ad

जीवदया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जीवदया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 30 जनवरी 2011

अधिकार.......(संडे ज्ञान)

राजकुमार गौतम उद्यान में सैर कर रहे थे कि अकस्मात उनके पाँवों के पास एक पक्षी आकर गिरा. राजकुमार नें देखा कि उसके परों में एक तीर चुभा है और वह बडी बेचैनी से छटपटा रहा है. दयाद्र होकर गौतम नें पक्षी को उठाया और वे बडे यत्न से रक्त में भीगे हुए तीर को निकालने लगे, ताकि किसी प्रकार उस निरीह पक्षी के प्राणों को बचाया जा सके. गौतम अभी तीर को निकाल भी न पाये थे कि हाथ में धनुष-बाण लिए एक शिकारी आया और उनसे बडे रोष भरे स्वर में कहने लगा------
" राजकुमार! ये मेरा शिकार है, जो मेरी क्षुधापूर्ती का साधन बनने वाला है. आपको इसे उठाने का क्या अधिकार था? "
राजकुमार गौतम स्नेह भरे स्वर में बोले----"जब आपको उसके प्राण लेने का अधिकार है, तब मुझे उसके प्राण बचाने का भी अधिकार न दोगे भाई !"

रविवार, 21 नवंबर 2010

ब्लागर्स से......मनुज प्रकृति से शाकाहारी (संडे ज्ञान)

ब्लागर्स से:-

रंगों की पहचान अन्धे के बूते की बात नहीं हुआ करती. आँख है तो ही दृश्य है. दृश्य पर नेत्रहीन की आस्था असम्भव है. इन्द्रधनुष जन्मान्ध के लिए आविर्भूत नहीं होता. गाने के तराने, राग-रागनियों की स्वर लहरियाँ  वज्र-वधिर के लिए कोई अस्तित्व नहीं रखती. मल्हार बहरे के लिए नहीं गाया जाता, न वीणा झंकृत होती है....इसलिए अधर्म का चश्मा लगाए बैठे अक्ल के अन्धों पर अपना समय नष्ट  करने की अपेक्षा उन पाठकों को ध्यान में रखते हुए लिखा जाए, जिनकी अक्ल और आँखें दोनों सलामत हैं...... 
आज संडे ज्ञान में श्री धन्यकुमार जैन जी कि एक कविता की चन्द पंक्तियाँ (स्मरण-शक्ति के आधार पर)प्रस्तुत है......

मनुज प्रकृति से शाकाहारी 
माँस उसे अनुकूल नहीं है !
पशु भी मानव जैसे प्राणी
वे मेवा फल फूल नहीं हैं !!

वे जीते हैं अपने श्रम पर
होती उनके नहीं दुकाने !
मोती देते उन्हे न सागर
हीरे देती उन्हे न खानें !!
नहीं उन्हे है आय कहीं से
और न उनके कोष कहीं हैं!
नहीं कहीं के "बैंकर" बकरे
नहीं, "क्लर्क" खरगोश कही हैं !!
स्वर्णाभरण न मिलते उनको
मिलते उन्हे दुकूल नहीं है !
अत: दु:खी को और सताना
मानव के अनुकूल नहीं है !!

कभी दीवाली होली में भी
मिलती उनको खीर नहीं है !
कभी ईद औ क्रिसमिस में भी
मिलता उन्हे पनीर नहीं है!!
फिर भी तृण से क्षुधा शान्त कर
वे संतोषी खेल रहे हैं !
नंगे तन पर धूप जेठ की
ठंड पूस की झेल रहे हैं !!
इतने पर भी चलें कभी वें
मानव के प्रतिकूल नहीं हैं !!
अत: स्वाद हित उन्हे निगलना
मानव के अनुकूल नहीं हैं !!
क्या नहीं मनुज को खेत लुटाते
गेहूँ, मक्का, धान, चने हैं !
औ फल देने हेतु किमिच्छिक
दानी से उद्यान तने है !!
अत: बना पकवान चखो तुम
फल खाकर सानन्द जियो तुम
मेवों से लो सभी विटामिन
बलवर्द्धक घी, दूध पियो तुम !!
तुम्हे पालने में असमर्था !
धरती माँ की धूल नहीं है!
अत: अन्न, फल, मेवे रहते
माँस तुम्हे अनुकूल नहीं है !!

शाकाहारी और अहिंसक
बनो धर्म का मूल यही है!
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!



ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा