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रविवार, 16 मई 2010

इस सर्वसुलभ माध्यम का उपयोग निज एवं समाज के विकास के लिए किया जाए तो ही बेहतर है!!!!!!

ये ठीक है कि यहाँ ब्लागजगत में आज बहुत से ब्लागर इस प्रकार की शैली को अपना रहे हैं, जो आपस में विद्वेष और कटुता बढा रही है और लोगों को अच्छाई की अपेक्षा बुराई की ओर ले जा रही है। लेकिन इसमें भी मैं दोष पढने वाले व्यक्ति का ही अधिक मानता हूँ। क्यों कि आज व्यक्ति का दृ्ष्टिकोण ही इस प्रकार की भाषा को चाहता है। यह तो संसार है, इसमें अच्छा-बुरा सब कुछ है। वास्तव में देखा जाए तो अच्छा और बुरा कुछ भी नहीं। किसी चीज को अच्छे और बुरे की पदवी भी हमारा दृ्ष्टिकोण ही देता है। हम यहाँ हैं तो हमें अपनी रूचि के अनुसार विषयवस्तु और विचार को चुनना है। हमारी रूचि, हमारा दृ्ष्टिकोण ऎसा होना चाहिए कि जिससे हम उन्ही बातों को ग्रहण कर सकें जिनसें हमारा मन, बुद्धि, जीवन, समाज एवं राष्ट्र का विकास हो सके।
देखा जाए तो ब्लागिंग आज के युग में ज्ञान बढाने का एक सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम साधन बन चुका हैं। हमें चाहिए कि हम इसका अधिकाधिक लाभ उठा सकें, इसकी सार्थकता को समझने का प्रयास करें ताकि अपने एवं समाज के विकास में महती भूमिका अता कर सकें न कि सिर्फ फालतू के विवादों को जन्म देकर अपनी बेशकीमती उर्जा एवं अमूल्य समय को यूँ व्यर्थ में नष्ट किया जाए।
गूगल कृ्पा भई ब्लाग बनाया, लोग कहैं यह मेरा है
न यह तेरा न यह मेरा,  चिडिया रैन बसेरा है!!

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

असली हिन्दुस्तान तो यहीं इस ब्लागजगत में बस रहा है.......

कितना अद्भुत है ये हिन्दी ब्लागजगत! जैसे ईश्वर नें सृ्ष्टि रचना के समय भान्ती भान्ती के जीवों को उत्पन किया, सब के सब सूरत, स्वभाव और व्यवहार में एक दूसरे से बिल्कुल अलग। ठीक वैसे ही इस ब्लाग संसार में भी हजारों लोग दिन रात अलग अलग मसलों पर लिखे जा रहे हैं----लेकिन क्या मजाल कि वे किसी एक भी बात पर कभी एकमत हो सकें। सब एक दूसरे से निराले और अजीब। ये वो जगह हैं जहाँ आपको हरेक वैराईटी का जीव मिलेगा। यहाँ आपको आँख के अन्धे से अक्ल के अन्धे तक हर तरह के इन्सान के दर्शन होंगें। मैं तो कहता हूँ कि सही मायनों में यहीं असली हिन्दुस्तान बस रहा है। ऊपर वाले नें अपनी फैक्ट्री में मनुष्य जाति के जितने भी माडल तैयार किए होंगें, उन सब के नमूने आपको यहाँ देखने को मिल जाएंगें। जहाँ के पुरूष औरतों की तरह लडें, जहाँ के बूढे बुजुर्ग बात बात में बच्चों की तरह ठुसकने लगें, जहाँ एक से बढकर एक भाँड, जमूरे, नौटंकीबाज आपका मनोरंजन करने को तैयार बैठे हों, जहाँ मूर्ख विद्वानों को मात दें और जहाँ लम्पट देवताओं की तरह सिँहासनारूढ होकर भी ईर्ष्या और द्वेष में पारंगत हों,  तो बताईये भला आप इनमें दिलचस्पी लेंगें या घर में बीवी बच्चों के साथ बैठकर गप्पे हांकेंगें ।
गधे और घोडे कैसे एक साथ जुत रहे हैं। शेर और बकरी कैसे एक साथ एक ही घाट पर पानी पीते हैं। यदि यह सब देखना है तो बजाए घर में बाल बच्चों के साथ सिर खपाने या टेलीवीजन पर अलाने-फलाने का स्वयंवर या सास-बहु का रोना धोना देखकर अपना ब्लड प्रैशर बढाने के यहाँ हिन्दी चिट्ठानगरी में पधारिए और हो सके तो अपने अडोसी-पडोसी, नाते रिश्तेदार, दोस्त-दुश्मन सब को हिन्दी चिट्ठाकारी का माहत्मय समझाकर उन्हे इस अनोखी दुनिया से जुडने के लिए प्रोत्साहित कीजिए क्यों कि निश्चित ही आने वाला कल हिन्दी ब्लागिंग के नाम रहने वाला है। ऎसा न हो कि कल वक्त आगे निकल जाए और आप पिछडों की श्रेणी में खडे उसे दूर जाते देखते रहें।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

