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रविवार, 5 दिसंबर 2010

मियाँ नौचंदी चले गये.........

सुबह सैर को निकले तो राह में अपने बिलागर भाई मियाँ नौचंदी मिल गए. दुआ-सलाम हुई तो पूछ लिया कि क्या बात है मियाँ! बहुत दिनों से आप ब्लागिंग में दिखाई नहीं दे रहे. ऎसे कौन से काम में उलझ गये कि ब्लाग लिखने का भी समय नहीं मिल पा रहा."
मियाँ नौचंदी:----" अजी छोडिये पंडित जी, क्या रखा है इस ब्लागिंग-फ्लागिंग में. यूँ समझ लीजिए कि बस अब इससे हमारा मन भर गया है."
"कमाल है मियाँ! ऎसी भला क्या बात हो गई कि यूँ मन उचाट कर बैठे?"
मिय़ाँ नौचंदी:- "अब क्या बतायें जनाब! पहले तो दुनियादारी से ही फुर्सत नहीं मिलती. गर इधर-उधर से कुछ टाईम निकालकर कभी लिखने का मन बनता भी तो बेगम सिरहाने आन खडी होती. न मालूम किसने उसके दिमाग में ये फितूर भर दिया कि मियाँ ब्लागिंग के बहाने औरतों से चैटिंग किया करते हैं. लाहौल-विला-कुव्वत! बताईये पंडित जी आपको क्या हम ऎसे आदमी दिखते हैं?"
"ओह्! मियाँ ये तो आपके साथ बहुत ही बुरी हुई. बहरहाल, आपको उनकी इस गलतफहमी को दूर कर देना चाहिए था."
"ये हम ही जानते हैं कि हमने उनके इस दिमागी फितूर को कैसे दूर किया. हमें कैसे-कैसे पापड नहीं बेलने पडे इसके लिए"
" चलिए गलतफहमी तो दूर हो गई न ! फिर ब्लागिंग से मन उचाट होने का ऎसा कौन सा कारण रहा ?"
मियाँ नौचंदी:-- "अजी पंडित जी, अब क्या बतायें आपको. देखिए हम कोई लेखक या कवि तो हैं नहीं कि दिन-रात मन में भाव उमडे पडे जा रहे हैं. हमें तो एक पोस्ट लिखने के लिए भी पूरे हफ्ता भर दिमाग का तेल निकालना पडता है. ऎसे में भला हम क्या तो ब्लागिंग करें और क्या छोडें?"
"लो कर लो बात! अरे मियाँ यहाँ कौन से साहित्यकारों का अखाडा जमा है. सबके सब तो आप और हम जैसे ही हैं. आपके जो जी में आए, वो लिखिए---इसी का नाम ही तो ब्लागिंग है. वैसे एक बात है, अभी तक आपने जितनी भी पोस्टें लिखी हैं, उन्हे देखकर तो कोई भी नहीं मान सकता कि यें किसी अनाडी के हाथों लिखी गई हैं."
मियाँ नौचंदी:-" ये तो आपकी जर्रानवाजी है पंडित जी, वर्ना हम भला लिखना क्या जाने"
" अरे नहीं मियाँ, हम मजाक नहीं कर रहे, सच मानिये. हमें तो आपको पढना बहुत अच्छा लगता है. लेकिन, एक बात है कि ब्लागिंग से मन उचाट होने की इतनी सी वजह तो नहीं हो सकती. बताईये ऎसी भला क्या बात हो गई?"
मियाँ नौचंदी:- " बात ये है पंडित जी, कि हमारे बिलाग पर तो कोई कुत्ता भी झाँकने नहीं आता. हम इतनी मेहनत से अगर कुछ लिखते भी हैं तो उसे पढने वाला ही कोई न मिले तो ऎसे लिखने का भी भला क्या फायदा?"
"अरे! तो ये बात है! मियाँ तुम भी न निरे'खाँटी" आदमी हो. भाई हम हैं न आपको पढने वाले"
मियाँ नौचंदी:--"छोडिए पंडित जी, पूरा साल भर इस हमाम में रहकर हम तो इतना जान पायें कि जैसे वेश्यायों के घर में नकद नारायण की पूछ होती है, वैसे ही यहाँ ब्लगिंग में भी सिर्फ टिप्पाचारियों का ही आदर होता है. यहाँ क्या खबीस और क्या पट्ठा---सब एक बराबर है. पूछ उसी की है जो दे दनादन आँख मूँदकर एक लाईन से टीपना जानता हो. आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी, कि--"जिसकी जेब में चाँदी है, तवायफ उसी की बान्दी है"
"कह तो आप ठीक ही रहे हैं, लेकिन........"
मियाँ नौचंदी---लेकिन-वेकिन को मारिए गोली पंडित जी, यूँ भी आजकल ब्लागिंग में बडे भारी खतरे हो रहे हैं. देखते नहीं कि आए दिन वहाँ किसी न किसी भले आदमी की बेईज्जती खराब हो जाती है"
"लो कर लो बात, मियाँ क्या इसी हिम्मत पर ब्लागिंग करने चले थे ? भाई जब ऎब पालने का शौक रखते हो तो इज्जत को ताक पर रख देना चाहिए. ब्लागिंग को आपने क्या हँसी ठठ्ठा समझ रखा है. मियाँ ये तो वो कूचा है, जिसमें से सिर के बल गुजरना होता है. कहते हैं कि----"कटाए सर को उल्फत में वही सरदार होता है!"
मियाँ नौचंदी:- " अजी छोडिए पंडित जी, मारिए गोली ऎसी सरदारी को. हमें नहीं चाहिए ऎसी सरदारी जिसमें इज्जत का दिवाला पिट जाए. अच्छा तो पंडित जी अब चला जाये, एक बहुत जरूरी काम याद आ गया. फिर मिलते हैं"

इतना कहकर मियाँ नौचंदी तो अपने रास्ते निकल लिए और हम खडे सोच रहे हैं कि काश हमसे कहने की बजाय मियाँ ब्लाग पर इस बात की घोषणा करके जाते कि "हम ब्लागिंग छोड रहे हैं" तो भला कौन जाने देता उन्हे. अब तक तो भाई लोगों नें "ब्लागर बचाओ आन्दोलन" छेड दिया होता.
 ओह! न जाने अब ब्लागजगत इस अपूरणीय क्षति को कैसे सह पाएगा......:)
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

बुधवार, 24 नवंबर 2010

जो बुद्धि की कसौटी सहन कर सकता हो, वही असली धर्म है !!!

कुछ लोग हैं, जो मानते हैं कि बुद्धि और धर्म दोनों एक दूसरे के विपरीत तत्व है। इन दोनों के क्षेत्र बिल्कुल अलग-अलग है. बात है भी सही। क्योंकि जहाँ बुद्धि तर्क पर चलती है, वहीं धर्म श्रद्धा पर। लेकिन इतने पर भी बुद्धि खुद समझती है कि मेरी हद कहाँ तक है। इसलिए, यदि बुद्धि का प्रयोग करने से कोई विश्वास, कोई धर्म टूटता है तो उसे टूटने ही देना चाहिए। बुद्धि की कैंची से जो धर्म कट जाए, खंडित हो जाए---समझिए कि वह धर्म नालायक है। जो बुद्धि की कसौटी सहन कर सकता हो, वही असली धर्म है। लेकिन जो ये सोचने का अंग है, उसमें किसी धर्म के मानने वाले यदि यह कहें कि बुद्धि प्रयोग से हमारी परम्पराएं, हमारे विश्वास, हमारी धारणाएं खंडित होती है तो समझना चाहिए कि वें खंडित होने के लायक ही है।

बचपन में हमें कहा जाता था कि चोटी खुली रखने से ब्रह्महत्या का पाप लगता है। अब बचपन की बात है तो उस समय इतनी समझ भी कहाँ होती थी कि तर्क करने बैठें। सो जैसा कहा गया वैसा मान लिया। कुछ बडे हुए तो उसकी गम्भीरता समझ में आई और पूछ बैठे कि यदि चोटी न बाँधने से ही ब्रह्महत्या लग जाती है तो यदि कोई साक्षात ब्रह्महत्या कर दी जाए तो फिर कितना पाप लगेगा? बस, इसका किसी के पास् क्या जवाब होता। सो, टूट गई श्रद्धा। कहने का मतलब ये कि इस प्रकार की बेसिरपैर की बातों का बुद्धि से कोई सम्बंध नहीं है।
आज, चाहे कोई सा भी धर्म क्यों न हो, सबमें धर्म के नाम पर अनेक प्रकार की अन्धश्रद्धाएं, भान्ती-भान्ती की कुरीतियाँ ही देखने को मिल रही हैं। इन्सान धर्म की आड में चल रही इन कुप्रथाओं को ही वास्तविक धर्म समझने लगा है। अब यदि कोई व्यक्ति इनके विरूद्ध आवाज उठाता भी है तो लोग उसे निज धर्म का खंडन मानने लगते हैं। लोगों को सोचना चाहिए कि अगर ये प्रथायें बुद्धि प्रयोग से खंडित होती हैं, तो उन्हे खंडित होने दें। अब यदि कोई उसे निज धर्म का खंडन मानता है तो उन्हे यह भी समझ लेना चाहिए कि वास्तव में धर्म कभी खंडित होने वाला नहीं होता। ओर जो खंडित हो जाए, समझो वो धर्म ही नहीं है। इसलिए उसके विषय में दुख करने, क्रोधित होने का कोई कारण ही नहीं है।

