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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

मनोविज्ञान----क्या, क्यों, कैसे ?

मनोविज्ञान का सब से सरल लक्षण जो परम्परा से प्रामाणिक समझा गया है. यह है कि मनोविज्ञान उस शास्त्र का नाम है जो "आत्मा" का विवेचन करता है अर्थात आत्म-ज्ञान सम्बन्धी शास्त्र का नाम मनोविज्ञान है. इस लक्षण को वर्तमान आधुनिक विज्ञान के रंग से रंगे हुए मनोविज्ञानवेता स्वीकार नहीं करते. वे इस लक्षण में जो बडी आपत्ति देखते हैं, वह स्वयं "आत्मा" शब्द का प्रयोग है. उनके मतानुसार "आत्मा" एक विवादास्पद विषय है. आत्मा प्रकृ्ति से अतिरिक्त एक स्वतन्त्र सत्ता है या नहीं , इस प्रश्न पर दोनों प्रकार के विचार रखने वाले मनोविज्ञान के विद्वान रहे हैं. ऎसी दशा में मनोविज्ञान का लक्षण आत्मा शब्द के प्रयोग से करना प्रारम्भ में ही इस विज्ञान को विवादमय बना देता है.
इस आपत्ति से बचने के लिए कईं विचारकों नें मनोविज्ञान से तात्पर्य ऎसे शास्त्र से लिया है जो "मन" की विवेचना करे. परन्तु मन शब्द भी, आत्मा शब्द के समान वैसी ही कठनाई उपस्थित करता है. तर्क शास्त्र भी किसी अंश में मन(विचार) ही के साथ सम्बन्ध रखता है. ऎसी अवस्था में इन दोनों शास्त्रों का क्षेत्र-भेद आवश्यक प्रतीत होता है.
इन दोनों लक्षणों से अधिक स्पष्ट मनोविज्ञान का लक्षण वह है जो इसे "चेतना" (Consciousness) का विज्ञान कहता है. चेतना शब्द अधिक प्रचलित शब्द है. चेतना का यथार्थ भाव भी सुलभतया उपलब्ध है. सब मनुष्यों को अपने ज्ञान और निज की चेतना का साक्षात बोध होता है. उनकी सता में सन्देह असम्भव है, क्यों कि सन्देह स्वयं "चेतना" का प्रतिपादक है. ऎसी दशा में आत्मा शब्द के स्थान में चेतना शब्द का प्रयोग यद्यपि लक्षण को अधिक सरल तथा सुबोध बना देता है तथापि एक आपत्ति भी उपस्थित कर देता है.
प्रत्येक चेतना वैयक्तिक होने के कारण उसका ज्ञान भी वैयक्तिक होगा. परन्तु विज्ञान की दृ्ष्टि से हमें केवल वैयक्तिक चेतनता का अध्ययन अभीष्ट नहीं, अपितु उन व्यापक सिद्धान्तों के जानने की आवश्यकता है जो अनेक व्यक्तियों की चेष्टा पर घट सकें. यह तभी सम्भव है जब कि वैयक्तिक चेतना के साथ साथ सामूहिक चेतना का परिज्ञान भी हमें प्राप्त हो. ऎसी दशा में मनोविज्ञान का लक्षण और भी अधिक व्यापक होना चाहिए. अत: चेतना की अपेक्षा हमें किसी अधिक व्यापक परिभाषा का लक्षण में प्रयोग करना चाहिए.
बीते कुछ माह की बात है जब हमने इसी विषय पर आधारित एक आलेख मनोविज्ञान---मन का विज्ञान या आत्मा का ? आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया था, जिस पर हमें अभी तक भी जिज्ञासु पाठकों की ओर से प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो रही हैं. जिनमें से कुछ पाठकों नें इस विषय पर विस्तृ्त जानकारी देने की माँग भी रखी है. सो, स्नेही पाठकों की इच्छा को शिरोधार्य मानते हुए अब से कुछ समय निरन्तर इस विषय पर ही लिखने का प्रयास रहेगा.
दरअसल मनोविज्ञान अपने आप में एक ऎसा विषय है, जिसका अध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है. मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है. उसकी जीवन यात्रा की सफलता बहुत कुछ उसके सामाजिक कर्तव्यों को भलीभान्ती पालन करने पर आश्रित रहती है. मनुष्य अपने सामाजिक कर्तव्यों का पालन तब तक सफलतापूर्वक नहीं कर सकता, जब तक कि वह समाज निष्ठ अन्य व्यक्तियों के स्वभाव को समझ न लेवे. परन्तु यह कार्य पूर्णतया सिद्ध होना मनोविज्ञान के बिना असम्भव है. इस लिए सामाजिक व्यवहार को दक्षतापूर्ण चलाने तथा उसको अधिक शान्तीमय बनाने के लिए मनोविज्ञान से थोडा बहुत परिचय सब के लिए परम आवश्यक है.
