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शुक्रवार, 7 मई 2010

रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं!!!(हास्य-व्यंग्य)

धर्म, अधर्म का जितना ज्ञान हमें गुरूकुल में रहते "आचार्य" की पढाई के दौरान भी नहीं हुआ होगा, उससे कहीं अधिक ज्ञान हम इस ब्लागनगरी में रहते हासिल कर चुके हैं, वो भी सिर्फ चन्द महीनों में। सुबह शाम धर्म आख्ययान, प्रवचन सुनकर हमें तो ऎसा लगने लगा है कि मानों हमारे लिए तो ये समूचा संसार ही "धर्ममय"(धर्म+मय) हो गया है। सोते जागते, खाते पीते, नहाते धोते, उठते बैठते हमें हर चीज में धर्म के दर्शन होने लगे हैं।  इधर-उधर,यहाँ-वहाँ, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे--हर जगह बस धर्म ही धर्म दिखाई देने लगा है। मत पूछिए कि हमारे जीवन में कहाँ कहाँ इस धर्म नें अपनी नाक घुसेड डाली है। 
अभी कल की ही बात है, हमने अपनी धर्मपत्नि जी को बोला कि भार्ये! जल्दी से भोजन परोस दीजिए, बहुत जोर से भूख लगी है। तो धर्मपत्नि जी झट से बोल पडी कि " भोजन अभी कहाँ बना है, सुबह से तो गैस खत्म है, सिलेंडर लाते तो ही तो खाना बनता"। सुनते ही हमारे अन्दर का धर्म रूपी कीडा कुलबुलाने लगा और हमारे मुख से निकल गया कि " देवी! फलाने ब्लाग बाबा जी कहते हैं कि स्त्री के लिए कैसे भी करके पति की आज्ञा, उसकी इच्छापूर्ती का प्रबंध करना ही उसका धर्म होता है"। बस इतना सुनना था कि उसने वो रूप धारण किया कि उसने हमारी, उस ब्लाग बाबा और धर्म तीनों की ऎसी तैसी करने में तनिक भी देर न लगाई। ये हम जानते हैं, या फिर हमारा भगवान या अल्लाह जानता है कि हमने कैसे जान बचाई वर्ना आज आप यहाँ बैठकर हमारी ये दुखभरी "धर्मकथा" न सुन रहे होते।
और सुनिये अब तो इस धर्म ने हमें सपनों में आकर भी भयभीत करना आरम्भ कर दिया है। आज रात की ही बात है जब हमें एक बहुत ही विचित्र सा स्वपन दिखाई दिया। हमने क्या देखा कि हम लैपटोप सामने रखे बडे एकाग्रचित्त हो किसी ब्लाग बाबा जी के ब्लाग के जरिए धर्म का रसपान कर रहे हैं। तभी क्या होता है कि अचानक से सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित, दिव्य आभा युक्त दो दिव्यपुरूष हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं। उन दोनों के गलों में दो तख्तियाँ लटक रही थी, एक पर लिखा था धर्म और दूसरे पर अधर्म। जिस के गले में अधर्म की तख्ती लटक रही थी, उसकी ओर हमने बस एक हल्की सी उपेक्षापूर्ण निगाह भर डाली और धर्म की ओर देखकर झट से उनके चरणों में शाष्टाँग प्रणाम करने लगे। अभी उस धर्म रूपी दिव्यपुरूष नें हमें आशीर्वाद भी नहीं दिया था कि वो अधर्मपुरूष तो हमें गालियाँ बकने लगा। एक ही साँस में हमें मूर्ख, अज्ञानी, दंभी ओर न जाने हमें क्या क्या कह गया। क्रोध तो हमें बहुत आया लेकिन शालीनता का पल्लू न छोडते हुए हमने उनसे सिर्फ यही निवेदन किया कि "महोदय! आप हमें नाहक ही गालियाँ बके जा रहे हैं। हम  अधर्म से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते। हमने अपने धर्म को पहचान लिया है। शुक्र है! उन ब्लागबाबाओं का जिन्होने हमारा धर्म से वास्तविक परिचय करा दिया है। अगर आप अपनी सलामती चाहते हैं तो तुरन्त पतली गली से निकल लीजिए वर्ना हम अपने धर्मदेव को कहकर आपकी वो ठुकाई कराएंगें कि आपसे भागते न बनेगा"।
"रे मूर्ख! धर्म तो हमारा नाम है। जिसे तूं धर्म समझे बैठा है, वो धर्म नहीं अधर्म है"---अधर्म चिल्लाया ।
"चलिए! अपना रास्ता नापिये। हम तुम्हारे झाँसे में आने वाले नहीं है। अरे! अब हम अज्ञानी नहीं रहे कि धर्म और अधर्म में भेद भी न कर सकें। पिछले साल भर में बडे बडे नामी ब्लाग बाबा वेद, पुराण, कुरआन घोंट घोंटकर हमें इतना धर्मामृ्त पिला चुके हैं कि हमारे तो कब के ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं"---इतना कहकर हमने एक दृ्ष्टि पास में ही खडे धर्मदेव पर डाली जो बस चुपचाप खडे हम दोनो की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। हमें उनकी ये मुस्कुराहट कुछ विचित्र सी लगी।
"वत्स! अब भी समझ जाओ। तुम क्यूं अपनी दीन दुनिया खराब करने पे तुले हो। जिन ब्लाग बाबाओं के तुम जो इतने गुणगान किए जा रहा हो, असल में वो लोग धर्म नहीं बल्कि अधर्म के उपासक हैं और जिसे तुम धर्मामृ्त कह रहे हो, वो अमृ्त नहीं बल्कि हलाहल विष है। जो न केवल तुम्हारे इस ब्लागजगत अपितु तुम्हारे समूचे समाज को ले डूबेगा। यदि अब भी न समझे तो तुम्हे जहन्नुम की आग में जलने से मैं भी न रोक पाऊँगा"। अब की बार अधर्म नें इतने मधुर स्वर में कहा कि एक बार तो मैं भी शंका में पड गया। फिर सोचा कि जरूर इसे मेरी विद्वता का अहसास हो गया है, तभी इसने बात करने की टोन बदल ली :-)।
अब मुझे भी जुबान की तल्खी छोड, उसके जैसी ही विनम्रता अख्तियार करनी पडी " देव्! मै कैसे मान लूँ कि आप जो कह रहे हैं, वो सही है"
इतना कहकर पहले तो मैने एक प्रश्नवाचक दृ्ष्टि पास में खडे धर्मदेव पर डाली ओर बिना अधर्मदेव के जवाब की प्रतीक्षा किए सीधे धर्म से ही संबोधित हुआ" हे धर्मदेव! आप चुप क्यों है। कुछ बोलते क्यों नहीं। कृ्प्या आप ही बताईये कि सत्य क्या है?"
