हमारे ज्ञान की परिधि कितनी सीमित है--- कि, कईं बार तो हम बिल्कुल सामान्य सी छोटी मोटी बातें भी नहीं जानते। जैसे कि पक्षियों में गरूड नहीं बल्कि बाज की गति सबसे तेज होती है। हिरण की आँखे बडी मानी जाती है लेकिन वास्तव में घोडे की आँखे उससे अधिक बडी होती हैं। तेज धूप में संसार के हरेक प्राणी को पसीना आता है लेकिन कुत्ता ऎसा जानवर है जिसे चाहे सारा दिन धूप में खडा करके रखा जाए लेकिन फिर भी उसे पसीना नहीं आएगा। स्तनपायी प्राणियों के शरीर पर बाल होते हैं लेकिन गेन्डा इसका अपवाद है जो स्तनपायी होने पर भी बिना बालों का जीव है। वृ्क्षों में बरगद के पेड को दीर्धजीवी माना जाता है लेकिन सबसे अधिक दिन जैतून का पेड जीवित रहता है।
मेंडक के पैदा होते समय दुम होती है, पैर नहीं लेकिन मरते समय उसके पैर रहते हैं दुम नहीं। हँस के बारे में किम्बदन्ति है कि वो मिले हुए दूध-पानी में से दूध पी लेता है और पानी छोड देता है, साथ ही यह भी कहा जाता है कि वो मोती खाता है लेकिन यह दोनों ही किम्बदन्तियाँ बिल्कुल मिथ्या हैं। हँस भी अन्य पक्षियों की तरह ही कीडे मकोडे तथा बीज इत्यादि का भक्षण करता है।
स्वाती नक्षत्र में वर्षा होने से सीप में मोती, केले से कपूर और बाँस में वंशलोचन पैदा होता है, यह मान्यता सर्वथा कपोल कल्पित है जिसमें सच्चाई का नाममात्र भी अंश नहीं। दस बीस भाषाओं और दर्जन दो दर्जन मजहबों के अतिरिक्त किसे पता है कि संसार में 3064 भाषाएं बोली जाती हैं और 900 से अधिक मत-मतान्तर हैं।
हमारा सामान्य ज्ञान कितना स्वल्प है!---- इस बात का पता इससे चलता है कि अपनी मान्यता प्राप्त जानकारियों में कितनी उपहासास्पद मान्यताएं भरी पडी हैं और हम लोग कितनी मिथ्या धारणाएं संजोएं बैठे हैं।
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रविवार, 1 अगस्त 2010
हमारे ज्ञान की परिधि कितनी सीमित है-----(संडे ज्ञान)
मंगलवार, 20 जुलाई 2010
क्या आप भी सोचते हैं ???
पता नहीं आप इस तरह से सोचते हैं या नहीं, पर बात वास्तव में सोचने की ही है. घरबार, बाल-बच्चे, रोजी-रोजगार, अडोसी-पडोसी, नाते-रिश्तेदार, देश-दुनिया और तो और भगवान के होने या न होने के बारे में भी आपने जरूर सोचा होगा. लेकिन मैं कहता हूँ कि इतना सबकुछ सोचने पर भी आपने कुछ नहीं सोचा, क्यों कि जो कुछ भी आपने सोचा वो सोचा न सोचा एक बराबर है.
दरअसल बात ये है कि जो कुछ भी हम सोचते हैं, उसे यदि सोचना कहा जाए तो हकीकत ये है कि वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्यों कि धूल से लेकर चाँद-तारों तक, 'इस' से लेकर 'उस' तक सोचते रहने पर भी हम लोग अपने बारे में जरा भर भी सोचते ही कहाँ हैं?
यूँ तो हम और आप सभी सोचने का काम करते हैं. आखिर ऊपर वाले नें दिमाग तो इन्सान को सोचने के लिए ही दिया है. अब ये हमारे ऊपर है कि हम उससे क्या सोचते हैं, कितना सोचते हैं और किस तरह से सोचते हैं. अब सोचने वाले तो एक गधे को भी किसी एक विशेष दृ्ष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य, उसके भोलेपन, उसके शरीफाना अन्दाज की सराहना करने के बारे में सोचते सोचते भी एक अच्छे खासे दार्शनिक हो सकते हैं. इसी तरह आप हिन्दी के ब्लागर होकर भी, ब्लाग पर अगढम-बगढम, कूडा कबाड छापते रहकर भी,आप चाहे तो दिनभर सक्रियता क्रमाँक, उसका आधार,सिद्धान्त, उसकी कार्यप्रणाली----साथ में अपनी(ब्लाग की) और दूसरों की क्रमाँक सँख्या आँखों के सामने रखकर चिन्तन करते रहें तो भी अपने आप में श्रेष्ठ ब्लागर होने के गुण विकसित कर ब्लागरत्व को सहज ही प्राप्त सकते हैं. पर मेरा संकेत इस तरह से सोचने की ओर नहीं है. भई आप विकासवाद के सिद्धान्तानुसार बन्दर के नूतनतम संस्करण हैं...सो, बन्दर से कुछ अधिक दिमागदार तो होंगें ही. इसलिए, इस दशा में सोचना भी आपके लिए लाजिमी ठहरा. लेकिन एक बात जो तय है कि सारी दुनिया जहान की सोचते सोचते भी कुछ तो सोचना हमेशा बाकी रह ही जाता है. आप पूछेंगें क्या ?
जरा उस समय के बारे में सोचिए जब आप अकेले बैठे हों और जम्हाई आ रही हो. उस समय बिना सोचे मुँह चौडा करके नथुना फुलाना कितना मनमोहक लगता होगा. यदि उस समय आप अपनी खुद की शक्ल देख सकें तो अपने काजल भाई या इरफान भाई के कार्टून भी फीके लगने लगेंगें. या फिर चुपचाप बैठे मूच्छ के बाल पकडकर उन्हे घुमाते रहना या नाक को अंगूठे और अँगुली का चिमटा बनाकर बार बार खीँचना----इन सबको आप सोचने की वस्तु भले ही न समझें, लेकिन मैं तो समझता ही हूँ.
आप सोचेंगें कि ये भी कहाँ कहाँ की सोचने लगे. लेकिन भाई बात सोचने की ही है. चाहे बेशक आप उसे सोचकर भी अनसोचा कर दें. यह सोचकर भी बिना सोचे-समझे मैं जो ये यहाँ लिख रहा हूँ , वह भी एक सोच में विमग्न व्यक्ति को देखकर ही. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में कहें तो सोचा है----वह सिर्फ उस सामने बैठे व्यक्ति को देखकर ही. लेकिन अब वह उठकर चल दिया, इसलिए आगे क्या लिखा जाए बस यही सोच रहा हूँ.....तब तक आप बताईये कि पढकर आपने क्या सोचा ? :)
दरअसल बात ये है कि जो कुछ भी हम सोचते हैं, उसे यदि सोचना कहा जाए तो हकीकत ये है कि वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्यों कि धूल से लेकर चाँद-तारों तक, 'इस' से लेकर 'उस' तक सोचते रहने पर भी हम लोग अपने बारे में जरा भर भी सोचते ही कहाँ हैं?
यूँ तो हम और आप सभी सोचने का काम करते हैं. आखिर ऊपर वाले नें दिमाग तो इन्सान को सोचने के लिए ही दिया है. अब ये हमारे ऊपर है कि हम उससे क्या सोचते हैं, कितना सोचते हैं और किस तरह से सोचते हैं. अब सोचने वाले तो एक गधे को भी किसी एक विशेष दृ्ष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य, उसके भोलेपन, उसके शरीफाना अन्दाज की सराहना करने के बारे में सोचते सोचते भी एक अच्छे खासे दार्शनिक हो सकते हैं. इसी तरह आप हिन्दी के ब्लागर होकर भी, ब्लाग पर अगढम-बगढम, कूडा कबाड छापते रहकर भी,आप चाहे तो दिनभर सक्रियता क्रमाँक, उसका आधार,सिद्धान्त, उसकी कार्यप्रणाली----साथ में अपनी(ब्लाग की) और दूसरों की क्रमाँक सँख्या आँखों के सामने रखकर चिन्तन करते रहें तो भी अपने आप में श्रेष्ठ ब्लागर होने के गुण विकसित कर ब्लागरत्व को सहज ही प्राप्त सकते हैं. पर मेरा संकेत इस तरह से सोचने की ओर नहीं है. भई आप विकासवाद के सिद्धान्तानुसार बन्दर के नूतनतम संस्करण हैं...सो, बन्दर से कुछ अधिक दिमागदार तो होंगें ही. इसलिए, इस दशा में सोचना भी आपके लिए लाजिमी ठहरा. लेकिन एक बात जो तय है कि सारी दुनिया जहान की सोचते सोचते भी कुछ तो सोचना हमेशा बाकी रह ही जाता है. आप पूछेंगें क्या ?
