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रविवार, 24 अक्तूबर 2010

राजनीतिज्ञ---(कुछ हल्का-फुल्का)

किसी समय की बात है, एक आदमी हुआ करता था. अब यह न पूछिए कि वह कौन था और कहाँ रहता था. कथा-कहानियों में यह आवश्यक नहीं है कि कथा के नायक का नाम, पता, बाप का नाम, निवास स्थान वगैरह का इस प्रकार वर्णन किया जाए, मानो वह किसी झूठे मुकद्दमे में जज के सामने गवाही देने गया है. हाँ तो आप केवल इतना ही समझ लीजिए कि एक व्यक्ति था और एक था उसका पुत्र. एक दिन उसके दिमाग में आया कि जरा अपने बेटे की मनोवृति का तो पता चले कि आखिर उसका झुकाव है किस ओर.
लो जी, उसने अपने पुत्र की मनोवृति का झुकाव जानने के लिए उसकी अनुपस्थिति में एक बोतल शराब, नोटों की एक गड्डी, और एक भगवतगीता उसकी मेज पर धर दिए. उसका विचार था कि यदि लडके नें नोटों की गड्डी उठा ली, तो मैं समझूँगा कि उसका झुकाव कोई बडा सेठ-साहुकार बनने की ओर है अर्थात उसे धन कमाने की चिन्ता होगी. यदि उसने भगवतगीता को उठा लिया तो उसका यह अर्थ होगा कि उसकी रूचि धर्म-कर्म, आध्यात्म की ओर है. अगर कहीं उसने शराब की बोतल उठा ली तो उसका परिणाम यही निकलता है कि वह एक अवारा, ऎबी, दुराचारी व्यक्ति सिद्ध होगा. अब वो व्यक्ति रात को जब घूम फिरकर लौटा तो देखता क्या है कि उसका सपूत बगल में भगवतगीता दबाए,नोटों की गड्ढी जेब के हवाले किए और शराब की बोतल खोलकर पैग पर पैग चढाए जा रहा है. देखते ही बन्दे नें माथा पकड लिया और समझ गया कि यो सपूत आगे चलकर जरूर राजनीतिज्ञ बनेगा..
आजकल राजनीतिज्ञ बनने के लिए इन तीनों साधनों का होना अनिवार्य है. यानि कि धन, शराब और धर्म, इन तीनों का घालमेल आवश्यक है. राजनेताओं नें इसी उपाय से देश भर पर अपना आतंक तथा अधिकार जमा रखा है. र्म ईमान, प्रतिज्ञा पालन, वचन की लाज, सहानुभूति, भ्रातृत्व आदि दैवी गुणों तो वर्तमान युग की राजनीति से इस कदर उड गए हैं कि जैसे गधे के सिर से सींग. धोखा, बेईमानी, विश्वाशघात, शोषण, लूट-खसोट आदि को नए नए तथा आकर्षक और मनमोहक नाम देकर राजनीति के क्षेत्र में चालू टकसाली सिक्के बना दिया गया है.
राजनीति महारानी की जय हो!!
आज जरा हल्का-फुल्का ही झेल जीजिए. हो सकता है कि आगामी पोस्ट आपकी उम्मीद से भी बढकर भारी भरकम रहे. बिल्कुल इस नेता जी की तरह :)