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शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

आप क्यूँ नहीं सोचते ?

पिछले दो दिनों से तबियत कुछ नासाज चल रही है. इसलिए नैट से जरा दूरी बनी रही. आज आए तो ही मालूम चल पाया कि इन दो दिनों में पुल से कितना पानी बह चुका है. खैर, बहना तो पानी का स्वभाव ठहरा. वो तो बहेगा ही. आप चाहे लाख जतन कर लें, चाहे कैसे भी बन्ध लगा लें, लेकिन वो फिर भी अपने बहने का रास्ता खोज ही लेगा. बहना तो उसका धर्म ठहरा तो वो अपना धर्म निभाएगा ही, चाहे मार्ग कैसा भी जटिलताओं भरा क्यों न हो. कोई इन्सान थोडे ही है कि अपने धर्म को लात मार बैठे.  
पता नहीं आपने कभी इस बारे में सोचा है या नहीं, पर देखा जाए तो बात वास्तव में सोचने की ही है. धर्म के बारे में आपने कभी तो सोचा होगा. आत्मा या परमात्मा भी कभी अपके सोचने का विषय रहा होगा. जीवन-मृत्यु, अज्ञान, पाखंड, विश्वास-अन्धविश्वास जैसी चीजों नें भी कभी आपको सोचने के लिए मजबूर किया होगा. मतलब यह कि और भी कईं विषय होंगें, जिनके बारे में आपने सोचा होगा-----चाहे मन मारे ही सोचा हो.
लेकिन मैं तो कहता हूँ कि इतना कुछ सोचने पर भी आपने कुछ नहीं सोचा, क्योंकि जो कुछ भी आपने सोचा, वह सोचा न सोचा एक बराबर है. इसलिए कि आपने शायद यह कभी नहीं सोचा कि अपने बारे में भी कभी फुरसत से सोचा जाये, कभी सोचा भी होगा तो उतनी गम्भीरता से नहीं सोचा होगा. क्यों कि अपने बारे में एक बार भी तनिक गम्भीरता से सोचा होता तो शायद जीवन में फिर दोबारा से सोचने की कभी नौबत ही न आती. इसी सिलसिले में एक कहानी याद आ गई. एक बार गुरू द्रोणाचार्य नें पांडव और कौरवादि अपने शिष्यों की धनुर्विद्या की परीक्षा लेने के लिए सामने वृक्ष पर एक मिट्टी का पक्षी रख दिया और अपने सभी शिष्यों को प्रत्यंचा चढाकर निशाना साधने का आदेश देकर पूछा कि तुम्हे सामने कौन-कौन सी वस्तुएँ दिखाई दे रही हैं. किसी नें पेड कहा, तो किसी नें पत्ते, आकाश आदि अन्य सभी चीजों का ब्यौरा सुना दिया. लेकिन जब अर्जुन से पूछा गया तो उसने बताया कि मुझे तो सिर्फ पक्षी ही दिखाई दे रहा है. आप सोचकर देखें तो आपको पता चल जाएगा कि अर्जुन का वास्तविक अभिप्राय यह था-----" मैं देख रहा हूँ कि मुझे क्या देखते रहना है" गर्ज यह कि जो कुछ हम सोचते हैं, उसे सोचना कहा जाए तो वास्तविकता में वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्योंकि गाय भैंसों की जुगाली से लेकर स्टीफन हाकिंस जैसों और अणु-परमाणु वगैरह वगैरह की अदभुतता सोचते हुए भी क्या कभी आप अपने बारे में सोचते हैं?--नहीं, बिल्कुल नहीं सोचते होगें. आँखिन सबको देखिया, आँखि न देखी जाये !
