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गुरुवार, 21 मई 2009

(कु) संगति का असर.....:)

 अब तक अपनी जिन्दगी के हम 35 बसन्त देख चुके हैं किन्तु आज तक जीवन में कभी ऎसा महसूस नहीं हुआ, जैसा कि पिछले कुछेक दिनों से हो रहा है। हमें तो लगने लगा है कि शायद हमारी मति भ्रष्ट हो चुकी है
अभी परसों की ही बात है, बैठे बैठे मन में विचार आया कि चलो कोई नईं ढंग की पोस्ट ही लिख ली जाए। वैसे यहां बहुत से लोग शायद ये भी सोच रहे होंगे कि पहले क्या कभी ढंग की पोस्ट लिखी है, जो अब की बार लिखोगे .:)। लेकिन खैर जैसा भी है, कभी किसी हलवाई को अपनी मिठाई की बुराई करते सुना है। और तो और जब एक सब्जी वाला भी कभी अपनी सब्जी को खराब नहीं कहता (चाहे कैसी भी गली सडी क्यूं न हो) तो भई हम तो फिर भी एक ब्लागर हैं। हम अपने लिखे को खराब कैसे कह सकते हैं। अब पढने वाला चाहे लाख बुराई करता रहे-----हमारी बला से।
Computing

 खैर छोडिए, मुद्दे की बात की जाए। हां तो हम परसों जब एक नई पोस्ट लिखने बैठे, जो कि भ्रूण हत्या जैसे एक गंभीर सामाजिक विषय पर आधारित थी। जिसका कि हमने शीर्षक भी अपने दिमाग में सोच के रख लिया था। लेकिन ये क्या! हम लिखना कुछ चाहें,लिखा कुछ जाए.......... कहां तो कन्या भ्रूण हत्या पर लिखने बैठे थे ओर कहां दिमाग में वफा, अश्क, लम्हे,जुबां, मयखाना जैसे शब्द गूंजने लगे। एक दो बार दिमाग से इन शब्दों को परे झटकने का प्रयास किया, सीट से उठकर दो चार मिनट चहलकदमी भी की। लेकिन जब दोबारा से लिखने बैठे तो फिर वही हाल। दिमाग सोच सोच कर परेशान कि आखिर ये हो क्या रहा है। जब सोचने समझने की बिल्कुल भी ताकत न रही तो लैपटाप उठा कर साईड में रख दिया। धर्मपत्नि को कह कर तेज मसाले वाली कडक चाय बनवाई। चाय पीते पीते अचानक से दिमाग की घण्टी बजने लगी, कि हो न हो जरूर ये सब संगति का असर है।  शायर, कवि बिलागर भाईयों (बहनें भी) की कविताएं/गजलें पढ पढ कर दिमाग में काव्यरसिकता छाने लगी है।  कबीर दास जी सच कह गए हैं कि "कबीरा संगत साधु की, कभी न निष्फल जाए"
अब भाई लोगों की (कु) संगति का ये असर हुआ कि हम पिछले तीन दिनों से बेफालतू की तुकबन्दी  करने में ही उलझे हुए हैं। बार बार लिखे जा रहे हैं, मिटाए जा रहे हैं। लेकिन इतनी सर खपाई का ये नतीजा जरूर निकला कि हम इन तीन दिनों में 2- 4 लाईनों की तुकबन्दी करने में सफल हो गए।

अब जब चन्द लाईनें लिख ही ली हैं तो फिर उन्हे कोई सुनने वाला भी तो चाहिए कि नहीं। बस इसी उधेडबुन में खोए हम कोई मुर्गा फंसने की राह देख रहे थे। तभी शाम को अचानक से बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के भाई मुफलिस जी का आना हो गया। हमने भी आव देखा न ताव , बस दुआ सलाम करते ही झट से उन्हे पकाना शुरू कर दिया। अभी मुश्किल से कोई दो लाईनें ही सुना पाए थे कि मुफलिस जी उठ खडे हुए। बोले कि कोई काम याद आ गया है, इसलिए अभी जाना पडेगा। फिर किसी दिन आराम से बैठकर महफिल जमाते हैं।

अब मुफलिस जी तो पल्लू  छुडा के भाग लिए और साथ ही हमारे भी ज्ञान चक्षु खुल गए कि भई, ये काम अपने बस का नहीं.....अपनी तो पंडिताई भली जिसमे यूं किसी की मिन्नतें तो नहीं करनी पडती। बस हींग लगे न फटकरी और रंग चौखा

