक कर रहा था तो उनमे एक मेल दिखाई दी,जिसके जरिए किसी अंजान शख्स नें ढेर सारे चुटकुले भेजे हुए थे। पढने पर बढिया लगे तो सोचा कि क्यूं न आप लोगों के साथ बांट कर मूड को थोडा हल्का कर लिया जाए। तो फिर लीजिए, उन्ही मे से चन्द उधार के चुटकुले झेलिए और हमारे साथ आप भी थोडा सा मुस्कुरा लीजिए.:-----
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                                             चोर की इन्सानियत
एक चोर एक घर में चोरी करने गया। तिजोरी पर लिखा था - तिजोरी को तोड़ने की जरूरत नहीं है। 123 नंबर लंगाकर सामने वाला लाल बटन दबाओ, तिजोरी खुल जाएगी।

जैसे ही चोर ने बटन दबाया, अलार्म बजने लगा और पुलिस आ गई।

जाते-जाते चोर ने घर के मालिक से कहा -----"लानत है तुम पर! आज तुम्हारे कारण मेरा इंसानियत से विश्वास उठ गया है ".....
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                                            स्त्री की कर्तव्यनिष्ठा
इंटेलिजेंस ब्यूरो में एक उच्च पद हेतु भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी। अंतिम तौर पर केवल तीन उम्मीदवार बचे थे जिनमें से किसी एक का चयन किया जाना था। इनमें दो पुरुष थे और एक महिला।
फाइनल परीक्षा के रूप में कर्तव्य के प्रति उनकी निष्ठा की जांच की जानी थी। पहले आदमी को एक कमरे में ले जाकर परीक्षक ने कहा - ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।'' फिर उसने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा - ''उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।''
''मैं अपनी पत्नी को किसी भी हालत में गोली नहीं मार सकता''- आदमी ने कहा।
''तो फिर तुम हमारे किसी काम के नहीं हो। तुम जा सकते हो।'' - परीक्षक ने कहा।

अब दूसरे आदमी को बुलाया गया। ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।'' कहकर परीक्षक ने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा - ''उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।'' आदमी उस कमरे में गया और पांच मिनट बाद आंखों में आंसू लिये वापस आ गया। ''मैं अपनी प्यारी पत्नी को गोली नहीं मार सका। मुझे माफ कर दीजिये। मैं इस पद के योग्य नहीं हूं।''

