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शुक्रवार, 24 जून 2011

क्यूंकि हर धर्म यही कहता है.........

श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं----"सर्वभूत हिते रत्ता" अर्थात सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हित में रत और सम्पूर्ण प्राणियों का सुह्रद रहो. जो शुभफल प्राणियों पर दया करने से होता है, वह फल न तो वेदों से, समस्त यज्ञों के करने से और न ही किसी तीर्थ, वन्दन अथवा स्नान-दान इत्यादि से होता है.

जीवितुं य: स्वयं चेच्छेत कथं सोन्यं प्रघात्तयेतु !
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत !!
जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को भला कैसे मार सकता है ? प्राणी जैसा अपने लिए चाहता है, वैसा ही दूसरों के लिए भी चाहे. कोई भी इन्सान यह नहीं चाहता कि कोई हिँसक पशु या मनुष्य मुझे, मेरे बाल-बच्चों, इष्टमित्रों वा आत्मीयजनों को किसी प्रकार का कष्ट दे या हानि पहुँचाये अथवा प्राण ले ले या इनका माँस खाये. एक कसाई जो प्रतिदिन सैकडों प्राणियों के गले पर खंजर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूईं भी चुभोयें, तो वह उसे भी कभी सहन नहीं करेगा. फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे भला कहाँ से मिल गया ?
मित्रस्य चक्षुणा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे !!
हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें. इस वेदाज्ञानुसार सब प्राणियों को मित्रवत समझकर सेवा करें, सुख दे. इसी में जीवन की सफलता है. इसी से यह लोक और परलोक दोनों बनते हैं.

फिर दूसरों के प्रति हमें वैसा बर्ताव कदापि नहीं करना चाहिए, जिसे हम अपने लिए पसन्द न करें. कहा भी है, कि------"आत्मन प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत". लेकिन देखिए दुनिया में कितना बडा विरोधाभास है, जहाँ एक ओर हम भगवान से "दया के लिए" प्रार्थना करते हैं और वहीं दूसरे प्राणियों के प्रति क्रूर हो जाते हैं-------How is that man who prays for money, is himself not merciful towards other fellow beings.


इस्लामिक धर्मग्रन्थ कुरआन शरीफ का आरम्भ ही "बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम" से होता है. जिसका अर्थ है कि खुदा रहीम अर्थात "सब पर रहम" करने वाला है. इनके अनुनायियों के मुख से भी सदैव यही सुनने को मिलता है कि अल्लाह अत्यन्त कृपाशील दयावान है .वही हर चीज को पैदा करने वाला और उसका निगहबान(Guardian ) है. अब जीभ के स्वाद के चक्कर में मनुष्य उस "निगहबान" की देखरेख में उसी की पैदा की हुई चीज की हत्या करे, तो क्या यह अत्यन्त विचारणीय प्रश्न नहीं ?

श्री अरविन्द कहते रहे हैं कि-----"जो भोजन आप लेते हैं, उसके साथ न्यूनाधिक मात्रा में उस पशु की जिसका माँस आप निगलते हैं, चेतना भी लेते हैं"

भगवान बुद्ध नें "माँस और खून के आहार" को अभक्ष्य और घृणा से भरा और 'मलेच्छों द्वारा सेवित' कहा है.  

सिक्ख धर्म के जनक गुरू नानक देव जी कहते हैं-----"घृणित खून जब मनुष्य पियेगा, तो वह निर्मल चित्त
भला कैसे रह सकेगा."

पारसी धर्म के प्रणेता जोरास्टर नें कसाईखानों को पाप की आकर्षण शक्ति का केन्द्र बताया है और हिब्रू धर्म के सन्त इजराइल कहते हैं----" जब तुम बहुत प्रार्थना करते हो, मैं उन्हे नहीं सुनूँगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं". चीनी विद्वान कन्फ्यूनिस नें भी जहाँ "पशु आहार को संसार का सर्वाधिक अनैतिक कर्म" कहा है, वहीं रामकृष्ण परमहँस का कहना है, कि-----"सात्विक आहार-उच्च विचार मनुष्य को परम शान्ति प्रदान करने का एकमात्र साधन है".

भगवान महावीर नें अहिँसा को "अश्रमों का ह्रदय", "शास्त्रों का गर्भ" (Nucleous) एवं "व्रत-उपवास तथा सदगुणों का पिंडी भूतसार" कहा है. और संसार में जितने प्राणी है, उन सबको जानते हुए या अनजाने में भी कोई कष्ट न देना ही धर्म का एकमात्र मूल तत्व है.