किसी ने सच ही कहा है कि इन्सान कवि या शायर तब ही बन पाता है, जब कि उसमे सामने वाले को पकड के रखने का (अव) गुण विकसित हो चुका हो.:)। लेकिन शायद ऊपर वाले ने हमें इस (दुर)गुण से नवाजा ही नहीं।

खैर चलते चलते आप खुद पढ लीजिए कि आप लोगों की (कु) संगति में रह कर कैसी ऊलजलूल तुकबन्दी को अंजाम दिया है। लेकिन ध्यान रहे-----कि हूटिंग करना मना है।
जिन्दगी
फर्ज की लहरों पे अब तक डौल रही है जिन्दगी
 रिश्तों के पलडे में खुद को तौल रही है जिन्दगी !!

यूं तो,हर तरफ दिख रही है भीड इस जमाने की
पर कहीं कुछ अपना सा, टटोल रही है जिन्दगी !!

हर शख्स चेहरे पे इक नकाब पहने फिर रहा 
पर धीरे-धीरे सबके पर्दे खोल रही है जिन्दगी !!

आज तलक उलझा हुआ हूं उन्ही चन्द सवालों में
"अब भी कईं जवाब हैं बाकी" बोल रही है जिन्दगी !!

सोमवार, 18 मई 2009

प्रतिभा संसाधनों की मौहताज नहीं होती

हिन्दुस्तान के दिल यानी दिल्ली में सडक के किनारे चाय बेचता हुआ यह व्यक्ति आपको किसी भी दूसरे चाय वाले की तरह ही नजर आएगा। परन्तु ये कोई जरूरी तो नहीं कि जो दिखता है, वह असल में वैसा ही हो। इस चाय वाले का नाम है लक्ष्मण राव। लेकिन आप हैरान रह जाएंगें, जब आपको पता चलेगा कि ये कोई मामूली चाय वाला नहीं बल्कि एक साहित्यकार है, जिनकी अब तक कुल 18 पुस्तकें छप चुकी हैं। किसी ने सच ही कहा है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।

दिल्ली में आईटीओ के नजदीक चाय की दुकान चलाने वाले 53 वर्षीय लक्ष्मण राव का 'भारतीय साहित्य कला प्रकाशन' नाम से स्वयं का प्रकाशन संस्थान भी है। लक्ष्मण राव बताते हैं कि मैं पिछले 28 या 29 सालों से लघु कहानियां, नाटक और उपन्यास लिख रहा हूं। उन्होंने बताया कि मैने अपनी पहली किताब सन 1979 में लिखी थी, जिसका शीर्षक था  "नई दुनिया की नई कहानी" जिसमें मैंने अपने जीवन के सारे संघर्षो और चुनौतियों का चित्रण किया है।

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक गरीब किसान परिवार में जन्मे लक्ष्मण राव को हिंदी साहित्य से विशेष लगाव रहा है। उन्होंने 1973 में मुंबई विश्वविद्यालय से हिंदी माध्यम में 10वीं की शिक्षा पूरी की। इन्हे बचपन से गुलशन नंदा के उपन्यासों से विशेष लगाव रहा है।

लक्ष्मण ने कहा कि वह जीवन के शुरुआती दौर में लेखक बनना नहीं चाहते थे, पर एक घटना ने उन्हे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। एक छोटा बच्चा, जो नदी में नहाने गया था, डूब कर मर गया और इस घटना ने उन्हे इतना उद्वेलित किया कि अपनी भावनाओं को एक शक्ल देने के लिए उन्होंने किताबों का सहारा लिया। हालांकि घर के कमजोर आर्थिक हालात की वजह से उन्हे अपनी पढ़ाई दसवीं कक्षा के बाद छोड़नी पड़ी। आजीविका के लिए उन्होंने कुछ समय के लिए स्थानीय मिल और निर्माण स्थलों पर भी काम किया। पर फिर वह 1975 में दिल्ली आ गए। दिल्ली में दरियागंज इलाके में किताब बाजार को देखकर उनका शौक एक बार फिर जाग उठा। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार के माध्यम से स्नातक की डिग्री ली। अपनी जमा पूंजी से उन्होंने एक चाय की दुकान खोली और तब से वह किताबें लिखने में जुट गए। हालांकि उन्हे किसी प्रकाशक से कोई सहायता नहीं मिली। तब उन्होंने सोचा कि वह अपनी किताबों को खुद ही लिखेंगे, प्रकाशित करेगे और खुद ही बेचेंगे। लक्ष्मण राव गर्व से कहते है, मेरी कुछ किताबों को आप सार्वजनिक पुस्तकालयों और स्कूली पुस्तकालयों में भी देख सकते है।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