जरा उस समय के बारे में सोचिए जब आप अकेले बैठे हों और जम्हाई आ रही हो. उस समय बिना सोचे मुँह चौडा करके नथुना फुलाना कितना मनमोहक लगता होगा. यदि उस समय आप अपनी खुद की शक्ल देख सकें तो अपने काजल भाई या इरफान भाई के कार्टून भी फीके लगने लगेंगें. या फिर चुपचाप बैठे मूच्छ के बाल पकडकर उन्हे घुमाते रहना या नाक को अंगूठे और अँगुली का चिमटा बनाकर बार बार खीँचना----इन सबको आप सोचने की वस्तु भले ही न समझें, लेकिन मैं तो समझता ही हूँ.
आप सोचेंगें कि ये भी कहाँ कहाँ की सोचने लगे. लेकिन भाई बात सोचने की ही है. चाहे बेशक आप उसे सोचकर भी अनसोचा कर दें. यह सोचकर भी बिना सोचे-समझे मैं जो ये यहाँ लिख रहा हूँ , वह भी एक सोच में विमग्न व्यक्ति को देखकर ही. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में कहें तो सोचा है----वह सिर्फ उस सामने बैठे व्यक्ति को देखकर ही. लेकिन अब वह उठकर चल दिया, इसलिए आगे क्या लिखा जाए बस यही सोच रहा हूँ.....तब तक आप बताईये कि पढकर आपने क्या सोचा ? :)
रविवार, 11 जुलाई 2010
ब्लागिंग सुधारोन्माद :)
आजकल देखने में आ रहा है कि बिल्कुल किसी महामारी की तरह से, ब्लागिंग सुधारोन्माद नाम का रोग भी बडी तेजी से फैलता जा रहा है. सच पूछिए, तो यह एक बहुत ही भयानक किस्म का रोग है, जो कि सिर्फ हिन्दी भाषी ब्लागिंग क्षेत्र में ही पाया जाता है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति बस हर वक्त कुछ न कुछ ऊल-जलूल सी हरकतें करता ही रहता है। इस नामुराद बीमारी के चँगुल में फँस कर बेचारा रोगी न तो घर का रहता है और न घाट का। अच्छा भला व्यक्ति बस महज कुछ दिनों में ही अर्ध-पागल की सी हालत में पहुँच जाता है। उठता-बैठता, सोता-जागता, नहाता-धोता, खाता-पीता, यहां तक कि न मालूम कैसी कैसी जगह में भी बस "गुन गुन" करता रहता है। दूसरों के चिट्ठों पर टिप्पणियों की भरमार देखकर तो रोगी को एकदम से भयंकर दौरा शुरू हो जाता है, जो लाख चिकित्सा करने पर भी शान्त नहीं होता। ब्लागिंग की दशा पर रोगी चीखता चिल्लाता है। पसन्द-नापसन्द, टिप्पणियों की कम-ज्यादा संख्या, निरर्थक लेखन,गुटबाजी इत्यादि कुछ ऎसे विषय हैं, जिन्हे देखकर तो उसे एकदम बुरी तरह से फुरफुरी सी आने लगती है। बस उसके बाद तो वो तुरन्त "ब्लाग सुधारक" की भूमिका में आ जाता है और झट से अपनी नेतागिरी की भडास मुफ्त में मिले ब्लाग पर छापकर और फिर उस पर लोगों की वाह! वाह्! देख आनन्दित हो खुशी से झूमने लगता है। इस रोग का अगर शीघ्र ही उचित इलाज न किया जाए तो फिर बहुत जल्द रोगी अर्ध-पागल से पूर्ण पागल की स्थिति में पहुँच जाता है।
अक्सर वे ही ब्लागर इस रोग के शिकार होते हैं जिनकी लेखनशक्ति का उचित विकास नहीं हो पाता. वर्तमान अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित भी हो चुका है कि यह रोग आलतू फालतू प्रकृ्ति के ब्लागरों में ही पाया जाता है.
उपचार विधि:-ऎसे रोगी को सुबह शाम दो चार टिप्पणियाँ वाह्! वाह्! के शहद के साथ मिलाकर चटानी चाहिए। उसे नियमित रूप से "चर्चा-धारा" पिलाने से भी रोग का प्रकोप शान्त रहता है। इसके अतिरिक्त कभी कभी किसी "ब्लागर पुरूस्कार" की पुडिया देने से भी लाभ होता देखा गया है। इसके साथ में कभी कभी हफ्ते दो हफ्ते में "ब्लाग सर्वश्रेष्ठता" का काढा भी पिलाते रहें तो समझिए जल्दी लाभ मिलने लगेगा।
यदि ऊपरोक्त वर्णित उपचार के पश्चात भी रोगी की दशा में कोई सुधार नहीं होता तो जानिये कि रोग अब अन्तिम स्टेज तक पहुँच चुका है, बिना विशेष इलाज के ठीक होने वाला नहीं। तब एकमात्र हल ये है कि बिना कोई समय नष्ट किए, रोगी को किन्चित मात्रा में "जूतम-धारा" पिलाई जाए, तो बस , तुरन्त आराम हो जाएगा :-)
अक्सर वे ही ब्लागर इस रोग के शिकार होते हैं जिनकी लेखनशक्ति का उचित विकास नहीं हो पाता. वर्तमान अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित भी हो चुका है कि यह रोग आलतू फालतू प्रकृ्ति के ब्लागरों में ही पाया जाता है.
उपचार विधि:-ऎसे रोगी को सुबह शाम दो चार टिप्पणियाँ वाह्! वाह्! के शहद के साथ मिलाकर चटानी चाहिए। उसे नियमित रूप से "चर्चा-धारा" पिलाने से भी रोग का प्रकोप शान्त रहता है। इसके अतिरिक्त कभी कभी किसी "ब्लागर पुरूस्कार" की पुडिया देने से भी लाभ होता देखा गया है। इसके साथ में कभी कभी हफ्ते दो हफ्ते में "ब्लाग सर्वश्रेष्ठता" का काढा भी पिलाते रहें तो समझिए जल्दी लाभ मिलने लगेगा।
यदि ऊपरोक्त वर्णित उपचार के पश्चात भी रोगी की दशा में कोई सुधार नहीं होता तो जानिये कि रोग अब अन्तिम स्टेज तक पहुँच चुका है, बिना विशेष इलाज के ठीक होने वाला नहीं। तब एकमात्र हल ये है कि बिना कोई समय नष्ट किए, रोगी को किन्चित मात्रा में "जूतम-धारा" पिलाई जाए, तो बस , तुरन्त आराम हो जाएगा :-)
सोमवार, 5 जुलाई 2010
सिर्फ जटिलताएं ही जटिलताएं, सरलता कुछ भी नहीं.......
सरलता सदैव प्रश्नों को जन्म देती है और जटिलता समस्याओं को. वर्तमान आधुनिक युग को यदि समस्याओं का युग कहा जाए तो शायद कुछ गलत न होगा. प्राचीन युग प्रश्नों का युग था. उस पौराणिक युग में तरह तरह के प्रश्न पूछे जाते थे, अनेक शंकाओं को उठाया जाता था. सब सवालों के जवाब दिए जाते थे और सारी शंकाओं का समाधान हो जाता था. यह शायद इसलिए कि पुराने युग की मानसिक स्थिति बचपन के जैसे हुआ करती थी,लेकिन ये युग तो मानो बूढों का युग है. आदमी पैदा होते ही सीधे बूढापे में कदम रख लेता है.जीवन की वो सरलता भला अब कहाँ दिखाई पडती है. बस बूढी मानसिकता से जन्मे उपदेश भर रह गए हैं सुनने को.
