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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

कुत्तों का सामाजिक विकास (व्यंग्य)

पिछले कईं दिनों से चिट्ठाजगत पर कुतों के विषय में चल रही चर्चा को देखते हुए, सोचा कि इस महान जीव के विषय में अपनी 'कुक्कुरमति' द्वारा मैने जो भी ज्ञान उपार्जित किया है,उसे आपसे सांझा कर ही लेता हूं.
                     कुत्तों का समाजिक विकास

कुत्ता वास्तव में एक ऎतिहासिक प्राणी है, किन्तु आधुनिक युग मे प्रवृत्ति के हिसाब से इस प्राणी का जितना अभूतपूर्व विकास हुआ है। उतना तो शायद मनुष्य का भी नहीं हुआ है.इंसानो के साथ रहते हुए कुछ तो अपने को कुत्ता ही नहीं समझते। उनका अपना अहंकार होता है। उनकी अपनी चाल होती है। वे आपकी तरफ़ देखेंगे तो कुछ इस तरह जैसे यह उनकी कृपा है कि वे आपको देख रहे हैं।वे कुत्तों में अपने को आर्य समझते हैं।

रंग-रूप,कद-काठी के अतिरिक्त प्रकृति के आधार पर कुतों को दो भागों में बांटा जा सकता है.

एक वो जो काटते हैं-कुतों की यह प्रजाति मुख्यत: पुलिस विभाग में पाई जाती है,जिनका अपना हि एक भिन्न प्रकार का स्वाभिमान होता है.हर रास्ता चलते प्राणी पर गुर्राना ओर अपनी ताकत का अहसास कराना ईनका मौलिक अधिकार माना जाता है.

ईश्वर की तरफ़ से प्राप्त सबसे अनूठे उपहार अपनी घ्राणशक्ति का भी सबसे अधिक उपयोग यही प्रजाति करती हैं।साधारण मनुष्य तो इनके सामने अपने आप को पूर्णत: दीन-हीन अवस्था मे महसूस करता है.खानपान के मामले मे यह प्रजाति थोडी पेटू टाईप की होती है, आप इन्हे सर्वाहारा भी कह सकते है.इनकी पाचन क्षमता बहुत ही विलक्षण होती है,क्यों कि इस पृथ्वी की ऎसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसका भक्षण करने मे ये अपने आप को असमर्थ पाते हों.
किन्तु समाजिक स्तर पर अभी यह विकासशील प्रजाति है.

दूसरे वो जो केवल भौंकते है- कुत्तों मे यह पूर्णत: विकसित प्रजाति मानी जाती है.सीमित साधनों के बावजूद् जितनी उन्नति इस प्रजाति ने की है, उतनी तो निश्चित तौर पर मनुष्य जाति ने भी नहीं की है.पहले कुते को इंसान का वफादार सेवक तथा रक्षक समझा जाता था,किन्तु शनै: शनै: इनकी 'कुत्तापंती' का ऎसा विकास हुआ कि आज इनकी रक्षा का दायित्व मनुष्य जाति को सौंपा जाता है.

इस तरह के कुत्ते मुख्यत: राजनीती में पाए जाते है.इनकी विकास क्षमता का आंकलन आप इसी बात से लगा सकतें हैं कि इनमे से कुछ तो किसी राज्य विशेष के मुख्यमन्त्री पद पर शोभायमान हो चुके हैं. वास्तव मे ऎसी अविश्वसनीय उन्नति का 'राज' केवलमात्र इनकी 'भौंकन-क्षमता' मे ही निहित है.इनकी इसी 'भौंकन कला' के वशिभूत होकर मानव जाति इनके पीछे चलने में, अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है.

किन्तु स्वभावत: ये थोडे (या अधिकतर)दम्भी एवं अहंकारी होते है., तथा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने,एवं मनुष्य जाति को उनकी हीनता का अहसास कराने हेतु समय-समय पर उन्हे प्रताडित भी करते रहते हैं.
कुतों में मुख्यत: पाया जाने वाला वफादारी नामक गुण, जिसके आधार पर कुता वास्तव में कुत्ता कहलाने का अधिकारी है, उस गुण का शनै: शनै: इनमे पूर्णत: ह्रास होता चला गया.

आज जैसे-जैसे इन्सान अपनी 'इन्सानियत'से दूर होता जा रहा है,वैसे ही इन्होने भी अपनी 'कुत्तानियत' का परित्याग कर दिया है.