बस यूं हीं----------- चन्द उधार के चुटकुले

बहुत दिनों से या तो कुछ लिखने का ही मन नहीं कर रहा था।या फिर अगर मन मारकर लिखने भी बैठा तो  गम्भीर विषय ही सूझा। इसलिए  पिछली दो चार पोस्टें गंभीर सामाजिक विषयों पर ही लिखी गई। अचानक आज पुरानी ईमेल चैक कर रहा था तो उनमे एक मेल दिखाई दी,जिसके जरिए किसी अंजान शख्स नें ढेर सारे चुटकुले भेजे हुए थे। पढने पर बढिया लगे तो सोचा कि क्यूं न आप लोगों के साथ बांट कर मूड को थोडा हल्का कर लिया जाए। तो फिर लीजिए, उन्ही मे से चन्द उधार के चुटकुले झेलिए और हमारे साथ आप भी थोडा सा मुस्कुरा लीजिए.:-----
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                                             चोर की इन्सानियत
एक चोर एक घर में चोरी करने गया। तिजोरी पर लिखा था - तिजोरी को तोड़ने की जरूरत नहीं है। 123 नंबर लंगाकर सामने वाला लाल बटन दबाओ, तिजोरी खुल जाएगी।

जैसे ही चोर ने बटन दबाया, अलार्म बजने लगा और पुलिस आ गई।

जाते-जाते चोर ने घर के मालिक से कहा -----"लानत है तुम पर! आज तुम्हारे कारण मेरा इंसानियत से विश्वास उठ गया है ".....
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                                            स्त्री की कर्तव्यनिष्ठा
इंटेलिजेंस ब्यूरो में एक उच्च पद हेतु भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी। अंतिम तौर पर केवल तीन उम्मीदवार बचे थे जिनमें से किसी एक का चयन किया जाना था। इनमें दो पुरुष थे और एक महिला।
फाइनल परीक्षा के रूप में कर्तव्य के प्रति उनकी निष्ठा की जांच की जानी थी। पहले आदमी को एक कमरे में ले जाकर परीक्षक ने कहा - ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।'' फिर उसने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा - ''उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।''
''मैं अपनी पत्नी को किसी भी हालत में गोली नहीं मार सकता''- आदमी ने कहा।
''तो फिर तुम हमारे किसी काम के नहीं हो। तुम जा सकते हो।'' - परीक्षक ने कहा।

अब दूसरे आदमी को बुलाया गया। ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।'' कहकर परीक्षक ने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा - ''उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।'' आदमी उस कमरे में गया और पांच मिनट बाद आंखों में आंसू लिये वापस आ गया। ''मैं अपनी प्यारी पत्नी को गोली नहीं मार सका। मुझे माफ कर दीजिये। मैं इस पद के योग्य नहीं हूं।''

