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शुक्रवार, 14 मई 2010

सुना है, हिन्दी ब्लागजगत में चुनाव होने वाले हैं!!!!!!

जैसे ही खबर मिली कि हिन्दी चिट्ठाजगत में "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" चुनने के लिए चुनाव प्रक्रिया अपनाई जा रही है तो सुनते ही अपने ब्लागर मित्र श्री बनवारी लाल जी तुरन्त धमक पडे. पूछने लगे कि " पंडित जी! जरा एक मशविरा तो दीजिए"
"जी कहिए, आज किस बात पर मशविरा माँगा जा रहा है"
"पंडित जी! बात तो आप तक पहुँच ही चुकी होगी कि अपने यहाँ चिट्ठजगत में सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का चुनाव होने जा रहा है. उसके लिए उन सभी इच्छुक प्रत्याशियों से नाँमाकन पत्र भरने को कहा गया है, जो कि खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं"
"जी हाँ, कुछ ऎसा सुना तो है"
" तो बात ये है कि हमने इस चुनाव में भाग लेने का मन बनाया है. आपसे इसी मसलें पर मशविरा चाहिए था कि हमें चुनाव लड लेना चाहिए कि नहीं"
मैने उन्हे निहारा. जानना चाहता था कि वह इस समय किस श्रेणी का मजाक कर रहे थे. मैं मन ही मन में उनके द्वारा हिन्दी ब्लागिंग में दिए गए योगदान का आंकलन करने लगा. सब लोग अच्छे से जानते हैं कि बनवारी लाल जी का साहित्य की किसी भी विधा से लगभग वैसा ही सम्बंध रहा है, जैसा कि ईँट और कुत्ते में. अपनी दो बरस की ब्लागिंग में उन्होने ले देकर यही कोई पाँच सात तो पोस्ट लिखी हैं. उनमें भी या तो घटिया सी कोई तुकबन्दी रही या फिर बच्चों के चुटकुले ............बस ले देकर हिन्दी के विकास में उनका यही योगदान रहा है .
अब ऎसे निरीह ब्लागर के मुँह से टपके ये शब्द मुझे कोरा मजाक न लगते तो भला क्या लगते. अत: मैने तो सपाट राय दे डाली " अमां यार छोडो भी! यह चुनाव वनाव वाला झंझट आप जैसे भले आदमियों के लिए नहीं है.ओर अगर चुनाव लड भी लिया तो आपको वोट देगा कौन?"
सुनते ही बनवारी लाल जी उदास हो गए. मुँह लटक गया. शायद मैने उनके बढते कदमों में टंगडी जो मार दी थी. मुँह बिसूरकर बोले" पंडित जी! आपसे हमें यह उम्मीद नहीं थी. आपने तो हमारा दिल ही तोड दिया"     
अब उनको भला कौन समझाता कि मुझे भी उनसे ऎसे प्रश्न की कोई उम्मीद नहीं थी. फिर भी मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. गलती के अहसास का दायित्व इस जमाने में प्राय: समझदार आदमी का ही होता है. मुझे लगा कि उडनातुर पतंगें को रोकना टोकना नहीं चाहिए. फिर भले ही वो जलती लौ पर भस्म होने ही क्यों न जा रहा हो. अब उडना तो उस बेचारे का स्वभाव ठहरा और जलना उसकी नियती. फिर ईश्वर के बनाए इस विधान में हम भला क्यों टाँग अडाएं. सो, मैने भूल सुधार करनी चाही " देख लीजिए! अगर जीतने का कोई चान्स वान्स हो तो!"
हमारी ओर से तनिक सी सकारात्मकता दिखाई देते ही बनवारी लाल जी का मुखारविन्द खिल उठा. बोले" जी क्यों नहीं, जब आप जैसे मित्र साथ हैं तो फिर जीतेंगें कैसे नहीं"