मुझे याद है जब मैं बचपन में परिवार के अपने बडे-बुजुर्गों से तरह तरह के सवाल किया करता था----देवता कौन होते हैं? लोग मर क्यूं जाया करते हैं? मरने के बाद इन्सान कहाँ जाता है? भगवान दिखता क्यूँ नहीं? दिन के बाद रात क्यूँ होती है? आकाश में ये तारे किसलिए चमकते हैं? वगैरह वगैरह......मेरे इन अबोध सवालों को सुनकर अक्सर या तो पिता जी चुप रहते या फिर उनका यही एक जवाब होता कि "बाप रे! ये लडका कितनी सिर खपाई करवाता है"
आज शायद मन की इस सरलता का कहीं लोप हो गया है, इसे पूरी तरह से जटिलता नें घेर लिया है. आज हर प्रश्न टेढा होकर समस्या बनता जा रहा है और समस्याओं से जीवन घिर गया है. इन का समाधान नहीं हो पा रहा है. इस लिए कभी कभी जी चाहता है कि काश हम पुन: बचपन में लौट सकते या फिर ये युग ही बदल जाता....इसके बदले में पौराणिक युग फिर से लौट आता. लेकिन ऎसा होना संभव ही कहाँ है. सच पूछिए, मुझे कभी कभी उन लोगों से रश्क होने लगता है,जो आज भी बचपन में जी रहे हैं. इनके चेहरों पर न तो हैरानी दिखती है और न ही किसी किस्म की परेशानी. सोचता हूँ कि हम लोगों नें पौराणिक सरलता को खोकर क्या पाया है. इस ससुरी आधुनिकता नें दुनिया को आखिर दिया ही क्या है ?...बस, हर एक चेहरे पर जटिलता की लकीरें और बिना सवालों के जवाब.
आज पेट के लिए रोटी मिलना, मोक्ष मिलने या न मिलने से अधिक चिन्ता का विषय है. सिलेंडर में गैस या गाडी में पेट्रोल का न होना, भगवान के होने या न होने से कहीं अधिक हैरान कर डालता है. पुरखे कितने सुखी थे. हर तरह की चिन्ता फिक्र से मुक्त.जो पेडों की छाँव तले बैठकर ब्रह्म और माया के रहस्य खोज लिया करते थे...लेकिन एक इधर हम हैं जिनसे दिन भर ऎ.सी.के नीचे बैठकर भी आज तक घर-गृ्हस्थी तक का रहस्य न सुलझाया जा सका. आज यदि हम अतीत में जीना चाहते हैं तो दुनिया पलायनवादी कहने लगती है,एक झटके में पुरातनपंथी घोषित कर दिया जाता है.करें तो क्या करें. जाएं तो आखिर कहाँ जाएँ ?
भाग्य के बलिहारी जाऊँ! धर्मपत्नि भी ऎसी मिली जो साईंस पढी हुई. समझिए जी का जंजाल. खाना खाने बैठो तो, निवाला मुँह तक बाद में जाए उससे पहले देर तक मुए प्रोटीन,विटामिन,कैल्शियम,कार्बोहाईटड्रेट वगैरह पर प्रवचन सुनना पडता है. पेट तो पहले ही इस प्रवचन से भर चुका होता है, खाना क्या खाक खाया जाएगा. कभी मीठे का निषेध करने लगती है तो कभी खट्टे का. आचार, घी वगैरह को तो छूने भी नहीं देती...कहती है कि दिल के लिए नुक्सानदेह होता है. अब उसे क्या समझाएं कि भागवान दिल को तो नुक्सान हो ही रहा है, अब और इससे ज्यादा भला क्या नुक्सान होगा. बस गनीमत है कि तुम्हारे होते (भी) अभी तक जैसे तैसे चल रहा है, धडकना बन्द नहीं हुआ :) इन नासपीटे वैज्ञानिकों का क्या जाता है. क्या खाना है, क्या पीना है.....ये लोग तो यूँ ही फालतू के शोध करते रहते हैं और बिना बात के हमारी जान को नए नए क्लेश खडे करते जाते हैं. इनका क्या जाता है. भुगतना तो हमें पडता है :)
अब तो ऎसा लगने लगा हैं कि विज्ञान का कार्य जीवन को समस्या मुक्त करना है ही नहीं वरन नित नई समस्याएं पैदा कर इसे ओर अधिक जटिल करते जाना है. पता ही नहीं चलता कि अपनी सहजता,सरलता और प्रकृतिमय जीवन व्यवस्था को खोकर हमने हासिल क्या किया है ? दिखाई पडता है तो सिर्फ यही कि----आधुनिकता के नाम पर जीवन में बस जटिलताएं ही जटिलताएं, सरलता कुछ भी नहीं.......
मुझे याद है जब मैं बचपन में परिवार के अपने बडे-बुजुर्गों से तरह तरह के सवाल किया करता था----देवता कौन होते हैं? लोग मर क्यूं जाया करते हैं? मरने के बाद इन्सान कहाँ जाता है? भगवान दिखता क्यूँ नहीं? दिन के बाद रात क्यूँ होती है? आकाश में ये तारे किसलिए चमकते हैं? वगैरह वगैरह......मेरे इन अबोध सवालों को सुनकर अक्सर या तो पिता जी चुप रहते या फिर उनका यही एक जवाब होता कि "बाप रे! ये लडका कितनी सिर खपाई करवाता है"आज शायद मन की इस सरलता का कहीं लोप हो गया है, इसे पूरी तरह से जटिलता नें घेर लिया है. आज हर प्रश्न टेढा होकर समस्या बनता जा रहा है और समस्याओं से जीवन घिर गया है. इन का समाधान नहीं हो पा रहा है. इस लिए कभी कभी जी चाहता है कि काश हम पुन: बचपन में लौट सकते या फिर ये युग ही बदल जाता....इसके बदले में पौराणिक युग फिर से लौट आता. लेकिन ऎसा होना संभव ही कहाँ है. सच पूछिए, मुझे कभी कभी उन लोगों से रश्क होने लगता है,जो आज भी बचपन में जी रहे हैं. इनके चेहरों पर न तो हैरानी दिखती है और न ही किसी किस्म की परेशानी. सोचता हूँ कि हम लोगों नें पौराणिक सरलता को खोकर क्या पाया है. इस ससुरी आधुनिकता नें दुनिया को आखिर दिया ही क्या है ?...बस, हर एक चेहरे पर जटिलता की लकीरें और बिना सवालों के जवाब.
आज पेट के लिए रोटी मिलना, मोक्ष मिलने या न मिलने से अधिक चिन्ता का विषय है. सिलेंडर में गैस या गाडी में पेट्रोल का न होना, भगवान के होने या न होने से कहीं अधिक हैरान कर डालता है. पुरखे कितने सुखी थे. हर तरह की चिन्ता फिक्र से मुक्त.जो पेडों की छाँव तले बैठकर ब्रह्म और माया के रहस्य खोज लिया करते थे...लेकिन एक इधर हम हैं जिनसे दिन भर ऎ.सी.के नीचे बैठकर भी आज तक घर-गृ्हस्थी तक का रहस्य न सुलझाया जा सका. आज यदि हम अतीत में जीना चाहते हैं तो दुनिया पलायनवादी कहने लगती है,एक झटके में पुरातनपंथी घोषित कर दिया जाता है.करें तो क्या करें. जाएं तो आखिर कहाँ जाएँ ?
भाग्य के बलिहारी जाऊँ! धर्मपत्नि भी ऎसी मिली जो साईंस पढी हुई. समझिए जी का जंजाल. खाना खाने बैठो तो, निवाला मुँह तक बाद में जाए उससे पहले देर तक मुए प्रोटीन,विटामिन,कैल्शियम,कार्बोहाईटड्रेट वगैरह पर प्रवचन सुनना पडता है. पेट तो पहले ही इस प्रवचन से भर चुका होता है, खाना क्या खाक खाया जाएगा. कभी मीठे का निषेध करने लगती है तो कभी खट्टे का. आचार, घी वगैरह को तो छूने भी नहीं देती...कहती है कि दिल के लिए नुक्सानदेह होता है. अब उसे क्या समझाएं कि भागवान दिल को तो नुक्सान हो ही रहा है, अब और इससे ज्यादा भला क्या नुक्सान होगा. बस गनीमत है कि तुम्हारे होते (भी) अभी तक जैसे तैसे चल रहा है, धडकना बन्द नहीं हुआ :) इन नासपीटे वैज्ञानिकों का क्या जाता है. क्या खाना है, क्या पीना है.....ये लोग तो यूँ ही फालतू के शोध करते रहते हैं और बिना बात के हमारी जान को नए नए क्लेश खडे करते जाते हैं. इनका क्या जाता है. भुगतना तो हमें पडता है :)
अब तो ऎसा लगने लगा हैं कि विज्ञान का कार्य जीवन को समस्या मुक्त करना है ही नहीं वरन नित नई समस्याएं पैदा कर इसे ओर अधिक जटिल करते जाना है. पता ही नहीं चलता कि अपनी सहजता,सरलता और प्रकृतिमय जीवन व्यवस्था को खोकर हमने हासिल क्या किया है ? दिखाई पडता है तो सिर्फ यही कि----आधुनिकता के नाम पर जीवन में बस जटिलताएं ही जटिलताएं, सरलता कुछ भी नहीं.......
शनिवार, 26 जून 2010
कैसे कैसे लोग........