मेरा मानना है कि जहाँ इन्सान के सामने उसके विचारों के खोखलेपन का प्रश्न तनकर कुतुबमीनार की तरह खडा हो जाता है, वहाँ सोचने और नोचने की शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है. लेकिन मेरा विषय इस प्रकार के सोचने से सम्बन्धित नहीं है. अज्ञानी कहे जाने पर बाहर से उसका विरोध करते हुए भी यदि आप अपने भीतर एक अज्ञानी की हरकतों का आभास पाकर दार्शनिक मुद्रा अपनायें और यह सोचने की चेष्टा करें कि वास्तव में आप अज्ञानी हैं या नहीं, तब भी वह मेरे विषय से बाहर है.
वास्तविकता यह है कि हम आप सभी सोचते हैं, किसी गधे को भी एक विशेष दृष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य की सराहना करने के बारे में सोचते रहने से आप एक दार्शनिक कहला सकते हैं. पर मेरा संकेत इस सोचने की ओर नहीं है. ईश्वर की कृपा से आप अच्छे खासे दो पैरों वाले मनुष्य है------डार्विन के अनुसार बन्दर के एकदम "नूतनतम संस्करण"---और फिर मनुष्य होने के नाते आपके पास एक सिर भी तो है, ये अलग बात है कि उस सिर में विधाता नें कुछ भरा हो या न हो. वैसे इस दिशा में भी सोचना लाजिमी है, चाहे फिर आपका सोचना किसी की बडी नाक से टक्कर खा-खाकर पीछे उछलता रहे, चाहे कहीं किसी के लिखे हुए पर ही क्यों न अटक जाए. जब तक आप बे-सिर-पैर नहीं हैं और जब तक अपने जैसे सिर-पैर वालों में रहने का आपको जन्मसिद्ध अधिकार है, तबतक यह सब चलता ही रहेगा, लेकिन इतना सोचने पर भी कुछ सोचना बाकी रह जाता है. जैसे यह पोस्ट पढकर किसी अज्ञानी पर तरस खाकर आपका सोचना लाजिमी है. इस पर यदि आपको यह सोच हो जाये कि आप भी यदि "समझदारी" के भूत को अपने वश में कर लेते तो हम जैसों से कहीं अधिक समझदार होते, तो भी आश्चर्य के लिए गुंजाईश बाकी न रहती.
हाँ तो मैं कह रहा था कि इतना सब सोच लेने पर भी कुछ सोचना हमेशा बाकी रह जाता है. आप पूछेंगें कैसे ? पोस्ट पढते-पढते, ध्यान में न रहने  के कारण अगर कहीं पूछना भूल भी जाएं तो भी मैं कहूँगा कि सोचते समय आँख और कान बन्द रक्खे जाएं तो आपको खुद ब खुद समझ में आ जाएगा कि जिसे आप आजतक सोचना समझ रहे थे, दरअसल वो सोच थी ही नहीं, सोचने का सिर्फ एक नाटक भर था. असली सोच तो इससे आगे शुरू होती है. जिसके बारे में हम आजतक कभी सोच ही नहीं पाये.
चलिए छोडिये, आप भी सोचेंगें कि कहां की सोच बैठे. लेकिन बात हकीकत में सोचने की ही है. चाहे सोचकर आप बेशक उसे अनसोचा कर दें. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में सोचा है, वह किसी "सोचनीय" स्थिति वाले व्यक्ति के बारे में सोचकर ही. लेकिन अब वह ख्यालों से ओझ हो चला है, इसलिए आगे क्या लिखूँ यह सोचने लगा तो फिर सोचता ही रह जाऊँगा. अब बताईये, आपने क्या सोचा ? :-)
चलते चलते:--
इस पोस्ट को लिखने के बाद जब हमने अपने एक मित्र को पढवाया और उनसे इसके बारे में जानना चाहा कि उन्हे ये पोस्ट कैसी लगी, तो मियाँ झट से बोल उठे---" अजी पोस्ट क्या है, निरा एकदम से कूडा है". यहाँ हमसे तनिक गलती हो गई, क्योंकि वो मित्र ठहरे महागम्भीर प्रकृ्ति वाले जीव. उन्हे ये नहीं मालूम कि ब्लागिंग में "ब्रिलियन्ट नोन्सेन्स" जैसी शैली में कुछ हास्य वगैरह भी लिखा जाता है. :-)

