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सोमवार, 3 मई 2010

हिन्दी ब्लागिंग और टिप्पणियों का हिसाब-किताब (हास्य कथा)

(दरवाजे पर दस्तक की आवाज)
ललित शर्मा:- अरी ओर भगवान! जरा देखना तो सही कौन नासपीटा इतनी सुबह सुबह दरवाजा खटकटा रहा है।
(इतनी देर में फिर से दरवाजे पर ठक ठक की आवाज सुनाई देने लगी)
ललित:- (खीझ कर) तुम मत सुनना! मुझे ही उठना पडेगा। हाँ भाई बोलो तो सही कौन हो। भई हमसे कोई गलती हो गई क्या जो इतनी सुबह सुबह दरवाजा ही तोडने पर तुले हो।
आगन्तुक:- अरे भाई पहले दरवाजा तो खोलिए! क्या बाहर से ही टालने का इरादा है।
ललित शर्मा:- ठहरिए आता हूँ!
"अरे वाह्! मिश्रा जी.....आईये आईये...धन्यभाग हमारे जो आप पधारे! आईये बैठिए...
मिश्रा जी आसन ग्रहण कर लेते हैं तो ललित जी अपनी धर्मपत्नि को आवाज लगाते हैं। "अरी ओ भागवान! जरा इधर तो आना..."
श्रीमति आती हैं तो ललित जी बडे हर्षित मन से उनका मिश्रा जी से परिचय कराते हैं।" देख आज हमारे ब्लागर मित्र मिश्रा जी आए हैं...जा जरा जल्दी बढिया से चाय-नाश्ते का प्रबन्ध कर.." सुनते ही श्रीमति जी रसोई की ओर प्रस्थान कर लेती हैं और इधर ललित जी अपने ब्लागर मित्र मिश्रा जी से वार्तालाप में व्यस्त हो जाते हैं।
"अच्छा मिश्रा जी! ये तो बताईये कि अचानक कैसे आना हो गया...न कोई सूचना, न फोन"
मिश्रा जी:- भई बात ये है कि हम आज आपसे अपना हिसाब किताब क्लियर करने आए हैं।
सुनते ही ललित जी हैरान, "हिसाब! अजी मिश्रा जी कैसा हिसाब ? हमने आपसे कौन सा लोन ले रखा है जो आप हमसे वसूल करने आए हैं।
अब पता नहीं इनके मन में क्या आया कि इन्होने धर्मपत्नि को आवाज देकर चाय नाश्ता भेजने से मना कर दिया। " जरा ठहर जाओ, चाय नाश्ता अभी मत भेजना..."
भई मिश्रा जी साफ साफ कहिए, हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि आप किस हिसाब किताब की बात कर रहे हैं"
मिश्रा जी अपनी जेब से एक नोटबुक निकालते हैं और उसके पन्ने उलटते हुए बोलते चले जाते हैं...."बात ये है कि पिछले कईं दिनों से मैं आपको फोन करके कहने भी वाला था, लेकिन फिर ये सोचकर रूक गया कि कुछ दिनों बाद मेरा रायपुर जाना होगा ही, सो उसी समय आमने सामने बैठ कर ही क्लियर कर लेंगें"
भई क्या क्लियर कर लेंगें ? कुछ पता तो चले....आप तो पहेलियाँ बुझाए चले जा रहे हैं"
"भई बताता हूँ, जरा रूकिए तो सही.....अच्छा ये बताईये कि ब्लागिंग में रहते हम लोगों को आपस में जुडे हुए एक साल से अधिक तो हो ही चुका है न ?"
"जी हाँ, बिल्कुल! आप तो हमारे नजदीकी मित्रों में से हैं"
"वो सब तो ठीक है! मित्रता अपनी जगह है और हिसाब किताब अपनी जगह"
"अरे! फिर वही बात! भाई कौन सा हिसाब किताब ?"
मिश्रा जी अपने हाथ में पकडी नोटबुक ललित शर्मा के आगे कर देते हैं। ये देखिए पिछले एक साल में हमने आपकी जिस जिस पोस्ट पर जब जब टिप्पणी की है, उन सबका हिसाब इसमें लिखा हुआ है। ये देखिए कुल 420 टिप्पणियाँ हमारे द्वारा की गई हैं, ओर ये इधर देखिए साल भर में हमारी पोस्टों पर आपने कुल कितनी टिप्पणियाँ की हैं, महज 136. अभी ले देकर आपकी तरफ हमारी 284 टिप्पणियाँ बकाया रहती हैं। लेकिन आप हैं कि लौटाने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी कुछ दिनों से हमारी किसी भी पोस्ट पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आ रही...जब कि हमारी टिप्पणी रोजाना आपको पहुँच रही है। भाई ऎसा कैसे चलेगा?