धर्म में, जो नाना प्रकार के मसलन बली प्रथा, कुर्बानी जैसे गैर जरूरी तत्व शामिल हो गए हैं, उन्हे हटाया जाए और स्पष्ट कहा जाए कि वे जरूरी नहीं है। भिन्न भिन्न धर्मावलम्बी जो छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे का विरोध करते हैं, जरा जरा सी बात पर मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं, उन्हे ये समझना चाहिये कि अपनी कुरीतियों पर पर्दा डालने की बजाय, उसके बदले में सर्वमान्य नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित किया जाए और उसके अनुसार जीवन चलाने का प्रयास किया जाए। ऎसा करने पर ही लोगों में धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा विकसित होगी और समाज भी सही रूप में प्रगति कर सकेगा।
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

रविवार, 22 अगस्त 2010

आजकल तो ब्लागजगत में हास्य रस की ही धूम है......(बस यूँ ही)

आजकल ब्लागजगत में जिस रस की पोस्टें सबसे अधिक लिखी जा रही हैं, वह है हास्य-रस . अब यह बात दूसरी है कि लिखने वाला स्वयं उसे करूण या वीर रस समझता हो. लेकिन जब उनकी शैली हास्यास्पद लगे तो तब इन्हे हास्य रस के अन्तर्गत रखना ही ठीक समझा जाएगा.
हमारे एक ब्लागर बन्धु, जो रोजाना नियम से एक पोस्ट की सृ्ष्टि रचना करते हैं, उनकी लिखने की शैली इतनी जबरदस्त होती है कि क्या कहें! पाठक गम्भीर पोस्ट समझकर पढने आता है और महज चार पंक्तियाँ पढकर ही हँसता हुआ खिसक लेता है. यूँ भी एक आम पाठक भला इतना समझदार भी कहाँ होता है. वो तो लेखक के दो चार बुद्धिमान टाईप के यार मित्र हैं, जो पोस्ट को पूरा पढने का दम रखते हैं वर्ना आम पाठक में कहाँ दम कि वो इनकी पोस्ट को पूरा झेल सके. देखने में आता है कि ऎसे कुछ ब्लागरों को हमेशा शब्दों और भावों का अपच हुआ रहता है और तब वे मदारी के गोलों की भान्ती एक के बाद एक रन थ्रू निकलते चलते हैं. तब ऎसे में क्रम भंग हो जाए, मतलब कि कभी शब्द पहले निकल आए और भाव बाद में, और कभी भाव आगे निकल गए और शब्द कहीं मन में ही अटक गए तो कोई आश्चर्य की बात थोडे ही है.
ईमान धर्म की बात तो ये है कि ब्लाग लेखन स्वांत सुखाय होना चाहिए और ऎसा लिखा जाए कि पढने वाले की समझ में आए------ये सिद्धान्त बहुत पुराना हो चुका है. नया सिद्धान्त तो है कि बात ऎसी कहो जिसे कोई भले न समझे, उसका किसी को कोई लाभ हो या न हो, लेकिन टिप्पणी मिलनी चाहिए और दूसरी बात ये कि भाई बन्धुओं के प्रताप से पुरूस्कार उरस्कार मिलने के चाँस भी बने रहे. इससे उन्हे खुद को तो खुशी मिलेगी ही, साथ में हम जैसे तमाशबीन भी तनिक हास्य रस का आनन्द ले सकेंगें. इसलिए हमने निवेदन किया था कि आजकल ब्लागजगत में हास्य रस की धूम है. आगे चलकर जब कोई ब्लागिंग का इतिहास लिखेगा तो उसे हास्यास्पद रचनाओं की कमी न रहेगी और उसे यह मानना पडेगा कि ब्लागिंग के इस वर्तमान काल में इन हास्यास्पद रचनाओं को सराहने वाले भी जितने गुणग्राहक मिले, उतने पहले कभी न थे. आपने अभी तक ऎसी रचना न चेपी हो तो अब चेप लीजिए, टिप्पणी और पुरूस्कार देने वालों की यहाँ कोई कमी थोडे ही है....:)
चलते चलते आपकी नजर एक एक शेर अर्ज है:---

कहाँ हैं गुण के ग्राहक, जो गुण को देखते हैं
बस,जो हमको टीपते हैं, हम उनको टीपते हैं!!

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

क्या आप भी सोचते हैं ???

पता नहीं आप इस तरह से सोचते हैं या नहीं, पर बात वास्तव में सोचने की ही है. घरबार, बाल-बच्चे, रोजी-रोजगार, अडोसी-पडोसी, नाते-रिश्तेदार, देश-दुनिया और तो और भगवान के होने या न होने के बारे में भी आपने जरूर सोचा होगा. लेकिन मैं कहता हूँ कि इतना सबकुछ सोचने पर भी आपने कुछ नहीं सोचा, क्यों कि जो कुछ भी आपने सोचा वो सोचा न सोचा एक बराबर है. 
दरअसल बात ये है कि जो कुछ भी हम सोचते हैं, उसे यदि सोचना कहा जाए तो हकीकत ये है कि वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्यों कि धूल से लेकर चाँद-तारों तक, 'इस' से लेकर 'उस' तक सोचते रहने पर भी हम लोग अपने बारे में जरा भर भी सोचते ही कहाँ हैं?
यूँ तो हम और आप सभी सोचने का काम करते हैं. आखिर ऊपर वाले नें दिमाग तो इन्सान को सोचने के लिए ही दिया है. अब ये हमारे ऊपर है कि हम उससे क्या सोचते हैं, कितना सोचते हैं और किस तरह से सोचते हैं. अब सोचने वाले तो एक गधे को भी किसी एक विशेष दृ्ष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य, उसके भोलेपन, उसके शरीफाना अन्दाज की सराहना करने के बारे में सोचते सोचते भी एक अच्छे खासे दार्शनिक हो सकते हैं. इसी तरह आप हिन्दी के ब्लागर होकर भी, ब्लाग पर अगढम-बगढम, कूडा कबाड छापते रहकर भी,आप चाहे तो दिनभर सक्रियता क्रमाँक, उसका आधार,सिद्धान्त, उसकी कार्यप्रणाली----साथ में अपनी(ब्लाग की) और दूसरों की क्रमाँक सँख्या आँखों के सामने रखकर चिन्तन करते रहें तो भी अपने आप में श्रेष्ठ ब्लागर होने के गुण विकसित कर ब्लागरत्व को सहज ही प्राप्त सकते हैं. पर मेरा संकेत इस तरह से सोचने की ओर नहीं है. भई आप विकासवाद के सिद्धान्तानुसार बन्दर के नूतनतम संस्करण हैं...सो, बन्दर से कुछ अधिक दिमागदार तो होंगें ही. इसलिए, इस दशा में सोचना भी आपके लिए लाजिमी ठहरा.  लेकिन एक बात जो तय है कि सारी दुनिया जहान की सोचते सोचते भी कुछ तो सोचना हमेशा बाकी रह ही जाता है. आप पूछेंगें क्या ?
जरा उस समय के बारे में सोचिए जब आप अकेले बैठे हों और जम्हाई आ रही हो. उस समय बिना सोचे मुँह चौडा करके नथुना फुलाना कितना मनमोहक लगता होगा. यदि उस समय आप अपनी खुद की शक्ल देख सकें तो अपने काजल भाई या इरफान भाई के कार्टून भी फीके लगने लगेंगें. या फिर चुपचाप बैठे मूच्छ के बाल पकडकर उन्हे घुमाते रहना या नाक को अंगूठे और अँगुली का चिमटा बनाकर बार बार खीँचना----इन सबको आप सोचने की वस्तु भले ही न समझें, लेकिन मैं तो समझता ही हूँ.
आप सोचेंगें कि ये भी कहाँ कहाँ की सोचने लगे. लेकिन भाई बात सोचने की ही है. चाहे बेशक आप उसे सोचकर भी अनसोचा कर दें. यह सोचकर भी बिना सोचे-समझे मैं जो ये यहाँ लिख रहा हूँ , वह भी एक सोच में विमग्न व्यक्ति को देखकर ही. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में कहें तो सोचा है----वह सिर्फ उस सामने बैठे व्यक्ति को देखकर ही. लेकिन अब वह उठकर चल दिया, इसलिए आगे क्या लिखा जाए बस यही सोच रहा हूँ.....तब तक आप बताईये कि पढकर आपने क्या सोचा ? :)

रविवार, 11 जुलाई 2010

ब्लागिंग सुधारोन्माद :)