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

ब्लागर एकता जिन्दाबाद….."जिन्दाबाद-जिन्दाबाद”


सचमुच लोगों का भी कोई हाल नहीं है.देखिए अन्तर्र्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन हो गया, जिसमें हिन्दी ब्लागर संगठन बनाने जैसा कितना शानदार च जानदार सुझाव भी दे दिया गया, जिसका कि अधिकतर भई लोग समर्थन भी कर चुके हैं, लेकिन इत्ते दिन बीतने के बाद भी अभी तक इस सुझाव को असली जामा ही नहीं पहनाया जा रहा. लोग-बाग कितने जाहिल और नाकारा हो गये हैं. मजे ले लेकर बातें खूब करते हैं, पढते हैं, वाह वाह करते हैं लेकिन ब्लागर संगठन की शुरूआत करने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता. भला क्यों ?
अरे भाई!एक विचार नें जन्म लिया है और आप ही लोग उसका भरपूर समर्थन भी कर रहे है तो फिर काहे नहीं उस विचार को मूर्तरूप दे रहे.भाई यह कोई गैरकानूनी काम तो है नहीं कि डरा जाए.मेरे विचार से भारतीय कानून में ऎसी कोई धारा भी नहीं है कि कोई संगठन खडा करने पर किसी दंड का प्रावधान हो,ओर न ही इसमें गूगल-वूगल या चिट्ठाजगत वगैरह किसी को भी कोई ऎतराज होना चाहिए,तो फिर अभी तक ऎसा कोई संगठन खडा क्यों नहीं किया जा सका. अरे भाई! सिर्फ सोचने भर से कुछ नहीं हुआ करता. खाली-पीली बौद्धिक-वैचारिक जुगाली से यदि यक्ष प्रश्नों का हल हुआ करता तो अब तक इस हिन्दी ब्लागजगत का क्या पूरे देश का कायापलट न हो चुका होता.
हमें इस ब्लागिंग के अखाडे में आए हुए शायद दो बरस के करीब हो चुके हैं,लेकिन सोच रहे हैं कि इस तरफ अब तक हमारा ध्यान क्यूं नहीं गया.वैसे हमें याद आ रहा है कि बहुत पहले ताऊ द्वारा जब हमारा साक्षात्कार लिया गया था,उस समय ऎसे ही एक विचार नें हमारे मन में भी जन्म लिया था..लेकिन वो सिर्फ एक विचार भर था...एक ऎसा विचार जिसका जन्म शब्दों के इस अनन्त ब्राह्मंड में किसी क्षूद्र तारे की भान्ती सिर्फ नष्ट होने के लिए ही हुआ था.उसके बाद से हमने नहीं देखा कि यहाँ पुन:उस विचार को किसी नें जन्म दिया हो...मैं समझ नहीं पा रहा कि अब तक किसी द्वारा इस विषय पर गौर क्यूं नहीं किया गया ?न्यूटन से पहले पेड से फल गिरने पर भी किसी नें गौर नहीं किया था. आदिकाल से फल पेडों से जमीन पर ही तो गिर रहे थे,लेकिन किसी का उस तरफ ध्यान नहीं गया....मानो संसार जन्म-जन्मांतर से न्यूटन का ही इन्तजार कर रहा था कि कब वो आएं ओर पेड से फल गिरते देखकर दुनिया को गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त दें........
चलिए आगे बढने से पहले एक बात कहना चाहते हैं,कि भईया हम अगर किसी से बडे नहीं तो छोटे भी हरगिज नहीं हैं.बस आप हमें अपने समकक्ष ही समझ लीजिए. सो, उस लिहाज से हम एक मशविरा देना चाह रहे है. वैसे भी दुनिया में कौन किसी को डालर,पौंड दे रहा है,ले देकर सबके पास ये एक मशविरा ही तो हैं बाँटने के लिए. तो हम ये कह रहे थे कि संगठन खडा करने में ही बुद्धिमानी है और अब इसमें तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए.लेकिन एक छोटी सी शंका मन में जन्म ले रही है----वो ये कि संगठन बनने के बाद में चर्चा होगी कि प्रधान पद का चुनाव कैसे हो. प्रधान कौन बने? इस पर मतभेद होंगें.विद्वान लोग खेमों में बटेंगें.आपस में कीचड उछालेंगें. वाद विवाद होगा.इन सबसे अच्छा है कि प्रधान पद के लिए पहले से ही ऎसे किसी ब्लागर का चुनाव कर लिया जाए जो कि बृ्हस्पति के सदृ्श विद्वान,शुक्राचार्य की तरह चतुर,सनकादिक के जैसे मायाहीन, चाणक्य की तरह कूटनीतिज्ञ और भूमी के जैसे सहनशील हो----जिससे कि इस मंच को एक सुदृ्ड आधार प्रदान किया जा सके और कल को यह मुद्दा आपसी नौंक-झौंक, सिर फुटौव्वल का विषय न बन सके. (वैसे कुछ लोग ये भी कह सकते हैं कि यदि ऎसा कोई व्यक्ति आज की दुनिया में होता तो यहाँ ब्लागिंग में क्या वो झक मारने के लिए आता:))