कल रात एक ब्लागर बन्धु से पहली बार जीमेल चैट पर कुछ वार्तालाप हुई तो वो भले आदमी बातों बातों में ही एक विचित्र सा आग्रह करने लगे. हुआ ये कि उन्होने अपने बारे में किसी पोस्ट में कुछ लिखने को कह दिया। क्यों कहा़ ? ये वो जानें। पर मैं तो अपनी जानता हूँ, अपनी कहता हूँ। मैं ब्लाग लिखता हूँ, पढता भी हूँ---यानि कि थोडा बहुत दोनों काम ही कर लेता हूँ। परन्तु होता कुछ नहीं, होता हुआ दिखता भी कुछ नहीं; पर मैं दिखाने का चाव और भाव भी नहीं रखता। क्यों? यह सब कुछ करने-धरने-देखने दिखाने पर निर्भर है, आदमी के स्वभाव और रूचि पर डिपैंड करता है। मुझ से यह कभी न हुआ और शायद होने वाला भी नहीं। यह किसी खास टाईप के आदमी का ही काम हो सकता है, हर किसी के बस की बात नहीं। हालाँकि यूँ तो मैं विभिन्न पत्रिकाओं में ज्योतिष विषय पर पिछले बहुत सालों से लिखता आ रहा हूँ, पर क्या क्या लिखा, कहाँ कहाँ लिखा, इसकी तो खुद मुझे भी खबर नहीं। हाँ ज्योतिष से इतर किसी अन्य विषय पर थोडा बहुत जो कुछ भी आडा-तिरछा लिखा, वो सिर्फ यहीँ ब्लाग पर आकर ही लिखा. लेकिन किसी की फरमाईश पर लिखना अपने बूते से बाहर की बात है। ओर अगर कहीं फरमाईश ऎसी हो जिसमें सामने वाले की विज्ञापनबाजी या खुशामद की मंशा झलकती हो तो ऎसा तो भई सात जन्म भी मुमकिन नहीं.अरे भाई यहाँ हमने क्या कोई विज्ञापन ऎजेंसी थोडे खोल रखी है जो तुम्हारा विज्ञापन करते फिरें.ओर हमें किसी से ऎसे कोई अलिखित समझौते करने की भी कोई जरूरत नहीं कि "मैं तुम्हारी तारीफ में कुछ लिखूँ और बदले में तुम हमारी तारीफ में".
यहाँ तो ये हाल है कि मन में कोई विचार आया तो बेशक उस पर कोई पोस्ट लिख डाली ओर न मन किया तो समझिए महीना भर छुट्टी, इसलिए हमने तो उन्हे स्पष्ट मना कर दिया कि भाई ये काम अपने बस का नहीं। हाँ इसके अलावा कुछ ओर सेवा हो तो बोलिए......वर्ना कोई ओर दूसरा द्वार खटखटाईये।
यहाँ तो ये हाल है कि मन में कोई विचार आया तो बेशक उस पर कोई पोस्ट लिख डाली ओर न मन किया तो समझिए महीना भर छुट्टी, इसलिए हमने तो उन्हे स्पष्ट मना कर दिया कि भाई ये काम अपने बस का नहीं। हाँ इसके अलावा कुछ ओर सेवा हो तो बोलिए......वर्ना कोई ओर दूसरा द्वार खटखटाईये।
बुधवार, 16 जून 2010
ब्लागरोत्थान की कोचिंग क्लास
पार्क की एक बैन्च पर तीन मित्र बैठे है, मिश्रा, अनोखेलाल और चौबे----तीनों ही हिन्दी के ब्लागर. अब ये आपके सोचने पर है कि आप चाहे तो इसे किसी ब्लागर मीट का नाम दें या मित्रों की आपस की गुफ्तगू. अब इनमें मिश्रा और अनोखेलाल तो थे ब्लाग की दुनिया के पुराने पापी यानि कि तजुर्बेकार ब्लागर और इनके मित्र श्रीमान चौबे ब्लागिंग के नए नए रंगरूट. जिन्हे इस अद्भुत संसार में आए हुए ही मुश्किल से जुम्मा जुम्मा चार दिन ही हुए होंगें ओर इन्हे इस जंगल में धकेलने वाले भी यही दोनो मित्र थे....मिश्रा और अनोखेलाल.
तो जी, पार्क में ब्लागर मीट माफ कीजिएगा मित्रों की गुफ्तगू चल रही है. जहाँ मिश्रा और अनोखेलाल खूब प्रसन्न एवं गर्वित भाव से अपनी अपनी पोस्टें, उन पर सावन की बरसात की माफिक झमाझम बरसती टिप्पणियों, अपनी सीनियोरटी, फालोवर संख्या, सक्रियता क्रमांक, ब्लाग ट्रैफिक, अलैक्सा रैंक इत्यादि गहन विषयों पर विचारमग्न थे, वहीं बेचारे चौबे जी मुँह लटकाए उनके धीर च गम्भीर वार्तालाप को समझने के अफसल प्रयास में लगे हुए थे. जब इत्ती देर बीत जाने के बाद भी उनके कुछ पल्ले न पडा तो श्रीमान चौबे बातों का रूख अपनी ओर मोडने के लिए बीच में बोल पडे " मिश्रा जी, पता नहीं आप लोग किस बात पर इसकी शान में कसीदे पढते रहते हैं, जब कि हमें तो ब्लागिंग में आकर ऎसा कुछ खास मजा नहीं आया"
"क्यूँ भाई तुम्हें ऎसा क्यूँ लगा कि ब्लागिंग में कोई रस नहीं है" मिश्रा जी नें हैरान हो सवाल पूछ डाला.
" आप ही देखिए! हमें यहाँ आए हुए पूरे पन्द्रह दिन हो गए. इन पन्द्रह दिनों में हमने हर रोज साहित्य की किसी न किसी विधा पर रोजाना कम से कम एक पोस्ट लिखी है. ये तो अपने अनोखेलाल जी है जो हमारी हर पोस्ट को बडे चाव से पढकर टिप्पणी से नवाज जाते हैं. वर्ना तो आज तक हमारे ब्लाग पर कोई कुता तक भी झाँकने नहीं आया. पढना और पढ्कर टिप्पणी देना तो बहुत दूर की बात है. हाँ जिस दिन हमने ब्लाग लिखना शुरू किया था, उस दिन पहली पोस्ट पर जरूर साहित्यप्रेमियों की लाईन लगी हुई थी. कोई कह रहा था कि आपका हिन्दी ब्लागजगत में स्वागत है. हम आपकी विद्वता को नमन करते हैं. कोई कहे हिन्दी के उत्थान हेतु इस ब्लॉग जगत को आप जैसी प्रतिभाओं की बहुत जरूरत है.--- हम भी फूल कर कुप्पा हुई जा रहे थे कि वाह्! इन्हे कहते हैं साहित्यप्रेमी! विद्वता के सच्चे पारखी! लेकिन वो दिन है ओर आज का दिन उन लोगों में से एक जन भी दुबारा से ब्लाग पर झाँकने नहीं आया. यूँ गायब हुए मानो गधे के सिर से सींग. भाई हमने बिलाग पे काँटे बिखेर रखे हैं क्या जो किसी को चुभ जाएंगें" श्रीमान चौबे जी न जाने किस रौ में बहे अपनी पीडा का इजहार करते चले गए.
"लगता है आप अभी हिन्दी ब्लागिंग के तौर तरीकों से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हैं. बताईये भला सिर्फ निरे लेखन के बूते भी भला यहाँ कोई टिक पाया है!" मिश्रा जी नें भी अपनी अनुभवशीलता की झलक दिखला ही दी.
अनोखे लाल जी भी झट से बोल पडे " अजी मिश्रा जी! अब क्या बतायें. इस बारे में ये हमारी बात तो सुनते ही नहीं. मैने सैंकडों दफे इन्हे समझाया कि भाई किसी बडे नामचीन से ग्रुप से जुड जाओ. थोडी बहुत चमचागिरी करनी सीख जाओ तो तुम्हारा भी कुछ भला हो जाए. लेकिन नहीं, ये महाश्य तो बात सुनते ही भडक जाते हैं. कहते हैं" मैं किसी की खुशामद करके ब्लाग चमकाने से ब्लाग न लिखना बेहतर समझूँगा" अब आप ही देखिए मिश्रा जी, आज के जमाने में ये कैसी दकिसानूसी सोच रखे हुए हैं "
मिश्रा जी कुछ न बोले, लेकिन इतना जरूर समझ गए कि इस भले आदमी पर आदर्शवाद का कच्चा रंग चढा हुआ है. बिना बारिश के धुलने वाला नहीं. और जब तक यह रंग नहीं उतरेगा तब तक ब्लागिंग में इन्हे कोई पूछने वाला भी नहीं.
खैर मिश्रा जी चौबे महाश्य को अकेले में एक तरह ले गए और बहुत देर तक पता नहीं क्या कुछ समझाते रहे. अब ये तो नहीं पता कि उन दोनों में क्या बाते हुईं लेकिन चौबे जी की मुखमुद्रा देख कर आभास हुआ कि मिश्रा जी की समझाईश कामयाब रही.
अपना अनुभवजन्य ज्ञान बाँटने के बाद मिश्रा जी अनोखेलाल के पास आए और कहने लगे "अनोखेलाल जी, समझिए कि मैने इन्हे ब्लागिंग शास्त्र का सम्पूर्ण पाठ पढा दिया है. किसी आवश्यक कार्य के कारण मैं अभी कुछ दिन ब्लागिंग से दूर हूँ. अब ये आपके जिम्मे रहा कि आप कुछ दिन तक इनके व्यवहारिक ज्ञान की प्रोगरेस रिपोर्ट निरन्तर मुझे ईमेल करते रहें.
कुछ दिनों तक अनोखेलाल जी ने इस नए रंगरूट के क्रियाकलापों को परखा और पहली रिपोर्ट मिश्रा जी को वाया ईमेल भेज दी " थोडे बहुत झटके खाकर और एक दो जगह लतियाये जाने के बाद अब चौबे महाश्य जय गुरूदेव! जय गुरूदेव! भजते व्यवहारिकता की पहली सीढी चढ गए हैं. कईं नामी ग्रुपबाजों के यहाँ रोजाना हाजिरी भरने तो जाते हैं,लेकिन अभी तक किसी की कृ्पादृ्ष्टि हो नहीं पाई. किन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं खुशामद से तो देवता तक प्रसन्न हो जाते हैं, ये तो फिर भी हिन्दी के ब्लागर है. चाटुकारिता की महिमा अपरम्पार है. ब्लागेश्वर जल्द ही इन पर कृ्पा करेंगें"
खैर चौबे जी खुशामद का सहारा ले पहली सीढी तो चढ चुके. अब देखना सिर्फ ये बाकी है कि कब तक अन्तिम पायदान तक पहुँच पाते हैं....बाकी, ट्रेनिंग तो उनकी अभी चल ही रही है.......:)
तो जी, पार्क में ब्लागर मीट माफ कीजिएगा मित्रों की गुफ्तगू चल रही है. जहाँ मिश्रा और अनोखेलाल खूब प्रसन्न एवं गर्वित भाव से अपनी अपनी पोस्टें, उन पर सावन की बरसात की माफिक झमाझम बरसती टिप्पणियों, अपनी सीनियोरटी, फालोवर संख्या, सक्रियता क्रमांक, ब्लाग ट्रैफिक, अलैक्सा रैंक इत्यादि गहन विषयों पर विचारमग्न थे, वहीं बेचारे चौबे जी मुँह लटकाए उनके धीर च गम्भीर वार्तालाप को समझने के अफसल प्रयास में लगे हुए थे. जब इत्ती देर बीत जाने के बाद भी उनके कुछ पल्ले न पडा तो श्रीमान चौबे बातों का रूख अपनी ओर मोडने के लिए बीच में बोल पडे " मिश्रा जी, पता नहीं आप लोग किस बात पर इसकी शान में कसीदे पढते रहते हैं, जब कि हमें तो ब्लागिंग में आकर ऎसा कुछ खास मजा नहीं आया"
"क्यूँ भाई तुम्हें ऎसा क्यूँ लगा कि ब्लागिंग में कोई रस नहीं है" मिश्रा जी नें हैरान हो सवाल पूछ डाला.
" आप ही देखिए! हमें यहाँ आए हुए पूरे पन्द्रह दिन हो गए. इन पन्द्रह दिनों में हमने हर रोज साहित्य की किसी न किसी विधा पर रोजाना कम से कम एक पोस्ट लिखी है. ये तो अपने अनोखेलाल जी है जो हमारी हर पोस्ट को बडे चाव से पढकर टिप्पणी से नवाज जाते हैं. वर्ना तो आज तक हमारे ब्लाग पर कोई कुता तक भी झाँकने नहीं आया. पढना और पढ्कर टिप्पणी देना तो बहुत दूर की बात है. हाँ जिस दिन हमने ब्लाग लिखना शुरू किया था, उस दिन पहली पोस्ट पर जरूर साहित्यप्रेमियों की लाईन लगी हुई थी. कोई कह रहा था कि आपका हिन्दी ब्लागजगत में स्वागत है. हम आपकी विद्वता को नमन करते हैं. कोई कहे हिन्दी के उत्थान हेतु इस ब्लॉग जगत को आप जैसी प्रतिभाओं की बहुत जरूरत है.--- हम भी फूल कर कुप्पा हुई जा रहे थे कि वाह्! इन्हे कहते हैं साहित्यप्रेमी! विद्वता के सच्चे पारखी! लेकिन वो दिन है ओर आज का दिन उन लोगों में से एक जन भी दुबारा से ब्लाग पर झाँकने नहीं आया. यूँ गायब हुए मानो गधे के सिर से सींग. भाई हमने बिलाग पे काँटे बिखेर रखे हैं क्या जो किसी को चुभ जाएंगें" श्रीमान चौबे जी न जाने किस रौ में बहे अपनी पीडा का इजहार करते चले गए.
"लगता है आप अभी हिन्दी ब्लागिंग के तौर तरीकों से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हैं. बताईये भला सिर्फ निरे लेखन के बूते भी भला यहाँ कोई टिक पाया है!" मिश्रा जी नें भी अपनी अनुभवशीलता की झलक दिखला ही दी.
अनोखे लाल जी भी झट से बोल पडे " अजी मिश्रा जी! अब क्या बतायें. इस बारे में ये हमारी बात तो सुनते ही नहीं. मैने सैंकडों दफे इन्हे समझाया कि भाई किसी बडे नामचीन से ग्रुप से जुड जाओ. थोडी बहुत चमचागिरी करनी सीख जाओ तो तुम्हारा भी कुछ भला हो जाए. लेकिन नहीं, ये महाश्य तो बात सुनते ही भडक जाते हैं. कहते हैं" मैं किसी की खुशामद करके ब्लाग चमकाने से ब्लाग न लिखना बेहतर समझूँगा" अब आप ही देखिए मिश्रा जी, आज के जमाने में ये कैसी दकिसानूसी सोच रखे हुए हैं "मिश्रा जी कुछ न बोले, लेकिन इतना जरूर समझ गए कि इस भले आदमी पर आदर्शवाद का कच्चा रंग चढा हुआ है. बिना बारिश के धुलने वाला नहीं. और जब तक यह रंग नहीं उतरेगा तब तक ब्लागिंग में इन्हे कोई पूछने वाला भी नहीं.
खैर मिश्रा जी चौबे महाश्य को अकेले में एक तरह ले गए और बहुत देर तक पता नहीं क्या कुछ समझाते रहे. अब ये तो नहीं पता कि उन दोनों में क्या बाते हुईं लेकिन चौबे जी की मुखमुद्रा देख कर आभास हुआ कि मिश्रा जी की समझाईश कामयाब रही.
अपना अनुभवजन्य ज्ञान बाँटने के बाद मिश्रा जी अनोखेलाल के पास आए और कहने लगे "अनोखेलाल जी, समझिए कि मैने इन्हे ब्लागिंग शास्त्र का सम्पूर्ण पाठ पढा दिया है. किसी आवश्यक कार्य के कारण मैं अभी कुछ दिन ब्लागिंग से दूर हूँ. अब ये आपके जिम्मे रहा कि आप कुछ दिन तक इनके व्यवहारिक ज्ञान की प्रोगरेस रिपोर्ट निरन्तर मुझे ईमेल करते रहें.
कुछ दिनों तक अनोखेलाल जी ने इस नए रंगरूट के क्रियाकलापों को परखा और पहली रिपोर्ट मिश्रा जी को वाया ईमेल भेज दी " थोडे बहुत झटके खाकर और एक दो जगह लतियाये जाने के बाद अब चौबे महाश्य जय गुरूदेव! जय गुरूदेव! भजते व्यवहारिकता की पहली सीढी चढ गए हैं. कईं नामी ग्रुपबाजों के यहाँ रोजाना हाजिरी भरने तो जाते हैं,लेकिन अभी तक किसी की कृ्पादृ्ष्टि हो नहीं पाई. किन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं खुशामद से तो देवता तक प्रसन्न हो जाते हैं, ये तो फिर भी हिन्दी के ब्लागर है. चाटुकारिता की महिमा अपरम्पार है. ब्लागेश्वर जल्द ही इन पर कृ्पा करेंगें"
खैर चौबे जी खुशामद का सहारा ले पहली सीढी तो चढ चुके. अब देखना सिर्फ ये बाकी है कि कब तक अन्तिम पायदान तक पहुँच पाते हैं....बाकी, ट्रेनिंग तो उनकी अभी चल ही रही है.......:)
शुक्रवार, 11 जून 2010
हे पंगेच्छु ब्लागर !!!
