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शुक्रवार, 24 जून 2011

क्यूंकि हर धर्म यही कहता है.........

श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं----"सर्वभूत हिते रत्ता" अर्थात सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हित में रत और सम्पूर्ण प्राणियों का सुह्रद रहो. जो शुभफल प्राणियों पर दया करने से होता है, वह फल न तो वेदों से, समस्त यज्ञों के करने से और न ही किसी तीर्थ, वन्दन अथवा स्नान-दान इत्यादि से होता है.

जीवितुं य: स्वयं चेच्छेत कथं सोन्यं प्रघात्तयेतु !
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत !!
जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को भला कैसे मार सकता है ? प्राणी जैसा अपने लिए चाहता है, वैसा ही दूसरों के लिए भी चाहे. कोई भी इन्सान यह नहीं चाहता कि कोई हिँसक पशु या मनुष्य मुझे, मेरे बाल-बच्चों, इष्टमित्रों वा आत्मीयजनों को किसी प्रकार का कष्ट दे या हानि पहुँचाये अथवा प्राण ले ले या इनका माँस खाये. एक कसाई जो प्रतिदिन सैकडों प्राणियों के गले पर खंजर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूईं भी चुभोयें, तो वह उसे भी कभी सहन नहीं करेगा. फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे भला कहाँ से मिल गया ?
मित्रस्य चक्षुणा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे !!
हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें. इस वेदाज्ञानुसार सब प्राणियों को मित्रवत समझकर सेवा करें, सुख दे. इसी में जीवन की सफलता है. इसी से यह लोक और परलोक दोनों बनते हैं.

फिर दूसरों के प्रति हमें वैसा बर्ताव कदापि नहीं करना चाहिए, जिसे हम अपने लिए पसन्द न करें. कहा भी है, कि------"आत्मन प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत". लेकिन देखिए दुनिया में कितना बडा विरोधाभास है, जहाँ एक ओर हम भगवान से "दया के लिए" प्रार्थना करते हैं और वहीं दूसरे प्राणियों के प्रति क्रूर हो जाते हैं-------How is that man who prays for money, is himself not merciful towards other fellow beings.


इस्लामिक धर्मग्रन्थ कुरआन शरीफ का आरम्भ ही "बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम" से होता है. जिसका अर्थ है कि खुदा रहीम अर्थात "सब पर रहम" करने वाला है. इनके अनुनायियों के मुख से भी सदैव यही सुनने को मिलता है कि अल्लाह अत्यन्त कृपाशील दयावान है .वही हर चीज को पैदा करने वाला और उसका निगहबान(Guardian ) है. अब जीभ के स्वाद के चक्कर में मनुष्य उस "निगहबान" की देखरेख में उसी की पैदा की हुई चीज की हत्या करे, तो क्या यह अत्यन्त विचारणीय प्रश्न नहीं ?

श्री अरविन्द कहते रहे हैं कि-----"जो भोजन आप लेते हैं, उसके साथ न्यूनाधिक मात्रा में उस पशु की जिसका माँस आप निगलते हैं, चेतना भी लेते हैं"

भगवान बुद्ध नें "माँस और खून के आहार" को अभक्ष्य और घृणा से भरा और 'मलेच्छों द्वारा सेवित' कहा है.  

सिक्ख धर्म के जनक गुरू नानक देव जी कहते हैं-----"घृणित खून जब मनुष्य पियेगा, तो वह निर्मल चित्त
भला कैसे रह सकेगा."

पारसी धर्म के प्रणेता जोरास्टर नें कसाईखानों को पाप की आकर्षण शक्ति का केन्द्र बताया है और हिब्रू धर्म के सन्त इजराइल कहते हैं----" जब तुम बहुत प्रार्थना करते हो, मैं उन्हे नहीं सुनूँगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं". चीनी विद्वान कन्फ्यूनिस नें भी जहाँ "पशु आहार को संसार का सर्वाधिक अनैतिक कर्म" कहा है, वहीं रामकृष्ण परमहँस का कहना है, कि-----"सात्विक आहार-उच्च विचार मनुष्य को परम शान्ति प्रदान करने का एकमात्र साधन है".

भगवान महावीर नें अहिँसा को "अश्रमों का ह्रदय", "शास्त्रों का गर्भ" (Nucleous) एवं "व्रत-उपवास तथा सदगुणों का पिंडी भूतसार" कहा है. और संसार में जितने प्राणी है, उन सबको जानते हुए या अनजाने में भी कोई कष्ट न देना ही धर्म का एकमात्र मूल तत्व है.