लेकिन धर्मदेव ने कोई जवाब न दिया ओर पूर्ववत ही उनके अधरों पर वही कुटिलतापूर्ण सी मुस्कान तैरती रही। उनकी इस मुस्कुराहट नें हमें ओर संशय में डाल दिया। फिर विचार आया कि कहीं ऎसा तो नहीं ये दोनों मिलकर हमारी परीक्षा ले रहे हों जैसी स्वर्गारोहण के समय धर्मराज युधिष्ठर की ली गई थी। मन में ये विचार आते ही हमारा दिल तो बल्लियों उछलने लगा और आँखों के सामने जन्नत की हूरें कत्थक नृ्त्य करती दिखाई देने लगी। बस अब तो हमने भी ठान लिया कि कैसे भी कर के हमें इस परीक्षा में उतीर्ण होना ही है।
इतने में अधर्म फिर बोल पडा "वत्स! क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि ये मिथ्यायुग है और तुम्हारा ये जो ब्लागसंसार है, जिसमें तुम दिन रात विचरते रहते हो, वो तो इसमें भी बडा मिथ्याजगत है, जहाँ एक से बढकर एक मिथ्याचारी छद्मभेष धारण किए अपना मायाजाल फैलाए बैठे हैं कि कोई मूर्ख फँसे तो उसे हलाल करें"।
अब तो हमारे भी मन में शंका अपने पैर पसारने लगी कि कहीं इनका कथन सत्य तो नहीं। फिर भी हमने अपने विश्वास की डोर को हाथ से न छूटने दिया। क्यों कि हमें अपने इन ब्लाग बाबाओं पर खुद से भी अधिक भरोसा था। धन्य हैं ये संत जिन्होने हमें सच्चे धर्म का मार्ग दिखलाया। जो लोग कहते हैं कि कलयुग में एक भी सच्चा सन्त मिलना दुर्लभ हैं तो मै उन्हे बताना चाहूँगा आप एक की बात करते हैं। यहाँ आकर देखिए आपको सन्तों की पूरी जमात मिलेगी जो डाक्टर, वैज्ञानिक, वकील जैसे पेशों से जुडे होते हुए भी बिना किसी स्वार्थ के दुनिया को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाने में तन-मन-धन से जुटे हुए हैं। अहोभाग्य इस ब्लागनगरी के वाशिन्दों का, जिन्हे ऎसी दिव्य विभूतियों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है। 
खैर हम भी उस अधर्म के झाँसे में कहां आने वाले थे। सो हमने उनसे प्रमाण देने की डिमांड कर डाली:- "देव! यदि कुछ प्रमाण दें तो ही मैं आपके कथन पर विश्वास कर सकता हूँ"
"वत्स्! यदि तुम प्रमाण ही चाहते हो तो तुम्हे इसके लिए एक कार्य करना होगा"
"कहिए देव! मुझे क्या करना होगा"
"वत्स्! तुम इन ब्लाग बाबाओं के पास जाओ ओर उनसे पूछ कर आओ कि इस वाक्य "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ है।
"वाह्! देव! आप भी कमाल करते हैं। इतने साधारण से वाक्य का अर्थ तो मै ही बता देता हूँ। इसके लिए बाबाओं से पूछने की क्या जरूरत है। नाहक ही उन्हे परेशान करना। वो वेद और कुरआन के महाविद्वान, जो बिना किसी स्वार्थ के, विश्व बन्धुत्व की भावना लिए, दिन-रात समूचे ब्लागजगत में ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं--क्या वो इतना भी न जानते होंगें। लगता है आप शायद मजाक के मूड में हैं"
"वत्स! धर्म का कार्य किसी से परिहास करना नहीं होता अपितु उसे जीवन का सही मार्ग दिखाना होता है। जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही करो। एक बार जाओ तो सही"।
"चलिए, आप कहते हैं तो चला जाता हूँ"। इतना कहकर हम अनमने मन से उस वाक्य का अर्थ पूछने बाबा फन्ने खाँ ब्लागर के पास चले गये। उनसे कहा कि बाबा जी! मैं आपके ब्लाग सत्संग का एक नियमित पाठक हूँ. जबसे आप इस ब्लागजगत में अवतरित हुए हैं, आपकी हर पोस्ट पर अपने श्रद्धसुमुन अर्पित करने नियमित रूप से आ रहा हूँ! आज आपके पास अपनी एक जिज्ञासा के समाधान हेतु उपस्थित हुआ हूँ---शंका निवारण कर कृ्तार्थ कीजिए! "
बाबा फन्ने खाँ:- " अजी बोलिए शर्मा जी! क्या पूछना चाहते हैं"
जी गुरूदेव्! वैसे सवाल तो बहुत ही मामूली सा है..ओर मुझे भीतर से बहुत ही संकोच भी हो रहा है कि आप जैसे धर्ममर्मज्ञ विद्वान, जो कि कुरआन एवं पुराण को घोटकर पी चुके हैं ---उनसे इतने मामूली से प्रश्न का जवाब पूछ रहा हूँ!
