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शनिवार, 16 जून 2012

मनुष्य की बढती स्वार्थपरता का खेल

यह बात तो हर कोई जानता है कि माँस कैसे प्राप्त किया जाता है. जीवन हर जीव को उतना ही प्रिय है, जितना कि हम सब को. अपनी खुशी से कोई पशु मरना नहीं चाहता. अत: उसे मारने से पूर्व अनेक क्रूर और अमानुषिक यातनाएं दी जाती हैं. जब वह वध स्थान पर खडा किया जाता है तो उसकी करूण पुकार से दिल पसीजने लगता है. मरने से पूर्व जैसे उसके मनोभाव रहते हैं, उसका ठीक वैसा ही प्रभाव उसके माँस पर भी पडता है. अब वही माँस जो कोई खायेगा, तो उन मनोभावों का प्रभाव उस पर पडे बिना भला कैसे रह सकता है. इसी से अपने देश में यह कहावत प्रचलित है, कि " जैसा खाये अन्न, वैसा होये मन " अर्थात हमारा भोजन जैसा होगा, हमारा मन भी ठीक वैसा ही होता जायेगा.
भोजन पर हमारा केवल शारीरिक स्वास्थय ही निर्भर नहीं है, अपितु वह मानसिक स्वास्थ्य का भी कारक है. सही मायनों में एक पूर्ण स्वस्थ्य मनुष्य उसे ही कहा जायेगा, जिसका कि शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ हों. स्वस्थ शरीर जहाँ रोगों से हमारी रक्षा करता हैं, वहीं स्वस्थ मन दुर्वासनाओं और दुर्विचारों से हमें बचाता है.
इसलिए माँसभक्षण न तो शरीर के लिए ही स्वास्थयकर है और न ही मन के लिए.
देखा जाये तो आज विश्व में चहुँ ओर जो इतनी अशान्ति दिखाई पडती है, उसके पीछे का एक कारण समाज में फैली माँसभक्षण की ये प्रवृति भी है. माँसाहार नें मानवी प्रवृति को एक दम से तामसिक बना छोडा है. अत: ऎसा मनुष्य केवल दूसरों के विनाश की ही बात सोच सकता है, न कि सृजन की. मुख से भले ही शान्ति-शान्ति चिल्लाते रहें, लेकिन उपाय ऎसे खोजे जा रहे हैं, जिनसे कि केवल अशान्ती ही बढती जा रही है.
किन्तु इस चीज का इन्सान इतना अभ्यस्त हो चुका है कि उसे माँस भक्षण करते हुए यह ख्याल तक नहीं आता कि जो पदार्थ हम खा रहे हैं, उसके लिए किसी को अपनी जान गँवानी पडी है. दूसरों के प्रति इतनी निर्दयता और स्वार्थीपन नें ही आज मनुष्य को मनुष्य के प्रति निष्ठुर बना दिया है. आज जो पशु के रक्त का प्यासा है, कल वो इन्सान के रक्त का प्यासा क्यूँ न होगा ? दरअसल प्यास तो सिर्फ रक्त की है, आज जो प्यास पशु के रक्त से बुझ सकती है, उसके लिए पशु का खूब बहाया जाता है. और कल को यही प्यास इन्सानी रक्त से बुझ सकेगी तो उसके लिए इन्सानी खून ही बहाया जायेगा.
यह तो मनुष्य की बढती हुई स्वार्थपरता का खेल है कि, वह प्रकृति से शाकाहारी होते हुए भी, प्रकृति प्रदत्त तरह-तरह के स्वास्थयकर पदार्थों के सहज सुलभ होने पर भी दूसरे की जान की कीमत नहीं आँकता और दूसरे के रक्त-माँस से अपनी भूख प्यास मिटाने में जुटा है.
माँस के निमित से रोजाना कितने लाखों पशु-पक्षियों को मार डाला जाता है और उससे समू़चे विश्व को कितनी बडी आर्थिक और स्वास्थ्य-विषयक क्षति उठानी पडती है, ये तो आप स्वयं ही सोच सकते हैं. यहाँ तो केवल इतना ही बतलाना है कि माँसाहार पूर्णत: अनैतिक है, जो कि मानवी सभ्यता को अनैतिकता की ओर लिए जा रहा है. मनुष्य की कोमल वृतियों को मसल, उसे निर्दयी, अकृतज्ञ और दुराचारी बनाने में जुटा है......!!!
दरअसल, मनुष्य की कोमल वृतियां ही मानव समाज की सुरक्षा का एक आवश्यक कचव है. उनके मर जाने पर समाज भी हरगिज जीवित नहीं रह सकता. अत: न केवल आहार अपितु औषधी, व्यवसाय अथवा मनोविनोद इत्यादि चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो, पशु-पक्षियों का निर्दयतापूर्वक वध रुकना ही चाहिए. इसी में विश्व का कल्याण है............       

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

वेद, वेद हैं.....कुरआन नहीं हैं !

दिकाल से भारतीय आर्य संस्कृति का विश्व में जो महत्वपूर्ण स्थान रहा है, उसे न तो किसी के चाहे झुठलाया ही जा सकता है और न ही मिटाया. ये वो एकमात्र संस्कृति रही है, जिसे उसके त्याग, शील, दया, अहिँसा और ज्ञान के लिए जाना जाता रहा है. हालाँकि वर्तमान युग में चन्द अरबी सभ्यता के पोषक एवं पालक तत्व इसकी गरिमा को लाँछित करने में पूरे मनोयोग से प्रयत्नशील हैं. ये वो आसुरी प्रवृति के लोग हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को अपने अज्ञान, कपट, हिँसा और अहं की अग्नि में भस्मीभुत कर देना चाहते हैं. लेकिन ये लोग शायद जानते ही नहीं, या कहें कि जानते हुए भी इस सत्य को पचा पाने में असमर्थ हैं, कि युगों से न जाने उनके जैसी कितनी सभ्यताओं और संस्कृतियों को ये सनातन संस्कृति अपने से समाहित कर चुकी है.
जेहादी मानसिकता के पोषक इन मलेच्छों की मलेच्छता का रोग तो यहाँ तक बढ गया है कि ये कुटिल लोग यह निराधार कल्पना करने से भी न चूके कि वेदों में माँसाहार की प्रशन्सा की गई है. ओर तो ओर आईएसआई के एक मलेच्छ एजेन्ट नें तो लगता है कि इस बात का बीडा ही उठा रखा है कि चाहे कैसे भी हो, वेदों में पशुबलि, माँसभक्षण वगैरह वगैरह सिद्ध करके ही रहूँगा.
कितने आश्चर्य की बात है कि जैसा ये लोग भविष्य को बदलना चाहते हैं, उसी प्रकार भूत को बदल डालने के अशक्य अनुष्ठान में भी प्रवृत होने लगे हैं. लेकिन ये मूर्ख नहीं जानते कि भूत सदा ही निश्चल और अमिट होता है. भविष्य की तरह वह कभी बनाये नहीं बनता. भारतीय आर्य संस्कृति और उसके आधार ग्रन्थ सत्य, शील, अहिँसा, त्याग और विश्वबन्धुत्व जैसे न जाने कितने सद्गुणों की उपज हैं. यह एक ऎसा ज्वलन्त सत्य है, जो किसी भी प्रकार से आवृत या असंदिग्ध न तो युगों से कभी हो सका है और न ही भविष्य में कभी हो सकता है. चाहे ये आसुरी जीव लाख सिर पटक लें.................
हालाँकि ब्लागिंग की दुनिया में सक्रिय प्रत्येक पाठक इस बात को भली भाँती समझता है कि विधर्मियों द्वारा फैलाया जा रहा ये मिथ्याचार केवल और केवलमात्र इस राष्ट्र एवं इसकी संस्कृति विषयक अरूचि का द्योतक है. भला मूर्खों को कोई क्या समझाये कि माँस भक्षण के विषय में उस समय के समाज में कितनी घृणा व्याप्त थी, यह तो इस जाति के धर्मशास्त्रों को स्वयं पढकर ही जाना जा सकता है,न कि अपने आकाओं द्वारा बताये गये मनमाफिक अनुवादों द्वारा.
भारतीय धार्मिक तथा व्यवहारिक शास्त्रों में "मानव जाति का आहार" क्या होना चाहिए, इस विषय की विचारणा तो अनादिकाल से ही होती आ रही है. वेद, पुराण, विविध स्मृतियां, जैन-सिद्धान्त इत्यादि इस विचारणा के मौलिक आधार ग्रन्थ हैं. इनके अतिरिक्त आयुर्वेद शास्त्र, उसके निघण्टु कोष तथा पाकशास्त्र भी मानव जाति के आहार के विषय में पर्याप्त प्रकाश डालने वाले ग्रन्थ हैं. परन्तु इस विषय की खोज करने का समय तभी आता है, जबकि मानव के भक्षण योग्य पदार्थों के सम्बन्ध में दो मत खडे होते हैं.
अनादि काल से मानव घी, दूध, दही एवं वनस्पति का ही भोजन करता आया है, माना कि समय-समय पर इसके सम्बन्ध में विपरीत विचार भी उपस्थित हुए हैं. लेकिन तात्कालिक विद्वानों नें अपने-अपने ग्रन्थों में भोजन सम्बन्धी इस नवीन "माँसभोजी मान्यता" का खंडन ही किया है न कि समर्थन.
अब इससे बढकर भला ओर क्या प्रमाण हो सकता है कि शास्त्र की दृष्टि में जो पदार्थ अभक्ष्य होता, उसकी निवृति के लिए उसे गो-माँस तुल्य बताकर उसे छोडने का उपदेश दिया जाता था. इस विषय के दृष्टान्तों से तो धर्मशास्त्र भरे पडे हैं. हम उनमें से केवल एक ही उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करेंगें.
घृतं वा यदि वा तैलं, विप्रोनाद्यान्नखस्थितम !
यमस्तदशुचि प्राह, तुल्यं गोमासभक्षण: !!

माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि: !
प्र नु वोचं चिकितुपे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट !! (ऋग्वेद 8/101/15)
अर्थात रूद्र ब्रह्मचारियों की माता, वसु ब्रह्मचारियों के लिए दुहिता के समान प्रिय, आदित्य ब्रह्मचारियों के लिए बहिन के समान स्नेहशील, दुग्धरूप अमृत के केन्द्र इस (अनागम) निर्दोष (अदितिम) अखंडनीया (गाम) गौ को (मा वधिष्ट) कभी मत मार. ऎसा मैं (चिकितेषु जनाय) प्रत्येक विचारशील मनुष्य के लिए (प्रनुवोचम) उपदेश करता हूँ.
वेदों के इतने स्पष्ट आदेश होते हुए यह कल्पना करना भी अपने आप में नितांत असंगत है कि वैदिक यज्ञों में माँसाहुति दी जाती थी, या कि वैदिक आर्य जाति पशुबलि, गौहत्या, माँसभक्ष्ण जैसे निकृष्ट कर्मों में संलग्न थी. यदि कोई राक्षस ( जिन्हे वेदों में यातुधान वा हिँसक के नाम से पुकारते हुए अत्यन्त निन्दनीय बतलाया गया है) ऎसा दुष्कर्म करते होंगें--------जैसा कि प्रत्येक समय में अच्छे-बुरे व्यक्ति कम या अधिक मात्रा में होते ही हैं, तो उनके इस कार्य को किसी प्रकार भी शिष्टानुमोदित नहीं माना जा सकता. ऎसे पापियों के लिए तो वेद मृत्युदंड का ही विधान करते हैं. जैसा कि यहाँ सप्रमाण दिखाया जा चुका है...........
यदि नो गां हंसि यघश्वं यदि पुरूषम !
त्वं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोसो अवीरहा !! (अथर्व.1/1/64)
अर्थात हे दुष्ट ! यदि तूं हमारे गायें, घोडे आदि पशु अथवा पुरूषों की हत्या करेगा तो हम तुझे सीसे की गोली से वेध देंगें.
य: पौरूषेयेण क्रविषा समंक्ते यो अश्वयेन पशुना: यातुधान: !
यो अध्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च !! (ऋग्वेद 10/87/16)
अर्थात जो मानव, घोडे या अन्य पशु के माँस का भक्षण करता है. और जो गौंओं की हत्या कर के उनके दूध से अन्यों को वंचित करता है. हे राजन! यदि अन्य उपायों से ऎसा यातुधान ( हिँसक--राक्षस वृति का मनुष्य) न माने तो अपने तेज से उसके सिर तक को काट डाल. यह अन्तिम दण्ड है जिसको दिया जा सकता है.
उपरोक्त मन्त्र माँसभक्षण निषेध की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है. अत: उसका सायणाचार्य कृत भाष्य भी यहाँ उद्धृत किया जाता है:--
य: यातुधान:--राक्षस: ( पौरूषेयेन क्रविषा) पुरूषसंम्बन्धिना हिंसेण (समंड्ते) आत्मानं संगमयति (यश्च अश्व्येन) अश्वसमूहेन तदियेन मांसेनेत्यर्थ: आत्मानं संगमयति यो वा यातुधान: अन्येन पशुना आत्मानं संगमयति यो वा यातुधान: (अध्न्याया:) गो: (क्षीरम) (भरति) हरति हे अग्ने त्वं तेषां सर्वेषामपि राक्षसानाम (शीर्षाणि) शिरांसि (हरसा) त्वदीयेन तेजसा (वृश्चा) छिन्धि ! इस का अर्थ वही है, जो हम यहाँ ऊपर दे चुके हैं.
ऋग्वेद 10.87 में यातुधानो अथवा राक्षसों के स्वभाव का वर्णन है. उसमें 3-4 स्थानों पर "क्रव्याद" इस विशेषण का प्रयोग है, जिसका अर्थ माँसभक्षक है. उपरोक्त ऋचा उसी सूक्त की है, जिसका सायणभाष्य सहित हमने उल्लेख किया है.
य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्व.8/6/23)
इस मन्त्र में कहा है कि जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !
हालाँकि इस विषय में सैकडों क्या हजारों मन्त्रों को उद्धृत किया जा सकता है, किन्तु विषय विस्तार के भय से दो ओर मन्त्रों का उल्लेख कर जिनमें चावल, जौं, माष ( उडद, तिल आदि उत्तम अन्न के सेवन का और पशुओं के दूध को ही ( न कि मांस को) सेवन करने का उपदेश है, हम इस विषय को समाप्त करते हैं.
पुष्टिं पशुनां परिजग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम !
पय: पशुनां रसमोषधीनां बृहस्पति: सविता मे नियच्छात !! (अथर्व.19/31/5)
इस मन्त्र में भी यही कहा है कि मैं पशुओं की पुष्टि वा शक्ति को अपने अन्दर ग्रहण करता हूं और धान्य का सेवन करता हूँ. सर्वोत्पादक ज्ञानदायक परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बनाया है कि (पशुनां पय:) गौ, बकरी आदि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण किया जाये न कि मांस तथा औषधियों के रस का आरोग्य के लिए सेवन किया जाए. यहां भी "पशुनां पयइति बृहस्पति: मे नियच्छात:" अर्थात ज्ञानप्रद परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बना दिया है कि मैं गवादि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण करूँ, स्पष्टतया मांसनिषेधक है !
अथर्ववेद 8/2/18 में ब्रीही और यव अर्थात चावल और जौं (ये धान्यों के उपलक्षण हैं) इत्यादि के विषय में कहा है कि------
शिवौ ते स्तां ब्रीहीयवावबलासावदोमधौ !
एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुण्चतौ अंहस: !!
हे मनुष्य ! तेरे लिए चावल, जौं आदि धान्य कल्याणकारी हैं. ये रोगों को दूर करते हैं और सात्विक होने के कारण पाप वासना से दूर रखते हैं.
इन के विरूद्ध माँस पाप वासना को बढाने वाला और अनेक रोगोत्पादक है. अत: माँस शब्द की जो व्युत्पत्ति  निरूक्त अध्याय 4.पाद 1. खं 3. में बताई गई है, उसमें कहा है---मासं माननं वा, मानसं वा, मनोस्मिन् सीदतीति वा !
माँस इसलिए कहते हैं कि यह मा + अननम है अर्थात इस से दीर्घ जीवन प्राप्त नहीं होता प्रत्युत यह आयु को क्षीण करने वाला है. ( मानसं वा ) यह हिंसाजन्य होने से मानस पापों को प्रोत्साहित करने वाला होता है. (मनोस्मिन् सीदतीति वा) जिस में भी मनुष्य का मन लग जाए, जो मन पसन्द हो ऎसे पदार्थ को मांस कह सकते हैं. इसीलिए परमान्न वा खीर तथा फलों के गूदे इत्यादि के लिए मांस शब्द का प्रयोग वेदों में कईं जगह आता है.
इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि वेदों में माँस भक्षण का पूर्णतय: निषेध है. इस के विरूद्ध धूर्तों द्वारा जहाँ कहीं कुछ अन्टशन्ट लिखा/कहा गया हो, वह अप्रमाणिक और अमान्य है, क्योंकि वेद, वेद हैं.......कुरआन नहीं हैं !

सोमवार, 25 जुलाई 2011

उफ्!

एक ओर जयचन्दी इरादे हैं, तो दूसरी ओर दिलोदिमाग में ढेर सारी चिन्ताएं और गुस्सा लिए एक आम इन्सान की आम जिन्दगी. इस समय जो कुछ हो रहा है, वही एकमात्र सच है और जिस ढंग से हो रहा है, शायद वही आज की नैतिकता भी है. आज के इस युग में 'सत्य' और 'नैतिकता' न तो आईने की तरह ही रहे हैं और न ही किसी कसौटी की तरह, कि इन्हे किसी के चेहरे या चरित्र के सामने रख दिया जाये. किन्तु जो बेचारे ऎसा सोचते हैं, वे आज की 'सफल' जिन्दगी से अलग, एक विकलता और अकुलाहट का अनुभव कर रहे होते हैं. बस जो जितना ही संवेदनशील है, वह उतना ही इस अनुभव के बीच है.
जमाने की रफ्तार को देखा जाए तो आज बैठना किसी को नहीं है, शर्त है तो बस चलते रहने की. हर कोई चलता चले जा रहा है. पसीने से तरबतर और पस्त. जो बेचारे नहीं चल पा रहे हैं, उन्हे चलाने की कौशिशें की जा रही है, घिस्से हुए सिक्के या मुडे-तुडे फटे नोट की तरह.
सुना है कि थकान से समझ ढीली होती जाती है, और उसी अनुपात में क्रोध भी बढता जाता है. और फिर जब वो हद से अधिक बढ जाता है तो फिर उतरने के लिए रास्ते खोजा करता है. अब जिन लोगों या स्थितियों पर क्रोध है, उनका कुछ भी बिगाड पाना संभव न देखकर आदमी करे तो क्या करे ? वो बस अपने आप में सिर्फ कुढ सकता है और वह कुढ रहा है. गुस्सा, बेबसी,तंगदस्ती,थकान,कुढन,तनाव और गतिशीलता------इन सुर्खियों से तैयार शर्तनामे का हर अक्षर आज की दिनचर्या का विवरण है और इस दिनचर्या के चारों ओर फैली हुई है----लोकतान्त्रिक बाडे की विशाल दीवारे, जहाँ सब कुछ समझने की स्वतन्त्रता तो है, किन्तु कुछ भी सोच पाने के लिए फुरसत और थोडा भी कर गुजरने का साहस नहीं है. शाश्वत प्रश्न और शाश्वत मूल्य जैसी चीजों का तो नामोनिशान तक मिटाया जा चुका है. हो भी क्यों न-----आखिर आधुनिक होने के लिए मूल्यों की तिलांजली तो देनी ही पडती है.
देश, समाज, भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आधुनिकता, लोकतन्त्र, राष्ट्रप्रेम, मूल्य और भी न जाने क्या क्या--------उफ! कितना गडमड है न ये सबकुछ ?

ज्योतिष की सार्थकता

शनिवार, 16 जुलाई 2011

मनुज प्रकृति से शाकाहारी

मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !
पशु भी मानव जैसे प्राणी
वे मेवा फल फूल नहीं हैं !!

वे जीते हैं अपने श्रम पर
होती उनके नहीं दुकानें
मोती देते उन्हे न सागर
हीरे देती उन्हे न खानें
नहीं उन्हे हैं आय कहीं से
और न उनके कोष कहीं हैं
केवल तृण से क्षुधा शान्त कर
वे संतोषी खेल रहे हैं
नंगे तन पर धूप जेठ की
ठंड पूस की झेल रहे हैं
इतने पर भी चलें कभी वें
मानव के प्रतिकूल नहीं हैं
अत: स्वाद हित उन्हे निगलना
सभ्यता के अनुकूल नहीं है!
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!

नदियों का मल खाकर खारा,
पानी पी जी रही मछलियाँ
कभी मनुज के खेतों में घुस
चरती नहीं वे मटर की फलियाँ
अत: निहत्थी जल कुमारियों
के घर जाकर जाल बिछाना
छल से उन्हे बलात पकडना
निरीह जीव पर छुरी चलाना
दुराचार है ! अनाचार है !
यह छोटी सी भूल नहीं है
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है  !!

मित्रो माँस को तज कर उसका
उत्पादन तुम आज घटाओ,
बनो निरामिष अन्न उगानें--
में तुम अपना हाथ बँटाओ,
तजो रे मानव! छुरी कटारी,
नदियों मे अब जाल न डालो
और चला हल खेतों में तुम
अब गेहूँ की बाल निकालो
शाकाहारी और अहिँसक
बनो धर्म का मूल यही है
मनुज प्रकृति से शाकाहारी,
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!

रचनाकार:-----श्री धन्यकुमार

सोमवार, 27 जून 2011

पुनर्जन्म की वैज्ञानिक संभावना

पुनर्जन्म----एक ऎसा विचार जिसे हिन्दू धर्म की सभी शाखाओं द्वारा स्वीकृत किया गया है. भगवतगीता का कहना है कि जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है उसका जन्म भी होना निश्चित है. लेकिन जन्म अन्त समय के संस्कार और इच्छाओं के अनुरूप होता है. 
भारतीय दार्शनिकों को तो पुनर्जन्म स्वीकारने में कोई परेशानी नहीं होती किन्तु विज्ञान जगत का स्वीकार करना ही भारतीय दर्शन की सबसे बडी बिजय होगी. विज्ञान की स्पष्ट धारणा है कि कभी भी कुछ पूर्णत: समाप्त नहीं होता. केवल उसका रूप परिवर्तित हो जाता है. तो क्या यह संभव नहीं कि जीवन भी समाप्त न होकर परिवर्तन हो जाए.

"यह सम्पूर्ण जीवन जगत तरंगात्मक है. जीवन मनोभौतिक तरंगों का समानान्तरीकरण है. यह समानान्तरीकरण का ही जीवन है. इसका नियोजन मनुष्य की मानसिक या शारीरिक मृत्यु का कारण होता है."
विज्ञान जगत भी इस बात को स्वीकार करता है कि जीवन तरंगात्मक है. इ.सी.जी.( E.C.G.) भी इस बात का स्पष्ट प्रमाण देती है. तरंग जहाँ जीवन हैं, सीधी रेखा मृत्यु की द्योतक है.
जब हम मानकर चलते हैं कि तरंगें कभी समाप्त नहीं होती तो यह मानना ही पडेगा कि मनुष्य की मृत्यु के पश्चात उसकी मनस तरंगें ब्राह्मंड में ही विचरण करती रहती हैं और जब किसी भौतिक तरंग (शरीर) से उनका समानान्तरीकरण हो जाता हैतो यह उस मनस तरंग का पुनर्जन्म हुआ.
यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान जगत यह मान रहा है कि शरीर की मृत्यु के पश्चात मस्तिष्क लगभग 5 या 6 घंटे की अवधि तक जीवित रहता है. मेरे शब्दों में मनस की अन्तर्यात्रा सम्भव है. भारतीय शैली में अग्निसंस्कार में मृतक की कपालक्रिया द्वारा मस्तिष्क की मृत्यु को भी पूर्णरूप से सुनिश्चित कर लिया जाता है ताकि आत्मा मुक्त हो जाए, भटके नहीं.
किसी भी शैली का अंतिम संस्कार शरीर को नष्ट कर ही देता है. अत: यह तो निश्चित है कि शरीर का पुनर्जन्म नहीं होता किन्तु विशेष स्थितियों में मनस या तरंगों का पुनर्जन्म हो सकता है. कोई आवश्यक नहीं ईसा या बुद्ध की तरंग पुन: धरती पर ही जन्म लें. हो सकता है हजारों वर्षों बाद किसी अन्य जीवित ग्रह पर उनका पुनर्जन्म हो रहा हो.
पुनर्जन्म की स्मृति की व्याख्या भी इसी आधार पर सहजता में होती है. क्योंकि अधिकांशत: पुनर्जन्म का स्मरण रखने वाले व्यक्ति अबोध शिशु ही होते हैं. उनके संस्काररहित कच्चे मन से कोई मनस तरंग सम्पर्क स्थापित कर लेती है किन्तु जब उनका मस्तिष्क अपने ज्ञान व अनुभव स्वयं पर अंकित करने में सक्षम हो जाता है तो ऎसी स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं. यह मेरी धारणा है. वैसे भी प्राय: असामान्य रूप से मृत्यु प्राप्त करने वाली को ही पुनर्जन्म की घटनायें देखने सुनने को मिलती हैं.

किन्तु इस ज्योतिषांज्योति का अमृत प्राप्त कर लेने वाला साधक ब्रह्ममय हो जाता है. उसकी मनस तरंगें महामानस में विलीन हो जाती है.

शुक्रवार, 24 जून 2011

क्यूंकि हर धर्म यही कहता है.........

श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं----"सर्वभूत हिते रत्ता" अर्थात सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हित में रत और सम्पूर्ण प्राणियों का सुह्रद रहो. जो शुभफल प्राणियों पर दया करने से होता है, वह फल न तो वेदों से, समस्त यज्ञों के करने से और न ही किसी तीर्थ, वन्दन अथवा स्नान-दान इत्यादि से होता है.

