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शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

डाक्टर.....भगवान...और मेरा विद्रोही मन

कुछ दिन पहले का एक वाकया है. हालाँकि, आज के इस युग में ऎसे वाकये अपने आप में इतने साधारण है कि उस पर कोई ध्यान न दिया जाए, तो उसकी यह उपेक्षा किसी अपराध के दर्जे में खींच-तान कर भी दर्ज नहीं की जा सकती.परन्तु एक संवेदनशील व्यक्ति होने के नाते ऎसा कुछ देखना मन को सालता तो जरूर है.
हुआ ये कि,लगभग सप्ताह भर पहले की बात है, शायद मौसम में बदलाव की वजह रही होगी, लगातार दो तीन दिन हमें बुखार से जूझना पडा. वैसे तो मैं, ऎलोपैथी ईलाज से हमेशा से ही दूर रहता आया हूँ. मेरा विश्वास सिर्फ आयुर्वेद पर ही टिका है. लेकिन आजकल फैले डेंगू के प्रकोप की वजह से पत्नि इस जिद पर अडी रही कि चलकर एक बार डाक्टर को दिखा लिजिए. सो, न चाहते हुए भी इस बार उसकी जिद के आगे झुकना ही पडा और मन को मारते हुए पहुँच गये डाक्टर के पास.
डाक्टर वर्मा----एम.बी.बी.एस(एमडी)और भी जाने कौन-कौन सी डिग्रियाँ जिनके नाम से जुडी हुई है. शहर के नामी काबिल डाक्टरों में गिने जाते हैं. वहाँ पहुंचें तो देखा हमसे पहले ही कोई आठ-दस मरीज अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे हैं. बाहर काऊन्टर पर एक छुईमुई सी लडकी बैठी थी, जो हर आने वाले का नाम अपने रजिस्टर में दर्ज कर उसके हाथ में एक टोकन थमा देती. हमने भी उसके बही-खाते में अपना नाम लिखाया और टोकन थामे अपनी बारी का इन्तजार करने लगे. बैठे-बैठे कोई आधा घंटा बीत गया, लेकिन बारी है कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी और इधर मरीजों की भीड है कि बढती ही चली जा रही थी. घंटे भर बाद तो ये हालत थी कि बैठना तो दूर, बल्कि क्लीनिक में खडे होने भर की भी जगह नहीं थी. ऎसा लग रहा था कि मानो सारे शहर भर के मरीज इन्ही के यहाँ इकट्ठे हुए जा रहे हैं.
बहरहाल, हम कुनमुनाते हुए से बैठे इन्तजार करते रहे. बस अब हमारा नम्बर आने ही वाला था. हमसे पहले के मरीज की जाँच चल रही थी. हम अपनी सीट से उठकर, दरवाजे के पास खडे बारी की इन्तजार में ही थे, कि तभी एक 28-30 साल का एक नवयुवक बाहर से आया और बिना इधर उधर देखे, सीधा डाक्टर के केबिन में घुस गया. हमें कोफत तो बहुत हुई कि यहाँ हम पिछले डेढ घण्टे से बैठे इन्तजार किए जा रहे हैं और ये मुँह उठाये लाट साहब की तरह घुस गया. सचमुच इस देश में नियम, सिस्टम नाम की कोई चीज रह ही नहीं गई है. लेकिन भला किया भी क्या जा सकता था,सिवाए कुढने के. अब डाक्टर से लडने से तो रहे.
खैर, हम खडे खडे अपना ओर अधिक खून जलाते कि तभी उस लडके की आवाज सुनाई दी. हमें लगा कि वो डाक्टर को अपने साथ चलने के लिए कह रहा है. थोडा ध्यान दिया तो मालूम पडा कि अचानक से उसके पिता को रीढ की हड्डी में कोई समस्या हुई है, जिसकी वजह से वो बिस्तर से उठ पाने में भी असमर्थ है. इसलिए ही वो डाक्टर को अपने साथ चलने के लिए कह रहा था. लेकिन डाक्टर नें इस समय उसके साथ चलने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. उसका कहना था कि बाहर इतने मरीज बैठे हैं. फिलहाल उन्हे छोडकर मैं नहीं जा सकता. तुम उन्हे गाडी में डलवाकर यहीं ले लाओ. लेकिन युवक बारबार यही कहता रहा कि उसके पिता की हालत ऎसी है कि,वो इस समय अपने शरीर का कोई भी अंग नहीं हिला पा रहे हैं. पीठ इस कदर अकडी हुई है कि जरा सा हाथ लगाते ही दर्द से चिल्ला उठते हैं. हालत ऎसी नहीं है कि बिस्तर से एक इंच भी उठ पायें.
युवक के मुँह से निकला "प्लीज" शब्द कईं बार मेरे कानों तक पहुंचा, मगर बदले में डाक्टर की ओर से बार-बार सिर्फ यही सुनने को मिलता रहा, कि "नहीं मैं इस समय क्लीनिक छोडकर तुम्हारे साथ नहीं चल सकता. तुम उन्हे जैसे भी करके यहीं ले आओ".थोडी देर में युवक केबिन से बाहर निकल आया. उस समय उसके चेहरे पर छाई उदासी और लाचारी के भावों को कोई भी बडी आसानी से पढ सकता था.

