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शनिवार, 16 जून 2012

मनुष्य की बढती स्वार्थपरता का खेल

यह बात तो हर कोई जानता है कि माँस कैसे प्राप्त किया जाता है. जीवन हर जीव को उतना ही प्रिय है, जितना कि हम सब को. अपनी खुशी से कोई पशु मरना नहीं चाहता. अत: उसे मारने से पूर्व अनेक क्रूर और अमानुषिक यातनाएं दी जाती हैं. जब वह वध स्थान पर खडा किया जाता है तो उसकी करूण पुकार से दिल पसीजने लगता है. मरने से पूर्व जैसे उसके मनोभाव रहते हैं, उसका ठीक वैसा ही प्रभाव उसके माँस पर भी पडता है. अब वही माँस जो कोई खायेगा, तो उन मनोभावों का प्रभाव उस पर पडे बिना भला कैसे रह सकता है. इसी से अपने देश में यह कहावत प्रचलित है, कि " जैसा खाये अन्न, वैसा होये मन " अर्थात हमारा भोजन जैसा होगा, हमारा मन भी ठीक वैसा ही होता जायेगा.
भोजन पर हमारा केवल शारीरिक स्वास्थय ही निर्भर नहीं है, अपितु वह मानसिक स्वास्थ्य का भी कारक है. सही मायनों में एक पूर्ण स्वस्थ्य मनुष्य उसे ही कहा जायेगा, जिसका कि शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ हों. स्वस्थ शरीर जहाँ रोगों से हमारी रक्षा करता हैं, वहीं स्वस्थ मन दुर्वासनाओं और दुर्विचारों से हमें बचाता है.
इसलिए माँसभक्षण न तो शरीर के लिए ही स्वास्थयकर है और न ही मन के लिए.
देखा जाये तो आज विश्व में चहुँ ओर जो इतनी अशान्ति दिखाई पडती है, उसके पीछे का एक कारण समाज में फैली माँसभक्षण की ये प्रवृति भी है. माँसाहार नें मानवी प्रवृति को एक दम से तामसिक बना छोडा है. अत: ऎसा मनुष्य केवल दूसरों के विनाश की ही बात सोच सकता है, न कि सृजन की. मुख से भले ही शान्ति-शान्ति चिल्लाते रहें, लेकिन उपाय ऎसे खोजे जा रहे हैं, जिनसे कि केवल अशान्ती ही बढती जा रही है.
किन्तु इस चीज का इन्सान इतना अभ्यस्त हो चुका है कि उसे माँस भक्षण करते हुए यह ख्याल तक नहीं आता कि जो पदार्थ हम खा रहे हैं, उसके लिए किसी को अपनी जान गँवानी पडी है. दूसरों के प्रति इतनी निर्दयता और स्वार्थीपन नें ही आज मनुष्य को मनुष्य के प्रति निष्ठुर बना दिया है. आज जो पशु के रक्त का प्यासा है, कल वो इन्सान के रक्त का प्यासा क्यूँ न होगा ? दरअसल प्यास तो सिर्फ रक्त की है, आज जो प्यास पशु के रक्त से बुझ सकती है, उसके लिए पशु का खूब बहाया जाता है. और कल को यही प्यास इन्सानी रक्त से बुझ सकेगी तो उसके लिए इन्सानी खून ही बहाया जायेगा.
यह तो मनुष्य की बढती हुई स्वार्थपरता का खेल है कि, वह प्रकृति से शाकाहारी होते हुए भी, प्रकृति प्रदत्त तरह-तरह के स्वास्थयकर पदार्थों के सहज सुलभ होने पर भी दूसरे की जान की कीमत नहीं आँकता और दूसरे के रक्त-माँस से अपनी भूख प्यास मिटाने में जुटा है.
माँस के निमित से रोजाना कितने लाखों पशु-पक्षियों को मार डाला जाता है और उससे समू़चे विश्व को कितनी बडी आर्थिक और स्वास्थ्य-विषयक क्षति उठानी पडती है, ये तो आप स्वयं ही सोच सकते हैं. यहाँ तो केवल इतना ही बतलाना है कि माँसाहार पूर्णत: अनैतिक है, जो कि मानवी सभ्यता को अनैतिकता की ओर लिए जा रहा है. मनुष्य की कोमल वृतियों को मसल, उसे निर्दयी, अकृतज्ञ और दुराचारी बनाने में जुटा है......!!!
दरअसल, मनुष्य की कोमल वृतियां ही मानव समाज की सुरक्षा का एक आवश्यक कचव है. उनके मर जाने पर समाज भी हरगिज जीवित नहीं रह सकता. अत: न केवल आहार अपितु औषधी, व्यवसाय अथवा मनोविनोद इत्यादि चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो, पशु-पक्षियों का निर्दयतापूर्वक वध रुकना ही चाहिए. इसी में विश्व का कल्याण है............       

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

वेद, वेद हैं.....कुरआन नहीं हैं !