जीवितुं य: स्वयं चेच्छेत कथं सोन्यं प्रघात्तयेतु !
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत !!
जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को भला कैसे मार सकता है ? प्राणी जैसा अपने लिए चाहता है, वैसा ही दूसरों के लिए भी चाहे. कोई भी इन्सान यह नहीं चाहता कि कोई हिँसक पशु या मनुष्य मुझे, मेरे बाल-बच्चों, इष्टमित्रों वा आत्मीयजनों को किसी प्रकार का कष्ट दे या हानि पहुँचाये अथवा प्राण ले ले या इनका माँस खाये. एक कसाई जो प्रतिदिन सैकडों प्राणियों के गले पर खंजर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूईं भी चुभोयें, तो वह उसे भी कभी सहन नहीं करेगा. फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे भला कहाँ से मिल गया ?
मित्रस्य चक्षुणा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे !!
हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें. इस वेदाज्ञानुसार सब प्राणियों को मित्रवत समझकर सेवा करें, सुख दे. इसी में जीवन की सफलता है. इसी से यह लोक और परलोक दोनों बनते हैं.

फिर दूसरों के प्रति हमें वैसा बर्ताव कदापि नहीं करना चाहिए, जिसे हम अपने लिए पसन्द न करें. कहा भी है, कि------"आत्मन प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत". लेकिन देखिए दुनिया में कितना बडा विरोधाभास है, जहाँ एक ओर हम भगवान से "दया के लिए" प्रार्थना करते हैं और वहीं दूसरे प्राणियों के प्रति क्रूर हो जाते हैं-------How is that man who prays for money, is himself not merciful towards other fellow beings.


इस्लामिक धर्मग्रन्थ कुरआन शरीफ का आरम्भ ही "बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम" से होता है. जिसका अर्थ है कि खुदा रहीम अर्थात "सब पर रहम" करने वाला है. इनके अनुनायियों के मुख से भी सदैव यही सुनने को मिलता है कि अल्लाह अत्यन्त कृपाशील दयावान है .वही हर चीज को पैदा करने वाला और उसका निगहबान(Guardian ) है. अब जीभ के स्वाद के चक्कर में मनुष्य उस "निगहबान" की देखरेख में उसी की पैदा की हुई चीज की हत्या करे, तो क्या यह अत्यन्त विचारणीय प्रश्न नहीं ?

श्री अरविन्द कहते रहे हैं कि-----"जो भोजन आप लेते हैं, उसके साथ न्यूनाधिक मात्रा में उस पशु की जिसका माँस आप निगलते हैं, चेतना भी लेते हैं"

भगवान बुद्ध नें "माँस और खून के आहार" को अभक्ष्य और घृणा से भरा और 'मलेच्छों द्वारा सेवित' कहा है.  

सिक्ख धर्म के जनक गुरू नानक देव जी कहते हैं-----"घृणित खून जब मनुष्य पियेगा, तो वह निर्मल चित्त
भला कैसे रह सकेगा."

पारसी धर्म के प्रणेता जोरास्टर नें कसाईखानों को पाप की आकर्षण शक्ति का केन्द्र बताया है और हिब्रू धर्म के सन्त इजराइल कहते हैं----" जब तुम बहुत प्रार्थना करते हो, मैं उन्हे नहीं सुनूँगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं". चीनी विद्वान कन्फ्यूनिस नें भी जहाँ "पशु आहार को संसार का सर्वाधिक अनैतिक कर्म" कहा है, वहीं रामकृष्ण परमहँस का कहना है, कि-----"सात्विक आहार-उच्च विचार मनुष्य को परम शान्ति प्रदान करने का एकमात्र साधन है".

भगवान महावीर नें अहिँसा को "अश्रमों का ह्रदय", "शास्त्रों का गर्भ" (Nucleous) एवं "व्रत-उपवास तथा सदगुणों का पिंडी भूतसार" कहा है. और संसार में जितने प्राणी है, उन सबको जानते हुए या अनजाने में भी कोई कष्ट न देना ही धर्म का एकमात्र मूल तत्व है.

आपने देखा कि मनुष्य जाति के इतिहास में शायद ही कोई ऎसा धर्म अथवा धर्मशास्त्र होगा, जिसमें अहिंसा को सबसे ऊँचा स्थान न दिया गया हो. लेकिन इन्सान, जो कि अपने स्वयं का आसन इस संसार के अन्य समस्त प्राणियों से कहीं ऊँचा समझता है. क्या उस पर बैठकर उसे अपने खानपान का इतना भी विवेक नहीं कि वह सही मायनों में मानव बनना तो बहुत दूर की बात रही, एक पशु से ही कुछ सीख ले सके. एक पशु भी इस बात को अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य. उसे कोई सिखानेवाला नहीं है, फिर भी वो अपने आहार का उचित ज्ञान रखता है, परन्तु इन्सान पशु से भी इतना नीचे गिर गया है कि दूसरों के द्वारा परामर्श दिए जाने पर भी वह अपने को उसी रूप में गौरवशाली समझता है. क्या एक समझदार आदमी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो अपना पौरूष अपने से निर्बल प्राणी को मारकर अथवा उसे खाकर ही दिखाये ?. विधाता नें इन्सान के खाने के लिए स्वादु मधुर, पौष्टिक, बुद्धिवर्धक और हितकर इतने पदार्थ बना रखे हैं कि उनको छोडकर एक निकृष्ट अभक्ष्य पदार्थ पर टूट पडना कहाँ तक उचित है ?

यह कहना सर्वथा उचित ही होगा कि माँसाहार को छोड देने वाला व्यक्ति अन्य अनेक प्रकार की बुराईयों से भी स्वत: ही मुक्त हो जायेगा. इसलिए मेरा यही कहना है कि जो लोग इस बुराई से दूर रहे हैं, उनकी अपेक्षा वे लोग कहीं अधिक साहसी माने जायेंगें, जो इस लत को लात मारकर निरीह पशुओं के आँसू पोंछेंगें.
पक्षी और चौपाये सब मार-मार के खाय,
फिर भी सगर्व खुद को इन्सान कहाये !
बन के मर्द बहादुरी, बकरों-मुर्गों पर दिखलाये !
क्यूं  तुझे लाज नहीं आये ?

गुरुवार, 16 जून 2011

क्या भ्रष्टाचार के इस दानव पर अंकुश लगा पाना सम्भव है ?


आचार और विचार की शुद्धता भारतीय सभ्यता का मूलमन्त्र रहा है. मनुष्यता सदैव आचरण और व्यवहार से पहचानी जाती है; पैसा, पद अथवा उपाधि से नहीं. हर युग, हर देश और यहाँ तक कि हर धर्म में मानव-जीवन की मर्यादा के एक-से सिद्धान्त स्वीकृत हैं. वे हैं---कर्तव्य-परायणता, सत्यनिष्ठा, नि:स्वार्थ कर्म, मानवमात्र के प्रति सहानुभूति और परोपकार की भावना आदि. इन मर्यादाओं के अनुसार किया गया आचरण और व्यवहार ही "सदाचार" माना जाता है तथा इसके विपरीत, मर्यादा से हटकर, स्वार्थपूर्ण, दूषित आचरण "भ्रष्टाचार" है. हमारा जो भी कार्य औचित्य के विरूद्ध होगा, अनुचित होगा, वह निश्चित ही भ्रष्टाचार की श्रेणी में गिना जाएगा.
आज स्थिति ये है कि ये "भ्रष्टाचार" हमारे जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में कैंसर के भीषण रोग की तरह इस प्रकार अपनी जडें जमा चुका है कि यदि एक क्षेत्र में इसकी चिकित्सा की भी जाती है तो वह दूसरे क्षेत्र में, दूसरे रूप में फूट पडता है. प्रशासन तन्त्र के हर विभाग, अनुभाग और प्रभाग तथा राजनैतिक क्षेत्र में तो भ्रष्टाचार एक औपचारिक अनिवार्यता बन ही चुका है----सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र भी इस 'महारोग' के कीटाणुओं से बच नहीं पाया है. कोई भी ऎसा कार्य जो कि एक नागरिक के रूप में हमारा मूलभूत संवैधानिक अधिकार है, तो भी किसी न किसी सम्बन्धित अधिकारी की जेब या मुट्ठी गर्म किए बिना बात ही नहीं सुनी जाती. जब न्यायसंगत और 'उचित' कार्य भी रिश्वत अथवा सिफारिश के बिना नहीं हो सकते तो अनुचित रूप से लाभकारी कार्यों के लिए तो 'उच्चतम' भ्रष्टाचार स्वाभाविक ही है.

भ्रष्टाचार के इस विषैले कीट नें इस देश के लोकतन्त्र की जडों तक तो पूरी तरह से खोखला कर डाला है.आज स्थिति यह है कि प्रिंट मीडिया हो चाहे टेलिवीजन मीडिया---अभिव्यक्ति-स्वातन्त्र्य के मूलभूत अधिकार पर भी सेंसर, पक्षपात तथा ब्लैकमेल, चरित्रहनन, अपप्रचार आदि के रूप में भ्रष्टाचार का दानव निरन्तर कुठाराघात कर रहा है.

आखिर, भ्रष्टाचार की इस भयंकर महाव्याधि का कारण क्या है ? इसका उत्तरदायी कौन है ? निस्सन्देह नौकरशाही प्रशासनिक व्यवस्था इस समस्या की जड है. स्थिति ये है कि ऊपर मन्त्री से लेकर नीचे सन्तरी तक भ्रष्टाचार के अनेक सोपान है. लेकिन इन सोपानों का निर्माणकर्ता कौन है ? केवल शासनतन्त्र को इसका दोष देकर सन्तोष नहीं किया जा सकता. यह ठीक है कि भ्रष्टाचार का जन्म प्रशासन और न्याय-व्यवस्था में विलम्ब का कारण होता है. सरकार विभिन्न संस्थानों, उद्योगों तथा योजना-कार्यों को पर्याप्त अनुदान प्रदान करती है, जिसे स्वार्थी भ्रष्टाचारी बीच में ही हडप लेते हैं, एक आम आदमी तक कुछ नहीं पहुँच पाता. जो स्वयं को मिलने वाले अधिकार का कुछ अंश बिचौलियों में बाँट सके, सिर्फ वही कुछ हासिल कर सकता है. क्या इस सबका कारण स्वयं जनता नहीं है ? कोई भी अधिकारी मूलत: भ्रष्टाचारी नहीं होता. जनता स्वयं अपनी आवश्यकताओं को 'समय से पहले' या अनुचित रूप से पूरा करने के लोभ से, उसी लोभ का कुछ भाग सम्बन्धित अधिकारी को पेश करती है. इस प्रकार स्वयं 'दाना फेंककर' भ्रष्टाचार का श्रीगणेश करती है. कहा जा सकता है कि जिसने लाखों रूपयों का चढावा चढाकर कोई सरकारी पद प्राप्त किया है, वह अधिकार हाथ में आते ही अपना 'व्यय' क्यों नहीं निकालेगा ? लेकिन सबसे पहले रिश्वत देकर भ्रष्टाचार को स्वीकृति तो उसी ने दी थी ! आज का अधिकारी, नेता या मन्त्री कल तक जनता का ही एक अंग था. उस समय यदि वह भ्रष्ट साधन अपनाकर अपनी तथाकथित "उन्नति" के लिए पासा न फैंकें------और प्रत्येक व्यक्ति ऎसा ही निश्चय कर ले तो भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन नहीं मिल सकता. इसी प्रकार प्रत्येक राजनीतिक दल चुनाव के लिए विभिन्न तरह के लोगों और उद्योगों से पार्टी फंड के रूप में "काला धन" हासिल करता है. अत: विजयी होने पर उन व्यक्तियों एवं उद्योगों को उचित-ानुचित रूप से लाभ पहुँचाने की वह दल हर सम्भव चेष्टा करता है. इस प्रकार भ्रष्टाचार का चक्र अनवरत रूप से चलता रहता है.

स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की निरन्तर वृद्धि का कारण किसी एक वर्ग की स्वार्थान्ध वृति नहीं, जनता और सरकार, देश और समाज के प्राय: सभी वर्ग किसी-न-किसी रूप में इस समस्या के लिए जिम्मेदार हैं. इस समस्या के निरन्तर पनपने के कुछ मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कारण भी हैं. कईं बार कुछ लोगों की मजबूरी और लाचारी उन्हे न चाहते हुए भी भ्रष्टाचार के जाल में फँसा देती है. आकाश को छूने वाली महँगाई के कारण अच्छ ऊँचे पद पर काम करने तथा पर्याप्त वेतन पाने वाले लोग भी परिवार का भली-भाँती पालन-पोषण करने में असमर्थ हो रहे हैं, निम्न और साधारण वर्ग की तो बात ही क्या है. इस स्थिति में कुछ दिन तक तो काम चल सकता है, जीवन की सभी आवश्यकताएं स्थायी रूप से पूरी नहीं की जा सकती. ऎसी स्थिति में लोग विवश होकर अनुचित साधनों से आय बढाने के उपाय नहीं सोचेंगें तो भला ओर क्या करेंगें. ये तो रहा आर्थिक कारण जो भ्रष्टाचार के इस पौधे को खाद देने का काम कर रहा है. इसके अतिरिक्त इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण ये है कि हम लोग अपनी आवश्यकताएँ दूसरों की देखादेखी बढाते चले जा रहे हैं. आज केवल पेट भरने, शरीर ढँकने या रहने में इतना खर्च नहीं होता, जितना कि ऊपरी रख-रखाव, मौजमस्ती , शानो-शौकत और बनाव-श्रृंगार में होता है. हमारे घर में चाहे दो समय का भोजन जुटाना कठिन हो किन्तु मोहल्ले, समाज और दुनिया की नजरों में अपनी मिथ्या शान बनाये रखने के लिए जिन ढकोसलों में पडे हैं, उन्हे ही हम जीवन का अनिवार्य अंग मानने लगे हैं. इन ऊपरी अनावश्यक बातों के लिए जब हमारी उचित आय पूरी नहीं पडती, तब अनुचित आमदनी के लिए ललकना तो स्वाभाविक ही है!