तभी टोकन बाँटती उस लडकी द्वारा हमें इशारा किया गया कि आप जाईये.......अब आपका नम्बर है. मैने दरवाजा खोल अन्दर कदम तो रख दिया मगर उस समय दिमाग में कुछ ऎसे प्रश्न जन्म ले बैठे, जो मुझसे अपना समाधान भी माँग रहे थे.पहला प्रश्न यह कि: ये कहना कितना सही है कि डाक्टर भगवान का प्रतिरूप होता है? जिस डाक्टर नें किसी की विवशता और कष्ट को जानते-समझते हुए भी, उसके साथ चलना गवारा न किया, क्या वो भगवान का प्रतिरूप हो सकता है? एक दुकानदार और डाक्टर में भला क्या अन्तर है? और इस सवाल के जवाब में जैसे मैं स्वयं अपने आप से ही कह रहा हूँ; यह शायद पैसे के प्रभुत्व का ही अभिशाप है. हालाँकि, उस समय मेरे विद्रोही मन में ओर भी बहुत कुछ चल रहा था.चाहता भी था कि डाक्टर से वो सब कह डालूँ-----मगर ? कह न पाया! 

मेरे निकट इस वाकये का एक पहलू और भी महत्वपूर्ण है कि वह युवक समाज के उस अति प्रतिष्ठित डाक्टर की इस प्रकार की अनपेक्षित प्रतिक्रिया से बच पाया. इस मायाचक्र से वह कैसे बच पाया, यह स्वयं अपने आप में मेरे लिए तो विस्मय का एक मायाचक्र ही है. वो डाक्टर उसकी विवशता को जानते-समझते हुए भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ; यह जानकर भी कि उसके पिता यहाँ आने में असमर्थ हैं, वो भीषण शारीरिक कष्ट से गुजर रहे हैं.
उसे भीतर ही भीतर चाहे जितना क्रोध आया हो, पर डाक्टर के प्रति उसकी कृतज्ञता अभंग रही....जाते समय भी वो डाक्टर का अभिवादन करके गया. मगर मैं ?
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

रविवार, 16 मई 2010

इस सर्वसुलभ माध्यम का उपयोग निज एवं समाज के विकास के लिए किया जाए तो ही बेहतर है!!!!!!