खैर जो भी है,इसे सिर्फ हमारा सुझाव ही माना जाए, उस पर अमल करना न करना आप लोगों की मर्जी पर है.लेकिन इतना जरूर कहे देते है कि ये ऎसा सुझाव हैं,जिसमें प्रतिवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं है......सो,हमारे विचार से तो इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया जाना चाहिए.
writers_block वैसे हमारे पास संगठन की रूपरेखा के बारे में भी एक सुझाव है,चलिए वो भी बताए देते हैं,तनिक ध्यान से पढिए.....तो हमारे विचार से इस संगठन में कुछ अलग अलग विभाग/समूह भी बनाए जाने चाहिए......जैसे कि सरकार में होता है रेलवे विभाग, बिजली विभाग, दूरसंचार विभाग वगैरह वगैरह. वैसे ही यहाँ भी कुछ विभाग या फिर छोटे छोटे उपसंगठन बनाए जाने चाहिए,जिनके अपने अपने अध्यक्ष हों,जो कि अपने अपने समूह की जिम्मेदारी संभालें.......ओर वें सभी समूहाध्यक्ष आगे संगठन संचालक के प्रति जवाबदेय हों.मसलन एक उपसंगठन खडा किया जाए "दंगेच्छु हिन्दी ब्लागर्स संगठन" नाम से, जिसका कार्य हिन्दुस्तान के तमाम फसादी, दंगेच्छु, धर्मांध, उठाईगिरे ब्लागर्स को एक साथ एक मंच पर लाना हो.अगर कहीं इस समूह का कोई सदस्य कभी किसी दंगे-फसाद मे पकडा जाए,किसी चोरी चकारी,धोखाधडी के केस मे पुलिस अन्दर कर दे तो समूह के सभी सदस्य एक जगह इकठा हो कर पुलिस के खिलाफ हाय! हाय! मुर्दाबाद! के नारे लगाकर या पुतले फूँक अभियान चलाकर कानून पर सामूहिक दबाव बनाएं ताकि उस "हिन्दी सेवी ब्लागर"को कानून के क्रूर पंजों से मुक्त कराया जा सके.ब्लागर एकता जिन्दाबाद्!
ऎसे ही कुछेक ओर समूह बनाए जा सकते हैं,जैसे कि "राष्ट्रीय सरकारी कर्मचारी ब्लागर्स संगठन"जिसका कार्य होगा समय समय पर संसद भवन के सामने सरकार के विरूद्ध नारे लगाना,ताकि सरकार को विवश किया जा सके कि वो "रिश्वत लेने" को कानूनन वैध घोषित करे.साथ ही सरकारी कर्मचरियों के कार्यकाल में आने वाली अन्य विभिन्न प्रकार की दिक्कत,परेशानियों को दूर करने हेतु कुछ सामूहिक प्रयास भी समय समय पर किए जाते रहें.
"सम्मान जुटाऊ ब्लागर्स संगठन".इस समूह का कार्य होगा कि जब भी संगठन के किसी सदस्य के यहाँ कोई प्रभात फेरी, जागरण, कथा कीर्तन या फिर कोई जलूस वगैरह निकालने का प्रोग्राम हो तो ब्लागर्स की भीड जुटाकर अपने मोहल्ले,शहर के लोगों के सामने अपनी पहचान के झंडे गाडें जा सकें. अडोसी-पडोसी, नाते-रिश्तेदार भी देखकर दंग रह जाएं कि बन्दे का कितना भारी रसूख है.कितनी दूर दूर तक इनकी जान पहचान है........
हाँ तो भाईयो!अब हमने तो अपने सुझाव आप लोगों के सामने रख दिए.......वैसे सुझाव तो हमारे पास ओर भी बहुत सारे हैं,बिल्कुल थोक के भाव.लेकिन अभी इतने से ही काम चला लीजिए.पहले तो ये देखना बाकी हैं कि आप लोग इन सुझावों को असली जामा पहनाते भी हैं कि नहीं....खैर, हमरा काम तो था मशविरा देना,मानना न मानना आप की मर्जी......राम जी भली करें.बोलिए--"ब्लागर एकता जिन्दाबाद":)

