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रविवार, 14 नवंबर 2010

पठन मूर्खों की जमात

दुनिया में लकीर के फकीर स्वनामधन्य विद्वानों की कोई कमी नहीं. जहाँ-तहाँ यही लोग बिखरे पडे हैं. किसी भी शिक्षा या सिद्धान्त के तत्व में व्यवहार का जोड मिलाने के लिए ये लोग तैयार ही नहीं होते. जो किताब में लिखा है या जो गुरूओं नें बताया है, बस वही सत्य है, बाकी सब ?--प्रश्नचिन्ह!

इसी विषय में स्वामी रामकृ्ष्ण परमहँस के एक शिष्य की बडी मनोरंजक घटना याद आ रही है------स्वामी जी नें एक दिन अपने प्रवचन में कहा" सब प्राणियों में ईश्वर विद्यमान है. हमें उसका आदर करना चाहिए". बस एक शिष्य महोदय बाहर निकले तो सब प्राणियों को----गधा, घोडा, बैल, कुत्ते को भगवान समझकर नमस्कार करने लगे. इतनें में एक हाथी जो पागल हो गया था, चिंघाडता हुआ आया. उसका महावत हाथी पर ही बैठा बैठा उसे काबू में लाने की कौशिश में जुटा था. लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी. इसलिए वह चिल्ला-चिल्ला कर लोगों को आगाह कर रहा था---"बचो! भागो, भागो! हाथी पागल हो गया है!" लेकिन हमारे शिष्य महाशय क्यों भागने लगे? वे हाथ जोडकर और नतमस्तक होकर हाथी देव के आगे खडे हो गए, पर देवता नें उनकी पूजा की कोई परवाह नहीं की, ऎसी सूंड फटकारी कि वे कईं हाथ दूर जा गिरे और लहूलुहान हो गए. जब स्वामी रामकृ्ष्ण नें पूछा कि--"तुम भागे क्यूँ नहीं ? तो जवाब मिला कि "हाथी में तो ईश्वर है न, मैं उस ईश्वर के सामने से कैसे भाग सकता था ?". स्वामी जी नें मुस्कुराते हुए कहा, "पागल हाथी में जो ईश्वर था, उसकी बात तो तुमने मान ली, लेकिन उस महावत में बसा ईश्वर जो तुम्हे आगाह कर रहा था, उसकी बात क्यों नहीं मानी ?"

ऎसे ही पुस्तक कीटों की जो यहाँ एक श्रेणी पैदा हुई है, उसे "पठन मूर्ख" कहा जाता है. चाहे बेशक कितनी ही किताबें चाट डाली हों, कितने ही धर्मग्रन्थों का अध्ययन क्यूं न कर चुके हों लेकिन फिर भी कोरे के कोरे बने हुए हैं. कथनी-करनी का अन्तर देखिये कि शान्ती, प्रेम, सद्भावना, समरसता जैसे नाना प्रकार के विचार सब दिमाग में बसा रखे हैं, लेकिन उसमें इतना पक्का ताला लगा हुआ है कि कहीं गलती से भी कोई विचार प्रत्यक्ष जीवन और व्यवहार में काम न आ जाए.
दुनिया नव निर्माण करे ये मुर्दे गडे उखाड रहे हैं
नहीं समझते 'मूर्ख' अपनी जीती बाजी हार रहे हैं !!