ये ठीक है कि यहाँ ब्लागजगत में आज बहुत से ब्लागर इस प्रकार की शैली को अपना रहे हैं, जो आपस में विद्वेष और कटुता बढा रही है और लोगों को अच्छाई की अपेक्षा बुराई की ओर ले जा रही है। लेकिन इसमें भी मैं दोष पढने वाले व्यक्ति का ही अधिक मानता हूँ। क्यों कि आज व्यक्ति का दृ्ष्टिकोण ही इस प्रकार की भाषा को चाहता है। यह तो संसार है, इसमें अच्छा-बुरा सब कुछ है। वास्तव में देखा जाए तो अच्छा और बुरा कुछ भी नहीं। किसी चीज को अच्छे और बुरे की पदवी भी हमारा दृ्ष्टिकोण ही देता है। हम यहाँ हैं तो हमें अपनी रूचि के अनुसार विषयवस्तु और विचार को चुनना है। हमारी रूचि, हमारा दृ्ष्टिकोण ऎसा होना चाहिए कि जिससे हम उन्ही बातों को ग्रहण कर सकें जिनसें हमारा मन, बुद्धि, जीवन, समाज एवं राष्ट्र का विकास हो सके।
देखा जाए तो ब्लागिंग आज के युग में ज्ञान बढाने का एक सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम साधन बन चुका हैं। हमें चाहिए कि हम इसका अधिकाधिक लाभ उठा सकें, इसकी सार्थकता को समझने का प्रयास करें ताकि अपने एवं समाज के विकास में महती भूमिका अता कर सकें न कि सिर्फ फालतू के विवादों को जन्म देकर अपनी बेशकीमती उर्जा एवं अमूल्य समय को यूँ व्यर्थ में नष्ट किया जाए।
गूगल कृ्पा भई ब्लाग बनाया, लोग कहैं यह मेरा है
न यह तेरा न यह मेरा,  चिडिया रैन बसेरा है!!

शनिवार, 18 जुलाई 2009

आखिर दस लाख का सवाल है भई!!!!!!!!

एक प्रतियोगिता जिसमे भाग ले रहे हैं 12 प्रतियोगी।जिसमें जीतने वाले को ईनाम के रूप में मिलेंगे पूरे 10 लाख रूपये। जी हाँ पूरे 10 लाख!। वैसे दस लाख बहुत बडी रकम होती है न!!जिसके भाग्य में विजेता बनना लिखा होगा उसकी तो जैसे लाटरी ही खुल जाएगी।इन रूपयों से आप अपने लिए कोई गाडी खरीद सकते हैं,मकान ले सकते हैं और चाहे तो बीवी बच्चों को (या किसी ओर को!)लेकर कहीं घूमने जा सकते हैं। यानि कि दस लाख रूपयों में आपकी बहुत सारी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं। यार दोस्तों,मुहल्ले,नाते-रिश्तेदारों में नाम होगा वो अलग। सभी आपके भाग्य को सराहेंगे कि भई मुकद्दर हो तो इन जैसा। क्या किस्मत पाई है-पूरे दस लाख रूपये जीत कर आए हैं। माना कि इनमे से कुछ ईर्ष्या करने,जलने भुनने वाले लोग भी होंगे। लेकिन ये तो एक अच्छी बात है, समाज में जब तक सौ पचास लोग अपने से ईर्ष्या करने वाले न हों तो तब तक आदमी के स्टेटस का पता भी नहीं चलता।जब कुछ पास में होगा तभी तो जलने वाले होंगे न। जिसके पल्ले कुछ है ही नहीं उससे भला कौन जलेगा।

