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गुरुवार, 17 मार्च 2011

कृत्रिम परिपक्वता

शिक्षा प्रणाली और बाजार व्यवस्था दोनों नें मिलकर आज बच्चों से उनका बचपन पूरी तरह से छीन लिया है. दोनों ही बच्चों को उम्र से कहीं पहले बढा कर देना चाहते हैं. आज की पीढी में बारह-तेरह साल के बच्चे जिन्हे हम किशोर समझने की भूल कर बैठते हैं, जब कि वे मानसिक रूप से युवा हो चुके होते हैं.
कितनी हैरानी की बात है कि आजादी के 65 वर्षों बाद भी आजतक हम लोग ऎसी शिक्षा प्रणाली को विकसित नहीं कर पाये हैं---जिसे कि हम भारतीय कह सकें, अपनी खुद की कह सकें. हमारे पास जो कुछ भी है, उधार का है----पश्चिम से लिया हुआ उधार. उस देश के लिए यह ओर भी दु:ख की बात है, जिसनें नालंदा--तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय तब बनाये थे, जब दुनिया विश्वविद्यालय जैसी किसी धारणा से भी परिचित नहीं थी. यह वही समय था, जब इस देश को विश्वगुरू बनने का गौरव मिला था. लेकिन आज वही देश उधार की शिक्षा प्रणाली पर जी रहा है और वो भी दिनप्रतिदिन इतनी महंगी होती जा रही है कि गरीब आदमी की तो बात ही न करें, एक मध्यमवर्गीय परिवार के बस से भी बाहर की बात होने लगी है.
इधर माँ-बाप भी कुछ कम दोषी नहीं हैं, जिन्हे बच्चों को कम उम्र में स्कूल में दाखिल कराने की होड मची रहती है, ताकि उनका बच्चा दुनिया में स्पर्धा करने के लिए जल्द से जल्द तैयार हो सके. बच्चों को छोटी से छोटी उम्र में स्कूल में दाखिल करने की जिस तरह आज होड लगी है, उसे देख तो लगता है कि वो दिन भी बहुत दूर नहीं है---जब गर्भ में आये शिशु का भी स्कूल में पंजीकरण किया जाने लगेगा.

प्ले-वे वगैरह के नाम पर बच्चे को बेहद कम उम्र में स्कूल में दाखिल करना तो एक तरह से उनके बचपन पर कुल्हाडी चलाने का ही काम हुआ, जो कि माँ-बाप चला ही रहे हैं. बाकी रही सही कसर स्कूल में अध्यापक-अध्यापिकायें पूरी किये दे रही हैं. अब नर्सरी क्लास को ही लीजिए, नर्सरी का मतलब जहाँ पौधों की देखरेख की जाती है, उन्हे विकसित किया जाता है. लेकिन इन नर्सरियों में पौधे विकसित नहीं किए जाते, बल्कि उनके विकास को खंडित किया जाता है. उनकी कटाई-छँटाई करके उन्हे बोनजाई बनाया जा रहा है. वे जीवन भर बौने ही बने रहते हैं, कभी पूर्ण विकसित नहीं बन पाते.
हो सकता है कि कुछ लोग इन विचारों से सहमति न रखें, क्योंकि शायद उन लोगों को बच्चों के बौद्धिक विकास की दृष्टि से इस प्ले-वे संस्कृति में कुछ खूबियाँ दिखाई पडती हों. लेकिन ऎसा सिर्फ वही सोच सकता है, जो कि मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से पूर्णत: अनभिज्ञ हो.

इस बात को पूर्ण रूप से समझने के लिए हमें सर्वप्रथम मानव मस्तिष्क की बनावट को समझना होगा.
मस्तिष्क के दो हिस्से होते हैं------दायाँ भाग और बायाँ भाग. मस्तिष्क का दायाँ हिस्सा शरीर के बायें हिस्से को नियन्त्रित करता है और बायाँ भाग दायें हिस्से को संचालित करता है. अगर किसी के शरीर के बायें भाग में लकवा मार गया हो तो उसका कारण मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में होगा.
डा. रोजर स्पेरी नाम के एक वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होने मस्तिष्क के दोनों हिस्सों की कार्यप्रणालियों पर काफी शोध किया है. उस शोध के आधार पर ये सिद्ध हुआ है कि मस्तिष्क का दायाँ हिस्सा भावप्रधान तथा कलात्मक (sentimental & artistic) होता है, जब कि बायाँ हिस्सा तर्कप्रधान और गणितीय (Logical & mathematical) होता है. दायाँ भाग रंगों के प्रति, ध्वनियों एवं गंध आदि के प्रति संवेदनशील होता है. साथ ही अतीन्द्रीय अनुभूतियाँ भी इसी हिस्से में होती हैं. मस्तिष्क का केवल यही भाग ही जन्म से सक्रिय होता है.
दिमाग का बायाँ भाग तार्किक और गणितीय होता है. भाषा, व्याकरण, सूत्र, गणित, व्यापार आदि का कार्य इसी भाग से होता है. अब जो बताना चाह रहा हूँ, वो यह कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा लगभग दस-बारह वर्ष की आयु से अपने स्वाभाविक रूप में कार्य करना आरम्भ करता है. इससे पहले उससे काम लेना शुरू किया जाये, तो उसका विकास अस्वाभाविक होता है, स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता. छोटे बच्चों को गणित एवं कम्पयूटर जैसे विषयों की शिक्षा देना उनके मस्तिष्क के बायें भाग को अस्वाभाविक रूप से विकसित करना है. इसका सबसे बुरा परिणाम यह होता है कि उनके व्यक्तित्व में भाव पक्ष---इमोशनल पार्ट तो दबने लगता है और तर्क पक्ष सक्रिय हो जाता है. यक तर्क पक्ष उसे समय से कहीं पहले समझदार बना देता है-----उन अर्थों में समझदार, जो समझदारी उनमें बीस-बाईस साल की उम्र में आनी चाहिए थी. समय से पहले आई इस तथाकथित कृत्रिम समझदारी का नतीजा यह होता है कि उनसे उनका बचपन छिन जाता है. यह अपरिपक्व परिक्वत्ता बहुत ही खतरनाक साबित हो रही है. दुनिया के लगभग सभी कथित आधुनिक स्कूलों में आज हिँसा और अपराध बढ रहे हैं. नैतिकता, सदाचार, संस्कार, संस्कृति, धर्माचरण जैसे विषयों से वो दूर होते चले जा रहे हैं. ये सब उसी कृत्रिम परिपक्वता का नतीजा है.
होना तो ये चाहिए कि बच्चों की संवेदनायें, उनकी आन्तरिक शक्ति कुंठित न होने पाये. उनका पूर्ण रुप से संतुलित विकास हो अर्थात उनके मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ दोनों भाग समान रूप से संतुलन में विकसित हो सकें, जबकि आज की हमारी ये शिक्षा प्रणाली सिर्फ दिमाग के बायें हिस्से को विकसित करने पर जोर दे रही है. दाहिना भाग बिल्कुल पूरी तरह से उपेक्षित छोड दिया गया है. किसी के स्वप्रयासों या स्वरूचि से ही विकसित हो जायें तो और बात है, वर्ना तो इस शिक्षा नें बच्चों को मानसिक रूप से पंगु बनाने में कोई कसर नहीं छोड रखी.
अब आप स्वयं ही विचार करें कि क्या ये उचित है कि छोटी कक्षाओं में बच्चों को तार्किक एवं गणितीय विषय पढाये जायें ?