कितना अद्भुत है ये हिन्दी ब्लागजगत! जैसे ईश्वर नें सृ्ष्टि रचना के समय भान्ती भान्ती के जीवों को उत्पन किया, सब के सब सूरत, स्वभाव और व्यवहार में एक दूसरे से बिल्कुल अलग। ठीक वैसे ही इस ब्लाग संसार में भी हजारों लोग दिन रात अलग अलग मसलों पर लिखे जा रहे हैं----लेकिन क्या मजाल कि वे किसी एक भी बात पर कभी एकमत हो सकें। सब एक दूसरे से निराले और अजीब। ये वो जगह हैं जहाँ आपको हरेक वैराईटी का जीव मिलेगा। यहाँ आपको आँख के अन्धे से अक्ल के अन्धे तक हर तरह के इन्सान के दर्शन होंगें। मैं तो कहता हूँ कि सही मायनों में यहीं असली हिन्दुस्तान बस रहा है। ऊपर वाले नें अपनी फैक्ट्री में मनुष्य जाति के जितने भी माडल तैयार किए होंगें, उन सब के नमूने आपको यहाँ देखने को मिल जाएंगें। जहाँ के पुरूष औरतों की तरह लडें, जहाँ के बूढे बुजुर्ग बात बात में बच्चों की तरह ठुसकने लगें, जहाँ एक से बढकर एक भाँड, जमूरे, नौटंकीबाज आपका मनोरंजन करने को तैयार बैठे हों, जहाँ मूर्ख विद्वानों को मात दें और जहाँ लम्पट देवताओं की तरह सिँहासनारूढ होकर भी ईर्ष्या और द्वेष में पारंगत हों, तो बताईये भला आप इनमें दिलचस्पी लेंगें या घर में बीवी बच्चों के साथ बैठकर गप्पे हांकेंगें ।
गधे और घोडे कैसे एक साथ जुत रहे हैं। शेर और बकरी कैसे एक साथ एक ही घाट पर पानी पीते हैं। यदि यह सब देखना है तो बजाए घर में बाल बच्चों के साथ सिर खपाने या टेलीवीजन पर अलाने-फलाने का स्वयंवर या सास-बहु का रोना धोना देखकर अपना ब्लड प्रैशर बढाने के यहाँ हिन्दी चिट्ठानगरी में पधारिए और हो सके तो अपने अडोसी-पडोसी, नाते रिश्तेदार, दोस्त-दुश्मन सब को हिन्दी चिट्ठाकारी का माहत्मय समझाकर उन्हे इस अनोखी दुनिया से जुडने के लिए प्रोत्साहित कीजिए क्यों कि निश्चित ही आने वाला कल हिन्दी ब्लागिंग के नाम रहने वाला है। ऎसा न हो कि कल वक्त आगे निकल जाए और आप पिछडों की श्रेणी में खडे उसे दूर जाते देखते रहें।
ad
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
असली हिन्दुस्तान तो यहीं इस ब्लागजगत में बस रहा है.......
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
यूँ चले जाना किसी का..........
ध्यान में अपने निरन्तर
मार्ग पर चलते हुए ही
बीती कुछ सुनसान रस्ते
की अन्धेरी रात राही
कट गई कुछ राह तेरे
साथ करते बात राही........
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान में भर्ती हेतु आज माननीय चिट्ठाकारों का साक्षात्कार चालू आहे!!!
चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान उन सभी आवेदनकर्ताओं का दिल से धन्यवाद करता है, जिन्होने इस संस्थान के साथ जुडकर हिन्दी चिट्ठाकारिता को समृ्द्धि प्रदान करने में अपना योगदान देने की इच्छा प्रकट की हैं। जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि रिक्त्त पदों हेतु आवेदन करने की अन्तिम समय सीमा अब समाप्त हो चुकी है। संस्थान के गुणी,विद्वान,कलामर्मज्ञ,साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी प्रबंधकों द्वारा प्राप्त सभी आवेदन पत्रों का गहन दृष्टि से अवकोलन करने के पश्चात, उनमें से कुछ आवेदनकर्ताओं को आज यहाँ साक्षात्कार हेतु आमन्त्रित किया गया है।
सभी चयनित आवेदनकर्ता साक्षात्कार स्थल पर पहुँच चुके हैं। ओर उनसे साक्षात्कार कर रहे हैं, संस्थान द्वारा नियुक्त किए गये चयनकर्ता और इस ब्लागजगत के एक अति वरिष्ठ ब्लागर श्री राज भाटिया "जर्मनी वाले".........
सबसे पहले उम्मीदवार कविवर श्री दिगम्बर नासवा जी.......
दिगम्बर नासवा:- " मे आई कम इन, सर"
राज भाटिया:- लो ये आए अंग्रेज महाशय। भई हिन्दुस्तान में रह कर हिन्दी बोलते जुबान सूखती है क्या?
दिगम्बर नासवा:- सारी सर्! ओह! माफी चाहता हूँ। सर! मैं दुबई से आया हूँ ।
राज भाटिया:- भई माना आप दुबई से आए हैं, लेकिन हो तो हिन्दूस्तान ही न। तो फिर हिन्दी में नहीं पूछ सकते थे। जब आप कविता, कहानियाँ, शेरो शायरी हिन्दी में लिखते हो तो फिर हिन्दी को व्यवहार में क्यों नहीं लाते।
दरअसल दोष आपका नहीं, आजकल के सभी नौजवानों का यही हाल है । ये सब गलत खानपान का नतीजा है । दूध,दही,घी वगैरह तो कुछ खाऎंगें नहीं, बस चाय, पिज्जा बर्गर, सिगरेट गुटखे, शराब, अंडे खा खाकर दिमाग भ्रष्ट हो चुका है, देश की युवा पीढी का । बादाम की ठंडई की जगह सिगरेट पी रहे हैं, पूजा पाठ की बजाय मल्लिका शेरावत,बिपासा बसु जैसी देवियों की आराधना में जीवन बीत रहा है। इसी कारण से मानसिक शक्ति दुर्बल पडती जा रही है। आप एक तो कमरे के भीतर आकर पूछते हो कि "मै अन्दर आ सकता हूँ" ओर वो भी अंग्रेजी में । अफसोस्! नवयुवक ! बेहद अफसोस्! अब अगर मै कह दूँ कि नहीं आ सकते तो?
दिगम्बर नासवा:- सर! मैं यहाँ संस्थान में भर्ती के लिए आया हूँ, न कि प्रवचन सुनने के लिए। ओर वैसे भी वो तो मैने सिर्फ एटीकेट के नाते पूछा था ।
राज भाटिया:- ठीक है अब आप प्रस्थान कीजिए। समझिए कि आपको भर्ती कर लिया गया है। आपका नियुक्ति पत्र कुछ दिनों में आपके पास पहुँच जाएगा।
अगला उम्मीदवार आता है ।
राज भाटिया:- क्या नाम है आपका?
उम्मीदवार:-(आच्च्छी) जी, नीरज जाट
राज भाटिया:- क्या हुआ, आपकी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही?
नीरज जाट:- जी वैसे तो ठीक है, बस थोडा सा कोल्ड हुआ है। आच्च्च्छी....
राज भाटिया:- अरे कैसे नौजवान हो तुम्! देश का भविष्य तुम लोगों के कन्धों पर टिका है ओर कमाल है इस आग उगलती गर्मी में तुम कोल्ड से परेशान हो। भई तुम कुछ लेते क्यों नहीं? किसी अच्छे से डाक्टर को दिखाओ।
नीरज जाट:- जी क्या करूँ। डाक्टर के पास जाने का टाईम ही नहीं मिल पाता। इस साक्षात्कार के लिए भी बडी मुश्किल से समय निकाल पाया हूँ। बस यहाँ से फ्री होते ही सीधे लद्दाख के लिए गाडी पकडनी है।
राज भाटिया:- अच्छा चलो छोडिए। ये बताईये कि कितना पढ लिखे हैं ?
नीरज जाट:- जी मैने डबल एम.ए. किया है।
राज भाटिया:- डबल ऎंवें! शायद ये ऎंवें करने का ही नतीजा है कि तुम बीस की उम्र में तीस के दिखाई पड रहे हो । अरे मैं तुम्हारी जगह होता तो इस ऎंवें- ऊंवें करने की बजाय दंड पेलता, अपने शरीर की ओर ध्यान देता। और एक बात मैने सही सुना है कि तुम बहुत घुमक्कड किस्म के आदमी हो। महीने में 27 दिन तो तुम्हारे घूमने में निकल जाते हैं। अरे! जब हर समय घूमते ही रहोगे तो फिर काम किस समय करोगे। भाई! इस संस्थान को घुमक्कडों की नहीं काम के आदमियों की जरूरत है। जाओ कबड्डी खेलो, दण्ड पेलो, सैर करो। जब घुमक्कडी से पीछा छूट जाए और शरीर में कुछ जान पड जाए, तब आना.....
चलिए अगले उम्मीदवार को भेजिए............
समीरलाल "उडनतश्तरी वाले" :- जी नमस्ते!
राज भाटिया:-नमस्ते! बैठिए। आपको देखकर बहुत प्रसन्नता हुई । इस बात पर खास तौर से कि आप अपनी मातृ्भाषा का सम्मान करना जानते हैं। कितना शानदार व्यक्तित्व है आपका। यदि कद थोडा एक फुट ओर छोटा, रंग थोडा कम काला और वजन भी बीस तीस किलो कम होता तो इसमें ओर भी निखार आ जाता। खैर कोई बात नहीं.......आप ये बताईये कि आपका शुभ नाम क्या है?
समीरलाल:- जी, शुभ और अशुभ दोनों ही समीरलाल हैं।
राज भाटिया:- आपकी योग्यता क्या है?
समीरलाल:- जी, साहित्य में पी.एच.डी. की है।
राज भाटिया:- किस विषय पर ?
समीरलाल:- धुम्रपान का काव्य रचना में योगदान......
राज भाटिया:- बडा अछूता विषय चुना आपने। अच्छा ये बताईये कि आपके दिमाग में इस अनूठे विषय पर पी.एच.डी करने का विचार आया कैसे?
समीरलाल:- जी बात दरअसल ये है कि मुझे बचपन से ही सिगरेट पीने की लत पड गई थी।
राज भाटिया:- (हैरतवश बीच में ही टोकते हुए) क्या कहा बचपन से!
समीरलाल:- (थोडा सकुचाते हुए) ज्ज्जी! वो क्या है कि बचपन में गलत यार दोस्तों की संगत की वजह से ये नामुराद आदत पड गई। हमें किसी नें कह दिया कि नेवीकट पीने वालों की बात ही कुछ ओर होती है, बस तब से रोजाना हम कुछ यार दोस्त मिलकर विल्स नेवी कट सिगरेट की एक डिब्बी खरीद लेते, और स्कूल से भागकर किसी पार्क वगैरह में बैठकर धुऎं के छल्ले उडाया करते। आगे चलकर जब हम जवान हुए तो वो पुराने यार दोस्त तो सब के सब छुट गये लेकिन इस विल्स नें हमारा साथ न छोडा, उल्टा हमें कविता, शायरी वगैरह करने की एक ओर आदत लग गई। हम घंटों अकेले बैठे सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहते और दिमाग में कविता की कुछ पंक्तियाँ या कोई शेर गूँजने लगता तो उसे किसी कागज पर उतार लिया करते। धीरे धीरे ऎसा होने लगा कि खाते-पीते, नहाते धोते, उठते बैठते यानि कि चौबीसों घंटे हम जहाँ भी, जिस भी स्थिति में होते मन में कोई न कोई कविता जन्म ले लेती। अब मुश्किल ये की हर जगह तो हम अपने पास कोई कागज, डायरी वगैरह रख नहीं सकते थे कि इधर कविता जन्म ले ओर उधर झट से हम उसे कलमबद्ध कर लें। ये तो बडी भारी मुश्किल खडी हो गई। क्यों कि विचार तो हवा का झौंका है, ये तो जैसे ही दिमाग में आया ओर आप उसे उसी समय कलम से बाँध न पाए तो फिर वो दोबारा से कहाँ आपके हाथ में आने वाला है। हमें लगने लगा कि मानो हमारी काव्य रचनाओं की भ्रूण हत्या होती जा रही हो। लेकिन कहते है न कि जहाँ चाह, वहाँ राह। चाहे ऎन मौके पर हमारे पास कोई कागज वगैरह न होता हो लेकिन सिगरेट की डिब्बी तो हमेशा चौबीसों घंटे पास में होती ही थी। सो राह ये निकली कि जैसे ही कोई विचार, कोई कविता जन्म लेने लगे तो हम झट से उसे सिगरेट की डिब्बी के अन्दर के खाली कागज पर उतार लेते थे। धीरे धीरे कविता और सिगरेट के बीच न मालूम कैसा तारतम्य स्थापित हो गया कि हमें जब भी सिगरेट की तलब लगे। तो पैकेट में से सिगरेट निकालने भर की देर होती थी कि साथ के साथ तुरन्त एक नई कविता जन्म ले लेती थी। बस तभी से जैसे जैसे हमारी सिगरेट पीने की आदत बढती गई, ठीक वैसे वैसे ही हमारी काव्यधर्मिता विस्तार पाती गई। बचपन में बोया गया एक बीज समय के साथ पुष्पित,पल्लवित होकर आज एक विशाल वृ्क्ष बन चुका है। और इसका सम्पूर्ण श्रेय जाता है तो सिर्फ हमारी धुम्रपान की इस आदत को।
बस यही कारण रहा कि मैने इस अछूते विषय को पी.एच.डी. के लिए चुना।
राज भाटिया:- भई मान गये! आपने साबित कर दिया कि सचमुच विल्स पीने वालों की बात ही निराली है। अच्छा तो ये बताईये कि आपने ये थीसिस कितने पृ्ष्ठों का लिखा?