मैने मन ही मन माथा ठोंक लिया. गलतफहमी की भी कोई तो एक सीमा होनी ही चाहिए,लेकिन लगता है शायद ये तो सीमाओं को भी लाँघ चुके हैं. कहते हैं कि मूर्ख सिर्फ पागलखानों में ही नहीं पाए जाते और न ही वो गले में तख्ती लटकाए घूमते हैं कि "हम पागल हैं," उनकी तो हरकतें ही सब कुछ बयां कर डालती हैं. एक बार तो जी में आया कि इन्हे साफ साफ मना कर दिया जाए कि भाई ऎसे किसी भुलावे में मत रहिएगा, लेकिन शायद मेरे मित्र धर्म नें मुझे इस प्रकार की चुभती सी प्रतिक्रिया करने से रोक दिया. "चलिए हम तो आपको वोट दे ही देंगें लेकिन सिर्फ हमारी अकेले की वोट से तो जीत हार तय नहीं होने वाली,,,ओर लोगों की भी वोट मिले तब न"
" मिलेगी क्यों नहीं, आखिर हम में कमी क्या है? सभी ब्लागरों के साथ तो अपने मधुर सम्बंध है. सबने वोट देने का वायदा भी कर दिया है" जनाब का आत्मविश्वास पूरे उत्थान पर था.
हिन्दी ब्लागिंग के प्रचलित नियम कायदों के अनुसार तो इनमें कैसी भी कोई कमी नहीं थी, बल्कि एक आध गुण फालतू ही बेशक होगा. लेकिन बिना किसी सार्थक योगदान के "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" होने का भ्रम पाल बैठना भी तो किसी मूर्खता से कम नहीं कहा जा सकता. अब नासमझ आदमी को तो समझा भी लो लेकिन पागल या दीवाने को भला कौन समझाए. ब्लागिंग धर्म मुझे कोई कडक उत्तर देने से रोक रहा था लेकिन बनवारी लाल थे कि टस से मस ही नहीं हो रहे थे.
"पंडित जी, आप तो जानते ही हैं कि समूचे ब्लागजगत में हमारे से स्वच्छ छवि वाला ब्लागर मिलना भी मुश्किल है. आज तक न तो हमारा किसी विवाद में कोई हाथ रहा, न ही हमने कभी किसी का नाम लेकर कोई पोस्ट लिखी...ओर तो ओर किसी ओर ने भी कभी हमारा नाम लेकर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... आज तक कैसे भी करके हम अपनी छवि को दागदार होने से बचाए रखे हुए हैं..अब आप ही बताईये कि हमारे जैसे इतनी पाक साफ छवि वाले ब्लागर को कोई भला वोट क्यूं नहीं देगा ?"
अब इस बेचारे भले आदमी को कौन समझाए कि इसकी कोई छवि ही कहाँ हैं, जो दागदार या बेदाग होगी. लेकिन मालूम नहीं कि वो मित्रधर्म निभाने की विवशता रही या कि ब्लागिंग धर्म से च्युत होने का डर, कि हमने उनसे ओर कुछ कहना उचित ही नहीं समझा. सो, हमने उनकी योग्यता को स्वीकार करते हुए(बेशक ऊपरी मन से ही सही) अपना वोट उन्हे ही देने के वादे के साथ हाथ जोडकर उन्हे रूखसत किया.....
अब सोच रहे हैं कि कुछ दिनों के लिए नैट कनैक्शन कटवा दिया जाए या फिर कहीं घूमफिर आया जाए...तब तक ये "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" वाली चुनावी आपदा भी टल चुकी होगी वर्ना अभी तो चुनाव का आगाज ही हुआ है ओर ये बनवारी लाल ट्पक पडे, कल को पता नहीं कौन कौन अलाने फलाने ब्लागर मुँह उठाए वोट का दान माँगने चले आएंगें. अब जिसका समर्थन न किया वही नाम ले लेकर गरियाया करेगा.......सो, काहे को फोकट में दुश्मनी मोल लेनी.
इसलिए भाई हम तो चले हरिद्वार गंगा माई की शरण में, कुछेक पाप धो आएं...चुनाव निपटते ही आ जाएंगें. तब तक आप लोग लडो, भिडो, एक दूजे के खिलाफ नारेबाजी करो, आरोप-प्रत्यारोप लगाओ. जो भी कोई जीत जाएगा, उसी को हम भी "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" मान लेंगें....आखिर लोकतन्त्र भी तो यही कहता है!