अब अंतिम उम्मीदवार के रूप में केवल महिला बची थी। उन्होंने उसे भी बंदूक पकड़ाई और उसी कमरे की तरफ इशारा करते हुये कहा - ''हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगी चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो। उस कमरे में तुम्हारा पति बैठा है। जाओ और जाकर उसे गोली से उड़ा दो।'' महिला ने बंदूक ली और कमरे के अंदर चली गई। कमरे के अंदर घुसते ही फायरिंग की आवाजें आने लगीं । लगभग 11 राउंड फायर के बाद कमरे से चीखपुकार, उठापटक की आवाजें आनी शुरू हो गईं। यह क्रम लगभग पन्द्रह मिनटों तक चला उसके बाद खामोशी छा गई।
लगभग पांच मिनट बाद कमरे का दरवाजा खुला और माथे से पसीना पोंछते हुये महिला बाहर आई। बोली - ''तुम लोगों ने मुझे बताया नहीं कि बंदूक में कारतूस नकली हैं। मजबूरन मुझे उसे पीट-पीट कर मारना पड़ा।''
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                                            सस्ता समाधान
एक आदमी मनोचिकित्सक के पास गया । बोला -''डॉक्टर साहब मैं बहुत परेशान हूं। जब भी मैं बिस्तर पर लेटता हूं, मुझे लगता है कि बिस्तर के नीचे कोई है। जब मैं बिस्तर के नीचे देखने जाता हूं तो लगता है कि बिस्तर के ऊपर कोई है। नीचे, ऊपर, नीचे, ऊपर यही करता रहता हूं। सो नहीं पाता । कृपा कर मेरा इलाज कीजिये नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगा।''
डॉक्टर ने कहा - ''तुम्हारा इलाज लगभग दो साल तक चलेगा। तुम्हें सप्ताह में तीन बार आना पड़ेगा। अगर तुमने मेरा इलाज मेरे बताये अनुसार लिया तो तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे।''
मरीज - ''पर डॉक्टर साहब, आपकी फीस कितनी होगी ?''
डॉक्टर - ''सौ रूपये प्रति मुलाकात''
गरीब आदमी था। फिर आने को कहकर चला गया।
लगभग छ: महीने बाद वही आदमी डॉक्टर को सड़क पर घूमते हुये मिला ।
''क्यों भाई, तुम फिर अपना इलाज कराने क्यों नहीं आये ?'' मनोचिकित्सक ने पूछा।
''सौ रूपये प्रति मुलाकात में इलाज करवाऊं ? मेरे पड़ोसी ने मेरा इलाज सिर्फ बीस रूपये में कर दिया'' आदमी ने जवाब दिया।
''अच्छा! वो कैसे ?''
''दरअसल वह एक बढ़ई है। उसने मेरे पलंग के चारों पाए सिर्फ पांच रूपये पाए के हिसाब से काट दिये।''
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                                          विज्ञान का अन्तिम सत्य
एक जीवविज्ञानी मेंढ़कों के व्यवहार का अध्ययन कर रहा था। वह अपनी प्रयोगशाला में एक मेंढ़क लाया, उसे फर्श पर रखा और बोला - ''चलो कूदो !'' मेंढ़क उछला और कमरे के दूसरे कोने में पहुंच गया। वैज्ञानिक ने दूरी नापकर अपनी नोटबुक में लिखा - ''मेंढ़क चार टांगों के साथ आठ फीट तक उछलता है।''
फिर उसने मेंढ़क की अगली दो टांगें काट दी और बोला - ''चलो कूदो, चलो !'' मेंढ़क अपने स्थान से उचटकर थोड़ी दूर पर जा गिरा। वैज्ञानिक ने अपनी नोटबुक में लिखा - ''मेंढ़क दो टांगों के साथ तीन फीट तक उछलता है।''
इसके बाद वैज्ञानिक ने मेंढ़क की पीछे की भी दोनों टांगे काट दीं और मेंढ़क से बोला - ''चलो कूदो!''
मेंढ़क अपनी जगह पड़ा था। वैज्ञानिक ने फिर कहा - ''कूदो! कूदो! चलो कूदो!'' पर मेंढ़क टस से मस नहीं हुआ।
वैज्ञानिक ने बार बार आदेश दिया पर मेंढ़क जैसा पड़ा था वैसा ही पड़ा रहा ।
वैज्ञानिक ने अपनी नोटबुक में अंतिम निष्कर्ष लिखा - ''चारों टांगें काटने के बाद मेंढ़क बहरा हो जाता है।''
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो

ईश्वर द्वारा निर्मित इस प्रकृति का अपना एक पूर्ण चक्र है -----जिसका सिर्फ एक ही नियम है कि एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो। इस वर्तुल को तोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन हम लोग क्या कर रहे हैं कि, बस सिर्फ और सिर्फ लिये चले जा रहे हैं,देना तो हम लोगों नें सीखा ही नहीं। इसीलिए धीरे-धीरे आज सारे प्राकृ्तिक जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती निरन्तर विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं, झीलें, तालाब खत्म हो  रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इतनी बुरी तरह से बिगाड़ चुके हैं कि भविष्य में इस पर रह ही नहीं पाएंगे,अपितु जीने के लिए हमें किसी और नए ग्रह की खोज करनी पडेगी ।

देखा जाए तो इस स्थिति के लिए आधुनिक विज्ञान भी कोई कम दोषी नहीं है। उसका रवैया भी सदैव विजेता वाला ही रहा है। विज्ञान ये सोचता है कि धरती और आकाश से दोस्ती कैसी, उस पर तो बस विजय हासिल करनी है। हमने कुदरत से खिलवाड किया , किसी नदी का मुहाना मोड़ दिया, किसी पहाड़ का कुछ हिस्सा काट लिया, किसी प्रयोगशाला में चन्द रसायनिक क्रियाएं संपन्न कर ली और बस समझने लगे कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