आपने देखा कि मनुष्य जाति के इतिहास में शायद ही कोई ऎसा धर्म अथवा धर्मशास्त्र होगा, जिसमें अहिंसा को सबसे ऊँचा स्थान न दिया गया हो. लेकिन इन्सान, जो कि अपने स्वयं का आसन इस संसार के अन्य समस्त प्राणियों से कहीं ऊँचा समझता है. क्या उस पर बैठकर उसे अपने खानपान का इतना भी विवेक नहीं कि वह सही मायनों में मानव बनना तो बहुत दूर की बात रही, एक पशु से ही कुछ सीख ले सके. एक पशु भी इस बात को अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य. उसे कोई सिखानेवाला नहीं है, फिर भी वो अपने आहार का उचित ज्ञान रखता है, परन्तु इन्सान पशु से भी इतना नीचे गिर गया है कि दूसरों के द्वारा परामर्श दिए जाने पर भी वह अपने को उसी रूप में गौरवशाली समझता है. क्या एक समझदार आदमी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो अपना पौरूष अपने से निर्बल प्राणी को मारकर अथवा उसे खाकर ही दिखाये ?. विधाता नें इन्सान के खाने के लिए स्वादु मधुर, पौष्टिक, बुद्धिवर्धक और हितकर इतने पदार्थ बना रखे हैं कि उनको छोडकर एक निकृष्ट अभक्ष्य पदार्थ पर टूट पडना कहाँ तक उचित है ?

यह कहना सर्वथा उचित ही होगा कि माँसाहार को छोड देने वाला व्यक्ति अन्य अनेक प्रकार की बुराईयों से भी स्वत: ही मुक्त हो जायेगा. इसलिए मेरा यही कहना है कि जो लोग इस बुराई से दूर रहे हैं, उनकी अपेक्षा वे लोग कहीं अधिक साहसी माने जायेंगें, जो इस लत को लात मारकर निरीह पशुओं के आँसू पोंछेंगें.
पक्षी और चौपाये सब मार-मार के खाय,
फिर भी सगर्व खुद को इन्सान कहाये !
बन के मर्द बहादुरी, बकरों-मुर्गों पर दिखलाये !
क्यूं  तुझे लाज नहीं आये ?

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

हिन्दू धर्म, संस्कृति और क्यों ?

भारतीय संस्कृति, जिसके विभिन्न स्वरूपों के साथ देश,काल आदि भौगोलिक एवं वैज्ञानिक चिन्तन जुडा हुआ है. जिसके प्रत्येक आचार-विचार के मूल में विज्ञान विराजमान रहा है.
भारतीय सदाचार शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास के लिए वैज्ञानिक उपयोगिता पर आधारित है. 'आचार प्रभवो धर्म:' अर्थात आचार से ही धर्म उत्पन्न होता है. 'आचार ग्राहयति इति आचार्य'--ऎसा कहकर निरूक्तकार यास्क नें स्पष्ट कर दिया है कि श्रेष्ठ तथा आचार्यों का कार्य आचार का पालन कराना है. मनुस्मृति भी यही कहती है कि 'आचारहीन न पुनन्ति वेदा'---अर्थात आचारहीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते. दरअसल भारतीय संस्कृति ओर उसके प्रत्येक आचार-विचार में वैज्ञानिक चिन्तन विद्यमान रहा है. लेकिन अब इसे युग का प्रभाव कहा जाए या कुछ ओर, आज का समाज विज्ञान की चकाचौंध से प्रभावित होकर प्राचीन आचार-विचार पर कुछ अधिक ही तर्क करने लगा है. इस विषय में आधुनिक शिक्षा एवं संस्कारों नें इन्सान के मन-मस्तिष्क में ओर अधिक भ्रम उत्पन किया है.
परन्तु बेशक धीरे-धीरे ही सही, जहाँ आज आधुनिक विज्ञान इसका वैज्ञानिक स्वरूप प्रतिपादित करने लगा है, वहीं आज का सभ्य समाज भी इसके महत्व को स्वीकार करता जा रहा है. किन्तु फिर भी इस देश की प्राचीन संस्कृति को लेकर सभ्य समाज में मन में कुछ ऎसे प्रश्न शेष रह जाते हैं, जिनका समाधान होना बहुत आवश्यक हो जाता है. यूँ तो समय-समय पर अनेक योग्य विद्वानों द्वारा इस विषय पर भरपूर प्रकाश डाला जाता रहा है. किन्तु इस सनातन संस्कृति की वैज्ञानिकता को समग्र रूप से समझने के इच्छुक जिज्ञासुजनों को इस विषय पर शास्त्रार्थ महारथी स्वामी माधवाचार्य द्वारा लिखित 'क्यों' शीर्षक ग्रन्थ को एक बार अवश्य देखना चाहिए. हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित यह ग्रन्थ आपके मन में उठने वाले प्रत्येक 'क्यों' का संतुष्टिपरक जवाब दे पाने में पूर्णरूपेण सक्षम है. न केवल जिज्ञासुजनों अपितु अनर्गल प्रलाप करने वाले कुतर्कियों को भी एकबार इसे अवश्य पढना चाहिए.
पुस्तक नाम:- 'क्यों' ( दो खंडों में)
लेखक:- शास्त्र महारथी पं. माधवाचार्य शास्त्री
प्रकाशक:- माधव विद्या भवन, दिल्ली
भाषा:- हिन्दी तथा अंग्रेजी
मूल्य:- 180/-(प्रत्येक खंड)

