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रविवार, 17 अक्तूबर 2010

क्या रावण सचमुच मर चुका ?

युग बीते, समय बदला लेकिन आज भी राम और रावण की सेनाएं आमने-सामने खडी हैं. एक ओर सदाचार एवं सदवृति, दूसरी ओर अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अज्ञान, अहंकार और तमस.
विरथ राम और रथी रावण में आज भी युद्ध हो रहा है. निष्ठावान, कर्तव्य परायण, सदाचारी पीछे की पंक्ति में और अवसरवादी, भ्रष्टाचारी, पद लोलुप, दुराचारी उन्हे धक्का देकर जीवन के हरेक क्षेत्र में आगे बढकर अग्रिम पंक्ति में अग्रसर हैं. युद्ध चल रहा है....कईं युग बीत गए लेकिन आज तक न तो राम ही थका है और न रावण नें ही अपनी पराजय स्वीकार की है. युद्ध चलता रहा है, चल रहा है और प्रलयकाल तक भी ये युद्ध ऎसे ही चलता रहने वाला है
तो फिर राम-राज्य कब आएगा ? क्या आ पाएगा ? रावण के जीवित रहते भला राम-राज्य कभी आ सकता है ? नहीं! राम-राज्य तो तभी आ पायेगा, जब कि सचमुच रावण का अन्त हो जाए, वो भी लकडी और कागज के रावण का नहीं मन के रावण का, अहंकार के रावण का,  अज्ञान, दुर्बुद्धि और कुसंस्कारों के रावण का.
यदि आप चाहते हैं कि इस युद्ध में राम की विजय हो और रावण मारा जाए तो उसके लिए आवश्यकता है---राम के आदर्शों को चरितार्थ करने की. सिर्फ पुतला दहन से भला क्या होगा ?  कुछ नहीं.....भला ऎसे भी कहीं ये रावण मरने वाला है ? उसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि-------राम का व्यापक आदर्श कर्म-रूप में सामने लाया जाए. रामचरित का पाठ बहुत हो चुका, माला, धूप-दीप, फूल मात्र से राम की पूजा भी बहुत कर चुके. अब समय है कि उनके संकल्प, आदर्श और जीवन दर्शन को अपनाया जाए. स्वकर्मण अभ्यर्च के मन्त्र की आज घर-घर में आवश्यकता है. सत्वस्थ होकर ही ऊर्घ्व की ओर मानव बढ सकता है------अन्यथा नहीं !

अगर ये न कर पाए तो फिर करते रहिए हर साल यूँ ही इस कागजी रावण का दहन, मनाते रहिए विजयदशमी.......लेकिन ये रावण न आजतक मरा है और न ही कभी मर पाएगा....ये फिर भी आपको वहीं खडा मिलेगा, उसी जलते हुए श्मशान में अट्ठहास करता......