भ्रष्टाचार के जो भी रूप और कारण आज हम देख रहे हैं, उनका निराकरण कोई असम्भव बात नहीं है. वैसे तो देश के बडे-बडे विचारक और अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि 'काला धन' अर्थात भ्रष्टाचार देश का एक समानान्तर अर्र्थशास्त्र बन चुका है, जिससे मुक्ति नहीं पाई अज सकती. लेकिन मैं कहता हूँ कि यह सोच केवल बुराई के सामने आत्म-समर्पण है. कठोर नियन्त्रण और सच्चे आत्मानुशासन से इस समस्या का समाधान निश्चित रूप से किया जा सकता है. कठोर कानूनी व्यवस्था द्वारा निसन्न्देह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया अज सकता है. बस आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि सरकार और जनता की आँख खुली रहनी चाहिए. आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक------किसी भी प्रकार का भ्रष्ट आचरण करने वाले पर तनिक सा सन्देह होते ही कठोर निगरानी की जानी चाहिए और भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आने पर अपराधी को अवश्य दण्डित किया जाना चाहिए. लेकिन कठिनाई तो यह है कि दण्ड-व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार के जीवाणु घुस चुके है. उसे सतर्क, निष्पक्ष एवं कठोर बनाने के लिए आवश्यक है कि जनलोकपाल बिल के रूप में एक अधिकार प्राप्त, शक्ति-सम्पन्न और हर प्रकार के राजनैतिक दबाव से मुक्त स्वायत न्याय-तन्त्र स्थापित किया जाए, जिसका कार्य केवल विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार के मामलों की ही सुनवाई और उनके सम्बन्ध में कारवाई करना हो. हालाँकि अन्ना हजारे एवं उनकी मंडली इस दिशा में प्रयासरत्त है, लेकिन सरकार की मनोदशा को भाँपते हुए ये कहना अभी मुश्किल ही है ऊँट किस करवट बैठने वाला है.
इसके अतिरिक्त एक कार्य ओर है जो भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है. वि ये कि मिलावटखोरों, जमाखोरों और रिश्वत लेने-देने वालों को पकडकर उनका मुँह काला करके सरेआम बाजार में घुमाया जाए. यह सामाजिक तिरस्कार बडी से बडी कैद से भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो सकता है. लेकिन इस देश की यह एक विडम्बना है कि भ्रष्टाचार को दबाने वाले कहीं-न कहीं स्वयं उसी का शिकार हो जाते है. इसलिए ऎसा कुछ हो पाएगा, इसकी उम्मीद रखना भी शायद बेमानी ही होगा.

लेकिन एक बात तो तय है कि यदि भ्रष्टाचार के दानव को परास्त करना है, तो उसके लिए चहुँमुखी अभियान आवश्यक है------सरकार, जनता, कानून और आत्मानुशासन----इन चारों में परस्पर समन्वय होने पर ही इस नासूर से मुक्ति पाई जा सकती है, अन्यथा नहीं.

गुरुवार, 31 मार्च 2011

माँसाहार अर्थात वैश्विक अशान्ति का घर

माँसाहार को अगर "अशान्ति का घर" कहा जाये, तो शायद कुछ गलत नहीं होगा. डा. राजेन्द्र प्रसाद जी नें एक बार कहा था कि "अगर संसार में शान्ति कायम करनी है तो उसके लिए दुनिया से माँसाहार को समाप्त करना होगा. बिना माँसाहार पर अंकुश लगाये ये संसार सदैव अशान्ति का घर ही बना रहेगा".

डा. राजेन्द्र प्रसाद जी नें कितनी सही बात कही है. ये कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि माँसाहार के चलते दुनिया में शान्ति कायम नहीं रह सकती. शाकाहारी नीति का अनुसरण करने से ही पृथ्वी पर शान्ति, प्रेम, और आनन्द को चिरकाल तक बनाये रखा जा सकता है, अन्यथा नहीं.
पश्चिमी विद्वान मोरिस सी. किघली का भी कुछ ऎसा ही मानना है. उनके शब्दों में कहा जाए, तो " यदि पृथ्वी पर स्वर्ग का साम्राज्य स्थापित करना है तो पहले कदम के रूप में माँस भोजन को सर्वथा वर्जनीय करना होगा, क्योंकि माँसाहार अहिँसक समाज की रचना में सबसे बडी बाधा है".

आज जहाँ शाकाहार की महत्ता को स्वीकार करते हुए माँसाहार के जनक पश्चिमी राष्ट्रों तक में शाकाहार को अंगीकार किया जाने लगा है, उसके पक्ष में आन्दोलन छेडे जा रहे हैं, जिसके लिए न जाने कितनी संस्थायें कार्यरत हैं. पर अफसोस! भगवान राम और कृष्ण के भक्त, शाकाहारी हनुमान जी के आराधक, भगवान महावीर के 'जितेन्द्रिय', गुरू नानक जी के निर्मल चित्त के चित्तेरे, कबीर के 'अविनाशी' पद को प्राप्त करने की परीक्षा में लगे हुए साधक, महर्षि दयानन्द जी के अहिँसक आर्य समाजी और रामकृष्ण परमहँस के 'चित्त परिष्कार रेखे' देखने वाले इस देश भारत की पावन भूमी पर "पूर्णत: शुद्ध शाकाहारी होटलों" को खोजने तक की आवश्यकता आन पडी है. आज से सैकडों वर्ष पहले महान दार्शनिक सुकरात नें बिल्कुल ठीक ही कहा था, कि-----"इन्सान द्वारा जैसे ही अपनी आवश्यकताओं की सीमाओं का उल्लंघन किया जाता है, वो सबसे पहले माँस को पथ्य बनाता है.". लगता है जैसे सीमाओं का उल्लंघन कर मनुष्य 'विवेक' को नोटों की तिजोरी में बन्द कर, दूसरों के माँस के जरिये अपना माँस बढाने के चक्कर में लक्ष्यहीन हो, किसी अंजान दिशा में घूम रहा हो.......

आईये हम माँसाहार का परिहार करें-----"जीवो जीवस्य भोजनं" अर्थात जीव ही जीव का भोजन है जैसे फालतू के कपोलकल्पित विचार का परित्याग कर "मा हिँसात सर्व भूतानि" अर्थात किसी भी जीव के प्रति हिँसा न करें----इस विचार को अपनायें.

माँस एक प्रतीक है---क्रूरता का, क्योंकि हिँसा की वेदी पर ही तो निर्मित होता है माँस. माँस एक परिणाम है "हत्या" का, क्योंकि सिसकते प्राणियों के प्रति निर्मम होने से ही तो प्राप्त होता है--माँस. माँस एक पिंड है तोडे हुए श्वासों का, क्योंकि प्राण घोटकर ही तो प्राप्त किया जाता है--माँस. माँस एक प्रदर्शन है विचारहीन पतन का, क्योंकि जीवों के प्रति आदर( Reverence of Life) गँवाकर ही तो प्राप्त किया जाता है--माँस.
इसके विपरीत शाकाहार निर्ममता के विपरीत दयालुता, गन्दगी के विपरीत स्वच्छता, कुरूपता के विरोध में सौन्दर्य, कठोरता के विपरीत संवेदनशीलता, कष्ट देने के विपरीत क्षमादान, जीने का तर्क एवं मानसिक शान्ति का मूलाधार है. 

अब ये आप को सोचना है कि क्या आप अब भी माँस जैसे इस जड युगीन अवशेष से अपनी क्षुधा एवं जिव्हा लोलुपता को शान्त करते रहना चाहेंगें....................

रविवार, 20 मार्च 2011

माँस खायें और रोगों की सौगात मुफ्त पायें

किसी पश्चिमी विद्वान नें शान्ती की परिभाषा करते हुए लिखा है, कि " एक युद्ध की सामप्ति और दूसरे युद्ध की तैयारी---इन दोनों के बीच के अन्तराल को शान्ति कहते हैं". आज हकीकत में हमारे स्वास्थय का भी कुछ ऎसा ही हाल है. "जहाँ एक बीमारी को दबा दिया गया हो और द्सरी होने की तैयारी में हो, उस बीच के अन्तराल को हम कहते हैं---स्वास्थ्य". क्योंकि इसके सिवा हमें अच्छे स्वास्थ्य की अनुभूति ही नहीं हो पाती.
आज समूची दुनिया एक विचित्र रूग्ण मनोदशा से गुजर रही है. उस रूग्ण मनोदशा से छुटकारा दिलाने के लिए लाखों-करोडों डाक्टर्स के साथ साथ वैज्ञानिक भी प्रयोगशालाओं में दिन-रात जुटे हैं. नित्य नई नईं दवाओं का आविष्कार किया जा रहा है लेकिन फिर भी सम्पूर्ण मानवजाति अशान्त है, अस्वस्थ है, तनावग्रस्त है और न जाने कैसी विचित्र सी बेचैनी का जीवन व्यतीत कर रही है. जितनी दवायें खोजी जा रही हैं, उससे कहीं अधिक दुनिया में मरीज और नईं-नईं बीमारियाँ बढती चली जा रही हैं. इसका एकमात्र कारण यही है कि डाक्टर्स, वैज्ञानिक केवल शरीर का इलाज करने में लगे हैं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि इस पर विचार किया जाये कि इन्द्रियों और मन को स्वस्थ कैसे बनाया जाये. कितना हास्यस्पद है कि 'स्वस्थ इन्द्रियाँ' और 'स्वस्थ मन' कैप्स्यूल्स, गोलियों, इन्जैक्शन और सीलबन्द प्रोटीन-विटामिन्स के डिब्बों में बेचने का निहायत ही मूर्खतापूर्ण एवं असफल प्रयास किया जा रहा है.
दरअसल पेट को दवाखाना बनने से रोकने और उत्तम स्वास्थ्य का केवल एक ही मार्ग है-----इन्द्रियाँ एवं मन की स्वस्थ्यता और जिसका मुख्य आधार है------आहार शुद्धि. आहार शुद्धि के अभाव में आज का मानव मरता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनी स्वयं की हत्या करता है. हम अपने दैनिक जीवन में शरीर का ध्यान नहीं रखते,खानपान का ध्यान नहीं रखते. परिणामत: अकाल में ही काल कलवित हुए जा रहे हैं.