शुक्रवार, 7 मई 2010

रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं!!!(हास्य-व्यंग्य)

धर्म, अधर्म का जितना ज्ञान हमें गुरूकुल में रहते "आचार्य" की पढाई के दौरान भी नहीं हुआ होगा, उससे कहीं अधिक ज्ञान हम इस ब्लागनगरी में रहते हासिल कर चुके हैं, वो भी सिर्फ चन्द महीनों में। सुबह शाम धर्म आख्ययान, प्रवचन सुनकर हमें तो ऎसा लगने लगा है कि मानों हमारे लिए तो ये समूचा संसार ही "धर्ममय"(धर्म+मय) हो गया है। सोते जागते, खाते पीते, नहाते धोते, उठते बैठते हमें हर चीज में धर्म के दर्शन होने लगे हैं।  इधर-उधर,यहाँ-वहाँ, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे--हर जगह बस धर्म ही धर्म दिखाई देने लगा है। मत पूछिए कि हमारे जीवन में कहाँ कहाँ इस धर्म नें अपनी नाक घुसेड डाली है। 
अभी कल की ही बात है, हमने अपनी धर्मपत्नि जी को बोला कि भार्ये! जल्दी से भोजन परोस दीजिए, बहुत जोर से भूख लगी है। तो धर्मपत्नि जी झट से बोल पडी कि " भोजन अभी कहाँ बना है, सुबह से तो गैस खत्म है, सिलेंडर लाते तो ही तो खाना बनता"। सुनते ही हमारे अन्दर का धर्म रूपी कीडा कुलबुलाने लगा और हमारे मुख से निकल गया कि " देवी! फलाने ब्लाग बाबा जी कहते हैं कि स्त्री के लिए कैसे भी करके पति की आज्ञा, उसकी इच्छापूर्ती का प्रबंध करना ही उसका धर्म होता है"। बस इतना सुनना था कि उसने वो रूप धारण किया कि उसने हमारी, उस ब्लाग बाबा और धर्म तीनों की ऎसी तैसी करने में तनिक भी देर न लगाई। ये हम जानते हैं, या फिर हमारा भगवान या अल्लाह जानता है कि हमने कैसे जान बचाई वर्ना आज आप यहाँ बैठकर हमारी ये दुखभरी "धर्मकथा" न सुन रहे होते।
और सुनिये अब तो इस धर्म ने हमें सपनों में आकर भी भयभीत करना आरम्भ कर दिया है। आज रात की ही बात है जब हमें एक बहुत ही विचित्र सा स्वपन दिखाई दिया। हमने क्या देखा कि हम लैपटोप सामने रखे बडे एकाग्रचित्त हो किसी ब्लाग बाबा जी के ब्लाग के जरिए धर्म का रसपान कर रहे हैं। तभी क्या होता है कि अचानक से सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित, दिव्य आभा युक्त दो दिव्यपुरूष हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं। उन दोनों के गलों में दो तख्तियाँ लटक रही थी, एक पर लिखा था धर्म और दूसरे पर अधर्म। जिस के गले में अधर्म की तख्ती लटक रही थी, उसकी ओर हमने बस एक हल्की सी उपेक्षापूर्ण निगाह भर डाली और धर्म की ओर देखकर झट से उनके चरणों में शाष्टाँग प्रणाम करने लगे। अभी उस धर्म रूपी दिव्यपुरूष नें हमें आशीर्वाद भी नहीं दिया था कि वो अधर्मपुरूष तो हमें गालियाँ बकने लगा। एक ही साँस में हमें मूर्ख, अज्ञानी, दंभी ओर न जाने हमें क्या क्या कह गया। क्रोध तो हमें बहुत आया लेकिन शालीनता का पल्लू न छोडते हुए हमने उनसे सिर्फ यही निवेदन किया कि "महोदय! आप हमें नाहक ही गालियाँ बके जा रहे हैं। हम  अधर्म से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते। हमने अपने धर्म को पहचान लिया है। शुक्र है! उन ब्लागबाबाओं का जिन्होने हमारा धर्म से वास्तविक परिचय करा दिया है। अगर आप अपनी सलामती चाहते हैं तो तुरन्त पतली गली से निकल लीजिए वर्ना हम अपने धर्मदेव को कहकर आपकी वो ठुकाई कराएंगें कि आपसे भागते न बनेगा"।