ज्ञानवाणी:-बाबा लीडरानन्द जी कह गए हैं कि दुनिया को बदलने की बडी बडी बातें करने वाले, लम्बी-लम्बी हाँकने वाले यदि पहले खुद में बदलाव ला सकें तो शायद ये दुनिया खुद-ब-खुद बदल जाए.......बिना किसी संगठन के !!!

रविवार, 16 मई 2010

इस सर्वसुलभ माध्यम का उपयोग निज एवं समाज के विकास के लिए किया जाए तो ही बेहतर है!!!!!!

ये ठीक है कि यहाँ ब्लागजगत में आज बहुत से ब्लागर इस प्रकार की शैली को अपना रहे हैं, जो आपस में विद्वेष और कटुता बढा रही है और लोगों को अच्छाई की अपेक्षा बुराई की ओर ले जा रही है। लेकिन इसमें भी मैं दोष पढने वाले व्यक्ति का ही अधिक मानता हूँ। क्यों कि आज व्यक्ति का दृ्ष्टिकोण ही इस प्रकार की भाषा को चाहता है। यह तो संसार है, इसमें अच्छा-बुरा सब कुछ है। वास्तव में देखा जाए तो अच्छा और बुरा कुछ भी नहीं। किसी चीज को अच्छे और बुरे की पदवी भी हमारा दृ्ष्टिकोण ही देता है। हम यहाँ हैं तो हमें अपनी रूचि के अनुसार विषयवस्तु और विचार को चुनना है। हमारी रूचि, हमारा दृ्ष्टिकोण ऎसा होना चाहिए कि जिससे हम उन्ही बातों को ग्रहण कर सकें जिनसें हमारा मन, बुद्धि, जीवन, समाज एवं राष्ट्र का विकास हो सके।
देखा जाए तो ब्लागिंग आज के युग में ज्ञान बढाने का एक सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम साधन बन चुका हैं। हमें चाहिए कि हम इसका अधिकाधिक लाभ उठा सकें, इसकी सार्थकता को समझने का प्रयास करें ताकि अपने एवं समाज के विकास में महती भूमिका अता कर सकें न कि सिर्फ फालतू के विवादों को जन्म देकर अपनी बेशकीमती उर्जा एवं अमूल्य समय को यूँ व्यर्थ में नष्ट किया जाए।
गूगल कृ्पा भई ब्लाग बनाया, लोग कहैं यह मेरा है
न यह तेरा न यह मेरा,  चिडिया रैन बसेरा है!!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