बाबा फन्ने खाँ " शर्मा जी, आप निसंकोच होकर पूछिए! अल्लाह नें हमें इसी खातिर तो यहाँ भेजा है"
"जी! वो तो है! गुरूदेव मैं ये जानना चाहता था कि "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ होता है"
बाबा फन्ने खाँ" वत्स साहब! अल्लाह साक्षात शिव है। वो अनन्त है, सत्य है, सुन्दर है"।
"जी हाँ, आप बिल्कुल सत्य कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इस समय सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि धर्मो रक्षति रक्षत: का क्या अर्थ है"?
ब्लागर फन्ने खाँ " ऊपर वाला बडा नेकदिल है। सबका कल्याण चाहने वाला है। वो जिसे चाहे सिर्फ उसी को हिदायत देता है"।
"आप जो कह रहे हैं, सब सही है। लेकिन आज मैं जरा जल्दी में हूँ, आपके धर्मामृ्त का पान फिर किसी दिन करूँगा। आज तो आप बस मुझे उस वाक्य का अर्थ बता दीजिए"।
फन्ने खाँ:- " परमेश्वर ही सच्चा शिव अर्थात कल्याणकारी है"
"फन्ने खाँ जी, मैं आपसे कुछ पूछ रहा हूँ और आप कुछ का कुछ कहे जा रहे हैं। सीधे सीधे इसका अर्थ बता क्यूं नहीं देते। या कह दिजीए कि आपको इसका अर्थ पता नहीं है तो मैं किसी दूसरे बाबा जी के द्वारे जाऊँ" अब मुझे भी थोडी झुंझलाहट सी होने लगी थी।
फन्ने खाँ:- (कुछ देर सोचने के बाद) आप तो बडे नेकदिल इन्सान हैं। क्या कहा आपने? धर्मो रक्षति रक्षत:
"जी हाँ!" मैने थोडा खिजकर कहा
बाबा फन्ने खाँ(कुछ देर सोचकर) " जनाब इसका अर्थ होता है कि रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं" 
बस इतना सुनना था कि, एकदम से ऎसा लगा मानो किसी नें एक ही झटके में मेरी आँखों पर पडे पर्दे को खींचकर फेंक दिया हो। मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही बर्तनों के खडखडाने और धर्मपत्नि के चिल्लाने की आवाज एकसाथ कानों में पडने लगी। मैं एकदम से हडबडा कर उठा । मालूम हुआ कि ये तो मैं सपना देख रहा था। इतने में ही धर्मपत्नि पास में आकर फिर से चिल्लाने लगी" आपको कुछ शर्म हया है कि नहीं! कितने दिन हो गये मुझे भौंकते कि कहीं से कुछ पैसों का इन्तजाम कर लो, पप्पू का स्कूल में एडमीशन कराना है। कितने दिनों से बिजली का बिल आया पडा है,कल जमा कराने की आखिरी तारीख है। लेकिन नहीं आपको इस मुए कम्पयूटर और इन बाबाओं से फुर्सत मिले तो ही तो घर गृ्हस्थी की ओर कुछ ध्यान दे पाओ। इन नासपीटों नें तुम्हारी बुद्धि का दिवाला निकाल के रख दिया है। न जाने इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में क्यों नहीं घुस रही कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता"। 
इतना कहकर वो कुछ देर तक तो नथुने फुलाती वहीं खडी रही लेकिन मेरी ओर से कैसा भी कोई जवाब न पाकर गुस्से में पैर फटकारती हुई रसोई की ओर निकल गई। उसके बाद भी वो न जाने क्या कुछ बोलती रही, जिसे मैं सुन न पाया। क्यों कि मेरे कानों में तो अब तक सिर्फ यही शब्द गूंज रहे थे कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता। 
(यह रचना इस से पूर्व वैशाखनन्दन सम्मान प्रतियोगिता में एक बार प्रकाशित की जा चुकी है. आज यहाँ इसे पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है)