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बुधवार, 17 नवंबर 2010

शायद वो आदत से लाचार है.........

सुबह का वक्त--घर की छत पर बैठे, पुस्तक पढते हुए सर्दियों की हल्की गुनगुनी धूप का आनन्द लिया जा रहा है. थोडी देर में पुस्तक तो खत्म हो गई, लेकिन चाहने पर भी धूप से उठकर जाने का मन न हुआ. सो, बैठे-बैठे चाय की चुस्कियों के साथ धूप का आनन्द लिया जाने लगा. अब करने को कुछ काम तो था नहीं. दिमाग जरा किताब से हटकर खाली हुआ, तो स्वभाव के अनुसार उसे सोचने की फुर्सत मिली, पर वह सोचे क्या ?
भौं, भौं शब्द नें मस्तिष्क को राह दी, नजर घुमाकर देखा---सामने गली के मोड पर एक मकान की दहलीज में कुत्ता बैठा है और जो कोई भी सडक से गुजरता है, उस पर भौंकने लगता है. भौंकना उसकी आदत जो ठहरी!
अब दिमाग का सोचना कुत्ते से जा मिला. यह क्यों भौंकता है ? इसकी यह आदत क्यों है? आखिर यह कहता क्या है ? सवाल तो बहुत से हैं, पर जवाब तो किसी एक का भी नहीं. कुत्ता मेरी भाषा नहीं जानता कि मुझे बताये और मैं उसकी जुबान नहीं जानता कि उसे समझूँ. दोनों तरफ की इस नासमझी में अन्दाज को खुल के खेलने का अवसर तो मिला, पर अन्दाज भी कुछ नये सवाल पैदा करके ही रह गया.
क्या यह कुत्ता इसलिए भौंकता है कि वो शान्ती के साथ बैठना चाहता है और लोग इधर से उधर गुजरकर उसके 'अमन' में खलल डालते हैं ? या आने-जानें वालों से वो यह खतरा महसूस करता है कि लोग उसके मालिक के घर को लूट लेंगें और इसी लिए वह उन्हे भगाने की खातिर भौंकता है. क्या उसकी निगाह में हर आदमी चोर है? कुत्ता बराबर भौंके जा रहा है----भौं! भौं! भौं! और मैं बराबर सोचे जा रहा हूँ------क्यों, क्यों, क्यों ?