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गुरुवार, 26 नवंबर 2009

अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें.....:)

पिछले दो एक दिनों पहले की बात है कि जब एक रात हम अपनी मित्र मंडली के साथ किसी गूढ वार्तालाप में व्यस्त थे । खैर उस वार्तालाप का तो कोई निष्कर्ष नहीं निकला लेकिन बैठे बैठे हमारे मन में जरूर एक प्रेरणा सी जग उठी---कि चलें अपनी बीती जिन्दगी का कुछ लेखा जोखा ही मिला लिया जाए । जब मिलाने बैठे तो पता चला कि अपनी तो आधी जिन्दगी यूँ ही निकल गई---अपना खुद का तो कोई मतलब हल हुआ नहीं बल्कि आज तक दूसरे लोग ही अपना मतलब साध कर चलते बने ।
हम तो वहीं के वहीं रह गए--जहाँ से अपनी जीवन यात्रा आरम्भ की थी । यानि की ढाक के वही तीन पात ।
फिर सोचा--चलो खैर जो बीत गया सो बीत गया, उसे भूलकर अब कुछ आगे की सुध ले ली जाए ।
बस उस दिन से मन में ठान ली कि अब तो हम कुछ करके ही रहेंगें । लेकिन फिर सोचा कि भई आखिर हम करेंगें क्या ? आखिर कुछ करने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए कि नहीं । इधर उधर कुछ लोगों पर नजर दौडाई--जो कि अपने जीवन में कुछ कर चुके और अब तक कर ही रहे हैं ।
सबसे पहले याद आए श्री मधु फोडा जी, जो कि कभी किसी जमाने में नेताओं के सभा सम्मेलनों में पहले पहुँचकर दरिया बिछाया करते थे ओर बाद में वहीं खडे रहकर उनका भाषण सुना करते थे । लेकिन ऊपर वाले की कुछ ऎसी कृ्पा हुई कि दरियाँ बिछाने से शुरू हुआ उनका ये सफर आज मुख्यमन्त्री की कुर्सी तक पहुँच चुका है । वैसे तो इससे आगे का उनका लक्ष्य केन्द्र की सरकार में शामिल होने ओर वहाँ बैठकर देश सेवा करने का था...पर कुछ ग्रह दशा ऎसी खराब शुरू हुई कि एक घोटले में नाम आ गया ओर हाथ से मुख्यमन्त्री की कुर्सी भी जाती रही । लेकिन  उनका कहना है कि अगर सी.बी.आई वालों नें बख्श दिया तो एक दिन आपको इसी देश का प्रधानमन्त्री बन कर दिखाएंगें । वैसे हमारी अन्तरात्मा कह रही है कि उनकी ये इच्छा भी पूरी हो ही जाएगी ।  इन्हे याद करते ही हमारे मन में भी उत्साह का एक इन्जैक्शन सा लग गया ।



फिर याद आए एक अन्य सज्जन ----श्रीमान चालू चक्रम जी । भई क्या कमाल के दृ्ड प्रतिज्ञ इन्सान हैं । पैसा कमाने के मैदान में उतरे तो कर्म-कुकर्म की ओर से आँखें ही मूँद ली । कुछ समय पहले तक कोयले की दलाली किया करते थे---लेकिन बिना अपना मुँह काला कराए न जाने कितनों का काला,पीला,हरा,नीला कर चुके हैं । इन्होने तो इस कहावत को भी मिथ्या सिद्ध कर डाला कि "कोयले की दलाली में मुँह काला"  । एक बार किसी बडी सी कम्पनी वाले से इनकी दोस्ती हो गई तो उसने इनके गुणों को पहचान कर इन्हे अपनी कम्पनी में मैनेजर की नौकरी पर रख लिया । आज ये उस कम्पनी के मालिक हैं और वो बेचारा मालिक इन्ही की कम्पनी में नौकरी कर रहा है । वाह रे भाग्य्!
इन्हे याद करके हमें बडा आत्मिक बल मिला ।


