ad

सोमवार, 2 नवंबर 2009

चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत .........

कभी कभी सोचता हूँ कि पता नहीं ईश्वर ने कुछ लोगों को ऎसा क्यों बनाया है,जिन्हे कि आप चाहे लाख समझा लें, लेकिन फिर भी करेंगें वो लोग वही,जो कि उनके दिमाग में पहले ही कूट कूटकर भरा जा चुका है । इन्सान का मुखौटा पहनकर घूम रहे ये भेडिए पता नहीं समाज को किस ओर ले जाना चाहते हैं । 

रहिमन लाख भली करौ, इनका जिद्द न जाए
राग सुनत, पय पियतहू, सांप सहजहि घर खाए ।।


हर पोस्ट में गारी मिलत हैं, लोग रहे चिल्लाहिं
रहिमन करूए लिखन कौ, चहियत यही सजाहिं ।।


आप न काहू काम के, डार,पात,फल मूर
औरन को रोकत फिरैं, आपहूं वृ्क्ष बबूर ।।


रहिमन ऎसे लोगन ते, तजो बैर औ प्रीत
चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत ।।

रविवार, 20 सितंबर 2009

भगवान हजरत मोहम्मद की जय.......पैगम्बर रामचन्द्र की जय!!!!!!

इस लेख को पढने वाले सभी पाठकों विशेष रूप से मुसलमान भाईयों को एक बात मैं पहले ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इसे पढते समय कृ्प्या इस दृ्ष्टिकोण से न सोचें कि यह एक हिन्दू द्वारा लिखा गया है।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि कहीं आप लोग ये न सोचें कि मैं किसी धर्म विशेष की तरफदारी कर रहा हूँ। आप सब से निवेदन है कि कृ्प्या एक बार खुले दिमाग से विचार करके देखें कि आखिर हमारें में ऎसी कौन सी कमियाँ हैं,जिससे कि इस देश,दुनिया और समाज के साथ ही साथ अब इस ब्लागजगत में भी हिन्दू और मुसलमान के नाम पर आपस में दूरियाँ बढती चली जा रही हैं, क्यूं हम दूसरे के धर्म का सम्मान न करके सिर्फ अपनी ही अपनी हाँकने में लगे हुए हैं।
एक सच्चे धार्मिक व्यक्ति का यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि वो महापुरूषों,संतो-महात्माओं के वचनों का पालन करे,उनके दिखाए मार्ग का अनुसारण करे,अब वो महापुरूष चाहे किसी भी धर्म,जाति,सम्प्रदाय से संबंध क्यों न रखते हों। वैसे भी सत्पुरूष धर्मों और जातियों के बंधन से परे होते हैं---- उनकी शिक्षाएं,उनके विचारों को किसी धर्म,देश या काल के बन्धन में नहीं बाँधा जा सकता,उनके विचार सब के लिए उतने ही उपयोगी हैं,जितने कि उस धर्म विशेष के मानने वाले के लिए-----हजरत मोहम्मद जितना आपके हैं,उतने ही मेरे भी हैं। अब यदि मैं "जय मोहम्मद,जय मोहम्मद" कहूँ तो क्या कोई मुझे रोक सकता हैं---हर्गिज नहीं। ये मेरी इच्छा है कि मैं अपने ईश्वर को किस रूप में ध्याता हूँ। ऎसा करने से मुझे न तो कोई कुरआन रोक सकती है,न गीता और न ही इस देश का कानून।
एक बात ओर (जैसा कि मैने पहले भी कहा है) कि किसी भी व्यक्ति के लिए महापुरूषों,सन्तों की आज्ञा,उनके वचन शिरोधार्य होने चहिए--------आप हजरत साहब और कुरआन के फरमाबर्दार हैं,होना भी चाहिए;लेकिन कुरआन में शायद ये कहीं नही लिखा होगा कि आप लोग अपने धर्म का प्रचार करने के लिए दूसरे धर्म के धर्मग्रन्थों का आश्रय लें,उनसे तुलना करें। होना तो ये चाहिए कि हम अपने धर्मग्रंथों की शिक्षाओं पर अमल करते हुए पहले स्वयं उन्हे अपने व्यवहार में सम्मिलित करें,फिर बाकी समाज को भी उससे अवगत कराया जाए ताकि समाज भी उनसे लाभान्वित हो सके। ये नहीं कि अपने धर्म को बडा दिखाने के उदेश्य से हम लोग अन्य दूसरे धर्मों से उसकी तुलना करने बैठ जाएं।  अब हजरत साहब नें अपनी जिन्दगी में सैंकंडों,हजारों बार ये कहा है कि "मैं एक मामूली आदमी हूँ" तो क्या उनका हुक्म मानने के नाम पर आप लोग उन्हें मामूली आदमी ही मानने लगेंगें। चलिए हजरत तो ईश्वर के दूत थे, आपके सामने कोई उच्च पद प्राप्त या फिर कोई ऊंची शख्सियत का व्यक्ति आए और शालीनता दिखाते हुए कहे कि भई मैं तो एक नाचीज,अदना सा आदमी हूँ तो क्या आप लोग उनके व्यक्तित्व अनुसार व्यवहार न करते हुए उन्हे नाचीज और अदना इन्सान मान लेंगें?। अगर नहीं तो फिर हमें इस देश के दूसरे पैगम्बरों(श्रीराम,कृ्ष्ण,बुद्ध,नानक इत्यादि) को भी उसी दृ्ष्टि से देखना चाहिए,जिस दृ्ष्टि से हम हजरत मोहम्मद साहब को देखते हैं।