पता नहीं मन की ये दुविधा कब पीछा छोडेगी

मालूम नहीं क्यों, कभी कभी तो ऎसा लगने लगता है कि ये ब्लागिंग,फ्लागिंग कुछ नहीं--सब फालतू की टन्टेबाजी है--ऎसा लगता है कि अपनी कोई खुशी, कोई दुख, कोई जानकारी, मन में आया जरा सा कोई विचार अपने तक ही सीमित न रख पाना और उसे झट से एक पोस्ट के जरिये ठेल देना बिल्कुल एक भोले बालकपन का सा काम है। जब कभी अपनी किसी पोस्ट को इस दृ्ष्टि से देखता हूँ तो मानो ब्लागिंग के सारे उत्साह पर ठंडा पानी पड जाता है।
फिर कभी दूसरी विचारधारा बल पकडती है तो उस समय लगता है कि जैसे अपने मन के विचारों,भावों को प्रकट कर पाना हरेक के बस की बात नहीं होती; और आसान भी नहीं होता। इसलिए जो भी कोई इन्सान अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट कर सके, कि उससे चन्द दूसरे अन्य लोग भी अपने को जुडा समझें, तो उसे औरों से विलक्षण और कुछ समर्थ ही समझा जाना चाहिए। इस विचारधारा के वशीभूत होकर बस खुद में एक तीसमारखाँ सी अनुभूति होने लगती है ओर हम झट से कोई नई पोस्ट लिखने बैठ जाते हैं  :)  
लेकिन एक ऎसी समस्या है, जिसने कि पिछले कईं दिनों से हमारा जीना हराम कर रखा है। वो यूँ कि कभी कभी ऎसा होता है कि जिस पोस्ट को हमने बडे चाव से लिखा। जब पोस्ट की तो खुद के साथ साथ चार लोगों को भी पसंद आई लेकिन कुछ दिन बाद जब दोबारा से अपनी उस पोस्ट को पढता हूँ तो ऎसा प्रतीत होने लगता है कि मानो इसे लिखकर मैने केवल समय का अपव्यय ही किया है। मन में ऎसे  विचार आने लगते हैं कि "क्या यार्! ये सब भी कोई लिखने की चीज है। लिखना ही था तो कुछ तो ढंग का लिखना चाहिए था"।
मेरे मन की यह दुविधा पता नहीं मेरा इस ब्लागिंग में पीछा कब छोडेगी। ऎसा लगने लगा है कि जैसे मेरे अन्दर कोई दो धुर विरोधी व्यक्तित्व विद्यमान हैं। जो चीज एक को पसन्द है, वो दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती। इसी कशमकश के चलते आज तक हमारे इस ब्लाग का सक्रियता क्रमाँक 250-300 की संख्या पर ही अटका हुआ है----वर्ना तो समीर लाल जी और ताऊ जी, दोनों को न जाने कब का पछाड चुके होते(सिर्फ चिट्ठा सक्रियता क्रमांक के मामले में) हा हा हा...। बिल्कुल सीरियसली कह रहे हैं---मजाक मत समझिएगा :-)
हाँ तो हम कह रहे थे कि हमारे मन की ये दुविधा ही है, जो कि हमें चिट्ठाकारी के विजयरथ पर आरूढ नहीं होने दे रही । हमारी हालत तो रात के चौकीदार सी हो चुकी है---जो रात भर निरन्तर चलने के बाद भी कही नहीं पहुँच पाता, उसकी यात्रा सिर्फ उस मोहल्ले तक ही सीमित रहती है।
राम जाने!! पता नहीं ये दुविधा कब हमारा पीछा छोडेगी, या पता नहीं छोडेगी भी कि नहीं----डरते हैं, कहीं कोई साईकैट्रिक वाला मामला न हो जाए :-)

