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शनिवार, 16 जून 2012

मनुष्य की बढती स्वार्थपरता का खेल

यह बात तो हर कोई जानता है कि माँस कैसे प्राप्त किया जाता है. जीवन हर जीव को उतना ही प्रिय है, जितना कि हम सब को. अपनी खुशी से कोई पशु मरना नहीं चाहता. अत: उसे मारने से पूर्व अनेक क्रूर और अमानुषिक यातनाएं दी जाती हैं. जब वह वध स्थान पर खडा किया जाता है तो उसकी करूण पुकार से दिल पसीजने लगता है. मरने से पूर्व जैसे उसके मनोभाव रहते हैं, उसका ठीक वैसा ही प्रभाव उसके माँस पर भी पडता है. अब वही माँस जो कोई खायेगा, तो उन मनोभावों का प्रभाव उस पर पडे बिना भला कैसे रह सकता है. इसी से अपने देश में यह कहावत प्रचलित है, कि " जैसा खाये अन्न, वैसा होये मन " अर्थात हमारा भोजन जैसा होगा, हमारा मन भी ठीक वैसा ही होता जायेगा.
भोजन पर हमारा केवल शारीरिक स्वास्थय ही निर्भर नहीं है, अपितु वह मानसिक स्वास्थ्य का भी कारक है. सही मायनों में एक पूर्ण स्वस्थ्य मनुष्य उसे ही कहा जायेगा, जिसका कि शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ हों. स्वस्थ शरीर जहाँ रोगों से हमारी रक्षा करता हैं, वहीं स्वस्थ मन दुर्वासनाओं और दुर्विचारों से हमें बचाता है.
इसलिए माँसभक्षण न तो शरीर के लिए ही स्वास्थयकर है और न ही मन के लिए.
देखा जाये तो आज विश्व में चहुँ ओर जो इतनी अशान्ति दिखाई पडती है, उसके पीछे का एक कारण समाज में फैली माँसभक्षण की ये प्रवृति भी है. माँसाहार नें मानवी प्रवृति को एक दम से तामसिक बना छोडा है. अत: ऎसा मनुष्य केवल दूसरों के विनाश की ही बात सोच सकता है, न कि सृजन की. मुख से भले ही शान्ति-शान्ति चिल्लाते रहें, लेकिन उपाय ऎसे खोजे जा रहे हैं, जिनसे कि केवल अशान्ती ही बढती जा रही है.
किन्तु इस चीज का इन्सान इतना अभ्यस्त हो चुका है कि उसे माँस भक्षण करते हुए यह ख्याल तक नहीं आता कि जो पदार्थ हम खा रहे हैं, उसके लिए किसी को अपनी जान गँवानी पडी है. दूसरों के प्रति इतनी निर्दयता और स्वार्थीपन नें ही आज मनुष्य को मनुष्य के प्रति निष्ठुर बना दिया है. आज जो पशु के रक्त का प्यासा है, कल वो इन्सान के रक्त का प्यासा क्यूँ न होगा ? दरअसल प्यास तो सिर्फ रक्त की है, आज जो प्यास पशु के रक्त से बुझ सकती है, उसके लिए पशु का खूब बहाया जाता है. और कल को यही प्यास इन्सानी रक्त से बुझ सकेगी तो उसके लिए इन्सानी खून ही बहाया जायेगा.
यह तो मनुष्य की बढती हुई स्वार्थपरता का खेल है कि, वह प्रकृति से शाकाहारी होते हुए भी, प्रकृति प्रदत्त तरह-तरह के स्वास्थयकर पदार्थों के सहज सुलभ होने पर भी दूसरे की जान की कीमत नहीं आँकता और दूसरे के रक्त-माँस से अपनी भूख प्यास मिटाने में जुटा है.
माँस के निमित से रोजाना कितने लाखों पशु-पक्षियों को मार डाला जाता है और उससे समू़चे विश्व को कितनी बडी आर्थिक और स्वास्थ्य-विषयक क्षति उठानी पडती है, ये तो आप स्वयं ही सोच सकते हैं. यहाँ तो केवल इतना ही बतलाना है कि माँसाहार पूर्णत: अनैतिक है, जो कि मानवी सभ्यता को अनैतिकता की ओर लिए जा रहा है. मनुष्य की कोमल वृतियों को मसल, उसे निर्दयी, अकृतज्ञ और दुराचारी बनाने में जुटा है......!!!
दरअसल, मनुष्य की कोमल वृतियां ही मानव समाज की सुरक्षा का एक आवश्यक कचव है. उनके मर जाने पर समाज भी हरगिज जीवित नहीं रह सकता. अत: न केवल आहार अपितु औषधी, व्यवसाय अथवा मनोविनोद इत्यादि चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो, पशु-पक्षियों का निर्दयतापूर्वक वध रुकना ही चाहिए. इसी में विश्व का कल्याण है............       