"अरे मिश्रा जी! क्या बताएं आपको, आजकल बस कुछ समय ही नहीं मिल पा रहा.......वर्ना आपकी पोस्ट पर हम न टिप्पयाएं, ऎसा भला कभी हो सकता है."
"अरे वाह्! ये भी खूब कही...हमारी पोस्ट पढने के लिए आपके पास समय नहीं होता....ओर बाकी दिन भर जो 365 ब्लागों की कमेन्ट सूची में आपकी ये बनवारी लाल सरीखी मूच्छों वाली फोटू चस्पा मिलती है, वो शायद कोई जादू मन्तर से लग जाती होगी"
"ओह हो! अजी छोडिए भी इन बातो को... कुछ ओर सुनाईये"
"अरे ऎसे कैसे छोड दें....क्या हमारा समय फालतू का है जो हम आपको टिप्पणियाँ देने में खर्च करते हैं? क्या सरकार की ओर से बिजली हमें मुफ्त में मिलती है या इन्टरनैट सेवा कम्पनी हमारे बाबा जी की है, जिसके पैसे नहीं लगते! अगर इस जमाने में हम यूँ ही फोकट में दिन भर इन्टरनैट पर घूम घूम कर ब्लागों पर टिप्पयाते रहे न तो जल्द ही किसी गुरूद्वारे की शरण लेनी पड जाएगी। अरे भाई हम इतना समय और पैसा जो नष्ट करते हैं सिर्फ इसीलिए न कि हमें बदले में उसका कुछ प्रतिफल मिले, चाहे टिप्पणी के बदले टिप्पणी ही सही। लेकिन आप हैं कि उसमें भी धोखाधडी किए जा रहे हैं. ये तो सरासर हिन्दी ब्लागिंग के मूल सिद्धान्तों को नकारना हुआ। अगर आप अब भी इन्कार करते हैं तो हमारे पास सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं, या तो हम आपके खिलाफ अपने ब्लाग पर दो चार गरियाती हुई पोस्टें लिख मारें या फिर अपनी "चन्गू-मन्गू ब्लागर एसोसियशन" में अपनी शिकायत दर्ज करवाएं। अब आप ही बताईये कि हम क्या करें"
"अरे छोडिए मिश्रा जी, अच्छा चलिए आज आपकी शिकायत दूर कर देते हैं। रात भर जागकर आज आपकी सभी टिप्पणियाँ लौटा देता हूँ। अब तो खुश!"......चलिए चाय पीते हैं.....ओ भागवान!
"जी! आई!" कहते ही भाभी जी चाय नाश्ता ले आई.......मानो चाय की प्लेट थामे इन्तजार में दरवाजे के बाहर ही खडी हों...
दोनों परम मित्रों नें चाय नाश्ता किया....कुछ देर इधर उधर की बातें की और फिर मिश्रा जी दुआ सलाम करके वापिसी के लिए निकल लिए...ओर इधर ललित शर्मा जी इनका हिसाब किताब चुकता करने लैपटोप खोलकर रात भर बैठे रहे....जब सारा ऋण चुकता हो गया तो अगले दिन ही उधर से मिश्रा जी का फोन भी आ गया...आभार व्यक्त करने हेतु!
"हैल्लो! हाँ भाई ललित जी, आपकी टिप्पणियाँ वसूल पाई....इसके लिए आपका आभार. हाँ आगे से टिप्पणी साथ के साथ ही चुकता कर दिया करें. ज्यादा लम्बे चौडे हिसाब-किताब में गडबड होने का डर रहता है। अच्छा रखता हूँ, राम-राम्! भाभी जी को हमारी ओर से चरण स्पर्श कीजिएगा"
ललित जी नें फोन बन्द किया ही था कि साथ खडी उनकी श्रीमति जी पूछ बैठी--"अजी किसका फोन था?"
"वो कल जो आए थे अपने मिश्रा जी, उन्ही का था.....अरे हाँ याद आया" इतना कहते ही ललित जी नीचे को झुकने लगे.....अब पता नहीं उनकी कोई चीज गिर गई थी, जिसे कि वो उठाने के लिए झुके थे या फिर मिश्रा जी द्वारा फोन पर कहा गया अन्तिम वाक्य उन्हे याद आ गया था........राम जाने! :-)