खैर जाने दीजिए लोगों का तो काम ही जलना है,उन्हे जलने दीजिए। हाँ तो हम कहाँ थे? हाँ याद आया हम बात कर रहे थे प्रतियोगिता की जिसके विजेता को मिलेंगे पूरे 10 लाख रूपये। ये दस लाख का जिक्र होते ही पता नहीं क्यूं मुझे बार बार चक्कर सा आने लगता है, शायद बहुत बडी रकम है न इसलिए। वैसे भी हमने अपनी सारी जिन्दगी में दस लाख रूपये इकट्ठे देखे कहाँ हैं सो चक्कर आना तो जायज है:)।
आप लोग भी सोच रहे होंगे कि ये क्या दस लाख-दस लाख लगा रखी है; पूरी बात तो बता ही नहीं रहे। खैर चलिए बताए देते हैं तनिक धीरज तो रखिए भाई। हाँ तो ये दस लाख रूपये आप भी जीत सकते हैं वो भी बडी  आसानी से, बिना कुछ खास मेहनत किए।
जैसा कि मैने आपको बताया कि एक प्रतियोगिता है जिसमें 12 लोग भाग लेंगे, उनमे से 11 लोगों को हरा कर जो आखिरी प्रतियोगी बच जाएगा, वो ईनाम के पूरे 10 लाख रूपये(लो जी फिर से चक्कर आने लगे!) अपने घर ले जाएगा।
क्या कहा! उसके लिए हमें करना क्या होगा?।
अरे बता रहे हैं भाई! तनिक धीरज नाम की भी कोई चीज होती है कि नाहीं। 10 लाख क्या ऎसे फोकट में ही मिल जाएगा, उसके लिए कछु न कछु तो करना ही पडेगा न।
हाँ तो चलिए बताए देते हैं कि आपको क्या करना होगा। प्रतियोगिता में कईं राउण्ड होंगें। हरेक राऊण्ड मे से एक हारने वाला प्रतियोगी बाहर निकलता जाएगा। आखिर में जो बचेगा वो बन जाएगा लखपति.पूरे दस लाखपति।

सबसे पहले राउण्ड में आप लोगों के सामने एक प्लास्टिक का बडा सा भगोना टाईप कोई बर्तन रखा जाएगा। जिसमे होगा लाल लाल टमाटरों का सूप। सूप का नाम सुनकर आपके मुँह में पानी काहे आने लग पडा भाई। तनिक ठहरिए अपनी जीभ को कन्ट्रोल में रखिए और आगे भी सुन लीजिए। हाँ तो सुनिए, टमाटरों के सूप में होंगे ढेर सारे बाल। आपको क्या करना है कि अपने हाथ पीठ पीछे बाँधकर उस भगोने में से वो बालामृ्त पेय अपने मुँह में भरकर पास में ही रखे दूसरे वाले एक भगोने में डालना है। यानि कि बिना हाथों का प्रयोग किए सिर्फ मुँह के जरिए उस भगोने को पूरा का पूरा खाली करना है। बारी बारी से सभी प्रतियोगियों को वो भगोना खाली करना पडेगा लेकिन न तो वो बर्तन बदला जाएगा और न ही वो बालों वाला टमाटो सूप।
क्या कहा! ये तो सब का मुँह से निकला जूठन है, हम नहीं करेंगे।
अरे भाई ऎसा काहे सोचते हो। एक दूसरे का जूठन से तो आपस में प्रेम बढ्ता है। फिर दस लाख रूपयों का भी तो सवाल है।
लो जी आगे की सुनिये, अगले राऊण्ड में आपको एक बडी सी जिन्दा मछली दी जाएगी जिसे आपको अपने दातोँ से छीलकर छोटे छोटे टुकडों में बाँटना होगा।
अरे! आप तो फिर से बिदकने लगे। क्या कहा! ये तो जानवरों का काम है।
अजी छोडिए,आप भी इक्कीसवीं सदी में रह के न जाने कौन से जमाने की बात कर रहे हैं। जब बिना ब्याह किए ही लडका-लडकी इकट्ठे रह सकते हैं, फैशन के नाम पर कपडों का त्याग करके नंगा रहा जा सकता है तो फिर आप ये इत्ता सा काम करने में काहे बिदक रहे हैं भाई। वैसे भी, दस लाख क्या ऎसे ही फोकट में मिल जाएंगे। खैर छोडिए आप आगे सुनिए।
तीसरे राऊण्ड में आपको ज्यादा कुछ खास नहीं करना है। आपको एक हाथ में गोबर लेकर ( जित्ता जोर से खींचकर मार सकते हैं) सामने वाले के मुँह का निशाना बाँधकर मारना है। अगर आपका निशाना सही लग गया तो समझिए आप अगले राऊण्ड के लिए पास वर्ना घर जाकर पहले निशाना लगाने की प्रैक्टिस कीजिए। तब अगली बार भाग लीजिएगा।
अभी आपको तीन राऊण्ड के बारे में बता दिया है। अगर आप यहाँ तक पहुँच गए तो बाकी के राऊण्ड के बारे में भी आपको आगे बता दिया जाएगा। वैसे चिन्ता मत कीजिए आगे भी कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है। बहुत ही आसान है जैसे कि जिन्दा कीडे मकोडे खाना वगैरह वगैरह।
क्या कहा! ये तो पाप है!
लो कल्लो बात। भई आप ऎसा क्यूँ सोचते हैं। आप ये जानिए कि ऎसा करके एक तरह से आप पुण्य का ही काम कर रहे हैं।
कैसे?
भाई मेरे कीडे मकोडों की जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है। आप तो एक तरह से इन्हे इस कीट योनि से मुक्ति प्रदान कर रहे हैं। है न पुण्य का काम्! बस आँख मूंदकर और अपने भगवान का (या फिर शैतान का) नाम लेकर झट से मुँह में डाल लीजिएगा। वैसे भी इनमे कोन सी कोई हड्डी वगैरह होती है।
क्या कहा! आप इसमें हिस्सा नहीं लेंगे।
अजी छोडिए! नहीं भाग लेना तो न सही। हम कौन सा आपके भरोसे बैठे हैं।भाई मेरे ये आज का इण्डिया है, यहाँ  बिना ढूँढे भी हजारों-लाखों मिल जाएंगे जो कि चन्द पैसों के लिए जूठन,गोबर और कीडे-मकोडे तो क्या आदमी का माँस भी खा जाएँ। यहाँ तो फिर भी दस लाख रूपयों का सवाल है।

