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शुक्रवार, 14 मई 2010

सुना है, हिन्दी ब्लागजगत में चुनाव होने वाले हैं!!!!!!

जैसे ही खबर मिली कि हिन्दी चिट्ठाजगत में "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" चुनने के लिए चुनाव प्रक्रिया अपनाई जा रही है तो सुनते ही अपने ब्लागर मित्र श्री बनवारी लाल जी तुरन्त धमक पडे. पूछने लगे कि " पंडित जी! जरा एक मशविरा तो दीजिए"
"जी कहिए, आज किस बात पर मशविरा माँगा जा रहा है"
"पंडित जी! बात तो आप तक पहुँच ही चुकी होगी कि अपने यहाँ चिट्ठजगत में सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का चुनाव होने जा रहा है. उसके लिए उन सभी इच्छुक प्रत्याशियों से नाँमाकन पत्र भरने को कहा गया है, जो कि खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं"
"जी हाँ, कुछ ऎसा सुना तो है"
" तो बात ये है कि हमने इस चुनाव में भाग लेने का मन बनाया है. आपसे इसी मसलें पर मशविरा चाहिए था कि हमें चुनाव लड लेना चाहिए कि नहीं"
मैने उन्हे निहारा. जानना चाहता था कि वह इस समय किस श्रेणी का मजाक कर रहे थे. मैं मन ही मन में उनके द्वारा हिन्दी ब्लागिंग में दिए गए योगदान का आंकलन करने लगा. सब लोग अच्छे से जानते हैं कि बनवारी लाल जी का साहित्य की किसी भी विधा से लगभग वैसा ही सम्बंध रहा है, जैसा कि ईँट और कुत्ते में. अपनी दो बरस की ब्लागिंग में उन्होने ले देकर यही कोई पाँच सात तो पोस्ट लिखी हैं. उनमें भी या तो घटिया सी कोई तुकबन्दी रही या फिर बच्चों के चुटकुले ............बस ले देकर हिन्दी के विकास में उनका यही योगदान रहा है .
अब ऎसे निरीह ब्लागर के मुँह से टपके ये शब्द मुझे कोरा मजाक न लगते तो भला क्या लगते. अत: मैने तो सपाट राय दे डाली " अमां यार छोडो भी! यह चुनाव वनाव वाला झंझट आप जैसे भले आदमियों के लिए नहीं है.ओर अगर चुनाव लड भी लिया तो आपको वोट देगा कौन?"
सुनते ही बनवारी लाल जी उदास हो गए. मुँह लटक गया. शायद मैने उनके बढते कदमों में टंगडी जो मार दी थी. मुँह बिसूरकर बोले" पंडित जी! आपसे हमें यह उम्मीद नहीं थी. आपने तो हमारा दिल ही तोड दिया"     
अब उनको भला कौन समझाता कि मुझे भी उनसे ऎसे प्रश्न की कोई उम्मीद नहीं थी. फिर भी मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. गलती के अहसास का दायित्व इस जमाने में प्राय: समझदार आदमी का ही होता है. मुझे लगा कि उडनातुर पतंगें को रोकना टोकना नहीं चाहिए. फिर भले ही वो जलती लौ पर भस्म होने ही क्यों न जा रहा हो. अब उडना तो उस बेचारे का स्वभाव ठहरा और जलना उसकी नियती. फिर ईश्वर के बनाए इस विधान में हम भला क्यों टाँग अडाएं. सो, मैने भूल सुधार करनी चाही " देख लीजिए! अगर जीतने का कोई चान्स वान्स हो तो!"
हमारी ओर से तनिक सी सकारात्मकता दिखाई देते ही बनवारी लाल जी का मुखारविन्द खिल उठा. बोले" जी क्यों नहीं, जब आप जैसे मित्र साथ हैं तो फिर जीतेंगें कैसे नहीं"