दिकाल से भारतीय आर्य संस्कृति का विश्व में जो महत्वपूर्ण स्थान रहा है, उसे न तो किसी के चाहे झुठलाया ही जा सकता है और न ही मिटाया. ये वो एकमात्र संस्कृति रही है, जिसे उसके त्याग, शील, दया, अहिँसा और ज्ञान के लिए जाना जाता रहा है. हालाँकि वर्तमान युग में चन्द अरबी सभ्यता के पोषक एवं पालक तत्व इसकी गरिमा को लाँछित करने में पूरे मनोयोग से प्रयत्नशील हैं. ये वो आसुरी प्रवृति के लोग हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को अपने अज्ञान, कपट, हिँसा और अहं की अग्नि में भस्मीभुत कर देना चाहते हैं. लेकिन ये लोग शायद जानते ही नहीं, या कहें कि जानते हुए भी इस सत्य को पचा पाने में असमर्थ हैं, कि युगों से न जाने उनके जैसी कितनी सभ्यताओं और संस्कृतियों को ये सनातन संस्कृति अपने से समाहित कर चुकी है.
जेहादी मानसिकता के पोषक इन मलेच्छों की मलेच्छता का रोग तो यहाँ तक बढ गया है कि ये कुटिल लोग यह निराधार कल्पना करने से भी न चूके कि वेदों में माँसाहार की प्रशन्सा की गई है. ओर तो ओर आईएसआई के एक मलेच्छ एजेन्ट नें तो लगता है कि इस बात का बीडा ही उठा रखा है कि चाहे कैसे भी हो, वेदों में पशुबलि, माँसभक्षण वगैरह वगैरह सिद्ध करके ही रहूँगा.
कितने आश्चर्य की बात है कि जैसा ये लोग भविष्य को बदलना चाहते हैं, उसी प्रकार भूत को बदल डालने के अशक्य अनुष्ठान में भी प्रवृत होने लगे हैं. लेकिन ये मूर्ख नहीं जानते कि भूत सदा ही निश्चल और अमिट होता है. भविष्य की तरह वह कभी बनाये नहीं बनता. भारतीय आर्य संस्कृति और उसके आधार ग्रन्थ सत्य, शील, अहिँसा, त्याग और विश्वबन्धुत्व जैसे न जाने कितने सद्गुणों की उपज हैं. यह एक ऎसा ज्वलन्त सत्य है, जो किसी भी प्रकार से आवृत या असंदिग्ध न तो युगों से कभी हो सका है और न ही भविष्य में कभी हो सकता है. चाहे ये आसुरी जीव लाख सिर पटक लें.................
हालाँकि ब्लागिंग की दुनिया में सक्रिय प्रत्येक पाठक इस बात को भली भाँती समझता है कि विधर्मियों द्वारा फैलाया जा रहा ये मिथ्याचार केवल और केवलमात्र इस राष्ट्र एवं इसकी संस्कृति विषयक अरूचि का द्योतक है. भला मूर्खों को कोई क्या समझाये कि माँस भक्षण के विषय में उस समय के समाज में कितनी घृणा व्याप्त थी, यह तो इस जाति के धर्मशास्त्रों को स्वयं पढकर ही जाना जा सकता है,न कि अपने आकाओं द्वारा बताये गये मनमाफिक अनुवादों द्वारा.
भारतीय धार्मिक तथा व्यवहारिक शास्त्रों में "मानव जाति का आहार" क्या होना चाहिए, इस विषय की विचारणा तो अनादिकाल से ही होती आ रही है. वेद, पुराण, विविध स्मृतियां, जैन-सिद्धान्त इत्यादि इस विचारणा के मौलिक आधार ग्रन्थ हैं. इनके अतिरिक्त आयुर्वेद शास्त्र, उसके निघण्टु कोष तथा पाकशास्त्र भी मानव जाति के आहार के विषय में पर्याप्त प्रकाश डालने वाले ग्रन्थ हैं. परन्तु इस विषय की खोज करने का समय तभी आता है, जबकि मानव के भक्षण योग्य पदार्थों के सम्बन्ध में दो मत खडे होते हैं.
अनादि काल से मानव घी, दूध, दही एवं वनस्पति का ही भोजन करता आया है, माना कि समय-समय पर इसके सम्बन्ध में विपरीत विचार भी उपस्थित हुए हैं. लेकिन तात्कालिक विद्वानों नें अपने-अपने ग्रन्थों में भोजन सम्बन्धी इस नवीन "माँसभोजी मान्यता" का खंडन ही किया है न कि समर्थन.
अब इससे बढकर भला ओर क्या प्रमाण हो सकता है कि शास्त्र की दृष्टि में जो पदार्थ अभक्ष्य होता, उसकी निवृति के लिए उसे गो-माँस तुल्य बताकर उसे छोडने का उपदेश दिया जाता था. इस विषय के दृष्टान्तों से तो धर्मशास्त्र भरे पडे हैं. हम उनमें से केवल एक ही उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करेंगें.
घृतं वा यदि वा तैलं, विप्रोनाद्यान्नखस्थितम !
यमस्तदशुचि प्राह, तुल्यं गोमासभक्षण: !!

माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि: !
प्र नु वोचं चिकितुपे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट !! (ऋग्वेद 8/101/15)
अर्थात रूद्र ब्रह्मचारियों की माता, वसु ब्रह्मचारियों के लिए दुहिता के समान प्रिय, आदित्य ब्रह्मचारियों के लिए बहिन के समान स्नेहशील, दुग्धरूप अमृत के केन्द्र इस (अनागम) निर्दोष (अदितिम) अखंडनीया (गाम) गौ को (मा वधिष्ट) कभी मत मार. ऎसा मैं (चिकितेषु जनाय) प्रत्येक विचारशील मनुष्य के लिए (प्रनुवोचम) उपदेश करता हूँ.
वेदों के इतने स्पष्ट आदेश होते हुए यह कल्पना करना भी अपने आप में नितांत असंगत है कि वैदिक यज्ञों में माँसाहुति दी जाती थी, या कि वैदिक आर्य जाति पशुबलि, गौहत्या, माँसभक्ष्ण जैसे निकृष्ट कर्मों में संलग्न थी. यदि कोई राक्षस ( जिन्हे वेदों में यातुधान वा हिँसक के नाम से पुकारते हुए अत्यन्त निन्दनीय बतलाया गया है) ऎसा दुष्कर्म करते होंगें--------जैसा कि प्रत्येक समय में अच्छे-बुरे व्यक्ति कम या अधिक मात्रा में होते ही हैं, तो उनके इस कार्य को किसी प्रकार भी शिष्टानुमोदित नहीं माना जा सकता. ऎसे पापियों के लिए तो वेद मृत्युदंड का ही विधान करते हैं. जैसा कि यहाँ सप्रमाण दिखाया जा चुका है...........
यदि नो गां हंसि यघश्वं यदि पुरूषम !
त्वं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोसो अवीरहा !! (अथर्व.1/1/64)
अर्थात हे दुष्ट ! यदि तूं हमारे गायें, घोडे आदि पशु अथवा पुरूषों की हत्या करेगा तो हम तुझे सीसे की गोली से वेध देंगें.
य: पौरूषेयेण क्रविषा समंक्ते यो अश्वयेन पशुना: यातुधान: !
यो अध्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च !! (ऋग्वेद 10/87/16)
अर्थात जो मानव, घोडे या अन्य पशु के माँस का भक्षण करता है. और जो गौंओं की हत्या कर के उनके दूध से अन्यों को वंचित करता है. हे राजन! यदि अन्य उपायों से ऎसा यातुधान ( हिँसक--राक्षस वृति का मनुष्य) न माने तो अपने तेज से उसके सिर तक को काट डाल. यह अन्तिम दण्ड है जिसको दिया जा सकता है.
उपरोक्त मन्त्र माँसभक्षण निषेध की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है. अत: उसका सायणाचार्य कृत भाष्य भी यहाँ उद्धृत किया जाता है:--
य: यातुधान:--राक्षस: ( पौरूषेयेन क्रविषा) पुरूषसंम्बन्धिना हिंसेण (समंड्ते) आत्मानं संगमयति (यश्च अश्व्येन) अश्वसमूहेन तदियेन मांसेनेत्यर्थ: आत्मानं संगमयति यो वा यातुधान: अन्येन पशुना आत्मानं संगमयति यो वा यातुधान: (अध्न्याया:) गो: (क्षीरम) (भरति) हरति हे अग्ने त्वं तेषां सर्वेषामपि राक्षसानाम (शीर्षाणि) शिरांसि (हरसा) त्वदीयेन तेजसा (वृश्चा) छिन्धि ! इस का अर्थ वही है, जो हम यहाँ ऊपर दे चुके हैं.
ऋग्वेद 10.87 में यातुधानो अथवा राक्षसों के स्वभाव का वर्णन है. उसमें 3-4 स्थानों पर "क्रव्याद" इस विशेषण का प्रयोग है, जिसका अर्थ माँसभक्षक है. उपरोक्त ऋचा उसी सूक्त की है, जिसका सायणभाष्य सहित हमने उल्लेख किया है.
य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्व.8/6/23)
इस मन्त्र में कहा है कि जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !
हालाँकि इस विषय में सैकडों क्या हजारों मन्त्रों को उद्धृत किया जा सकता है, किन्तु विषय विस्तार के भय से दो ओर मन्त्रों का उल्लेख कर जिनमें चावल, जौं, माष ( उडद, तिल आदि उत्तम अन्न के सेवन का और पशुओं के दूध को ही ( न कि मांस को) सेवन करने का उपदेश है, हम इस विषय को समाप्त करते हैं.
पुष्टिं पशुनां परिजग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम !
पय: पशुनां रसमोषधीनां बृहस्पति: सविता मे नियच्छात !! (अथर्व.19/31/5)
इस मन्त्र में भी यही कहा है कि मैं पशुओं की पुष्टि वा शक्ति को अपने अन्दर ग्रहण करता हूं और धान्य का सेवन करता हूँ. सर्वोत्पादक ज्ञानदायक परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बनाया है कि (पशुनां पय:) गौ, बकरी आदि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण किया जाये न कि मांस तथा औषधियों के रस का आरोग्य के लिए सेवन किया जाए. यहां भी "पशुनां पयइति बृहस्पति: मे नियच्छात:" अर्थात ज्ञानप्रद परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बना दिया है कि मैं गवादि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण करूँ, स्पष्टतया मांसनिषेधक है !
अथर्ववेद 8/2/18 में ब्रीही और यव अर्थात चावल और जौं (ये धान्यों के उपलक्षण हैं) इत्यादि के विषय में कहा है कि------
शिवौ ते स्तां ब्रीहीयवावबलासावदोमधौ !
एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुण्चतौ अंहस: !!
हे मनुष्य ! तेरे लिए चावल, जौं आदि धान्य कल्याणकारी हैं. ये रोगों को दूर करते हैं और सात्विक होने के कारण पाप वासना से दूर रखते हैं.
इन के विरूद्ध माँस पाप वासना को बढाने वाला और अनेक रोगोत्पादक है. अत: माँस शब्द की जो व्युत्पत्ति  निरूक्त अध्याय 4.पाद 1. खं 3. में बताई गई है, उसमें कहा है---मासं माननं वा, मानसं वा, मनोस्मिन् सीदतीति वा !
माँस इसलिए कहते हैं कि यह मा + अननम है अर्थात इस से दीर्घ जीवन प्राप्त नहीं होता प्रत्युत यह आयु को क्षीण करने वाला है. ( मानसं वा ) यह हिंसाजन्य होने से मानस पापों को प्रोत्साहित करने वाला होता है. (मनोस्मिन् सीदतीति वा) जिस में भी मनुष्य का मन लग जाए, जो मन पसन्द हो ऎसे पदार्थ को मांस कह सकते हैं. इसीलिए परमान्न वा खीर तथा फलों के गूदे इत्यादि के लिए मांस शब्द का प्रयोग वेदों में कईं जगह आता है.
इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि वेदों में माँस भक्षण का पूर्णतय: निषेध है. इस के विरूद्ध धूर्तों द्वारा जहाँ कहीं कुछ अन्टशन्ट लिखा/कहा गया हो, वह अप्रमाणिक और अमान्य है, क्योंकि वेद, वेद हैं.......कुरआन नहीं हैं !