पता नहीं मन की ये दुविधा कब पीछा छोडेगी

मालूम नहीं क्यों, कभी कभी तो ऎसा लगने लगता है कि ये ब्लागिंग,फ्लागिंग कुछ नहीं--सब फालतू की टन्टेबाजी है--ऎसा लगता है कि अपनी कोई खुशी, कोई दुख, कोई जानकारी, मन में आया जरा सा कोई विचार अपने तक ही सीमित न रख पाना और उसे झट से एक पोस्ट के जरिये ठेल देना बिल्कुल एक भोले बालकपन का सा काम है। जब कभी अपनी किसी पोस्ट को इस दृ्ष्टि से देखता हूँ तो मानो ब्लागिंग के सारे उत्साह पर ठंडा पानी पड जाता है।
फिर कभी दूसरी विचारधारा बल पकडती है तो उस समय लगता है कि जैसे अपने मन के विचारों,भावों को प्रकट कर पाना हरेक के बस की बात नहीं होती; और आसान भी नहीं होता। इसलिए जो भी कोई इन्सान अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट कर सके, कि उससे चन्द दूसरे अन्य लोग भी अपने को जुडा समझें, तो उसे औरों से विलक्षण और कुछ समर्थ ही समझा जाना चाहिए। इस विचारधारा के वशीभूत होकर बस खुद में एक तीसमारखाँ सी अनुभूति होने लगती है ओर हम झट से कोई नई पोस्ट लिखने बैठ जाते हैं  :)  
लेकिन एक ऎसी समस्या है, जिसने कि पिछले कईं दिनों से हमारा जीना हराम कर रखा है। वो यूँ कि कभी कभी ऎसा होता है कि जिस पोस्ट को हमने बडे चाव से लिखा। जब पोस्ट की तो खुद के साथ साथ चार लोगों को भी पसंद आई लेकिन कुछ दिन बाद जब दोबारा से अपनी उस पोस्ट को पढता हूँ तो ऎसा प्रतीत होने लगता है कि मानो इसे लिखकर मैने केवल समय का अपव्यय ही किया है। मन में ऎसे  विचार आने लगते हैं कि "क्या यार्! ये सब भी कोई लिखने की चीज है। लिखना ही था तो कुछ तो ढंग का लिखना चाहिए था"।
मेरे मन की यह दुविधा पता नहीं मेरा इस ब्लागिंग में पीछा कब छोडेगी। ऎसा लगने लगा है कि जैसे मेरे अन्दर कोई दो धुर विरोधी व्यक्तित्व विद्यमान हैं। जो चीज एक को पसन्द है, वो दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती। इसी कशमकश के चलते आज तक हमारे इस ब्लाग का सक्रियता क्रमाँक 250-300 की संख्या पर ही अटका हुआ है----वर्ना तो समीर लाल जी और ताऊ जी, दोनों को न जाने कब का पछाड चुके होते(सिर्फ चिट्ठा सक्रियता क्रमांक के मामले में) हा हा हा...। बिल्कुल सीरियसली कह रहे हैं---मजाक मत समझिएगा :-)
हाँ तो हम कह रहे थे कि हमारे मन की ये दुविधा ही है, जो कि हमें चिट्ठाकारी के विजयरथ पर आरूढ नहीं होने दे रही । हमारी हालत तो रात के चौकीदार सी हो चुकी है---जो रात भर निरन्तर चलने के बाद भी कही नहीं पहुँच पाता, उसकी यात्रा सिर्फ उस मोहल्ले तक ही सीमित रहती है।
राम जाने!! पता नहीं ये दुविधा कब हमारा पीछा छोडेगी, या पता नहीं छोडेगी भी कि नहीं----डरते हैं, कहीं कोई साईकैट्रिक वाला मामला न हो जाए :-)

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान-----:-)