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

चिट्ठाकारों के लिए एक नायाब नुस्खा!!!!!!!!!!!!!!!!!!

 कुछ दिनों पहले हमने अपनी एक पोस्ट के जरिए आप लोगों से चिट्ठाकारी करने के उदेश्यों के बारे में जानना चाहा था। जिसमें आप सब लोगों नें अपने अपने उदेश्यों को जाहिर किया तो जानकर हमें तो अपनी निरूदेश्यता पर शर्म से महसूस होने लगी। सोचा कि जब सब लोगों नें अपने अपने उदेश्य निर्धारित कर रखे हैं तो फिर हमें भी अपने लिए किसी उदेश्य का चुनाव कर ही लेना चाहिए। भई आखिर कब तक यूँ ही निरूद्देश्य भटकते(ब्लागिंग करते) रहेंगें। फालतू में टाईम खोटी करने से बेहतर है कि अपने लिए किसी लक्ष्य का चुनाव कर ही लिया जाए।
लो जी, आज से हमने भी अपने लिए ब्लागिंग का एक उदेश्य चुन लिया।  इससे पहले कि हम अपने ध्येय को आपके सामने रखें---एक बात जान लीजिए कि हमारा जो ये उदेश्य है, वो आप लोगों की सुविधा और फायदे से जुडा हुआ है। आप लोग भी सोच रहे होंगें कि इसमें हमारा कौन सा फायदा हो सकता है। बताते हैं भाई----तनिक धीरज रखिए।
उससे पहले दो एक बातें कह लेने दीजिए। अच्छा एक बात बताईये क्या कभी आपको नहीं लगता कि अपने ब्लाग के लिए रोज रोज पोस्ट का जुगाड करना कितना श्रमसाध्य कार्य है। पहले तो लिखने के लिए कोई विषय ढूंढो।अब विषय मिल गया तो जरूरी नहीं कि उसके लिए दिमाग में भाव, विचार भी आने लगें। लगे रहो दिन भर सोचने में कि ये लिखूं कि वो लिखूँ----ऎसा लिखूँ कि वैसा लिखूँ। ऊपर से समय की दिक्कत, घर में बीवी की खिचखिच---जहाँ दिमाग में कोई विचार आया नहीं कि वहीं उधर से आवाज आने लगती है-"अजी! सुनते हो"। बस विचार जैसे आया था, दिमाग से वैसे ही चुपचाप निकल लेता है। 
एक ओर जो परेशानी है, वो है समय की। व्यापारी आदमी तो जैसे तैसे समय निकाल भी लेता है लेकिन नौकरीपेशा लोगों के लिए तो ओर बडी दिक्कत----बेचारे का सारा दिन तो पोस्ट लिखने के चक्कर में बीत जाता है। भला आदमी कब तो आफिस का काम करेगा ओर कब दूसरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी कर पाएगा। अगर आफिस का काम न करे तो नौकरी छूटने का खतरा ओर दूसरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी न की तो फिर तो अपने ब्लाग पर कोई झाँकने भी नहीं आएगा। यानि कि फिर तो ब्लाग लिखने से कहीं अच्छा है कि डायरी लिखने की आदत डाल ली जाए। खुद ही लिखो ओर खुद ही पढे जाओ। बाप रे बाप्! इतनी परेशानियाँ----ससुरी ब्लागिंग न हुई,जी का जंजाल हो गई।मानो साँप के मुँह में छुछुन्दर----न छोडने बनती है ओर न निगलते।
लेकिन घबराईये नहीं---समझिए आपकी सभी परेशानियो का हल हो गया। अब आपको पोस्ट लिखने में समय नष्ट करने की कोई जरूरत नहीं। आप तो बस अब अपना सारा ध्यान दूसरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पयाने में लगाईये ओर बदले में अपने ब्लाग पर आने वाली टिप्पणियाँ गिनते जाईये।
आप सोच रहे होंगें कि शायद हम आपके साथ कोई मजाक कर रहे हैं। अगर आप इसे मजाक समझ रहे हैं तो फिर आप बिल्कुल गलत हैं। कृ्प्या एक बात जान लीजिए कि किसी को भ्रमित करने या फालतू में हास परिहास करने की न तो हमारी आदत रही है ओर न ही यूँ व्यर्थ में नष्ट करने को हमारे पास इतना समय है।
सच मानिये,हम आप लोगों के लिए एक ऎसा नायाब नुस्खा खोज कर लाए कि समझिए आपकी ब्लागिंग के रास्ते में आने वाली सभी दिक्कतें, परेशानियाँ यूँ  चुटकी में समाप्त।
बस आपको थोडा अगली पोस्ट तक इन्तजार करना पडेगा.............. मिलते हैं कल या परसों।
नमस्कार्!!