 मैं आप लोगों से सिर्फ इतना जानना चाहूंगा कि क्या आप इस्लाम के इस फरमान को नहीं मानते  कि "दुनिया के सभी मजहब सच्चे है"हर मुल्क और हर कौम में अल्लाह नें अपने पैगम्बर भेजे हैं। तो फिर ऎसी हालत में हजरत रामचन्द्र जी या हजरत कृ्ष्ण जी कहने में आप लोगों को क्या ऎतराज है।  मुहम्मद साहब की जय बोलते हैं तो फिर रामचन्द्र जी की जय बोलने में किसी को क्या बुराई है? भई इससे तो आपसी मोहब्बत ही बढेगी और मोहब्बत जैसे धर्म के आगे तो दुनिया के सभी धर्म फीके हैं।

जब इस्लाम मानता है कि हर कौम और मजहब के पैगम्बर अल्लाह के ही भेजे गए पैगम्बर हैं और हिन्दू भी मानता है कि जगत की समस्त विभूतियाँ ईश्वर का अंश हैं तो इस प्रकार आपके मजहब के मुताबिक राम,कृ्ष्ण,बुद्ध,महावीर वगैरह भी अल्लाह के पैगम्बर हैं और हिन्दी धर्म के मुताबिक ईसा,मुहम्मद वगैरह "ईश्वर के अंश" हैं,बल्कि हिन्दू धर्म नें तो अपना ढाँचा ही ऎसा बना लिया है कि जो जो हिन्दूस्तान में आकर बसता जाए,वो अपनी विशेषताएं रखते हुए भी हिन्दू मजहब कहलाता जाए। हिन्दू धर्म के इस ढाँचे का फायदा उठाकर क्यों न देश के धार्मिक झगडों,विवादों,तनावों को दफनाकर आपसी प्रेम और सौहार्द का वातावरण निर्मित किया जाए.......तो फिर इस नेक काम की आज से ही शुरूआत करते हुए हम भी बोलते हैं कि "भगवान हजरत मोहम्मद की जय"  और आप भी बोलिए कि "पैगम्बर रामचन्द्र जी की जय"