आप प्लास्टिक को ही देखिए। उसे बना कर सोचने लगे कि कमाल है! ये तो न जलता है, न गीला होता है, न जंग लगती है - कितनी महान उपलब्धि है। उपयोग के बाद उसे फेंक देना भी कितना सुविधाजनक है। जिस भी पदार्थ,जीव-जन्तु,पशु-पक्षी,मनुष्य,पेड-पौधे इत्यादि की रचना प्रकृ्ति नें की है,अगर आप उन्हे वापस जमीन में डाल दो तो वह पुन: अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं।लेकिन अगर प्लास्टिक को जमीन में गाड़ दो और बरसों बाद खोदो तो भी वैसा का वैसा ही पाओगे।क्योंकि प्रकृ्ति प्लास्टिक जैसे मनुष्य निर्मित किसी पदार्थ को आत्मसात नहीं करती। लेकिन हम लोग हैं कि अपनी इन महान उपलब्धियों के दंभ में चूर स्वयं अपने ही हाथों विनाश के बीज बोए चले जा रहे हैं । अब इन बीजों से उत्पन फसल कैसी होगी,हमारे पास ये सोचने का भी समय नहीं है। बस चले जा रहे हैं---------विज्ञान के रथ पर सवार होकर कुदरत पर विजय हसिल करने को।

पर्यावरण का अर्थ है संपूर्ण का विचार करना। भारतीय मनीषा हमेशा 'पूर्ण' का विचार करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। सीमित दृष्टि पूर्णता का विचार नहीं कर सकती। एक बढ़ई सिर्फ पेड़ के बारे में सोचता है। उसे लकड़ी की गुणवत्ता की जानकारी है। पेड़ की और कोई उपयोगिता उसे मालूम नहीं है कि वे किस तरह बारिश होने में अपना योगदान देते हैं ,वे किस तरह मिट्टी को बांध कर रखते हैं। उसे तो बस सिर्फ अपनी लकड़ी से मतलब है।वैसी ही सीमित सोच ले कर हम अपने जंगलों को काटते चले गए और अब भुगत रहे हैं। अब आक्सीजन की कमी महसूस हो रही है। वृक्ष न होने से पूरा वातावरण ही अस्तव्यस्त होता जा रहा है। मौसम का क्रम बदलने लगा है। सावन के महीने में सूखा पड रहा है, सर्दियों में पसीने छूटने लगे हैं। और वायु प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं।इसे पढकर बहुत से मेरे जैसे लोग ये भी सोच रहे होंगे कि हमें इन सब से क्या लेना!मान लो, अगर कुछ समस्याएं उत्पन हों भी रही हैं तो सारी दुनिया के लिए ही तो हो रही हैं,कौन सा हमें अकेले को परेशानी उठानी पड रही है। अब जैसे बाकी दुनिया जियेगी,वैसे ही हम भी जी लेंगे।

सुना है कि किसी जमाने में एक राजा था । उसने एक दिन देखा कि खेत-खलिहानों में पक्षी आते हैं और अनाज खा जाते हैं। वह सोचने लगा कि ये अदना से पंछी पूरे राज्य में लाखों दाने खा जाते होंगे। इसे रोकना होगा। तो उसने राज्य में ऐलान कर दिया कि जो भी पक्षियों को मारेगा उसे इनाम दिया जाएगा। बस ईनाम के लालच में राज्य के सारे नागरिक शिकारी हो गए और देखते ही देखते पूरा राज्य पक्षी विहीन हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उत्सव मनाया गया कि आज उन्होंने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली।

किन्तु अगले ही वर्ष गेहूँ की फसल पूरी तरह से नदारद थी। क्योंकि मिट्टी में जो कीड़े थे और जो टिड्डियां थीं, उन्हें वे पक्षी खाते थे और अनाज की रक्षा करते थे। इस बार उन्हें खाने वाले पक्षी नहीं रहे, सो, कीडे-मकोडों नें पूरी फसल चट कर डाली।किसी विद्वान के बताने पर राजा के बात समझ में आई और उसके बाद उसे विदेशों से पक्षी मंगवाने पडे।

यह सृष्टि परस्पर निर्भर है। उसे किसी भी चीज से रिक्त करने की कोशिश बेहद खतरनाक है। न हम पूर्णत: स्वतंत्र हैं, और न ही परतंत्र । यहाँ हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे लिए सहोदर के समान है। हमें इन सबके साथ ही जीने का सलीका सीखना होगा।