आजकल देखने में आ रहा है कि बिल्कुल किसी महामारी की तरह से, ब्लागिंग सुधारोन्माद नाम का रोग भी बडी तेजी से फैलता जा रहा है. सच पूछिए, तो यह एक बहुत ही भयानक किस्म का रोग है, जो कि सिर्फ हिन्दी भाषी ब्लागिंग क्षेत्र में ही पाया जाता है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति बस हर वक्त कुछ न कुछ ऊल-जलूल सी हरकतें करता ही रहता है। इस नामुराद बीमारी के चँगुल में फँस कर बेचारा रोगी न तो घर का रहता है और न घाट का। अच्छा भला व्यक्ति बस महज कुछ दिनों में ही अर्ध-पागल की सी हालत में पहुँच जाता है। उठता-बैठता, सोता-जागता, नहाता-धोता, खाता-पीता, यहां तक कि न मालूम कैसी कैसी जगह में भी बस "गुन गुन" करता रहता है। दूसरों के चिट्ठों पर टिप्पणियों की भरमार देखकर तो रोगी को एकदम से भयंकर दौरा शुरू हो जाता है, जो लाख चिकित्सा करने पर भी शान्त नहीं होता। ब्लागिंग की दशा पर रोगी चीखता चिल्लाता है। पसन्द-नापसन्द, टिप्पणियों की कम-ज्यादा संख्या, निरर्थक लेखन,गुटबाजी इत्यादि कुछ ऎसे विषय हैं, जिन्हे देखकर तो उसे एकदम बुरी तरह से फुरफुरी सी आने लगती है। बस उसके बाद तो वो तुरन्त "ब्लाग सुधारक" की भूमिका में आ जाता है और झट से अपनी नेतागिरी की भडास मुफ्त में मिले ब्लाग पर छापकर और फिर उस पर लोगों की वाह! वाह्! देख आनन्दित हो खुशी से झूमने लगता है। इस रोग का अगर शीघ्र ही उचित इलाज न किया जाए तो फिर बहुत जल्द रोगी अर्ध-पागल से पूर्ण पागल की स्थिति में पहुँच जाता है।
अक्सर वे ही ब्लागर इस रोग के शिकार होते हैं जिनकी लेखनशक्ति का उचित विकास नहीं हो पाता. वर्तमान अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित भी हो चुका है कि यह रोग आलतू फालतू प्रकृ्ति के ब्लागरों में ही पाया जाता है.
  
उपचार विधि:-ऎसे रोगी को सुबह शाम दो चार टिप्पणियाँ वाह्! वाह्! के शहद के साथ मिलाकर चटानी चाहिए। उसे नियमित रूप से "चर्चा-धारा" पिलाने से भी रोग का प्रकोप शान्त रहता है। इसके अतिरिक्त कभी कभी किसी "ब्लागर पुरूस्कार" की पुडिया देने से भी लाभ होता देखा गया है। इसके साथ में कभी कभी हफ्ते दो हफ्ते में "ब्लाग सर्वश्रेष्ठता" का काढा भी पिलाते रहें तो समझिए जल्दी लाभ मिलने लगेगा।
यदि ऊपरोक्त वर्णित उपचार के पश्चात भी रोगी की दशा में कोई सुधार नहीं होता तो जानिये कि रोग अब अन्तिम स्टेज तक पहुँच चुका है, बिना विशेष इलाज के ठीक होने वाला नहीं। तब एकमात्र हल ये है कि बिना कोई समय नष्ट किए, रोगी को किन्चित मात्रा में "जूतम-धारा" पिलाई जाए, तो बस , तुरन्त आराम हो जाएगा :-)

बुधवार, 16 जून 2010

ब्लागरोत्थान की कोचिंग क्लास

पार्क की एक बैन्च पर तीन मित्र बैठे है, मिश्रा, अनोखेलाल और चौबे----तीनों ही हिन्दी के ब्लागर. अब ये आपके सोचने पर है कि आप चाहे तो इसे किसी ब्लागर मीट का नाम दें या मित्रों की आपस की गुफ्तगू. अब इनमें मिश्रा और अनोखेलाल तो थे ब्लाग की दुनिया के पुराने पापी यानि कि तजुर्बेकार ब्लागर और इनके मित्र श्रीमान चौबे ब्लागिंग के नए नए रंगरूट. जिन्हे इस अद्भुत संसार में आए हुए ही मुश्किल से जुम्मा जुम्मा चार दिन ही हुए होंगें ओर इन्हे इस जंगल में धकेलने वाले भी यही दोनो मित्र थे....मिश्रा और अनोखेलाल.
तो जी, पार्क में ब्लागर मीट माफ कीजिएगा मित्रों की गुफ्तगू चल रही है. जहाँ मिश्रा और अनोखेलाल खूब प्रसन्न एवं गर्वित भाव से अपनी अपनी पोस्टें, उन पर सावन की बरसात की माफिक झमाझम बरसती टिप्पणियों, अपनी सीनियोरटी, फालोवर संख्या, सक्रियता क्रमांक, ब्लाग ट्रैफिक, अलैक्सा रैंक इत्यादि गहन विषयों पर विचारमग्न थे, वहीं बेचारे चौबे जी मुँह लटकाए उनके धीर च गम्भीर वार्तालाप को समझने के अफसल प्रयास में लगे हुए थे. जब इत्ती देर बीत जाने के बाद भी उनके कुछ पल्ले न पडा तो श्रीमान चौबे बातों का रूख अपनी ओर मोडने के लिए बीच में बोल पडे " मिश्रा जी, पता नहीं आप लोग किस बात पर इसकी शान में कसीदे पढते रहते हैं, जब कि हमें तो ब्लागिंग में आकर ऎसा कुछ खास मजा नहीं आया"
"क्यूँ भाई तुम्हें ऎसा क्यूँ लगा कि ब्लागिंग में कोई रस नहीं है" मिश्रा जी नें हैरान हो सवाल पूछ डाला.
" आप ही देखिए! हमें यहाँ आए हुए पूरे पन्द्रह दिन हो गए. इन पन्द्रह दिनों में हमने हर रोज साहित्य की किसी न किसी विधा पर रोजाना कम से कम एक पोस्ट लिखी है. ये तो अपने अनोखेलाल जी है जो हमारी हर पोस्ट को बडे चाव से पढकर टिप्पणी से नवाज जाते हैं. वर्ना तो आज तक हमारे ब्लाग पर कोई कुता तक भी झाँकने नहीं आया. पढना और पढ्कर टिप्पणी देना तो बहुत दूर की बात है. हाँ जिस दिन हमने ब्लाग लिखना शुरू किया था, उस दिन पहली पोस्ट पर जरूर साहित्यप्रेमियों की लाईन लगी हुई थी. कोई कह रहा था कि आपका हिन्दी ब्लागजगत में स्वागत है. हम आपकी विद्वता को नमन करते हैं. कोई कहे हिन्दी के उत्थान हेतु इस ब्लॉग जगत को आप जैसी प्रतिभाओं की बहुत जरूरत है.--- हम भी फूल कर कुप्पा हुई जा रहे थे कि वाह्! इन्हे कहते हैं साहित्यप्रेमी! विद्वता के सच्चे पारखी! लेकिन वो दिन है ओर आज का दिन उन लोगों में से एक जन भी दुबारा से ब्लाग पर झाँकने नहीं आया. यूँ गायब हुए मानो गधे के सिर से सींग. भाई हमने बिलाग पे काँटे बिखेर रखे हैं क्या जो किसी को चुभ जाएंगें" श्रीमान चौबे जी न जाने किस रौ में बहे अपनी पीडा का इजहार करते चले गए.
"लगता है आप अभी हिन्दी ब्लागिंग के तौर तरीकों से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हैं. बताईये भला सिर्फ निरे लेखन के बूते भी भला यहाँ कोई टिक पाया है!" मिश्रा जी नें भी अपनी अनुभवशीलता की झलक दिखला ही दी.