आईये इस आहार शुद्धि के चिन्तन के समय इस बात पर विचार करें कि माँसाहार इन्सान के लिए कहाँ तक उचित है. अभी यहाँ हम स्वास्थ्य चिकित्सा के दृ्ष्टिकोण से इस विषय को रख रहे हैं. आगामी पोस्टस में वैज्ञानिक, धार्मिक, नैतिक इत्यादि अन्य विभिन्न दृष्टिकोण से हम इन बिन्दुओं पर विचार करेगें.....
स्वास्थ्य चिकित्सा एवं शारीरिक दृष्टि से विचार करें तो माँसाहार साक्षात नाना प्रकार की बीमारियों की खान है:-
1. यूरिक एसिड से यन्त्रणा---अर्थात मृत्यु से गुप्त मन्त्रणा
सबको पता है कि माँस खाने से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ जाती है. ओर ये बढा हुआ यूरिक एसिड इन्सान को होने वाली अनेक बीमारियों जैसे दिल की बीमारी, गठिया, माईग्रेन, टी.बी और जिगर की खराबी इत्यादि की उत्पत्ति का कारण है. यूरिक एसिड की वृद्धि के कारण शरीर के अवयव Irritable, Painful & Inflamed हो जाते हैं, जिससे अनेक रोग जन्म लेते हैं.
2. अपेडीसाइटीज को निमन्त्रण:-
अपेन्डीसाइटीज माँसाहारी व्यक्तियों में अधिक होता है. फ्रान्स के डा. Lucos Champoniere  का कहना है कि शाकाहारियों मे अपेन्डासाइटीज नहीं के बराबर होती है. " Appendicites is practically unknown among Vegetarians."
3. हड्डियों में ह्रास:-
अमेरिका में हावर्ड मेडिकल स्कूल, अमेरिका के डा. ए. वाचमैन और डा. डी.ए.वर्नलस्ट लैसेंट द्वारा प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध किया गया है कि मासाँहारी लोगोम का पेशाब प्राय: तेजाब और क्षार का अनुपात ठीक रखने के लिए हड्डियों में से क्षार के नमक खून में मिलते हैं और इसके विपरीत शाकाहारियों के पेशाब में क्षार की मात्रा अधिक होती है, इसलिए उनकी हड्डियों का क्षार खून में नहीं जाता और हड्डियों की मजबूती बरकरार रहती है. उनकी राय में जिन व्यक्तियों की हड्डियाँ कमजोर हों, उनको विशेष तौर पर अधिक फल, सब्जियों के प्रोटीन और दूध का सेवन करना चाहिए और माँसाहार का पूर्ण रूप से त्याग कर देना चाहिए.
4. माँस-मादक(उत्तेजक): शाकाहार शक्तिवर्द्धक:-
शाकाहार से शक्ति उत्पन होती है और माँसाहार से उत्तेजना. डा. हेग नें शक्तिवर्द्धक और उत्तेजक पदार्थों में भेद किया है. उत्तेजना एक वस्तु है और शक्ति दूसरी. माँसाहारी पहले तो उत्तेजनावश शक्ति का अनुभव करता है किन्तु शीघ्र थक जाता है, जबकि शाकाहार से उत्पन्न शक्ति शरीर द्वारा धैर्यपूर्वक प्रयोग में लाई जाती है. शरीर की वास्तविक शक्ति को आयुर्वेद में 'ओज' के नाम से जाना जाता है और दूध, दही एवं घी इत्यादि में ओज का स्फुरण होता है, जबकि माँसाहार से विशेष ओज प्रकट नहीं होता.
5. दिल का दर्दनाक दौरा:-
यों तो ह्रदय रोग के अनेक कारण है. लेकिन इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि उनमें से माँसाहार और धूम्रपान दो बडे कारणों में से हैं. वस्तुत: माँसाहारी भोजन में कोलोस्ट्रोल नामक् चर्बी तत्व होता है, जो कि रक्त वाहिनी नलिकाओं के लचीलेपन को घटा देता है. बहुत से मरीजों में यह तत्व  उच्च रक्तचाप के लिए भी उत्तरदायी होता है. कोलोस्ट्राल के अतिरिक्त यूरिक एसिड की अधिकता से व्यक्ति "रियूमेटिक" का शिकार हो जाता है. ऎसी स्थिति में आने वाला दिल का दौरा पूर्णत: प्राणघातक सिद्ध होता है. (Rheumatic causes inflammation of tissues and organs and can result in serious damage to the heart valves, joints, central nervous system)
माँस-मद्य-मैथुन----मित्रत्रय से "दुर्बल स्नायु":-
माँस एक ऎसा उत्तेजक अखाद्य पदार्थ है, जो कि इन्सान में तामसिक वृति की वृद्धि करता है. इसलिए अधिकांशत: देखने में आता है कि माँस खाने वाले व्यक्ति को शराब का चस्का भी देर सवेर लगने लग ही जाता है, जबकि शाकाहारियों को साधारणतय: शराब पीना संभव नहीं. एक तो माँस उत्तेजक ऊपर से शराब. नतीजा यह होता है कि माँस और मद्य के सेवन से मनुष्य के स्नायु इतने दुर्बल हो जाते हैं कि मनुष्य के जीवन में निराशा भावना तक भर जाती है. फिर एक बात ओर---माँस और मद्य की उत्तेजना से मैथुन(सैक्स) की प्रवृति का बढना निश्चित है. परिणाम सब आपके सामने है. इन्सान का वात-संस्थान (Nerve System ) बिगड जाता है और निराशा दबा लेती है. धर्मशास्त्रों के वचन पर मोहर लगाते हुए  टोलस्टाय के शब्दों मे विज्ञान का भी कुछ ऎसा ही कहना है-----Meat eating encourages animal passions as well as sexual desire. 

गुरुवार, 17 मार्च 2011

कृत्रिम परिपक्वता

शिक्षा प्रणाली और बाजार व्यवस्था दोनों नें मिलकर आज बच्चों से उनका बचपन पूरी तरह से छीन लिया है. दोनों ही बच्चों को उम्र से कहीं पहले बढा कर देना चाहते हैं. आज की पीढी में बारह-तेरह साल के बच्चे जिन्हे हम किशोर समझने की भूल कर बैठते हैं, जब कि वे मानसिक रूप से युवा हो चुके होते हैं.
कितनी हैरानी की बात है कि आजादी के 65 वर्षों बाद भी आजतक हम लोग ऎसी शिक्षा प्रणाली को विकसित नहीं कर पाये हैं---जिसे कि हम भारतीय कह सकें, अपनी खुद की कह सकें. हमारे पास जो कुछ भी है, उधार का है----पश्चिम से लिया हुआ उधार. उस देश के लिए यह ओर भी दु:ख की बात है, जिसनें नालंदा--तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय तब बनाये थे, जब दुनिया विश्वविद्यालय जैसी किसी धारणा से भी परिचित नहीं थी. यह वही समय था, जब इस देश को विश्वगुरू बनने का गौरव मिला था. लेकिन आज वही देश उधार की शिक्षा प्रणाली पर जी रहा है और वो भी दिनप्रतिदिन इतनी महंगी होती जा रही है कि गरीब आदमी की तो बात ही न करें, एक मध्यमवर्गीय परिवार के बस से भी बाहर की बात होने लगी है.
इधर माँ-बाप भी कुछ कम दोषी नहीं हैं, जिन्हे बच्चों को कम उम्र में स्कूल में दाखिल कराने की होड मची रहती है, ताकि उनका बच्चा दुनिया में स्पर्धा करने के लिए जल्द से जल्द तैयार हो सके. बच्चों को छोटी से छोटी उम्र में स्कूल में दाखिल करने की जिस तरह आज होड लगी है, उसे देख तो लगता है कि वो दिन भी बहुत दूर नहीं है---जब गर्भ में आये शिशु का भी स्कूल में पंजीकरण किया जाने लगेगा.

प्ले-वे वगैरह के नाम पर बच्चे को बेहद कम उम्र में स्कूल में दाखिल करना तो एक तरह से उनके बचपन पर कुल्हाडी चलाने का ही काम हुआ, जो कि माँ-बाप चला ही रहे हैं. बाकी रही सही कसर स्कूल में अध्यापक-अध्यापिकायें पूरी किये दे रही हैं. अब नर्सरी क्लास को ही लीजिए, नर्सरी का मतलब जहाँ पौधों की देखरेख की जाती है, उन्हे विकसित किया जाता है. लेकिन इन नर्सरियों में पौधे विकसित नहीं किए जाते, बल्कि उनके विकास को खंडित किया जाता है. उनकी कटाई-छँटाई करके उन्हे बोनजाई बनाया जा रहा है. वे जीवन भर बौने ही बने रहते हैं, कभी पूर्ण विकसित नहीं बन पाते.
हो सकता है कि कुछ लोग इन विचारों से सहमति न रखें, क्योंकि शायद उन लोगों को बच्चों के बौद्धिक विकास की दृष्टि से इस प्ले-वे संस्कृति में कुछ खूबियाँ दिखाई पडती हों. लेकिन ऎसा सिर्फ वही सोच सकता है, जो कि मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से पूर्णत: अनभिज्ञ हो.

इस बात को पूर्ण रूप से समझने के लिए हमें सर्वप्रथम मानव मस्तिष्क की बनावट को समझना होगा.
मस्तिष्क के दो हिस्से होते हैं------दायाँ भाग और बायाँ भाग. मस्तिष्क का दायाँ हिस्सा शरीर के बायें हिस्से को नियन्त्रित करता है और बायाँ भाग दायें हिस्से को संचालित करता है. अगर किसी के शरीर के बायें भाग में लकवा मार गया हो तो उसका कारण मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में होगा.
डा. रोजर स्पेरी नाम के एक वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होने मस्तिष्क के दोनों हिस्सों की कार्यप्रणालियों पर काफी शोध किया है. उस शोध के आधार पर ये सिद्ध हुआ है कि मस्तिष्क का दायाँ हिस्सा भावप्रधान तथा कलात्मक (sentimental & artistic) होता है, जब कि बायाँ हिस्सा तर्कप्रधान और गणितीय (Logical & mathematical) होता है. दायाँ भाग रंगों के प्रति, ध्वनियों एवं गंध आदि के प्रति संवेदनशील होता है. साथ ही अतीन्द्रीय अनुभूतियाँ भी इसी हिस्से में होती हैं. मस्तिष्क का केवल यही भाग ही जन्म से सक्रिय होता है.
दिमाग का बायाँ भाग तार्किक और गणितीय होता है. भाषा, व्याकरण, सूत्र, गणित, व्यापार आदि का कार्य इसी भाग से होता है. अब जो बताना चाह रहा हूँ, वो यह कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा लगभग दस-बारह वर्ष की आयु से अपने स्वाभाविक रूप में कार्य करना आरम्भ करता है. इससे पहले उससे काम लेना शुरू किया जाये, तो उसका विकास अस्वाभाविक होता है, स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता. छोटे बच्चों को गणित एवं कम्पयूटर जैसे विषयों की शिक्षा देना उनके मस्तिष्क के बायें भाग को अस्वाभाविक रूप से विकसित करना है. इसका सबसे बुरा परिणाम यह होता है कि उनके व्यक्तित्व में भाव पक्ष---इमोशनल पार्ट तो दबने लगता है और तर्क पक्ष सक्रिय हो जाता है. यक तर्क पक्ष उसे समय से कहीं पहले समझदार बना देता है-----उन अर्थों में समझदार, जो समझदारी उनमें बीस-बाईस साल की उम्र में आनी चाहिए थी. समय से पहले आई इस तथाकथित कृत्रिम समझदारी का नतीजा यह होता है कि उनसे उनका बचपन छिन जाता है. यह अपरिपक्व परिक्वत्ता बहुत ही खतरनाक साबित हो रही है. दुनिया के लगभग सभी कथित आधुनिक स्कूलों में आज हिँसा और अपराध बढ रहे हैं. नैतिकता, सदाचार, संस्कार, संस्कृति, धर्माचरण जैसे विषयों से वो दूर होते चले जा रहे हैं. ये सब उसी कृत्रिम परिपक्वता का नतीजा है.
होना तो ये चाहिए कि बच्चों की संवेदनायें, उनकी आन्तरिक शक्ति कुंठित न होने पाये. उनका पूर्ण रुप से संतुलित विकास हो अर्थात उनके मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ दोनों भाग समान रूप से संतुलन में विकसित हो सकें, जबकि आज की हमारी ये शिक्षा प्रणाली सिर्फ दिमाग के बायें हिस्से को विकसित करने पर जोर दे रही है. दाहिना भाग बिल्कुल पूरी तरह से उपेक्षित छोड दिया गया है. किसी के स्वप्रयासों या स्वरूचि से ही विकसित हो जायें तो और बात है, वर्ना तो इस शिक्षा नें बच्चों को मानसिक रूप से पंगु बनाने में कोई कसर नहीं छोड रखी.
अब आप स्वयं ही विचार करें कि क्या ये उचित है कि छोटी कक्षाओं में बच्चों को तार्किक एवं गणितीय विषय पढाये जायें ?

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

इनमें भी जाँ समझ कर, इनको जकात दे दो

हालाँकि इस समय मुझे उनका नाम तो स्मरण नहीं हो पा रहा. उर्दू के एक मुसलमान कवि थे, जिन्होने अपने भावों को निम्न प्रकार से प्रकट करते हुए निर्दोष, मूक प्राणियो पर दया करने की ये अपील की है :---

पशुओं की हडियों को अब न तबर से तोडो
चिडियों को देख उडती, छर्रे न इन पे छोडो !!
मजलूम जिसको देखो, उसकी मदद को दोडो
जख्मी के जख्म सीदो और टूटे उज्व जोडो !!
बागों में बुलबुलों को फूलों को चूमने दो
चिडियों को आसमाँ में आजाद घूमने दो !!
तुम्ही को यह दिया है, इक हौंसला खुदा नें
जो रस्म अच्छी देखो, उसको लगो चलाने !!
लाखों नें माँस छोडा, सब्जी लगे हैं खाने
और प्रेम रस जल से, हरजा लगे रचाने !!
इनमें भी जाँ समझ कर, इनको जकात दे दो
यह काम धर्म का है, तुम इसमें साथ दे दो !!