समीरलाल:- जी, दो सौ पोस्टों का।
राज भाटिया:- दो सौ पोस्टों का ?
समीरलाल:- ओह सारी! माफ कीजिएगा मेरे कहने का मतलब था दो सौ पृ्ष्ठों का ।
राज भाटिया:- अच्छा, तो आपने ये पी.एच.डी. किस विश्वविधालय से की है?
समीरलाल:- जी, झाऊमाऊ यूनिवर्सिटी से।
राज भाटिया:- ये तो कोई नई यूनिवर्सिटी लगती है।
समीरलाल:- जी हाँ, मै ही इसका सबसे पहला स्टूडेंड था।
राज भाटिया:- हो न हो आखिरी भी जरूर आप ही होंगें । चलिए जरा अपनी अपनी डिग्री तो दिखाईये।
समीरलाल:- जी, वो तो मिल ही नहीं पाई। इधर मैने थीसिस जमा करवाई और उधर न जाने क्यों यूनिवर्सिटी को ही ताला लग गया। दरअसल सरकार को मालूम पड गया था कि इस यूनिवर्सिटी में चोरी की थीसिस पर पी.एच.डी करवाने से लेकर नकली डिग्रियाँ बाँटने तक का धंधा किया जाता हैं, शायद इसीलिए.....।
बस इसके बाद तो भाटिया जी नें अपना सिर पकड लिया....बोले-----भाई साहब! आपसे हाथ जोडकर विनती है कि अब आप घर को प्रस्थान कीजिए। हम आपको सूचना भेज देंगें।
उसके बाद हमारे चयनकर्ता श्री भाटिया जी बाकी के उम्मीदवारों को किसी ओर दिन आने के लिए बोलकर उठ खडे हुए............
बेचारे बाकी के उम्मीदवार श्री ताऊ रामपुरिया, ललित शर्मा, यशवन्त मेहता, अन्तर सोहिल, महेन्द्र मिश्र, शशिभूषण तामडे और अजय झा जी, जो कि अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे थे, बडे ही अनमने ढंग से वहाँ से विदा हुए...इस उम्मीद के साथ कि जल्द ही उन्हे दोबारा से साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा......:-)
डिस्कलेमर:- (ये सिर्फ एक निर्मल हास्य है। यदि किसी सज्जन को यहाँ अपने नाम से असहमति हो तो सूचित कर दीजिए, उनका नाम उम्मीदवारों की सूचि से निकाल दिया जाएगा...लेकिन उसके बदले में उनके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के नाम का अनुमोदन किया जाना आवश्यक है :-))
सभी चयनित आवेदनकर्ता साक्षात्कार स्थल पर पहुँच चुके हैं। ओर उनसे साक्षात्कार कर रहे हैं, संस्थान द्वारा नियुक्त किए गये चयनकर्ता और इस ब्लागजगत के एक अति वरिष्ठ ब्लागर श्री राज भाटिया "जर्मनी वाले".........
सबसे पहले उम्मीदवार कविवर श्री दिगम्बर नासवा जी.......
दिगम्बर नासवा:- " मे आई कम इन, सर"
राज भाटिया:- लो ये आए अंग्रेज महाशय। भई हिन्दुस्तान में रह कर हिन्दी बोलते जुबान सूखती है क्या?
दिगम्बर नासवा:- सारी सर्! ओह! माफी चाहता हूँ। सर! मैं दुबई से आया हूँ ।
राज भाटिया:- भई माना आप दुबई से आए हैं, लेकिन हो तो हिन्दूस्तान ही न। तो फिर हिन्दी में नहीं पूछ सकते थे। जब आप कविता, कहानियाँ, शेरो शायरी हिन्दी में लिखते हो तो फिर हिन्दी को व्यवहार में क्यों नहीं लाते।
दरअसल दोष आपका नहीं, आजकल के सभी नौजवानों का यही हाल है । ये सब गलत खानपान का नतीजा है । दूध,दही,घी वगैरह तो कुछ खाऎंगें नहीं, बस चाय, पिज्जा बर्गर, सिगरेट गुटखे, शराब, अंडे खा खाकर दिमाग भ्रष्ट हो चुका है, देश की युवा पीढी का । बादाम की ठंडई की जगह सिगरेट पी रहे हैं, पूजा पाठ की बजाय मल्लिका शेरावत,बिपासा बसु जैसी देवियों की आराधना में जीवन बीत रहा है। इसी कारण से मानसिक शक्ति दुर्बल पडती जा रही है। आप एक तो कमरे के भीतर आकर पूछते हो कि "मै अन्दर आ सकता हूँ" ओर वो भी अंग्रेजी में । अफसोस्! नवयुवक ! बेहद अफसोस्! अब अगर मै कह दूँ कि नहीं आ सकते तो?
दिगम्बर नासवा:- सर! मैं यहाँ संस्थान में भर्ती के लिए आया हूँ, न कि प्रवचन सुनने के लिए। ओर वैसे भी वो तो मैने सिर्फ एटीकेट के नाते पूछा था ।
राज भाटिया:- ठीक है अब आप प्रस्थान कीजिए। समझिए कि आपको भर्ती कर लिया गया है। आपका नियुक्ति पत्र कुछ दिनों में आपके पास पहुँच जाएगा।
अगला उम्मीदवार आता है ।
राज भाटिया:- क्या नाम है आपका?
उम्मीदवार:-(आच्च्छी) जी, नीरज जाट
राज भाटिया:- क्या हुआ, आपकी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही?
नीरज जाट:- जी वैसे तो ठीक है, बस थोडा सा कोल्ड हुआ है। आच्च्च्छी....
राज भाटिया:- अरे कैसे नौजवान हो तुम्! देश का भविष्य तुम लोगों के कन्धों पर टिका है ओर कमाल है इस आग उगलती गर्मी में तुम कोल्ड से परेशान हो। भई तुम कुछ लेते क्यों नहीं? किसी अच्छे से डाक्टर को दिखाओ।
नीरज जाट:- जी क्या करूँ। डाक्टर के पास जाने का टाईम ही नहीं मिल पाता। इस साक्षात्कार के लिए भी बडी मुश्किल से समय निकाल पाया हूँ। बस यहाँ से फ्री होते ही सीधे लद्दाख के लिए गाडी पकडनी है।
राज भाटिया:- अच्छा चलो छोडिए। ये बताईये कि कितना पढ लिखे हैं ?
नीरज जाट:- जी मैने डबल एम.ए. किया है।
राज भाटिया:- डबल ऎंवें! शायद ये ऎंवें करने का ही नतीजा है कि तुम बीस की उम्र में तीस के दिखाई पड रहे हो । अरे मैं तुम्हारी जगह होता तो इस ऎंवें- ऊंवें करने की बजाय दंड पेलता, अपने शरीर की ओर ध्यान देता। और एक बात मैने सही सुना है कि तुम बहुत घुमक्कड किस्म के आदमी हो। महीने में 27 दिन तो तुम्हारे घूमने में निकल जाते हैं। अरे! जब हर समय घूमते ही रहोगे तो फिर काम किस समय करोगे। भाई! इस संस्थान को घुमक्कडों की नहीं काम के आदमियों की जरूरत है। जाओ कबड्डी खेलो, दण्ड पेलो, सैर करो। जब घुमक्कडी से पीछा छूट जाए और शरीर में कुछ जान पड जाए, तब आना.....
चलिए अगले उम्मीदवार को भेजिए............
समीरलाल "उडनतश्तरी वाले" :- जी नमस्ते!
राज भाटिया:-नमस्ते! बैठिए। आपको देखकर बहुत प्रसन्नता हुई । इस बात पर खास तौर से कि आप अपनी मातृ्भाषा का सम्मान करना जानते हैं। कितना शानदार व्यक्तित्व है आपका। यदि कद थोडा एक फुट ओर छोटा, रंग थोडा कम काला और वजन भी बीस तीस किलो कम होता तो इसमें ओर भी निखार आ जाता। खैर कोई बात नहीं.......आप ये बताईये कि आपका शुभ नाम क्या है?
समीरलाल:- जी, शुभ और अशुभ दोनों ही समीरलाल हैं।
राज भाटिया:- आपकी योग्यता क्या है?
समीरलाल:- जी, साहित्य में पी.एच.डी. की है।
राज भाटिया:- किस विषय पर ?
समीरलाल:- धुम्रपान का काव्य रचना में योगदान......
राज भाटिया:- बडा अछूता विषय चुना आपने। अच्छा ये बताईये कि आपके दिमाग में इस अनूठे विषय पर पी.एच.डी करने का विचार आया कैसे?
समीरलाल:- जी बात दरअसल ये है कि मुझे बचपन से ही सिगरेट पीने की लत पड गई थी।
राज भाटिया:- (हैरतवश बीच में ही टोकते हुए) क्या कहा बचपन से!
समीरलाल:- (थोडा सकुचाते हुए) ज्ज्जी! वो क्या है कि बचपन में गलत यार दोस्तों की संगत की वजह से ये नामुराद आदत पड गई। हमें किसी नें कह दिया कि नेवीकट पीने वालों की बात ही कुछ ओर होती है, बस तब से रोजाना हम कुछ यार दोस्त मिलकर विल्स नेवी कट सिगरेट की एक डिब्बी खरीद लेते, और स्कूल से भागकर किसी पार्क वगैरह में बैठकर धुऎं के छल्ले उडाया करते। आगे चलकर जब हम जवान हुए तो वो पुराने यार दोस्त तो सब के सब छुट गये लेकिन इस विल्स नें हमारा साथ न छोडा, उल्टा हमें कविता, शायरी वगैरह करने की एक ओर आदत लग गई। हम घंटों अकेले बैठे सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहते और दिमाग में कविता की कुछ पंक्तियाँ या कोई शेर गूँजने लगता तो उसे किसी कागज पर उतार लिया करते। धीरे धीरे ऎसा होने लगा कि खाते-पीते, नहाते धोते, उठते बैठते यानि कि चौबीसों घंटे हम जहाँ भी, जिस भी स्थिति में होते मन में कोई न कोई कविता जन्म ले लेती। अब मुश्किल ये की हर जगह तो हम अपने पास कोई कागज, डायरी वगैरह रख नहीं सकते थे कि इधर कविता जन्म ले ओर उधर झट से हम उसे कलमबद्ध कर लें। ये तो बडी भारी मुश्किल खडी हो गई। क्यों कि विचार तो हवा का झौंका है, ये तो जैसे ही दिमाग में आया ओर आप उसे उसी समय कलम से बाँध न पाए तो फिर वो दोबारा से कहाँ आपके हाथ में आने वाला है। हमें लगने लगा कि मानो हमारी काव्य रचनाओं की भ्रूण हत्या होती जा रही हो। लेकिन कहते है न कि जहाँ चाह, वहाँ राह। चाहे ऎन मौके पर हमारे पास कोई कागज वगैरह न होता हो लेकिन सिगरेट की डिब्बी तो हमेशा चौबीसों घंटे पास में होती ही थी। सो राह ये निकली कि जैसे ही कोई विचार, कोई कविता जन्म लेने लगे तो हम झट से उसे सिगरेट की डिब्बी के अन्दर के खाली कागज पर उतार लेते थे। धीरे धीरे कविता और सिगरेट के बीच न मालूम कैसा तारतम्य स्थापित हो गया कि हमें जब भी सिगरेट की तलब लगे। तो पैकेट में से सिगरेट निकालने भर की देर होती थी कि साथ के साथ तुरन्त एक नई कविता जन्म ले लेती थी। बस तभी से जैसे जैसे हमारी सिगरेट पीने की आदत बढती गई, ठीक वैसे वैसे ही हमारी काव्यधर्मिता विस्तार पाती गई। बचपन में बोया गया एक बीज समय के साथ पुष्पित,पल्लवित होकर आज एक विशाल वृ्क्ष बन चुका है। और इसका सम्पूर्ण श्रेय जाता है तो सिर्फ हमारी धुम्रपान की इस आदत को।
बस यही कारण रहा कि मैने इस अछूते विषय को पी.एच.डी. के लिए चुना।
राज भाटिया:- भई मान गये! आपने साबित कर दिया कि सचमुच विल्स पीने वालों की बात ही निराली है। अच्छा तो ये बताईये कि आपने ये थीसिस कितने पृ्ष्ठों का लिखा?