अनोखे लाल जी भी झट से बोल पडे " अजी मिश्रा जी! अब क्या बतायें. इस बारे में ये हमारी बात तो सुनते ही नहीं. मैने सैंकडों दफे इन्हे समझाया कि भाई किसी बडे नामचीन से ग्रुप से जुड जाओ. थोडी बहुत चमचागिरी करनी सीख जाओ तो तुम्हारा भी कुछ भला हो जाए. लेकिन नहीं, ये महाश्य तो बात सुनते ही भडक जाते हैं. कहते हैं" मैं किसी की खुशामद करके ब्लाग चमकाने से ब्लाग न लिखना बेहतर समझूँगा" अब आप ही देखिए मिश्रा जी, आज के जमाने में ये कैसी दकिसानूसी सोच रखे हुए हैं "
मिश्रा जी कुछ न बोले, लेकिन इतना जरूर समझ गए कि इस भले आदमी पर आदर्शवाद का कच्चा रंग चढा हुआ है. बिना बारिश के धुलने वाला नहीं. और जब तक यह रंग नहीं उतरेगा तब तक ब्लागिंग में इन्हे कोई पूछने वाला भी नहीं.
खैर मिश्रा जी चौबे महाश्य को अकेले में एक तरह ले गए और बहुत देर तक पता नहीं क्या कुछ समझाते रहे. अब ये तो नहीं पता कि उन दोनों में क्या बाते हुईं लेकिन चौबे जी की मुखमुद्रा देख कर आभास हुआ कि मिश्रा जी की समझाईश कामयाब रही.
अपना अनुभवजन्य ज्ञान बाँटने के बाद मिश्रा जी अनोखेलाल के पास आए और कहने लगे "अनोखेलाल जी, समझिए कि मैने इन्हे ब्लागिंग शास्त्र का सम्पूर्ण पाठ पढा दिया है. किसी आवश्यक कार्य के कारण मैं अभी कुछ दिन ब्लागिंग से दूर हूँ. अब ये आपके जिम्मे रहा कि आप कुछ दिन तक इनके व्यवहारिक ज्ञान की प्रोगरेस रिपोर्ट निरन्तर मुझे ईमेल करते रहें.
कुछ दिनों तक अनोखेलाल जी ने इस नए रंगरूट के क्रियाकलापों को परखा और पहली रिपोर्ट मिश्रा जी को वाया ईमेल भेज दी " थोडे बहुत झटके खाकर और एक दो जगह लतियाये जाने के बाद अब चौबे महाश्य जय गुरूदेव! जय गुरूदेव! भजते व्यवहारिकता की पहली सीढी चढ गए हैं. कईं नामी ग्रुपबाजों के यहाँ रोजाना हाजिरी भरने तो जाते हैं,लेकिन अभी तक किसी की कृ्पादृ्ष्टि हो नहीं पाई. किन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं खुशामद से तो देवता तक प्रसन्न हो जाते हैं, ये तो फिर भी हिन्दी के ब्लागर है. चाटुकारिता की महिमा अपरम्पार है. ब्लागेश्वर जल्द ही इन पर कृ्पा करेंगें"

खैर चौबे जी खुशामद का सहारा ले पहली सीढी तो चढ चुके. अब देखना सिर्फ ये बाकी है कि कब तक अन्तिम पायदान तक पहुँच पाते हैं....बाकी, ट्रेनिंग तो उनकी अभी चल ही रही है.......:)

शुक्रवार, 11 जून 2010

हे पंगेच्छु ब्लागर !!!

हे पंगेच्छु ब्लागर!
तुम्हारे अंतस का ब्लागर कीट
नित्य नए पंगें का सृ्जन करता है
और करता है रूप बदल
नित्य नईं बकवास.....

नैट पर आते ही
अपने कलुषित मन
रूपी गधे पर सवार हो
प्रस्थित हो जाते हो तुम
किसी नए पंगें की खोज में....

और पंगों के नित्य नवीन
प्रयोग करके भी तुम
क्या हासिल कर पाते हो ?
महज चन्द टिप्पणियाँ!
और कुछ समानधर्मी
ब्लागरों की वाह! वाह!

किन्तु सच बताना.....
क्या तुम इन तुच्छ प्राप्तियों को
अपनी प्रयोगधर्मिता
एवं अनथक श्रम का
सही मूल्यांकन मानते हो ?

*बस यूँ ही,कविता/फविता जैसा कुछ :)

गुरुवार, 3 जून 2010

सोच रहा हूँ कि क्या लिखा जाए और क्यूँ लिखा जाए !!!

अब इसे मौसम का असर कहा जाए कि माहौल का; पता नहीं क्यों अब कुछ भी लिखने पढने को मन ही नहीं करता. शायद ब्लागिंग का वो पहले वाला रस अब चला गया है. पहले कभी कुछ लिखते थे तो चाहे उसे पढने वालों को बेशक आनन्द न आए लेकिन हमें लिखने में तो खूब आया करता था. लेकिन अब वो बात नहीं रही........अब पहले तो लिखने का कुछ मन ही नहीं करता, अगर कहीं अनमने भाव से ही सही लिखने बैठ भी गए तो यूँ लगता है कि मानो शब्द हडताल पर उतर आए हों.....एकदम विचार शून्यता की स्थिति.
आज ही की बात है, बेमन से लिखने बैठे भी तो ऎसा कोई विषय ही नहीं सुझाई दिया कि जिसपर कुछ देर खिटरपिटर की जा सके. न जाने कितनी देर यूँ ही बैठे बैठे कभी डैशबोर्ड को देखता, कभी की-बोर्ड की ओर तो कभी मूषक महाराज की ओर लेकिन तीनों ढाक के तीन पात की तरह अलग ही नजर आते. इन तीनों का अस्तित्व मुझे बिल्कुल ही विरोधी जान पडने लगा. मैनें कीबोर्ड से कईं बार हाथों का स्पर्श कराया; पर कुछ काम न बना.
न जाने देवी, देवता, पितर वगैरह किन किन का स्मरण करके देख लिया लेकिन किसी को भी तरस न आया. कम से कम एक घंटा यूँ ही कभी माऊस, कभी की-बोर्ड तो कभी डैशबोर्ड को देखते बीत गया, लेकिन जैसा कि न तो कुछ लिखा जाना था, ओर न ही लिखा गया. उल्टे इस एक घंटे की अवधि में चार कप चाय और तीन गिलास पानी जरूर गटक लिए, सोचा कि शायद किसी तरह से दिमाग की अकर्मन्यता दूर हो; पर सब उपचार व्यर्थ गए. परेशान होकर एक दो बार सोचा भी कि छोडो यार! कम्पयूटर बन्द करके सोया जाए...क्या रखा है इस झंझट में; पर "जब तक साँस तब तक आस" ने वो भी न करने दिया.
कहते हैं कि जब मनुष्य निरूपाय हो जाता है तो फिर वो मूर्खता पर कमर कसता है. कभी कभी ऎसा भी समय आ जाता है कि जब अच्छे अच्छे विद्वानों की बुद्धि मात खा जाती है, तो भला हमारी क्या बिसात. हम तो यूँ भी कभी अपने आपको कोई खास समझदार नहीं समझते.
मैने जब अच्छी तरह देख लिया कि अब कोई चारा नहीं, दिमाग में कैसा भी कोई आईडिया आ ही नहीं रहा तो अब एक ही हल है कि नैट से कोई एक ऊलजलूल सी तस्वीर खोजकर, उसका कोई आलतू फालतू सा शीर्षक देकर ही एक पोस्ट ठेल दी जाए. ज्यों ज्यों मैं गौर करता गया, मुझे एक यही विचार समायोजित और उपयुक्त जान पडने लगा. कारण ये कि इसमें नुक्सान तो कुछ था ही नहीं; टिप्पणियाँ तो अपने को उस पर भी मिल ही जानी है. आखिर अपने भी तो कुछ बन्धे बँधाए ग्राहक हैं ही:).......भले ही बेशक भाई लोग झूठमूठ की वाह! वाह्! बहुत बढिया! जैसी टिप्पणियाँ चिपका के चलते बने(वैसे भी यहाँ कौन किसी की सच्ची तारीफ करता है) ओर बाद में मन ही मन कुढते रहें ओर पोस्ट को बकवास करार देकर जी भर गालियाँ निकालें या कि टिप्पणी देने की मजबूरी को कोसें.......क्या फर्क पडने वाला है! वैसे भी अपना काम तो हो गया.......एक पोस्ट ठेलनी थी, ठेल दी..बस! चलते हैं---जै राम जी की! :-)
कहते हैं कि किसी लेखक के लिए उसके पाठक गुरू समान होते है,जो उसके लेखन को दिशा प्रदान करते हैं; ओर ये भी सुना है कि गुरू लोगों के दिल दरिया में अक्सर दया की मौजें उठा करती हैं :-)

सोमवार, 31 मई 2010

आँख के सामने क्यूँ अन्धेरा है

क्यों जम्हाई आ रही है बेतरह
इस तरह से आँख क्यों है झप रही
देख लो चहुँ ओर क्या है हो रहा
बात सुन लो, आँख खोलो तो सही..........

सच की समझ तुम जो नहीं रखते
तो क्यों न रूचें तुम्हें घुनी बातें
सच को सच कहें कैसे
जब सुनी हैं बनी चुनी बातें.......

आँख खोलिए तनिक जतन करिये
जागिए हो रहा सवेरा है
बन गये हो किसलिए अन्धे
आँख के सामने क्यूँ अन्धेरा है........

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान में भर्ती हेतु आज माननीय चिट्ठाकारों का साक्षात्कार चालू आहे!!!