बुधवार, 19 अगस्त 2009

प्रेम विवाह

पत्नि:- "हे राम्! तुमसे लव मैरिज करके तो मेरी दुनिया ही उजड गई। लगता है शायद मेरी बुद्धि पर ही पत्थर पड गये थे जो मैने ऎसा कदम उठाया।"
पति:-" किसी दुनिया उजड गई? तुम्हारी या मेरी?"
पत्नि:- "तुम्हारी क्या खराब हुई! परिवार छूटा मेरा; बन्धन में फँसी मैं; पोजीशन गिरी मेरी। शादी के बाद तो तुम्हारी आँखे ही बदल गई।"
पति"- "क्या आँखें बदली मैने?"
पत्नि:- " क्या नहीं बदला? शादी से पहले जितना प्रेम दिखाते थे,आज उसका सौवाँ हिस्सा भी करते हो? बस हर बात पर हाथ चलाना और आँखें दिखाना जरूर सीख लिया तुमने।"
पति:- "तो! तुम क्या चाहती हो कि सारी जिन्दगी मैं तुम्हारे इशारों पर नाचता फिरूँ?"
पत्नि:- जो काम जिन्दगी भर नहीं कर सकते थे,उसका ढोंग चार दिनों के लिए क्यूं किया था? झूठे वादे करके मुझे क्यूं अपने जाल में फंसाया तुमने?"
पति:- " क्या झूठा ढोंग मेरा था? तुमने कोई ढोंग नहीं किया?  कहाँ गई वह इज्जत? कहाँ गया वो प्रेम,आदर-सत्कार? कहाँ गई वह मुस्कुराहट? सब कुछ तो खत्म हो गया!  अब तो मैं सिर्फ कमाकर लाने और तुम्हारा बोझा ढोने वाला एक बैल बन कर रह गया हूँ।"
पत्नि:- बैल? बैल नहीं बल्कि तुम तो एक साँड हो,जिसे कि सिर्फ फुँकारे मारने आते हैं। अब जीवन में मुस्कुराहट रह ही कहाँ गई है जो चेहरे पे दिखाई दे। मेरा जीवन तो तुमने झुलसा ही डाला है।"
पति:- "ऎसी क्या आग लगा दी मैने कि तुम्हारा जीवन झुलस गया?"
पत्नि:- इतना कुछ हो जाने के बाद भी तुम ये पूछते हो कि कैसी आग लगा दी! तुमसे शादी करके मैने अपने घर वालों की नाराजगी मौल ली। अब यहाँ तुम से ओर तुम्हारी माँ से सारा दिन जल कटी सुनने को मिलती है;कुत्ते जैसी जिन्दगी बना डाली तुमने मेरी। कहाँ अपने मायके में राज किया करती थी,लेकिन आज तुमने पैसे पैसे के लिए मौहताज कर दिया है।देख लेना अब छोडूंगी नहीं मैं तुम्हे। "
 पति:- क्या करोगी? तलाक ही दे दोगी न !"
पत्नि:- " यह तो भाग्य में अब बदा ही है। लेकिन उससे पहले तुम्हारी भी जिन्दगी मैने नरक न बना दी तो कहना!"
पति:- "अच्छा! तो अब तुम मेरी जिन्दगी नरक बनाओगी!"
पत्नि:- "जब तुमने मेरी जिन्दगी में आग लगा डाली है तो क्या उसका थोडा सा सेंक भी तुम्हे नहीं लगेगा?  तुमने मेरा परिवार मुझसे छुडा दिया; मुझे न इधर का छोडा ओर न उधर का और अब इस घर में भी आग लगा डाली। अब मेरे पास जलने के सिवाय ओर कोई रास्ता भी कहाँ है,सो जलूंगी ओर खूब जलूंगी;इतना जलूंगी कि उसकी लपटों में जलाने वाला भी खुद जल जाये।"
यह कहती,अपने बाल नौंचती हुई कमरे के बाहर निकल जाती है और पति महाश्य अपना सिर पीटता हुआ धम से जमीन पर गिर पडता है।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------
समयाभाव के कारण बहुत दिनों से कोई पोस्ट ही नहीं लिखी जा रही थी। यूँ भी मेरा ध्यान अधिकतर अपने ज्योतिष की सार्थकता नामक ब्लाग पर ही केन्द्रित रहता है। यहाँ तो, अगर कभी कुछ मन किया तो लिख लिया,वर्ना छुट्टी। आज इस पोस्ट में प्रेमविवाह के परिणामस्वरूप आगामी गृ्हस्थ जीवन में यदाकदा निर्मित हो जाने वाली विषम स्थितियों को चित्रित करने का प्रयास किया है,अगली पोस्ट में इसी प्रसंग को आप एक नये नजरिये से देखेंगे।

बुधवार, 29 जुलाई 2009

राज भाटिया जी को मातृ शोक!!