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

बाबा लोगो का ब्लागिंग दर्शन और कलयुगी नीतिज्ञान :)


समीरानन्द आश्रम में तीनों बाबा जी समाधिस्थ अवस्था में बैठे हुए हैं । बिल्कुल अपने ध्यान में निमग्न...कुछ खबर नहीं कि संसार में क्या हो रहा है, और संसार में वे हैं भी या नहीं । ये दोनों काफी देर तक उनके सामने बैठे रहे..इतने में ही, न जाने कब की लगी  स्वामी ललितानन्द महाराज की समाधी टूटी । बाबा जी ने बडी ही दया दृ्ष्टि से इन लोगों की ओर देखा । इन लोगों नें भी श्रद्धाभाव से चरणस्पर्शपूर्वक उन्हे प्रणाम किया ।"बच्चा!- तुम लोग कौन हो और कहाँ से आए हो ?"
मुरारी लाल:- ":महाराज्! हम तो बस चिट्ठाकारी कीट हैं, हम दोनों "ब्लागनगर" के रहने वाले हैं। आप लोगों की बडी महिमा सुनी है,इसलिए दर्शनों के लिए आए हैं ।"
"बोलो बच्चा! कहो कोई समस्या आन पडी है क्या?"
महफूज:- "महाराज्! समस्या तो ऎसी कुछ नहीं । बस हम तो आपके दर्शनों के अभिलाषी थे, ब्लागिरी के मोह को त्याग कर आत्मिक शान्ती की खोज में आप लोगों के द्वारे आए हैं "
"न्! बच्चा न्! अभी तुम लोगों की आयु इन बखेडों में पडने की नहीं है । अभी तुम बस ब्लागिंग की ओर ध्यान दो।"
मुरारी लाल:- "बाबा! ब्लागिंग में क्या खाक ध्यान दें। दिनरात मगजमारी करनी पडती है, तब जाकर हफ्ते दस दिन में एक पोस्ट का जुगाड हो पाता है। हम लोग हर रोज कम से कम सौं लोगों के चिट्ठे पर जाकर टिप्पणियाँ करते है, तब जाकर बदले में हम लोगो को अपनी पोस्ट पर मुश्किल से पाँच सात टिप्पणियाँ मिल पाती हैं। ऊपर से फालतू में सारा दिन कम्पयूटर पे खिटर-पिटर करते रहो, न कुछ कमाई न धंधा"।
बाबा ललितानन्द:- "धैर्य रखो बच्चा ! एक दिन तुम्हारा भी वक्त जरूर आएगा, जब तुम्हे अपनी हर पोस्ट पर सैकंडों टिप्पणियाँ मिला करेंगी, रही बात कमाई कि तो वो भी जल्द शुरू हो ही जाएगी । अवधिया जी और पाबला जी जैसे तकनीकदक्ष ब्लागर इसकी खोज में प्रयासरत हैं"।
 मुरारी:- महाराज्! ब्लागर बनने का वास्तविक अधिकारी कौन है"?
बाबा ललितानन्द:-"जो संसार में किसी काम के लायक न रहें"
मुरारी:- "बुद्धिमान ब्लागर कौन है।"
बाबा ललितानन्द :- "जो दो विरोधी विचार आधारित पोस्टों पर "बिल्कुल सही कहा आपने" लिखकर टिप्पणी करना जानता हो"
मुरारी:-"मूर्ख ब्लागर की परिभाषा क्या है?"
बाबा ललितानन्द:- "जो गोलमोल बात न कह करके अपने ह्र्दय के भाव सब पर सरलता से प्रकट कर दे "
मुरारी:- "सच्चे ब्लागर का सबसे बडा गुण क्या है" ?
बाबा ललितानन्द:-" सुबह शाम गुरूदेव्! गुरूदेव्! कहकर अपने से वरिष्ठ ब्लागरों की चापलूसी और आत्म गौरव का अभाव"
मुरारी:- "सिद्धहस्त ब्लागर किसे कहना चाहिए" ?
बाबा ललितानन्द:- "जिसे दूसरे के लिखे लेखों, कविताओं,कहानियों को चुराने में तनिक भी शर्म का अनुभव न हो "
मुरारी:-"हिन्दी ब्लागिंग का प्रचार प्रसार कैसे होगा"?
बाबा ललितानन्द:- "रोमन भाषा में अधिकाधिक टिप्पणियाँ करने से"
मुरारी:- "हिन्दी ब्लागिंग में सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है"?
बाबा ललितानन्द:-"जो अभी तक स्वयम रचनाकार की भी समझ में न आई हो"