समीरलाल:- जी, दो सौ पोस्टों का।
राज भाटिया:- दो सौ पोस्टों का ?
समीरलाल:- ओह सारी! माफ कीजिएगा मेरे कहने का मतलब था दो सौ पृ्ष्ठों का ।
राज भाटिया:- अच्छा, तो आपने ये पी.एच.डी. किस विश्वविधालय से की है?
समीरलाल:- जी, झाऊमाऊ यूनिवर्सिटी से।
राज भाटिया:- ये तो कोई नई यूनिवर्सिटी लगती है।
समीरलाल:- जी हाँ, मै ही इसका सबसे पहला स्टूडेंड था।
राज भाटिया:- हो न हो आखिरी भी जरूर आप ही होंगें । चलिए जरा अपनी अपनी डिग्री तो दिखाईये।
समीरलाल:- जी, वो तो मिल ही नहीं पाई। इधर मैने थीसिस जमा करवाई और उधर न जाने क्यों यूनिवर्सिटी को ही ताला लग गया। दरअसल सरकार को मालूम पड गया था कि इस यूनिवर्सिटी में चोरी की थीसिस पर पी.एच.डी करवाने से लेकर नकली डिग्रियाँ बाँटने तक का धंधा किया जाता हैं, शायद इसीलिए.....।
बस इसके बाद तो भाटिया जी नें अपना सिर पकड लिया....बोले-----भाई साहब! आपसे हाथ जोडकर विनती है कि अब आप घर को प्रस्थान कीजिए। हम आपको सूचना भेज देंगें।
उसके बाद हमारे चयनकर्ता श्री भाटिया जी बाकी के उम्मीदवारों को किसी ओर दिन आने के लिए बोलकर उठ खडे हुए............
बेचारे बाकी के उम्मीदवार श्री ताऊ रामपुरिया, ललित शर्मा, यशवन्त मेहता, अन्तर सोहिल, महेन्द्र मिश्र, शशिभूषण तामडे और अजय झा जी, जो कि अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे थे, बडे ही अनमने ढंग से वहाँ से विदा हुए...इस उम्मीद के साथ कि जल्द ही उन्हे दोबारा से साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा......:-)
डिस्कलेमर:- (ये सिर्फ एक निर्मल हास्य है। यदि किसी सज्जन को यहाँ अपने नाम से असहमति हो तो सूचित कर दीजिए, उनका नाम उम्मीदवारों की सूचि से निकाल दिया जाएगा...लेकिन उसके बदले में उनके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के नाम का अनुमोदन किया जाना आवश्यक है :-))
मंगलवार, 30 मार्च 2010
चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान द्वारा कवि,गजलकार,लेखक,कार्टूनिस्ट के पदों हेतु आवेदनपत्र आमंत्रित
जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि हिन्दी ब्लागर्स को आ रही समस्यायों को देखते हुए पिछले दिनों हमने आप लोगों की सहायतार्थ "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक कुटीर उद्योग का शुभारंभ किया था। जिसके पीछे हमारा एकमात्र यही उदेश्य रहा है कि इसके जरिये हिन्दी चिट्ठाकारों को पोस्ट लेखन में लगने वाले शारीरिक एवं मानसिक श्रम तथा कीमती समय के अपव्यय से मुक्ति दिलाई जा सके। साथ ही प्रतिभा के धनी निम्न एवं मध्यमवर्गीय चिट्ठाकारों को कुछ अतिरिक्त कमाई का मौका देकर उन्हे आर्थिक संबल प्रदान किया जा सके।
इसी उदेश्य को ध्यान में रखते हुए संस्थान द्वारा कवियों,गजलकारों,लेखकों,कार्टूनिस्टों की ठेके/दिहाडी पर भर्ती हेतु आवेदनपत्र आमन्त्रित किए जा रहे हैं।
पद संख्या:- असीमित
अहर्ताऎं:-
1 जो.कहानी/कविता/गजल/हास्य-व्यंग्य/सामयिक/असामयिक लेखन इत्यादि में से कम से कम किसी एक विद्या का विशेष ज्ञान रखता हो।
2.अच्छी सहनशीलता,आचरण तथा व्यक्तित्व हो तथा अपने से विरिष्ठ ब्लागरों के साथ ब्लागजगत के अन्दर एवं बाहर प्रभावी परस्पर क्रिया करने के योग्य हो।
3. प्रसन्नचित स्वभाव तथा अंतरवैयक्तिक कौशल
4.किसी भी परिवर्तनशील स्थिति के प्रति अनुकूलन के योग्य हो तथा ब्लागजगत के इस अति असहिष्णु वातावरण में नारी-पुरूष, हिन्दू-मुस्लिम के विवाद में भाग न लेकर के अन्य सहकर्मी ब्लागरों के साथ बेहतर ढंग से काम करने के योग्य हो।
5.केवल अपने निजि कम्पयूटर/लैपटोप पर लेखन कार्य करने के योग्य हो
आवश्यक विवरण:-
1.ब्लागिंग के दौरान आपके अन्य ब्लागरों संग हुए मुद्दा आधारित अथवा मुद्दाविहीन विवाद,झगडों,गाली-गलौच,शिकायत इत्यादि का सम्पूर्ण विवरण देना आवश्यक है।
2.कोई लंबित/पिछला मुकद्दमा(ब्लागिंग के दौरान)। यदि हाँ तो कृ्प्या विवरण दें
3.रचनाकार की कम से कम एक या अधिक रचना किसी समाचार पत्र, पत्रिका में अवश्य प्रकाशित हो चुकी हों।
अनुभव:- प्रार्थी कम से कम एक वर्ष का ब्लागिंग का अनुभव रखता हो।
शैक्षणिक योग्यता:- किसी भी प्रकार की कोई शैक्षणिक योग्यता का होना अनिवार्य नहीं है। पाँचवीं फेल से लेकर डाक्टरेट तक की उपाधी प्राप्त कोई भी व्यक्ति आवेदन कर सकता है।
आयु:- न्यूनतम 18 वर्ष से अधिकतम 80 वर्ष की आयु तक।
वेतमान/दिहाडी/पारिश्रमिक:- बाद में तय की जाएगी ।
नियम एवं शर्तें:-
1.चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान को कोई भी आवेदनपत्र स्वीकार/अस्वीकार करने और इस समूची प्रक्रिया को रद्द करने अथवा रचनाकार के इस संस्थान से जुडने के पश्चात कभी भी उसे निकाल बाहर करने का अधिकार होगा। जिसके लिए संस्थान का संबंधित रचनाकार के प्रति कोई दायित्व नहीं होगा।
2.संस्थान (हमारे) द्वारा आवेदनपत्रों के तुलनात्मक अध्ययन या भर्ती करने के निर्णय को प्रभावित करने के लिए किसी रचनाकार द्वारा कोई प्रयास करने(रिश्वत देने) पर उसके आवेदनपत्र को विशेष वरीयता प्रदान की जाएगी।
3.किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में संस्थान का निर्णय अन्तिम एवं मान्य होगा। इस विषय में कैसी भी कोई दलील स्वीकार नहीं की जाएगी।
आवेदन:- ब्लागिंग में आकर फालतू में टाईमखोटी करने के बजाय कुछ कमाई करने एवं अपनी रचनाधर्मिता का सदुपयोग कर हिन्दी ब्लागजगत को आलोकित करने के चाहवान उम्मीदवार कल शाम 5 बजे तक इस पते(chithaudhyog_sewa@yahoo.com) पर अपना आवेदनपत्र भेज सकते हैं। तत्पश्चात चयनित उम्मीदवारों को परसों दिनांक 1 अप्रैल 2010 को साक्षात्कार हेतु आमंत्रित किया जाएगा।
इसी उदेश्य को ध्यान में रखते हुए संस्थान द्वारा कवियों,गजलकारों,लेखकों,कार्टूनिस्टों की ठेके/दिहाडी पर भर्ती हेतु आवेदनपत्र आमन्त्रित किए जा रहे हैं।
पद संख्या:- असीमित
अहर्ताऎं:-
1 जो.कहानी/कविता/गजल/हास्य-व्यंग्य/सामयिक/असामयिक लेखन इत्यादि में से कम से कम किसी एक विद्या का विशेष ज्ञान रखता हो।
2.अच्छी सहनशीलता,आचरण तथा व्यक्तित्व हो तथा अपने से विरिष्ठ ब्लागरों के साथ ब्लागजगत के अन्दर एवं बाहर प्रभावी परस्पर क्रिया करने के योग्य हो।
3. प्रसन्नचित स्वभाव तथा अंतरवैयक्तिक कौशल
4.किसी भी परिवर्तनशील स्थिति के प्रति अनुकूलन के योग्य हो तथा ब्लागजगत के इस अति असहिष्णु वातावरण में नारी-पुरूष, हिन्दू-मुस्लिम के विवाद में भाग न लेकर के अन्य सहकर्मी ब्लागरों के साथ बेहतर ढंग से काम करने के योग्य हो।
5.केवल अपने निजि कम्पयूटर/लैपटोप पर लेखन कार्य करने के योग्य हो
आवश्यक विवरण:-
1.ब्लागिंग के दौरान आपके अन्य ब्लागरों संग हुए मुद्दा आधारित अथवा मुद्दाविहीन विवाद,झगडों,गाली-गलौच,शिकायत इत्यादि का सम्पूर्ण विवरण देना आवश्यक है।
2.कोई लंबित/पिछला मुकद्दमा(ब्लागिंग के दौरान)। यदि हाँ तो कृ्प्या विवरण दें
3.रचनाकार की कम से कम एक या अधिक रचना किसी समाचार पत्र, पत्रिका में अवश्य प्रकाशित हो चुकी हों।
अनुभव:- प्रार्थी कम से कम एक वर्ष का ब्लागिंग का अनुभव रखता हो।
शैक्षणिक योग्यता:- किसी भी प्रकार की कोई शैक्षणिक योग्यता का होना अनिवार्य नहीं है। पाँचवीं फेल से लेकर डाक्टरेट तक की उपाधी प्राप्त कोई भी व्यक्ति आवेदन कर सकता है।
आयु:- न्यूनतम 18 वर्ष से अधिकतम 80 वर्ष की आयु तक।
वेतमान/दिहाडी/पारिश्रमिक:- बाद में तय की जाएगी ।
नियम एवं शर्तें:-
1.चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान को कोई भी आवेदनपत्र स्वीकार/अस्वीकार करने और इस समूची प्रक्रिया को रद्द करने अथवा रचनाकार के इस संस्थान से जुडने के पश्चात कभी भी उसे निकाल बाहर करने का अधिकार होगा। जिसके लिए संस्थान का संबंधित रचनाकार के प्रति कोई दायित्व नहीं होगा।
2.संस्थान (हमारे) द्वारा आवेदनपत्रों के तुलनात्मक अध्ययन या भर्ती करने के निर्णय को प्रभावित करने के लिए किसी रचनाकार द्वारा कोई प्रयास करने(रिश्वत देने) पर उसके आवेदनपत्र को विशेष वरीयता प्रदान की जाएगी।
3.किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में संस्थान का निर्णय अन्तिम एवं मान्य होगा। इस विषय में कैसी भी कोई दलील स्वीकार नहीं की जाएगी।
आवेदन:- ब्लागिंग में आकर फालतू में टाईमखोटी करने के बजाय कुछ कमाई करने एवं अपनी रचनाधर्मिता का सदुपयोग कर हिन्दी ब्लागजगत को आलोकित करने के चाहवान उम्मीदवार कल शाम 5 बजे तक इस पते(chithaudhyog_sewa@yahoo.com) पर अपना आवेदनपत्र भेज सकते हैं। तत्पश्चात चयनित उम्मीदवारों को परसों दिनांक 1 अप्रैल 2010 को साक्षात्कार हेतु आमंत्रित किया जाएगा।
शनिवार, 27 मार्च 2010
मेर धर्म महान!!!