मंगलवार, 24 मार्च 2009

आधुनिक शिक्षा प्रणाली और संस्कार

चाहे कोई भी युग हो,प्रत्येक युग का भविष्य उसकी आगामी पीढ़ी पर ही निर्भर करता है। जिस युग की नई पीढ़ी जितनी अधिक शालीन, सुसंस्कृत, सुघड़ और शिक्षित होती है, उस युग के विकास की संभावनाएं भी उतनी ही अधिक रहती है। राष्ट्र, समाज और परिवार के साथ भी यही सिद्धांत घटित होता है। आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण या करणीय कार्य है भावी पीढी को संस्कारित करना।
  अक्सर सुनने में आता है कि बाल्य मन एक सफेद कागज की भांती होता है। उस पर व्यक्ति जैसे चाहे, वैसे चित्र उकेर सकता है,या फिर जैसा भी चाहें,लिख सकते हैं। उसकी सोच को जिस दिशा में मोड़ना हो, सरलता से मोड़ा जा सकता है। एक दृष्टि से यह मंतव्य सही हो सकता है पर यह सर्वांगीण दृष्टिकोण नहीं है। क्योंकि हर बच्चा अपने साथ अनुवांशिकता लेकर आता है, जो कि गुणसूत्र (क्रोमोसोम) और संस्कार सूत्र (जीन्स) के रूप में विधमान रहते हैं।
सामाजिक वातावरण भी उसके व्यक्तित्व का एक घटक है। इसका अर्थ यह हुआ कि संस्कार-निर्माण के बीज हर बच्चा अपने साथ लाता है। सामाजिक या पारिवारिक वातावरण में उसे ऐसे निमित्त मिलते हैं, जिनके आधार पर उसके संस्कार विकसित होते हैं। प्राय: देखा जाता है कि माता-पिता अपनी संतान के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं के साधन जुटा देते हैं, शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था कर देते हैं,किन्तु उनके लिए सर्वांगीण विकास के अवसर नहीं खोज पाते। कुछ अभिभावक तो ऐसे होते हैं, जो उनकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता के बारें में भी उदासीन रहते हैं।
उचित मार्गदर्शन के अभाव में अथवा अधिक लाड़-प्यार में या तो बच्चे कुछ करते नहीं या इस प्रकार के काम करते हैं, जो उन्हें भटकाने में निमित्त बनते हैं। ऐसी परिस्थिति में हर समझदार माता पिता का यह दायित्व है कि वे अपने बच्चों की परवरिश में संस्कार-निर्माण की बात को न भूलें।
 आधुनिक युग में मां-बाप भी बच्चों को स्कूलों के भरोसे छोडकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं अगर देखा जाए तो इस तरह से हम लोग कहीं न कहीं उनके साथ अन्याय ही कर रहे हैं। क्यों कि वर्तमान शिक्षा पद्धति का ये सबसे बडा दोष है कि इसमें सिर्फ बौद्धिक विकास को ही महत्व दिया गया है,संस्कृ्ति एवं संस्कारपक्ष को तो पूरी तरह से त्याग दिया गया है
ऎसे में हम लोग किस प्रकार ये अपेक्षा कर सकते हैं कि बच्चों का समग्र विकास हो पाएगा। कान्वेंट्स और पब्लिक स्कूल आधुनिक कहलाने वाले अभिभावकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन चुके है। वे मानते हैं कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे आधुनिक रूप से विकसित होते हैं, समाज में जीने के तौर-तरीके बहुत अच्छे ढंग से सीखते हैं। कुछ अंशों में यह बात सही हो सकती है। परन्तु सिर्फ सामाजिक तौर तरीके ही जीवन नहीं है।

जीवन की समग्रता के लिए संस्कृति, परम्परा,राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, विनय, सच्चाई, सेवाभावना आदि अनेक मूल्यों को जीना सिखाने की जरूरत है।आप अगर कान्वैंट या पब्लिक स्कूल के विधार्थी से मुंशी प्रेमचन्द,जयशंकर प्रसाद इत्यादि के बारे में पूछ के देखें तो बगलें झांकने लगेगा,लेकिन माईकल जैक्सन के बारे में वो शर्तिया जानता होगा। वन्देमातरम की उसे भले एक लाईन न आती हो,लेकिन ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार पूरा सुना देगा जिस शिक्षाक्रम में संस्कृति के मूल पर ही कुठाराघात हो, उससे संस्कार-निर्माण की अपेक्षा करना तो एक प्रकार से मूर्खता ही कही जा सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को निरंतर ऐसा वातावरण मिले और उनके शिक्षाक्रम में कुछ ऐसी चीजें जुडें, ज़ो उन्हे बौध्दिक विकास के साथ-साथ भावनात्मक विकास के शिखर तक पहुंचा सके।

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

कुछ हल्का फुल्का सा.....