तो, अब विषय को आगे बढाते हुए बात करते हैं कि आत्मा, मस्तिष्क और चेतना---इन तीनों शक्तियों को अस्वीकार करने के पश्चात अब मनोविज्ञान की सबसे नवीन परिभाषा यह है कि जो शास्त्र मानसिक व्यापारों का क्रमबद्ध विवेचन करे------वो मनोविज्ञान है. मानसिक व्यापार किसको कहते हैं ? इसे समझने के लिए हमें थोडी देर अपनी चेतना का अन्तरीय अवलोकन करना चाहिए.
मैं जब ध्यानमग्न होकर अपनी चेतना का अवलोकन करता हूँ तो मुझे वहाँ पर किसी न किसी मानसिक दशा की विद्यमानता नजर आती है. अपने अन्दर मैं या तो अनुभव करता हूँ कि मैं किसी बात का "ध्यान" कर रहा हूं, या किसी पदार्थ की प्राप्ति की मुझे "आशा" लग रही है या किसी विषय में मुझे "सन्देह" उत्पन हो रहा है या मुझ को अपने किसी कार्य के सम्बन्ध में "भय" उत्पन हो रहा है या अपने किसी मित्र का "स्मरण" करके मुझे "प्रसन्नता" हो रही है, या अपने किसी शारीरिक अथवा मानसिक "दु:ख" का अनुभव हो रहा है, इत्यादि इसी प्रकार की अनेक मानसिक अवस्थाओं में से कोई न कोई अवस्था इस समय मेरे अन्तरीय अवलोकन का विषय बन रही है. ध्यान, आशा, दु:ख, सुख, स्मरण, भय, सन्देह, इत्यादि यह सब मानसिक व्यापार हैं. इन सब मानसिक व्यापारों के साथ कोई न कोई विषय सम्बद्ध रहता है. जब मैं चिन्तन करता हूँ तो मेरा चिन्तन किसी विषय को लक्ष्य करके ही होता है. जब मैं कोई सुख, दु:ख अनुभव करता हूँ, तो वह सुख-दु:ख भी किसी विषय के कारणभूत होने से उत्पन होते हैं. उपरोक्त विचार से यह स्पष्ट विदित होता है कि मानसिक व्यापार और उनका विषय दोनों पृ्थक-पृ्थक ज्ञान गोचर हो सकते हैं. मनोविज्ञान केवल मानसिक व्यापारों का ही विवेचन करता है. मानसिक व्यापारों की व्याख्या, उनके परस्पर सम्बन्धों का दर्शाना तथा उन व्यापक नियमों का खोजना है, जिनके अधीन वे मानसिक व्यापार कार्य करते हैं. यही मनोविज्ञान शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है. मानसिक व्यापारों के "विषय" अन्य विज्ञानों द्वारा प्रतिपादित होते हैं.
मनोविज्ञान के इस लक्षण की सार्थकता:-
यह लक्षण क्यों अधिक सर्वप्रिय बन पाया, इस पर भी थोडा विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है. प्रथम तो 'व्यापार' शब्द का प्रयोग अति विस्तृ्त अर्थों में लिया जा सकता है, मनुष्य से लेकर सब प्राणियों तक के सम्बन्ध में मानसिक व्यापार शब्द का प्रयोग किया जा सकता है. यदि एक मनुष्य विषय के सन्निकर्ष पर किसी विशेष प्रतिक्रिया अथवा मानसिक व्यापार को प्रकट करता है तो लगभग वैसी ही प्रतिक्रिया या व्यापार पशु-पक्षी, कीट-पतंगें आदि भी प्रकट करते हैं. ऎसी दशा में मानसिक व्यापार का विवेचन मनोविज्ञान शास्त्र के क्षेत्र को बहुत विस्तृ्त बना देता है. जहाँ मानुषी चेतना का विवेचन वैयक्तिक था, वहीं मानसिक व्यापारों का अध्ययन व्यापक तथा सर्वनिष्ठ होने के कारण मनोविज्ञान को वास्तव में विज्ञान कहलाने का अधिकारी बना देता है. किसी शास्त्र को विज्ञान का नाम तभी दिया जा सकता है, जब वह अपने विषय सम्बन्धी घटनाओं का किन्ही सामान्य नियमों अथवा सिद्धान्तों की दृ्ष्टि से प्रतिपादन करे. मनोविज्ञान शास्त्र भी अन्य विज्ञानों के समान प्राणियों के मानसिक व्यापारों का विस्तृ्त अध्ययन करके कईं एक सामान्य नियमों की स्थापना करना चाहता है....      
क्रमश:.........            धर्म                                                                                     ज्योतिष की सार्थकता