चींटी का धर्म
पंक्तिबद्ध हो चलना.........
हाथी का धर्म
समूह में विचरना..........
वानर का धर्म
डाली डाली उछलना..........
मानव का धर्म
सर्वधर्म सद्भाव और विश्व बन्धुत्व........
अरे! नहीं नहीं, रूकिये जरा
ये सब तो पिछले जमाने की बातें हैं
आज मानव का धर्म
स्वधर्म में आस्था
और परधर्म पर शंका...........
पंक्तिबद्ध हो चलना.........
हाथी का धर्म
समूह में विचरना..........
वानर का धर्म
डाली डाली उछलना..........
मानव का धर्म
सर्वधर्म सद्भाव और विश्व बन्धुत्व........
अरे! नहीं नहीं, रूकिये जरा
ये सब तो पिछले जमाने की बातें हैं
आज मानव का धर्म
स्वधर्म में आस्था
और परधर्म पर शंका...........
मेरा धर्म महान!!!
गुरुवार, 18 मार्च 2010
बडे बडे फन्ने खाँ ब्लागर यहाँ एक कौडी में तीन के भाव बिक रहे हैं-- (आह्वान)
प्रभो! आओ, आओ.....हम इस समय तुम्हे बडे दीन होकर पुकार रहे हैं। तुम तो दीनों की बहुत सुनते थे। सुनते क्या थे, तुम तो दीनों के लिए थे ही। क्या हमारी न सुनोगे?! देखो जरा इस ब्लागजगत को एक नजर देखो तो सही। पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष नें यहाँ का सत्यानाश कर के रख दिया है। बडे बडे फन्ने खाँ ब्लागर एक कौडी में तीन के भाव बिक रहे हैं। सबकी बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो चुकी है। किसी में सहनशीलता, धर्म, विवेक, आपसी प्रेम, बन्धुत्व जैसा कोई गुण नहीं दिखाई पडता। लम्पटगिरी दिनों दिन बढती चली जा रही है। छोटे बडों को उपदेश देने में निमग्न हैं और बडे दिन रात छोटों पर गुर्र गुर्र करने में लगे हुए हैं। तमाशबीन अनामी/बेनामी का मुखौटा पहने एक दूसरे को आपस में लडाने को ही अपना कर्तव्य मानकर यहाँ जमे हुए हैं। कुछ जलील इन्सान धर्म की ओट लिए अधर्म का नंगा नाच करने में जुटे हैं। बिना अर्थ जाने पुस्तकों में से पढे हुए को टीप टीप कर विद्वान होने का भ्रम फैलाने में बडे जोरों शोरों से लगे हुए हैं। धर्म के वास्तविक मूल्यों की परख कहीं लुप्त हो चुकी है, आस्था और निष्ठाओं पर कुठाराघात किया जा रहा है। एक दूसरे का जम के अनादर किया जा रहा है और कोई ससुरा सुनने को तैयार नहीं।
प्रभो! आप ये समझ लीजिए कि एक दम से हाहाकार सी मची हुई है। ब्लाग देवीयों की दशा सोचनीय सी हो रखी है। बुजुर्ग ब्लागरों की मन की पीडा असह्य है। ब्लागिंग धर्म की कोई मर्यादा नहीं। समाज की तरह ही यहाँ भी जातियाँ, उपजातियाँ उत्पन हो गई हैं। ऊंच-नीच का भाव यहाँ भी शुरू हो चुका है। अच्छे एवं गुणवत्तापूर्ण लेखन का स्थान सक्रियता क्रमाँक की दौड नें ले लिया है। लोग सुबह पोस्ट लिखते हैं और शाम तक छ: बार देख चुके होते हैं कि सक्रियता क्रमाँक बडा कि नहीं?। लोग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस चाटूकार धर्म निभाने में लगे हुए हैं। गुरू जैसा परम पवित्र शब्द भी यहाँ आकर अपनी गरिमा खो चुका है। यहाँ गुरू माने===ऊपर चढने की सीढी। बस ये सीढी तभी तक है जब तक कि ऊपर नहीं चढ जाते। एक बार ऊपर चढे नहीं की उसके बाद तो इस सीढी का एक एक डंडा बिखरा मिलता हैं। तब चेले खुद किसी ओर के गुरू बन चुके होते हैं और गुरू उनके द्वारे हाथ बाँधे अपनी पोस्ट पर टिप्पणी की भीख माँगता दिखाई पडता है। लोगबाग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस जय गुरूदेव्! जय गुरूदेव! करते इस ब्लाग भवसागर को पार करने में जुटे हैं।
बडे बडे दंगेच्छु,बकवादी,जेहादी,माओवादी,आतंकवादी, और भी जितने प्रकार के वादी है, यहाँ अपने अपने डेरे जमाने लगे हैं। प्रेम और सहानुभूति का स्थान घृ्णा नें ले लिया है। हिन्दू और अहिन्दूओं, देशप्रेमियों और पडोसी प्रेमियों के झगडे, अनर्गल प्रलाप, गाली गलौच साधारण और सुबह शाम की घटना हो चुकी हैं। धर्म के नाम पर समझो अधर्म हो रहा है। क्या इस समय और ऎसे समय में भी तुम यहाँ अपने पधारने की जरूरत नहीं समझते ?
दीनानाथ! आओ, आओ । अब विलम्ब न करो। ब्लागजगत की ऎसी दशा है और तुम देखते तक नहीं, सुनते तक नहीं। अब नहीं आओगे तो कब आओगे। कहीं ऎसा तो नहीं कि कलयुग में तुम भी दीनों की बजाय इन माँ के दीनों का पक्ष लेने लगे हो।(माँ का दीना पंजाबी भाषा में एक बहुत ही आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला शब्द है, किन्तु इसका अर्थ कोई परम विद्वान ही बता सकता है, हमें तो पता नहीं :-)
(बहुत दिनों से हम सोच रहे थे कि पता नहीं लोगों को अपनी पोस्ट पर नापसंद के चटके कैसे मिल जाते हैं,हमें तो आजतक किसी नें नहीं दिया। ईश्वर नें चाहा तो शायद आज हमारी ये इच्छा पूरी हो ही जाये :-)







प्रभो! आप ये समझ लीजिए कि एक दम से हाहाकार सी मची हुई है। ब्लाग देवीयों की दशा सोचनीय सी हो रखी है। बुजुर्ग ब्लागरों की मन की पीडा असह्य है। ब्लागिंग धर्म की कोई मर्यादा नहीं। समाज की तरह ही यहाँ भी जातियाँ, उपजातियाँ उत्पन हो गई हैं। ऊंच-नीच का भाव यहाँ भी शुरू हो चुका है। अच्छे एवं गुणवत्तापूर्ण लेखन का स्थान सक्रियता क्रमाँक की दौड नें ले लिया है। लोग सुबह पोस्ट लिखते हैं और शाम तक छ: बार देख चुके होते हैं कि सक्रियता क्रमाँक बडा कि नहीं?। लोग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस चाटूकार धर्म निभाने में लगे हुए हैं। गुरू जैसा परम पवित्र शब्द भी यहाँ आकर अपनी गरिमा खो चुका है। यहाँ गुरू माने===ऊपर चढने की सीढी। बस ये सीढी तभी तक है जब तक कि ऊपर नहीं चढ जाते। एक बार ऊपर चढे नहीं की उसके बाद तो इस सीढी का एक एक डंडा बिखरा मिलता हैं। तब चेले खुद किसी ओर के गुरू बन चुके होते हैं और गुरू उनके द्वारे हाथ बाँधे अपनी पोस्ट पर टिप्पणी की भीख माँगता दिखाई पडता है। लोगबाग ब्लागिंग धर्म को भूलकर बस जय गुरूदेव्! जय गुरूदेव! करते इस ब्लाग भवसागर को पार करने में जुटे हैं।
बडे बडे दंगेच्छु,बकवादी,जेहादी,माओवादी,आतंकवादी, और भी जितने प्रकार के वादी है, यहाँ अपने अपने डेरे जमाने लगे हैं। प्रेम और सहानुभूति का स्थान घृ्णा नें ले लिया है। हिन्दू और अहिन्दूओं, देशप्रेमियों और पडोसी प्रेमियों के झगडे, अनर्गल प्रलाप, गाली गलौच साधारण और सुबह शाम की घटना हो चुकी हैं। धर्म के नाम पर समझो अधर्म हो रहा है। क्या इस समय और ऎसे समय में भी तुम यहाँ अपने पधारने की जरूरत नहीं समझते ?