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान उन सभी आवेदनकर्ताओं का दिल से धन्यवाद करता है, जिन्होने इस संस्थान के साथ जुडकर हिन्दी चिट्ठाकारिता को समृ्द्धि प्रदान करने में अपना योगदान देने की इच्छा प्रकट की हैं। जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि रिक्त्त पदों हेतु आवेदन करने की अन्तिम समय सीमा अब समाप्त हो चुकी है। संस्थान के गुणी,विद्वान,कलामर्मज्ञ,साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी प्रबंधकों द्वारा प्राप्त सभी आवेदन पत्रों का गहन दृष्टि से अवकोलन करने के पश्चात, उनमें से कुछ आवेदनकर्ताओं को आज यहाँ साक्षात्कार हेतु आमन्त्रित किया गया है। 
सभी चयनित आवेदनकर्ता साक्षात्कार स्थल पर पहुँच चुके हैं। ओर उनसे साक्षात्कार कर रहे हैं, संस्थान द्वारा नियुक्त किए गये चयनकर्ता और इस ब्लागजगत के एक अति वरिष्ठ ब्लागर श्री राज भाटिया "जर्मनी वाले".........
सबसे पहले उम्मीदवार कविवर श्री दिगम्बर नासवा जी.......
दिगम्बर नासवा:- " मे आई कम इन, सर"
राज भाटिया:- लो ये आए अंग्रेज महाशय। भई हिन्दुस्तान में रह कर हिन्दी बोलते जुबान सूखती है क्या?
दिगम्बर नासवा:- सारी सर्! ओह! माफी चाहता हूँ। सर! मैं दुबई से आया हूँ ।
राज भाटिया:- भई माना आप दुबई से आए हैं, लेकिन हो तो हिन्दूस्तान ही न। तो फिर हिन्दी में नहीं पूछ सकते थे। जब आप कविता, कहानियाँ, शेरो शायरी हिन्दी में लिखते हो तो फिर हिन्दी को व्यवहार में क्यों नहीं लाते।
 दरअसल दोष आपका नहीं, आजकल के सभी नौजवानों का यही हाल है । ये सब गलत खानपान का नतीजा है । दूध,दही,घी वगैरह तो कुछ खाऎंगें नहीं, बस चाय, पिज्जा बर्गर, सिगरेट गुटखे, शराब, अंडे खा खाकर दिमाग भ्रष्ट हो चुका है, देश की युवा पीढी का । बादाम की ठंडई की जगह सिगरेट पी रहे हैं, पूजा पाठ की बजाय मल्लिका शेरावत,बिपासा बसु जैसी देवियों की आराधना में जीवन बीत रहा है। इसी कारण से मानसिक शक्ति दुर्बल पडती जा रही है। आप एक तो कमरे के भीतर आकर पूछते हो कि "मै अन्दर आ सकता हूँ" ओर वो भी अंग्रेजी में । अफसोस्! नवयुवक ! बेहद अफसोस्! अब अगर मै कह दूँ कि नहीं आ सकते तो?
दिगम्बर नासवा:- सर! मैं यहाँ संस्थान में भर्ती के लिए आया हूँ, न कि प्रवचन सुनने के लिए। ओर वैसे भी वो तो मैने सिर्फ एटीकेट के नाते पूछा था ।
राज भाटिया:- ठीक है अब आप प्रस्थान कीजिए। समझिए कि आपको भर्ती कर लिया गया है। आपका नियुक्ति पत्र कुछ दिनों में आपके पास पहुँच जाएगा।
अगला उम्मीदवार आता है ।
राज भाटिया:- क्या नाम है आपका?
उम्मीदवार:-(आच्च्छी) जी, नीरज जाट
राज भाटिया:- क्या हुआ, आपकी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही?
नीरज जाट:- जी वैसे तो ठीक है, बस थोडा सा कोल्ड हुआ है। आच्च्च्छी....
राज भाटिया:- अरे कैसे नौजवान हो तुम्! देश का भविष्य तुम लोगों के कन्धों पर टिका है ओर कमाल है इस आग उगलती गर्मी में तुम कोल्ड से परेशान हो। भई तुम कुछ लेते क्यों नहीं? किसी अच्छे से डाक्टर को दिखाओ।
नीरज जाट:- जी क्या करूँ। डाक्टर के पास जाने का टाईम ही नहीं मिल पाता। इस साक्षात्कार के लिए भी बडी मुश्किल से समय निकाल पाया हूँ। बस यहाँ से फ्री होते ही सीधे लद्दाख के लिए गाडी पकडनी है।
राज भाटिया:- अच्छा चलो छोडिए। ये बताईये कि कितना पढ लिखे हैं ?
नीरज जाट:- जी मैने डबल एम.ए. किया है।
राज भाटिया:- डबल ऎंवें! शायद ये ऎंवें करने का ही नतीजा है कि तुम बीस की उम्र में तीस के दिखाई पड रहे हो । अरे मैं तुम्हारी जगह होता तो इस ऎंवें- ऊंवें करने की बजाय दंड पेलता, अपने शरीर की ओर ध्यान देता। और एक बात मैने सही सुना है कि तुम बहुत घुमक्कड किस्म के आदमी हो। महीने में 27 दिन तो तुम्हारे घूमने में निकल जाते हैं। अरे! जब हर समय घूमते ही रहोगे तो फिर काम किस समय करोगे। भाई! इस संस्थान को घुमक्कडों की नहीं काम के आदमियों की जरूरत है। जाओ कबड्डी खेलो, दण्ड पेलो, सैर करो। जब घुमक्कडी से पीछा छूट जाए और शरीर में कुछ जान पड जाए, तब आना.....
चलिए अगले उम्मीदवार को भेजिए............
समीरलाल "उडनतश्तरी वाले" :- जी नमस्ते!
राज भाटिया:-नमस्ते! बैठिए। आपको देखकर बहुत प्रसन्नता हुई । इस बात पर खास तौर से कि आप अपनी मातृ्भाषा का सम्मान करना जानते हैं। कितना शानदार व्यक्तित्व है आपका। यदि कद थोडा एक फुट ओर छोटा, रंग थोडा कम काला और वजन भी बीस तीस किलो कम होता तो इसमें ओर भी निखार आ जाता। खैर कोई बात नहीं.......आप ये बताईये कि आपका शुभ नाम क्या है?
समीरलाल:- जी, शुभ और अशुभ दोनों ही समीरलाल हैं।
राज भाटिया:- आपकी योग्यता क्या है?
समीरलाल:- जी, साहित्य में पी.एच.डी. की है।
राज भाटिया:- किस विषय पर ?
समीरलाल:-  धुम्रपान का काव्य रचना में योगदान......
राज भाटिया:- बडा अछूता विषय चुना आपने।  अच्छा ये बताईये कि आपके दिमाग में इस अनूठे विषय पर पी.एच.डी करने का विचार आया कैसे?
समीरलाल:- जी बात दरअसल ये है कि मुझे बचपन से ही सिगरेट पीने की लत पड गई थी।
राज भाटिया:- (हैरतवश बीच में ही टोकते हुए) क्या कहा बचपन से!
समीरलाल:- (थोडा सकुचाते हुए) ज्ज्जी! वो क्या है कि बचपन में गलत यार दोस्तों की संगत की वजह से ये नामुराद आदत पड गई। हमें किसी नें कह दिया कि नेवीकट पीने वालों की बात ही कुछ ओर होती है, बस तब से रोजाना हम कुछ यार दोस्त मिलकर विल्स नेवी कट सिगरेट की एक डिब्बी खरीद लेते, और स्कूल से भागकर किसी पार्क वगैरह में बैठकर धुऎं के छल्ले उडाया करते। आगे चलकर जब हम जवान हुए तो वो पुराने यार दोस्त तो सब के सब छुट गये लेकिन इस विल्स नें हमारा साथ न छोडा, उल्टा हमें कविता, शायरी वगैरह करने की एक ओर आदत लग गई। हम घंटों अकेले बैठे सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहते और दिमाग में कविता की कुछ पंक्तियाँ या कोई शेर गूँजने लगता तो उसे किसी कागज पर उतार लिया करते। धीरे धीरे ऎसा होने लगा कि  खाते-पीते, नहाते धोते, उठते बैठते यानि कि चौबीसों घंटे हम जहाँ भी, जिस भी स्थिति में होते मन में कोई न कोई कविता जन्म ले लेती। अब मुश्किल ये की हर जगह तो हम अपने पास कोई कागज, डायरी वगैरह रख नहीं सकते थे कि इधर कविता जन्म ले ओर उधर झट से हम उसे कलमबद्ध कर लें। ये तो बडी भारी मुश्किल खडी हो गई। क्यों कि विचार तो हवा का झौंका है, ये तो जैसे ही दिमाग में आया ओर आप उसे उसी समय कलम से बाँध न पाए तो फिर वो दोबारा से कहाँ आपके हाथ में आने वाला है। हमें लगने लगा कि मानो हमारी काव्य रचनाओं की भ्रूण हत्या होती जा रही हो। लेकिन कहते है न कि जहाँ चाह, वहाँ राह। चाहे ऎन मौके पर हमारे पास कोई कागज वगैरह न होता हो लेकिन सिगरेट की डिब्बी तो हमेशा चौबीसों घंटे पास में होती ही थी। सो राह ये निकली कि जैसे ही कोई विचार, कोई कविता जन्म लेने लगे तो हम झट से उसे सिगरेट की डिब्बी के अन्दर के खाली कागज पर उतार लेते थे। धीरे धीरे कविता और सिगरेट के बीच न मालूम कैसा तारतम्य स्थापित हो गया कि हमें जब भी सिगरेट की तलब लगे। तो पैकेट में से सिगरेट निकालने भर की देर होती थी कि साथ के साथ तुरन्त एक नई कविता जन्म ले लेती थी। बस तभी से जैसे जैसे हमारी सिगरेट पीने की आदत बढती गई, ठीक वैसे वैसे ही हमारी काव्यधर्मिता विस्तार पाती गई। बचपन में बोया गया एक बीज समय के साथ पुष्पित,पल्लवित होकर आज एक विशाल वृ्क्ष बन चुका है। और इसका सम्पूर्ण श्रेय जाता है तो सिर्फ हमारी धुम्रपान की इस आदत को।
बस यही कारण रहा कि मैने इस अछूते विषय को पी.एच.डी. के लिए चुना।
राज भाटिया:- भई मान गये! आपने साबित कर दिया कि सचमुच विल्स पीने वालों की बात ही निराली है। अच्छा तो ये बताईये कि आपने ये थीसिस कितने पृ्ष्ठों का लिखा?
समीरलाल:- जी, दो सौ पोस्टों का।
राज भाटिया:- दो सौ पोस्टों का ?
समीरलाल:- ओह सारी! माफ कीजिएगा मेरे कहने का मतलब था दो सौ पृ्ष्ठों का ।
राज भाटिया:- अच्छा, तो आपने ये पी.एच.डी. किस विश्वविधालय से की है?
समीरलाल:- जी, झाऊमाऊ यूनिवर्सिटी से।
राज भाटिया:- ये तो कोई नई यूनिवर्सिटी लगती है।
समीरलाल:- जी हाँ, मै ही इसका सबसे पहला स्टूडेंड था।
राज भाटिया:- हो न हो आखिरी भी जरूर आप ही होंगें । चलिए जरा अपनी अपनी डिग्री तो दिखाईये।
समीरलाल:- जी, वो तो मिल ही नहीं पाई। इधर मैने थीसिस जमा करवाई और उधर न जाने क्यों यूनिवर्सिटी को ही ताला लग गया। दरअसल सरकार को मालूम पड गया था कि इस यूनिवर्सिटी में चोरी की थीसिस पर पी.एच.डी करवाने से लेकर नकली डिग्रियाँ बाँटने तक का धंधा किया जाता हैं, शायद इसीलिए.....।
बस इसके बाद तो भाटिया जी नें अपना सिर पकड लिया....बोले-----भाई साहब! आपसे हाथ जोडकर विनती है कि अब आप घर को प्रस्थान कीजिए। हम आपको सूचना भेज देंगें।
उसके बाद हमारे चयनकर्ता श्री भाटिया जी बाकी के उम्मीदवारों को किसी ओर दिन आने के लिए बोलकर उठ खडे हुए............
बेचारे बाकी के उम्मीदवार श्री ताऊ रामपुरिया, ललित शर्मा, यशवन्त मेहता, अन्तर सोहिल, महेन्द्र मिश्र, शशिभूषण तामडे और अजय झा जी, जो कि अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे थे, बडे ही अनमने ढंग से वहाँ से विदा हुए...इस उम्मीद के साथ कि जल्द ही उन्हे दोबारा से साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा......:-)