अब अंतिम उम्मीदवार के रूप में केवल महिला बची थी। उन्होंने उसे भी बंदूक पकड़ाई और उसी कमरे की तरफ इशारा करते हुये कहा - ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगी चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो। उस कमरे में तुम्हारा पति बैठा है। जाओ और जाकर उसे गोली से उड़ा दो।'' महिला ने बंदूक ली और कमरे के अंदर चली गई। कमरे के अंदर घुसते ही फायरिंग की आवाजें आने लगीं । लगभग 11 राउंड फायर के बाद कमरे से चीखपुकार, उठापटक की आवाजें आनी शुरू हो गईं। यह क्रम लगभग पन्द्रह मिनटों तक चला उसके बाद खामोशी छा गई।
लगभग पांच मिनट बाद कमरे का दरवाजा खुला और माथे से पसीना पोंछते हुये महिला बाहर आई। बोली - ''तुम लोगों ने मुझे बताया नहीं कि बंदूक में कारतूस नकली हैं। मजबूरन मुझे उसे पीट-पीट कर मारना पड़ा।''
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                                            सस्ता समाधान
एक आदमी मनोचिकित्सक के पास गया । बोला -''डॉक्टर साहब मैं बहुत परेशान हूं। जब भी मैं बिस्तर पर लेटता हूं, मुझे लगता है कि बिस्तर के नीचे कोई है। जब मैं बिस्तर के नीचे देखने जाता हूं तो लगता है कि बिस्तर के ऊपर कोई है। नीचे, ऊपर, नीचे, ऊपर यही करता रहता हूं। सो नहीं पाता । कृपा कर मेरा इलाज कीजिये नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगा।''
डॉक्टर ने कहा - ''तुम्हारा इलाज लगभग दो साल तक चलेगा। तुम्हें सप्ताह में तीन बार आना पड़ेगा। अगर तुमने मेरा इलाज मेरे बताये अनुसार लिया तो तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे।''
मरीज - ''पर डॉक्टर साहब, आपकी फीस कितनी होगी ?''
डॉक्टर - ''सौ रूपये प्रति मुलाकात''
गरीब आदमी था। फिर आने को कहकर चला गया।
लगभग छ: महीने बाद वही आदमी डॉक्टर को सड़क पर घूमते हुये मिला ।
''क्यों भाई, तुम फिर अपना इलाज कराने क्यों नहीं आये ?'' मनोचिकित्सक ने पूछा।
''सौ रूपये प्रति मुलाकात में इलाज करवाऊं ? मेरे पड़ोसी ने मेरा इलाज सिर्फ बीस रूपये में कर दिया'' आदमी ने जवाब दिया।
''अच्छा! वो कैसे ?''
''दरअसल वह एक बढ़ई है। उसने मेरे पलंग के चारों पाए सिर्फ पांच रूपये पाए के हिसाब से काट दिये।''
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                                          विज्ञान का अन्तिम सत्य
एक जीवविज्ञानी मेंढ़कों के व्यवहार का अध्ययन कर रहा था। वह अपनी प्रयोगशाला में एक मेंढ़क लाया, उसे फर्श पर रखा और बोला - ''चलो कूदो !'' मेंढ़क उछला और कमरे के दूसरे कोने में पहुंच गया। वैज्ञानिक ने दूरी नापकर अपनी नोटबुक में लिखा - ''मेंढ़क चार टांगों के साथ आठ फीट तक उछलता है।''
फिर उसने मेंढ़क की अगली दो टांगें काट दी और बोला - ''चलो कूदो, चलो !'' मेंढ़क अपने स्थान से उचटकर थोड़ी दूर पर जा गिरा। वैज्ञानिक ने अपनी नोटबुक में लिखा - ''मेंढ़क दो टांगों के साथ तीन फीट तक उछलता है।''
इसके बाद वैज्ञानिक ने मेंढ़क की पीछे की भी दोनों टांगे काट दीं और मेंढ़क से बोला - ''चलो कूदो!''
मेंढ़क अपनी जगह पड़ा था। वैज्ञानिक ने फिर कहा - ''कूदो! कूदो! चलो कूदो!'' पर मेंढ़क टस से मस नहीं हुआ।
वैज्ञानिक ने बार बार आदेश दिया पर मेंढ़क जैसा पड़ा था वैसा ही पड़ा रहा ।
वैज्ञानिक ने अपनी नोटबुक में अंतिम निष्कर्ष लिखा - ''चारों टांगें काटने के बाद मेंढ़क बहरा हो जाता है।''
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो

ईश्वर द्वारा निर्मित इस प्रकृति का अपना एक पूर्ण चक्र है -----जिसका सिर्फ एक ही नियम है कि एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो। इस वर्तुल को तोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन हम लोग क्या कर रहे हैं कि, बस सिर्फ और सिर्फ लिये चले जा रहे हैं,देना तो हम लोगों नें सीखा ही नहीं। इसीलिए धीरे-धीरे आज सारे प्राकृ्तिक जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती निरन्तर विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं, झीलें, तालाब खत्म हो  रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इतनी बुरी तरह से बिगाड़ चुके हैं कि भविष्य में इस पर रह ही नहीं पाएंगे,अपितु जीने के लिए हमें किसी और नए ग्रह की खोज करनी पडेगी ।

देखा जाए तो इस स्थिति के लिए आधुनिक विज्ञान भी कोई कम दोषी नहीं है। उसका रवैया भी सदैव विजेता वाला ही रहा है। विज्ञान ये सोचता है कि धरती और आकाश से दोस्ती कैसी, उस पर तो बस विजय हासिल करनी है। हमने कुदरत से खिलवाड किया , किसी नदी का मुहाना मोड़ दिया, किसी पहाड़ का कुछ हिस्सा काट लिया, किसी प्रयोगशाला में चन्द रसायनिक क्रियाएं संपन्न कर ली और बस समझने लगे कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