दीनानाथ! आओ, आओ । अब विलम्ब न करो। ब्लागजगत की ऎसी दशा है और तुम देखते तक नहीं, सुनते तक नहीं। अब नहीं आओगे तो कब आओगे। कहीं ऎसा तो नहीं कि कलयुग में तुम भी दीनों की बजाय इन माँ के दीनों का पक्ष लेने लगे हो।(माँ का दीना पंजाबी भाषा में एक बहुत ही आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला शब्द है, किन्तु इसका अर्थ कोई परम विद्वान ही बता सकता है, हमें तो पता नहीं :-)
हे महादेव औघडदानी, भोले बाबा ऎसा वर दो
सोने का सर्प चढाऊंगा, इनकी बुद्धि निर्मल कर दो ।।(स्व-रचित नहीं)
(बहुत दिनों से हम सोच रहे थे कि पता नहीं लोगों को अपनी पोस्ट पर नापसंद के चटके कैसे मिल जाते हैं,हमें तो आजतक किसी नें नहीं दिया। ईश्वर नें चाहा तो शायद आज हमारी ये इच्छा पूरी हो ही जाये :-)
शनिवार, 13 मार्च 2010
कडवे का शहद भी कडवा................(बस यूँ ही)
बचपन में एक कहानी पढी थी कि फारस देश में एक स्त्री रहा करती थी जो कि शहद बेचने का व्यवसाय किया करती थी । उस स्त्री में एक खूबी यह थी कि उसका बातचीत करने का ढंग बहुत ही आकर्षक था । जिस कारण से उसकी दुकान पर सारा दिन ग्राहकों की भीड लगी रहती थी । ग्राहकों का उस पर इतना विश्वास था कि यदि वो जहर भी बेचती तो शायद लोग उसे भी शहद समझकर खरीद लेते ।
अब जैसा कि जमाने का चलन है कि यदि किसी की दुकानदारी अच्छे से चल रही हो तो उसकी देखादेखी बीसियों लोग उसी के बगल में दुकान खोलकर बैठ जाते है । ऎसे ही एक दुष्ट स्वभाव के आदमी नें देखा कि ये औरत तो शहद बेच बेच कर बहुत भारी कमाई कर रही है तो क्यों न मैं भी ये धंधा शुरू कर दूं ।
अब उस औरत की देखादेखी वो दुष्ट आदमी भी उसके बगल में शहद की दुकान खोलकर बैठ गया । अब दुकान तो उसने खोल ली लेकिन शहद के सजे सजाए बर्तनों के पीछे उसने अपनी आकृ्ति कठोर ही बनाए रखी । दुकानदारी तो निम्रता की है, तो भला ऎसे कठोर मुख आदमी के पास ग्राहक भी कहां फटकता । अगर भूले भटके कोई आ भी जाता तो उसके माथे पर चढी त्यौरियाँ देखकर वहाँ से खिसकने में ही भलाई समझता । एक मक्खी भी उसके शहद के पास फटकने का साहस न कर पाती थी । सुबह से शाम हो जाती लेकिन उसके हाथ खाली के खाली ही रहते ।
कईं दिनों तक ऎसा ही चलता रहा तो धीरे धीरे उसकी खिन्नता बढने लगी ओर फिर तो वो क्रोध के मारे राह चलते लोगों को ही गालियाँ बकने लगा । छोटे छोटे बच्चे भी अब तो उसे चिढाने के लिए उसकी ओर भृ्कुटियाँ तान कर देखते ओर कहते कि "कडवे का शहद भी कडवा" । उसका कुछ ओर तो जोर चल नहीं पाता बस गुस्से में भरकर उन्हे मारने को दौड पडता । धीरे धीरे हर कोई उसे यही कह कर चिढाने लगा कि " कडवे का शहद भी कडवा" ।
उस मूर्ख इन्सान को इतनी सी बात समझ में नहीं आई कि संसार में हमारा कार्य सिर्फ बेचना और खरीदना ही नहीं है । हमें यहाँ एक दूसरे के मित्र बनकर रहना है ।
अब जैसा कि जमाने का चलन है कि यदि किसी की दुकानदारी अच्छे से चल रही हो तो उसकी देखादेखी बीसियों लोग उसी के बगल में दुकान खोलकर बैठ जाते है । ऎसे ही एक दुष्ट स्वभाव के आदमी नें देखा कि ये औरत तो शहद बेच बेच कर बहुत भारी कमाई कर रही है तो क्यों न मैं भी ये धंधा शुरू कर दूं ।
अब उस औरत की देखादेखी वो दुष्ट आदमी भी उसके बगल में शहद की दुकान खोलकर बैठ गया । अब दुकान तो उसने खोल ली लेकिन शहद के सजे सजाए बर्तनों के पीछे उसने अपनी आकृ्ति कठोर ही बनाए रखी । दुकानदारी तो निम्रता की है, तो भला ऎसे कठोर मुख आदमी के पास ग्राहक भी कहां फटकता । अगर भूले भटके कोई आ भी जाता तो उसके माथे पर चढी त्यौरियाँ देखकर वहाँ से खिसकने में ही भलाई समझता । एक मक्खी भी उसके शहद के पास फटकने का साहस न कर पाती थी । सुबह से शाम हो जाती लेकिन उसके हाथ खाली के खाली ही रहते ।
कईं दिनों तक ऎसा ही चलता रहा तो धीरे धीरे उसकी खिन्नता बढने लगी ओर फिर तो वो क्रोध के मारे राह चलते लोगों को ही गालियाँ बकने लगा । छोटे छोटे बच्चे भी अब तो उसे चिढाने के लिए उसकी ओर भृ्कुटियाँ तान कर देखते ओर कहते कि "कडवे का शहद भी कडवा" । उसका कुछ ओर तो जोर चल नहीं पाता बस गुस्से में भरकर उन्हे मारने को दौड पडता । धीरे धीरे हर कोई उसे यही कह कर चिढाने लगा कि " कडवे का शहद भी कडवा" ।
उस मूर्ख इन्सान को इतनी सी बात समझ में नहीं आई कि संसार में हमारा कार्य सिर्फ बेचना और खरीदना ही नहीं है । हमें यहाँ एक दूसरे के मित्र बनकर रहना है ।
गुरुवार, 11 मार्च 2010
इन्साफ की दिशा में अन्याय हो रहा है.............
इन्साफ की दिशा में अन्याय हो रहा है
आरम्भ किस विद्या का अध्याय हो रहा है।।
सोना बता रहे हैं शब्दों को सब हमारे
मिट्टी मगर हमारा अभिप्राय हो रहा है।।
आदेश बन रहा है अपशब्द भी किसी का
औ राय रख के कोई बे-राय हो रहा है ।।
शोषण अवैध घोषित है, जिस जगह वहीं पर
शोषित जनों का अपना समुदाय हो रहा है।।
इन्साफ की दिशा में अन्याय हो रहा है
आरम्भ किस विद्या का अध्याय हो रहा है।।
ना मालूम कब,कहाँ ये गजल/कविता पढी थी या किसी से सुनी थी। लेकिन मस्तिष्क पटल पर उसकी कुछ पंक्तियाँ अब तक अंकित हैं। आज पता नहीं क्यों, किसी की पोस्ट को पढते हुए ये पंक्तियाँ अनायास ही दिमाग में गूंजने लगी तो मन किया कि इसे ब्लाग पर पोस्ट किया जाए। अगर किसी को इस कविता/गजल के रचनाकार के बारे में पता हो तो अवश्य बताएं...............
सोमवार, 8 मार्च 2010
महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण..अब पुरूषों का रूख इनके मार्ग में बाधा पहुँचाने का नहीं वरन् उदारतापूर्ण सहयोग देने का ही होगा
महिला जागरण! महिला सशक्तिकरण----जिसके लिए चिरकाल से छिटपुट प्रयत्न होते रहे हैं। न्यायशीलता सदा से यह प्रतिपादन करती रही है कि "नर और नारी एक समान" का तथ्य ही सनातन है। जीवन एक गाडी है तो उस गाडी के दोनों पहियों को एक समान महत्व मिलना ही चाहिए। स्त्री एवं पुरूष दोनों को समान श्रेय सम्मान, महत्व और अधिकार मिलना नीतिगत ही नहीं बल्कि आवश्यक भी है। लेकिन इस प्रतिपादन के बावजूद बलिष्ठता के अहंकार नें पुरूष द्वारा नारी को पालतू पशु जैसी मान्यता दिलाई और उसके शोषण में किसी प्रकार की कोई कमी न रखी। सुधारकों के प्रयत्न भी जहाँ तहाँ एक सीमा तक ही सफल होते रहे, अनथक प्रयासों के बावजूद भी अभी तक समग्र परिवर्तन का माहौल बन ही नहीं पाया। किन्तु आज यह अनोखा समय आ गया है, जब सहस्त्राब्धियों से प्रचलित कुरीतियों की जंजीरें मानो कच्चे धागे की तरह टूट कर गिरने ही वाली हैं------क्यों कि आज संसंद में महिला आरक्षण बिल पास होते ही उसे शासकीय व्यवस्था में प्रतिनिधित्व मिलने जा रहा है। आने वाले दिनों में सारी दुनिया देखेगी जब प्रत्येक क्षेत्र में इनका अनुपात और गौरव भारतवर्ष के कोने कोने में निरन्तर बढता जाएगा।
आने वाले दिनों में देखिएगा कि जब ये महिला सशक्तिकरण बिल्कुल अनोखे रूप में अपने ही ढंग का होगा। इससे एक ओर तो उनमें आत्म विश्वास जागृ्त होगा, वहीं प्रगति पथ पर चलने का मनोरथ अदम्य रूप से उभरेगा। इस बार पुरूषों का रूख उनके मार्ग में बाधा पहुँचाने का नहीं वरन् उदारतापूर्ण सहयोग देने का ही होगा। क्यों कि...........................???
बस अब हम इस से अधिक नहीं लिख सकते। कारण कि हमारे कम्पयूटर के "मूषकदेव" ने काम करना बन्द कर दिया है। अब नये मूषकदेव के आने तक क्या प्रतीक्षा करें, सो इस "क्यों" का जवाब देने की जिम्मेदारी आप लोगों पर छोडे जा रहे हैं......चाहे तो आप इसे एक पहेली मान लीजिए :-)
हैप्पी महिला दिवस!!!
आने वाले दिनों में देखिएगा कि जब ये महिला सशक्तिकरण बिल्कुल अनोखे रूप में अपने ही ढंग का होगा। इससे एक ओर तो उनमें आत्म विश्वास जागृ्त होगा, वहीं प्रगति पथ पर चलने का मनोरथ अदम्य रूप से उभरेगा। इस बार पुरूषों का रूख उनके मार्ग में बाधा पहुँचाने का नहीं वरन् उदारतापूर्ण सहयोग देने का ही होगा। क्यों कि...........................???
बस अब हम इस से अधिक नहीं लिख सकते। कारण कि हमारे कम्पयूटर के "मूषकदेव" ने काम करना बन्द कर दिया है। अब नये मूषकदेव के आने तक क्या प्रतीक्षा करें, सो इस "क्यों" का जवाब देने की जिम्मेदारी आप लोगों पर छोडे जा रहे हैं......चाहे तो आप इसे एक पहेली मान लीजिए :-)
हैप्पी महिला दिवस!!!
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
पता नहीं मन की ये दुविधा कब पीछा छोडेगी
मालूम नहीं क्यों, कभी कभी तो ऎसा लगने लगता है कि ये ब्लागिंग,फ्लागिंग कुछ नहीं--सब फालतू की टन्टेबाजी है--ऎसा लगता है कि अपनी कोई खुशी, कोई दुख, कोई जानकारी, मन में आया जरा सा कोई विचार अपने तक ही सीमित न रख पाना और उसे झट से एक पोस्ट के जरिये ठेल देना बिल्कुल एक भोले बालकपन का सा काम है। जब कभी अपनी किसी पोस्ट को इस दृ्ष्टि से देखता हूँ तो मानो ब्लागिंग के सारे उत्साह पर ठंडा पानी पड जाता है।
फिर कभी दूसरी विचारधारा बल पकडती है तो उस समय लगता है कि जैसे अपने मन के विचारों,भावों को प्रकट कर पाना हरेक के बस की बात नहीं होती; और आसान भी नहीं होता। इसलिए जो भी कोई इन्सान अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट कर सके, कि उससे चन्द दूसरे अन्य लोग भी अपने को जुडा समझें, तो उसे औरों से विलक्षण और कुछ समर्थ ही समझा जाना चाहिए। इस विचारधारा के वशीभूत होकर बस खुद में एक तीसमारखाँ सी अनुभूति होने लगती है ओर हम झट से कोई नई पोस्ट लिखने बैठ जाते हैं :)
लेकिन एक ऎसी समस्या है, जिसने कि पिछले कईं दिनों से हमारा जीना हराम कर रखा है। वो यूँ कि कभी कभी ऎसा होता है कि जिस पोस्ट को हमने बडे चाव से लिखा। जब पोस्ट की तो खुद के साथ साथ चार लोगों को भी पसंद आई लेकिन कुछ दिन बाद जब दोबारा से अपनी उस पोस्ट को पढता हूँ तो ऎसा प्रतीत होने लगता है कि मानो इसे लिखकर मैने केवल समय का अपव्यय ही किया है। मन में ऎसे विचार आने लगते हैं कि "क्या यार्! ये सब भी कोई लिखने की चीज है। लिखना ही था तो कुछ तो ढंग का लिखना चाहिए था"।
मेरे मन की यह दुविधा पता नहीं मेरा इस ब्लागिंग में पीछा कब छोडेगी। ऎसा लगने लगा है कि जैसे मेरे अन्दर कोई दो धुर विरोधी व्यक्तित्व विद्यमान हैं। जो चीज एक को पसन्द है, वो दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती। इसी कशमकश के चलते आज तक हमारे इस ब्लाग का सक्रियता क्रमाँक 250-300 की संख्या पर ही अटका हुआ है----वर्ना तो समीर लाल जी और ताऊ जी, दोनों को न जाने कब का पछाड चुके होते(सिर्फ चिट्ठा सक्रियता क्रमांक के मामले में) हा हा हा...। बिल्कुल सीरियसली कह रहे हैं---मजाक मत समझिएगा :-)
हाँ तो हम कह रहे थे कि हमारे मन की ये दुविधा ही है, जो कि हमें चिट्ठाकारी के विजयरथ पर आरूढ नहीं होने दे रही । हमारी हालत तो रात के चौकीदार सी हो चुकी है---जो रात भर निरन्तर चलने के बाद भी कही नहीं पहुँच पाता, उसकी यात्रा सिर्फ उस मोहल्ले तक ही सीमित रहती है।
राम जाने!! पता नहीं ये दुविधा कब हमारा पीछा छोडेगी, या पता नहीं छोडेगी भी कि नहीं----डरते हैं, कहीं कोई साईकैट्रिक वाला मामला न हो जाए :-)