सोमवार, 25 जुलाई 2011

उफ्!

एक ओर जयचन्दी इरादे हैं, तो दूसरी ओर दिलोदिमाग में ढेर सारी चिन्ताएं और गुस्सा लिए एक आम इन्सान की आम जिन्दगी. इस समय जो कुछ हो रहा है, वही एकमात्र सच है और जिस ढंग से हो रहा है, शायद वही आज की नैतिकता भी है. आज के इस युग में 'सत्य' और 'नैतिकता' न तो आईने की तरह ही रहे हैं और न ही किसी कसौटी की तरह, कि इन्हे किसी के चेहरे या चरित्र के सामने रख दिया जाये. किन्तु जो बेचारे ऎसा सोचते हैं, वे आज की 'सफल' जिन्दगी से अलग, एक विकलता और अकुलाहट का अनुभव कर रहे होते हैं. बस जो जितना ही संवेदनशील है, वह उतना ही इस अनुभव के बीच है.
जमाने की रफ्तार को देखा जाए तो आज बैठना किसी को नहीं है, शर्त है तो बस चलते रहने की. हर कोई चलता चले जा रहा है. पसीने से तरबतर और पस्त. जो बेचारे नहीं चल पा रहे हैं, उन्हे चलाने की कौशिशें की जा रही है, घिस्से हुए सिक्के या मुडे-तुडे फटे नोट की तरह.
सुना है कि थकान से समझ ढीली होती जाती है, और उसी अनुपात में क्रोध भी बढता जाता है. और फिर जब वो हद से अधिक बढ जाता है तो फिर उतरने के लिए रास्ते खोजा करता है. अब जिन लोगों या स्थितियों पर क्रोध है, उनका कुछ भी बिगाड पाना संभव न देखकर आदमी करे तो क्या करे ? वो बस अपने आप में सिर्फ कुढ सकता है और वह कुढ रहा है. गुस्सा, बेबसी,तंगदस्ती,थकान,कुढन,तनाव और गतिशीलता------इन सुर्खियों से तैयार शर्तनामे का हर अक्षर आज की दिनचर्या का विवरण है और इस दिनचर्या के चारों ओर फैली हुई है----लोकतान्त्रिक बाडे की विशाल दीवारे, जहाँ सब कुछ समझने की स्वतन्त्रता तो है, किन्तु कुछ भी सोच पाने के लिए फुरसत और थोडा भी कर गुजरने का साहस नहीं है. शाश्वत प्रश्न और शाश्वत मूल्य जैसी चीजों का तो नामोनिशान तक मिटाया जा चुका है. हो भी क्यों न-----आखिर आधुनिक होने के लिए मूल्यों की तिलांजली तो देनी ही पडती है.
देश, समाज, भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आधुनिकता, लोकतन्त्र, राष्ट्रप्रेम, मूल्य और भी न जाने क्या क्या--------उफ! कितना गडमड है न ये सबकुछ ?

ज्योतिष की सार्थकता

शनिवार, 16 जुलाई 2011

मनुज प्रकृति से शाकाहारी

मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !
पशु भी मानव जैसे प्राणी
वे मेवा फल फूल नहीं हैं !!

वे जीते हैं अपने श्रम पर
होती उनके नहीं दुकानें
मोती देते उन्हे न सागर
हीरे देती उन्हे न खानें
नहीं उन्हे हैं आय कहीं से
और न उनके कोष कहीं हैं
केवल तृण से क्षुधा शान्त कर
वे संतोषी खेल रहे हैं
नंगे तन पर धूप जेठ की
ठंड पूस की झेल रहे हैं
इतने पर भी चलें कभी वें
मानव के प्रतिकूल नहीं हैं
अत: स्वाद हित उन्हे निगलना
सभ्यता के अनुकूल नहीं है!
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!

नदियों का मल खाकर खारा,
पानी पी जी रही मछलियाँ
कभी मनुज के खेतों में घुस
चरती नहीं वे मटर की फलियाँ
अत: निहत्थी जल कुमारियों
के घर जाकर जाल बिछाना
छल से उन्हे बलात पकडना
निरीह जीव पर छुरी चलाना
दुराचार है ! अनाचार है !
यह छोटी सी भूल नहीं है
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है  !!

मित्रो माँस को तज कर उसका
उत्पादन तुम आज घटाओ,
बनो निरामिष अन्न उगानें--
में तुम अपना हाथ बँटाओ,
तजो रे मानव! छुरी कटारी,
नदियों मे अब जाल न डालो
और चला हल खेतों में तुम
अब गेहूँ की बाल निकालो
शाकाहारी और अहिँसक
बनो धर्म का मूल यही है
मनुज प्रकृति से शाकाहारी,
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!

