ad

बुद्धि के ठेकेदार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बुद्धि के ठेकेदार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

आप क्यूँ नहीं सोचते ?

पिछले दो दिनों से तबियत कुछ नासाज चल रही है. इसलिए नैट से जरा दूरी बनी रही. आज आए तो ही मालूम चल पाया कि इन दो दिनों में पुल से कितना पानी बह चुका है. खैर, बहना तो पानी का स्वभाव ठहरा. वो तो बहेगा ही. आप चाहे लाख जतन कर लें, चाहे कैसे भी बन्ध लगा लें, लेकिन वो फिर भी अपने बहने का रास्ता खोज ही लेगा. बहना तो उसका धर्म ठहरा तो वो अपना धर्म निभाएगा ही, चाहे मार्ग कैसा भी जटिलताओं भरा क्यों न हो. कोई इन्सान थोडे ही है कि अपने धर्म को लात मार बैठे.  
पता नहीं आपने कभी इस बारे में सोचा है या नहीं, पर देखा जाए तो बात वास्तव में सोचने की ही है. धर्म के बारे में आपने कभी तो सोचा होगा. आत्मा या परमात्मा भी कभी अपके सोचने का विषय रहा होगा. जीवन-मृत्यु, अज्ञान, पाखंड, विश्वास-अन्धविश्वास जैसी चीजों नें भी कभी आपको सोचने के लिए मजबूर किया होगा. मतलब यह कि और भी कईं विषय होंगें, जिनके बारे में आपने सोचा होगा-----चाहे मन मारे ही सोचा हो.
लेकिन मैं तो कहता हूँ कि इतना कुछ सोचने पर भी आपने कुछ नहीं सोचा, क्योंकि जो कुछ भी आपने सोचा, वह सोचा न सोचा एक बराबर है. इसलिए कि आपने शायद यह कभी नहीं सोचा कि अपने बारे में भी कभी फुरसत से सोचा जाये, कभी सोचा भी होगा तो उतनी गम्भीरता से नहीं सोचा होगा. क्यों कि अपने बारे में एक बार भी तनिक गम्भीरता से सोचा होता तो शायद जीवन में फिर दोबारा से सोचने की कभी नौबत ही न आती. इसी सिलसिले में एक कहानी याद आ गई. एक बार गुरू द्रोणाचार्य नें पांडव और कौरवादि अपने शिष्यों की धनुर्विद्या की परीक्षा लेने के लिए सामने वृक्ष पर एक मिट्टी का पक्षी रख दिया और अपने सभी शिष्यों को प्रत्यंचा चढाकर निशाना साधने का आदेश देकर पूछा कि तुम्हे सामने कौन-कौन सी वस्तुएँ दिखाई दे रही हैं. किसी नें पेड कहा, तो किसी नें पत्ते, आकाश आदि अन्य सभी चीजों का ब्यौरा सुना दिया. लेकिन जब अर्जुन से पूछा गया तो उसने बताया कि मुझे तो सिर्फ पक्षी ही दिखाई दे रहा है. आप सोचकर देखें तो आपको पता चल जाएगा कि अर्जुन का वास्तविक अभिप्राय यह था-----" मैं देख रहा हूँ कि मुझे क्या देखते रहना है" गर्ज यह कि जो कुछ हम सोचते हैं, उसे सोचना कहा जाए तो वास्तविकता में वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्योंकि गाय भैंसों की जुगाली से लेकर स्टीफन हाकिंस जैसों और अणु-परमाणु वगैरह वगैरह की अदभुतता सोचते हुए भी क्या कभी आप अपने बारे में सोचते हैं?--नहीं, बिल्कुल नहीं सोचते होगें. आँखिन सबको देखिया, आँखि न देखी जाये !
