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रविवार, 19 दिसंबर 2010

दिल छोटे और झोलियाँ बडी.......

आज बहुत दिनों के बाद मन्दिर जाना हुआ.कोई पूजा-पाठ करने के विचार से नहीं---बस यूँ ही, टहलने निकले तो खुद-ब-खुद कदम उधर को उठ पडे. गया तो क्या देखता हूँ---भिखारियों, व्यापारियों और खुशामदी पिट्ठुओं की रेलमपेल मची हुई है. बाप रे! इतनी भीड! अमीर-गरीब, औरत-मर्द, विद्यार्थी, व्यापारी, प्रेमी-माशूक, रोगी, सभी माँगने में जुटे हैं.ये नहीं कि हम ईश्वर से प्रेम करना सीखे, उल्टे जिसे देखो हाथ फैलाये वही कुछ न कुछ बस माँगने में जुटा है........लगता है दिन-ब-दिन लोगों के दिल छोटे होते जा रहे हैं और झोलियाँ बडी!
मन ही मन पत्थर की मूरत में छिपा 'वो' भगवान भी जरूर सोचता होगा-----यार! आजिज आ गया इन दरिद्रों से!
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