आपने देखा कि मनुष्य जाति के इतिहास में शायद ही कोई ऎसा धर्म अथवा धर्मशास्त्र होगा, जिसमें अहिंसा को सबसे ऊँचा स्थान न दिया गया हो. लेकिन इन्सान, जो कि अपने स्वयं का आसन इस संसार के अन्य समस्त प्राणियों से कहीं ऊँचा समझता है. क्या उस पर बैठकर उसे अपने खानपान का इतना भी विवेक नहीं कि वह सही मायनों में मानव बनना तो बहुत दूर की बात रही, एक पशु से ही कुछ सीख ले सके. एक पशु भी इस बात को अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य. उसे कोई सिखानेवाला नहीं है, फिर भी वो अपने आहार का उचित ज्ञान रखता है, परन्तु इन्सान पशु से भी इतना नीचे गिर गया है कि दूसरों के द्वारा परामर्श दिए जाने पर भी वह अपने को उसी रूप में गौरवशाली समझता है. क्या एक समझदार आदमी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो अपना पौरूष अपने से निर्बल प्राणी को मारकर अथवा उसे खाकर ही दिखाये ?. विधाता नें इन्सान के खाने के लिए स्वादु मधुर, पौष्टिक, बुद्धिवर्धक और हितकर इतने पदार्थ बना रखे हैं कि उनको छोडकर एक निकृष्ट अभक्ष्य पदार्थ पर टूट पडना कहाँ तक उचित है ?

यह कहना सर्वथा उचित ही होगा कि माँसाहार को छोड देने वाला व्यक्ति अन्य अनेक प्रकार की बुराईयों से भी स्वत: ही मुक्त हो जायेगा. इसलिए मेरा यही कहना है कि जो लोग इस बुराई से दूर रहे हैं, उनकी अपेक्षा वे लोग कहीं अधिक साहसी माने जायेंगें, जो इस लत को लात मारकर निरीह पशुओं के आँसू पोंछेंगें.
पक्षी और चौपाये सब मार-मार के खाय,
फिर भी सगर्व खुद को इन्सान कहाये !
बन के मर्द बहादुरी, बकरों-मुर्गों पर दिखलाये !
क्यूं  तुझे लाज नहीं आये ?

7 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

कोई भी मत सम्प्रदाय धर्म हिंसा को उचित नहीं कह सकता!!

नमन है पंडित जी आपको!! बहुत ही सार्थक और कल्याणकारी बात कही।
"जो लोग इस बुराई से दूर रहे हैं, उनकी अपेक्षा वे लोग कहीं अधिक साहसी माने जायेंगें, जो इस लत को लात मारकर निरीह पशुओं के आँसू पोंछेंगें."

वाकई वे धन्य है जो आदत होते हुए भी पुरूषार्थ से इसका त्याग कर पाते है।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

हमारी वाणी पर आज आप देख सकते हैं पंडित वत्स का लेख । जनाब क़ुरआन में माँसाहार की अनुमति पर ऐतराज़ जता रहे हैं ।
शाहनवाज़ तो अपनी उदार छवि के कारण उन्हें न तो सच बता सकते हैं और न ही पोस्ट हटा सकते हैं और हम जानबूझ कर अभी ख़ामोश हैं वर्ना हम बता देंगे कि श्री कृष्ण जी ने गीता में मगरमच्छ , गरूड़ और हिरण आदि को अपना ही रूप बताया है और ये सब माँसाहारी हैं ।
हंस भी मज़े से मछलियाँ खाता है और फिर भी ...

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Correction :
श्री कृष्ण जी ने गीता में मगरमच्छ , गरूड़ और हिरण व गाय खाने वाले सिंह को अपना ही रूप बताया है और ये सब माँसाहारी जीव हैं।

हंस भी मज़े से मछलियाँ खाता है ।

सलीम ख़ान ने कहा…

मांसाहार सम्बंधित मेरे लेख निम्नलिखित जगह पर जाकर पढ़ें...

मांसाहार और शाकाहार पर सलीम ख़ान की रिपोर्ट

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत कम लिखा जा रहा है आजकल!!

सुज्ञ ने कहा…

@हमारी वाणी पर आज आप देख सकते हैं पंडित वत्स का लेख । जनाब क़ुरआन में माँसाहार की अनुमति पर ऐतराज़ जता रहे हैं ।
शाहनवाज़ तो अपनी उदार छवि के कारण उन्हें न तो सच बता सकते हैं और न ही पोस्ट हटा सकते हैं

अनवर जमाल साहब,

पंडित वत्स का क़ुरआन में माँसाहार की अनुमति शब्द पर कोई ऐतराज़ नहीं है। उन्होंने मात्र रहम की और इंगित किया है और प्रश्न पाठकों के विचारार्थ छोड दिया है। रहम के कारण कोई उस अनुमति का प्रयोग न करना चाहे तो स्वागत होना चाहिए क्योंकि क़ुरआन में माँसाहार की जबर्दस्ती नहीं है।

और यही इस पोस्ट का भाव है जो सारांश में वर्णित है।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

मित्र हंसराज सुज्ञ जी,
अतिशय धन्यवाद!
हालॉकि मेरा अपना प्रयास यही रहता कि अपनी अतिव्यस्त जीवनचर्या से जो चन्द पल चुरा पाता हूँ, उन्हे यूँ अक्ल के अन्धे मूर्खों को ज्ञान बाँटने में नष्ट करने से कहीं बेहतर है कि उन्हे किसी सदुपयोग में लाया जाए....