फिर कभी दूसरी विचारधारा बल पकडती है तो उस समय लगता है कि जैसे अपने मन के विचारों,भावों को प्रकट कर पाना हरेक के बस की बात नहीं होती; और आसान भी नहीं होता। इसलिए जो भी कोई इन्सान अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट कर सके, कि उससे चन्द दूसरे अन्य लोग भी अपने को जुडा समझें, तो उसे औरों से विलक्षण और कुछ समर्थ ही समझा जाना चाहिए। इस विचारधारा के वशीभूत होकर बस खुद में एक तीसमारखाँ सी अनुभूति होने लगती है ओर हम झट से कोई नई पोस्ट लिखने बैठ जाते हैं :)
लेकिन एक ऎसी समस्या है, जिसने कि पिछले कईं दिनों से हमारा जीना हराम कर रखा है। वो यूँ कि कभी कभी ऎसा होता है कि जिस पोस्ट को हमने बडे चाव से लिखा। जब पोस्ट की तो खुद के साथ साथ चार लोगों को भी पसंद आई लेकिन कुछ दिन बाद जब दोबारा से अपनी उस पोस्ट को पढता हूँ तो ऎसा प्रतीत होने लगता है कि मानो इसे लिखकर मैने केवल समय का अपव्यय ही किया है। मन में ऎसे विचार आने लगते हैं कि "क्या यार्! ये सब भी कोई लिखने की चीज है। लिखना ही था तो कुछ तो ढंग का लिखना चाहिए था"।
मेरे मन की यह दुविधा पता नहीं मेरा इस ब्लागिंग में पीछा कब छोडेगी। ऎसा लगने लगा है कि जैसे मेरे अन्दर कोई दो धुर विरोधी व्यक्तित्व विद्यमान हैं। जो चीज एक को पसन्द है, वो दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती। इसी कशमकश के चलते आज तक हमारे इस ब्लाग का सक्रियता क्रमाँक 250-300 की संख्या पर ही अटका हुआ है----वर्ना तो समीर लाल जी और ताऊ जी, दोनों को न जाने कब का पछाड चुके होते(सिर्फ चिट्ठा सक्रियता क्रमांक के मामले में) हा हा हा...। बिल्कुल सीरियसली कह रहे हैं---मजाक मत समझिएगा :-)
हाँ तो हम कह रहे थे कि हमारे मन की ये दुविधा ही है, जो कि हमें चिट्ठाकारी के विजयरथ पर आरूढ नहीं होने दे रही । हमारी हालत तो रात के चौकीदार सी हो चुकी है---जो रात भर निरन्तर चलने के बाद भी कही नहीं पहुँच पाता, उसकी यात्रा सिर्फ उस मोहल्ले तक ही सीमित रहती है।
राम जाने!! पता नहीं ये दुविधा कब हमारा पीछा छोडेगी, या पता नहीं छोडेगी भी कि नहीं----डरते हैं, कहीं कोई साईकैट्रिक वाला मामला न हो जाए :-)
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान-----:-)
जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि हिन्दी ब्लागर्स को आ रही समस्यायों को देखते हुए पिछले दिनों हमने आप लोगों की सहायतार्थ "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक कुटीर उद्योग का शुभारंभ किया था। जिसके पीछे हमारा एकमात्र यही उदेश्य रहा है कि इसके जरिये हिन्दी चिट्ठाकारों को पोस्ट लेखन में लगने वाले शारीरिक एवं मानसिक श्रम तथा कीमती समय के अपव्यय से मुक्ति दिलाई जा सके। साथ ही प्रतिभा के धनी निम्न एवं मध्यमवर्गीय चिट्ठाकारों को कुछ अतिरिक्त कमाई का मौका देकन उन्हे आर्थिक संबल प्रदान किया जा सके। प्रभु की कृ्पा एवं आप लोगों के योगदान से कुछ हद तक हम इन दोनों ही उदेश्यों की पूर्ती में सफल होते जा रहे हैं। यदि आप लोगों का सहयोग इसी प्रकार मिलता रहा तो निकट भविष्य में ये आपका अपना "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" सफलता के नित नये आयाम छूता चला जाएगा----ऎसा हमारी अन्तरात्मा का कहना है, और कहते हैं कि आत्मा कभी झूठ नहीं बोलती :)
जैसा कि हमने प्रारम्भ में ही कहा था कि आप लोगों को प्रेरित करने के लिए, इस संस्थान की अमूल्य सेवाएं लेने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अनुभवों को आप लोगों से साँझा करते रहेंगें। आज
हमारे सम्मानीय ग्राहक श्री राज भाटिया जी इस संस्थान से जुडने के पश्चात के अपने अनुभवों को आप लोगों से बाँटने के उदेश्य से हमारे बीच उपस्थित हुए हैं। आईये उन्ही से जानते हैं कि हमारी सेवाऎँ लेने से उनके ब्लागिंग जीवन पर कैसा प्रभाव रहा:--------
भाटिया जी उवाच:- पहले मैं भी आप ही की तरह बहुत परेशान रहा करता था। कुछ नया लिखने के लिए दिमाग में आयडिया ही नहीं आ पाता था। मैने बहुत से उपाय किए जैसे कि हर रोज सुबह उठकर पहले तो नियमित रूप से "सरस्वती चालीसा" का पाठ करना। लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं होता दिखाई दिया तो ये सोचकर छोड दिया कि जितना समय रोज देवी सरस्वती को मनाने में लगता है, उतने समय में तो मैं दस ब्लागों पर जाकर टिप्पणी कर सकता हूँ---जिसका कि मुझे कुछ फल भी मिलेगा। उसके बाद मैने कुछ दिनों तक हर रोज दूध में "बादाम रोगन" डालकर पीना शुरू किया। लेकिन उससे भी फायदा तो क्या खाक होना था, उल्टे इस मँहगें बादाम रोगन नें हाथ जरूर तंग कर दिया। जब मैं हर ओर से निराश परेशान हो चुका था ओर ब्लागिंग छोडने का पूरी तरह से मन बना चुका था कि तभी अचानक मुझे " चिट्ठाकार सेवा संस्थान" के बारे में पता चला। सच मानिये, जिस दिन से मैने "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ली हैं तो मानो मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई। अब न तो पोस्ट लिखने का कोई झंझट ओर न ही कैसी भी कोई परेशानी। अब मैं आराम से अपना सारा समय दूसरे के चिट्ठों को पढने ओर उन पर टिप्पणियाँ करने में लगाता हूँ। बदले में मुझे मिलता है भरपूर मानसिक आराम ओर अपने ब्लाग पर ढेरों टिप्पणियाँ। मैं तो कहता हूँ कि अगर आप भी अपनी ब्लागिंग लाईफ को सुधारना चाहते हैं तो आज ही "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ले लीजिए------ओर मेरी तरह आराम से मजे करिए।
अब मिलते हैं हमारे अगले सम्मानीय ग्राहक श्री समीर लाल "उडनतश्तरी" जी से। जानते हैं कि चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान की सेवाऎं लेने से उनके ब्लागिंग जीवन में क्या प्रभाव पडा । चलिए छोडिए....बहुत हो गया, इनके अनुभव फिर किसी ओर दिन सुन लेंगें :-)
विशेष सूचना:- बहुत जल्द ही संस्थान द्वारा काव्य,लेख,कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि रचनाओं के निर्माण हेतु श्रमजीवी विद्वानों, कवियों,गजलकारों,कार्टूनिस्टों की ठेके पर भर्ती हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा। इच्छुक प्रार्थी आवेदन हेतु तैयार रहें......:-)
लेबल:- "फाग के रंग" :-)
जैसा कि हमने प्रारम्भ में ही कहा था कि आप लोगों को प्रेरित करने के लिए, इस संस्थान की अमूल्य सेवाएं लेने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अनुभवों को आप लोगों से साँझा करते रहेंगें। आज
हमारे सम्मानीय ग्राहक श्री राज भाटिया जी इस संस्थान से जुडने के पश्चात के अपने अनुभवों को आप लोगों से बाँटने के उदेश्य से हमारे बीच उपस्थित हुए हैं। आईये उन्ही से जानते हैं कि हमारी सेवाऎँ लेने से उनके ब्लागिंग जीवन पर कैसा प्रभाव रहा:--------
भाटिया जी उवाच:- पहले मैं भी आप ही की तरह बहुत परेशान रहा करता था। कुछ नया लिखने के लिए दिमाग में आयडिया ही नहीं आ पाता था। मैने बहुत से उपाय किए जैसे कि हर रोज सुबह उठकर पहले तो नियमित रूप से "सरस्वती चालीसा" का पाठ करना। लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं होता दिखाई दिया तो ये सोचकर छोड दिया कि जितना समय रोज देवी सरस्वती को मनाने में लगता है, उतने समय में तो मैं दस ब्लागों पर जाकर टिप्पणी कर सकता हूँ---जिसका कि मुझे कुछ फल भी मिलेगा। उसके बाद मैने कुछ दिनों तक हर रोज दूध में "बादाम रोगन" डालकर पीना शुरू किया। लेकिन उससे भी फायदा तो क्या खाक होना था, उल्टे इस मँहगें बादाम रोगन नें हाथ जरूर तंग कर दिया। जब मैं हर ओर से निराश परेशान हो चुका था ओर ब्लागिंग छोडने का पूरी तरह से मन बना चुका था कि तभी अचानक मुझे " चिट्ठाकार सेवा संस्थान" के बारे में पता चला। सच मानिये, जिस दिन से मैने "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ली हैं तो मानो मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई। अब न तो पोस्ट लिखने का कोई झंझट ओर न ही कैसी भी कोई परेशानी। अब मैं आराम से अपना सारा समय दूसरे के चिट्ठों को पढने ओर उन पर टिप्पणियाँ करने में लगाता हूँ। बदले में मुझे मिलता है भरपूर मानसिक आराम ओर अपने ब्लाग पर ढेरों टिप्पणियाँ। मैं तो कहता हूँ कि अगर आप भी अपनी ब्लागिंग लाईफ को सुधारना चाहते हैं तो आज ही "चिट्ठाकार सेवा संस्थान" की सेवाएं ले लीजिए------ओर मेरी तरह आराम से मजे करिए।
अब मिलते हैं हमारे अगले सम्मानीय ग्राहक श्री समीर लाल "उडनतश्तरी" जी से। जानते हैं कि चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान की सेवाऎं लेने से उनके ब्लागिंग जीवन में क्या प्रभाव पडा । चलिए छोडिए....बहुत हो गया, इनके अनुभव फिर किसी ओर दिन सुन लेंगें :-)
विशेष सूचना:- बहुत जल्द ही संस्थान द्वारा काव्य,लेख,कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि रचनाओं के निर्माण हेतु श्रमजीवी विद्वानों, कवियों,गजलकारों,कार्टूनिस्टों की ठेके पर भर्ती हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा। इच्छुक प्रार्थी आवेदन हेतु तैयार रहें......:-)
लेबल:- "फाग के रंग" :-)
शनिवार, 20 फ़रवरी 2010
कुछ ऎसे सवाल जिनका जवाब खोजना बहुत जरूरी सा लगने लगा है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जन्मसंख्या की दृ्ष्टि से दुनिया का सबसे बडा लोकतन्त्र देश-----भारत। जहाँ संसार के हर धर्म को मानने वाला शख्स मिलेगा। जहाँ आधुनिकता की चरम सीमा तक पहुँच चुके धन कुबेरों की कमी नहीं तो दूसरी ओर अनादिकाल से चले आ रहे आदिवासी भी साथ साथ ही पल रहे हैं। सुनने में आता है कि देश की आजादी के बाद के शुरूआती समय में ये कहा जाता था कि जातिभेद और धर्मभेद के कारण और अविकसित राष्ट्रीयता के चलते ये देश आने वाले 5-10 सालों में ही या तो अपनी आजादी गँवा बैठेगा या फिर टुकडों में बँटकर पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो चुका होगा। लेकिन तब से लेकर आज तक पाकिस्तान और चीन जैसे पडोसियों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चलाए जा रहे युद्धों को झेलते हुए भी ये देश हर कसौटी पर खरा उतरता रहा। आज भी यहाँ लोकतन्त्र प्रणाली कायम है, भले ही वह औपचारिक, लुंज-पुंज एवं त्रुटियों का भंडार ही क्यों न बन चुकी हो।
लेकिन इन बडी बडी उपलब्धियों के बावजूद, देश की विशालता एवं विविधता के बाद भी आज एक आम भारतीय पूरी तरह से हताश और निराश है। आजादी के समय के सारे प्रश्न आज भी ज्यों के त्यों खडे हैं, उलटा समाज का नैतिक ह्रास होता हुआ ही दिख रहा है। ऎसा लग रहा है कि मानो हम लोग किसी उल्टी दिशा की ओर बढते चले जा रहे हैं। जिधर देखो उधर संकंट ही संकट क्यों दिखाई पड रहा है। मोर्चा नागरिक अधिकारों का हो कि जनसंख्या वृ्द्धि का,गरीबी-बेरोजगारी घटाने का हो कि भ्रष्टाचार का, शिक्षा की समस्या लीजिए या नशाखोरी की,मँहगाई का सवाल हो कि अराजकता का, महिलाओं की दशा लीजिए या एक आम आदमी की सुरक्षा के हालातों पर दृ्ष्टि डालिए------इस देश में चारों तरफ संकंट ही संकंट क्यों दिखाई दे रहा है?