एक बार की बात है कि भाटिया जी को किसी विवाह समारोह में सम्मिलित होने का निमंत्रण प्राप्त हुआ। बस फिर क्या था, भाटिया जी पहुंच गये शादी की दावत में शामिल होने। अब जैसा कि अमूमन पंजाबी और हरियाणवी लोगों की आदत होती है कि भई जब 101 रूपये शगुन दिया है तो किसी न किसी तरीके से उसे वसूल भी तो करना है।लेकिन अब शगुन तो शगुन है कोई लोन की रकम थोडे ही है कि किश्तों में वसूली होगी। अब उन रूपयों की कीमत  तो वहां दावत में खा पीकर ही वसूली जा सकती थी। खैर भाटिया जी लगे अपने नुक्सान की भरपाई करने। खाते खाते 2 घंटा बीत गये लेकिन वो तो रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये देखकर वहां किसी सज्जन नें पूछ लिया " अब कितना खाओगे भाटिया जी"
भाटिया जी" अबे यार, मैं तो खुद खा खाकर परेशान हूं,लेकिन क्या करूं कार्ड में लिखा है कि डिनर 7 से 10 बजे तक"।
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एक बार ताऊ  पहली बार शहर घूमने गया। उसने गाँव मे सुन रखा था की, शहरवाले लोग भोले भाले गाँववाले लोगो को खूब बेवकूफ़ बनाते है! इसलिए उनसे सावधान रहना चाहिए! ताऊ सीधे एक होटल मे पहुचां और बोला "आपकी होटल मे सबसे अच्छा कमरा मिलेगा?! होटलवाले ने पहले तो ताऊ का ऊपर से नीचे तक विश्लेषण किया ओर फिर बोला  "जी हां श्रीमान, सभी सुविधा वाला कमरा मिल जाएगा, हमारे पास सबसे बढ़िया कमरा एक हज़ार रूपए प्रतिदिन के किराये पर है" ताऊ ने रोबदार आवाज़ मे कहा " हमे किसी प्रकार की सुविधा की कमी तो नही होगी?" होटल वाले ने भरोसा दिलाते हुए कहा " नही श्रीमान,यहां आपको सबसे उत्तम सुविधा मिलेगी." ये कहकर होटल वाले ने एक आदमी को ताऊ का सामान देकर कमरा दिखाने के लिए भेजा। ओर वो आदमी ताऊ को ले के चला गया, फिर दरवाज़ा खोलकर सामान रखकर ताऊ को अंदर बुलाता है। ये क्या! ताऊ का चेहरा ग़ुस्से से लाल  "ये क्या 4/6 का कमरा है, यहा पर तो एक आदमी आराम से सो भी नही सकता, और तो और ये तो यहा पर 6 लोग एक साथ खड़े भी नही हो सकते ! मणै इस होटल का सबसे अच्छा कमरा माँगा था इस कमरे का एक हज़ार ले रहे हो!मुझे ऎसा कमरा नही चाहिए " ये बोलते हुए ताऊ गुस्से में नथुने फुल्लाता बाहर आ गया। उस आदमी ने ताऊ को भोले पन से समझाते हुए कहा " साह्ब ये तो लिफ्ट है"

बुधवार, 11 मार्च 2009

होली पर भाटिया जी की मौज........( भई होली है ! )