बुधवार, 2 मार्च 2011

माँस मनुष्य का भोजन नहीं

पशु,पक्षी,कीट, पतंगे आदि संसार में जितने भी प्रकार के प्राणी हैं, सब के सब अपने-अपने स्वाभाविक भोजन को भलीभाँती जानते तथा पहचानते हैं. अपने भोजन को छोडकर दूसरे पदार्थों को सर्वदा अभक्ष्य समझते हैं, उनको देखते, सूँघते तक नहीं. अत: अपने आपको सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ समझने वाले इस इन्सान से तो अन्य सभी प्राणी कहीं अच्छे हैं. जैसे जो पशु घास खाते हैं, वे माँस की ओर देखते तक भी नहीं और जो माँसाहारी पशु हैं, वे घासफूस की ओर खाने के लिए दृष्टिपात तक नहीं करते. उसी प्रकार कन्द-मूल और फल-फूल भक्षी प्राणी इन पदार्थों को छोडकर घासफूस नहीं खाते. परन्तु यह अभिमानी मनुष्य संसार का एक विचित्र प्राणी है, जिसे भक्ष्य-अभक्ष्य का कोई विचार नहीं, पेय-अपेय की कोई मर्यादा नहीं----खानपान में सर्वदा उच्छ्रंखल, कोई नियम-बंधन नहीं. यह सर्वभक्षी बना हुआ है. पशु-पक्षी-कीट-पतंगें इत्यादि सबको चट कर जाता है. उसने पेट को सभी प्राणियों का कब्रिस्तान बना छोडा है. निरपराध निर्बल प्राणियों को मारकर खाने में इसनें न जाने कौन सी वीरता समझ रखी है. यहाँ मुझे राष्ट्रीय कवि मैथली शरण गुप्त जी की लिखी चार पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं, जिसमें उन्होने इसका अच्छा चित्र खींचा है------
" वीरत्व हिँसा में रहा जो मूल उनके लक्ष्य का
   कुछ भी विचार उन्हे नहीं है आज भक्ष्याभक्ष्य का !
  केवल पतंग विहंगमों में जलचरों में नाव ही,
  बस भोजनार्थ चतुष्पदों में चारपाई बच रही !! "
अर्थात जो अपने शत्रुओं का वध(हिँसा) युद्ध में करके अपनी वीरता दिखाते थे, आज वे भक्ष्याभक्ष्य का कुछ विचार न करके निर्दोष प्राणियों को मारकर अभक्ष्य भोजन करने के लिए अपनी वीरता दिखा रहे हैं. पापी मनुष्य नें सब प्राणी खा लिए, केवल नभचरों में आसमान में उडने वाली पतंग, जल में रहने वालों में लकडी की नाव और चौपायों में केवल एक चारपाई बची है, जिसे वो खा न सका. इन तीनों को छोडकर शेष सबको इसनें अपने पेट में पहुँचा दिया. इसी के फलस्वरूप मनुष्य सभी प्राणियों की अपेक्षा कहीं अधिक रोगी व दु:खी रहता है.
पुरातन काल की बात है, एक बार ऋषियों की शरण में जाकर किसी नें अपनी जिज्ञासा रखी ओर तीन बार प्रश्न किया कि रोग रहित पूर्ण स्वस्थ कौन रहता है ?
प्रश्न:---- कोरूक्, कोरूक्, कोरूक्
कौन निरोग रहता है ? कौन निरोग रहता है? कौन निरोग रहता है?
उत्तर:--- ऋतभुक्, हितभुक्, मितभुक्
(1) जो धर्मानुसार भोजन करता है, (2) जो हितकारी भोजन करता है, (3) और जो मितभोजन अर्थात भूख से कुछ कम भोजन (अल्पाहार) करता है---वाह सर्वथा रोगरहित और पूर्णत: स्वस्थ व सुखी रहता है.
माँसाहार कभी धर्मानुसार इन्सान का भोजन नहीं हो सकता. माँसाहारी ऋतभुक नहीं हो सकता क्योंकि बिना किसी प्राणी के प्राण लिए माँस की प्राप्ति नहीं होती और किसी निरपराध को सताना, मारना, उसके प्राण लेना ही हिँसा है और हिँसा से प्रप्त हुई कोई सामग्री भक्ष्य नहीं होती.
हितभुक् जो हितकारी पदार्थों का सेवन करता है, वह हितभुक् सदा स्वस्थ रहता है.
मितभुक् जो भूख रखकर थोडा मिताहार करता है, ऎसा व्यक्ति पूर्णत: स्वस्थ रहता है.
जो लोग ईश्वर नाम की किसी सत्ता पर विश्वास करने वाले हैं, उन्हे भी ये समझना चाहिए कि ईश्वर सभी प्राणियों का पिता है. संसार का हर जीव उसके पुत्र तुल्य है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य को अपनी अन्य संतानों पशु, पक्षी आदि की हिँसा करके खाने की आज्ञा भला कैसे दे सकता है तथा अपनी संतानों के प्रति की गई हिँसा से कैसे प्रसन्न हो सकात है ? उन लोगों को ये समझना चाहिए कि जो पदार्थ हिँसा से किसी को सताकर, मारकर, छल-कपट, अधर्म से प्राप्त हों, उनका सेवन करना किसी भी प्रकार से इन्सान के लिए हितकारी नहीं हो सकता.
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी!
 संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातका: !!
सम्मति देने वाला, अंग काटने वाला, मारनेवाला, खरीदनेवाला, बेचनेवाला, पकानेवाला, परोसनेवाला और खानेवाला ये आठ प्रकार के पातक अर्थात कसाई कहे गये हैं. ऎसे हिँसक कसाई अधर्मियों के लोक-परलोक दोनों बिगड जाते हैं. इसलिए हिँसा से बचिए और न केवल अपने अपितु अपनी आने वाली पीढियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए भी माँसाहार का परित्याग कर शाकाहार को अपनाईये.
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रविवार, 27 फ़रवरी 2011

हिन्दू धर्म, संस्कृति और क्यों ?

भारतीय संस्कृति, जिसके विभिन्न स्वरूपों के साथ देश,काल आदि भौगोलिक एवं वैज्ञानिक चिन्तन जुडा हुआ है. जिसके प्रत्येक आचार-विचार के मूल में विज्ञान विराजमान रहा है.
भारतीय सदाचार शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास के लिए वैज्ञानिक उपयोगिता पर आधारित है. 'आचार प्रभवो धर्म:' अर्थात आचार से ही धर्म उत्पन्न होता है. 'आचार ग्राहयति इति आचार्य'--ऎसा कहकर निरूक्तकार यास्क नें स्पष्ट कर दिया है कि श्रेष्ठ तथा आचार्यों का कार्य आचार का पालन कराना है. मनुस्मृति भी यही कहती है कि 'आचारहीन न पुनन्ति वेदा'---अर्थात आचारहीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते. दरअसल भारतीय संस्कृति ओर उसके प्रत्येक आचार-विचार में वैज्ञानिक चिन्तन विद्यमान रहा है. लेकिन अब इसे युग का प्रभाव कहा जाए या कुछ ओर, आज का समाज विज्ञान की चकाचौंध से प्रभावित होकर प्राचीन आचार-विचार पर कुछ अधिक ही तर्क करने लगा है. इस विषय में आधुनिक शिक्षा एवं संस्कारों नें इन्सान के मन-मस्तिष्क में ओर अधिक भ्रम उत्पन किया है.
परन्तु बेशक धीरे-धीरे ही सही, जहाँ आज आधुनिक विज्ञान इसका वैज्ञानिक स्वरूप प्रतिपादित करने लगा है, वहीं आज का सभ्य समाज भी इसके महत्व को स्वीकार करता जा रहा है. किन्तु फिर भी इस देश की प्राचीन संस्कृति को लेकर सभ्य समाज में मन में कुछ ऎसे प्रश्न शेष रह जाते हैं, जिनका समाधान होना बहुत आवश्यक हो जाता है. यूँ तो समय-समय पर अनेक योग्य विद्वानों द्वारा इस विषय पर भरपूर प्रकाश डाला जाता रहा है. किन्तु इस सनातन संस्कृति की वैज्ञानिकता को समग्र रूप से समझने के इच्छुक जिज्ञासुजनों को इस विषय पर शास्त्रार्थ महारथी स्वामी माधवाचार्य द्वारा लिखित 'क्यों' शीर्षक ग्रन्थ को एक बार अवश्य देखना चाहिए. हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित यह ग्रन्थ आपके मन में उठने वाले प्रत्येक 'क्यों' का संतुष्टिपरक जवाब दे पाने में पूर्णरूपेण सक्षम है. न केवल जिज्ञासुजनों अपितु अनर्गल प्रलाप करने वाले कुतर्कियों को भी एकबार इसे अवश्य पढना चाहिए.
पुस्तक नाम:- 'क्यों' ( दो खंडों में)
लेखक:- शास्त्र महारथी पं. माधवाचार्य शास्त्री
प्रकाशक:- माधव विद्या भवन, दिल्ली
भाषा:- हिन्दी तथा अंग्रेजी
मूल्य:- 180/-(प्रत्येक खंड)

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

कुतर्कियों के सिर पर चढा प्रोटीन का भूत (एक वैज्ञानिक अन्धविश्वास)

इन्सान पर हावी होने वाले भूत-प्रेतों को उतारने के लिए तो ओझाओं-गुनियों, तान्त्रिक, पीर-फकीरों, बाबाओं वगैरह को बुलाना पडता है. लेकिन आज के इस वैज्ञानिक युग में कईं भूत ऎसे भी हैं जिनका किसी के पास कोई इलाज नजर नहीं आ रहा. इन्ही में एक भूत है---प्रोटीन का, जिसने सारे डाक्टरों, आहार वैज्ञानिकों और इन्सान को तन्दरूस्त रखने के नए नए तरीके इजाद करने वाले लोगों को इस तरह जकड लिया है कि इससे छुटकारा पाना निहायत ही मुश्किल है. अब आदमी बीमार हो तो वो डाक्टर से इलाज करा ले, पर वो बेचारा डाक्टर ही किसी भूत से जकडा जाए तो फिर उसका इलाज भला कौन करे? अब ऎसे ही एक प्रेत ग्रसित डाक्टर हैं--जनाब अनवर जमाल साहब. अब ये बात दूसरी है कि वो सिर्फ नाम के डाक्टर हों. कहीं साल छ: महीनें किसी डाक्टर के यहाँ कम्पाऊंडरी करते करते डाक्टर बन गए हों. खैर अल्लाह बेहतर जानता है :)
बहरहाल हम मूल विषय पर आते हैं. प्रोटीन-----जिसकी होड नें आज अनेक समस्याएं पैदा कर दी है. प्रोटीन पाने के लिए सरकारें तक कमर कसे बैठी हैं. देश भर में जगह-जगह कसाईघर खुलवा रखे हैं, जहाँ से माँस डिब्बों में बन्द कर बेचा जाता है. टेलीवीजन, समाचार पत्र जैसे संचार माध्यमों नें भी शोर मचा रखा है कि अंडे खाओ ताकि शरीर में जान पडे. प्राण चाहते हो तो प्रोटीन खाओ. बेचारे पशु-पक्षियों की शामत आन पडी है. अनेक सदबुद्धि वालों नें उनकी पैरवी की, पर कुतर्क यह दिया जाता है कि वैज्ञानिक खोजों के आधार पर ऎसा करना उचित है. हमारे जैसा आदमी यह कहे कि हमारे बाप-दादाओं नें तो कभी इन सब चीजों को छुआ तक नहीं...तो क्या उन लोगों नें स्वस्थ जीवन व्यतीत नहीं किया. वे दूध, दही, फल-फ्रूट खाते थे और उन्हे रोग भी कम होते थे. पर दुर्बुद्धि लोग अपने विचार बदलने को तैयार ही नहीं है......बदलें भी कैसे, उन पर प्रोटीन का भूत जो सवार है.