आप प्लास्टिक को ही देखिए। उसे बना कर सोचने लगे कि कमाल है! ये तो न जलता है, न गीला होता है, न जंग लगती है - कितनी महान उपलब्धि है। उपयोग के बाद उसे फेंक देना भी कितना सुविधाजनक है। जिस भी पदार्थ,जीव-जन्तु,पशु-पक्षी,मनुष्य,पेड-पौधे इत्यादि की रचना प्रकृ्ति नें की है,अगर आप उन्हे वापस जमीन में डाल दो तो वह पुन: अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं।लेकिन अगर प्लास्टिक को जमीन में गाड़ दो और बरसों बाद खोदो तो भी वैसा का वैसा ही पाओगे।क्योंकि प्रकृ्ति प्लास्टिक जैसे मनुष्य निर्मित किसी पदार्थ को आत्मसात नहीं करती। लेकिन हम लोग हैं कि अपनी इन महान उपलब्धियों के दंभ में चूर स्वयं अपने ही हाथों विनाश के बीज बोए चले जा रहे हैं । अब इन बीजों से उत्पन फसल कैसी होगी,हमारे पास ये सोचने का भी समय नहीं है। बस चले जा रहे हैं---------विज्ञान के रथ पर सवार होकर कुदरत पर विजय हसिल करने को।

पर्यावरण का अर्थ है संपूर्ण का विचार करना। भारतीय मनीषा हमेशा 'पूर्ण' का विचार करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। सीमित दृष्टि पूर्णता का विचार नहीं कर सकती। एक बढ़ई सिर्फ पेड़ के बारे में सोचता है। उसे लकड़ी की गुणवत्ता की जानकारी है। पेड़ की और कोई उपयोगिता उसे मालूम नहीं है कि वे किस तरह बारिश होने में अपना योगदान देते हैं ,वे किस तरह मिट्टी को बांध कर रखते हैं। उसे तो बस सिर्फ अपनी लकड़ी से मतलब है।वैसी ही सीमित सोच ले कर हम अपने जंगलों को काटते चले गए और अब भुगत रहे हैं। अब आक्सीजन की कमी महसूस हो रही है। वृक्ष न होने से पूरा वातावरण ही अस्तव्यस्त होता जा रहा है। मौसम का क्रम बदलने लगा है। सावन के महीने में सूखा पड रहा है, सर्दियों में पसीने छूटने लगे हैं। और वायु प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं।इसे पढकर बहुत से मेरे जैसे लोग ये भी सोच रहे होंगे कि हमें इन सब से क्या लेना!मान लो, अगर कुछ समस्याएं उत्पन हों भी रही हैं तो सारी दुनिया के लिए ही तो हो रही हैं,कौन सा हमें अकेले को परेशानी उठानी पड रही है। अब जैसे बाकी दुनिया जियेगी,वैसे ही हम भी जी लेंगे।

सुना है कि किसी जमाने में एक राजा था । उसने एक दिन देखा कि खेत-खलिहानों में पक्षी आते हैं और अनाज खा जाते हैं। वह सोचने लगा कि ये अदना से पंछी पूरे राज्य में लाखों दाने खा जाते होंगे। इसे रोकना होगा। तो उसने राज्य में ऐलान कर दिया कि जो भी पक्षियों को मारेगा उसे इनाम दिया जाएगा। बस ईनाम के लालच में राज्य के सारे नागरिक शिकारी हो गए और देखते ही देखते पूरा राज्य पक्षी विहीन हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उत्सव मनाया गया कि आज उन्होंने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

किन्तु अगले ही वर्ष गेहूँ की फसल पूरी तरह से नदारद थी। क्योंकि मिट्टी में जो कीड़े थे और जो टिड्डियां थीं, उन्हें वे पक्षी खाते थे और अनाज की रक्षा करते थे। इस बार उन्हें खाने वाले पक्षी नहीं रहे, सो, कीडे-मकोडों नें पूरी फसल चट कर डाली।किसी विद्वान के बताने पर राजा के बात समझ में आई और उसके बाद उसे विदेशों से पक्षी मंगवाने पडे।

यह सृष्टि परस्पर निर्भर है। उसे किसी भी चीज से रिक्त करने की कोशिश बेहद खतरनाक है। न हम पूर्णत: स्वतंत्र हैं, और न ही परतंत्र । यहाँ हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे लिए सहोदर के समान है। हमें इन सबके साथ ही जीने का सलीका सीखना होगा।

