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बुधवार, 24 नवंबर 2010

जो बुद्धि की कसौटी सहन कर सकता हो, वही असली धर्म है !!!

कुछ लोग हैं, जो मानते हैं कि बुद्धि और धर्म दोनों एक दूसरे के विपरीत तत्व है। इन दोनों के क्षेत्र बिल्कुल अलग-अलग है. बात है भी सही। क्योंकि जहाँ बुद्धि तर्क पर चलती है, वहीं धर्म श्रद्धा पर। लेकिन इतने पर भी बुद्धि खुद समझती है कि मेरी हद कहाँ तक है। इसलिए, यदि बुद्धि का प्रयोग करने से कोई विश्वास, कोई धर्म टूटता है तो उसे टूटने ही देना चाहिए। बुद्धि की कैंची से जो धर्म कट जाए, खंडित हो जाए---समझिए कि वह धर्म नालायक है। जो बुद्धि की कसौटी सहन कर सकता हो, वही असली धर्म है। लेकिन जो ये सोचने का अंग है, उसमें किसी धर्म के मानने वाले यदि यह कहें कि बुद्धि प्रयोग से हमारी परम्पराएं, हमारे विश्वास, हमारी धारणाएं खंडित होती है तो समझना चाहिए कि वें खंडित होने के लायक ही है।

बचपन में हमें कहा जाता था कि चोटी खुली रखने से ब्रह्महत्या का पाप लगता है। अब बचपन की बात है तो उस समय इतनी समझ भी कहाँ होती थी कि तर्क करने बैठें। सो जैसा कहा गया वैसा मान लिया। कुछ बडे हुए तो उसकी गम्भीरता समझ में आई और पूछ बैठे कि यदि चोटी न बाँधने से ही ब्रह्महत्या लग जाती है तो यदि कोई साक्षात ब्रह्महत्या कर दी जाए तो फिर कितना पाप लगेगा? बस, इसका किसी के पास् क्या जवाब होता। सो, टूट गई श्रद्धा। कहने का मतलब ये कि इस प्रकार की बेसिरपैर की बातों का बुद्धि से कोई सम्बंध नहीं है।
आज, चाहे कोई सा भी धर्म क्यों न हो, सबमें धर्म के नाम पर अनेक प्रकार की अन्धश्रद्धाएं, भान्ती-भान्ती की कुरीतियाँ ही देखने को मिल रही हैं। इन्सान धर्म की आड में चल रही इन कुप्रथाओं को ही वास्तविक धर्म समझने लगा है। अब यदि कोई व्यक्ति इनके विरूद्ध आवाज उठाता भी है तो लोग उसे निज धर्म का खंडन मानने लगते हैं। लोगों को सोचना चाहिए कि अगर ये प्रथायें बुद्धि प्रयोग से खंडित होती हैं, तो उन्हे खंडित होने दें। अब यदि कोई उसे निज धर्म का खंडन मानता है तो उन्हे यह भी समझ लेना चाहिए कि वास्तव में धर्म कभी खंडित होने वाला नहीं होता। ओर जो खंडित हो जाए, समझो वो धर्म ही नहीं है। इसलिए उसके विषय में दुख करने, क्रोधित होने का कोई कारण ही नहीं है।

धर्म में, जो नाना प्रकार के मसलन बली प्रथा, कुर्बानी जैसे गैर जरूरी तत्व शामिल हो गए हैं, उन्हे हटाया जाए और स्पष्ट कहा जाए कि वे जरूरी नहीं है। भिन्न भिन्न धर्मावलम्बी जो छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे का विरोध करते हैं, जरा जरा सी बात पर मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं, उन्हे ये समझना चाहिये कि अपनी कुरीतियों पर पर्दा डालने की बजाय, उसके बदले में सर्वमान्य नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित किया जाए और उसके अनुसार जीवन चलाने का प्रयास किया जाए। ऎसा करने पर ही लोगों में धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा विकसित होगी और समाज भी सही रूप में प्रगति कर सकेगा।
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

शनिवार, 27 मार्च 2010

मेर धर्म महान!!!

चींटी का धर्म
पंक्तिबद्ध हो चलना.........
हाथी का धर्म
समूह में विचरना..........
वानर का धर्म
डाली डाली उछलना..........
मानव का धर्म
सर्वधर्म सद्भाव और विश्व बन्धुत्व........
अरे! नहीं नहीं, रूकिये जरा
ये सब तो पिछले जमाने की बातें हैं
आज मानव का धर्म
स्वधर्म में आस्था
और परधर्म पर शंका...........
मेरा धर्म महान!!!

