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सोमवार, 27 जून 2011

पुनर्जन्म की वैज्ञानिक संभावना

पुनर्जन्म----एक ऎसा विचार जिसे हिन्दू धर्म की सभी शाखाओं द्वारा स्वीकृत किया गया है. भगवतगीता का कहना है कि जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है उसका जन्म भी होना निश्चित है. लेकिन जन्म अन्त समय के संस्कार और इच्छाओं के अनुरूप होता है. 
भारतीय दार्शनिकों को तो पुनर्जन्म स्वीकारने में कोई परेशानी नहीं होती किन्तु विज्ञान जगत का स्वीकार करना ही भारतीय दर्शन की सबसे बडी बिजय होगी. विज्ञान की स्पष्ट धारणा है कि कभी भी कुछ पूर्णत: समाप्त नहीं होता. केवल उसका रूप परिवर्तित हो जाता है. तो क्या यह संभव नहीं कि जीवन भी समाप्त न होकर परिवर्तन हो जाए.

"यह सम्पूर्ण जीवन जगत तरंगात्मक है. जीवन मनोभौतिक तरंगों का समानान्तरीकरण है. यह समानान्तरीकरण का ही जीवन है. इसका नियोजन मनुष्य की मानसिक या शारीरिक मृत्यु का कारण होता है."
विज्ञान जगत भी इस बात को स्वीकार करता है कि जीवन तरंगात्मक है. इ.सी.जी.( E.C.G.) भी इस बात का स्पष्ट प्रमाण देती है. तरंग जहाँ जीवन हैं, सीधी रेखा मृत्यु की द्योतक है.
जब हम मानकर चलते हैं कि तरंगें कभी समाप्त नहीं होती तो यह मानना ही पडेगा कि मनुष्य की मृत्यु के पश्चात उसकी मनस तरंगें ब्राह्मंड में ही विचरण करती रहती हैं और जब किसी भौतिक तरंग (शरीर) से उनका समानान्तरीकरण हो जाता हैतो यह उस मनस तरंग का पुनर्जन्म हुआ.
यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान जगत यह मान रहा है कि शरीर की मृत्यु के पश्चात मस्तिष्क लगभग 5 या 6 घंटे की अवधि तक जीवित रहता है. मेरे शब्दों में मनस की अन्तर्यात्रा सम्भव है. भारतीय शैली में अग्निसंस्कार में मृतक की कपालक्रिया द्वारा मस्तिष्क की मृत्यु को भी पूर्णरूप से सुनिश्चित कर लिया जाता है ताकि आत्मा मुक्त हो जाए, भटके नहीं.
किसी भी शैली का अंतिम संस्कार शरीर को नष्ट कर ही देता है. अत: यह तो निश्चित है कि शरीर का पुनर्जन्म नहीं होता किन्तु विशेष स्थितियों में मनस या तरंगों का पुनर्जन्म हो सकता है. कोई आवश्यक नहीं ईसा या बुद्ध की तरंग पुन: धरती पर ही जन्म लें. हो सकता है हजारों वर्षों बाद किसी अन्य जीवित ग्रह पर उनका पुनर्जन्म हो रहा हो.
पुनर्जन्म की स्मृति की व्याख्या भी इसी आधार पर सहजता में होती है. क्योंकि अधिकांशत: पुनर्जन्म का स्मरण रखने वाले व्यक्ति अबोध शिशु ही होते हैं. उनके संस्काररहित कच्चे मन से कोई मनस तरंग सम्पर्क स्थापित कर लेती है किन्तु जब उनका मस्तिष्क अपने ज्ञान व अनुभव स्वयं पर अंकित करने में सक्षम हो जाता है तो ऎसी स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं. यह मेरी धारणा है. वैसे भी प्राय: असामान्य रूप से मृत्यु प्राप्त करने वाली को ही पुनर्जन्म की घटनायें देखने सुनने को मिलती हैं.

किन्तु इस ज्योतिषांज्योति का अमृत प्राप्त कर लेने वाला साधक ब्रह्ममय हो जाता है. उसकी मनस तरंगें महामानस में विलीन हो जाती है.

सोमवार, 5 जुलाई 2010

सिर्फ जटिलताएं ही जटिलताएं, सरलता कुछ भी नहीं.......