डिस्कलेमर:- (ये सिर्फ एक निर्मल हास्य है। यदि किसी सज्जन को यहाँ अपने नाम से असहमति हो तो सूचित कर दीजिए, उनका नाम उम्मीदवारों की सूचि से निकाल दिया जाएगा...लेकिन उसके बदले में उनके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के नाम का अनुमोदन किया जाना आवश्यक है :-))

शनिवार, 13 मार्च 2010

कडवे का शहद भी कडवा................(बस यूँ ही)

बचपन में एक कहानी पढी थी कि फारस देश में एक स्त्री रहा करती थी जो कि शहद बेचने का व्यवसाय किया करती थी । उस स्त्री में एक खूबी यह थी कि उसका बातचीत करने का ढंग बहुत ही आकर्षक था । जिस कारण से उसकी दुकान पर सारा दिन ग्राहकों की भीड लगी रहती थी  । ग्राहकों का उस पर इतना विश्वास था कि यदि वो जहर भी बेचती तो शायद लोग उसे भी शहद समझकर खरीद लेते ।
अब जैसा कि जमाने का चलन है कि यदि किसी की दुकानदारी अच्छे से चल रही हो तो उसकी देखादेखी बीसियों लोग उसी के बगल में दुकान खोलकर बैठ जाते है । ऎसे ही एक दुष्ट स्वभाव के आदमी नें देखा कि ये औरत तो शहद बेच बेच कर बहुत भारी कमाई कर रही है तो क्यों न मैं भी ये धंधा शुरू कर दूं ।
अब उस औरत की देखादेखी वो दुष्ट आदमी भी उसके बगल में शहद की दुकान खोलकर बैठ गया । अब दुकान तो उसने खोल ली लेकिन शहद के सजे सजाए बर्तनों के पीछे उसने अपनी आकृ्ति कठोर ही बनाए रखी ।  दुकानदारी तो निम्रता की है, तो भला ऎसे कठोर मुख आदमी के पास ग्राहक भी कहां फटकता । अगर भूले भटके कोई आ भी जाता तो उसके माथे पर चढी त्यौरियाँ देखकर वहाँ से खिसकने में ही भलाई समझता ।  एक मक्खी भी उसके शहद के पास फटकने का साहस न कर पाती थी । सुबह से शाम हो जाती लेकिन उसके हाथ खाली के खाली ही रहते ।
कईं दिनों तक ऎसा ही चलता रहा तो धीरे धीरे उसकी खिन्नता बढने लगी ओर फिर तो वो क्रोध के मारे राह चलते लोगों को ही गालियाँ बकने लगा । छोटे छोटे बच्चे भी अब तो उसे चिढाने के लिए उसकी ओर भृ्कुटियाँ तान कर देखते ओर कहते कि "कडवे का शहद भी कडवा" । उसका कुछ ओर तो जोर चल नहीं पाता बस गुस्से में भरकर उन्हे मारने को दौड पडता ।  धीरे धीरे हर कोई उसे यही कह कर चिढाने लगा कि " कडवे का शहद भी कडवा" ।
उस मूर्ख इन्सान को इतनी सी बात समझ में नहीं आई कि संसार में हमारा कार्य सिर्फ बेचना और खरीदना ही नहीं है । हमें यहाँ एक दूसरे के मित्र बनकर रहना है ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

पता नहीं मन की ये दुविधा कब पीछा छोडेगी

मालूम नहीं क्यों, कभी कभी तो ऎसा लगने लगता है कि ये ब्लागिंग,फ्लागिंग कुछ नहीं--सब फालतू की टन्टेबाजी है--ऎसा लगता है कि अपनी कोई खुशी, कोई दुख, कोई जानकारी, मन में आया जरा सा कोई विचार अपने तक ही सीमित न रख पाना और उसे झट से एक पोस्ट के जरिये ठेल देना बिल्कुल एक भोले बालकपन का सा काम है। जब कभी अपनी किसी पोस्ट को इस दृ्ष्टि से देखता हूँ तो मानो ब्लागिंग के सारे उत्साह पर ठंडा पानी पड जाता है।
फिर कभी दूसरी विचारधारा बल पकडती है तो उस समय लगता है कि जैसे अपने मन के विचारों,भावों को प्रकट कर पाना हरेक के बस की बात नहीं होती; और आसान भी नहीं होता। इसलिए जो भी कोई इन्सान अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट कर सके, कि उससे चन्द दूसरे अन्य लोग भी अपने को जुडा समझें, तो उसे औरों से विलक्षण और कुछ समर्थ ही समझा जाना चाहिए। इस विचारधारा के वशीभूत होकर बस खुद में एक तीसमारखाँ सी अनुभूति होने लगती है ओर हम झट से कोई नई पोस्ट लिखने बैठ जाते हैं  :)  
लेकिन एक ऎसी समस्या है, जिसने कि पिछले कईं दिनों से हमारा जीना हराम कर रखा है। वो यूँ कि कभी कभी ऎसा होता है कि जिस पोस्ट को हमने बडे चाव से लिखा। जब पोस्ट की तो खुद के साथ साथ चार लोगों को भी पसंद आई लेकिन कुछ दिन बाद जब दोबारा से अपनी उस पोस्ट को पढता हूँ तो ऎसा प्रतीत होने लगता है कि मानो इसे लिखकर मैने केवल समय का अपव्यय ही किया है। मन में ऎसे  विचार आने लगते हैं कि "क्या यार्! ये सब भी कोई लिखने की चीज है। लिखना ही था तो कुछ तो ढंग का लिखना चाहिए था"।
मेरे मन की यह दुविधा पता नहीं मेरा इस ब्लागिंग में पीछा कब छोडेगी। ऎसा लगने लगा है कि जैसे मेरे अन्दर कोई दो धुर विरोधी व्यक्तित्व विद्यमान हैं। जो चीज एक को पसन्द है, वो दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती। इसी कशमकश के चलते आज तक हमारे इस ब्लाग का सक्रियता क्रमाँक 250-300 की संख्या पर ही अटका हुआ है----वर्ना तो समीर लाल जी और ताऊ जी, दोनों को न जाने कब का पछाड चुके होते(सिर्फ चिट्ठा सक्रियता क्रमांक के मामले में) हा हा हा...। बिल्कुल सीरियसली कह रहे हैं---मजाक मत समझिएगा :-)
हाँ तो हम कह रहे थे कि हमारे मन की ये दुविधा ही है, जो कि हमें चिट्ठाकारी के विजयरथ पर आरूढ नहीं होने दे रही । हमारी हालत तो रात के चौकीदार सी हो चुकी है---जो रात भर निरन्तर चलने के बाद भी कही नहीं पहुँच पाता, उसकी यात्रा सिर्फ उस मोहल्ले तक ही सीमित रहती है।
राम जाने!! पता नहीं ये दुविधा कब हमारा पीछा छोडेगी, या पता नहीं छोडेगी भी कि नहीं----डरते हैं, कहीं कोई साईकैट्रिक वाला मामला न हो जाए :-)