गुरुवार, 18 मार्च 2010

बडे बडे फन्ने खाँ ब्लागर यहाँ एक कौडी में तीन के भाव बिक रहे हैं-- (आह्वान)

प्रभो! आओ, आओ.....हम इस समय तुम्हे बडे दीन होकर पुकार रहे हैं। तुम तो दीनों की बहुत सुनते थे। सुनते क्या थे, तुम तो दीनों के लिए थे ही। क्या हमारी न सुनोगे?! देखो जरा इस ब्लागजगत को एक नजर देखो तो सही। पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष नें यहाँ का सत्यानाश कर के रख दिया है। बडे बडे फन्ने खाँ ब्लागर एक कौडी में तीन के भाव बिक रहे हैं। सबकी बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो चुकी है। किसी में सहनशीलता, धर्म, विवेक, आपसी प्रेम, बन्धुत्व जैसा कोई गुण नहीं दिखाई पडता। लम्पटगिरी दिनों दिन बढती चली जा रही है। छोटे बडों को उपदेश देने में निमग्न हैं और बडे दिन रात छोटों पर गुर्र गुर्र करने में लगे हुए हैं। तमाशबीन अनामी/बेनामी का मुखौटा पहने एक दूसरे को आपस में लडाने को ही अपना कर्तव्य मानकर यहाँ जमे हुए हैं। कुछ जलील इन्सान धर्म की ओट लिए अधर्म का नंगा नाच करने में जुटे हैं। बिना अर्थ जाने पुस्तकों में से पढे हुए को टीप टीप कर विद्वान होने का भ्रम फैलाने में बडे जोरों शोरों से लगे हुए हैं। धर्म के वास्तविक मूल्यों की परख कहीं लुप्त हो चुकी है, आस्था और निष्ठाओं पर कुठाराघात किया जा रहा है। एक दूसरे का जम के अनादर किया जा रहा है और कोई ससुरा सुनने को तैयार नहीं।
प्रभो! आप ये समझ लीजिए कि एक दम से हाहाकार सी मची हुई है। ब्लाग देवीयों की दशा सोचनीय सी हो रखी है। बुजुर्ग ब्लागरों की मन की पीडा असह्य है। ब्लागिंग धर्म की कोई मर्यादा नहीं। समाज की तरह ही यहाँ भी जातियाँ, उपजातियाँ उत्पन हो गई हैं। ऊंच-नीच का भाव यहाँ भी शुरू हो चुका है। अच्छे एवं गुणवत्तापूर्ण लेखन का स्थान सक्रियता क्रमाँक की दौड नें ले लिया है। लोग सुबह पोस्ट लिखते हैं और शाम तक छ: बार देख चुके होते हैं कि सक्रियता क्रमाँक बडा कि नहीं?। लोग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस चाटूकार धर्म निभाने में लगे हुए हैं। गुरू जैसा परम पवित्र शब्द भी यहाँ आकर अपनी गरिमा खो चुका हैयहाँ गुरू माने===ऊपर चढने की सीढी। बस ये सीढी तभी तक है जब तक कि ऊपर नहीं चढ जाते। एक बार ऊपर चढे नहीं की उसके बाद तो इस सीढी का एक एक डंडा बिखरा मिलता हैं। तब चेले खुद किसी ओर के गुरू बन चुके होते हैं और गुरू उनके द्वारे हाथ बाँधे अपनी पोस्ट पर टिप्पणी की भीख माँगता दिखाई पडता है। लोगबाग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस जय गुरूदेव्!  जय गुरूदेव! करते इस ब्लाग भवसागर को पार करने में जुटे हैं।
बडे बडे दंगेच्छु,बकवादी,जेहादी,माओवादी,आतंकवादी, और भी जितने प्रकार के वादी है, यहाँ अपने अपने डेरे जमाने लगे हैं। प्रेम और सहानुभूति का स्थान घृ्णा नें ले लिया है। हिन्दू और अहिन्दूओं, देशप्रेमियों और पडोसी प्रेमियों के झगडे, अनर्गल प्रलाप, गाली गलौच साधारण और सुबह शाम की घटना हो चुकी हैं। धर्म के नाम पर समझो अधर्म हो रहा है। क्या इस समय और ऎसे समय में भी तुम यहाँ अपने पधारने की जरूरत नहीं समझते ?
दीनानाथ! आओ, आओ । अब विलम्ब न करो। ब्लागजगत की ऎसी दशा है और तुम देखते तक नहीं, सुनते तक नहीं। अब नहीं आओगे तो कब आओगे। कहीं ऎसा तो नहीं कि कलयुग में तुम भी दीनों की बजाय इन माँ के दीनों का पक्ष लेने लगे हो।(माँ का दीना पंजाबी भाषा में एक बहुत ही आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला शब्द है, किन्तु इसका अर्थ कोई परम विद्वान ही बता सकता है, हमें तो पता नहीं :-)
हे महादेव औघडदानी, भोले बाबा ऎसा वर दो
                        सोने का सर्प चढाऊंगा, इनकी बुद्धि निर्मल कर दो ।।(स्व-रचित नहीं)

(बहुत दिनों से हम सोच रहे थे कि पता नहीं लोगों को अपनी पोस्ट पर नापसंद के चटके कैसे मिल जाते हैं,हमें तो आजतक किसी नें नहीं दिया। ईश्वर नें चाहा तो शायद आज हमारी ये इच्छा पूरी हो ही जाये :-)
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