बीसवीं सदी के शुरू में आहार का मसला बकायदा एक विज्ञान के तौर पर सामने आया. भोजन में उर्जा के स्रोतों जैसे कार्बोहाईड्रेट, चर्बी और प्रोटीन की खोज हुई. प्रोटीन को माँसपेशियों और बच्चों के विकास के लिए जरूरी समझा गया. चर्बी और कार्बोहाईड्रेट को उर्जा का प्रमुख स्रोत माना गया. मैक कालम और डेविस नाम के वैज्ञानिकों नें विटामिन "ए" खोजा, फिर दूसरे विटामिन खोजे गये. आज विटामिन ए, बी, सी, डी, ई इत्यादि न जाने कितने प्रकार के विटामिन्स का विस्तृत ज्ञान मैडिकल साईन्स को है.
प्रचलित भ्रान्तियाँ:-
प्रोटीन को लेकर भ्रान्तियाँ कब शुरू हुई, यह कहना तो कठिन है, पर वे बहुप्रचलित हैं. यह एक आम धारणा है कि प्रोटीन अधिक मात्रा में लेना चाहिए. नतीजतन डिब्बों में बन्द बहुत से प्रोटीनमय पदार्थों की बिक्री बहुत होने लगी. इन चीजों को दूध या पानी में घोलकर पिया जाने लगा. माओं नें बच्चों को जबरिया पिलाना शुरू कर दिया. मायें भी बडे लाड से कहती हैं कि हारलिक पिओगे तो जल्दी से बडे हो जाओगे.
सूरदास का पद याद करें तो कृष्ण भी यही कहते थे-----"मैया कबहूँ बडेगी चोटी! कित्ती बार मोहि दूध पियावत, है अजहू छोटी की छोटी!!" लगभग यही बात प्रोटीन वाले भोजन को घोल-घोलकर पिलाने के लिए कही जा रही है. टीवी पर विज्ञापनों के जरिए मानो 'प्रोटीन ही जीवन है" का सन्देश हमारे गले उतरवाने की कौशिशें जारी हैं.
दरअसल प्रोटीन की मात्रा भोजन में सन्तुलित होनी चाहिए. उर्जा देने वाले तत्व के रुप में प्रोटीन की विशेष जरूरत नहीं होती. उर्जा के अच्छे स्रोत तो वसा और कार्बोहाईड्रेट हैं. आहार वैज्ञानिक इस पर एकराय हैं कि प्रति एक किलो वजन पर एक ग्राम प्रोटीन एक आम इन्सान के लिए काफी है. बच्चों को अधिक से अधिक 2 ग्राम प्रति किलो प्रोटीन पर्याप्त होगी. साधारण भोजन में तो प्रोटीन की इतनी मात्रा अपने आप ही मिल जाती है. आमतौर पर एक औसत व्यक्ति 250 ग्राम अनाज और 50-100 ग्राम दाल या दाल से बनी चीजें जरूर खाता है. 250ग्राम अन्न से लगभग 30 ग्राम प्रोटीन, दाल में 20 ग्राम से अधिक प्रोटीन और दूध,दही, पनीर आदि में 10-20 ग्राम प्रोटीन मिल जाती है. इस तरह आदमी 60-70 ग्राम प्रोटीन रोजाना उदरस्थ कर लेता है. तब बताईये फिर प्रोटीन की कमी कहाँ?
प्रोटीन के स्रोत:-
यह बात काफी प्रचारित हुई है कि माँसाहार और अंडे उच्च कोटि के प्रोटीन के स्रोत है. यह विचार सबसे पहले कहाँ से आया, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता. डाक्टरों से पूछिए कि प्रोटीन का ऎसा वर्गीकरण किसने किया और इसका कहाँ उल्लेख है, तो मैं आपको गारंटी देता हूँ कि उनसे जवाब देते नहीं बनेगा. दरअसल ये सब एक दूसरे से सुनी-सुनाई बातें हैं और इन सुनी सुनाई बातों को ही किताबों में लिख-लिखकर दुनिया में ये भ्रमजाल फैलाया जा रहा है कि पशुओं के माँस और अंडों में उच्च कोटि के प्रोटीन होते हैं और वनस्पतियों में दोयम दर्जे के. प्रसिद्ध वैज्ञानिक Dr.Semsan Wright के अनुसार ऎसा विभाजन निहायत ही अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक हैं. उनका कहना था कि पशुओं की माँसपेशियाँ तो घास खाने से बनती हैं. जिस प्रोटीन को हम उच्च स्तर का कहते हैं---वह घास से बनती है.
अचरज की बात यह है कि सभी जगह मेडिकल के छात्रों को डा. सैमसन राईट की किताब पढाई जाती है, पर इस वैज्ञानिक की इस बात को पूरी तरह से नजरअन्दाज कर दिया जाता है. जनाब अनवर जमाल साहब जैसे स्वनामधन्य डाक्टरों को तो यह भी नहीं पता होगा कि किताब में इस बात का उल्लेख भी है.
प्रोटीन आवश्यकता से अधिक ले लिए जायें तो क्या हो ? 
आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से पता चला है कि प्रोटीन के मेटाबोलिज्म के बाद इनकी तोडफोड से कईं विषैले पदार्थ पैदा होते हैं-----यूरिया, यूरिक एसिड क्रीटीन, क्रोटीनीन आदि. ये सीधे इन्सान के गुर्दों पर असर करते हैं. अधिक मात्रा में इनकी उत्पति होने से इनका गुर्दों से निकलना कठिन हो जाता है और गुर्दे समय से पहले जवाब भी दे सकते हैं. देश में गुर्दे की बीमारी की बढोतरी का एक कारण यह भी समझा जा रहा है. लंदन के मेडिकल जनरल "Lancet" के अनुसार गठिया की बीमारी का कारण भी भोजन में प्रोटीन की अधिकता ही है.
दालें और दूध:-
प्रोटीन सबको मिले, इसके लिए जरूरी है कि इसकी कीमत कम हो. पर क्या अंडे या माँस सस्ते पडते हैं. एक अंडा 4-5 रूपये का आता है जिसका वजन लगभग 50-60 ग्राम होता है. उसमें प्रोटीन की मात्रा लगभग 6 ग्राम होती है. इस तरह 100 ग्राम अंडे में लगभग 12-13 ग्राम प्रोटीन. कीमत 8-9 रूपये के लगभग. इसके विपरीत 100 ग्राम सोयाबीन में 83 ग्राम प्रोटीन होता है, जिसकी कीमत पडती है महज अढाई रूपये. यानि अंकों की तुलना में लगभग 8 गुणा.
प्रोटीन के अच्छे स्रोत दालें, अन्न और दूध हैं. सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा 43 ग्राम प्रतिशत है. दालों में भी यह पर्याप्त मात्रा में होता है. माँस, अंडे में प्रोटीन की मात्रा क्रमश: 18 और 13 ग्राम होती है. फिर भी माँसाहार से प्रोटीन पाने का भूत इन लोगों के सिर से नहीं उतर रहा. प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन बिगडने की एक प्रमुख वजह आज यह भी है.
इसलिए आज इस युग की ये सब से बडी जरूरत है कि अपने दुराग्रहों का परित्याग कर खुले मस्तिष्क से इस विषय पर विचार किया जाए और खोखली वैज्ञानिकता के नाम पर फैलाये जा रहे इन भ्रमों को दूर कर निज, समाज और प्रकृति के प्रति अपने उतरदायित्व को समझते हुए शाकाहार को अपनाया जाए. 
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ज्योतिष की सार्थकता

रविवार, 30 जनवरी 2011

अधिकार.......(संडे ज्ञान)

राजकुमार गौतम उद्यान में सैर कर रहे थे कि अकस्मात उनके पाँवों के पास एक पक्षी आकर गिरा. राजकुमार नें देखा कि उसके परों में एक तीर चुभा है और वह बडी बेचैनी से छटपटा रहा है. दयाद्र होकर गौतम नें पक्षी को उठाया और वे बडे यत्न से रक्त में भीगे हुए तीर को निकालने लगे, ताकि किसी प्रकार उस निरीह पक्षी के प्राणों को बचाया जा सके. गौतम अभी तीर को निकाल भी न पाये थे कि हाथ में धनुष-बाण लिए एक शिकारी आया और उनसे बडे रोष भरे स्वर में कहने लगा------
" राजकुमार! ये मेरा शिकार है, जो मेरी क्षुधापूर्ती का साधन बनने वाला है. आपको इसे उठाने का क्या अधिकार था? "
राजकुमार गौतम स्नेह भरे स्वर में बोले----"जब आपको उसके प्राण लेने का अधिकार है, तब मुझे उसके प्राण बचाने का भी अधिकार न दोगे भाई !"

शनिवार, 22 जनवरी 2011

भोजन द्वारा स्वास्थय (सात्विक आहार)

कहते हैं कि इन्सान को सदैव सात्विक आहार का ही सेवन करना चाहिए, क्योंकि प्राकृतिक नियम के अनुसार मानव का भोजन फलाहार और शाकाहार ही है.जो कि शारीरिक निरोगता, शक्तिवर्द्धन और दीर्घायुष्य जैसी सतोगुणी शक्तियों की प्राप्ति का एकमात्र स्त्रोत है. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि ये सात्विक भोजन होता कौन सा है ? इसके लिए श्रीमगभागवत गीता का ये श्लोक देखिये..........
आयु: सत्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धन:
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा ह्रद्या आहारा: सात्विकप्रिया: !!
अर्थ:-- आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढाने वाले एवं रसयुक्त चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय हों, ऎसे आहार सात्विक प्रवृति के मनुष्यों को प्रिय होते हैं !
व्याख्या:- आयु,बुद्धि,बल,आरोग्य और प्रीति को बढाने के लिए चार प्रकार का आहार (1) रस्या: (2) स्निग्धा: (3) स्थिरा (4) ह्रद्या में कौन कौन सी खाद्य वस्तुएं आती हैं, उन्हे जानना जरूरी है अन्यथा प्रत्येक प्रकार के खाद्य पदार्थों का गलत अर्थ लगाकर तथा गलत ढंग से प्रयोग करने के कारण उपर्युक्त लाभों से वंचित तथा रोग, शोक से छुटकारा नहीं प्राप्त हो सकता. अत: इसके लिए निम्न उदाहरण से समझें.
रस्या:--- सब तरह के फल,सब्जियाँ यथा गाजर, टमाटर, सेब, सन्तरा, खीरा, तरबूज, ककडी इत्यादि जिनमें प्राकृतिक रस भरा मिलता है, ऎसी रसदार खाद्य वस्तुएं इस श्रेणी में आती हैं.
स्निग्धा:-----दूध, दही, मक्खन, तिल, गरी गोला, बादाम, मूँगफली, सोयाबीन आदि पदार्थ जिनमें चिकनाई की मात्रा होती है, वें वस्तुएं स्निग्धा की श्रेणी में आती हैं.
स्थिरा:---प्रत्येक प्रकार के अन्न गेहूँ, चावल, चना, बाजरा इत्यादि इत्यादि. जिन पदार्थों को ग्रहण करने के पश्चात बहुत समय तक उसका सार शरीर के लिए टिकाऊ हो तथा भोजन करने के बाद अधिक देर तक स्थिरता का अनुभव किया जा सके, वें खाद्य पदार्थ स्थिरा हैं. वैसे भी इन अनाजों में फल, सब्जियाँ तथा दूध, दही, तिल, नारियल आदि की तुलना में अधिक टिकाऊपन है. यह अधिक दिनों तक स्थिर रखे भी जा सकते हैं, जल्दी खराब नहीं होते. इसलिए यह स्थिरा की श्रेणी में आते हैं.
ह्रद्या :--- जिस खाद्य पदार्थ को देखने मात्र से खाने की रूचि उत्पन्न हो तथा साफ-सुथरी तथा पवित्र हो उसे ह्रद्या कह सकते हैं.
विश्लेषण:-- उपरोक्त चारों प्रकार के खाद्य पदार्थ यद्यपि सात्विक हैं, परन्तु इन्हे भी तलने, भूनने, अधिक पकाने, मात्रा से अधिक खा लेने, व्यक्ति की आवश्यकता एव्म प्रकृति के अनुकूल-प्रतिकूल का विचार किए बिना खा लेने पर सात्विक होते हुए भी राजस-तामस के प्रभाव वाले ही हो जाते हैं. जैसे कि दूध पूर्णत: सात्विक आहार है और आयु, सत्व, बल, बुद्धि, निरोगिता प्रदान करने में एक तरह से अमृत तुल्य ही है, लेकिन हैजे, अतिसार के मरीज के लिए यही दूध विष का काम करता है. अत: यहाँ यह विचार करना पडेगा कि वस्तु सात्विक होते हुए भी व्यक्ति की प्रकृति के विपरीत देने से वह राजस-तामस प्रभाव की हो सकती है. खाद्य पदार्थ के उपयोग के तरीके यदि गलत हैं तो वस्तु सात्विक होते हुए भी उसका प्रभाव (प्रतिक्रिया) सात्विक नहीं हो सकता.
अब बाजार में गली-सडी मिलावटी मिठाईयाँ, चाट-पकोडे, चाईनीज फूडस, पिज्जा, बर्गर आदि गरिष्ठ पदार्थ जो कि ठूँस-ठूँस कर खाये जाते हैं, वह अधिक हानिकर होते हैं, परन्तु गलत मान्यताओं के कारण लोग इन पदार्थों को खाते हुए अपने को शाकाहारी कहला कर गौरव समझते हैं. प्रत्येक खाद्य पदार्थ किस किस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है, उसके प्रयोग विधि, मात्रा, आहार ग्रहण कर पचाने की पात्रता आदि के अनुसार भोजन सात्विक-राजस एवं तामस का प्रभाव वाला बताया जा सकता है.
अब लोग हैं कि खान-पान के विषय में केवल साफ-सफाई के विचार को ही महत्व देते हैं, सामग्री के गुण-अवगुण तथा उसकी शुद्धता, बनाने की विधि एवं प्रयोग की विधि पर कोई ध्यान नहीं देता. बस जो मन को भाये, खाने में स्वादिष्ट हो और फैशन के अनुकूल हो---बस वही चीज अच्छी है. इसलिए ही आहार की दशा बिगडती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप आयु, बल, एवं स्वास्थय क्षीण हो रहा है, दुनिया में नाना प्रकार की बीमारियों की भरमार है. इसी कारण ही इन्सान की बुद्धि राजसी-तामसी हो रही है और दुनिया भर में रोग,बीमारी, दु:ख का एकछत्र साम्राज्य है.
अत: खाद्य पदार्थ का स्वरूप सात्विक हो इसके लिए बनाने की विधि, खाने की मात्रा, खाने वाले व्यक्ति के अनुकूल प्रकृति आदि इन समस्त बातों का विचार करके आहार ग्रहण किया जाये, तभी उसका परिणाम सात्विक होगा.
आगामी पोस्ट में बात करेंगें तामसिक आहार पर.......