रचनाकार:-----श्री धन्यकुमार

सोमवार, 27 जून 2011

पुनर्जन्म की वैज्ञानिक संभावना

पुनर्जन्म----एक ऎसा विचार जिसे हिन्दू धर्म की सभी शाखाओं द्वारा स्वीकृत किया गया है. भगवतगीता का कहना है कि जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है उसका जन्म भी होना निश्चित है. लेकिन जन्म अन्त समय के संस्कार और इच्छाओं के अनुरूप होता है. 
भारतीय दार्शनिकों को तो पुनर्जन्म स्वीकारने में कोई परेशानी नहीं होती किन्तु विज्ञान जगत का स्वीकार करना ही भारतीय दर्शन की सबसे बडी बिजय होगी. विज्ञान की स्पष्ट धारणा है कि कभी भी कुछ पूर्णत: समाप्त नहीं होता. केवल उसका रूप परिवर्तित हो जाता है. तो क्या यह संभव नहीं कि जीवन भी समाप्त न होकर परिवर्तन हो जाए.

"यह सम्पूर्ण जीवन जगत तरंगात्मक है. जीवन मनोभौतिक तरंगों का समानान्तरीकरण है. यह समानान्तरीकरण का ही जीवन है. इसका नियोजन मनुष्य की मानसिक या शारीरिक मृत्यु का कारण होता है."
विज्ञान जगत भी इस बात को स्वीकार करता है कि जीवन तरंगात्मक है. इ.सी.जी.( E.C.G.) भी इस बात का स्पष्ट प्रमाण देती है. तरंग जहाँ जीवन हैं, सीधी रेखा मृत्यु की द्योतक है.
जब हम मानकर चलते हैं कि तरंगें कभी समाप्त नहीं होती तो यह मानना ही पडेगा कि मनुष्य की मृत्यु के पश्चात उसकी मनस तरंगें ब्राह्मंड में ही विचरण करती रहती हैं और जब किसी भौतिक तरंग (शरीर) से उनका समानान्तरीकरण हो जाता हैतो यह उस मनस तरंग का पुनर्जन्म हुआ.
यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान जगत यह मान रहा है कि शरीर की मृत्यु के पश्चात मस्तिष्क लगभग 5 या 6 घंटे की अवधि तक जीवित रहता है. मेरे शब्दों में मनस की अन्तर्यात्रा सम्भव है. भारतीय शैली में अग्निसंस्कार में मृतक की कपालक्रिया द्वारा मस्तिष्क की मृत्यु को भी पूर्णरूप से सुनिश्चित कर लिया जाता है ताकि आत्मा मुक्त हो जाए, भटके नहीं.
किसी भी शैली का अंतिम संस्कार शरीर को नष्ट कर ही देता है. अत: यह तो निश्चित है कि शरीर का पुनर्जन्म नहीं होता किन्तु विशेष स्थितियों में मनस या तरंगों का पुनर्जन्म हो सकता है. कोई आवश्यक नहीं ईसा या बुद्ध की तरंग पुन: धरती पर ही जन्म लें. हो सकता है हजारों वर्षों बाद किसी अन्य जीवित ग्रह पर उनका पुनर्जन्म हो रहा हो.
पुनर्जन्म की स्मृति की व्याख्या भी इसी आधार पर सहजता में होती है. क्योंकि अधिकांशत: पुनर्जन्म का स्मरण रखने वाले व्यक्ति अबोध शिशु ही होते हैं. उनके संस्काररहित कच्चे मन से कोई मनस तरंग सम्पर्क स्थापित कर लेती है किन्तु जब उनका मस्तिष्क अपने ज्ञान व अनुभव स्वयं पर अंकित करने में सक्षम हो जाता है तो ऎसी स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं. यह मेरी धारणा है. वैसे भी प्राय: असामान्य रूप से मृत्यु प्राप्त करने वाली को ही पुनर्जन्म की घटनायें देखने सुनने को मिलती हैं.

किन्तु इस ज्योतिषांज्योति का अमृत प्राप्त कर लेने वाला साधक ब्रह्ममय हो जाता है. उसकी मनस तरंगें महामानस में विलीन हो जाती है.

शुक्रवार, 24 जून 2011

क्यूंकि हर धर्म यही कहता है.........

श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं----"सर्वभूत हिते रत्ता" अर्थात सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हित में रत और सम्पूर्ण प्राणियों का सुह्रद रहो. जो शुभफल प्राणियों पर दया करने से होता है, वह फल न तो वेदों से, समस्त यज्ञों के करने से और न ही किसी तीर्थ, वन्दन अथवा स्नान-दान इत्यादि से होता है.

जीवितुं य: स्वयं चेच्छेत कथं सोन्यं प्रघात्तयेतु !
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत !!
जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को भला कैसे मार सकता है ? प्राणी जैसा अपने लिए चाहता है, वैसा ही दूसरों के लिए भी चाहे. कोई भी इन्सान यह नहीं चाहता कि कोई हिँसक पशु या मनुष्य मुझे, मेरे बाल-बच्चों, इष्टमित्रों वा आत्मीयजनों को किसी प्रकार का कष्ट दे या हानि पहुँचाये अथवा प्राण ले ले या इनका माँस खाये. एक कसाई जो प्रतिदिन सैकडों प्राणियों के गले पर खंजर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूईं भी चुभोयें, तो वह उसे भी कभी सहन नहीं करेगा. फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे भला कहाँ से मिल गया ?
मित्रस्य चक्षुणा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे !!
हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें. इस वेदाज्ञानुसार सब प्राणियों को मित्रवत समझकर सेवा करें, सुख दे. इसी में जीवन की सफलता है. इसी से यह लोक और परलोक दोनों बनते हैं.

