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रविवार, 8 अगस्त 2010

भय और अविश्वास भरा सफर.......

पिछले सप्ताह की बात है, अचानक किसी आवश्यक कार्य से हिमाचल प्रदेश स्थित कांगडा जी जाने का कार्यक्रम बन गया.रात के समय ही हम गाडी में बैठे सफर के लिए निकल पडे. गाडी में हम कुल जमा चार लोग थे---एक मैं,एक हमारे यहाँ की नगरनिगम के पार्षद,एक व्यवसायी और चौथा ड्राईवर.हमारा ड्राईवर जो था, वो था एक मुसलमान युवक---नाम शायद जाहिद करके कुछ था.
एक तो पहाडी रास्ता ऊपर से लम्बा सफर, घुमावदार सडकें.....अब किसी किसी मोड पर तो गाडी यूँ टर्न लेती कि एकदम से प्राण हलक में आ जाते.न मालूम ये पिछले कुछ दिनों से यहाँ ब्लागजगत में देखे जा रहे अधर्मी लम्पटों के आचरण का असर था या क्या था लेकिन उस ड्राईवर को देखते हुए हमारे दिमाग में कुछ अजीब से विचार जन्म लेने लगे. वो जिस स्पीड से गाडी चला रहा था और मोड पर जिस तेजी से टर्न ले रहा था---उसे देखते हुए लगा कि आज सही सलामत घर वापसी मुश्किल है.हमने उसे कईं बार कहा भी कि भाई जरा गाडी धीरे चलाओ,लेकिन वो पट्ठा कहाँ मानने वाला था.हमारे कहने का उसपर सिर्फ इतना असर होता कि मुश्किल से 2-3 किलोमीटर तक वो गाडी कहने मुताबिक चलाता, फिर थोडी देर में ही धीरे धीरे गाडी उसी पहले वाली स्पीड में ही पहुँच जाती.अब हमारा ये हाल था कि हमें उसकी शक्ल में साक्षात यमराज के दर्शन होने लगे.
दिन भर दुनिया जहान के लोगों की जन्मपत्रियाँ बाँचते बाँचते इतना समय भी नहीं निकाल पाते कि कभी खुद की जन्मकुंडली के ग्रह-नक्षत्रों पे ही निगाह डाल लें.अपनी कुंडली देखे हुए भी शायद बरसों बीत गए होंगें.ये भी नहीं मालूम कि कहीं किसी "मारकेश" ग्रह की दशा ही न चल रही हो.अगर चलने से पहले अपनी कुंडली देख लेते तो जाने का प्रोग्राम कैंसिल न सही, कम से कम चलने से पहले "महामृ्त्युंजय" का जाप ही कर लिए होते.लेकिन अब भला क्या किया जा सकता था ?  उसकी रफ्तार देख देखकर हमें तो सचमुच भय सा लगने लगा था.मन में उल्टे सीधे विचार आ रहे थे कि अगर कहीं इसने गाडी किसी खड्ड में गिरा दी तो एक ही समयावच्छेद से तीन तीन महान आत्माओं को सदगति प्रदान करने का महापुण्यफल इसके हाथों सिद्ध हो जाएगा और साथ ही दुनिया से कुछ काफिरों को खत्म करने का सबाब भी इसे मिल जाएगा. वाह रे ड्राईवर! तेरे तो दोनों हाथों में लड्डू हैं---पुण्य भी और सबाब भी.पर शुक्र है ऊपर वाले का कि ऎसा पाक ख्याल उसके दिमाग में नहीं आया.इसका कारण कदाचित हमारे ही कुछ पापकर्म रहे होगें,जिनका भुगतान करने को उसने हमें जीवनदान दे दिया.कम से कम मुझे तो कुछ ऎसा ही लगा........
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