"रे मूर्ख! धर्म तो हमारा नाम है। जिसे तूं धर्म समझे बैठा है, वो धर्म नहीं अधर्म है"---अधर्म चिल्लाया ।
"चलिए! अपना रास्ता नापिये। हम तुम्हारे झाँसे में आने वाले नहीं है। अरे! अब हम अज्ञानी नहीं रहे कि धर्म और अधर्म में भेद भी न कर सकें। पिछले साल भर में बडे बडे नामी ब्लाग बाबा वेद, पुराण, कुरआन घोंट घोंटकर हमें इतना धर्मामृ्त पिला चुके हैं कि हमारे तो कब के ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं"---इतना कहकर हमने एक दृ्ष्टि पास में ही खडे धर्मदेव पर डाली जो बस चुपचाप खडे हम दोनो की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। हमें उनकी ये मुस्कुराहट कुछ विचित्र सी लगी।
"वत्स! अब भी समझ जाओ। तुम क्यूं अपनी दीन दुनिया खराब करने पे तुले हो। जिन ब्लाग बाबाओं के तुम जो इतने गुणगान किए जा रहा हो, असल में वो लोग धर्म नहीं बल्कि अधर्म के उपासक हैं और जिसे तुम धर्मामृ्त कह रहे हो, वो अमृ्त नहीं बल्कि हलाहल विष है। जो न केवल तुम्हारे इस ब्लागजगत अपितु तुम्हारे समूचे समाज को ले डूबेगा। यदि अब भी न समझे तो तुम्हे जहन्नुम की आग में जलने से मैं भी न रोक पाऊँगा"। अब की बार अधर्म नें इतने मधुर स्वर में कहा कि एक बार तो मैं भी शंका में पड गया। फिर सोचा कि जरूर इसे मेरी विद्वता का अहसास हो गया है, तभी इसने बात करने की टोन बदल ली :-)।
अब मुझे भी जुबान की तल्खी छोड, उसके जैसी ही विनम्रता अख्तियार करनी पडी " देव्! मै कैसे मान लूँ कि आप जो कह रहे हैं, वो सही है"
इतना कहकर पहले तो मैने एक प्रश्नवाचक दृ्ष्टि पास में खडे धर्मदेव पर डाली ओर बिना अधर्मदेव के जवाब की प्रतीक्षा किए सीधे धर्म से ही संबोधित हुआ" हे धर्मदेव! आप चुप क्यों है। कुछ बोलते क्यों नहीं। कृ्प्या आप ही बताईये कि सत्य क्या है?"
लेकिन धर्मदेव ने कोई जवाब न दिया ओर पूर्ववत ही उनके अधरों पर वही कुटिलतापूर्ण सी मुस्कान तैरती रही। उनकी इस मुस्कुराहट नें हमें ओर संशय में डाल दिया। फिर विचार आया कि कहीं ऎसा तो नहीं ये दोनों मिलकर हमारी परीक्षा ले रहे हों जैसी स्वर्गारोहण के समय धर्मराज युधिष्ठर की ली गई थी। मन में ये विचार आते ही हमारा दिल तो बल्लियों उछलने लगा और आँखों के सामने जन्नत की हूरें कत्थक नृ्त्य करती दिखाई देने लगी। बस अब तो हमने भी ठान लिया कि कैसे भी कर के हमें इस परीक्षा में उतीर्ण होना ही है।
इतने में अधर्म फिर बोल पडा "वत्स! क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि ये मिथ्यायुग है और तुम्हारा ये जो ब्लागसंसार है, जिसमें तुम दिन रात विचरते रहते हो, वो तो इसमें भी बडा मिथ्याजगत है, जहाँ एक से बढकर एक मिथ्याचारी छद्मभेष धारण किए अपना मायाजाल फैलाए बैठे हैं कि कोई मूर्ख फँसे तो उसे हलाल करें"।