सरलता सदैव प्रश्नों को जन्म देती है और जटिलता समस्याओं को. वर्तमान आधुनिक युग को यदि समस्याओं का युग कहा जाए तो शायद कुछ गलत न होगा. प्राचीन युग प्रश्नों का युग था. उस पौराणिक युग में तरह तरह के प्रश्न पूछे जाते थे, अनेक शंकाओं को उठाया जाता था. सब सवालों के जवाब दिए जाते थे और सारी शंकाओं का समाधान हो जाता था. यह शायद इसलिए कि पुराने युग की मानसिक स्थिति बचपन के जैसे हुआ करती थी,लेकिन ये युग तो मानो बूढों का युग है. आदमी पैदा होते ही सीधे बूढापे में कदम रख लेता है.जीवन की वो सरलता भला अब कहाँ दिखाई पडती है. बस बूढी मानसिकता से जन्मे उपदेश भर रह गए हैं सुनने को.
मुझे याद है जब मैं बचपन में परिवार के अपने बडे-बुजुर्गों से तरह तरह के सवाल किया करता था----देवता कौन होते हैं? लोग मर क्यूं जाया करते हैं? मरने के बाद इन्सान कहाँ जाता है? भगवान दिखता क्यूँ नहीं? दिन के बाद रात क्यूँ होती है? आकाश में ये तारे किसलिए चमकते हैं? वगैरह वगैरह......मेरे इन अबोध सवालों को सुनकर अक्सर या तो पिता जी चुप रहते या फिर उनका यही एक जवाब होता कि "बाप रे! ये लडका कितनी सिर खपाई करवाता है"
आज शायद मन की इस सरलता का कहीं लोप हो गया है, इसे पूरी तरह से जटिलता नें घेर लिया है. आज हर प्रश्न टेढा होकर समस्या बनता जा रहा है और समस्याओं से जीवन घिर गया है. इन का समाधान नहीं हो पा रहा है. इस लिए कभी कभी जी चाहता है कि काश हम पुन: बचपन में लौट सकते या फिर ये युग ही बदल जाता....इसके बदले में पौराणिक युग फिर से लौट आता. लेकिन ऎसा होना संभव ही कहाँ है. सच पूछिए, मुझे कभी कभी उन लोगों से रश्क होने लगता है,जो आज भी बचपन में जी रहे हैं. इनके चेहरों पर न तो हैरानी दिखती है और न ही किसी किस्म की परेशानी. सोचता हूँ कि हम लोगों नें पौराणिक सरलता को खोकर क्या पाया है. इस ससुरी आधुनिकता नें दुनिया को आखिर दिया ही क्या है ?...बस, हर एक चेहरे पर जटिलता की लकीरें और बिना सवालों के जवाब.
आज पेट के लिए रोटी मिलना, मोक्ष मिलने या न मिलने से अधिक चिन्ता का विषय है. सिलेंडर में गैस या गाडी में पेट्रोल का न होना, भगवान के होने या न होने से कहीं अधिक हैरान कर डालता है. पुरखे कितने सुखी थे. हर तरह की चिन्ता फिक्र से मुक्त.जो पेडों की छाँव तले बैठकर ब्रह्म और माया के रहस्य खोज लिया करते थे...लेकिन एक इधर हम हैं जिनसे दिन भर ऎ.सी.के नीचे बैठकर भी आज तक घर-गृ्हस्थी तक का रहस्य न सुलझाया जा सका. आज यदि हम अतीत में जीना चाहते हैं तो दुनिया पलायनवादी कहने लगती है,एक झटके में पुरातनपंथी घोषित कर दिया जाता है.करें तो क्या करें. जाएं तो आखिर कहाँ जाएँ ?
भाग्य के बलिहारी जाऊँ! धर्मपत्नि भी ऎसी मिली जो साईंस पढी हुई. समझिए जी का जंजाल. खाना खाने बैठो तो, निवाला मुँह तक बाद में जाए उससे पहले देर तक मुए प्रोटीन,विटामिन,कैल्शियम,कार्बोहाईटड्रेट वगैरह पर प्रवचन सुनना पडता है. पेट तो पहले ही इस प्रवचन से भर चुका होता है, खाना क्या खाक खाया जाएगा. कभी मीठे का निषेध करने लगती है तो कभी खट्टे का. आचार, घी वगैरह को तो छूने भी नहीं देती...कहती है कि दिल के लिए नुक्सानदेह होता है. अब उसे क्या समझाएं कि भागवान दिल को तो नुक्सान हो ही रहा है, अब और इससे ज्यादा भला क्या नुक्सान होगा. बस गनीमत है कि तुम्हारे होते (भी) अभी तक जैसे तैसे चल रहा है, धडकना बन्द नहीं हुआ :) इन नासपीटे वैज्ञानिकों का क्या जाता है. क्या खाना है, क्या पीना है.....ये लोग तो यूँ ही फालतू के शोध करते रहते हैं और बिना बात के हमारी जान को नए नए क्लेश खडे करते जाते हैं. इनका क्या जाता है. भुगतना तो हमें पडता है :)
अब तो ऎसा लगने लगा हैं कि विज्ञान का कार्य जीवन को समस्या मुक्त करना है ही नहीं वरन नित नई समस्याएं पैदा कर इसे ओर अधिक जटिल करते जाना है. पता ही नहीं चलता कि अपनी सहजता,सरलता और प्रकृतिमय जीवन व्यवस्था को खोकर हमने हासिल क्या किया है ? दिखाई पडता है तो सिर्फ यही कि----आधुनिकता के नाम पर जीवन में बस जटिलताएं ही जटिलताएं, सरलता कुछ भी नहीं.......