वैसे तो मैं टेलीवीजन जैसी बीमारी से बिल्कुल ही दूर रहने वाला प्राणी हूँ। ज्यादा से ज्यादा कभी महीने बीस दिन में समाचार सुनने का मन किया तो देख लिया वर्ना नहीं। परसों समाचारों के लिए जैसे ही टी.वी देखने का मन बना तो देखा कि बेटा अपने कमरे में बैठा बडा मग्न होकर कोई कार्यक्रम देख रहा है। मन में उत्सुकता हुई कि देखूँ तो सही कि ये इतने ध्यान से कौन सा कार्यक्रम देख रहा है। मैने पूछा कि बेटा क्या देख रहे हो? तो झट से बोला कि पिता जी देखिए बहुत बढिया प्रोगाम आ रहा है, इसमें जीतने वाले को दस लाख रूपये ईनाम में मिलेंगे। मैंने लगभग दस पन्द्रह मिन्ट उसके साथ बैठकर वो प्रोग्राम देखा होगा कि बस इतने में ही दिमाग भन्ना गया। क्या देखता हूँ कि प्रतियोगीयों को कभी जूठन खाने का कहा जा रहा है,कभी मुँह पर गोबर मलना तो कभी जिन्दा मछली खाने को और प्रतियोगी भी अपने अपने क्रम से बडी आसानी से हँसते मुस्कुराते हुए किए जा रहे हैं। सारे के सारे प्रतियोगी अच्छे घरों के दिखाई दे रहे थे,जिनमें लडके-लडकियाँ दोनो शामिल थे। सिर्फ 15 मिन्ट ही वो कार्यक्रम देखा होगा कि गुस्से से दिमाग ऎसा भन्नाया कि सबसे पहला काम ये किया कि झट से केबल की तार निकालकर साईड मे इकट्ठी करके रखी। कल केबल वाले को बोलकर कनैक्शन भी कटवा दिया।