अब तो हमारे भी मन में शंका अपने पैर पसारने लगी कि कहीं इनका कथन सत्य तो नहीं। फिर भी हमने अपने विश्वास की डोर को हाथ से न छूटने दिया। क्यों कि हमें अपने इन ब्लाग बाबाओं पर खुद से भी अधिक भरोसा था। धन्य हैं ये संत जिन्होने हमें सच्चे धर्म का मार्ग दिखलाया। जो लोग कहते हैं कि कलयुग में एक भी सच्चा सन्त मिलना दुर्लभ हैं तो मै उन्हे बताना चाहूँगा आप एक की बात करते हैं। यहाँ आकर देखिए आपको सन्तों की पूरी जमात मिलेगी जो डाक्टर, वैज्ञानिक, वकील जैसे पेशों से जुडे होते हुए भी बिना किसी स्वार्थ के दुनिया को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाने में तन-मन-धन से जुटे हुए हैं। अहोभाग्य इस ब्लागनगरी के वाशिन्दों का, जिन्हे ऎसी दिव्य विभूतियों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है। 
खैर हम भी उस अधर्म के झाँसे में कहां आने वाले थे। सो हमने उनसे प्रमाण देने की डिमांड कर डाली:- "देव! यदि कुछ प्रमाण दें तो ही मैं आपके कथन पर विश्वास कर सकता हूँ"
"वत्स्! यदि तुम प्रमाण ही चाहते हो तो तुम्हे इसके लिए एक कार्य करना होगा"
"कहिए देव! मुझे क्या करना होगा"
"वत्स्! तुम इन ब्लाग बाबाओं के पास जाओ ओर उनसे पूछ कर आओ कि इस वाक्य "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ है।
"वाह्! देव! आप भी कमाल करते हैं। इतने साधारण से वाक्य का अर्थ तो मै ही बता देता हूँ। इसके लिए बाबाओं से पूछने की क्या जरूरत है। नाहक ही उन्हे परेशान करना। वो वेद और कुरआन के महाविद्वान, जो बिना किसी स्वार्थ के, विश्व बन्धुत्व की भावना लिए, दिन-रात समूचे ब्लागजगत में ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं--क्या वो इतना भी न जानते होंगें। लगता है आप शायद मजाक के मूड में हैं"
"वत्स! धर्म का कार्य किसी से परिहास करना नहीं होता अपितु उसे जीवन का सही मार्ग दिखाना होता है। जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही करो। एक बार जाओ तो सही"।
"चलिए, आप कहते हैं तो चला जाता हूँ"। इतना कहकर हम अनमने मन से उस वाक्य का अर्थ पूछने बाबा फन्ने खाँ ब्लागर के पास चले गये। उनसे कहा कि बाबा जी! मैं आपके ब्लाग सत्संग का एक नियमित पाठक हूँ. जबसे आप इस ब्लागजगत में अवतरित हुए हैं, आपकी हर पोस्ट पर अपने श्रद्धसुमुन अर्पित करने नियमित रूप से आ रहा हूँ! आज आपके पास अपनी एक जिज्ञासा के समाधान हेतु उपस्थित हुआ हूँ---शंका निवारण कर कृ्तार्थ कीजिए! "
बाबा फन्ने खाँ:- " अजी बोलिए शर्मा जी! क्या पूछना चाहते हैं"
जी गुरूदेव्! वैसे सवाल तो बहुत ही मामूली सा है..ओर मुझे भीतर से बहुत ही संकोच भी हो रहा है कि आप जैसे धर्ममर्मज्ञ विद्वान, जो कि कुरआन एवं पुराण को घोटकर पी चुके हैं ---उनसे इतने मामूली से प्रश्न का जवाब पूछ रहा हूँ!
बाबा फन्ने खाँ " शर्मा जी, आप निसंकोच होकर पूछिए! अल्लाह नें हमें इसी खातिर तो यहाँ भेजा है"