भाटिया जी - "पिछले चार दिनों से पता नहीं सुबह किसका मुहं देखकर उठ रहा हूं कि हर रोज छीछालेदार हो रही है।अभी परसों पाबला नें अपनी पोस्ट में मेरी एक गलत सलत सी फोटू लगा रखी थी,जिसे देखके सब लोग हंस रहे थे। अभी उस बेईइज्जती की तो भरपाई हो भी नहीं पाई थी, कि आज जिस मैं अपना भाई माना करता था, उस ताऊ नें भी सारे ब्लागियों के सामने मेरी बेईज्जती कर के रख दी।मुझे तो लगे है कि जरूर मुझ पर राहू या शनि की निगाह पड चुकी है।
भाटिया जी की धर्मपत्नि-" क्या बात हुई? ताऊ नें ऎसा क्या कह दिया कि आपको राहू-केतु याद आने लग पडे।"
भाटिया जी " अब क्या बताऊं, सारे ब्लागरियों के सामने मेरी इतनी साफ सुथरी इमेज थी कि क्या बताऊं। लोग तो ये सोचा करें थे कि भाटिया जी तो बहुत ही पढे लिखे,जहीन महीन, जैन्टल मैन बन्दे हैं,लेकिन ताऊ ने सारी इमेज खराब कर दी।
धर्मपत्नि- "अब कुछ बताओगे भी या यू हीं पहेलियां बुझाते रहोगे।"
भाटिया जी- "अरी भागवान,पहेली बुझाना तो मैने कईं दिनों से बन्द कर रखा है। अब तो मैं कुछ सार्थक लिखकर बुद्धिजीवी बनने की राह पर चल पडा हूं।"
धर्मपत्नि-" सार्थक? ऎसा क्या लिखना चाहते हो।"
भाटिया जी-"दहेज,कन्यादान, स्त्रीयों की मनोदशा-उनके आचार व्यवहार के बारे में लिखा करूंगा।"
धर्मपत्नि-"बैठे रहो टिक के,  अपनी स्त्री को तो आज तक समझ नहीं पाए और चले हैं स्त्रीयों के आचार-व्यवहार के बारे में लिखने। अब कहीं भूल के कुछ ऎसा वैसा लिख भी मत देना। वर्ना ये सारी स्त्रियां, जिनकी कविताएं पढ के तुम बडी वाह्! वाह्! करते हो,सारी मिलजुल के तुम्हारा ही आचार बना डालेंगी।"
भाटिया जी-"अब ज्यादा चूं चपड मत कर,बडी आई नसीहत देने वाली। जरा जल्दी से मेरी जन्मपत्री निकाल ले ला,पंडित जी को दिखा के लाता हूं। लगता है कि मुझपे जरूर राहू की दशा चल पडी है। तभी तो एक ताऊ कम था बेईज्जती करने को जो अब तुम भी शुरू हो गई।"
धर्मपत्नि - "अरे हां, तुमने बताया नहीं, कि ताऊ ने ऎसा क्या कह दिया कि तुम भरी जवानी में सठियाये बूढे की तरह नथुने फुला रहे हो।"
भाटिया जी-"अब क्या बताऊं तुम्हें, हम लोगों को हरियाणा छोडे हुए तो जमाना बीत गया। अब सब लोगों की नजरों में मेरी इमेज एक विलायती बाबू की बन चुकी है।लेकिन ताऊ से मेरी ये इज्जत देखी नहीं गई,बस लगा अपने ब्लाग पे मेरी पोल पट्टियां खोलने। सब को बता दिया कि रोहतक में भाटिया जी मेरे साथ बीडियां, जगाधरी नम्बर वन देसी दारू पिया करते थे। भला ये भी कोई बात हुई,अगर बताना ही था तो ये भी तो कह सकता था कि हम लोग इक्कठे बैठकर सिगार और अंग्रेजी शराब पीते थे।"
धर्मपत्नि-"बैठे रहो जी टिक के,अब मेरा मुंह मत खुलवाओ। घर में नहीं दाने ओर अम्मां चली भुनाने।"
भाटिया जी- हे भगवान्! पता नहीं पिछले चार दिनों से सुबह सुबह किसका मुंह देखकर उठ रहा हूं।"
धर्मपत्नि-"अब मेरी मानो तो बैडरूम में लगे आईने को हटा दो, वर्ना रोजाना तुम्हे यही शिकायत् रहेगी।"
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लो जी,होली के हुडदंग में,मस्ती में सरोबार इस रंगों के त्योहार के उपलक्ष्य में आप सब ब्लागियाये, मौजियाये,हुल्लियाये सभी बंधुओं को ढेर सारी शुभकामनाऎं..........................लेकिन भई विनती है कि जरूर टिप्पियायें।और लगे हाथ भाटिया जी और ताऊ रामपुरिया जी को एक ही दिन खूंटे पे बंधने(शादी) सालगिरह की बधाई भी जरूर दीजिएगा(लेकिन उनके अपने  ठिकाने पर जाकर)-----अजी ये रहे उनके ठिकाने -----
  ताऊजी        भाटिया जी
बुरा न मानो होली है------------------------------------------
 होली लगातार बार बार ही मनाऎं हम
 जीवन भर प्यार भरे रंग ही मिलाएँ हम
   धरती  हमारी यह महकेगी फूलों सी
  अमृत के घूँट यदि सब को पिलाएँ हम
  कारण बने न हम दूसरों की पीडा के
  प्रेम के ही आँसू सर्वत्र छलकाएँ हम
  उत्सव यह और भी रंगीन बन जायेगा
 रंग ही बस रंग की ही नदियाँ बहाएँ हम 
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रफ़्तार