फिर दूसरों के प्रति हमें वैसा बर्ताव कदापि नहीं करना चाहिए, जिसे हम अपने लिए पसन्द न करें. कहा भी है, कि------"आत्मन प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत". लेकिन देखिए दुनिया में कितना बडा विरोधाभास है, जहाँ एक ओर हम भगवान से "दया के लिए" प्रार्थना करते हैं और वहीं दूसरे प्राणियों के प्रति क्रूर हो जाते हैं-------How is that man who prays for money, is himself not merciful towards other fellow beings.


इस्लामिक धर्मग्रन्थ कुरआन शरीफ का आरम्भ ही "बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम" से होता है. जिसका अर्थ है कि खुदा रहीम अर्थात "सब पर रहम" करने वाला है. इनके अनुनायियों के मुख से भी सदैव यही सुनने को मिलता है कि अल्लाह अत्यन्त कृपाशील दयावान है .वही हर चीज को पैदा करने वाला और उसका निगहबान(Guardian ) है. अब जीभ के स्वाद के चक्कर में मनुष्य उस "निगहबान" की देखरेख में उसी की पैदा की हुई चीज की हत्या करे, तो क्या यह अत्यन्त विचारणीय प्रश्न नहीं ?

श्री अरविन्द कहते रहे हैं कि-----"जो भोजन आप लेते हैं, उसके साथ न्यूनाधिक मात्रा में उस पशु की जिसका माँस आप निगलते हैं, चेतना भी लेते हैं"

भगवान बुद्ध नें "माँस और खून के आहार" को अभक्ष्य और घृणा से भरा और 'मलेच्छों द्वारा सेवित' कहा है.  

सिक्ख धर्म के जनक गुरू नानक देव जी कहते हैं-----"घृणित खून जब मनुष्य पियेगा, तो वह निर्मल चित्त
भला कैसे रह सकेगा."

पारसी धर्म के प्रणेता जोरास्टर नें कसाईखानों को पाप की आकर्षण शक्ति का केन्द्र बताया है और हिब्रू धर्म के सन्त इजराइल कहते हैं----" जब तुम बहुत प्रार्थना करते हो, मैं उन्हे नहीं सुनूँगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं". चीनी विद्वान कन्फ्यूनिस नें भी जहाँ "पशु आहार को संसार का सर्वाधिक अनैतिक कर्म" कहा है, वहीं रामकृष्ण परमहँस का कहना है, कि-----"सात्विक आहार-उच्च विचार मनुष्य को परम शान्ति प्रदान करने का एकमात्र साधन है".

भगवान महावीर नें अहिँसा को "अश्रमों का ह्रदय", "शास्त्रों का गर्भ" (Nucleous) एवं "व्रत-उपवास तथा सदगुणों का पिंडी भूतसार" कहा है. और संसार में जितने प्राणी है, उन सबको जानते हुए या अनजाने में भी कोई कष्ट न देना ही धर्म का एकमात्र मूल तत्व है.

आपने देखा कि मनुष्य जाति के इतिहास में शायद ही कोई ऎसा धर्म अथवा धर्मशास्त्र होगा, जिसमें अहिंसा को सबसे ऊँचा स्थान न दिया गया हो. लेकिन इन्सान, जो कि अपने स्वयं का आसन इस संसार के अन्य समस्त प्राणियों से कहीं ऊँचा समझता है. क्या उस पर बैठकर उसे अपने खानपान का इतना भी विवेक नहीं कि वह सही मायनों में मानव बनना तो बहुत दूर की बात रही, एक पशु से ही कुछ सीख ले सके. एक पशु भी इस बात को अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य. उसे कोई सिखानेवाला नहीं है, फिर भी वो अपने आहार का उचित ज्ञान रखता है, परन्तु इन्सान पशु से भी इतना नीचे गिर गया है कि दूसरों के द्वारा परामर्श दिए जाने पर भी वह अपने को उसी रूप में गौरवशाली समझता है. क्या एक समझदार आदमी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो अपना पौरूष अपने से निर्बल प्राणी को मारकर अथवा उसे खाकर ही दिखाये ?. विधाता नें इन्सान के खाने के लिए स्वादु मधुर, पौष्टिक, बुद्धिवर्धक और हितकर इतने पदार्थ बना रखे हैं कि उनको छोडकर एक निकृष्ट अभक्ष्य पदार्थ पर टूट पडना कहाँ तक उचित है ?

यह कहना सर्वथा उचित ही होगा कि माँसाहार को छोड देने वाला व्यक्ति अन्य अनेक प्रकार की बुराईयों से भी स्वत: ही मुक्त हो जायेगा. इसलिए मेरा यही कहना है कि जो लोग इस बुराई से दूर रहे हैं, उनकी अपेक्षा वे लोग कहीं अधिक साहसी माने जायेंगें, जो इस लत को लात मारकर निरीह पशुओं के आँसू पोंछेंगें.
पक्षी और चौपाये सब मार-मार के खाय,
फिर भी सगर्व खुद को इन्सान कहाये !
बन के मर्द बहादुरी, बकरों-मुर्गों पर दिखलाये !
क्यूं  तुझे लाज नहीं आये ?