इतना कहकर बाबा ने अपनी दृ्ष्टि मुरारी लाल से हटाकर अब महफूज अली की ओर की---- "हाँ तुम बोलो बच्चा! तुम्हे क्या कष्ट है? क्या तुम भी मुरारी लाल की तरह ब्लाग ज्ञान के उद्देश्य से आए हो" ?
महफूज:- "नहीं महाराज्! ब्लागिंग में तो अपने को कोई दिक्कत परेशानी नहीं है । बल्कि आपकी कृ्पा से अपनी ब्लागिरी की दुकान तो चकाचक चल रही है, हर पोस्ट पर सौं पचास टिप्पणियाँ तो बडे आराम से बिना कुछ किए ही मिल जाती हैं"।
बाबा ललितानन्द:- " तो बच्चा, फिर तुम्हारे इस मुख मंडल पर ये उदासी क्यूं है?"
महफूज:- "बाबा! मेरी क्या बताऊँ! मेरी समस्या कुछ अलग है । दरअसल बात ये है कि जब से मेरी प्रेमिका रामप्यारी नें मुझे छोडकर सन्यास ग्रहण किया है, बस तब से मेरी आत्मा बहुत अशान्त रहती है । अब तो मन करता है कि मैं भी सब कुछ छोडछाड कर बस सन्यासी बन जाऊँ । मैं तो दुनियादारी का मोह त्याग कर बस आपके पास परम सत्य की खोज में आया हूँ। मन में कुछ भ्रम हैं, जिनका आपसे निवारण चाहता हूँ "
बाबा ललितानन्द:- "कहो! तुम्हें क्या भ्रम है बच्चा?"
महफूज :- "मुक्ति" कैसे प्राप्त होती है ?
बाबा ललितानन्द जी:- "आँख,कान बन्द करके खूब मोटा पैसा कमाने से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है"।
महफूज:- "महाराज्! "परोपकार" क्या है?"
बाबा ललितानन्द जी:- "खूब आनन्द से रहना और पाखंड पूर्वक स्वार्थ साधना ही "परोपकार" है। "
तभी बाबा समीरानन्द और बाबा ताऊआनन्द जी भी समाधि से उठ खडे हुए । बाबा जी का एक भक्त उन्हे सुल्फा भरी हुई चिलम पकडा गया और ये दोनों बारी बारी से लम्बे लम्बे कश खीँचने लगे । जब चिलम से निवृ्त हुए तो सामने बैठे इन दोनों की ओर हल्की सी निगाह डालकर बाबा ललितानन्द की ओर प्रश्नवाचक दृ्ष्टि से देखने लगे। उन्होने भी उनकी दृ्ष्टि के आशय को समझने में देर न लगाई ओर कहने लगे "गुरूदेव्! ये दोनों ब्लागजगत से आए दुखी ब्लागर हैं, आत्मिक शान्ती की खोज में यहाँ आए हैं।"
मुरारी लाल और महफूज दोनों नें ही बडे ही श्रद्धाभाव से बाबा लोगों के चरणों में अपना शीश झुकाया । बाबा लोगों नें भी झट से आशीर्वाद दे डाला  "आयुष्मान भव:, दूधो नहाओ, पूतो फलो"
"तुम्हारा कल्याण हो वत्स"