एक भद्र पुरूष ओर याद आए---श्री श्री 10008 बाबा बोल बचन जी महाराज । बचपन में पढाई लिखाई की ओर तो कुछ ध्यान था नहीं बस सारा सारा दिन नशेडियों के साथ बैठकर सुल्फे की चिलम का आनन्द लिया करते थे । इनकी हरकतों से दुखी होकर एक दिन बाप नें घर से निकाल बाहर किया तो राह चलते साधुओं की टोली में शामिल हो गए । वहाँ मुफ्त में चिलम पीते और बाबा लोगों की लंगोटियाँ धोते दिन बडे मजे में कट रहे थे। वहीं उनके बीच रहकर किसी तरह से पुराणों,शास्त्रों की दो चार कथा-कहानियाँ याद करके बस जैसे तैसे लुढकते लुढकते बाबा जी हो गए । साधु लोगों के चरण छूने के प्रताप से आज महाराज, गुरूदेव जैसी  उपाधियों से विभूषित हैं, अलग अलग शहरों में चार-छ: आश्रम खोल रखें हैं, गाडियाँ हैं, चारों ओर भक्तों की भीड लगी रहती है । लोग गले में इनकी तस्वीर जडे लाकेट पहने घूम रहे हैं । इनकी बचपन से ही एकमात्र अभिलाषा थी कि कभी लोग इनके पैर छूँए----आज इनकी ये अभिलाषा पूरी हो चुकी है । बस लगन की बात है :)


भई हम तो इन सब लोगों के कृ्तज्ञ हैं और शपथ लेकर कहते हैं कि हम भी अब कुछ हो के ही रहेंगें । बस भगवान हमें थोडी सी निर्लज्जता बख्श दे ।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

प्रेम विवाह

पत्नि:- "हे राम्! तुमसे लव मैरिज करके तो मेरी दुनिया ही उजड गई। लगता है शायद मेरी बुद्धि पर ही पत्थर पड गये थे जो मैने ऎसा कदम उठाया।"
पति:-" किसी दुनिया उजड गई? तुम्हारी या मेरी?"
पत्नि:- "तुम्हारी क्या खराब हुई! परिवार छूटा मेरा; बन्धन में फँसी मैं; पोजीशन गिरी मेरी। शादी के बाद तो तुम्हारी आँखे ही बदल गई।"
पति"- "क्या आँखें बदली मैने?"
पत्नि:- " क्या नहीं बदला? शादी से पहले जितना प्रेम दिखाते थे,आज उसका सौवाँ हिस्सा भी करते हो? बस हर बात पर हाथ चलाना और आँखें दिखाना जरूर सीख लिया तुमने।"
पति:- "तो! तुम क्या चाहती हो कि सारी जिन्दगी मैं तुम्हारे इशारों पर नाचता फिरूँ?"
पत्नि:- जो काम जिन्दगी भर नहीं कर सकते थे,उसका ढोंग चार दिनों के लिए क्यूं किया था? झूठे वादे करके मुझे क्यूं अपने जाल में फंसाया तुमने?"
पति:- " क्या झूठा ढोंग मेरा था? तुमने कोई ढोंग नहीं किया?  कहाँ गई वह इज्जत? कहाँ गया वो प्रेम,आदर-सत्कार? कहाँ गई वह मुस्कुराहट? सब कुछ तो खत्म हो गया!  अब तो मैं सिर्फ कमाकर लाने और तुम्हारा बोझा ढोने वाला एक बैल बन कर रह गया हूँ।"
पत्नि:- बैल? बैल नहीं बल्कि तुम तो एक साँड हो,जिसे कि सिर्फ फुँकारे मारने आते हैं। अब जीवन में मुस्कुराहट रह ही कहाँ गई है जो चेहरे पे दिखाई दे। मेरा जीवन तो तुमने झुलसा ही डाला है।"
पति:- "ऎसी क्या आग लगा दी मैने कि तुम्हारा जीवन झुलस गया?"
पत्नि:- इतना कुछ हो जाने के बाद भी तुम ये पूछते हो कि कैसी आग लगा दी! तुमसे शादी करके मैने अपने घर वालों की नाराजगी मौल ली। अब यहाँ तुम से ओर तुम्हारी माँ से सारा दिन जल कटी सुनने को मिलती है;कुत्ते जैसी जिन्दगी बना डाली तुमने मेरी। कहाँ अपने मायके में राज किया करती थी,लेकिन आज तुमने पैसे पैसे के लिए मौहताज कर दिया है।देख लेना अब छोडूंगी नहीं मैं तुम्हे। "
 पति:- क्या करोगी? तलाक ही दे दोगी न !"
पत्नि:- " यह तो भाग्य में अब बदा ही है। लेकिन उससे पहले तुम्हारी भी जिन्दगी मैने नरक न बना दी तो कहना!"
पति:- "अच्छा! तो अब तुम मेरी जिन्दगी नरक बनाओगी!"
पत्नि:- "जब तुमने मेरी जिन्दगी में आग लगा डाली है तो क्या उसका थोडा सा सेंक भी तुम्हे नहीं लगेगा?  तुमने मेरा परिवार मुझसे छुडा दिया; मुझे न इधर का छोडा ओर न उधर का और अब इस घर में भी आग लगा डाली। अब मेरे पास जलने के सिवाय ओर कोई रास्ता भी कहाँ है,सो जलूंगी ओर खूब जलूंगी;इतना जलूंगी कि उसकी लपटों में जलाने वाला भी खुद जल जाये।"
यह कहती,अपने बाल नौंचती हुई कमरे के बाहर निकल जाती है और पति महाश्य अपना सिर पीटता हुआ धम से जमीन पर गिर पडता है।
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समयाभाव के कारण बहुत दिनों से कोई पोस्ट ही नहीं लिखी जा रही थी। यूँ भी मेरा ध्यान अधिकतर अपने ज्योतिष की सार्थकता नामक ब्लाग पर ही केन्द्रित रहता है। यहाँ तो, अगर कभी कुछ मन किया तो लिख लिया,वर्ना छुट्टी। आज इस पोस्ट में प्रेमविवाह के परिणामस्वरूप आगामी गृ्हस्थ जीवन में यदाकदा निर्मित हो जाने वाली विषम स्थितियों को चित्रित करने का प्रयास किया है,अगली पोस्ट में इसी प्रसंग को आप एक नये नजरिये से देखेंगे।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो

ईश्वर द्वारा निर्मित इस प्रकृति का अपना एक पूर्ण चक्र है -----जिसका सिर्फ एक ही नियम है कि एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो। इस वर्तुल को तोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन हम लोग क्या कर रहे हैं कि, बस सिर्फ और सिर्फ लिये चले जा रहे हैं,देना तो हम लोगों नें सीखा ही नहीं। इसीलिए धीरे-धीरे आज सारे प्राकृ्तिक जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती निरन्तर विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं, झीलें, तालाब खत्म हो  रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इतनी बुरी तरह से बिगाड़ चुके हैं कि भविष्य में इस पर रह ही नहीं पाएंगे,अपितु जीने के लिए हमें किसी और नए ग्रह की खोज करनी पडेगी ।

देखा जाए तो इस स्थिति के लिए आधुनिक विज्ञान भी कोई कम दोषी नहीं है। उसका रवैया भी सदैव विजेता वाला ही रहा है। विज्ञान ये सोचता है कि धरती और आकाश से दोस्ती कैसी, उस पर तो बस विजय हासिल करनी है। हमने कुदरत से खिलवाड किया , किसी नदी का मुहाना मोड़ दिया, किसी पहाड़ का कुछ हिस्सा काट लिया, किसी प्रयोगशाला में चन्द रसायनिक क्रियाएं संपन्न कर ली और बस समझने लगे कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