मैने मन ही मन माथा ठोंक लिया. गलतफहमी की भी कोई तो एक सीमा होनी ही चाहिए,लेकिन लगता है शायद ये तो सीमाओं को भी लाँघ चुके हैं. कहते हैं कि मूर्ख सिर्फ पागलखानों में ही नहीं पाए जाते और न ही वो गले में तख्ती लटकाए घूमते हैं कि "हम पागल हैं," उनकी तो हरकतें ही सब कुछ बयां कर डालती हैं. एक बार तो जी में आया कि इन्हे साफ साफ मना कर दिया जाए कि भाई ऎसे किसी भुलावे में मत रहिएगा, लेकिन शायद मेरे मित्र धर्म नें मुझे इस प्रकार की चुभती सी प्रतिक्रिया करने से रोक दिया. "चलिए हम तो आपको वोट दे ही देंगें लेकिन सिर्फ हमारी अकेले की वोट से तो जीत हार तय नहीं होने वाली,,,ओर लोगों की भी वोट मिले तब न"
" मिलेगी क्यों नहीं, आखिर हम में कमी क्या है? सभी ब्लागरों के साथ तो अपने मधुर सम्बंध है. सबने वोट देने का वायदा भी कर दिया है" जनाब का आत्मविश्वास पूरे उत्थान पर था.
हिन्दी ब्लागिंग के प्रचलित नियम कायदों के अनुसार तो इनमें कैसी भी कोई कमी नहीं थी, बल्कि एक आध गुण फालतू ही बेशक होगा. लेकिन बिना किसी सार्थक योगदान के "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" होने का भ्रम पाल बैठना भी तो किसी मूर्खता से कम नहीं कहा जा सकता. अब नासमझ आदमी को तो समझा भी लो लेकिन पागल या दीवाने को भला कौन समझाए. ब्लागिंग धर्म मुझे कोई कडक उत्तर देने से रोक रहा था लेकिन बनवारी लाल थे कि टस से मस ही नहीं हो रहे थे.
"पंडित जी, आप तो जानते ही हैं कि समूचे ब्लागजगत में हमारे से स्वच्छ छवि वाला ब्लागर मिलना भी मुश्किल है. आज तक न तो हमारा किसी विवाद में कोई हाथ रहा, न ही हमने कभी किसी का नाम लेकर कोई पोस्ट लिखी...ओर तो ओर किसी ओर ने भी कभी हमारा नाम लेकर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... आज तक कैसे भी करके हम अपनी छवि को दागदार होने से बचाए रखे हुए हैं..अब आप ही बताईये कि हमारे जैसे इतनी पाक साफ छवि वाले ब्लागर को कोई भला वोट क्यूं नहीं देगा ?"
अब इस बेचारे भले आदमी को कौन समझाए कि इसकी कोई छवि ही कहाँ हैं, जो दागदार या बेदाग होगी. लेकिन मालूम नहीं कि वो मित्रधर्म निभाने की विवशता रही या कि ब्लागिंग धर्म से च्युत होने का डर, कि हमने उनसे ओर कुछ कहना उचित ही नहीं समझा. सो, हमने उनकी योग्यता को स्वीकार करते हुए(बेशक ऊपरी मन से ही सही) अपना वोट उन्हे ही देने के वादे के साथ हाथ जोडकर उन्हे रूखसत किया.....
अब सोच रहे हैं कि कुछ दिनों के लिए नैट कनैक्शन कटवा दिया जाए या फिर कहीं घूमफिर आया जाए...तब तक ये "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" वाली चुनावी आपदा भी टल चुकी होगी वर्ना अभी तो चुनाव का आगाज ही हुआ है ओर ये बनवारी लाल ट्पक पडे, कल को पता नहीं कौन कौन अलाने फलाने ब्लागर मुँह उठाए वोट का दान माँगने चले आएंगें. अब जिसका समर्थन न किया वही नाम ले लेकर गरियाया करेगा.......सो, काहे को फोकट में दुश्मनी मोल लेनी.
इसलिए भाई हम तो चले हरिद्वार गंगा माई की शरण में, कुछेक पाप धो आएं...चुनाव निपटते ही आ जाएंगें. तब तक आप लोग लडो, भिडो, एक दूजे के खिलाफ नारेबाजी करो, आरोप-प्रत्यारोप लगाओ. जो भी कोई जीत जाएगा, उसी को हम भी "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" मान लेंगें....आखिर लोकतन्त्र भी तो यही कहता है!