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि हिन्दी ब्लागर्स को आ रही समस्यायों को देखते हुए पिछले दिनों हमने आप लोगों की सहायतार्थ "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक कुटीर उद्योग का शुभारंभ किया था। जिसके पीछे हमारा एकमात्र यही उदेश्य रहा है कि इसके जरिये हिन्दी चिट्ठाकारों को पोस्ट लेखन में लगने वाले शारीरिक एवं मानसिक श्रम तथा कीमती समय के अपव्यय से मुक्ति दिलाई जा सके। साथ ही प्रतिभा के धनी निम्न एवं मध्यमवर्गीय चिट्ठाकारों को कुछ अतिरिक्त कमाई का मौका देकन उन्हे आर्थिक संबल प्रदान किया जा सके। प्रभु की कृ्पा एवं आप लोगों के योगदान से कुछ हद तक हम इन दोनों ही उदेश्यों की पूर्ती में सफल होते जा रहे हैं। यदि आप लोगों का सहयोग इसी प्रकार मिलता रहा तो निकट भविष्य में ये आपका अपना "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" सफलता के नित नये आयाम छूता चला जाएगा----ऎसा हमारी अन्तरात्मा का कहना है, और कहते हैं कि आत्मा कभी झूठ नहीं बोलती :)
जैसा कि हमने प्रारम्भ में ही कहा था कि आप लोगों को प्रेरित करने के लिए, इस संस्थान की अमूल्य सेवाएं लेने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अनुभवों को आप लोगों से साँझा करते रहेंगें। आज  
हमारे सम्मानीय ग्राहक श्री राज भाटिया जी इस संस्थान से जुडने के पश्चात के अपने अनुभवों को आप लोगों से बाँटने के उदेश्य से हमारे बीच उपस्थित हुए हैं। आईये उन्ही से जानते हैं कि हमारी सेवाऎँ लेने से उनके ब्लागिंग जीवन पर कैसा प्रभाव रहा:--------

भाटिया जी उवाच:- पहले मैं भी आप ही की तरह बहुत परेशान रहा करता था। कुछ नया लिखने के लिए दिमाग में आयडिया ही नहीं आ पाता था। मैने बहुत से उपाय किए जैसे कि हर रोज सुबह उठकर पहले तो नियमित रूप से "सरस्वती चालीसा" का पाठ करना। लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं होता दिखाई दिया तो ये सोचकर छोड दिया कि जितना समय रोज देवी सरस्वती को मनाने में लगता है, उतने समय में तो मैं दस ब्लागों पर जाकर टिप्पणी कर सकता हूँ---जिसका कि मुझे कुछ फल भी मिलेगा। उसके बाद मैने कुछ दिनों तक हर रोज दूध में "बादाम रोगन" डालकर पीना शुरू किया। लेकिन उससे भी फायदा तो क्या खाक होना था, उल्टे इस मँहगें बादाम रोगन नें हाथ जरूर तंग कर दिया। जब मैं हर ओर से निराश परेशान हो चुका था ओर ब्लागिंग छोडने का पूरी तरह से मन बना चुका था कि तभी अचानक मुझे " चिट्ठाकार सेवा संस्थान" के बारे में पता चला। सच मानिये, जिस दिन से मैने "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ली हैं तो मानो मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई। अब न तो पोस्ट लिखने का कोई झंझट ओर न ही कैसी भी कोई परेशानी। अब मैं आराम से अपना सारा समय दूसरे के चिट्ठों को पढने ओर उन पर टिप्पणियाँ करने में लगाता हूँ। बदले में मुझे मिलता है भरपूर मानसिक आराम ओर अपने ब्लाग पर ढेरों टिप्पणियाँ। मैं तो कहता हूँ कि अगर आप भी अपनी ब्लागिंग लाईफ को सुधारना चाहते हैं तो आज ही "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ले लीजिए------ओर मेरी तरह आराम से मजे करिए।

अब मिलते हैं हमारे अगले सम्मानीय ग्राहक श्री समीर लाल "उडनतश्तरी" जी से। जानते हैं कि चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान की सेवाऎं लेने से उनके ब्लागिंग जीवन में क्या प्रभाव पडा । चलिए छोडिए....बहुत हो गया, इनके अनुभव फिर किसी ओर दिन सुन लेंगें :-)