आप प्लास्टिक को ही देखिए। उसे बना कर सोचने लगे कि कमाल है! ये तो न जलता है, न गीला होता है, न जंग लगती है - कितनी महान उपलब्धि है। उपयोग के बाद उसे फेंक देना भी कितना सुविधाजनक है। जिस भी पदार्थ,जीव-जन्तु,पशु-पक्षी,मनुष्य,पेड-पौधे इत्यादि की रचना प्रकृ्ति नें की है,अगर आप उन्हे वापस जमीन में डाल दो तो वह पुन: अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं।लेकिन अगर प्लास्टिक को जमीन में गाड़ दो और बरसों बाद खोदो तो भी वैसा का वैसा ही पाओगे।क्योंकि प्रकृ्ति प्लास्टिक जैसे मनुष्य निर्मित किसी पदार्थ को आत्मसात नहीं करती। लेकिन हम लोग हैं कि अपनी इन महान उपलब्धियों के दंभ में चूर स्वयं अपने ही हाथों विनाश के बीज बोए चले जा रहे हैं । अब इन बीजों से उत्पन फसल कैसी होगी,हमारे पास ये सोचने का भी समय नहीं है। बस चले जा रहे हैं---------विज्ञान के रथ पर सवार होकर कुदरत पर विजय हसिल करने को।

पर्यावरण का अर्थ है संपूर्ण का विचार करना। भारतीय मनीषा हमेशा 'पूर्ण' का विचार करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। सीमित दृष्टि पूर्णता का विचार नहीं कर सकती। एक बढ़ई सिर्फ पेड़ के बारे में सोचता है। उसे लकड़ी की गुणवत्ता की जानकारी है। पेड़ की और कोई उपयोगिता उसे मालूम नहीं है कि वे किस तरह बारिश होने में अपना योगदान देते हैं ,वे किस तरह मिट्टी को बांध कर रखते हैं। उसे तो बस सिर्फ अपनी लकड़ी से मतलब है।वैसी ही सीमित सोच ले कर हम अपने जंगलों को काटते चले गए और अब भुगत रहे हैं। अब आक्सीजन की कमी महसूस हो रही है। वृक्ष न होने से पूरा वातावरण ही अस्तव्यस्त होता जा रहा है। मौसम का क्रम बदलने लगा है। सावन के महीने में सूखा पड रहा है, सर्दियों में पसीने छूटने लगे हैं। और वायु प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं।इसे पढकर बहुत से मेरे जैसे लोग ये भी सोच रहे होंगे कि हमें इन सब से क्या लेना!मान लो, अगर कुछ समस्याएं उत्पन हों भी रही हैं तो सारी दुनिया के लिए ही तो हो रही हैं,कौन सा हमें अकेले को परेशानी उठानी पड रही है। अब जैसे बाकी दुनिया जियेगी,वैसे ही हम भी जी लेंगे।

सुना है कि किसी जमाने में एक राजा था । उसने एक दिन देखा कि खेत-खलिहानों में पक्षी आते हैं और अनाज खा जाते हैं। वह सोचने लगा कि ये अदना से पंछी पूरे राज्य में लाखों दाने खा जाते होंगे। इसे रोकना होगा। तो उसने राज्य में ऐलान कर दिया कि जो भी पक्षियों को मारेगा उसे इनाम दिया जाएगा। बस ईनाम के लालच में राज्य के सारे नागरिक शिकारी हो गए और देखते ही देखते पूरा राज्य पक्षी विहीन हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उत्सव मनाया गया कि आज उन्होंने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

किन्तु अगले ही वर्ष गेहूँ की फसल पूरी तरह से नदारद थी। क्योंकि मिट्टी में जो कीड़े थे और जो टिड्डियां थीं, उन्हें वे पक्षी खाते थे और अनाज की रक्षा करते थे। इस बार उन्हें खाने वाले पक्षी नहीं रहे, सो, कीडे-मकोडों नें पूरी फसल चट कर डाली।किसी विद्वान के बताने पर राजा के बात समझ में आई और उसके बाद उसे विदेशों से पक्षी मंगवाने पडे।

यह सृष्टि परस्पर निर्भर है। उसे किसी भी चीज से रिक्त करने की कोशिश बेहद खतरनाक है। न हम पूर्णत: स्वतंत्र हैं, और न ही परतंत्र । यहाँ हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे लिए सहोदर के समान है। हमें इन सबके साथ ही जीने का सलीका सीखना होगा।