हे पंगेच्छु ब्लागर!
तुम्हारे अंतस का ब्लागर कीट
नित्य नए पंगें का सृ्जन करता है
और करता है रूप बदल
नित्य नईं बकवास.....
नैट पर आते ही
अपने कलुषित मन
रूपी गधे पर सवार हो
प्रस्थित हो जाते हो तुम
किसी नए पंगें की खोज में....
और पंगों के नित्य नवीन
प्रयोग करके भी तुम
क्या हासिल कर पाते हो ?
महज चन्द टिप्पणियाँ!
और कुछ समानधर्मी
ब्लागरों की वाह! वाह!
किन्तु सच बताना.....
क्या तुम इन तुच्छ प्राप्तियों को
अपनी प्रयोगधर्मिता
एवं अनथक श्रम का
सही मूल्यांकन मानते हो ?
*बस यूँ ही,कविता/फविता जैसा कुछ :)
तुम्हारे अंतस का ब्लागर कीट
नित्य नए पंगें का सृ्जन करता है
और करता है रूप बदल
नित्य नईं बकवास.....
नैट पर आते ही
अपने कलुषित मन
रूपी गधे पर सवार हो
प्रस्थित हो जाते हो तुम
किसी नए पंगें की खोज में....
और पंगों के नित्य नवीन
प्रयोग करके भी तुम
क्या हासिल कर पाते हो ?
महज चन्द टिप्पणियाँ!
और कुछ समानधर्मी
ब्लागरों की वाह! वाह!
किन्तु सच बताना.....
क्या तुम इन तुच्छ प्राप्तियों को
अपनी प्रयोगधर्मिता
एवं अनथक श्रम का
सही मूल्यांकन मानते हो ?
*बस यूँ ही,कविता/फविता जैसा कुछ :)
बुधवार, 9 जून 2010
इज्जतदार आम आदमी
वह उदास और परेशान सा मेरे पास आया. उसके चेहरे पर घबराहट के चिन्ह स्पष्ट दिखलाई पड रहे थे. मैने पूछा "क्या हुआ! ये इतने घबराए हुए से क्यूं हो ?"
बोला" देख नहीं रहे, चारों तरह क्या हो रहा है. हत्याएं, लूट-खसोट, भुठमेड और गुण्डागर्दी का नंगा नाच हो रहा है.अपने मोहल्ले मे तो आज सुबह पुलिस फाईरिंग भी हुई थी और अब पुलिस सारे मोहल्ले की तलाशी लेती घूम रही है. अब क्या करें?"
"मगर तुमको किस बात की फिक्र हो रही है भाई ?"
"बताईये हमको फिक्र नहीं होगी तो फिर किसे होगी?" उसके लज्फों से घबराहट अब भी झलक रही थी.
"क्यूँ ? तुम क्या कोई चोर डाकू हो?"
"नहीं"
"तो किसी का खून-वून किया या किसी दंगे वगैरह में हाथ होगा"
"अरे राम-राम्! कैसी बातें कर रहे हैं आप"
"तो फिर क्या कोई बहुत बडे सेठ साहूकार हो कि जिसने घर में ब्लैक मनी छिपा रखी है?"
"नहीं भाई नहीं. आप तो जानते ही हैं कि मैं तो एक साधारण सा दुकानदार हूँ बस"
"अरे भाई जब तुमने कुछ किया ही नहीं तो फिर पुलिस की सर्च से तुम्हे किस बात का डर. तुम कोई गुंडे बदमाश हो तो बताओ"
"अजी ऎसा कुछ होता तो फिर डर ही किस बात का था ?" वह कांपता सा बोल उठा " बस इज्जतदार आदमी हूँ इसीलिए.........."
इतना कहकर वो तो चुपचाप चला गया. मगर लग रहा है कि, मानो वो जाते जाते अपने डर में मुझे भागीदार बना गया.....
बोला" देख नहीं रहे, चारों तरह क्या हो रहा है. हत्याएं, लूट-खसोट, भुठमेड और गुण्डागर्दी का नंगा नाच हो रहा है.अपने मोहल्ले मे तो आज सुबह पुलिस फाईरिंग भी हुई थी और अब पुलिस सारे मोहल्ले की तलाशी लेती घूम रही है. अब क्या करें?"
"मगर तुमको किस बात की फिक्र हो रही है भाई ?"
"बताईये हमको फिक्र नहीं होगी तो फिर किसे होगी?" उसके लज्फों से घबराहट अब भी झलक रही थी.
"क्यूँ ? तुम क्या कोई चोर डाकू हो?"
"नहीं"
"तो किसी का खून-वून किया या किसी दंगे वगैरह में हाथ होगा"
"अरे राम-राम्! कैसी बातें कर रहे हैं आप"
"तो फिर क्या कोई बहुत बडे सेठ साहूकार हो कि जिसने घर में ब्लैक मनी छिपा रखी है?"
"नहीं भाई नहीं. आप तो जानते ही हैं कि मैं तो एक साधारण सा दुकानदार हूँ बस"
"अरे भाई जब तुमने कुछ किया ही नहीं तो फिर पुलिस की सर्च से तुम्हे किस बात का डर. तुम कोई गुंडे बदमाश हो तो बताओ"
"अजी ऎसा कुछ होता तो फिर डर ही किस बात का था ?" वह कांपता सा बोल उठा " बस इज्जतदार आदमी हूँ इसीलिए.........."
इतना कहकर वो तो चुपचाप चला गया. मगर लग रहा है कि, मानो वो जाते जाते अपने डर में मुझे भागीदार बना गया.....
गुरुवार, 3 जून 2010
सोच रहा हूँ कि क्या लिखा जाए और क्यूँ लिखा जाए !!!
अब इसे मौसम का असर कहा जाए कि माहौल का; पता नहीं क्यों अब कुछ भी लिखने पढने को मन ही नहीं करता. शायद ब्लागिंग का वो पहले वाला रस अब चला गया है. पहले कभी कुछ लिखते थे तो चाहे उसे पढने वालों को बेशक आनन्द न आए लेकिन हमें लिखने में तो खूब आया करता था. लेकिन अब वो बात नहीं रही........अब पहले तो लिखने का कुछ मन ही नहीं करता, अगर कहीं अनमने भाव से ही सही लिखने बैठ भी गए तो यूँ लगता है कि मानो शब्द हडताल पर उतर आए हों.....एकदम विचार शून्यता की स्थिति.
आज ही की बात है, बेमन से लिखने बैठे भी तो ऎसा कोई विषय ही नहीं सुझाई दिया कि जिसपर कुछ देर खिटरपिटर की जा सके. न जाने कितनी देर यूँ ही बैठे बैठे कभी डैशबोर्ड को देखता, कभी की-बोर्ड की ओर तो कभी मूषक महाराज की ओर लेकिन तीनों ढाक के तीन पात की तरह अलग ही नजर आते. इन तीनों का अस्तित्व मुझे बिल्कुल ही विरोधी जान पडने लगा. मैनें कीबोर्ड से कईं बार हाथों का स्पर्श कराया; पर कुछ काम न बना.
न जाने देवी, देवता, पितर वगैरह किन किन का स्मरण करके देख लिया लेकिन किसी को भी तरस न आया. कम से कम एक घंटा यूँ ही कभी माऊस, कभी की-बोर्ड तो कभी डैशबोर्ड को देखते बीत गया, लेकिन जैसा कि न तो कुछ लिखा जाना था, ओर न ही लिखा गया. उल्टे इस एक घंटे की अवधि में चार कप चाय और तीन गिलास पानी जरूर गटक लिए, सोचा कि शायद किसी तरह से दिमाग की अकर्मन्यता दूर हो; पर सब उपचार व्यर्थ गए. परेशान होकर एक दो बार सोचा भी कि छोडो यार! कम्पयूटर बन्द करके सोया जाए...क्या रखा है इस झंझट में; पर "जब तक साँस तब तक आस" ने वो भी न करने दिया.
कहते हैं कि जब मनुष्य निरूपाय हो जाता है तो फिर वो मूर्खता पर कमर कसता है. कभी कभी ऎसा भी समय आ जाता है कि जब अच्छे अच्छे विद्वानों की बुद्धि मात खा जाती है, तो भला हमारी क्या बिसात. हम तो यूँ भी कभी अपने आपको कोई खास समझदार नहीं समझते.
