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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो

ईश्वर द्वारा निर्मित इस प्रकृति का अपना एक पूर्ण चक्र है -----जिसका सिर्फ एक ही नियम है कि एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो। इस वर्तुल को तोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन हम लोग क्या कर रहे हैं कि, बस सिर्फ और सिर्फ लिये चले जा रहे हैं,देना तो हम लोगों नें सीखा ही नहीं। इसीलिए धीरे-धीरे आज सारे प्राकृ्तिक जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती निरन्तर विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं, झीलें, तालाब खत्म हो  रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इतनी बुरी तरह से बिगाड़ चुके हैं कि भविष्य में इस पर रह ही नहीं पाएंगे,अपितु जीने के लिए हमें किसी और नए ग्रह की खोज करनी पडेगी ।

देखा जाए तो इस स्थिति के लिए आधुनिक विज्ञान भी कोई कम दोषी नहीं है। उसका रवैया भी सदैव विजेता वाला ही रहा है। विज्ञान ये सोचता है कि धरती और आकाश से दोस्ती कैसी, उस पर तो बस विजय हासिल करनी है। हमने कुदरत से खिलवाड किया , किसी नदी का मुहाना मोड़ दिया, किसी पहाड़ का कुछ हिस्सा काट लिया, किसी प्रयोगशाला में चन्द रसायनिक क्रियाएं संपन्न कर ली और बस समझने लगे कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

आप प्लास्टिक को ही देखिए। उसे बना कर सोचने लगे कि कमाल है! ये तो न जलता है, न गीला होता है, न जंग लगती है - कितनी महान उपलब्धि है। उपयोग के बाद उसे फेंक देना भी कितना सुविधाजनक है। जिस भी पदार्थ,जीव-जन्तु,पशु-पक्षी,मनुष्य,पेड-पौधे इत्यादि की रचना प्रकृ्ति नें की है,अगर आप उन्हे वापस जमीन में डाल दो तो वह पुन: अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं।लेकिन अगर प्लास्टिक को जमीन में गाड़ दो और बरसों बाद खोदो तो भी वैसा का वैसा ही पाओगे।क्योंकि प्रकृ्ति प्लास्टिक जैसे मनुष्य निर्मित किसी पदार्थ को आत्मसात नहीं करती। लेकिन हम लोग हैं कि अपनी इन महान उपलब्धियों के दंभ में चूर स्वयं अपने ही हाथों विनाश के बीज बोए चले जा रहे हैं । अब इन बीजों से उत्पन फसल कैसी होगी,हमारे पास ये सोचने का भी समय नहीं है। बस चले जा रहे हैं---------विज्ञान के रथ पर सवार होकर कुदरत पर विजय हसिल करने को।

पर्यावरण का अर्थ है संपूर्ण का विचार करना। भारतीय मनीषा हमेशा 'पूर्ण' का विचार करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। सीमित दृष्टि पूर्णता का विचार नहीं कर सकती। एक बढ़ई सिर्फ पेड़ के बारे में सोचता है। उसे लकड़ी की गुणवत्ता की जानकारी है। पेड़ की और कोई उपयोगिता उसे मालूम नहीं है कि वे किस तरह बारिश होने में अपना योगदान देते हैं ,वे किस तरह मिट्टी को बांध कर रखते हैं। उसे तो बस सिर्फ अपनी लकड़ी से मतलब है।वैसी ही सीमित सोच ले कर हम अपने जंगलों को काटते चले गए और अब भुगत रहे हैं। अब आक्सीजन की कमी महसूस हो रही है। वृक्ष न होने से पूरा वातावरण ही अस्तव्यस्त होता जा रहा है। मौसम का क्रम बदलने लगा है। सावन के महीने में सूखा पड रहा है, सर्दियों में पसीने छूटने लगे हैं। और वायु प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं।इसे पढकर बहुत से मेरे जैसे लोग ये भी सोच रहे होंगे कि हमें इन सब से क्या लेना!मान लो, अगर कुछ समस्याएं उत्पन हों भी रही हैं तो सारी दुनिया के लिए ही तो हो रही हैं,कौन सा हमें अकेले को परेशानी उठानी पड रही है। अब जैसे बाकी दुनिया जियेगी,वैसे ही हम भी जी लेंगे।

सुना है कि किसी जमाने में एक राजा था । उसने एक दिन देखा कि खेत-खलिहानों में पक्षी आते हैं और अनाज खा जाते हैं। वह सोचने लगा कि ये अदना से पंछी पूरे राज्य में लाखों दाने खा जाते होंगे। इसे रोकना होगा। तो उसने राज्य में ऐलान कर दिया कि जो भी पक्षियों को मारेगा उसे इनाम दिया जाएगा। बस ईनाम के लालच में राज्य के सारे नागरिक शिकारी हो गए और देखते ही देखते पूरा राज्य पक्षी विहीन हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उत्सव मनाया गया कि आज उन्होंने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

किन्तु अगले ही वर्ष गेहूँ की फसल पूरी तरह से नदारद थी। क्योंकि मिट्टी में जो कीड़े थे और जो टिड्डियां थीं, उन्हें वे पक्षी खाते थे और अनाज की रक्षा करते थे। इस बार उन्हें खाने वाले पक्षी नहीं रहे, सो, कीडे-मकोडों नें पूरी फसल चट कर डाली।किसी विद्वान के बताने पर राजा के बात समझ में आई और उसके बाद उसे विदेशों से पक्षी मंगवाने पडे।

यह सृष्टि परस्पर निर्भर है। उसे किसी भी चीज से रिक्त करने की कोशिश बेहद खतरनाक है। न हम पूर्णत: स्वतंत्र हैं, और न ही परतंत्र । यहाँ हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे लिए सहोदर के समान है। हमें इन सबके साथ ही जीने का सलीका सीखना होगा।