बाबा समीरानन्द :- "कहो वत्स्! क्या शंका है तुम्हारी ?"
महफूज:- "महाराज्! स्वर्ग कहां है ?"
बाबा समीरानन्द:- "सिविल लाईन्स तथा माडल टाऊन की कोठियों और मल्टीप्लैक्स में "
महफूज:- "ओर नरक किस जगह है" ?
बाबा ताऊआनन्द:- "जो लोग अपनी सनातन संस्कृ्ति पर गर्व करते हैं, उन लोगो के घरों में "
महफूज:- "धर्म" क्या है ?
बाबा समीरानन्द:- "संसार की सब से सस्ती और निकृ्ष्ट वस्तु का नाम ही धर्म है"
महफूज:- "इन्सान को धर्म का पालन कब करना चाहिए ?"
बाबा ताऊआनन्द:- " मृ्त्यु के समय----जीवन समाप्ति में जब एक आध दिन रह जाए, यानि कि जब यमदूत प्राण लेने को दरवाजे पर खडा हो, तब"
महफूज:- "जीवन की सफलता किसमें है ?"
बाबा ताऊआनन्द:- "ढोंग रचने और ऎश करने में "
महफूज:- "सच्चा ज्ञानी कौन है?"
बाबा समीरानन्द:- " दसँवी में 33 प्रतिशत नम्बर लेकर भी जो अफसर की कुर्सी पर बैठा फर्स्ट डिवीजन बी.ए., एम.ए. पास को धमका रहा है" 
महफूज:- "सबसे बडा सत्यवादी कौन है?"
बाबा ललितानन्द:- नेता, वकील और हिन्दी ब्लागर"
महफूज:- "मनुष्य जीवन का उदेश्य क्या है?"
बाबा ताऊआनन्द:- "कमजोरों को सताना और अपने से बलवान से दब जाना ।"
महफूज:- "महाराज्! आज आपने मेरी सारी संशयनिवृ्ति कर दी, अब जाकर मेरी आत्मा को परम शान्ती प्राप्त हुई है । मेरे ह्रदय की उद्विग्नता दूर हो गई,! आप मुझे जो आदेश देंगें, अब मैं वही करूँगा"।
मुरारी:- "धन्य गुरूवर, धन्य् ! आज आप लोगों के दर्शन कर मेरे नेत्र और उपदेश सुनकर मेरे कान पवित्र हो गये । अब तो मैं आपके पाद-पंकंजो की सेवा कर अपना जीवन संवारना चाहता हूँ"।


" जाओ, बालको! अब अपने ब्लाग की सुध लो और हमारे बताए विधान द्वारा अपनी ब्लागिरी चमकाने के साथ साथ अपने लोक परलोक को भी सुधारते जाओ । बस तुम अपने इस जीवन मे ही मुक्ति के अधिकारी बनकर निसंदेह स्वर्ग को जाओगे। ओर हाँ, भक्तजनों के सहयोग से आश्रम का निर्माण कार्य प्रगति पर है । उसमें अपना योगदान देकर शर्मा जी से उसकी रसीद जरूर लेते जाना ।  अच्छा! चलते हैं, अब हम लोगो की समाधि का समय हो गया हैं ।"
तीनों बाबा आशीर्वाद की मुद्रा बनाए आश्रम के भीतरी भाग में बने अपने अपने वातानुकूलित कक्ष की ओर प्रस्थान कर गये ।
हरि बोल.......