कल दोपहर के समय जब ताऊ का फोन आया तो उन्ही से पता चला कि अपने राज भाटिया जी इण्डिया आए हुए हैं। क्यों कि कुछ दिनों पहले उनकी माता जी का देहान्त हो चुका है और वो आज ही उनकी अस्थियों को व्यास नदी में विसर्जित करने के लिए अमृ्तसर के लिए निकल चुके हैं। जब भाटिया जी को फोन लगाया तो पता चला कि वो कुछ ही देर में लुधियाना पहुँचने वाले हैं। बस तुरत फुरत में उनसे कुछ पलों के लिए रास्ते में ही मिलना हो पाया,क्यों कि हिन्दु मान्यताओं के अनुसार अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए जाते समय रास्ते में कहीं ठहराव नहीं किया जाता। इसलिए घर न आ पाने की उनकी इस विवशता को समझते हुए बीच रास्ते में ही मुलाकात हो पाई। ब्लाग के माध्यम से लगभग पिछले एक वर्ष से जब से उनसे परिचय हुआ है,मैने उनसे एक बडा आत्मीय सा रिश्ता अनुभव किया है। मेरे मन में उनके प्रति जो एक छवि निर्मित हो चुकी थी,मिलने पर उन्हे बिल्कुल हूबहू वैसा ही पाया। बेहद मिलनसार,भले एवं सज्जन व्यक्ति।।
उनसे मिलने की मन में एक इच्छा तो थी,लेकिन मुलाकात इस प्रकार से ऎसे दुखद मौके पर होगी,इस प्रकार की आशा नहीं की थी। 
ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो उनकी माता जी की आत्मा को शान्ती प्रदान करे और उनके परिवार को इस दुख की घडी में साहस प्रदान करे।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

आखिर दस लाख का सवाल है भई!!!!!!!!

एक प्रतियोगिता जिसमे भाग ले रहे हैं 12 प्रतियोगी।जिसमें जीतने वाले को ईनाम के रूप में मिलेंगे पूरे 10 लाख रूपये। जी हाँ पूरे 10 लाख!। वैसे दस लाख बहुत बडी रकम होती है न!!जिसके भाग्य में विजेता बनना लिखा होगा उसकी तो जैसे लाटरी ही खुल जाएगी।इन रूपयों से आप अपने लिए कोई गाडी खरीद सकते हैं,मकान ले सकते हैं और चाहे तो बीवी बच्चों को (या किसी ओर को!)लेकर कहीं घूमने जा सकते हैं। यानि कि दस लाख रूपयों में आपकी बहुत सारी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं। यार दोस्तों,मुहल्ले,नाते-रिश्तेदारों में नाम होगा वो अलग। सभी आपके भाग्य को सराहेंगे कि भई मुकद्दर हो तो इन जैसा। क्या किस्मत पाई है-पूरे दस लाख रूपये जीत कर आए हैं। माना कि इनमे से कुछ ईर्ष्या करने,जलने भुनने वाले लोग भी होंगे। लेकिन ये तो एक अच्छी बात है, समाज में जब तक सौ पचास लोग अपने से ईर्ष्या करने वाले न हों तो तब तक आदमी के स्टेटस का पता भी नहीं चलता।जब कुछ पास में होगा तभी तो जलने वाले होंगे न। जिसके पल्ले कुछ है ही नहीं उससे भला कौन जलेगा।