आज इन सवालों को समझना और इनके जवाब खोजना बहुत जरूरी हो गया है। इस देश के कर्णधारों के पास तो इन सवालों का कोई जवाब नहीं, सोचा कि शायद आप लोगों में से किसी के पास इन सवालों का कोई जवाब हो............
लेकिन इन बडी बडी उपलब्धियों के बावजूद, देश की विशालता एवं विविधता के बाद भी आज एक आम भारतीय पूरी तरह से हताश और निराश है। आजादी के समय के सारे प्रश्न आज भी ज्यों के त्यों खडे हैं, उलटा समाज का नैतिक ह्रास होता हुआ ही दिख रहा है। ऎसा लग रहा है कि मानो हम लोग किसी उल्टी दिशा की ओर बढते चले जा रहे हैं। जिधर देखो उधर संकंट ही संकट क्यों दिखाई पड रहा है। मोर्चा नागरिक अधिकारों का हो कि जनसंख्या वृ्द्धि का,गरीबी-बेरोजगारी घटाने का हो कि भ्रष्टाचार का, शिक्षा की समस्या लीजिए या नशाखोरी की,मँहगाई का सवाल हो कि अराजकता का, महिलाओं की दशा लीजिए या एक आम आदमी की सुरक्षा के हालातों पर दृ्ष्टि डालिए------इस देश में चारों तरफ संकंट ही संकंट क्यों दिखाई दे रहा है?
आज इन सवालों को समझना और इनके जवाब खोजना बहुत जरूरी हो गया है। इस देश के कर्णधारों के पास तो इन सवालों का कोई जवाब नहीं, सोचा कि शायद आप लोगों में से किसी के पास इन सवालों का कोई जवाब हो............
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
पाकिस्तान भारत से कहीं अधिक खुशहाल देश है..........
आजकल हमारे यहाँ लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में 48वीं वार्षिक एल्यूमिनी मीट का आयोजन चल रहा है। जिसमें देश विदेश से आए नामी गिरामी साईंटिस्ट और यूनिवर्सिटी एक्स स्टूडेंट भाग ले रहे हैं। इस एल्यूमनी मीट में कभी पाकिस्तान की फैसलाबाद कृ्षि यूनिवर्सिटी में साईंटिस्ट रह चुके प्रोफैसर डा. हाफिज अब्दुल कयूम भी पहुँचे हुए हैं। कल की बात है जब ये प्रोफैसर महोदय पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे तो इन्होने कुछ ऎसी बात कही जिसे सुनकर तो मेरी हँसी अब तक थमने का नाम नहीं ले रही। आज अचानक बैठे बैठे मन में विचार आया कि क्यूं न इस वाकये को आप लोगों से साँझा किया जाए। तो सुनिये(पढिए) प्रोफैसर महोदय ने क्या कहा--------
प्रोफैसर हाफिज अब्दुल:- "मैं जब भी भारत की यात्रा पर आता हूँ तो यहाँ की अत्यधिक गरीबी देखकर मेरा मन इतना रोता है कि जिसे मैं ब्यां नहीं कर सकता"।
यह बात सुनते ही झट से एक पत्रकार बोल उठा"डा. साहब, क्या पाकिस्तान में गरीबी नहीं है?"
डा. साहब का जवाब था कि "वैसे गरीबी तो पाकिस्तान में भी है, लेकिन उतनी नहीं जितनी भारत में हैं। कुछ मामलों में पाकिस्तान भारत से कहीं बेहतर स्थिति में है"।
तो सुना(पढा) आपने....एक हम लोग हैं जो भारत के विश्व शक्ति बनने के झूठे ख्वाब देखने में लगे हुए हैं, जब कि हमसे कहीं बेहतर स्थिति में तो पाकिस्तान जैसा देश है :)
प्रोफैसर हाफिज अब्दुल:- "मैं जब भी भारत की यात्रा पर आता हूँ तो यहाँ की अत्यधिक गरीबी देखकर मेरा मन इतना रोता है कि जिसे मैं ब्यां नहीं कर सकता"।
यह बात सुनते ही झट से एक पत्रकार बोल उठा"डा. साहब, क्या पाकिस्तान में गरीबी नहीं है?"
डा. साहब का जवाब था कि "वैसे गरीबी तो पाकिस्तान में भी है, लेकिन उतनी नहीं जितनी भारत में हैं। कुछ मामलों में पाकिस्तान भारत से कहीं बेहतर स्थिति में है"।
तो सुना(पढा) आपने....एक हम लोग हैं जो भारत के विश्व शक्ति बनने के झूठे ख्वाब देखने में लगे हुए हैं, जब कि हमसे कहीं बेहतर स्थिति में तो पाकिस्तान जैसा देश है :)
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
जय....................??????????????????
जय छत्तीसगढ
जय बुंदेलखंड
जय महाराष्ट्र
जय उत्तरप्रदेश
.
.
.
.
जय मुम्बई
जय रायपुर
जय लखनऊ
जय जबलपुर
.
.
.
जय कच्चा बाजार
जय टिब्बा रोड
जय घासी राम मोहल्ला
जय ननकू हलवाई वाली गली
.
.
.
जय ठोलकर मेंशन
जय प्रेम सदन
जय महबूब विला
.
.
.
.
जय....?????
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान............
जैसा कि पिछली पोस्ट में इस विषय पर विचार हो रहा था कि नियमित रूप से ब्लाग लिखना कितना श्रमसाध्य कार्य है। एक ओर यहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए रोज रोज नये नये विषयों को खोजने, फिर उन पर कुछ अच्छा, बेहतरीन सा लिखने के लिए सामग्री जुटाने की चिन्ता, वहीं दूसरी ओर मान लीजिए आप लेखन में दक्ष हैं तो भी घर परिवार,नौकरी इत्यादि के चलते ब्लाग लेखन को सही मात्रा में समय न दे पाने की परेशानी।समय की कमी के चलते न तो आप सही अन्तराल में पोस्ट लिख पाते हैं ओर न ही दूसरे के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी ही कर पाते हैं। अगर कोई पोस्ट ही नहीं लिख पाए तो ब्लाग बनाने का भी क्या उदेश्य ओर अगर पोस्ट भी लिख दी लेकिन समय की मजबूरी वश दूसरों के ब्लाग पर टिप्पणी न की तो भी लिखने का क्या फायदा----यूँ ही पढने तो कोई आने से रहा:)। यानि की टोटली टैन्शन!!!!
लेकिन अब आपको चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं। समझिए कि अब आपको पोस्ट लिखने के झंझट से मुक्ति मिल गई। क्यों कि आप लोगों की सेवा,सहयोग तथा हिन्दी भाषा के प्रचार,प्रसार की भावना लेकर हमने "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक संस्था का निर्माण किया है।जिसमें मूर्ख बुद्धिजीवियों,पाश्चात्यबुद्धि ज्ञान-विज्ञान के पुरोधा, नामी,बेनामी कवि,गजलकार और श्रमजीवी विद्वानों की भर्ती की गई है।जो आप जैसे परेशान ग्राहकों(ब्लागर्स) की माँग के अनुसार काव्य,लेख(सामयिक/असामयिक),कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि इत्यादि रचनाओं का निर्माण कर के देंगें।
सभी वर्गों विशेषतय: निम्न एवं मध्यमवर्गीय ब्लागरों का खास ध्यान रखते हुए एक बहुत ही साधारण सी "मूल्य दर" निश्चित की गई है, जिससे कि सभी लोग लाभ उठा सकें।
मूल्य सूची:---
1. कविता----मूल्य 100 रूपये
2.गजल----मूल्य पचास रूपये प्रति शेर के हिसाब से
3.कहानी---250 रूपये
4.कहानी(धारावाहिक)----200 रूपये प्रति किस्त के हिसाब से(न्यूतम 3 किस्तें), 5 किस्तों की कहानी पर कुल मूल्य पर 15% की छूट दी जाएगी।
5.सामयिक लेख----कीमत विषय अनुसार निश्चित की जाएगी ।
6 हास्य-व्यंग्य----मूल्य 250 रूपये
7 चुटकुले/लतीफे----मूल्य प्रति चुटकुला 20 रूपये (एक साथ 10 चुटकुलों के साथ में 1 पहेली फ्री)
गर्मियों में लेबर सस्ती हो जाने के कारण ग्राहकों को भी उस समय रचना बनवाने पर साढे 13 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
हमारे ब्लागर बन्धु उपरोक्त सूची को पढकर स्वयं ही निश्चय कर लें कि दरें कितनी वाजिब रखी गईं हैं। अनमोल रचनाओं के लिए आपसे कौडियों में कीमत ली जा रही है। चलिए अब जरा चन्द नियम एवं शर्तों को भी समझ लिया जाए।
नियम एवं शर्ते:--
1.किसी भी तरह का पंगा लेखन का कार्य स्वीकार नहीं किया जाएगा।
2.रचना निर्मित हो जाने पर उसे ग्राहक को स्वीकार करना ही होगा। उसके निरर्थक होने, पसंद न आने या भाव को व्यक्त न कर सकने इत्यादि किसी भी कारण से यदि ग्राहक उसे अस्वीकार करता है तो भी ग्राहक उसका पूरा पारिश्रमिक देनदार होगा।
3.बिकी हुई रचना किसी भी कीमत पर न तो बदली जाएगी ओर न ही उसका मूल्य वापिस किया जाएगा।
4.रचनाएं केवल हिन्दी भाषा में होगी ओर देवनागिरी लिपि में लिखी जाएंगीं।
5.आपको किसी भी रचना को सिर्फ एक ही चिट्ठे पर छापने का अधिकार होगा। यदि एक ही रचना को आप अपने विभिन्न चिट्ठों पर छापते हैं तो कीमत प्रति चिट्ठे के हिसाब से वसूल की जाएगी।
6.किसी भी तरह के वाद-विवाद की स्थिति में हमारा स्वयं का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।
अन्त में मैं सभी लेखक/कवि/गजलकार/कार्टूनिस्ट मित्रों से भी यह निवेदन करना चाहूँगा कि अपने बेकार समय को "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" के द्वारा उपयोग में लाएं। हमारा विचार चिट्ठाकारी विधा को "कोटेज इन्ड्स्ट्री" के रूप में विकसित करने का है। इस गृ्ह उद्योग से न केवल बहुत से ज्ञान और समय की कमी से पीडित चिट्ठाकारों को मदद मिलेगी बल्कि आप लोगों की आर्थिक दशा में भी सुधार होगा। साथ ही हिन्दी भाषा के प्रचार विस्तार में भी उल्लेखनीय मदद मिलेगी। जिससे कि आगे चलकर हिन्दी चिट्ठासंसार अधिकाधिक स्थूल होता जाएगा।
आशा है कि आप लोग इस सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने देंगें :)
------------------------------------------------------------------------------------
निकट भविष्य में इस संस्थान से जुडने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अमूल्य अनुभवों को आप सब से साँझा करते रहेंगें :)
लेकिन अब आपको चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं। समझिए कि अब आपको पोस्ट लिखने के झंझट से मुक्ति मिल गई। क्यों कि आप लोगों की सेवा,सहयोग तथा हिन्दी भाषा के प्रचार,प्रसार की भावना लेकर हमने "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" नाम से एक संस्था का निर्माण किया है।जिसमें मूर्ख बुद्धिजीवियों,पाश्चात्यबुद्धि ज्ञान-विज्ञान के पुरोधा, नामी,बेनामी कवि,गजलकार और श्रमजीवी विद्वानों की भर्ती की गई है।जो आप जैसे परेशान ग्राहकों(ब्लागर्स) की माँग के अनुसार काव्य,लेख(सामयिक/असामयिक),कहानी,गजल,कार्टून,हास्य-व्यंग्य इत्यादि इत्यादि रचनाओं का निर्माण कर के देंगें।
