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शुक्रवार, 11 जून 2010

हे पंगेच्छु ब्लागर !!!

हे पंगेच्छु ब्लागर!
तुम्हारे अंतस का ब्लागर कीट
नित्य नए पंगें का सृ्जन करता है
और करता है रूप बदल
नित्य नईं बकवास.....

नैट पर आते ही
अपने कलुषित मन
रूपी गधे पर सवार हो
प्रस्थित हो जाते हो तुम
किसी नए पंगें की खोज में....

और पंगों के नित्य नवीन
प्रयोग करके भी तुम
क्या हासिल कर पाते हो ?
महज चन्द टिप्पणियाँ!
और कुछ समानधर्मी
ब्लागरों की वाह! वाह!

किन्तु सच बताना.....
क्या तुम इन तुच्छ प्राप्तियों को
अपनी प्रयोगधर्मिता
एवं अनथक श्रम का
सही मूल्यांकन मानते हो ?

*बस यूँ ही,कविता/फविता जैसा कुछ :)