खैर जाने दीजिए लोगों का तो काम ही जलना है,उन्हे जलने दीजिए। हाँ तो हम कहाँ थे? हाँ याद आया हम बात कर रहे थे प्रतियोगिता की जिसके विजेता को मिलेंगे पूरे 10 लाख रूपये। ये दस लाख का जिक्र होते ही पता नहीं क्यूं मुझे बार बार चक्कर सा आने लगता है, शायद बहुत बडी रकम है न इसलिए। वैसे भी हमने अपनी सारी जिन्दगी में दस लाख रूपये इकट्ठे देखे कहाँ हैं सो चक्कर आना तो जायज है:)।
आप लोग भी सोच रहे होंगे कि ये क्या दस लाख-दस लाख लगा रखी है; पूरी बात तो बता ही नहीं रहे। खैर चलिए बताए देते हैं तनिक धीरज तो रखिए भाई। हाँ तो ये दस लाख रूपये आप भी जीत सकते हैं वो भी बडी  आसानी से, बिना कुछ खास मेहनत किए।
जैसा कि मैने आपको बताया कि एक प्रतियोगिता है जिसमें 12 लोग भाग लेंगे, उनमे से 11 लोगों को हरा कर जो आखिरी प्रतियोगी बच जाएगा, वो ईनाम के पूरे 10 लाख रूपये(लो जी फिर से चक्कर आने लगे!) अपने घर ले जाएगा।
क्या कहा! उसके लिए हमें करना क्या होगा?।
अरे बता रहे हैं भाई! तनिक धीरज नाम की भी कोई चीज होती है कि नाहीं। 10 लाख क्या ऎसे फोकट में ही मिल जाएगा, उसके लिए कछु न कछु तो करना ही पडेगा न।
हाँ तो चलिए बताए देते हैं कि आपको क्या करना होगा। प्रतियोगिता में कईं राउण्ड होंगें। हरेक राऊण्ड मे से एक हारने वाला प्रतियोगी बाहर निकलता जाएगा। आखिर में जो बचेगा वो बन जाएगा लखपति.पूरे दस लाखपति।

सबसे पहले राउण्ड में आप लोगों के सामने एक प्लास्टिक का बडा सा भगोना टाईप कोई बर्तन रखा जाएगा। जिसमे होगा लाल लाल टमाटरों का सूप। सूप का नाम सुनकर आपके मुँह में पानी काहे आने लग पडा भाई। तनिक ठहरिए अपनी जीभ को कन्ट्रोल में रखिए और आगे भी सुन लीजिए। हाँ तो सुनिए, टमाटरों के सूप में होंगे ढेर सारे बाल। आपको क्या करना है कि अपने हाथ पीठ पीछे बाँधकर उस भगोने में से वो बालामृ्त पेय अपने मुँह में भरकर पास में ही रखे दूसरे वाले एक भगोने में डालना है। यानि कि बिना हाथों का प्रयोग किए सिर्फ मुँह के जरिए उस भगोने को पूरा का पूरा खाली करना है। बारी बारी से सभी प्रतियोगियों को वो भगोना खाली करना पडेगा लेकिन न तो वो बर्तन बदला जाएगा और न ही वो बालों वाला टमाटो सूप।
क्या कहा! ये तो सब का मुँह से निकला जूठन है, हम नहीं करेंगे।
अरे भाई ऎसा काहे सोचते हो। एक दूसरे का जूठन से तो आपस में प्रेम बढ्ता है। फिर दस लाख रूपयों का भी तो सवाल है।
लो जी आगे की सुनिये, अगले राऊण्ड में आपको एक बडी सी जिन्दा मछली दी जाएगी जिसे आपको अपने दातोँ से छीलकर छोटे छोटे टुकडों में बाँटना होगा।
अरे! आप तो फिर से बिदकने लगे। क्या कहा! ये तो जानवरों का काम है।
अजी छोडिए,आप भी इक्कीसवीं सदी में रह के न जाने कौन से जमाने की बात कर रहे हैं। जब बिना ब्याह किए ही लडका-लडकी इकट्ठे रह सकते हैं, फैशन के नाम पर कपडों का त्याग करके नंगा रहा जा सकता है तो फिर आप ये इत्ता सा काम करने में काहे बिदक रहे हैं भाई। वैसे भी, दस लाख क्या ऎसे ही फोकट में मिल जाएंगे। खैर छोडिए आप आगे सुनिए।
तीसरे राऊण्ड में आपको ज्यादा कुछ खास नहीं करना है। आपको एक हाथ में गोबर लेकर ( जित्ता जोर से खींचकर मार सकते हैं) सामने वाले के मुँह का निशाना बाँधकर मारना है। अगर आपका निशाना सही लग गया तो समझिए आप अगले राऊण्ड के लिए पास वर्ना घर जाकर पहले निशाना लगाने की प्रैक्टिस कीजिए। तब अगली बार भाग लीजिएगा।
अभी आपको तीन राऊण्ड के बारे में बता दिया है। अगर आप यहाँ तक पहुँच गए तो बाकी के राऊण्ड के बारे में भी आपको आगे बता दिया जाएगा। वैसे चिन्ता मत कीजिए आगे भी कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है। बहुत ही आसान है जैसे कि जिन्दा कीडे मकोडे खाना वगैरह वगैरह।
क्या कहा! ये तो पाप है!
लो कल्लो बात। भई आप ऎसा क्यूँ सोचते हैं। आप ये जानिए कि ऎसा करके एक तरह से आप पुण्य का ही काम कर रहे हैं।
कैसे?
भाई मेरे कीडे मकोडों की जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है। आप तो एक तरह से इन्हे इस कीट योनि से मुक्ति प्रदान कर रहे हैं। है न पुण्य का काम्! बस आँख मूंदकर और अपने भगवान का (या फिर शैतान का) नाम लेकर झट से मुँह में डाल लीजिएगा। वैसे भी इनमे कोन सी कोई हड्डी वगैरह होती है।
क्या कहा! आप इसमें हिस्सा नहीं लेंगे।
अजी छोडिए! नहीं भाग लेना तो न सही। हम कौन सा आपके भरोसे बैठे हैं।भाई मेरे ये आज का इण्डिया है, यहाँ  बिना ढूँढे भी हजारों-लाखों मिल जाएंगे जो कि चन्द पैसों के लिए जूठन,गोबर और कीडे-मकोडे तो क्या आदमी का माँस भी खा जाएँ। यहाँ तो फिर भी दस लाख रूपयों का सवाल है।