"जी! वो तो है! गुरूदेव मैं ये जानना चाहता था कि "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ होता है"
बाबा फन्ने खाँ" वत्स साहब! अल्लाह साक्षात शिव है। वो अनन्त है, सत्य है, सुन्दर है"।
"जी हाँ, आप बिल्कुल सत्य कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इस समय सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि धर्मो रक्षति रक्षत: का क्या अर्थ है"?
ब्लागर फन्ने खाँ " ऊपर वाला बडा नेकदिल है। सबका कल्याण चाहने वाला है। वो जिसे चाहे सिर्फ उसी को हिदायत देता है"।
"आप जो कह रहे हैं, सब सही है। लेकिन आज मैं जरा जल्दी में हूँ, आपके धर्मामृ्त का पान फिर किसी दिन करूँगा। आज तो आप बस मुझे उस वाक्य का अर्थ बता दीजिए"।
फन्ने खाँ:- " परमेश्वर ही सच्चा शिव अर्थात कल्याणकारी है"
"फन्ने खाँ जी, मैं आपसे कुछ पूछ रहा हूँ और आप कुछ का कुछ कहे जा रहे हैं। सीधे सीधे इसका अर्थ बता क्यूं नहीं देते। या कह दिजीए कि आपको इसका अर्थ पता नहीं है तो मैं किसी दूसरे बाबा जी के द्वारे जाऊँ" अब मुझे भी थोडी झुंझलाहट सी होने लगी थी।
फन्ने खाँ:- (कुछ देर सोचने के बाद) आप तो बडे नेकदिल इन्सान हैं। क्या कहा आपने? धर्मो रक्षति रक्षत:
"जी हाँ!" मैने थोडा खिजकर कहा
बाबा फन्ने खाँ(कुछ देर सोचकर) " जनाब इसका अर्थ होता है कि रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं" 
बस इतना सुनना था कि, एकदम से ऎसा लगा मानो किसी नें एक ही झटके में मेरी आँखों पर पडे पर्दे को खींचकर फेंक दिया हो। मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही बर्तनों के खडखडाने और धर्मपत्नि के चिल्लाने की आवाज एकसाथ कानों में पडने लगी। मैं एकदम से हडबडा कर उठा । मालूम हुआ कि ये तो मैं सपना देख रहा था। इतने में ही धर्मपत्नि पास में आकर फिर से चिल्लाने लगी" आपको कुछ शर्म हया है कि नहीं! कितने दिन हो गये मुझे भौंकते कि कहीं से कुछ पैसों का इन्तजाम कर लो, पप्पू का स्कूल में एडमीशन कराना है। कितने दिनों से बिजली का बिल आया पडा है,कल जमा कराने की आखिरी तारीख है। लेकिन नहीं आपको इस मुए कम्पयूटर और इन बाबाओं से फुर्सत मिले तो ही तो घर गृ्हस्थी की ओर कुछ ध्यान दे पाओ। इन नासपीटों नें तुम्हारी बुद्धि का दिवाला निकाल के रख दिया है। न जाने इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में क्यों नहीं घुस रही कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता"। 
इतना कहकर वो कुछ देर तक तो नथुने फुलाती वहीं खडी रही लेकिन मेरी ओर से कैसा भी कोई जवाब न पाकर गुस्से में पैर फटकारती हुई रसोई की ओर निकल गई। उसके बाद भी वो न जाने क्या कुछ बोलती रही, जिसे मैं सुन न पाया। क्यों कि मेरे कानों में तो अब तक सिर्फ यही शब्द गूंज रहे थे कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता। 
(यह रचना इस से पूर्व वैशाखनन्दन सम्मान प्रतियोगिता में एक बार प्रकाशित की जा चुकी है. आज यहाँ इसे पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है)

