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शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

सब टैम-टैम की बात है

एक बार अपने ताऊ का हरिद्वार जा कै गगां स्नान करण का मूड बन गया. जब वो जाने कि तैयारी करने लगा तो सारे गाव को खबर हो गई.गाव मे एक ब्राह्मण भी रहता था नाम था पडिंत राधेश्याम , जिसकी एक बहुत बुरी आद्त थी कि गांव से कोई भी कही बाहर जाता तो वो कुछ न कुछ लाने की फरमाईश जरुर कर देता.
उसे जब पता लगा कि ताऊ हरिद्वार जा रहा है तो सीधा पहुच गया ताऊ के घर और बोला "ताऊ हरद्वार जा रिया है तो एक धरम का काम हि कर दियो, तन्नै पुण्य मिलेगा".
ताऊ का मत्था तो पडित को देखते हि ठणक गया था, फिर भी बोल्या " हां पंडित  जी, बोलो क्या करणा है".
पडित "ताऊ आते हुए एक शंख् लेता आईयो, इब तक गाव के मदिर मे शंख् नही है"
ताऊ ने चाहे मजबूरी मे ही सही, लेकिन हां कर दी.
फिर हरिद्वार गया और जिदगी मे चोरी-ठगी-बेईमानी करके जो पाप कमाये थे, उन्हे गंगा स्नान करके पुण्यो मे तबदील किया और वापिस घर को चल दिया.
रास्ते मे अपने गाव के नजदीक पहुच कर उसे याद आया कि बाह्ममण ने शखं मंगवाया था, वो तो ल्याणा भूल ही गया. इब के करूं, कहीं ब्राह्म्ण नाराज हो कै कोई श्राप-श्रूप ना दे दै. (वैसे ब्राह्ममण का श्राप बहुत जल्दी फलिभूत होता है, अगर आपने आज मेरे ईस चिठ्ठे पर टिप्पणि ना की तो फिर .........)
अब ताऊ बेचारा बडा परेशान हो गया, उसे कोई समाधान नजर नही आया. ईधर-ऊधर नजर दौडाई तो कुछ दूर आगे उसे मरे हुये जानवरों के कंकाल पडे दिखाई दिये.अचानक उसकी नजर एक गधे के कंकाल पर पडी, जिसकी खोपडी का आकार बिल्कुल शंख जैसा था.
अब विपरीत बुद्धि ताऊ ने सोचा कि बाह्मण ने क्या कभी शंख देखा है, यही ले चलता हूं, ये तो दिखता भी बिल्कुल शंख जैसा है
अब उसने उस खोपडी को उठाया, उसे अच्छी तरह पानी से धोकर, एक साफ से कपडे में लपेटकर अपने पास रख लिया और चल पडा गांव की ओर .
पहुंचते हि पंडित के पास गया और बोला" ले भाई पंडित तेरा शंख, बहोत हि मुसकिल ते मिल्या है"
अब अगले दिन बाह्ममण ने शंख को तिलक लगाया फिर लाल कपडे मे लपेटकर अपने भगवान के सामने रख दिया ओर पूजा-पाठ करके बजाने लगा.
लग्या फूंक पे फूंक मारण, अब अगर वो शंख होता तो बजता. बेचारे पंडित के तो फूंक मार मार के पसीने छूट गये.
उठाया शंख ओर पहुंच गया ताऊ के घर. बोला "रे ताऊ! यो कैसा शंख ले आया, यो सुसरा तो बजता ही कोणी, फूंक मारते-मारते मेरे तो फेफडे दुखण लाग गे"
ताऊ बोल्या " सब टाईम-टाईम की बात है पंडित जी, जब ईसका टैम था ना,तो गांव को सारी सारी रात सोण ना देवे था, अब इस मैं वो बात नही रही,ईब तो इसने कपडे मे लपेट कै ही रक्ख ल्यो"