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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान-----:-)

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि हिन्दी ब्लागर्स को आ रही समस्यायों को देखते हुए पिछले दिनों हमने आप लोगों की सहायतार्थ "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक कुटीर उद्योग का शुभारंभ किया था। जिसके पीछे हमारा एकमात्र यही उदेश्य रहा है कि इसके जरिये हिन्दी चिट्ठाकारों को पोस्ट लेखन में लगने वाले शारीरिक एवं मानसिक श्रम तथा कीमती समय के अपव्यय से मुक्ति दिलाई जा सके। साथ ही प्रतिभा के धनी निम्न एवं मध्यमवर्गीय चिट्ठाकारों को कुछ अतिरिक्त कमाई का मौका देकन उन्हे आर्थिक संबल प्रदान किया जा सके। प्रभु की कृ्पा एवं आप लोगों के योगदान से कुछ हद तक हम इन दोनों ही उदेश्यों की पूर्ती में सफल होते जा रहे हैं। यदि आप लोगों का सहयोग इसी प्रकार मिलता रहा तो निकट भविष्य में ये आपका अपना "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" सफलता के नित नये आयाम छूता चला जाएगा----ऎसा हमारी अन्तरात्मा का कहना है, और कहते हैं कि आत्मा कभी झूठ नहीं बोलती :)
जैसा कि हमने प्रारम्भ में ही कहा था कि आप लोगों को प्रेरित करने के लिए, इस संस्थान की अमूल्य सेवाएं लेने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अनुभवों को आप लोगों से साँझा करते रहेंगें। आज  
हमारे सम्मानीय ग्राहक श्री राज भाटिया जी इस संस्थान से जुडने के पश्चात के अपने अनुभवों को आप लोगों से बाँटने के उदेश्य से हमारे बीच उपस्थित हुए हैं। आईये उन्ही से जानते हैं कि हमारी सेवाऎँ लेने से उनके ब्लागिंग जीवन पर कैसा प्रभाव रहा:--------

भाटिया जी उवाच:- पहले मैं भी आप ही की तरह बहुत परेशान रहा करता था। कुछ नया लिखने के लिए दिमाग में आयडिया ही नहीं आ पाता था। मैने बहुत से उपाय किए जैसे कि हर रोज सुबह उठकर पहले तो नियमित रूप से "सरस्वती चालीसा" का पाठ करना। लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं होता दिखाई दिया तो ये सोचकर छोड दिया कि जितना समय रोज देवी सरस्वती को मनाने में लगता है, उतने समय में तो मैं दस ब्लागों पर जाकर टिप्पणी कर सकता हूँ---जिसका कि मुझे कुछ फल भी मिलेगा। उसके बाद मैने कुछ दिनों तक हर रोज दूध में "बादाम रोगन" डालकर पीना शुरू किया। लेकिन उससे भी फायदा तो क्या खाक होना था, उल्टे इस मँहगें बादाम रोगन नें हाथ जरूर तंग कर दिया। जब मैं हर ओर से निराश परेशान हो चुका था ओर ब्लागिंग छोडने का पूरी तरह से मन बना चुका था कि तभी अचानक मुझे " चिट्ठाकार सेवा संस्थान" के बारे में पता चला। सच मानिये, जिस दिन से मैने "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ली हैं तो मानो मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई। अब न तो पोस्ट लिखने का कोई झंझट ओर न ही कैसी भी कोई परेशानी। अब मैं आराम से अपना सारा समय दूसरे के चिट्ठों को पढने ओर उन पर टिप्पणियाँ करने में लगाता हूँ। बदले में मुझे मिलता है भरपूर मानसिक आराम ओर अपने ब्लाग पर ढेरों टिप्पणियाँ। मैं तो कहता हूँ कि अगर आप भी अपनी ब्लागिंग लाईफ को सुधारना चाहते हैं तो आज ही "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ले लीजिए------ओर मेरी तरह आराम से मजे करिए।

अब मिलते हैं हमारे अगले सम्मानीय ग्राहक श्री समीर लाल "उडनतश्तरी" जी से। जानते हैं कि चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान की सेवाऎं लेने से उनके ब्लागिंग जीवन में क्या प्रभाव पडा । चलिए छोडिए....बहुत हो गया, इनके अनुभव फिर किसी ओर दिन सुन लेंगें :-)

विशेष सूचना:- बहुत जल्द ही संस्थान द्वारा काव्य,लेख,कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि रचनाओं के निर्माण हेतु श्रमजीवी विद्वानों, कवियों,गजलकारों,कार्टूनिस्टों की ठेके पर भर्ती हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा। इच्छुक प्रार्थी आवेदन हेतु तैयार रहें......:-)
लेबल:- "फाग के रंग" :-)

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान............