मंगलवार, 30 मार्च 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान द्वारा कवि,गजलकार,लेखक,कार्टूनिस्ट के पदों हेतु आवेदनपत्र आमंत्रित

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि हिन्दी ब्लागर्स को आ रही समस्यायों को देखते हुए पिछले दिनों हमने आप लोगों की सहायतार्थ "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक कुटीर उद्योग का शुभारंभ किया था। जिसके पीछे हमारा एकमात्र यही उदेश्य रहा है कि इसके जरिये हिन्दी चिट्ठाकारों को पोस्ट लेखन में लगने वाले शारीरिक एवं मानसिक श्रम तथा कीमती समय के अपव्यय से मुक्ति दिलाई जा सके। साथ ही प्रतिभा के धनी निम्न एवं मध्यमवर्गीय चिट्ठाकारों को कुछ अतिरिक्त कमाई का मौका देकर उन्हे आर्थिक संबल प्रदान किया जा सके।
इसी उदेश्य को ध्यान में रखते हुए संस्थान द्वारा कवियों,गजलकारों,लेखकों,कार्टूनिस्टों की ठेके/दिहाडी पर भर्ती हेतु आवेदनपत्र आमन्त्रित किए जा रहे हैं।
पद संख्या:- असीमित
अहर्ताऎं:-
1 जो.कहानी/कविता/गजल/हास्य-व्यंग्य/सामयिक/असामयिक लेखन इत्यादि में से कम से कम किसी एक विद्या का विशेष ज्ञान रखता हो।
2.अच्छी सहनशीलता,आचरण तथा व्यक्तित्व हो तथा अपने से विरिष्ठ ब्लागरों के साथ ब्लागजगत के अन्दर एवं बाहर प्रभावी परस्पर क्रिया करने के योग्य हो।
3. प्रसन्नचित स्वभाव तथा अंतरवैयक्तिक कौशल
4.किसी भी परिवर्तनशील स्थिति के प्रति अनुकूलन के योग्य हो तथा ब्लागजगत के इस अति असहिष्णु वातावरण में नारी-पुरूष, हिन्दू-मुस्लिम के विवाद में भाग न लेकर के अन्य सहकर्मी ब्लागरों के साथ बेहतर ढंग से काम करने के योग्य हो।
5.केवल अपने निजि कम्पयूटर/लैपटोप पर लेखन कार्य करने के योग्य हो
आवश्यक विवरण:-
1.ब्लागिंग के दौरान आपके अन्य ब्लागरों संग हुए मुद्दा आधारित अथवा मुद्दाविहीन विवाद,झगडों,गाली-गलौच,शिकायत इत्यादि का सम्पूर्ण विवरण देना आवश्यक है।
2.कोई लंबित/पिछला मुकद्दमा(ब्लागिंग के दौरान)। यदि हाँ तो कृ्प्या विवरण दें
3.रचनाकार की कम से कम एक या अधिक रचना किसी समाचार पत्र, पत्रिका में अवश्य प्रकाशित हो चुकी हों।
अनुभव:- प्रार्थी कम से कम एक वर्ष का ब्लागिंग का अनुभव रखता हो।
शैक्षणिक योग्यता:- किसी भी प्रकार की कोई शैक्षणिक योग्यता का होना अनिवार्य नहीं है। पाँचवीं फेल से लेकर डाक्टरेट तक की उपाधी प्राप्त कोई भी व्यक्ति आवेदन कर सकता है।
आयु:- न्यूनतम 18 वर्ष से अधिकतम 80 वर्ष की आयु तक।
वेतमान/दिहाडी/पारिश्रमिक:- बाद में तय की जाएगी ।
नियम एवं शर्तें:-
1.चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान को कोई भी आवेदनपत्र स्वीकार/अस्वीकार करने और इस समूची प्रक्रिया को रद्द करने अथवा रचनाकार के इस संस्थान से जुडने के पश्चात कभी भी उसे निकाल बाहर करने का अधिकार होगा। जिसके लिए संस्थान का संबंधित रचनाकार के प्रति कोई दायित्व नहीं होगा।
2.संस्थान (हमारे) द्वारा आवेदनपत्रों के तुलनात्मक अध्ययन या भर्ती करने के निर्णय को प्रभावित करने के लिए किसी रचनाकार द्वारा कोई प्रयास करने(रिश्वत देने) पर उसके आवेदनपत्र को विशेष वरीयता प्रदान की जाएगी।
3.किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में संस्थान का निर्णय अन्तिम एवं मान्य होगा। इस विषय में कैसी भी कोई दलील स्वीकार नहीं की जाएगी।
आवेदन:- ब्लागिंग में आकर फालतू में टाईमखोटी करने के बजाय कुछ कमाई करने एवं अपनी रचनाधर्मिता का सदुपयोग कर हिन्दी ब्लागजगत को आलोकित करने के चाहवान उम्मीदवार कल शाम 5 बजे तक इस पते(chithaudhyog_sewa@yahoo.com) पर अपना आवेदनपत्र भेज सकते हैं। तत्पश्चात चयनित उम्मीदवारों को परसों दिनांक 1 अप्रैल 2010 को साक्षात्कार हेतु आमंत्रित किया जाएगा।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