गुरुवार, 16 जून 2011

क्या भ्रष्टाचार के इस दानव पर अंकुश लगा पाना सम्भव है ?


आचार और विचार की शुद्धता भारतीय सभ्यता का मूलमन्त्र रहा है. मनुष्यता सदैव आचरण और व्यवहार से पहचानी जाती है; पैसा, पद अथवा उपाधि से नहीं. हर युग, हर देश और यहाँ तक कि हर धर्म में मानव-जीवन की मर्यादा के एक-से सिद्धान्त स्वीकृत हैं. वे हैं---कर्तव्य-परायणता, सत्यनिष्ठा, नि:स्वार्थ कर्म, मानवमात्र के प्रति सहानुभूति और परोपकार की भावना आदि. इन मर्यादाओं के अनुसार किया गया आचरण और व्यवहार ही "सदाचार" माना जाता है तथा इसके विपरीत, मर्यादा से हटकर, स्वार्थपूर्ण, दूषित आचरण "भ्रष्टाचार" है. हमारा जो भी कार्य औचित्य के विरूद्ध होगा, अनुचित होगा, वह निश्चित ही भ्रष्टाचार की श्रेणी में गिना जाएगा.
आज स्थिति ये है कि ये "भ्रष्टाचार" हमारे जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में कैंसर के भीषण रोग की तरह इस प्रकार अपनी जडें जमा चुका है कि यदि एक क्षेत्र में इसकी चिकित्सा की भी जाती है तो वह दूसरे क्षेत्र में, दूसरे रूप में फूट पडता है. प्रशासन तन्त्र के हर विभाग, अनुभाग और प्रभाग तथा राजनैतिक क्षेत्र में तो भ्रष्टाचार एक औपचारिक अनिवार्यता बन ही चुका है----सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र भी इस 'महारोग' के कीटाणुओं से बच नहीं पाया है. कोई भी ऎसा कार्य जो कि एक नागरिक के रूप में हमारा मूलभूत संवैधानिक अधिकार है, तो भी किसी न किसी सम्बन्धित अधिकारी की जेब या मुट्ठी गर्म किए बिना बात ही नहीं सुनी जाती. जब न्यायसंगत और 'उचित' कार्य भी रिश्वत अथवा सिफारिश के बिना नहीं हो सकते तो अनुचित रूप से लाभकारी कार्यों के लिए तो 'उच्चतम' भ्रष्टाचार स्वाभाविक ही है.

भ्रष्टाचार के इस विषैले कीट नें इस देश के लोकतन्त्र की जडों तक तो पूरी तरह से खोखला कर डाला है.आज स्थिति यह है कि प्रिंट मीडिया हो चाहे टेलिवीजन मीडिया---अभिव्यक्ति-स्वातन्त्र्य के मूलभूत अधिकार पर भी सेंसर, पक्षपात तथा ब्लैकमेल, चरित्रहनन, अपप्रचार आदि के रूप में भ्रष्टाचार का दानव निरन्तर कुठाराघात कर रहा है.

आखिर, भ्रष्टाचार की इस भयंकर महाव्याधि का कारण क्या है ? इसका उत्तरदायी कौन है ? निस्सन्देह नौकरशाही प्रशासनिक व्यवस्था इस समस्या की जड है. स्थिति ये है कि ऊपर मन्त्री से लेकर नीचे सन्तरी तक भ्रष्टाचार के अनेक सोपान है. लेकिन इन सोपानों का निर्माणकर्ता कौन है ? केवल शासनतन्त्र को इसका दोष देकर सन्तोष नहीं किया जा सकता. यह ठीक है कि भ्रष्टाचार का जन्म प्रशासन और न्याय-व्यवस्था में विलम्ब का कारण होता है. सरकार विभिन्न संस्थानों, उद्योगों तथा योजना-कार्यों को पर्याप्त अनुदान प्रदान करती है, जिसे स्वार्थी भ्रष्टाचारी बीच में ही हडप लेते हैं, एक आम आदमी तक कुछ नहीं पहुँच पाता. जो स्वयं को मिलने वाले अधिकार का कुछ अंश बिचौलियों में बाँट सके, सिर्फ वही कुछ हासिल कर सकता है. क्या इस सबका कारण स्वयं जनता नहीं है ? कोई भी अधिकारी मूलत: भ्रष्टाचारी नहीं होता. जनता स्वयं अपनी आवश्यकताओं को 'समय से पहले' या अनुचित रूप से पूरा करने के लोभ से, उसी लोभ का कुछ भाग सम्बन्धित अधिकारी को पेश करती है. इस प्रकार स्वयं 'दाना फेंककर' भ्रष्टाचार का श्रीगणेश करती है. कहा जा सकता है कि जिसने लाखों रूपयों का चढावा चढाकर कोई सरकारी पद प्राप्त किया है, वह अधिकार हाथ में आते ही अपना 'व्यय' क्यों नहीं निकालेगा ? लेकिन सबसे पहले रिश्वत देकर भ्रष्टाचार को स्वीकृति तो उसी ने दी थी ! आज का अधिकारी, नेता या मन्त्री कल तक जनता का ही एक अंग था. उस समय यदि वह भ्रष्ट साधन अपनाकर अपनी तथाकथित "उन्नति" के लिए पासा न फैंकें------और प्रत्येक व्यक्ति ऎसा ही निश्चय कर ले तो भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन नहीं मिल सकता. इसी प्रकार प्रत्येक राजनीतिक दल चुनाव के लिए विभिन्न तरह के लोगों और उद्योगों से पार्टी फंड के रूप में "काला धन" हासिल करता है. अत: विजयी होने पर उन व्यक्तियों एवं उद्योगों को उचित-ानुचित रूप से लाभ पहुँचाने की वह दल हर सम्भव चेष्टा करता है. इस प्रकार भ्रष्टाचार का चक्र अनवरत रूप से चलता रहता है.