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

आखिर हम लोग ब्लागिंग किस लिए कर रहे हैं ???

बहुत दिनों से मन मे ये सवाल उमडघुमड रहा है कि आखिर हम लोगों का ब्लागिंग करने का उदेश्य क्या है ?। आखिर क्यूँ हम लोग दिन रात मगजमारी किया करते हैं । बहुत सोचने पर भी मेरी समझ में अभी तक कुछ नहीं आया । वैसे कुछ न कुछ उदेश्य तो होता ही होगा । अगर इसका सचमुच में कोई उदेश्य न होता तो क्यूँ रात रात भर, जब कि बाकी दुनिया सुख की नीँद ले रही होती है और हम लोगों की आँखें कम्पयूटर सक्रीन पर गढी होती हैं । अकारण ही तो कोई समझदार इन्सान इतने व्यस्त जीवन और मंहगाई के इस जमाने में अपना टाईम खोटी नहीं करेगा।
सचमुच कुछ न कुछ उदेश्य तो चिट्ठाकारी का होना ही चाहिए । पर सच कहूँ, तो अब तक इसका उदेश्य मेरी समझ में तो नहीं आया ? यों तो हमारी भी चिट्ठाकारी साधना किसी से कम नहीं रही है । अभी तक अपने जीवन का स्वर्णिम एक वर्ष और चार महीने इस पर न्यौछावर कर चुके हैं । इस बीच यह नहीं कि हमने यहाँ रहकर कोई भाड ही भूँजा है---बल्कि लगभग प्रति सप्ताह एक पोस्ट के हिसाब से अपने पाठकों को ज्योतिष पर अति महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते रहे हैं । धर्म यात्रा ब्लाग पर अपने धर्म, संस्कृ्ति, नीतिज्ञान आधारित लगभग 60-70 आलेख छाप चुके हैं । यहीं इसी ब्लाग पर ही कुछ सामाजिक आलेख, एक दो कथा कहानियाँ, एक गजल और थोडी सी बकवास भी ठेल चुके हैं । अब पाठकों नें उन्हे किस हद तक पसन्द किया, ये तो मैं नहीं जानता लेकिन टिप्पणियो में आलोचकों द्वारा मिले प्रशंसा पत्र जरूर आज तक हमने सहेज कर रखे हुए हैं ।
अब अगर आप लोग मुझसे पूछें कि ब्लागिंग के पीछे मेरा क्या उदेश्य है तो शायद आप लोगों को मेरा जवाब कुछ निराशाजनक प्रतीत हो...क्यों कि अभी तक हम तो किन्ही उदेश्यों का निर्धारण कर ही नहीं पाए हैं। सच बात ये है कि बहुत खोजने पर भी हमें तो कोई उदेश्य अभी तक मिला नहीं।
अब आप लोग किन्ही विशेष उदेश्यों को लेकर ब्लागिंग कर रहे हैं तो हमारा उदेश्य भी वही समझ लीजिए। लेकिन बता जरूर दीजिएगा कि आपका उदेश्य क्या है?...वर्ना इस सवाल का जवाब मिलने तक यूँ ही फालतू में हमारा भेजा मंथन चलता रहेगा ।
आज आप लोगों का बहुत समय ले लिया.......चलते चलते एक सुन्दर सी तस्वीर देख लीजिए। लेकिन बताए देते हैं कि चित्र और आज की इस पोस्ट का आपस में कैसा भी कोई सम्बंध नहीं है :)

रविवार, 20 सितंबर 2009

भगवान हजरत मोहम्मद की जय.......पैगम्बर रामचन्द्र की जय!!!!!!