मैने जब अच्छी तरह देख लिया कि अब कोई चारा नहीं, दिमाग में कैसा भी कोई आईडिया आ ही नहीं रहा तो अब एक ही हल है कि नैट से कोई एक ऊलजलूल सी तस्वीर खोजकर, उसका कोई आलतू फालतू सा शीर्षक देकर ही एक पोस्ट ठेल दी जाए. ज्यों ज्यों मैं गौर करता गया, मुझे एक यही विचार समायोजित और उपयुक्त जान पडने लगा. कारण ये कि इसमें नुक्सान तो कुछ था ही नहीं; टिप्पणियाँ तो अपने को उस पर भी मिल ही जानी है. आखिर अपने भी तो कुछ बन्धे बँधाए ग्राहक हैं ही:).......भले ही बेशक भाई लोग झूठमूठ की वाह! वाह्! बहुत बढिया! जैसी टिप्पणियाँ चिपका के चलते बने(वैसे भी यहाँ कौन किसी की सच्ची तारीफ करता है) ओर बाद में मन ही मन कुढते रहें ओर पोस्ट को बकवास करार देकर जी भर गालियाँ निकालें या कि टिप्पणी देने की मजबूरी को कोसें.......क्या फर्क पडने वाला है! वैसे भी अपना काम तो हो गया.......एक पोस्ट ठेलनी थी, ठेल दी..बस! चलते हैं---जै राम जी की! :-)
कहते हैं कि किसी लेखक के लिए उसके पाठक गुरू समान होते है,जो उसके लेखन को दिशा प्रदान करते हैं; ओर ये भी सुना है कि गुरू लोगों के दिल दरिया में अक्सर दया की मौजें उठा करती हैं :-)
आज ही की बात है, बेमन से लिखने बैठे भी तो ऎसा कोई विषय ही नहीं सुझाई दिया कि जिसपर कुछ देर खिटरपिटर की जा सके. न जाने कितनी देर यूँ ही बैठे बैठे कभी डैशबोर्ड को देखता, कभी की-बोर्ड की ओर तो कभी मूषक महाराज की ओर लेकिन तीनों ढाक के तीन पात की तरह अलग ही नजर आते. इन तीनों का अस्तित्व मुझे बिल्कुल ही विरोधी जान पडने लगा. मैनें कीबोर्ड से कईं बार हाथों का स्पर्श कराया; पर कुछ काम न बना.
न जाने देवी, देवता, पितर वगैरह किन किन का स्मरण करके देख लिया लेकिन किसी को भी तरस न आया. कम से कम एक घंटा यूँ ही कभी माऊस, कभी की-बोर्ड तो कभी डैशबोर्ड को देखते बीत गया, लेकिन जैसा कि न तो कुछ लिखा जाना था, ओर न ही लिखा गया. उल्टे इस एक घंटे की अवधि में चार कप चाय और तीन गिलास पानी जरूर गटक लिए, सोचा कि शायद किसी तरह से दिमाग की अकर्मन्यता दूर हो; पर सब उपचार व्यर्थ गए. परेशान होकर एक दो बार सोचा भी कि छोडो यार! कम्पयूटर बन्द करके सोया जाए...क्या रखा है इस झंझट में; पर "जब तक साँस तब तक आस" ने वो भी न करने दिया.
कहते हैं कि जब मनुष्य निरूपाय हो जाता है तो फिर वो मूर्खता पर कमर कसता है. कभी कभी ऎसा भी समय आ जाता है कि जब अच्छे अच्छे विद्वानों की बुद्धि मात खा जाती है, तो भला हमारी क्या बिसात. हम तो यूँ भी कभी अपने आपको कोई खास समझदार नहीं समझते.
मैने जब अच्छी तरह देख लिया कि अब कोई चारा नहीं, दिमाग में कैसा भी कोई आईडिया आ ही नहीं रहा तो अब एक ही हल है कि नैट से कोई एक ऊलजलूल सी तस्वीर खोजकर, उसका कोई आलतू फालतू सा शीर्षक देकर ही एक पोस्ट ठेल दी जाए. ज्यों ज्यों मैं गौर करता गया, मुझे एक यही विचार समायोजित और उपयुक्त जान पडने लगा. कारण ये कि इसमें नुक्सान तो कुछ था ही नहीं; टिप्पणियाँ तो अपने को उस पर भी मिल ही जानी है. आखिर अपने भी तो कुछ बन्धे बँधाए ग्राहक हैं ही:).......भले ही बेशक भाई लोग झूठमूठ की वाह! वाह्! बहुत बढिया! जैसी टिप्पणियाँ चिपका के चलते बने(वैसे भी यहाँ कौन किसी की सच्ची तारीफ करता है) ओर बाद में मन ही मन कुढते रहें ओर पोस्ट को बकवास करार देकर जी भर गालियाँ निकालें या कि टिप्पणी देने की मजबूरी को कोसें.......क्या फर्क पडने वाला है! वैसे भी अपना काम तो हो गया.......एक पोस्ट ठेलनी थी, ठेल दी..बस! चलते हैं---जै राम जी की! :-)
कहते हैं कि किसी लेखक के लिए उसके पाठक गुरू समान होते है,जो उसके लेखन को दिशा प्रदान करते हैं; ओर ये भी सुना है कि गुरू लोगों के दिल दरिया में अक्सर दया की मौजें उठा करती हैं :-)
सोमवार, 31 मई 2010
आँख के सामने क्यूँ अन्धेरा है
क्यों जम्हाई आ रही है बेतरह
इस तरह से आँख क्यों है झप रही
देख लो चहुँ ओर क्या है हो रहा
बात सुन लो, आँख खोलो तो सही..........
सच की समझ तुम जो नहीं रखते
तो क्यों न रूचें तुम्हें घुनी बातें
सच को सच कहें कैसे
जब सुनी हैं बनी चुनी बातें.......
आँख खोलिए तनिक जतन करिये
जागिए हो रहा सवेरा है
बन गये हो किसलिए अन्धे
आँख के सामने क्यूँ अन्धेरा है........
इस तरह से आँख क्यों है झप रही
देख लो चहुँ ओर क्या है हो रहा
बात सुन लो, आँख खोलो तो सही..........
सच की समझ तुम जो नहीं रखते
तो क्यों न रूचें तुम्हें घुनी बातें
सच को सच कहें कैसे
जब सुनी हैं बनी चुनी बातें.......
आँख खोलिए तनिक जतन करिये
जागिए हो रहा सवेरा है
बन गये हो किसलिए अन्धे
आँख के सामने क्यूँ अन्धेरा है........
शनिवार, 29 मई 2010
मनोविज्ञान---मन का विज्ञान या आत्मा का ?