जैसा कि पिछली पोस्ट में इस विषय पर विचार हो रहा था कि नियमित रूप से ब्लाग लिखना कितना श्रमसाध्य कार्य है। एक ओर यहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए रोज रोज नये नये विषयों को खोजने, फिर उन पर कुछ अच्छा, बेहतरीन सा लिखने के लिए सामग्री जुटाने की चिन्ता, वहीं दूसरी ओर मान लीजिए आप लेखन में दक्ष हैं तो भी घर परिवार,नौकरी इत्यादि के चलते ब्लाग लेखन को सही मात्रा में समय न दे पाने की परेशानी।समय की कमी के चलते न तो आप सही अन्तराल में पोस्ट लिख पाते हैं ओर न ही दूसरे के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी ही कर पाते हैं। अगर कोई पोस्ट ही नहीं लिख पाए तो ब्लाग बनाने का भी क्या उदेश्य ओर अगर पोस्ट भी लिख दी लेकिन समय की मजबूरी वश दूसरों के ब्लाग पर टिप्पणी न की तो भी लिखने का क्या फायदा----यूँ ही पढने तो कोई आने से रहा:)। यानि की टोटली टैन्शन!!!!
लेकिन अब आपको चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं। समझिए कि अब आपको पोस्ट लिखने के झंझट से मुक्ति मिल गई। क्यों कि आप लोगों की सेवा,सहयोग तथा हिन्दी भाषा के प्रचार,प्रसार की भावना लेकर हमने "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक संस्था का निर्माण किया है।जिसमें मूर्ख बुद्धिजीवियों,पाश्चात्यबुद्धि ज्ञान-विज्ञान के पुरोधा, नामी,बेनामी कवि,गजलकार और श्रमजीवी विद्वानों की भर्ती की गई है।जो आप जैसे परेशान ग्राहकों(ब्लागर्स) की माँग के अनुसार काव्य,लेख(सामयिक/असामयिक),कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि इत्यादि रचनाओं का निर्माण कर के देंगें।
सभी वर्गों विशेषतय: निम्न एवं मध्यमवर्गीय ब्लागरों का खास ध्यान रखते हुए एक बहुत ही साधारण सी "मूल्य दर" निश्चित की गई है, जिससे कि सभी लोग लाभ उठा सकें।
मूल्य सूची:---
1. कविता----मूल्य 100 रूपये
2.गजल----मूल्य पचास रूपये प्रति शेर के हिसाब से
3.कहानी---250 रूपये
4.कहानी(धारावाहिक)----200 रूपये प्रति किस्त के हिसाब से(न्यूतम 3 किस्तें), 5 किस्तों की कहानी पर कुल मूल्य पर 15% की छूट दी जाएगी।
5.सामयिक लेख----कीमत विषय अनुसार निश्चित की जाएगी ।
6 हास्य-व्यंग्य----मूल्य 250 रूपये
7 चुटकुले/लतीफे----मूल्य प्रति चुटकुला 20 रूपये (एक साथ 10 चुटकुलों के साथ में 1 पहेली फ्री)


गर्मियों में लेबर सस्ती हो जाने के कारण ग्राहकों को भी उस समय रचना बनवाने पर साढे 13 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
हमारे ब्लागर बन्धु उपरोक्त सूची को पढकर स्वयं ही निश्चय कर लें कि दरें कितनी वाजिब रखी गईं हैं। अनमोल रचनाओं के लिए आपसे कौडियों में कीमत ली जा रही है। चलिए अब जरा चन्द नियम एवं शर्तों को भी समझ लिया जाए।
 नियम एवं शर्ते:--
1.किसी भी तरह का पंगा लेखन का कार्य स्वीकार नहीं किया जाएगा।
2.रचना निर्मित हो जाने पर उसे ग्राहक को स्वीकार करना ही होगा। उसके निरर्थक होने, पसंद न आने या भाव को व्यक्त न कर सकने इत्यादि किसी भी कारण से यदि ग्राहक उसे अस्वीकार करता है तो भी ग्राहक उसका पूरा पारिश्रमिक देनदार होगा।
3.बिकी हुई रचना किसी भी कीमत पर न तो बदली जाएगी ओर न ही उसका मूल्य वापिस किया जाएगा।
4.रचनाएं केवल हिन्दी भाषा में होगी ओर देवनागिरी लिपि में लिखी जाएंगीं।
5.आपको किसी भी रचना को सिर्फ एक ही चिट्ठे पर छापने का अधिकार होगा। यदि एक ही रचना को आप अपने विभिन्न चिट्ठों पर छापते हैं तो कीमत प्रति चिट्ठे के हिसाब से वसूल की जाएगी।
6.किसी भी तरह के वाद-विवाद की स्थिति में हमारा स्वयं का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।


अन्त में मैं सभी लेखक/कवि/गजलकार/कार्टूनिस्ट मित्रों से भी यह निवेदन करना चाहूँगा कि अपने बेकार समय को "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" के द्वारा उपयोग में लाएं। हमारा विचार चिट्ठाकारी विधा को "कोटेज इन्ड्स्ट्री" के रूप में विकसित करने का है। इस गृ्ह उद्योग से न केवल बहुत से ज्ञान और समय की कमी से पीडित चिट्ठाकारों को मदद मिलेगी बल्कि आप लोगों की आर्थिक दशा में भी सुधार होगा। साथ ही हिन्दी भाषा के प्रचार विस्तार में भी उल्लेखनीय मदद मिलेगी। जिससे कि आगे चलकर हिन्दी चिट्ठासंसार अधिकाधिक स्थूल होता जाएगा।
आशा है कि आप लोग इस सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने देंगें :)
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निकट भविष्य में इस संस्थान से जुडने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अमूल्य अनुभवों को आप सब से साँझा करते रहेंगें :)