सभी वर्गों विशेषतय: निम्न एवं मध्यमवर्गीय ब्लागरों का खास ध्यान रखते हुए एक बहुत ही साधारण सी "मूल्य दर" निश्चित की गई है, जिससे कि सभी लोग लाभ उठा सकें।
मूल्य सूची:---
1. कविता----मूल्य 100 रूपये
2.गजल----मूल्य पचास रूपये प्रति शेर के हिसाब से
3.कहानी---250 रूपये
4.कहानी(धारावाहिक)----200 रूपये प्रति किस्त के हिसाब से(न्यूतम 3 किस्तें), 5 किस्तों की कहानी पर कुल मूल्य पर 15% की छूट दी जाएगी।
5.सामयिक लेख----कीमत विषय अनुसार निश्चित की जाएगी ।
6 हास्य-व्यंग्य----मूल्य 250 रूपये
7 चुटकुले/लतीफे----मूल्य प्रति चुटकुला 20 रूपये (एक साथ 10 चुटकुलों के साथ में 1 पहेली फ्री)
गर्मियों में लेबर सस्ती हो जाने के कारण ग्राहकों को भी उस समय रचना बनवाने पर साढे 13 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
हमारे ब्लागर बन्धु उपरोक्त सूची को पढकर स्वयं ही निश्चय कर लें कि दरें कितनी वाजिब रखी गईं हैं। अनमोल रचनाओं के लिए आपसे कौडियों में कीमत ली जा रही है। चलिए अब जरा चन्द नियम एवं शर्तों को भी समझ लिया जाए।
नियम एवं शर्ते:--
1.किसी भी तरह का पंगा लेखन का कार्य स्वीकार नहीं किया जाएगा।
2.रचना निर्मित हो जाने पर उसे ग्राहक को स्वीकार करना ही होगा। उसके निरर्थक होने, पसंद न आने या भाव को व्यक्त न कर सकने इत्यादि किसी भी कारण से यदि ग्राहक उसे अस्वीकार करता है तो भी ग्राहक उसका पूरा पारिश्रमिक देनदार होगा।
3.बिकी हुई रचना किसी भी कीमत पर न तो बदली जाएगी ओर न ही उसका मूल्य वापिस किया जाएगा।
4.रचनाएं केवल हिन्दी भाषा में होगी ओर देवनागिरी लिपि में लिखी जाएंगीं।
5.आपको किसी भी रचना को सिर्फ एक ही चिट्ठे पर छापने का अधिकार होगा। यदि एक ही रचना को आप अपने विभिन्न चिट्ठों पर छापते हैं तो कीमत प्रति चिट्ठे के हिसाब से वसूल की जाएगी।
6.किसी भी तरह के वाद-विवाद की स्थिति में हमारा स्वयं का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।
अन्त में मैं सभी लेखक/कवि/गजलकार/कार्टूनिस्ट मित्रों से भी यह निवेदन करना चाहूँगा कि अपने बेकार समय को "चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान" के द्वारा उपयोग में लाएं। हमारा विचार चिट्ठाकारी विधा को "कोटेज इन्ड्स्ट्री" के रूप में विकसित करने का है। इस गृ्ह उद्योग से न केवल बहुत से ज्ञान और समय की कमी से पीडित चिट्ठाकारों को मदद मिलेगी बल्कि आप लोगों की आर्थिक दशा में भी सुधार होगा। साथ ही हिन्दी भाषा के प्रचार विस्तार में भी उल्लेखनीय मदद मिलेगी। जिससे कि आगे चलकर हिन्दी चिट्ठासंसार अधिकाधिक स्थूल होता जाएगा।
आशा है कि आप लोग इस सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने देंगें :)
------------------------------------------------------------------------------------
निकट भविष्य में इस संस्थान से जुडने वाले हमारे सम्मानीय ग्राहक समय समय पर अपने अमूल्य अनुभवों को आप सब से साँझा करते रहेंगें :)
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
चिट्ठाकारों के लिए एक नायाब नुस्खा!!!!!!!!!!!!!!!!!!
कुछ दिनों पहले हमने अपनी एक पोस्ट के जरिए आप लोगों से चिट्ठाकारी करने के उदेश्यों के बारे में जानना चाहा था। जिसमें आप सब लोगों नें अपने अपने उदेश्यों को जाहिर किया तो जानकर हमें तो अपनी निरूदेश्यता पर शर्म से महसूस होने लगी। सोचा कि जब सब लोगों नें अपने अपने उदेश्य निर्धारित कर रखे हैं तो फिर हमें भी अपने लिए किसी उदेश्य का चुनाव कर ही लेना चाहिए। भई आखिर कब तक यूँ ही निरूद्देश्य भटकते(ब्लागिंग करते) रहेंगें। फालतू में टाईम खोटी करने से बेहतर है कि अपने लिए किसी लक्ष्य का चुनाव कर ही लिया जाए।
लो जी, आज से हमने भी अपने लिए ब्लागिंग का एक उदेश्य चुन लिया। इससे पहले कि हम अपने ध्येय को आपके सामने रखें---एक बात जान लीजिए कि हमारा जो ये उदेश्य है, वो आप लोगों की सुविधा और फायदे से जुडा हुआ है। आप लोग भी सोच रहे होंगें कि इसमें हमारा कौन सा फायदा हो सकता है। बताते हैं भाई----तनिक धीरज रखिए।
उससे पहले दो एक बातें कह लेने दीजिए। अच्छा एक बात बताईये क्या कभी आपको नहीं लगता कि अपने ब्लाग के लिए रोज रोज पोस्ट का जुगाड करना कितना श्रमसाध्य कार्य है। पहले तो लिखने के लिए कोई विषय ढूंढो।अब विषय मिल गया तो जरूरी नहीं कि उसके लिए दिमाग में भाव, विचार भी आने लगें। लगे रहो दिन भर सोचने में कि ये लिखूं कि वो लिखूँ----ऎसा लिखूँ कि वैसा लिखूँ। ऊपर से समय की दिक्कत, घर में बीवी की खिचखिच---जहाँ दिमाग में कोई विचार आया नहीं कि वहीं उधर से आवाज आने लगती है-"अजी! सुनते हो"। बस विचार जैसे आया था, दिमाग से वैसे ही चुपचाप निकल लेता है।
एक ओर जो परेशानी है, वो है समय की। व्यापारी आदमी तो जैसे तैसे समय निकाल भी लेता है लेकिन नौकरीपेशा लोगों के लिए तो ओर बडी दिक्कत----बेचारे का सारा दिन तो पोस्ट लिखने के चक्कर में बीत जाता है। भला आदमी कब तो आफिस का काम करेगा ओर कब दूसरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी कर पाएगा। अगर आफिस का काम न करे तो नौकरी छूटने का खतरा ओर दूसरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी न की तो फिर तो अपने ब्लाग पर कोई झाँकने भी नहीं आएगा। यानि कि फिर तो ब्लाग लिखने से कहीं अच्छा है कि डायरी लिखने की आदत डाल ली जाए। खुद ही लिखो ओर खुद ही पढे जाओ। बाप रे बाप्! इतनी परेशानियाँ----ससुरी ब्लागिंग न हुई,जी का जंजाल हो गई।मानो साँप के मुँह में छुछुन्दर----न छोडने बनती है ओर न निगलते।
लेकिन घबराईये नहीं---समझिए आपकी सभी परेशानियो का हल हो गया। अब आपको पोस्ट लिखने में समय नष्ट करने की कोई जरूरत नहीं। आप तो बस अब अपना सारा ध्यान दूसरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पयाने में लगाईये ओर बदले में अपने ब्लाग पर आने वाली टिप्पणियाँ गिनते जाईये।
आप सोच रहे होंगें कि शायद हम आपके साथ कोई मजाक कर रहे हैं। अगर आप इसे मजाक समझ रहे हैं तो फिर आप बिल्कुल गलत हैं। कृ्प्या एक बात जान लीजिए कि किसी को भ्रमित करने या फालतू में हास परिहास करने की न तो हमारी आदत रही है ओर न ही यूँ व्यर्थ में नष्ट करने को हमारे पास इतना समय है।
सच मानिये,हम आप लोगों के लिए एक ऎसा नायाब नुस्खा खोज कर लाए कि समझिए आपकी ब्लागिंग के रास्ते में आने वाली सभी दिक्कतें, परेशानियाँ यूँ चुटकी में समाप्त।
बस आपको थोडा अगली पोस्ट तक इन्तजार करना पडेगा.............. मिलते हैं कल या परसों।
नमस्कार्!!
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
आखिर हम लोग ब्लागिंग किस लिए कर रहे हैं ???
बहुत दिनों से मन मे ये सवाल उमडघुमड रहा है कि आखिर हम लोगों का ब्लागिंग करने का उदेश्य क्या है ?। आखिर क्यूँ हम लोग दिन रात मगजमारी किया करते हैं । बहुत सोचने पर भी मेरी समझ में अभी तक कुछ नहीं आया । वैसे कुछ न कुछ उदेश्य तो होता ही होगा । अगर इसका सचमुच में कोई उदेश्य न होता तो क्यूँ रात रात भर, जब कि बाकी दुनिया सुख की नीँद ले रही होती है और हम लोगों की आँखें कम्पयूटर सक्रीन पर गढी होती हैं । अकारण ही तो कोई समझदार इन्सान इतने व्यस्त जीवन और मंहगाई के इस जमाने में अपना टाईम खोटी नहीं करेगा।
सचमुच कुछ न कुछ उदेश्य तो चिट्ठाकारी का होना ही चाहिए । पर सच कहूँ, तो अब तक इसका उदेश्य मेरी समझ में तो नहीं आया ? यों तो हमारी भी चिट्ठाकारी साधना किसी से कम नहीं रही है । अभी तक अपने जीवन का स्वर्णिम एक वर्ष और चार महीने इस पर न्यौछावर कर चुके हैं । इस बीच यह नहीं कि हमने यहाँ रहकर कोई भाड ही भूँजा है---बल्कि लगभग प्रति सप्ताह एक पोस्ट के हिसाब से अपने पाठकों को ज्योतिष पर अति महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते रहे हैं । धर्म यात्रा ब्लाग पर अपने धर्म, संस्कृ्ति, नीतिज्ञान आधारित लगभग 60-70 आलेख छाप चुके हैं । यहीं इसी ब्लाग पर ही कुछ सामाजिक आलेख, एक दो कथा कहानियाँ, एक गजल और थोडी सी बकवास भी ठेल चुके हैं । अब पाठकों नें उन्हे किस हद तक पसन्द किया, ये तो मैं नहीं जानता लेकिन टिप्पणियो में आलोचकों द्वारा मिले प्रशंसा पत्र जरूर आज तक हमने सहेज कर रखे हुए हैं ।
अब अगर आप लोग मुझसे पूछें कि ब्लागिंग के पीछे मेरा क्या उदेश्य है तो शायद आप लोगों को मेरा जवाब कुछ निराशाजनक प्रतीत हो...क्यों कि अभी तक हम तो किन्ही उदेश्यों का निर्धारण कर ही नहीं पाए हैं। सच बात ये है कि बहुत खोजने पर भी हमें तो कोई उदेश्य अभी तक मिला नहीं।
अब आप लोग किन्ही विशेष उदेश्यों को लेकर ब्लागिंग कर रहे हैं तो हमारा उदेश्य भी वही समझ लीजिए। लेकिन बता जरूर दीजिएगा कि आपका उदेश्य क्या है?...वर्ना इस सवाल का जवाब मिलने तक यूँ ही फालतू में हमारा भेजा मंथन चलता रहेगा ।
आज आप लोगों का बहुत समय ले लिया.......चलते चलते एक सुन्दर सी तस्वीर देख लीजिए। लेकिन बताए देते हैं कि चित्र और आज की इस पोस्ट का आपस में कैसा भी कोई सम्बंध नहीं है :)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)