मंगलवार, 24 मार्च 2009

आधुनिक शिक्षा प्रणाली और संस्कार

चाहे कोई भी युग हो,प्रत्येक युग का भविष्य उसकी आगामी पीढ़ी पर ही निर्भर करता है। जिस युग की नई पीढ़ी जितनी अधिक शालीन, सुसंस्कृत, सुघड़ और शिक्षित होती है, उस युग के विकास की संभावनाएं भी उतनी ही अधिक रहती है। राष्ट्र, समाज और परिवार के साथ भी यही सिद्धांत घटित होता है। आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण या करणीय कार्य है भावी पीढी को संस्कारित करना।
  अक्सर सुनने में आता है कि बाल्य मन एक सफेद कागज की भांती होता है। उस पर व्यक्ति जैसे चाहे, वैसे चित्र उकेर सकता है,या फिर जैसा भी चाहें,लिख सकते हैं। उसकी सोच को जिस दिशा में मोड़ना हो, सरलता से मोड़ा जा सकता है। एक दृष्टि से यह मंतव्य सही हो सकता है पर यह सर्वांगीण दृष्टिकोण नहीं है। क्योंकि हर बच्चा अपने साथ अनुवांशिकता लेकर आता है, जो कि गुणसूत्र (क्रोमोसोम) और संस्कार सूत्र (जीन्स) के रूप में विधमान रहते हैं।
सामाजिक वातावरण भी उसके व्यक्तित्व का एक घटक है। इसका अर्थ यह हुआ कि संस्कार-निर्माण के बीज हर बच्चा अपने साथ लाता है। सामाजिक या पारिवारिक वातावरण में उसे ऐसे निमित्त मिलते हैं, जिनके आधार पर उसके संस्कार विकसित होते हैं। प्राय: देखा जाता है कि माता-पिता अपनी संतान के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं के साधन जुटा देते हैं, शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था कर देते हैं,किन्तु उनके लिए सर्वांगीण विकास के अवसर नहीं खोज पाते। कुछ अभिभावक तो ऐसे होते हैं, जो उनकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता के बारें में भी उदासीन रहते हैं।
उचित मार्गदर्शन के अभाव में अथवा अधिक लाड़-प्यार में या तो बच्चे कुछ करते नहीं या इस प्रकार के काम करते हैं, जो उन्हें भटकाने में निमित्त बनते हैं। ऐसी परिस्थिति में हर समझदार माता पिता का यह दायित्व है कि वे अपने बच्चों की परवरिश में संस्कार-निर्माण की बात को न भूलें।
 आधुनिक युग में मां-बाप भी बच्चों को स्कूलों के भरोसे छोडकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं अगर देखा जाए तो इस तरह से हम लोग कहीं न कहीं उनके साथ अन्याय ही कर रहे हैं। क्यों कि वर्तमान शिक्षा पद्धति का ये सबसे बडा दोष है कि इसमें सिर्फ बौद्धिक विकास को ही महत्व दिया गया है,संस्कृ्ति एवं संस्कारपक्ष को तो पूरी तरह से त्याग दिया गया है
ऎसे में हम लोग किस प्रकार ये अपेक्षा कर सकते हैं कि बच्चों का समग्र विकास हो पाएगा। कान्वेंट्स और पब्लिक स्कूल आधुनिक कहलाने वाले अभिभावकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन चुके है। वे मानते हैं कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे आधुनिक रूप से विकसित होते हैं, समाज में जीने के तौर-तरीके बहुत अच्छे ढंग से सीखते हैं। कुछ अंशों में यह बात सही हो सकती है। परन्तु सिर्फ सामाजिक तौर तरीके ही जीवन नहीं है।

जीवन की समग्रता के लिए संस्कृति, परम्परा,राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, विनय, सच्चाई, सेवाभावना आदि अनेक मूल्यों को जीना सिखाने की जरूरत है।आप अगर कान्वैंट या पब्लिक स्कूल के विधार्थी से मुंशी प्रेमचन्द,जयशंकर प्रसाद इत्यादि के बारे में पूछ के देखें तो बगलें झांकने लगेगा,लेकिन माईकल जैक्सन के बारे में वो शर्तिया जानता होगा। वन्देमातरम की उसे भले एक लाईन न आती हो,लेकिन ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार पूरा सुना देगा जिस शिक्षाक्रम में संस्कृति के मूल पर ही कुठाराघात हो, उससे संस्कार-निर्माण की अपेक्षा करना तो एक प्रकार से मूर्खता ही कही जा सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को निरंतर ऐसा वातावरण मिले और उनके शिक्षाक्रम में कुछ ऐसी चीजें जुडें, ज़ो उन्हे बौध्दिक विकास के साथ-साथ भावनात्मक विकास के शिखर तक पहुंचा सके।

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

कुछ हल्का फुल्का सा.....