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान-----:-)

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि हिन्दी ब्लागर्स को आ रही समस्यायों को देखते हुए पिछले दिनों हमने आप लोगों की सहायतार्थ "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक कुटीर उद्योग का शुभारंभ किया था। जिसके पीछे हमारा एकमात्र यही उदेश्य रहा है कि इसके जरिये हिन्दी चिट्ठाकारों को पोस्ट लेखन में लगने वाले शारीरिक एवं मानसिक श्रम तथा कीमती समय के अपव्यय से मुक्ति दिलाई जा सके। साथ ही प्रतिभा के धनी निम्न एवं मध्यमवर्गीय चिट्ठाकारों को कुछ अतिरिक्त कमाई का मौका देकन उन्हे आर्थिक संबल प्रदान किया जा सके। प्रभु की कृ्पा एवं आप लोगों के योगदान से कुछ हद तक हम इन दोनों ही उदेश्यों की पूर्ती में सफल होते जा रहे हैं। यदि आप लोगों का सहयोग इसी प्रकार मिलता रहा तो निकट भविष्य में ये आपका अपना "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" सफलता के नित नये आयाम छूता चला जाएगा----ऎसा हमारी अन्तरात्मा का कहना है, और कहते हैं कि आत्मा कभी झूठ नहीं बोलती :)
जैसा कि हमने प्रारम्भ में ही कहा था कि आप लोगों को प्रेरित करने के लिए, इस संस्थान की अमूल्य सेवाएं लेने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अनुभवों को आप लोगों से साँझा करते रहेंगें। आज  
हमारे सम्मानीय ग्राहक श्री राज भाटिया जी इस संस्थान से जुडने के पश्चात के अपने अनुभवों को आप लोगों से बाँटने के उदेश्य से हमारे बीच उपस्थित हुए हैं। आईये उन्ही से जानते हैं कि हमारी सेवाऎँ लेने से उनके ब्लागिंग जीवन पर कैसा प्रभाव रहा:--------

भाटिया जी उवाच:- पहले मैं भी आप ही की तरह बहुत परेशान रहा करता था। कुछ नया लिखने के लिए दिमाग में आयडिया ही नहीं आ पाता था। मैने बहुत से उपाय किए जैसे कि हर रोज सुबह उठकर पहले तो नियमित रूप से "सरस्वती चालीसा" का पाठ करना। लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं होता दिखाई दिया तो ये सोचकर छोड दिया कि जितना समय रोज देवी सरस्वती को मनाने में लगता है, उतने समय में तो मैं दस ब्लागों पर जाकर टिप्पणी कर सकता हूँ---जिसका कि मुझे कुछ फल भी मिलेगा। उसके बाद मैने कुछ दिनों तक हर रोज दूध में "बादाम रोगन" डालकर पीना शुरू किया। लेकिन उससे भी फायदा तो क्या खाक होना था, उल्टे इस मँहगें बादाम रोगन नें हाथ जरूर तंग कर दिया। जब मैं हर ओर से निराश परेशान हो चुका था ओर ब्लागिंग छोडने का पूरी तरह से मन बना चुका था कि तभी अचानक मुझे " चिट्ठाकार सेवा संस्थान" के बारे में पता चला। सच मानिये, जिस दिन से मैने "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ली हैं तो मानो मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई। अब न तो पोस्ट लिखने का कोई झंझट ओर न ही कैसी भी कोई परेशानी। अब मैं आराम से अपना सारा समय दूसरे के चिट्ठों को पढने ओर उन पर टिप्पणियाँ करने में लगाता हूँ। बदले में मुझे मिलता है भरपूर मानसिक आराम ओर अपने ब्लाग पर ढेरों टिप्पणियाँ। मैं तो कहता हूँ कि अगर आप भी अपनी ब्लागिंग लाईफ को सुधारना चाहते हैं तो आज ही "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ले लीजिए------ओर मेरी तरह आराम से मजे करिए।

अब मिलते हैं हमारे अगले सम्मानीय ग्राहक श्री समीर लाल "उडनतश्तरी" जी से। जानते हैं कि चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान की सेवाऎं लेने से उनके ब्लागिंग जीवन में क्या प्रभाव पडा । चलिए छोडिए....बहुत हो गया, इनके अनुभव फिर किसी ओर दिन सुन लेंगें :-)

विशेष सूचना:- बहुत जल्द ही संस्थान द्वारा काव्य,लेख,कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि रचनाओं के निर्माण हेतु श्रमजीवी विद्वानों, कवियों,गजलकारों,कार्टूनिस्टों की ठेके पर भर्ती हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा। इच्छुक प्रार्थी आवेदन हेतु तैयार रहें......:-)
लेबल:- "फाग के रंग" :-)

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

बाबा लोगो का ब्लागिंग दर्शन और कलयुगी नीतिज्ञान :)


समीरानन्द आश्रम में तीनों बाबा जी समाधिस्थ अवस्था में बैठे हुए हैं । बिल्कुल अपने ध्यान में निमग्न...कुछ खबर नहीं कि संसार में क्या हो रहा है, और संसार में वे हैं भी या नहीं । ये दोनों काफी देर तक उनके सामने बैठे रहे..इतने में ही, न जाने कब की लगी  स्वामी ललितानन्द महाराज की समाधी टूटी । बाबा जी ने बडी ही दया दृ्ष्टि से इन लोगों की ओर देखा । इन लोगों नें भी श्रद्धाभाव से चरणस्पर्शपूर्वक उन्हे प्रणाम किया ।"बच्चा!- तुम लोग कौन हो और कहाँ से आए हो ?"
मुरारी लाल:- ":महाराज्! हम तो बस चिट्ठाकारी कीट हैं, हम दोनों "ब्लागनगर" के रहने वाले हैं। आप लोगों की बडी महिमा सुनी है,इसलिए दर्शनों के लिए आए हैं ।"
"बोलो बच्चा! कहो कोई समस्या आन पडी है क्या?"
महफूज:- "महाराज्! समस्या तो ऎसी कुछ नहीं । बस हम तो आपके दर्शनों के अभिलाषी थे, ब्लागिरी के मोह को त्याग कर आत्मिक शान्ती की खोज में आप लोगों के द्वारे आए हैं "
"न्! बच्चा न्! अभी तुम लोगों की आयु इन बखेडों में पडने की नहीं है । अभी तुम बस ब्लागिंग की ओर ध्यान दो।"
मुरारी लाल:- "बाबा! ब्लागिंग में क्या खाक ध्यान दें। दिनरात मगजमारी करनी पडती है, तब जाकर हफ्ते दस दिन में एक पोस्ट का जुगाड हो पाता है। हम लोग हर रोज कम से कम सौं लोगों के चिट्ठे पर जाकर टिप्पणियाँ करते है, तब जाकर बदले में हम लोगो को अपनी पोस्ट पर मुश्किल से पाँच सात टिप्पणियाँ मिल पाती हैं। ऊपर से फालतू में सारा दिन कम्पयूटर पे खिटर-पिटर करते रहो, न कुछ कमाई न धंधा"।
बाबा ललितानन्द:- "धैर्य रखो बच्चा ! एक दिन तुम्हारा भी वक्त जरूर आएगा, जब तुम्हे अपनी हर पोस्ट पर सैकंडों टिप्पणियाँ मिला करेंगी, रही बात कमाई कि तो वो भी जल्द शुरू हो ही जाएगी । अवधिया जी और पाबला जी जैसे तकनीकदक्ष ब्लागर इसकी खोज में प्रयासरत हैं"।
 मुरारी:- महाराज्! ब्लागर बनने का वास्तविक अधिकारी कौन है"?
बाबा ललितानन्द:-"जो संसार में किसी काम के लायक न रहें"
मुरारी:- "बुद्धिमान ब्लागर कौन है।"
बाबा ललितानन्द :- "जो दो विरोधी विचार आधारित पोस्टों पर "बिल्कुल सही कहा आपने" लिखकर टिप्पणी करना जानता हो"
मुरारी:-"मूर्ख ब्लागर की परिभाषा क्या है?"
बाबा ललितानन्द:- "जो गोलमोल बात न कह करके अपने ह्र्दय के भाव सब पर सरलता से प्रकट कर दे "
मुरारी:- "सच्चे ब्लागर का सबसे बडा गुण क्या है" ?
बाबा ललितानन्द:-" सुबह शाम गुरूदेव्! गुरूदेव्! कहकर अपने से वरिष्ठ ब्लागरों की चापलूसी और आत्म गौरव का अभाव"
मुरारी:- "सिद्धहस्त ब्लागर किसे कहना चाहिए" ?
बाबा ललितानन्द:- "जिसे दूसरे के लिखे लेखों, कविताओं,कहानियों को चुराने में तनिक भी शर्म का अनुभव न हो "
मुरारी:-"हिन्दी ब्लागिंग का प्रचार प्रसार कैसे होगा"?
बाबा ललितानन्द:- "रोमन भाषा में अधिकाधिक टिप्पणियाँ करने से"
मुरारी:- "हिन्दी ब्लागिंग में सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है"?
बाबा ललितानन्द:-"जो अभी तक स्वयम रचनाकार की भी समझ में न आई हो"


