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रविवार, 28 नवंबर 2010

काश ! पुस्तकें बोल पाती...........

पुस्तकों का सौभाग्य देखिए, कि कल तक जो लाईब्रेरियों में धूल फाँका करती थी, आज इस आधुनिक युग में उन्हे भी ड्राईंग रूप में स्थान मिलने लगा है. कोठी और बंगलों को तो छोडिये, अब तो एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवारों में भी कुछ सुन्दर आवरण पृ्ष्ठ और सुनहरी जिल्दों से सुसज्जित पुस्तकें करीने से शो पीस बनाकर रखने का रिवाज हो गया है. मैने ऎसी पुस्तकें अपने कईं जानकारों के यहाँ सजी धजी मुद्रा में शो-केस में लगी देखी हैं, जिन्हे छूने का भी कष्ट कोई नहीं करता. भडकीली जिल्दों से सुसज्जित बडी-बडी पुस्तकें आप वहाँ देख भर सकते हैं-----पढने का फैशन नहीं है; बस पढे-लिखे दिखने दिखाने का फैशन है. घर में बीसियों आर्ट पीस हैं तो पुस्तकें भी उन्ही की संगी साथी बन शोभा बढाती रहें, यही इन बडे घरों में इनकी सार्थकता है. घर के मालिक को न तो उनके नाम और लेखक का पता है और न उनकी विषयवस्तु से कोई परिचय है. फिर भी अपनी सौन्दर्यकृ्ति और सांस्कृ्तिक स्थिति के कारण घर में ठौर पा सकी हैं. ऎसी शोभाकारक पुस्तकें जीवन भर अछूती ही रहती हैं. बस झाडने-पौंछने के सिवा उन्हे कोई नहीं छूता, पढने की बात तो कोसों दूर है.

हमारे एक व्यापारी मित्र हैं, मैने एक बार उनके ड्राईंग रूम में करीने से सजी-धजी हू-बहू एक ही आकार-प्रकार की 20 पुस्तकें देखकर उनसे पूछ लिया कि क्या यें एक ही पुस्तक की बीस प्रतियाँ हैं या अलग-अलग पुस्तकें हैं, देखने में तो सब की सब एक जैसी लग रही हैं. उस भले आदमी नें बडे उपेक्षा भाव से जवाब दिया कि "ये किताबें इन्टीरियर डेकोरेटर नें सजाई हैं. ये भी एक तरह से आर्ट-पीस ही हैं. सिर्फ सजावट के लिए रखी गई हैं. इनटीरियर डेकोरेटर नें कह रखा है कि इनका स्थान न बदला जाए, इन्हे पढने के लिए नहीं ड्राईंगरूम की शोभा के लिए रखा गया है" . शायद वे पुस्तकें इनसाईकलोपीडिया की चमकदार जिल्दों से सजी बीस प्रतियाँ थी. बेचारा भला आदमी इनकी यथास्थिति में खलल क्यों पैदा करे.
यह सब देखकर मैं सोचने लगता हूँ कि जिस विद्याध्ययन को सर्वश्रेष्ठ ठहराया जाता है: "सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुसूत्तमम" और जिसके विषय में कहा गया है कि : "न चौरहार्य न च राजहार्य, न भ्रातृ्भाज्यं न च भारकारी"----वह पुस्तकें उत्तम नहीं रहती और भार क्यों बन जाती हैं ? खैर कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन यह तो मानना ही होगा कि पुस्तक संग्रह की चरम परिणति अच्छी नहीं होती. पुस्तक की पराकाष्ठा या परागति उसकी दुर्गति में निहित है. सचमुच यह बडे खेद का विषय है. क्या पुस्तकों को दुर्गति तक पहुँचाने के लिए ही हम पुस्तकें संकलित करते हैं.
पुस्तकों की व्यथा कथा कोई नहीं सुनता. रद्दीवाले की दुकान ही उनकी अन्तिम शरण स्थली है. दूसरी गति तो उनका नष्ट होना ही है. काश्! पुस्तकें बोल पाती, मुखर होती और घर से निकाले जाने पर अपना ज्ञान भी वे अपने साथ ले जाती---तब जाकर मानवजाति परम्परा प्राप्त ज्ञान से वंचित होकर पुस्तकों के महत्व को समझ पाती.
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