मेरा मानना है कि जहाँ इन्सान के सामने उसके विचारों के खोखलेपन का प्रश्न तनकर कुतुबमीनार की तरह खडा हो जाता है, वहाँ सोचने और नोचने की शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है. लेकिन मेरा विषय इस प्रकार के सोचने से सम्बन्धित नहीं है. अज्ञानी कहे जाने पर बाहर से उसका विरोध करते हुए भी यदि आप अपने भीतर एक अज्ञानी की हरकतों का आभास पाकर दार्शनिक मुद्रा अपनायें और यह सोचने की चेष्टा करें कि वास्तव में आप अज्ञानी हैं या नहीं, तब भी वह मेरे विषय से बाहर है.
वास्तविकता यह है कि हम आप सभी सोचते हैं, किसी गधे को भी एक विशेष दृष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य की सराहना करने के बारे में सोचते रहने से आप एक दार्शनिक कहला सकते हैं. पर मेरा संकेत इस सोचने की ओर नहीं है. ईश्वर की कृपा से आप अच्छे खासे दो पैरों वाले मनुष्य है------डार्विन के अनुसार बन्दर के एकदम "नूतनतम संस्करण"---और फिर मनुष्य होने के नाते आपके पास एक सिर भी तो है, ये अलग बात है कि उस सिर में विधाता नें कुछ भरा हो या न हो. वैसे इस दिशा में भी सोचना लाजिमी है, चाहे फिर आपका सोचना किसी की बडी नाक से टक्कर खा-खाकर पीछे उछलता रहे, चाहे कहीं किसी के लिखे हुए पर ही क्यों न अटक जाए. जब तक आप बे-सिर-पैर नहीं हैं और जब तक अपने जैसे सिर-पैर वालों में रहने का आपको जन्मसिद्ध अधिकार है, तबतक यह सब चलता ही रहेगा, लेकिन इतना सोचने पर भी कुछ सोचना बाकी रह जाता है. जैसे यह पोस्ट पढकर किसी अज्ञानी पर तरस खाकर आपका सोचना लाजिमी है. इस पर यदि आपको यह सोच हो जाये कि आप भी यदि "समझदारी" के भूत को अपने वश में कर लेते तो हम जैसों से कहीं अधिक समझदार होते, तो भी आश्चर्य के लिए गुंजाईश बाकी न रहती.
हाँ तो मैं कह रहा था कि इतना सब सोच लेने पर भी कुछ सोचना हमेशा बाकी रह जाता है. आप पूछेंगें कैसे ? पोस्ट पढते-पढते, ध्यान में न रहने  के कारण अगर कहीं पूछना भूल भी जाएं तो भी मैं कहूँगा कि सोचते समय आँख और कान बन्द रक्खे जाएं तो आपको खुद ब खुद समझ में आ जाएगा कि जिसे आप आजतक सोचना समझ रहे थे, दरअसल वो सोच थी ही नहीं, सोचने का सिर्फ एक नाटक भर था. असली सोच तो इससे आगे शुरू होती है. जिसके बारे में हम आजतक कभी सोच ही नहीं पाये.
चलिए छोडिये, आप भी सोचेंगें कि कहां की सोच बैठे. लेकिन बात हकीकत में सोचने की ही है. चाहे सोचकर आप बेशक उसे अनसोचा कर दें. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में सोचा है, वह किसी "सोचनीय" स्थिति वाले व्यक्ति के बारे में सोचकर ही. लेकिन अब वह ख्यालों से ओझ हो चला है, इसलिए आगे क्या लिखूँ यह सोचने लगा तो फिर सोचता ही रह जाऊँगा. अब बताईये, आपने क्या सोचा ? :-)
चलते चलते:--
इस पोस्ट को लिखने के बाद जब हमने अपने एक मित्र को पढवाया और उनसे इसके बारे में जानना चाहा कि उन्हे ये पोस्ट कैसी लगी, तो मियाँ झट से बोल उठे---" अजी पोस्ट क्या है, निरा एकदम से कूडा है". यहाँ हमसे तनिक गलती हो गई, क्योंकि वो मित्र ठहरे महागम्भीर प्रकृ्ति वाले जीव. उन्हे ये नहीं मालूम कि ब्लागिंग में "ब्रिलियन्ट नोन्सेन्स" जैसी शैली में कुछ हास्य वगैरह भी लिखा जाता है. :-)