सोमवार, 17 जनवरी 2011

आस्था और तर्क

मनुष्य आज जो कुछ है, उसके निर्माण में समाज की अहम भूमिका है.हर इन्सान अपने तात्कालिक परिवेश, रीति-रिवाज, मान्यताओं, सामाजिक नियमों से तो सीखता-समझता ही है, वह परम्परा प्राप्त ज्ञान, ऎतिहासिक घटनाओं, महापुरूषों की जीवनियों एवं धर्मशास्त्रों से भी बहुत कुछ सीखता है और उन्ही सबसे उसका जीवन बनता-बिगडता है. इन्सान का यह सहज स्वभाव है कि जहाँ से उसे कुछ प्राप्त होता है, वहाँ उसकी आस्था होती है. आस्था मनुष्य मात्र के लिए एक महान संबल है. आस्थारहित मनुष्य का जीवन तो उस पेड के समान है, जिसकी जडें कट चुकी हैं. आस्था नैतिकता एवं सदाचार की रीढ ओर नैतिकता हमारे जीवन की. अत: यह सहज समझा जा सकता है कि आस्था का होना जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है.
दरअसल, आस्था एक ऎसी धातु है जो हर इन्सान को कहीं-न-कहीं जोडती है और इन्सान का पथप्रशस्त करती है. लेकिन जिस प्रकार किसी भी प्रकार की अति इन्सान के लिए अहितकर होती है, उसी प्रकार अत्यंत आस्था भी इन्सान को भटका देती है. अत्यन्त आस्था का ही यह पागलपन है कि धार्मिकों नें दूसरे मत-मजहब वालों के लिए नास्तिक, काफिर आदि शब्द गढे और परस्पर घृणा, वैमनस्य एवं ईर्ष्या का जहर घोला. अत्यन्त आस्था का ही फल है कि इन्सान की बुद्धि धर्म, ईश्वर एवं ईश्वरीय वाणी के नाम पर गुलाम बना दी गई और इन्सान मानसिक-बौद्धिक गुलाम बना भटक रहा है. वह तर्क, विवेक, विचार, वैज्ञानिक चिन्तन को प्रश्रय देना ही नहीं चाहता.
हमें इस बात को हमेशा याद रखना होगा कि इस दुनिया में जब भी, जहाँ भी, जिस किसी नें भी किसी दिशा में सफलता हासिल की है, उसमें तर्क और विचार की भी उतनी ही भूमिका रही है, जितनी आस्था की. तर्क से ही अज्ञान-अंधकार को दूरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाया जा सकता है. आज का वैज्ञानिक युग भी तो पूरी तरह से तर्कप्रधान ही है.जहाँ विज्ञान का विकास आस्था से नहीं तर्क से होता है. लेकिन ये भी बात है कि कोरा तर्क इन्सान को दिग्भ्रमित कर देता है और ऎसा इन्सान फिर डोर कटी पतंग की तरह यहाँ-वहाँ उलझकर और अधिक भ्रमित और अशांत ही होता है.
तर्क और आस्था की तुलना हम पतवार और नाव से कर सकते हैं. नाव में बैठकर हम लम्बी-चौडी नदी को भी सहजतया पार कर सकते हैं, परन्तु नाव धारा में तभी आगे बढती है, जब पतवार से पानी को काटा जाता है. केवल नाव के सहारे नदी नहीं पार की जा सकती और केवल पतवार का आश्रय लेना तो हद दर्जे की मूढता ही कही जाएगी. अत: नाव और पतवार दोनों का संयोग अति आवश्यक है. इसी प्रकार जीवन-पथ में आगे बढने एवं संसार-समुद्र में से सकुशल पार जाने के लिए आस्था और तर्क दोनों की महती आवश्यकता है, क्योंकि दोनों के संयोग से ही इन्सान में विवेक जागृत होता है-----और विवेक ही तो सुख-शान्ती-अमन-प्रेम का आधार है.
कबीर साहब कहते हैं-------कहहिं कबीर ते उबरे जाहि न मोह समाय !!
धर्म के नाम पर फैलाये जा रहे अन्धविश्वासों, चमत्कारों, प्रकृतिगत नियमों के विरूद्ध गलत मान्यताओं, कुरीतियों आदि के कारण जहाँ आज इन्सान की आस्था खंडित हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक-चिंतन के नाम पर सिर्फ कोरे तर्क या कुतर्क को प्रश्रय दिया जा रहा है, फलत: आज मानव-समाज की स्थिति बिल्कुल घडी के पैण्डुलम की तरह हो चुकी है. जो कभी इधर तो कभी उधर----बस झूल रहा है.

शनिवार, 8 जनवरी 2011

लोक-कहावतों में स्वास्थय चर्चा

 संसार में उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से सुखी कहा जा सकता है, जो कि शरीर से निरोगी हो. ओर निरोगी रहने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चों को उनकी बाल्यावस्था ही से स्वस्थ रखने का ध्यान रखा जाए, उनको संयमी बनाया जाए, उनको ऎसी शिक्षा दी जाए, जिससे कि वे स्वस्थ रहने की ओर अपना विशेष ध्यान दे सकें.
माना कि समय की तेज रफ्तार के आगे आज शहरी और ग्रामीण समाज का अन्तर धीरे धीरे मिटता जा रहा है, लेकिन इतने पर भी आपको अभी भी गाँवों में बसते उस समाज की झाँकी देखने को मिल सकती है, जो कि युग परम्परा से श्रवण-ज्ञान द्वारा अपने स्वास्थय का ख्याल रखता आया है. यह ज्ञान बहुत कुछ उन्हे अपनी लोक-कहावतों में मिल जाता है.
आप देख सकते हैं कि लोक-कहावतों के ज्ञान के कारण ही आज भी अधिकाँश ग्रामीण समाज शहरी समाज की अपेक्षा कहीं अधिक स्वस्थ एवं निरोग मिलेगा.
लोक-कहावतों में प्रात:काल से लेकर रात्रि तक की विविध अनुभूतियाँ मिला करती हैं. कोई भी उनके अनुसार आचरण करके देख ले, उनकी सत्यता की गहरी छाप ह्रदय पर पडकर ही रहेगी. उदाहरणार्थ यहाँ कुछ कहावतें दी जा रही हैं-----
प्रात:काल खटिया से उठकै, पियै तुरन्तै पानी;
कबहूँ घर मा वैद न अइहै, बात घाघ कै जानि !!

आँखों में त्रिफला, दांतों में नोन,
भूखा राखै, चौथा कोन !!
अर्थात----त्रिफला, जो कि नेत्रों हेतु ज्योतिवर्द्धक एवं उनकी अन्य विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव हेतु रामबाण औषधी मानी जाती है. जो व्यक्ति त्रिफला के जल से आँखों का प्रक्षालन करता है, नमक से दाँत करता है और सप्ताह में एक बार उपवास रखता है तो इन तीनों विधियों के अतिरिक्त उसे अन्य चौथा कार्य करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है.सिर्फ इन तीन उपायों से ही वो अपने पूरे शरीर को निरोग रख सकता है.

मोटी दतुअन जो करै,
भूनी हर्र चबाय;
दूद-बयारी जो करै,
उन घर वैद न जाय्!!
अर्थात----उपरोक्त की ही भान्ती ही यहाँ भी शरीर रक्षार्थ तीन विधियाँ बताई गई हैं. नीम, कीकर इत्यादि कि मोटी लकडी (दातुन) को चबाकर करने से दाँत मजबूत होते हैं, भूनी हुई हर्र(हरड) के सेवन से पाचनतन्त्र मजबूत होता है और कच्चे दूध से नेत्र प्रक्षालन(नेत्रों को धोना) करने से नेत्रों की ज्योति बढती है. जो व्यक्ति इन तीन कार्यों को करता है, उसे फिर किसी चिकित्सक की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती.
प्रात:काल करै अस्नाना,
रोग-दोष एकौ नई आना !
अर्थात--जो प्रात:काल नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान कर लेते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं.
खाय कै मूतै, सूतै बाउं,
काय कौं वैद बसाबै गाउं !
अर्थात---भोजन करके के पश्चात जो मूत्र-त्याग करते हैं और बायीं करवट लेकर सोते हैं, उनको यह चिन्ता नहीं रहती कि उनके गाँव में वैद्य/डाक्टर रहता है या नहीं.
वर्ष के बारह महीनों में कब कम भोजन करना हितकर है, क्या-क्या खाद्य पदार्थ किस-किस मास में वर्जित हैं, यह ज्ञान भी कहावतों में हैं. यथा----
सावन ब्यारो जब-तब कीजे,
भादौं बाकौ नाम न लीजे;
क्वारं मास के दो पखवारे
जतन-जतन से काटौ प्यारे !!
अर्थात----श्रावण मास में रात्रि का भोजन कभी-कभी ही करना चाहिए, भाद्रपद में रात्रि का भोजन करना ही नहीं चाहिए, आश्विन मास के दोनों ही पक्ष सतर्कतापूर्वक व्यतीत करने चाहिए अन्यथा अस्वस्थ हो जाने की आशंका हो ही जाती है.
क्वांर करेला, चेतै गुड,
भादौं में जो मूली खाय;
पैसा  खोवै गांठ का
रोग-झकोरा खाय !
अर्थात-----अश्विन मास में जो करेला, चैत्र मास में गुड और भाद्रपद मास में मूली का सेवन करते हैं, वें गाँठ का पैसा गंवाकर उससे रोग ही अपने पास में बुलाते हैं.
कातिक-मास, दिवाली जलाय;
जै बार चाबै,  तै बार खाय !
अर्थात---कार्तिक मास में दीपावली की पूजा करने के पश्चात ऎसी ऋतु आ जाती है कि भोजन का परिपाक भली प्रकार से होने लगता है, उन दिनों इच्छानुसार भोजन जितनी बार चाहें कर लिया करें.सब खाया-पिया अच्छी तरह से शरीर को लगेगा और चेहरे पर कांती रहेगी.
चैते गुड, वैसाखे तेल,
जेठे पंथ, अषाडै बेल;
साउन साग, भादौं दही,
क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना,
माघै मिसरी, फागुन चना;
जो यह बारह देई बचाय,
ता घर वैद कभऊं नइं जाए!!
अर्थात---चैत्र मास में गुड का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड शरीर में कफकारक होता है और इस मास में प्रकृति के अनुसार कफ की बहुलता रहती है. वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है. ज्येष्ठ मास में लू-लपट का दौर रहता है, अतएव यात्राएं वर्जित हैं. आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह अनुकूल नहीं पडता, पेट की अग्नि को मंद कर देता है. सावन में वायु का प्रकोप रहता है, साग वायुकारक हैं, अतएव प्रतिकूल रहता हैं. भाद्रपद में वर्षा होती रहती है और दही पित्त को कुपित करता है. आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है.
कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है,  उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही(मट्ठा) से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन(मार्गशीष) में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए. पौष मास में धान, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना शरीर के लिए प्रतिकूल बैठते हैं, इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती.

रविवार, 19 दिसंबर 2010

दिल छोटे और झोलियाँ बडी.......

आज बहुत दिनों के बाद मन्दिर जाना हुआ.कोई पूजा-पाठ करने के विचार से नहीं---बस यूँ ही, टहलने निकले तो खुद-ब-खुद कदम उधर को उठ पडे. गया तो क्या देखता हूँ---भिखारियों, व्यापारियों और खुशामदी पिट्ठुओं की रेलमपेल मची हुई है. बाप रे! इतनी भीड! अमीर-गरीब, औरत-मर्द, विद्यार्थी, व्यापारी, प्रेमी-माशूक, रोगी, सभी माँगने में जुटे हैं.ये नहीं कि हम ईश्वर से प्रेम करना सीखे, उल्टे जिसे देखो हाथ फैलाये वही कुछ न कुछ बस माँगने में जुटा है........लगता है दिन-ब-दिन लोगों के दिल छोटे होते जा रहे हैं और झोलियाँ बडी!
मन ही मन पत्थर की मूरत में छिपा 'वो' भगवान भी जरूर सोचता होगा-----यार! आजिज आ गया इन दरिद्रों से!
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रविवार, 12 दिसंबर 2010

समझदारी का तकाजा

उस रोज देखा कि सडक के किनारे धूप में एक आदमी पडा हुआ है. हड्डियों का मात्र ढाँचा रह गया है और बस कुछेक देर का मेहमान है. चलती सडक----बहुत से लोग आ-जा रहे थे. राहगीर उसकी तरफ देखते, थोडा ठहरते और फिर आगे बढ जाते. उसने भी क्षणभर के लिए ठहरकर उसकी तरफ देखा और आगे बढ गया.
वो अभी महज चन्द कदम ही चला होगा कि चलते-चलते अचानक से ठिठककर रूक गया, देखा बीच सडक में मुडा-तुडा, पुराना सा एक 100 रूपये का नोट पडा है. इधर-उधर निगाह दौडाई, कि कहीं कोई देख तो नही रहा. जब पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि किसी का भी ध्यान उसकी ओर नहीं है, तो उसने आहिस्ता से झुककर नोट उठाया और जेब के हवाले कर लम्बे-लम्बे डग भरता दूर निकल गया..........
शायद वो जानता था, कि दुनिया दया से नहीं समझदारी से चला करती है.....
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रफ़्तार