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रविवार, 12 दिसंबर 2010

समझदारी का तकाजा

उस रोज देखा कि सडक के किनारे धूप में एक आदमी पडा हुआ है. हड्डियों का मात्र ढाँचा रह गया है और बस कुछेक देर का मेहमान है. चलती सडक----बहुत से लोग आ-जा रहे थे. राहगीर उसकी तरफ देखते, थोडा ठहरते और फिर आगे बढ जाते. उसने भी क्षणभर के लिए ठहरकर उसकी तरफ देखा और आगे बढ गया.
वो अभी महज चन्द कदम ही चला होगा कि चलते-चलते अचानक से ठिठककर रूक गया, देखा बीच सडक में मुडा-तुडा, पुराना सा एक 100 रूपये का नोट पडा है. इधर-उधर निगाह दौडाई, कि कहीं कोई देख तो नही रहा. जब पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि किसी का भी ध्यान उसकी ओर नहीं है, तो उसने आहिस्ता से झुककर नोट उठाया और जेब के हवाले कर लम्बे-लम्बे डग भरता दूर निकल गया..........
शायद वो जानता था, कि दुनिया दया से नहीं समझदारी से चला करती है.....
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