एक बार की बात है कि भाटिया जी को किसी विवाह समारोह में सम्मिलित होने का निमंत्रण प्राप्त हुआ। बस फिर क्या था, भाटिया जी पहुंच गये शादी की दावत में शामिल होने। अब जैसा कि अमूमन पंजाबी और हरियाणवी लोगों की आदत होती है कि भई जब 101 रूपये शगुन दिया है तो किसी न किसी तरीके से उसे वसूल भी तो करना है।लेकिन अब शगुन तो शगुन है कोई लोन की रकम थोडे ही है कि किश्तों में वसूली होगी। अब उन रूपयों की कीमत  तो वहां दावत में खा पीकर ही वसूली जा सकती थी। खैर भाटिया जी लगे अपने नुक्सान की भरपाई करने। खाते खाते 2 घंटा बीत गये लेकिन वो तो रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये देखकर वहां किसी सज्जन नें पूछ लिया " अब कितना खाओगे भाटिया जी"
भाटिया जी" अबे यार, मैं तो खुद खा खाकर परेशान हूं,लेकिन क्या करूं कार्ड में लिखा है कि डिनर 7 से 10 बजे तक"।
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एक बार ताऊ  पहली बार शहर घूमने गया। उसने गाँव मे सुन रखा था की, शहरवाले लोग भोले भाले गाँववाले लोगो को खूब बेवकूफ़ बनाते है! इसलिए उनसे सावधान रहना चाहिए! ताऊ सीधे एक होटल मे पहुचां और बोला "आपकी होटल मे सबसे अच्छा कमरा मिलेगा?! होटलवाले ने पहले तो ताऊ का ऊपर से नीचे तक विश्लेषण किया ओर फिर बोला  "जी हां श्रीमान, सभी सुविधा वाला कमरा मिल जाएगा, हमारे पास सबसे बढ़िया कमरा एक हज़ार रूपए प्रतिदिन के किराये पर है" ताऊ ने रोबदार आवाज़ मे कहा " हमे किसी प्रकार की सुविधा की कमी तो नही होगी?" होटल वाले ने भरोसा दिलाते हुए कहा " नही श्रीमान,यहां आपको सबसे उत्तम सुविधा मिलेगी." ये कहकर होटल वाले ने एक आदमी को ताऊ का सामान देकर कमरा दिखाने के लिए भेजा। ओर वो आदमी ताऊ को ले के चला गया, फिर दरवाज़ा खोलकर सामान रखकर ताऊ को अंदर बुलाता है। ये क्या! ताऊ का चेहरा ग़ुस्से से लाल  "ये क्या 4/6 का कमरा है, यहा पर तो एक आदमी आराम से सो भी नही सकता, और तो और ये तो यहा पर 6 लोग एक साथ खड़े भी नही हो सकते ! मणै इस होटल का सबसे अच्छा कमरा माँगा था इस कमरे का एक हज़ार ले रहे हो!मुझे ऎसा कमरा नही चाहिए " ये बोलते हुए ताऊ गुस्से में नथुने फुल्लाता बाहर आ गया। उस आदमी ने ताऊ को भोले पन से समझाते हुए कहा " साह्ब ये तो लिफ्ट है"

बुधवार, 11 मार्च 2009

होली पर भाटिया जी की मौज........( भई होली है ! )