बडे बडे फन्ने खाँ ब्लागर यहाँ एक कौडी में तीन के भाव बिक रहे हैं-- (आह्वान)

प्रभो! आओ, आओ.....हम इस समय तुम्हे बडे दीन होकर पुकार रहे हैं। तुम तो दीनों की बहुत सुनते थे। सुनते क्या थे, तुम तो दीनों के लिए थे ही। क्या हमारी न सुनोगे?! देखो जरा इस ब्लागजगत को एक नजर देखो तो सही। पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष नें यहाँ का सत्यानाश कर के रख दिया है। बडे बडे फन्ने खाँ ब्लागर एक कौडी में तीन के भाव बिक रहे हैं। सबकी बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो चुकी है। किसी में सहनशीलता, धर्म, विवेक, आपसी प्रेम, बन्धुत्व जैसा कोई गुण नहीं दिखाई पडता। लम्पटगिरी दिनों दिन बढती चली जा रही है। छोटे बडों को उपदेश देने में निमग्न हैं और बडे दिन रात छोटों पर गुर्र गुर्र करने में लगे हुए हैं। तमाशबीन अनामी/बेनामी का मुखौटा पहने एक दूसरे को आपस में लडाने को ही अपना कर्तव्य मानकर यहाँ जमे हुए हैं। कुछ जलील इन्सान धर्म की ओट लिए अधर्म का नंगा नाच करने में जुटे हैं। बिना अर्थ जाने पुस्तकों में से पढे हुए को टीप टीप कर विद्वान होने का भ्रम फैलाने में बडे जोरों शोरों से लगे हुए हैं। धर्म के वास्तविक मूल्यों की परख कहीं लुप्त हो चुकी है, आस्था और निष्ठाओं पर कुठाराघात किया जा रहा है। एक दूसरे का जम के अनादर किया जा रहा है और कोई ससुरा सुनने को तैयार नहीं।
प्रभो! आप ये समझ लीजिए कि एक दम से हाहाकार सी मची हुई है। ब्लाग देवीयों की दशा सोचनीय सी हो रखी है। बुजुर्ग ब्लागरों की मन की पीडा असह्य है। ब्लागिंग धर्म की कोई मर्यादा नहीं। समाज की तरह ही यहाँ भी जातियाँ, उपजातियाँ उत्पन हो गई हैं। ऊंच-नीच का भाव यहाँ भी शुरू हो चुका है। अच्छे एवं गुणवत्तापूर्ण लेखन का स्थान सक्रियता क्रमाँक की दौड नें ले लिया है। लोग सुबह पोस्ट लिखते हैं और शाम तक छ: बार देख चुके होते हैं कि सक्रियता क्रमाँक बडा कि नहीं?। लोग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस चाटूकार धर्म निभाने में लगे हुए हैं। गुरू जैसा परम पवित्र शब्द भी यहाँ आकर अपनी गरिमा खो चुका हैयहाँ गुरू माने===ऊपर चढने की सीढी। बस ये सीढी तभी तक है जब तक कि ऊपर नहीं चढ जाते। एक बार ऊपर चढे नहीं की उसके बाद तो इस सीढी का एक एक डंडा बिखरा मिलता हैं। तब चेले खुद किसी ओर के गुरू बन चुके होते हैं और गुरू उनके द्वारे हाथ बाँधे अपनी पोस्ट पर टिप्पणी की भीख माँगता दिखाई पडता है। लोगबाग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस जय गुरूदेव्!  जय गुरूदेव! करते इस ब्लाग भवसागर को पार करने में जुटे हैं।
बडे बडे दंगेच्छु,बकवादी,जेहादी,माओवादी,आतंकवादी, और भी जितने प्रकार के वादी है, यहाँ अपने अपने डेरे जमाने लगे हैं। प्रेम और सहानुभूति का स्थान घृ्णा नें ले लिया है। हिन्दू और अहिन्दूओं, देशप्रेमियों और पडोसी प्रेमियों के झगडे, अनर्गल प्रलाप, गाली गलौच साधारण और सुबह शाम की घटना हो चुकी हैं। धर्म के नाम पर समझो अधर्म हो रहा है। क्या इस समय और ऎसे समय में भी तुम यहाँ अपने पधारने की जरूरत नहीं समझते ?
दीनानाथ! आओ, आओ । अब विलम्ब न करो। ब्लागजगत की ऎसी दशा है और तुम देखते तक नहीं, सुनते तक नहीं। अब नहीं आओगे तो कब आओगे। कहीं ऎसा तो नहीं कि कलयुग में तुम भी दीनों की बजाय इन माँ के दीनों का पक्ष लेने लगे हो।(माँ का दीना पंजाबी भाषा में एक बहुत ही आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला शब्द है, किन्तु इसका अर्थ कोई परम विद्वान ही बता सकता है, हमें तो पता नहीं :-)
हे महादेव औघडदानी, भोले बाबा ऎसा वर दो
                        सोने का सर्प चढाऊंगा, इनकी बुद्धि निर्मल कर दो ।।(स्व-रचित नहीं)

