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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

न गुड सा मीठा, न नीम सा कडवा !!!

चलिए, आज आपको एक कहानी सुनाते हैं. एक था सांप और एक थे ऋषि. साँप एक दिन ऋषि के पास जा बैठा और उनसे कुछ ज्ञान देने की प्रार्थना की. ऋषि नें उसे अहिंसा का उपदेश दिया. बस, उस दिन से साँप नें व्रत ले लिया कि अब वह किसी को न काटेगा. कुछ दिन बीते कि ऋषि अपनी तीर्थयात्रा पर चले गए और साँप के व्रत की बात आसपास सबको मालूम हो गई. अब हुआ ये कि वहाँ खेलते हुए बच्चे उस साँप को पकड लेते और घंण्टों तोडते मरोडते. एक दिन एक ग्वाले नें उसे पकडकर अपनी गाय के सींगों में बाँध दिया और दिन भर गाय झाडियों में सींग मारती घूमती रही. अब बेचारे साँप की तो आ गई शामत. बेचारा लहूलुहान होकर बडी मुश्किल से शाम को छूटा, पर दूसरे दिन बच्चों नें उसे फिर पकड लिया और उसके मुँह में रेत भर दिया.
उन बच्चों में कोई एक आध उदण्ड टाईप का लडका भी रहा होगा. उनमें से एक उसकी आँखों में सींक देकर अन्धा करने वाला ही था कि ऋषि उधर से आ निकले. देखते क्या हैं कि मोटा-मतंगा साँप लट्कर रस्सी हुआ पडा है और रूप एकदम से बटरूप!
खिन्न होकर बोले: " अरे यह क्या हुआ तुझे साँप?"
"महाराज, आपने ही तो अहिँसा का उपदेश दिया था!" साँप नें भक्ति-भाव से, पर कातर स्वर में कहा.
ऋषि समझ गये कि क्या हुआ है उसके साथ और बोले: "अरे मूर्ख, मैने यही तो कहा था कि काटना मत. पर यह कहाँ कहा था कि फुँकारना भी भूल जाना!"
साँप समझ गया और आज बहुत दिन बाद उसने फन उठाकर फुंकार मारी. बस, सारे खिलाडी नौ-दो-ग्यारह और उस दिन के बाद साँप अब व्रती भी और मौज में भी.
मतलब यह कि उदार रहो, कृपा करो, सबके साथ समानता निबाहो, पर सस्ते न बनो. अपना भेद न दो कि दूसरे सिरपर-से रास्ता करने की ठानें.
महाकवि कालिदास ने महाराज दिलीप के वर्णन में कहा है:---
"भीमकान्तैर्नृपगुणै: स: बभूवोजिविनाम
अदृ्श्यश्चाभिगभ्यश्च यादोरत्नैरिवार्णव: !!
दिलीप में भयंकरता भी थी और कमनीयता भी, इसलिए उसके आस-पास वाले न उसकी अवज्ञा कर सकते थे, न उपेक्षा; जैसे भयंकर जलजीवों के कारण लोग समुद्र को मथ नहीं सकते, पर रत्नों के कारण छोड भी नहीं पाते.
लोकभषा में भी तो कहते हैं कि 'न गुड सा मीठा, न नीम सा कडवा!" न ऎसा ही बन कि पल में निगला जाए और न ही ऎसा बन कि तुझे लोग थूक दें. 
क्या समझे ?
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