भाटिया जी - "पिछले चार दिनों से पता नहीं सुबह किसका मुहं देखकर उठ रहा हूं कि हर रोज छीछालेदार हो रही है।अभी परसों पाबला नें अपनी पोस्ट में मेरी एक गलत सलत सी फोटू लगा रखी थी,जिसे देखके सब लोग हंस रहे थे। अभी उस बेईइज्जती की तो भरपाई हो भी नहीं पाई थी, कि आज जिस मैं अपना भाई माना करता था, उस ताऊ नें भी सारे ब्लागियों के सामने मेरी बेईज्जती कर के रख दी।मुझे तो लगे है कि जरूर मुझ पर राहू या शनि की निगाह पड चुकी है।
भाटिया जी की धर्मपत्नि-" क्या बात हुई? ताऊ नें ऎसा क्या कह दिया कि आपको राहू-केतु याद आने लग पडे।"
भाटिया जी " अब क्या बताऊं, सारे ब्लागरियों के सामने मेरी इतनी साफ सुथरी इमेज थी कि क्या बताऊं। लोग तो ये सोचा करें थे कि भाटिया जी तो बहुत ही पढे लिखे,जहीन महीन, जैन्टल मैन बन्दे हैं,लेकिन ताऊ ने सारी इमेज खराब कर दी।
धर्मपत्नि- "अब कुछ बताओगे भी या यू हीं पहेलियां बुझाते रहोगे।"
भाटिया जी- "अरी भागवान,पहेली बुझाना तो मैने कईं दिनों से बन्द कर रखा है। अब तो मैं कुछ सार्थक लिखकर बुद्धिजीवी बनने की राह पर चल पडा हूं।"
धर्मपत्नि-" सार्थक? ऎसा क्या लिखना चाहते हो।"
भाटिया जी-"दहेज,कन्यादान, स्त्रीयों की मनोदशा-उनके आचार व्यवहार के बारे में लिखा करूंगा।"
धर्मपत्नि-"बैठे रहो टिक के,  अपनी स्त्री को तो आज तक समझ नहीं पाए और चले हैं स्त्रीयों के आचार-व्यवहार के बारे में लिखने। अब कहीं भूल के कुछ ऎसा वैसा लिख भी मत देना। वर्ना ये सारी स्त्रियां, जिनकी कविताएं पढ के तुम बडी वाह्! वाह्! करते हो,सारी मिलजुल के तुम्हारा ही आचार बना डालेंगी।"
भाटिया जी-"अब ज्यादा चूं चपड मत कर,बडी आई नसीहत देने वाली। जरा जल्दी से मेरी जन्मपत्री निकाल ले ला,पंडित जी को दिखा के लाता हूं। लगता है कि मुझपे जरूर राहू की दशा चल पडी है। तभी तो एक ताऊ कम था बेईज्जती करने को जो अब तुम भी शुरू हो गई।"
धर्मपत्नि - "अरे हां, तुमने बताया नहीं, कि ताऊ ने ऎसा क्या कह दिया कि तुम भरी जवानी में सठियाये बूढे की तरह नथुने फुला रहे हो।"
भाटिया जी-"अब क्या बताऊं तुम्हें, हम लोगों को हरियाणा छोडे हुए तो जमाना बीत गया। अब सब लोगों की नजरों में मेरी इमेज एक विलायती बाबू की बन चुकी है।लेकिन ताऊ से मेरी ये इज्जत देखी नहीं गई,बस लगा अपने ब्लाग पे मेरी पोल पट्टियां खोलने। सब को बता दिया कि रोहतक में भाटिया जी मेरे साथ बीडियां, जगाधरी नम्बर वन देसी दारू पिया करते थे। भला ये भी कोई बात हुई,अगर बताना ही था तो ये भी तो कह सकता था कि हम लोग इक्कठे बैठकर सिगार और अंग्रेजी शराब पीते थे।"
धर्मपत्नि-"बैठे रहो जी टिक के,अब मेरा मुंह मत खुलवाओ। घर में नहीं दाने ओर अम्मां चली भुनाने।"
भाटिया जी- हे भगवान्! पता नहीं पिछले चार दिनों से सुबह सुबह किसका मुंह देखकर उठ रहा हूं।"
धर्मपत्नि-"अब मेरी मानो तो बैडरूम में लगे आईने को हटा दो, वर्ना रोजाना तुम्हे यही शिकायत् रहेगी।"
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लो जी,होली के हुडदंग में,मस्ती में सरोबार इस रंगों के त्योहार के उपलक्ष्य में आप सब ब्लागियाये, मौजियाये,हुल्लियाये सभी बंधुओं को ढेर सारी शुभकामनाऎं..........................लेकिन भई विनती है कि जरूर टिप्पियायें।और लगे हाथ भाटिया जी और ताऊ रामपुरिया जी को एक ही दिन खूंटे पे बंधने(शादी) सालगिरह की बधाई भी जरूर दीजिएगा(लेकिन उनके अपने  ठिकाने पर जाकर)-----अजी ये रहे उनके ठिकाने -----
  ताऊजी        भाटिया जी
बुरा न मानो होली है------------------------------------------
 होली लगातार बार बार ही मनाऎं हम
 जीवन भर प्यार भरे रंग ही मिलाएँ हम
   धरती  हमारी यह महकेगी फूलों सी
  अमृत के घूँट यदि सब को पिलाएँ हम
  कारण बने न हम दूसरों की पीडा के
  प्रेम के ही आँसू सर्वत्र छलकाएँ हम
  उत्सव यह और भी रंगीन बन जायेगा
 रंग ही बस रंग की ही नदियाँ बहाएँ हम 
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रफ़्तार