शनिवार, 22 जनवरी 2011

भोजन द्वारा स्वास्थय (सात्विक आहार)

कहते हैं कि इन्सान को सदैव सात्विक आहार का ही सेवन करना चाहिए, क्योंकि प्राकृतिक नियम के अनुसार मानव का भोजन फलाहार और शाकाहार ही है.जो कि शारीरिक निरोगता, शक्तिवर्द्धन और दीर्घायुष्य जैसी सतोगुणी शक्तियों की प्राप्ति का एकमात्र स्त्रोत है. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि ये सात्विक भोजन होता कौन सा है ? इसके लिए श्रीमगभागवत गीता का ये श्लोक देखिये..........
आयु: सत्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धन:
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा ह्रद्या आहारा: सात्विकप्रिया: !!
अर्थ:-- आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढाने वाले एवं रसयुक्त चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय हों, ऎसे आहार सात्विक प्रवृति के मनुष्यों को प्रिय होते हैं !
व्याख्या:- आयु,बुद्धि,बल,आरोग्य और प्रीति को बढाने के लिए चार प्रकार का आहार (1) रस्या: (2) स्निग्धा: (3) स्थिरा (4) ह्रद्या में कौन कौन सी खाद्य वस्तुएं आती हैं, उन्हे जानना जरूरी है अन्यथा प्रत्येक प्रकार के खाद्य पदार्थों का गलत अर्थ लगाकर तथा गलत ढंग से प्रयोग करने के कारण उपर्युक्त लाभों से वंचित तथा रोग, शोक से छुटकारा नहीं प्राप्त हो सकता. अत: इसके लिए निम्न उदाहरण से समझें.
रस्या:--- सब तरह के फल,सब्जियाँ यथा गाजर, टमाटर, सेब, सन्तरा, खीरा, तरबूज, ककडी इत्यादि जिनमें प्राकृतिक रस भरा मिलता है, ऎसी रसदार खाद्य वस्तुएं इस श्रेणी में आती हैं.
स्निग्धा:-----दूध, दही, मक्खन, तिल, गरी गोला, बादाम, मूँगफली, सोयाबीन आदि पदार्थ जिनमें चिकनाई की मात्रा होती है, वें वस्तुएं स्निग्धा की श्रेणी में आती हैं.
स्थिरा:---प्रत्येक प्रकार के अन्न गेहूँ, चावल, चना, बाजरा इत्यादि इत्यादि. जिन पदार्थों को ग्रहण करने के पश्चात बहुत समय तक उसका सार शरीर के लिए टिकाऊ हो तथा भोजन करने के बाद अधिक देर तक स्थिरता का अनुभव किया जा सके, वें खाद्य पदार्थ स्थिरा हैं. वैसे भी इन अनाजों में फल, सब्जियाँ तथा दूध, दही, तिल, नारियल आदि की तुलना में अधिक टिकाऊपन है. यह अधिक दिनों तक स्थिर रखे भी जा सकते हैं, जल्दी खराब नहीं होते. इसलिए यह स्थिरा की श्रेणी में आते हैं.
ह्रद्या :--- जिस खाद्य पदार्थ को देखने मात्र से खाने की रूचि उत्पन्न हो तथा साफ-सुथरी तथा पवित्र हो उसे ह्रद्या कह सकते हैं.
विश्लेषण:-- उपरोक्त चारों प्रकार के खाद्य पदार्थ यद्यपि सात्विक हैं, परन्तु इन्हे भी तलने, भूनने, अधिक पकाने, मात्रा से अधिक खा लेने, व्यक्ति की आवश्यकता एव्म प्रकृति के अनुकूल-प्रतिकूल का विचार किए बिना खा लेने पर सात्विक होते हुए भी राजस-तामस के प्रभाव वाले ही हो जाते हैं. जैसे कि दूध पूर्णत: सात्विक आहार है और आयु, सत्व, बल, बुद्धि, निरोगिता प्रदान करने में एक तरह से अमृत तुल्य ही है, लेकिन हैजे, अतिसार के मरीज के लिए यही दूध विष का काम करता है. अत: यहाँ यह विचार करना पडेगा कि वस्तु सात्विक होते हुए भी व्यक्ति की प्रकृति के विपरीत देने से वह राजस-तामस प्रभाव की हो सकती है. खाद्य पदार्थ के उपयोग के तरीके यदि गलत हैं तो वस्तु सात्विक होते हुए भी उसका प्रभाव (प्रतिक्रिया) सात्विक नहीं हो सकता.
अब बाजार में गली-सडी मिलावटी मिठाईयाँ, चाट-पकोडे, चाईनीज फूडस, पिज्जा, बर्गर आदि गरिष्ठ पदार्थ जो कि ठूँस-ठूँस कर खाये जाते हैं, वह अधिक हानिकर होते हैं, परन्तु गलत मान्यताओं के कारण लोग इन पदार्थों को खाते हुए अपने को शाकाहारी कहला कर गौरव समझते हैं. प्रत्येक खाद्य पदार्थ किस किस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है, उसके प्रयोग विधि, मात्रा, आहार ग्रहण कर पचाने की पात्रता आदि के अनुसार भोजन सात्विक-राजस एवं तामस का प्रभाव वाला बताया जा सकता है.
अब लोग हैं कि खान-पान के विषय में केवल साफ-सफाई के विचार को ही महत्व देते हैं, सामग्री के गुण-अवगुण तथा उसकी शुद्धता, बनाने की विधि एवं प्रयोग की विधि पर कोई ध्यान नहीं देता. बस जो मन को भाये, खाने में स्वादिष्ट हो और फैशन के अनुकूल हो---बस वही चीज अच्छी है. इसलिए ही आहार की दशा बिगडती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप आयु, बल, एवं स्वास्थय क्षीण हो रहा है, दुनिया में नाना प्रकार की बीमारियों की भरमार है. इसी कारण ही इन्सान की बुद्धि राजसी-तामसी हो रही है और दुनिया भर में रोग,बीमारी, दु:ख का एकछत्र साम्राज्य है.
अत: खाद्य पदार्थ का स्वरूप सात्विक हो इसके लिए बनाने की विधि, खाने की मात्रा, खाने वाले व्यक्ति के अनुकूल प्रकृति आदि इन समस्त बातों का विचार करके आहार ग्रहण किया जाये, तभी उसका परिणाम सात्विक होगा.
आगामी पोस्ट में बात करेंगें तामसिक आहार पर.......