लेकिन कल से एक बात जो दिमाग से निकल ही नहीं रही कि आखिर इन्सान पैसों के लिए क्या कुछ कर सकता है। हम लोग देखते हैं कि अक्सर मीडिया को दोष दिया जाता है कि वो समाज को पतन की ओर मोड रहा है।लेकिन मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि जो लोग इनाम के लालच में ऎसे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं उनकी बुद्धि क्या घास चरने चली जाती है। कल को कोई चैनल ऎसा कार्यक्रम बनाए जिसमें कि प्रतियोगिओं को इन्सान का माँस खाना पडे,मल-मूत्र का सेवन करना पडे तो इसका मतलब कि लोग तो वो भी करने को तैयार हो जाएंगे। 
हे प्रभु! पता नहीं इन्सान क्या से क्या बनता जा रहा है। किसी ने शायद सच कहा है कि पैसा इन्सान से कुछ भी करा सकता है।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

कुत्तों का सामाजिक विकास (व्यंग्य)

पिछले कईं दिनों से चिट्ठाजगत पर कुतों के विषय में चल रही चर्चा को देखते हुए, सोचा कि इस महान जीव के विषय में अपनी 'कुक्कुरमति' द्वारा मैने जो भी ज्ञान उपार्जित किया है,उसे आपसे सांझा कर ही लेता हूं.
                     कुत्तों का समाजिक विकास

कुत्ता वास्तव में एक ऎतिहासिक प्राणी है, किन्तु आधुनिक युग मे प्रवृत्ति के हिसाब से इस प्राणी का जितना अभूतपूर्व विकास हुआ है। उतना तो शायद मनुष्य का भी नहीं हुआ है.इंसानो के साथ रहते हुए कुछ तो अपने को कुत्ता ही नहीं समझते। उनका अपना अहंकार होता है। उनकी अपनी चाल होती है। वे आपकी तरफ़ देखेंगे तो कुछ इस तरह जैसे यह उनकी कृपा है कि वे आपको देख रहे हैं।वे कुत्तों में अपने को आर्य समझते हैं।

रंग-रूप,कद-काठी के अतिरिक्त प्रकृति के आधार पर कुतों को दो भागों में बांटा जा सकता है.

एक वो जो काटते हैं-कुतों की यह प्रजाति मुख्यत: पुलिस विभाग में पाई जाती है,जिनका अपना हि एक भिन्न प्रकार का स्वाभिमान होता है.हर रास्ता चलते प्राणी पर गुर्राना ओर अपनी ताकत का अहसास कराना ईनका मौलिक अधिकार माना जाता है.

ईश्वर की तरफ़ से प्राप्त सबसे अनूठे उपहार अपनी घ्राणशक्ति का भी सबसे अधिक उपयोग यही प्रजाति करती हैं।साधारण मनुष्य तो इनके सामने अपने आप को पूर्णत: दीन-हीन अवस्था मे महसूस करता है.खानपान के मामले मे यह प्रजाति थोडी पेटू टाईप की होती है, आप इन्हे सर्वाहारा भी कह सकते है.इनकी पाचन क्षमता बहुत ही विलक्षण होती है,क्यों कि इस पृथ्वी की ऎसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसका भक्षण करने मे ये अपने आप को असमर्थ पाते हों.
किन्तु समाजिक स्तर पर अभी यह विकासशील प्रजाति है.

दूसरे वो जो केवल भौंकते है- कुत्तों मे यह पूर्णत: विकसित प्रजाति मानी जाती है.सीमित साधनों के बावजूद् जितनी उन्नति इस प्रजाति ने की है, उतनी तो निश्चित तौर पर मनुष्य जाति ने भी नहीं की है.पहले कुते को इंसान का वफादार सेवक तथा रक्षक समझा जाता था,किन्तु शनै: शनै: इनकी 'कुत्तापंती' का ऎसा विकास हुआ कि आज इनकी रक्षा का दायित्व मनुष्य जाति को सौंपा जाता है.