वैसे तो मैं टेलीवीजन जैसी बीमारी से बिल्कुल ही दूर रहने वाला प्राणी हूँ। ज्यादा से ज्यादा कभी महीने बीस दिन में समाचार सुनने का मन किया तो देख लिया वर्ना नहीं। परसों समाचारों के लिए जैसे ही टी.वी देखने का मन बना तो देखा कि बेटा अपने कमरे में बैठा बडा मग्न होकर कोई कार्यक्रम देख रहा है। मन में उत्सुकता हुई कि देखूँ तो सही कि ये इतने ध्यान से कौन सा कार्यक्रम देख रहा है। मैने पूछा कि बेटा क्या देख रहे हो? तो झट से बोला कि पिता जी देखिए बहुत बढिया प्रोगाम आ रहा है, इसमें जीतने वाले को दस लाख रूपये ईनाम में मिलेंगे। मैंने लगभग दस पन्द्रह मिन्ट उसके साथ बैठकर वो प्रोग्राम देखा होगा कि बस इतने में ही दिमाग भन्ना गया। क्या देखता हूँ कि प्रतियोगीयों को कभी जूठन खाने का कहा जा रहा है,कभी मुँह पर गोबर मलना तो कभी जिन्दा मछली खाने को और प्रतियोगी भी अपने अपने क्रम से बडी आसानी से हँसते मुस्कुराते हुए किए जा रहे हैं। सारे के सारे प्रतियोगी अच्छे घरों के दिखाई दे रहे थे,जिनमें लडके-लडकियाँ दोनो शामिल थे। सिर्फ 15 मिन्ट ही वो कार्यक्रम देखा होगा कि गुस्से से दिमाग ऎसा भन्नाया कि सबसे पहला काम ये किया कि झट से केबल की तार निकालकर साईड मे इकट्ठी करके रखी। कल केबल वाले को बोलकर कनैक्शन भी कटवा दिया।

लेकिन कल से एक बात जो दिमाग से निकल ही नहीं रही कि आखिर इन्सान पैसों के लिए क्या कुछ कर सकता है। हम लोग देखते हैं कि अक्सर मीडिया को दोष दिया जाता है कि वो समाज को पतन की ओर मोड रहा है।लेकिन मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि जो लोग इनाम के लालच में ऎसे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं उनकी बुद्धि क्या घास चरने चली जाती है। कल को कोई चैनल ऎसा कार्यक्रम बनाए जिसमें कि प्रतियोगिओं को इन्सान का माँस खाना पडे,मल-मूत्र का सेवन करना पडे तो इसका मतलब कि लोग तो वो भी करने को तैयार हो जाएंगे। 
हे प्रभु! पता नहीं इन्सान क्या से क्या बनता जा रहा है। किसी ने शायद सच कहा है कि पैसा इन्सान से कुछ भी करा सकता है।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

पीर पराई जानिए!!!!!!!!