इस लेख को पढने वाले सभी पाठकों विशेष रूप से मुसलमान भाईयों को एक बात मैं पहले ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इसे पढते समय कृ्प्या इस दृ्ष्टिकोण से न सोचें कि यह एक हिन्दू द्वारा लिखा गया है।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि कहीं आप लोग ये न सोचें कि मैं किसी धर्म विशेष की तरफदारी कर रहा हूँ। आप सब से निवेदन है कि कृ्प्या एक बार खुले दिमाग से विचार करके देखें कि आखिर हमारें में ऎसी कौन सी कमियाँ हैं,जिससे कि इस देश,दुनिया और समाज के साथ ही साथ अब इस ब्लागजगत में भी हिन्दू और मुसलमान के नाम पर आपस में दूरियाँ बढती चली जा रही हैं, क्यूं हम दूसरे के धर्म का सम्मान न करके सिर्फ अपनी ही अपनी हाँकने में लगे हुए हैं।
एक सच्चे धार्मिक व्यक्ति का यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि वो महापुरूषों,संतो-महात्माओं के वचनों का पालन करे,उनके दिखाए मार्ग का अनुसारण करे,अब वो महापुरूष चाहे किसी भी धर्म,जाति,सम्प्रदाय से संबंध क्यों न रखते हों। वैसे भी सत्पुरूष धर्मों और जातियों के बंधन से परे होते हैं---- उनकी शिक्षाएं,उनके विचारों को किसी धर्म,देश या काल के बन्धन में नहीं बाँधा जा सकता,उनके विचार सब के लिए उतने ही उपयोगी हैं,जितने कि उस धर्म विशेष के मानने वाले के लिए-----हजरत मोहम्मद जितना आपके हैं,उतने ही मेरे भी हैं। अब यदि मैं "जय मोहम्मद,जय मोहम्मद" कहूँ तो क्या कोई मुझे रोक सकता हैं---हर्गिज नहीं। ये मेरी इच्छा है कि मैं अपने ईश्वर को किस रूप में ध्याता हूँ। ऎसा करने से मुझे न तो कोई कुरआन रोक सकती है,न गीता और न ही इस देश का कानून।
एक बात ओर (जैसा कि मैने पहले भी कहा है) कि किसी भी व्यक्ति के लिए महापुरूषों,सन्तों की आज्ञा,उनके वचन शिरोधार्य होने चहिए--------आप हजरत साहब और कुरआन के फरमाबर्दार हैं,होना भी चाहिए;लेकिन कुरआन में शायद ये कहीं नही लिखा होगा कि आप लोग अपने धर्म का प्रचार करने के लिए दूसरे धर्म के धर्मग्रन्थों का आश्रय लें,उनसे तुलना करें। होना तो ये चाहिए कि हम अपने धर्मग्रंथों की शिक्षाओं पर अमल करते हुए पहले स्वयं उन्हे अपने व्यवहार में सम्मिलित करें,फिर बाकी समाज को भी उससे अवगत कराया जाए ताकि समाज भी उनसे लाभान्वित हो सके। ये नहीं कि अपने धर्म को बडा दिखाने के उदेश्य से हम लोग अन्य दूसरे धर्मों से उसकी तुलना करने बैठ जाएं।  अब हजरत साहब नें अपनी जिन्दगी में सैंकंडों,हजारों बार ये कहा है कि "मैं एक मामूली आदमी हूँ" तो क्या उनका हुक्म मानने के नाम पर आप लोग उन्हें मामूली आदमी ही मानने लगेंगें। चलिए हजरत तो ईश्वर के दूत थे, आपके सामने कोई उच्च पद प्राप्त या फिर कोई ऊंची शख्सियत का व्यक्ति आए और शालीनता दिखाते हुए कहे कि भई मैं तो एक नाचीज,अदना सा आदमी हूँ तो क्या आप लोग उनके व्यक्तित्व अनुसार व्यवहार न करते हुए उन्हे नाचीज और अदना इन्सान मान लेंगें?। अगर नहीं तो फिर हमें इस देश के दूसरे पैगम्बरों(श्रीराम,कृ्ष्ण,बुद्ध,नानक इत्यादि) को भी उसी दृ्ष्टि से देखना चाहिए,जिस दृ्ष्टि से हम हजरत मोहम्मद साहब को देखते हैं।

 मैं आप लोगों से सिर्फ इतना जानना चाहूंगा कि क्या आप इस्लाम के इस फरमान को नहीं मानते  कि "दुनिया के सभी मजहब सच्चे है"हर मुल्क और हर कौम में अल्लाह नें अपने पैगम्बर भेजे हैं। तो फिर ऎसी हालत में हजरत रामचन्द्र जी या हजरत कृ्ष्ण जी कहने में आप लोगों को क्या ऎतराज है।  मुहम्मद साहब की जय बोलते हैं तो फिर रामचन्द्र जी की जय बोलने में किसी को क्या बुराई है? भई इससे तो आपसी मोहब्बत ही बढेगी और मोहब्बत जैसे धर्म के आगे तो दुनिया के सभी धर्म फीके हैं।

जब इस्लाम मानता है कि हर कौम और मजहब के पैगम्बर अल्लाह के ही भेजे गए पैगम्बर हैं और हिन्दू भी मानता है कि जगत की समस्त विभूतियाँ ईश्वर का अंश हैं तो इस प्रकार आपके मजहब के मुताबिक राम,कृ्ष्ण,बुद्ध,महावीर वगैरह भी अल्लाह के पैगम्बर हैं और हिन्दी धर्म के मुताबिक ईसा,मुहम्मद वगैरह "ईश्वर के अंश" हैं,बल्कि हिन्दू धर्म नें तो अपना ढाँचा ही ऎसा बना लिया है कि जो जो हिन्दूस्तान में आकर बसता जाए,वो अपनी विशेषताएं रखते हुए भी हिन्दू मजहब कहलाता जाए। हिन्दू धर्म के इस ढाँचे का फायदा उठाकर क्यों न देश के धार्मिक झगडों,विवादों,तनावों को दफनाकर आपसी प्रेम और सौहार्द का वातावरण निर्मित किया जाए.......तो फिर इस नेक काम की आज से ही शुरूआत करते हुए हम भी बोलते हैं कि "भगवान हजरत मोहम्मद की जय"  और आप भी बोलिए कि "पैगम्बर रामचन्द्र जी की जय"