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

सब टैम-टैम की बात है

एक बार अपने ताऊ का हरिद्वार जा कै गगां स्नान करण का मूड बन गया. जब वो जाने कि तैयारी करने लगा तो सारे गाव को खबर हो गई.गाव मे एक ब्राह्मण भी रहता था नाम था पडिंत राधेश्याम , जिसकी एक बहुत बुरी आद्त थी कि गांव से कोई भी कही बाहर जाता तो वो कुछ न कुछ लाने की फरमाईश जरुर कर देता.
उसे जब पता लगा कि ताऊ हरिद्वार जा रहा है तो सीधा पहुच गया ताऊ के घर और बोला "ताऊ हरद्वार जा रिया है तो एक धरम का काम हि कर दियो, तन्नै पुण्य मिलेगा".
ताऊ का मत्था तो पडित को देखते हि ठणक गया था, फिर भी बोल्या " हां पंडित  जी, बोलो क्या करणा है".
पडित "ताऊ आते हुए एक शंख् लेता आईयो, इब तक गाव के मदिर मे शंख् नही है"
ताऊ ने चाहे मजबूरी मे ही सही, लेकिन हां कर दी.
फिर हरिद्वार गया और जिदगी मे चोरी-ठगी-बेईमानी करके जो पाप कमाये थे, उन्हे गंगा स्नान करके पुण्यो मे तबदील किया और वापिस घर को चल दिया.
रास्ते मे अपने गाव के नजदीक पहुच कर उसे याद आया कि बाह्ममण ने शखं मंगवाया था, वो तो ल्याणा भूल ही गया. इब के करूं, कहीं ब्राह्म्ण नाराज हो कै कोई श्राप-श्रूप ना दे दै. (वैसे ब्राह्ममण का श्राप बहुत जल्दी फलिभूत होता है, अगर आपने आज मेरे ईस चिठ्ठे पर टिप्पणि ना की तो फिर .........)
अब ताऊ बेचारा बडा परेशान हो गया, उसे कोई समाधान नजर नही आया. ईधर-ऊधर नजर दौडाई तो कुछ दूर आगे उसे मरे हुये जानवरों के कंकाल पडे दिखाई दिये.अचानक उसकी नजर एक गधे के कंकाल पर पडी, जिसकी खोपडी का आकार बिल्कुल शंख जैसा था.
अब विपरीत बुद्धि ताऊ ने सोचा कि बाह्मण ने क्या कभी शंख देखा है, यही ले चलता हूं, ये तो दिखता भी बिल्कुल शंख जैसा है
अब उसने उस खोपडी को उठाया, उसे अच्छी तरह पानी से धोकर, एक साफ से कपडे में लपेटकर अपने पास रख लिया और चल पडा गांव की ओर .
पहुंचते हि पंडित के पास गया और बोला" ले भाई पंडित तेरा शंख, बहोत हि मुसकिल ते मिल्या है"
अब अगले दिन बाह्ममण ने शंख को तिलक लगाया फिर लाल कपडे मे लपेटकर अपने भगवान के सामने रख दिया ओर पूजा-पाठ करके बजाने लगा.
लग्या फूंक पे फूंक मारण, अब अगर वो शंख होता तो बजता. बेचारे पंडित के तो फूंक मार मार के पसीने छूट गये.
उठाया शंख ओर पहुंच गया ताऊ के घर. बोला "रे ताऊ! यो कैसा शंख ले आया, यो सुसरा तो बजता ही कोणी, फूंक मारते-मारते मेरे तो फेफडे दुखण लाग गे"
ताऊ बोल्या " सब टाईम-टाईम की बात है पंडित जी, जब ईसका टैम था ना,तो गांव को सारी सारी रात सोण ना देवे था, अब इस मैं वो बात नही रही,ईब तो इसने कपडे मे लपेट कै ही रक्ख ल्यो"