श्रावण मास में की जाने वाली कांवड यात्रा से तो हरेक व्यक्ति भली भान्ती परिचित है। एक अलग ही पहचान और महत्व है इस यात्रा का। पाप नाशिनी गंगा और भगवान भोलेनाथ के प्रति असीम मानवीय श्रद्धा का प्रतीक है ये कांवड यात्रा।

इसी कांवड के प्रसंग में ही एक प्राचीन कथानक स्मरणीय है------एक बार संत एकनाथ जी गंगोत्री से कांवड़ लेकर, रामेश्वर की ओर पैदल यात्रा करते हुये जा रहे थे। साथ में हीं उनके कई संगी-साथी भी चल रहे थे। रास्ते में उन्हे एक ऐसे स्थान से गुजरना हुआ जहाँ कि पानी का अत्यन्त अभाव था। चलते चलते एक जगह उन्होने देखा कि बीच रास्ते में एक गदहा प्यास से व्याकुल होकर तड़प रहा है। राह चलते लोग उसे देखते और आगे निकल जाते। एकनाथ जी उस रास्ते से जाते समय यह नज़ारा देखकर शास्त्रों की, संतो की यह बात याद करने लगे कि "हर प्राणी में ईश्वर का वास है। यह देह ही देवालय है और इस देह में यह चेतन देव ही शिव है। जब गदहे के रुप में यह चेतन देव तड़प रहे हैं तो इन्हें इस हालत में छोड़कर मैं रामेश्वर कैसे जा सकता हूँ? मैं तो अपने शिव को यहीं मनाऊँगा।" ऐसा सोचकर वह हर-हर महादेव कहते हुए गंगाजल गदहे के मुँह में डालने लगे। उनके सभी संगी-साथियों और राह चलते अन्य लोगों ने भी बहुत समझाया कि अरे! क्यूँ मूर्खों वाला काम रहे हो। ये तो गदहा है। मर भी जायेगा तो क्या फर्क पड़ जाएगा ? लेकिन एकनाथ तो सच्चे संत थे। हर जीव में ईश्वर का दर्शन करते थे। और चमत्कार यह हुआ कि उसी गदहे के मुख में उन्हें साक्षात भगवान भोलेनाथ के दर्शन हो गए।

इस प्रसंग को लिखने का मेरा प्रयोजन आप सब को सिर्फ ये याद दिलाना है कि किसी का दिल दुखाकर,किसी का अपमान करके की गई भक्ति, पूजन कभी सफल नहीं हो सकती। किसी दुखी/पीड़ित की उपेक्षा करना तो एक तरह से ईश्वर का ही अपमान है। इसलिए चाहे हम मंदिरों/मस्जिदों/गुरूद्वारों में जितने मर्जी शीश झुका लें,सुबह शाम घण्टे-घडियाल बजा लें किन्तु जब तक किसी के दुख को देखकर हमारा अन्तरमन द्रवित नहीं जो जाता, हमारे ह्र्दय में दया का भाव जागृ्त नहीं हो जाता तो हमारा भजन-पूजन, दान-पुण्य करना सब व्यर्थ है।
एक निवेदन:- यदि अपने आसपास आपको कोई रोगी,लाचार,गरीब व्यक्ति मिले तो उसकी यथासंभव मदद करने की चेष्टा करें ओर जो बेचारे बेजुबान पशु-पक्षी भूख प्यास और गर्मी से व्याकुल होकर प्राण त्यागने को विवश हो रहे हैं, उनके लिए भी हमारा कुछ कर्तव्य बनता है।यदि हम सिर्फ इतना ही करने में सक्षम हो सकें तो यही हमारे लिए ईश्वर की सबसे बडी पूजा होगी।

जय भोले नाथ............