इतना कहकर बाबा ने अपनी दृ्ष्टि मुरारी लाल से हटाकर अब महफूज अली की ओर की---- "हाँ तुम बोलो बच्चा! तुम्हे क्या कष्ट है? क्या तुम भी मुरारी लाल की तरह ब्लाग ज्ञान के उद्देश्य से आए हो" ?
महफूज:- "नहीं महाराज्! ब्लागिंग में तो अपने को कोई दिक्कत परेशानी नहीं है । बल्कि आपकी कृ्पा से अपनी ब्लागिरी की दुकान तो चकाचक चल रही है, हर पोस्ट पर सौं पचास टिप्पणियाँ तो बडे आराम से बिना कुछ किए ही मिल जाती हैं"।
बाबा ललितानन्द:- " तो बच्चा, फिर तुम्हारे इस मुख मंडल पर ये उदासी क्यूं है?"
महफूज:- "बाबा! मेरी क्या बताऊँ! मेरी समस्या कुछ अलग है । दरअसल बात ये है कि जब से मेरी प्रेमिका रामप्यारी नें मुझे छोडकर सन्यास ग्रहण किया है, बस तब से मेरी आत्मा बहुत अशान्त रहती है । अब तो मन करता है कि मैं भी सब कुछ छोडछाड कर बस सन्यासी बन जाऊँ । मैं तो दुनियादारी का मोह त्याग कर बस आपके पास परम सत्य की खोज में आया हूँ। मन में कुछ भ्रम हैं, जिनका आपसे निवारण चाहता हूँ "
बाबा ललितानन्द:- "कहो! तुम्हें क्या भ्रम है बच्चा?"
महफूज :- "मुक्ति" कैसे प्राप्त होती है ?
बाबा ललितानन्द जी:- "आँख,कान बन्द करके खूब मोटा पैसा कमाने से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है"।
महफूज:- "महाराज्! "परोपकार" क्या है?"
बाबा ललितानन्द जी:- "खूब आनन्द से रहना और पाखंड पूर्वक स्वार्थ साधना ही "परोपकार" है। "
तभी बाबा समीरानन्द और बाबा ताऊआनन्द जी भी समाधि से उठ खडे हुए । बाबा जी का एक भक्त उन्हे सुल्फा भरी हुई चिलम पकडा गया और ये दोनों बारी बारी से लम्बे लम्बे कश खीँचने लगे । जब चिलम से निवृ्त हुए तो सामने बैठे इन दोनों की ओर हल्की सी निगाह डालकर बाबा ललितानन्द की ओर प्रश्नवाचक दृ्ष्टि से देखने लगे। उन्होने भी उनकी दृ्ष्टि के आशय को समझने में देर न लगाई ओर कहने लगे "गुरूदेव्! ये दोनों ब्लागजगत से आए दुखी ब्लागर हैं, आत्मिक शान्ती की खोज में यहाँ आए हैं।"
मुरारी लाल और महफूज दोनों नें ही बडे ही श्रद्धाभाव से बाबा लोगों के चरणों में अपना शीश झुकाया । बाबा लोगों नें भी झट से आशीर्वाद दे डाला  "आयुष्मान भव:, दूधो नहाओ, पूतो फलो"
"तुम्हारा कल्याण हो वत्स"
बाबा समीरानन्द :- "कहो वत्स्! क्या शंका है तुम्हारी ?"
महफूज:- "महाराज्! स्वर्ग कहां है ?"
बाबा समीरानन्द:- "सिविल लाईन्स तथा माडल टाऊन की कोठियों और मल्टीप्लैक्स में "
महफूज:- "ओर नरक किस जगह है" ?
बाबा ताऊआनन्द:- "जो लोग अपनी सनातन संस्कृ्ति पर गर्व करते हैं, उन लोगो के घरों में "
महफूज:- "धर्म" क्या है ?
बाबा समीरानन्द:- "संसार की सब से सस्ती और निकृ्ष्ट वस्तु का नाम ही धर्म है"
महफूज:- "इन्सान को धर्म का पालन कब करना चाहिए ?"
बाबा ताऊआनन्द:- " मृ्त्यु के समय----जीवन समाप्ति में जब एक आध दिन रह जाए, यानि कि जब यमदूत प्राण लेने को दरवाजे पर खडा हो, तब"
महफूज:- "जीवन की सफलता किसमें है ?"
बाबा ताऊआनन्द:- "ढोंग रचने और ऎश करने में "
महफूज:- "सच्चा ज्ञानी कौन है?"
बाबा समीरानन्द:- " दसँवी में 33 प्रतिशत नम्बर लेकर भी जो अफसर की कुर्सी पर बैठा फर्स्ट डिवीजन बी.ए., एम.ए. पास को धमका रहा है" 
महफूज:- "सबसे बडा सत्यवादी कौन है?"
बाबा ललितानन्द:- नेता, वकील और हिन्दी ब्लागर"
महफूज:- "मनुष्य जीवन का उदेश्य क्या है?"
बाबा ताऊआनन्द:- "कमजोरों को सताना और अपने से बलवान से दब जाना ।"
महफूज:- "महाराज्! आज आपने मेरी सारी संशयनिवृ्ति कर दी, अब जाकर मेरी आत्मा को परम शान्ती प्राप्त हुई है । मेरे ह्रदय की उद्विग्नता दूर हो गई,! आप मुझे जो आदेश देंगें, अब मैं वही करूँगा"।
मुरारी:- "धन्य गुरूवर, धन्य् ! आज आप लोगों के दर्शन कर मेरे नेत्र और उपदेश सुनकर मेरे कान पवित्र हो गये । अब तो मैं आपके पाद-पंकंजो की सेवा कर अपना जीवन संवारना चाहता हूँ"।


" जाओ, बालको! अब अपने ब्लाग की सुध लो और हमारे बताए विधान द्वारा अपनी ब्लागिरी चमकाने के साथ साथ अपने लोक परलोक को भी सुधारते जाओ । बस तुम अपने इस जीवन मे ही मुक्ति के अधिकारी बनकर निसंदेह स्वर्ग को जाओगे। ओर हाँ, भक्तजनों के सहयोग से आश्रम का निर्माण कार्य प्रगति पर है । उसमें अपना योगदान देकर शर्मा जी से उसकी रसीद जरूर लेते जाना ।  अच्छा! चलते हैं, अब हम लोगो की समाधि का समय हो गया हैं ।"
तीनों बाबा आशीर्वाद की मुद्रा बनाए आश्रम के भीतरी भाग में बने अपने अपने वातानुकूलित कक्ष की ओर प्रस्थान कर गये ।
हरि बोल.......

सोमवार, 2 नवंबर 2009

चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत .........

कभी कभी सोचता हूँ कि पता नहीं ईश्वर ने कुछ लोगों को ऎसा क्यों बनाया है,जिन्हे कि आप चाहे लाख समझा लें, लेकिन फिर भी करेंगें वो लोग वही,जो कि उनके दिमाग में पहले ही कूट कूटकर भरा जा चुका है । इन्सान का मुखौटा पहनकर घूम रहे ये भेडिए पता नहीं समाज को किस ओर ले जाना चाहते हैं । 

रहिमन लाख भली करौ, इनका जिद्द न जाए
राग सुनत, पय पियतहू, सांप सहजहि घर खाए ।।


हर पोस्ट में गारी मिलत हैं, लोग रहे चिल्लाहिं
रहिमन करूए लिखन कौ, चहियत यही सजाहिं ।।


आप न काहू काम के, डार,पात,फल मूर
औरन को रोकत फिरैं, आपहूं वृ्क्ष बबूर ।।


रहिमन ऎसे लोगन ते, तजो बैर औ प्रीत
चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत ।।
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रफ़्तार