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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

रिश्तों का महत्व

लाला बनवारी लाल की रईसी का अन्दाजा तो कोई भी उनके बंगले को बाहर से देख कर ही लगा सकता था-सुंदर नक्काशीदार विशाल गेट जिससे अंदर जाते ही तरह-तरह के देशी-विदेशी पौधों, रंग-बिरंगे फूलों से लदा विशाल बगीचा,बडा सा स्वीमिंग पुल, गाड़ियां, पचासों नौकर-चाकर, राजा-महाराजाओं जैसी शानो-शौकत। और बंगले के अंदर तो जैसे एकदम स्वर्ग का सा आनन्द, एक से एक लग्जरी सामान, झाड़-फानूस, सभी ऐशो-आराम के साधन मौजूद थे । लगता था कि लक्ष्मी जी और कुबेर पूर्णरूप से मेहरबान थे लाला जी पर ।

लाला जी का भी क्या मेनटेनैंस था…एक-एक सामान को ऐसे सहेजकर रखते थे कि मज़ाल है कहीं कोई धूल का कण भी उसे छू जाए...बंगले के हर सामान में उनकी जान बसती थी । एक दिन उनकी गाड़ी को किसी ने टक्कर दे मारी थी…उसके दु:ख में घर पर किसी ने दो दिन तक खाना भी नहीं खाया ।

एक दिन अचानक ही बंगले के अंदर से तेज-तेज आवाजें आने लगी।चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था, कोई अंदर भाग रहा था तो कोई बाहर ।
कुछ ही देर में सेठानी दौड़ती हुई बाहर आई और हांफती हुई बोली-'बचाओ,आग! आग!'

मंझला बेटा जो बाहर बगीचे में टहल रहा था, भागा-भागा अंदर गया और अपने प्यारे से कुत्ते को बाहर निकाल लाया ।

बाहर खड़े लोगों ने बंगले की ओर देखा-खिड़कियों से बाहर धुआं निकल रहा था, सेठानी तथा घर के अन्य लोग भी बाहर आ गए थे । सभी नौकरों को चिल्ला-चिल्ला कर अपना-अपना सामान लाने का आर्डर दे रहे थे।
बडे बेटे ने आवाज लगाई-'अरे ! कोई वो बड़ा बाला संदूक बाहर निकालो'।

इधर से बहु चिल्लाई'अलमारी से मेरी ज्वेलरी लाओ , वो डायमंड वाला सेट वहां लॉकर में पड़ा है…'।

छोटा बेटा बोला-'अरे! मेरा मोबाईल फोन वो वहां ड्राईंग रूम की टेबल पर रह गया.....'

धीरे-धीरे सारा कीमती सामान बाहर निकाल लिया गया ।

अंत में लाला जी का पोता जो कि 7 साल का था, दौड़ता हुआ बंगले के अंदर गया ओर कुछ देर बाद व्हील चेयर पर बैठे अपने दादाजी को लेकर बाहर निकला।

शायद रिश्तों का महत्व सिर्फ वो बच्चा ही समझ पाया था ।