इस तरह के कुत्ते मुख्यत: राजनीती में पाए जाते है.इनकी विकास क्षमता का आंकलन आप इसी बात से लगा सकतें हैं कि इनमे से कुछ तो किसी राज्य विशेष के मुख्यमन्त्री पद पर शोभायमान हो चुके हैं. वास्तव मे ऎसी अविश्वसनीय उन्नति का 'राज' केवलमात्र इनकी 'भौंकन-क्षमता' मे ही निहित है.इनकी इसी 'भौंकन कला' के वशिभूत होकर मानव जाति इनके पीछे चलने में, अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है.

किन्तु स्वभावत: ये थोडे (या अधिकतर)दम्भी एवं अहंकारी होते है., तथा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने,एवं मनुष्य जाति को उनकी हीनता का अहसास कराने हेतु समय-समय पर उन्हे प्रताडित भी करते रहते हैं.
कुतों में मुख्यत: पाया जाने वाला वफादारी नामक गुण, जिसके आधार पर कुता वास्तव में कुत्ता कहलाने का अधिकारी है, उस गुण का शनै: शनै: इनमे पूर्णत: ह्रास होता चला गया.

आज जैसे-जैसे इन्सान अपनी 'इन्सानियत'से दूर होता जा रहा है,वैसे ही इन्होने भी अपनी 'कुत्तानियत' का परित्याग कर दिया है.

रविवार, 23 नवंबर 2008

ईमानदारी का ईनाम

एक बड़े व्यापारिक संस्थान की शाखा का कार्यालय पास ही के उपनगर में था जहां कार्यालय में एक कर्मचारी ओटो रिक्शा से आता था। उसे दैनिक भत्ते के सिवाय ओटो का भाड़ा भी दिया जाता था। भाड़ा चालीस रूपए के आस-पास बनता था। मगर कर्मचारियों ने परस्पर तय कर लिया था। जो भी आये जाये वह खर्च का सौ रूपये का ही वाउचर बनाएगा। बाकी बचा रूपया अपनी जेब के हवाले कर देगा। इसमें वाउचर मंजूर करने वाले अधिकारी का भी प्रतिशत बंधा था। कर्मचारी और अधिकारी की सांठ-गांठ थी।ये समझो कि दसों उंगलियॉं घी में और सिर कढ़ाई में था.

हर तीन माह बाद यह डयूटी बदलती रहती थी। थोडे दिनों बाद एक निकम्मे (ईमानदार) कर्मचारी की डयूटी लगी तो उसने चालीस रूपए खर्च का वाउचर बनाया।

निचले वर्ग के अधिकारी ने कहा कि वाउचर तो सौ रूपए का बनता था है। क्या तुम इतना भी नहीं जानते?
सर! मैंने तो ओटो का भाड़ा चालीस रूपए ही दिया है। मैं अधिक भाड़ा कैसे ले सकता हूं? अधिकारी के बार-बार समझाने पर भी वह अपनी बात पर अडिग रहा। अनीति का धन लेना यानी कंपनी के साथ धोखा। बचपन में मां ने नीति का ही पाठ पढ़ाया था। अधिकारी उससे ज्यादा न उलझा।

उसने प्रतिष्ठान के बड़े अफसर से मुलाकात करनी चाही। अपने केबिन से बाहर निकल ही रहा था कि द्वार पर खडे दो-चार कर्मचारियों ने कहा, 'क्यों, यार, हमारे पेट पर लात मारते हो?' वाउचर सौ रूपए का बनाते तो तुम्हारा क्या घिस जाता? मगर उसने सुनी अनसुनी कर दी। सीधा बड़े साहब के केबिन में गया। सारी घटना कह सुनाई। बड़े साहब ने तो उसकी ईमानदारी की भूरि भूरि प्रशंसा की।

उसी शाम को चपरासी द्वारा पीले रंग का लिफाफा मिला। उसमें लिखा था। प्रतिष्ठान को आपकी जरूरत नहीं है। और वो बेचारा हाथ मे लिफाफा पकडे माँ (को)के बताए नीति वचनो को कोसने लगा.