गुरुवार, 25 जून 2009

चन्द लतीफे..........

 तन्दरूस्ती का राज
हाल ही में हमारे पड़ोस में एक बूढ़े सज्जन रहने को आये । काफी खुशमिजाज और जवांदिल लगते थे।

एक दिन मैंने उनसे पूछा - आप उम्र के लिहाज से काफी तन्दुरुस्त और खुश दिखते हैं । आपके सुखी जीवन का राज क्या है ?

- मैं रोज तीन पैकेट सिगरेट पीता हूं । शाम को व्हिस्की का अध्दा और बढ़िया मसालेदार खाना खाता हूं। और हां, व्यायाम तो मैं कभी नहीं करता।

- कमाल है । मैं आश्चर्य से भर गया।
मैंने फिर पूछा - वैसे आपकी उम्र क्या होगी ?

- छब्बीस साल ।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------
फिजूल खर्ची
एक जापानी महिला अपनी सहेली के साथ सिंगापुर की सड़कों से गुजर रही थी। तभी एक महिला ने अपने प्रेमी को खिड़की के बाहर धक्का दिया जो नीचे रखे कूड़ेदान में जा गिरा।

यह देखकर जापानी महिला ने अपनी सहेली से कहा - ये सिंगापुरी महिलाएं बहुत फिजूलखर्च होती हैं।

- वो कैसे ? सहेली ने पूछा ।

- अब देखो न ! यह आदमी अभी और चार-पांच साल इसके काम आ सकता था।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------
तरक्की की सीढी
बॉस ने अपने एक कर्मचारी को ऑफिस में बुलाया और कहा - मि. गोपाल, तुमने एक साल पहले यह कंपनी बतौर क्लर्क ज्वाइन की थी। चार महीने के भीतर ही तुम्हारा प्रमोशन मैनेजर के पद पर हो गया। उसके चार महीने बाद तुम कंपनी के वाइस-चेयरमेन पद तक पहुंच गए। मेरे विचार से अब समय आ गया है कि तुम इस कंपनी का पूरा भार ग्रहण कर लो और मैं रिटायरमेंट ले लूं।

- जी । कर्मचारी ने कहा।

- तुम इस संबंध में कुछ कहना चाहते हो।

- जी हां। मैं आपको थैंक्यू कहना चाहता हूं।

- बस सिर्फ थैंक्यू ? और कुछ नहीं कहना ।

- ओह सॉरी ! थैंक्यू पापा ........ !
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------
त्रासदी
एक मंत्रीजी एक स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे । बच्चों से बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा कि क्या कोई बच्चा त्रासदी को उदाहरण देकर समझा सकता है।

एक छोटे बच्चा खड़ा हुआ और बोला - यदि किसी बच्चे को सड़क पार करते समय कोई कार कुचल दे तो यह एक त्रासदी होगी।

- नहीं बेटे .... । मंत्री जी ने टोका - यह तो एक दुर्घटना कही जाएगी।

एक दूसरे बच्चे ने बताया - यदि कोई स्कूल बस पुल से गिर जाए और उसमें बैठे सभी लोग मारे जाएं तो यह एक त्रासदी होगी।

- नहीं ... नहीं ... । मंत्री जी ने कहा - यह त्रासदी नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी अपूरणीय क्षति कही जाएगी।

- क्या और कोई बच्चा बता सकता है ? मंत्रीजी ने बच्चों से पूछा ।

आखिरकार एक बच्चा उठा और बोला - यदि आप अपने परिवार सहित एक हेलीकॉप्टर में जा रहे हों और आतंकवादी उसे बम से उड़ा दें तो यह एक त्रासदी होगी।

- शाबाश ! बहुत बढ़िया उदाहरण है । अच्छा बेटे, क्या तुम समझा सकते हो कि तुम इसे त्रासदी क्यों कह सकते हो ? मंत्रीजी ने खुश होते हुए पूछा ।

बच्चे ने समझाया - देखिए, यह दुर्घटना तो कही नहीं जा सकती और बहुत बड़ी क्षति तो कैसे भी नहीं ............ !
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------
www.hamarivani.com
रफ़्तार