(बहुत दिनों से हम सोच रहे थे कि पता नहीं लोगों को अपनी पोस्ट पर नापसंद के चटके कैसे मिल जाते हैं,हमें तो आजतक किसी नें नहीं दिया। ईश्वर नें चाहा तो शायद आज हमारी ये इच्छा पूरी हो ही जाये :-)
Microsoft Office 2010 Home & StudentOtterBox Defender Case for iPhone 3G, 3G S (Black)Free: The Future of a Radical Price

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान............

जैसा कि पिछली पोस्ट में इस विषय पर विचार हो रहा था कि नियमित रूप से ब्लाग लिखना कितना श्रमसाध्य कार्य है। एक ओर यहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए रोज रोज नये नये विषयों को खोजने, फिर उन पर कुछ अच्छा, बेहतरीन सा लिखने के लिए सामग्री जुटाने की चिन्ता, वहीं दूसरी ओर मान लीजिए आप लेखन में दक्ष हैं तो भी घर परिवार,नौकरी इत्यादि के चलते ब्लाग लेखन को सही मात्रा में समय न दे पाने की परेशानी।समय की कमी के चलते न तो आप सही अन्तराल में पोस्ट लिख पाते हैं ओर न ही दूसरे के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी ही कर पाते हैं। अगर कोई पोस्ट ही नहीं लिख पाए तो ब्लाग बनाने का भी क्या उदेश्य ओर अगर पोस्ट भी लिख दी लेकिन समय की मजबूरी वश दूसरों के ब्लाग पर टिप्पणी न की तो भी लिखने का क्या फायदा----यूँ ही पढने तो कोई आने से रहा:)। यानि की टोटली टैन्शन!!!!
लेकिन अब आपको चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं। समझिए कि अब आपको पोस्ट लिखने के झंझट से मुक्ति मिल गई। क्यों कि आप लोगों की सेवा,सहयोग तथा हिन्दी भाषा के प्रचार,प्रसार की भावना लेकर हमने "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक संस्था का निर्माण किया है।जिसमें मूर्ख बुद्धिजीवियों,पाश्चात्यबुद्धि ज्ञान-विज्ञान के पुरोधा, नामी,बेनामी कवि,गजलकार और श्रमजीवी विद्वानों की भर्ती की गई है।जो आप जैसे परेशान ग्राहकों(ब्लागर्स) की माँग के अनुसार काव्य,लेख(सामयिक/असामयिक),कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि इत्यादि रचनाओं का निर्माण कर के देंगें।
सभी वर्गों विशेषतय: निम्न एवं मध्यमवर्गीय ब्लागरों का खास ध्यान रखते हुए एक बहुत ही साधारण सी "मूल्य दर" निश्चित की गई है, जिससे कि सभी लोग लाभ उठा सकें।
मूल्य सूची:---
1. कविता----मूल्य 100 रूपये
2.गजल----मूल्य पचास रूपये प्रति शेर के हिसाब से
3.कहानी---250 रूपये
4.कहानी(धारावाहिक)----200 रूपये प्रति किस्त के हिसाब से(न्यूतम 3 किस्तें), 5 किस्तों की कहानी पर कुल मूल्य पर 15% की छूट दी जाएगी।
5.सामयिक लेख----कीमत विषय अनुसार निश्चित की जाएगी ।
6 हास्य-व्यंग्य----मूल्य 250 रूपये
7 चुटकुले/लतीफे----मूल्य प्रति चुटकुला 20 रूपये (एक साथ 10 चुटकुलों के साथ में 1 पहेली फ्री)