स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की निरन्तर वृद्धि का कारण किसी एक वर्ग की स्वार्थान्ध वृति नहीं, जनता और सरकार, देश और समाज के प्राय: सभी वर्ग किसी-न-किसी रूप में इस समस्या के लिए जिम्मेदार हैं. इस समस्या के निरन्तर पनपने के कुछ मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कारण भी हैं. कईं बार कुछ लोगों की मजबूरी और लाचारी उन्हे न चाहते हुए भी भ्रष्टाचार के जाल में फँसा देती है. आकाश को छूने वाली महँगाई के कारण अच्छ ऊँचे पद पर काम करने तथा पर्याप्त वेतन पाने वाले लोग भी परिवार का भली-भाँती पालन-पोषण करने में असमर्थ हो रहे हैं, निम्न और साधारण वर्ग की तो बात ही क्या है. इस स्थिति में कुछ दिन तक तो काम चल सकता है, जीवन की सभी आवश्यकताएं स्थायी रूप से पूरी नहीं की जा सकती. ऎसी स्थिति में लोग विवश होकर अनुचित साधनों से आय बढाने के उपाय नहीं सोचेंगें तो भला ओर क्या करेंगें. ये तो रहा आर्थिक कारण जो भ्रष्टाचार के इस पौधे को खाद देने का काम कर रहा है. इसके अतिरिक्त इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण ये है कि हम लोग अपनी आवश्यकताएँ दूसरों की देखादेखी बढाते चले जा रहे हैं. आज केवल पेट भरने, शरीर ढँकने या रहने में इतना खर्च नहीं होता, जितना कि ऊपरी रख-रखाव, मौजमस्ती , शानो-शौकत और बनाव-श्रृंगार में होता है. हमारे घर में चाहे दो समय का भोजन जुटाना कठिन हो किन्तु मोहल्ले, समाज और दुनिया की नजरों में अपनी मिथ्या शान बनाये रखने के लिए जिन ढकोसलों में पडे हैं, उन्हे ही हम जीवन का अनिवार्य अंग मानने लगे हैं. इन ऊपरी अनावश्यक बातों के लिए जब हमारी उचित आय पूरी नहीं पडती, तब अनुचित आमदनी के लिए ललकना तो स्वाभाविक ही है!

भ्रष्टाचार के जो भी रूप और कारण आज हम देख रहे हैं, उनका निराकरण कोई असम्भव बात नहीं है. वैसे तो देश के बडे-बडे विचारक और अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि 'काला धन' अर्थात भ्रष्टाचार देश का एक समानान्तर अर्र्थशास्त्र बन चुका है, जिससे मुक्ति नहीं पाई अज सकती. लेकिन मैं कहता हूँ कि यह सोच केवल बुराई के सामने आत्म-समर्पण है. कठोर नियन्त्रण और सच्चे आत्मानुशासन से इस समस्या का समाधान निश्चित रूप से किया जा सकता है. कठोर कानूनी व्यवस्था द्वारा निसन्न्देह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया अज सकता है. बस आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि सरकार और जनता की आँख खुली रहनी चाहिए. आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक------किसी भी प्रकार का भ्रष्ट आचरण करने वाले पर तनिक सा सन्देह होते ही कठोर निगरानी की जानी चाहिए और भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आने पर अपराधी को अवश्य दण्डित किया जाना चाहिए. लेकिन कठिनाई तो यह है कि दण्ड-व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार के जीवाणु घुस चुके है. उसे सतर्क, निष्पक्ष एवं कठोर बनाने के लिए आवश्यक है कि जनलोकपाल बिल के रूप में एक अधिकार प्राप्त, शक्ति-सम्पन्न और हर प्रकार के राजनैतिक दबाव से मुक्त स्वायत न्याय-तन्त्र स्थापित किया जाए, जिसका कार्य केवल विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार के मामलों की ही सुनवाई और उनके सम्बन्ध में कारवाई करना हो. हालाँकि अन्ना हजारे एवं उनकी मंडली इस दिशा में प्रयासरत्त है, लेकिन सरकार की मनोदशा को भाँपते हुए ये कहना अभी मुश्किल ही है ऊँट किस करवट बैठने वाला है.
इसके अतिरिक्त एक कार्य ओर है जो भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है. वि ये कि मिलावटखोरों, जमाखोरों और रिश्वत लेने-देने वालों को पकडकर उनका मुँह काला करके सरेआम बाजार में घुमाया जाए. यह सामाजिक तिरस्कार बडी से बडी कैद से भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो सकता है. लेकिन इस देश की यह एक विडम्बना है कि भ्रष्टाचार को दबाने वाले कहीं-न कहीं स्वयं उसी का शिकार हो जाते है. इसलिए ऎसा कुछ हो पाएगा, इसकी उम्मीद रखना भी शायद बेमानी ही होगा.

लेकिन एक बात तो तय है कि यदि भ्रष्टाचार के दानव को परास्त करना है, तो उसके लिए चहुँमुखी अभियान आवश्यक है------सरकार, जनता, कानून और आत्मानुशासन----इन चारों में परस्पर समन्वय होने पर ही इस नासूर से मुक्ति पाई जा सकती है, अन्यथा नहीं.