विशेष सूचना:- बहुत जल्द ही संस्थान द्वारा काव्य,लेख,कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि रचनाओं के निर्माण हेतु श्रमजीवी विद्वानों, कवियों,गजलकारों,कार्टूनिस्टों की ठेके पर भर्ती हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा। इच्छुक प्रार्थी आवेदन हेतु तैयार रहें......:-)
लेबल:- "फाग के रंग" :-)

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

आखिर हम लोग ब्लागिंग किस लिए कर रहे हैं ???

बहुत दिनों से मन मे ये सवाल उमडघुमड रहा है कि आखिर हम लोगों का ब्लागिंग करने का उदेश्य क्या है ?। आखिर क्यूँ हम लोग दिन रात मगजमारी किया करते हैं । बहुत सोचने पर भी मेरी समझ में अभी तक कुछ नहीं आया । वैसे कुछ न कुछ उदेश्य तो होता ही होगा । अगर इसका सचमुच में कोई उदेश्य न होता तो क्यूँ रात रात भर, जब कि बाकी दुनिया सुख की नीँद ले रही होती है और हम लोगों की आँखें कम्पयूटर सक्रीन पर गढी होती हैं । अकारण ही तो कोई समझदार इन्सान इतने व्यस्त जीवन और मंहगाई के इस जमाने में अपना टाईम खोटी नहीं करेगा।
सचमुच कुछ न कुछ उदेश्य तो चिट्ठाकारी का होना ही चाहिए । पर सच कहूँ, तो अब तक इसका उदेश्य मेरी समझ में तो नहीं आया ? यों तो हमारी भी चिट्ठाकारी साधना किसी से कम नहीं रही है । अभी तक अपने जीवन का स्वर्णिम एक वर्ष और चार महीने इस पर न्यौछावर कर चुके हैं । इस बीच यह नहीं कि हमने यहाँ रहकर कोई भाड ही भूँजा है---बल्कि लगभग प्रति सप्ताह एक पोस्ट के हिसाब से अपने पाठकों को ज्योतिष पर अति महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते रहे हैं । धर्म यात्रा ब्लाग पर अपने धर्म, संस्कृ्ति, नीतिज्ञान आधारित लगभग 60-70 आलेख छाप चुके हैं । यहीं इसी ब्लाग पर ही कुछ सामाजिक आलेख, एक दो कथा कहानियाँ, एक गजल और थोडी सी बकवास भी ठेल चुके हैं । अब पाठकों नें उन्हे किस हद तक पसन्द किया, ये तो मैं नहीं जानता लेकिन टिप्पणियो में आलोचकों द्वारा मिले प्रशंसा पत्र जरूर आज तक हमने सहेज कर रखे हुए हैं ।
अब अगर आप लोग मुझसे पूछें कि ब्लागिंग के पीछे मेरा क्या उदेश्य है तो शायद आप लोगों को मेरा जवाब कुछ निराशाजनक प्रतीत हो...क्यों कि अभी तक हम तो किन्ही उदेश्यों का निर्धारण कर ही नहीं पाए हैं। सच बात ये है कि बहुत खोजने पर भी हमें तो कोई उदेश्य अभी तक मिला नहीं।
अब आप लोग किन्ही विशेष उदेश्यों को लेकर ब्लागिंग कर रहे हैं तो हमारा उदेश्य भी वही समझ लीजिए। लेकिन बता जरूर दीजिएगा कि आपका उदेश्य क्या है?...वर्ना इस सवाल का जवाब मिलने तक यूँ ही फालतू में हमारा भेजा मंथन चलता रहेगा ।
आज आप लोगों का बहुत समय ले लिया.......चलते चलते एक सुन्दर सी तस्वीर देख लीजिए। लेकिन बताए देते हैं कि चित्र और आज की इस पोस्ट का आपस में कैसा भी कोई सम्बंध नहीं है :)