गर्मियों में लेबर सस्ती हो जाने के कारण ग्राहकों को भी उस समय रचना बनवाने पर साढे 13 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
हमारे ब्लागर बन्धु उपरोक्त सूची को पढकर स्वयं ही निश्चय कर लें कि दरें कितनी वाजिब रखी गईं हैं। अनमोल रचनाओं के लिए आपसे कौडियों में कीमत ली जा रही है। चलिए अब जरा चन्द नियम एवं शर्तों को भी समझ लिया जाए।
 नियम एवं शर्ते:--
1.किसी भी तरह का पंगा लेखन का कार्य स्वीकार नहीं किया जाएगा।
2.रचना निर्मित हो जाने पर उसे ग्राहक को स्वीकार करना ही होगा। उसके निरर्थक होने, पसंद न आने या भाव को व्यक्त न कर सकने इत्यादि किसी भी कारण से यदि ग्राहक उसे अस्वीकार करता है तो भी ग्राहक उसका पूरा पारिश्रमिक देनदार होगा।
3.बिकी हुई रचना किसी भी कीमत पर न तो बदली जाएगी ओर न ही उसका मूल्य वापिस किया जाएगा।
4.रचनाएं केवल हिन्दी भाषा में होगी ओर देवनागिरी लिपि में लिखी जाएंगीं।
5.आपको किसी भी रचना को सिर्फ एक ही चिट्ठे पर छापने का अधिकार होगा। यदि एक ही रचना को आप अपने विभिन्न चिट्ठों पर छापते हैं तो कीमत प्रति चिट्ठे के हिसाब से वसूल की जाएगी।
6.किसी भी तरह के वाद-विवाद की स्थिति में हमारा स्वयं का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।


अन्त में मैं सभी लेखक/कवि/गजलकार/कार्टूनिस्ट मित्रों से भी यह निवेदन करना चाहूँगा कि अपने बेकार समय को "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" के द्वारा उपयोग में लाएं। हमारा विचार चिट्ठाकारी विधा को "कोटेज इन्ड्स्ट्री" के रूप में विकसित करने का है। इस गृ्ह उद्योग से न केवल बहुत से ज्ञान और समय की कमी से पीडित चिट्ठाकारों को मदद मिलेगी बल्कि आप लोगों की आर्थिक दशा में भी सुधार होगा। साथ ही हिन्दी भाषा के प्रचार विस्तार में भी उल्लेखनीय मदद मिलेगी। जिससे कि आगे चलकर हिन्दी चिट्ठासंसार अधिकाधिक स्थूल होता जाएगा।
आशा है कि आप लोग इस सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने देंगें :)
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निकट भविष्य में इस संस्थान से जुडने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अमूल्य अनुभवों को आप सब से साँझा करते रहेंगें :)