मनोविज्ञान अर्थात मन का विज्ञान । शाब्दिक अर्थ यानि अध्ययन की वह शाखा जो कि मन का अध्ययन करती है । जिसे कि अंग्रेजी में साईकोलोजी(psychology) कहा जाता है । इस शब्द की उत्पति यूनानी भाषा के दो शब्दों साईकी ( psyche) तथा लोगस (logos) से मिलकर हुई है । साईकी का अर्थ होता है ---आत्मा(soul ) तथा लोगस का अर्थ है---अध्ययन ( study ) ।
इसका शाब्दिक अर्थ हुआ---आत्मा का अध्ययन । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि साईकोलोजी शन्द की उत्पति अध्ययन के उस क्षेत्र को इंगित करने के लिए हुई थी--जिससे कि आत्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सके । परन्तु वर्तमान समय में मनोविज्ञान और साईकोलोजी इन दोनों शन्दों के शाब्दिक अर्थों को स्वीकार नहीं किया जाता है । वास्तव में शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान का प्रयोग दर्शन शास्त्र की एक अलग शाखा के रूप में हुआ था । परन्तु आधुनिक काल में हुए परिवर्तनों के फलस्वरूप धीरे धीरे मनोवैज्ञानिकों नें इस विषय को दर्शन शास्त्र से बिल्कुल पृ्थक ही कर डाला, जो कि आज एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकार किया जाता है । दर्शन शस्त्र से अलग होने के क्रम में इसके अर्थ में अनेकों बार परिवर्तन हुए ।
1. आत्मा के विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान :- यदि आज से शताब्दियों पूर्व प्रश्न किया जाता कि मनोविज्ञान क्या है ? तो संभवत: इसका उत्तर यही मिलता,जैसा कि पहले इसके शाब्दिक अर्थ में मैं आपको बता चुका हूँ । अरस्तु,प्लेटो,डेकार्ट इत्यादि विद्वान यूनानी दार्शनिकों ने इसे उसी आत्मा के अध्ययन की विद्या के रूप में स्वीकार किया है । मनोविज्ञान की यह परिभाषा 16वीं शताब्दी तक प्रचलित रही, लेकिन बाद में आत्मा की प्रकृ्ति के संबंध में शंकाए उत्पन होने लगी तथा तात्कालीन मनोवैज्ञानिक( दार्शनिक) आत्मा की स्पष्ट परिभाषा, उसके स्वरूप, आकार-प्रकार, उसकी स्थिति तथा आत्मा के अध्ययन करने की विधियों को स्पष्ट करने में असफल रहे । परिणामत: 16वीं शताब्दी में मनोविज्ञान की इस परिभाषा को अस्वीकार कर दिया गया । आत्मा के विषय को अस्वीकृ्त करने के पश्चात इसे मस्तिष्क विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया । दूसरे शब्दों में उन्होने मनोविज्ञान को अध्ययन का वह क्षेत्र माना जिसके जरिए मस्तिष्क या मन का अध्ययन किया जा सके । परन्तु मस्तिष्क के अर्थ के सम्बंध में भी वही कठिनाई हुई जो कि आत्मा के विषय में थी । मनोवैज्ञानिक मस्तिष्क की भी प्रकृ्ति तथा स्वरूप को स्पष्ट रूप से निर्धारित न कर सके । किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुंच पाने के कारण मनोविज्ञान की यह परिभाषा भी शीघ्र ही अमान्य हो गई ।
उसके कुछ समय पश्चात इसे चेतना के विज्ञान के रूप में जाना जाने लगा । विलियम जेम्स, विलियम वुड और जेम्स सली इत्यादि मनोवैज्ञानिकों नें इसे चेतन विज्ञान के रूप में ही स्वीकार किया है । लेकिन ये लोग भी चेतन शब्द के अर्थ तथा स्वरूप के सम्बंध में एकमत न हो सके । क्यों कि चेतन क्रियायों पर अर्द्धचेतन व अचेतन क्रियायों का प्रभाव भी होने के कारण गम्भीर मतभेद उत्पन होने लगे तथा इसे मनोविज्ञान की एक अपूर्ण परिभाषा माना जाने लगा । परिणामत: सीमित अर्थ होने के कारण मनोविज्ञान की यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।
बीसवीं शताब्दी में जाकर मनोविज्ञान को व्यवहारिक विज्ञान के रूप में स्वीकार किया जाने लगा । वाटसन,वुडवर्थ इत्यादि मनोवैज्ञानिकों नें इसे व्यवहार का एक निश्चित विज्ञान ही स्वीकार किया है ।
स्पष्ट है कि मानव जाति के ज्ञान में वृ्द्धि के साथ साथ मनोविज्ञान के अर्थ में कईं परिवर्तन आए ।
वुडवर्थ के शब्दों में कहा जाए " सर्वप्रथम मनोविज्ञान ने अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मस्तिष्क का, उसके बाद इसने अपनी चेतना का भी त्याग कर डाला, अब यह व्यवहार की विधि को स्वीकार करता है " ।
first psychology lost its soul, then mind, then it lost its consciousness, it still has behaviour of sort .
यानि कि हम कह सकते हैं कि आधुनिक मनोविज्ञान आज उस स्तर पर खडा है, जहाँ आकर वो आत्मा, मस्तिष्क और चेतना--इन तीनों शक्तियों से हीन हो चुका है......
इसका शाब्दिक अर्थ हुआ---आत्मा का अध्ययन । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि साईकोलोजी शन्द की उत्पति अध्ययन के उस क्षेत्र को इंगित करने के लिए हुई थी--जिससे कि आत्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सके । परन्तु वर्तमान समय में मनोविज्ञान और साईकोलोजी इन दोनों शन्दों के शाब्दिक अर्थों को स्वीकार नहीं किया जाता है । वास्तव में शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान का प्रयोग दर्शन शास्त्र की एक अलग शाखा के रूप में हुआ था । परन्तु आधुनिक काल में हुए परिवर्तनों के फलस्वरूप धीरे धीरे मनोवैज्ञानिकों नें इस विषय को दर्शन शास्त्र से बिल्कुल पृ्थक ही कर डाला, जो कि आज एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकार किया जाता है । दर्शन शस्त्र से अलग होने के क्रम में इसके अर्थ में अनेकों बार परिवर्तन हुए ।
1. आत्मा के विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान :- यदि आज से शताब्दियों पूर्व प्रश्न किया जाता कि मनोविज्ञान क्या है ? तो संभवत: इसका उत्तर यही मिलता,जैसा कि पहले इसके शाब्दिक अर्थ में मैं आपको बता चुका हूँ । अरस्तु,प्लेटो,डेकार्ट इत्यादि विद्वान यूनानी दार्शनिकों ने इसे उसी आत्मा के अध्ययन की विद्या के रूप में स्वीकार किया है । मनोविज्ञान की यह परिभाषा 16वीं शताब्दी तक प्रचलित रही, लेकिन बाद में आत्मा की प्रकृ्ति के संबंध में शंकाए उत्पन होने लगी तथा तात्कालीन मनोवैज्ञानिक( दार्शनिक) आत्मा की स्पष्ट परिभाषा, उसके स्वरूप, आकार-प्रकार, उसकी स्थिति तथा आत्मा के अध्ययन करने की विधियों को स्पष्ट करने में असफल रहे । परिणामत: 16वीं शताब्दी में मनोविज्ञान की इस परिभाषा को अस्वीकार कर दिया गया । आत्मा के विषय को अस्वीकृ्त करने के पश्चात इसे मस्तिष्क विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया । दूसरे शब्दों में उन्होने मनोविज्ञान को अध्ययन का वह क्षेत्र माना जिसके जरिए मस्तिष्क या मन का अध्ययन किया जा सके । परन्तु मस्तिष्क के अर्थ के सम्बंध में भी वही कठिनाई हुई जो कि आत्मा के विषय में थी । मनोवैज्ञानिक मस्तिष्क की भी प्रकृ्ति तथा स्वरूप को स्पष्ट रूप से निर्धारित न कर सके । किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुंच पाने के कारण मनोविज्ञान की यह परिभाषा भी शीघ्र ही अमान्य हो गई ।
उसके कुछ समय पश्चात इसे चेतना के विज्ञान के रूप में जाना जाने लगा । विलियम जेम्स, विलियम वुड और जेम्स सली इत्यादि मनोवैज्ञानिकों नें इसे चेतन विज्ञान के रूप में ही स्वीकार किया है । लेकिन ये लोग भी चेतन शब्द के अर्थ तथा स्वरूप के सम्बंध में एकमत न हो सके । क्यों कि चेतन क्रियायों पर अर्द्धचेतन व अचेतन क्रियायों का प्रभाव भी होने के कारण गम्भीर मतभेद उत्पन होने लगे तथा इसे मनोविज्ञान की एक अपूर्ण परिभाषा माना जाने लगा । परिणामत: सीमित अर्थ होने के कारण मनोविज्ञान की यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।
बीसवीं शताब्दी में जाकर मनोविज्ञान को व्यवहारिक विज्ञान के रूप में स्वीकार किया जाने लगा । वाटसन,वुडवर्थ इत्यादि मनोवैज्ञानिकों नें इसे व्यवहार का एक निश्चित विज्ञान ही स्वीकार किया है ।
स्पष्ट है कि मानव जाति के ज्ञान में वृ्द्धि के साथ साथ मनोविज्ञान के अर्थ में कईं परिवर्तन आए ।
वुडवर्थ के शब्दों में कहा जाए " सर्वप्रथम मनोविज्ञान ने अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मस्तिष्क का, उसके बाद इसने अपनी चेतना का भी त्याग कर डाला, अब यह व्यवहार की विधि को स्वीकार करता है " ।
first psychology lost its soul, then mind, then it lost its consciousness, it still has behaviour of sort .
यानि कि हम कह सकते हैं कि आधुनिक मनोविज्ञान आज उस स्तर पर खडा है, जहाँ आकर वो आत्मा, मस्तिष्क और चेतना--इन तीनों शक्तियों से हीन हो चुका है......
गुरुवार, 27 मई 2010
बुद्धिमानों का सम्मेलन और बनवारी लाल जी की मन की पीडा
बहुत पुरानी बात है कि एक बार देश की राजधानी दिल्ली में "बुद्धिमानों का सम्मेलन" आयोजित किया गया. जिसमे देश-विदेश के जाने माने बुद्धिमानों को आमन्त्रित किया गया. अब अपने बनवारी लाल जी को पता चला तो उनका मन भी हुआ कि चल के देखा तो जाए कि आखिर बुद्धिमानों का जमावडा कैसा होता है. इतने बडे बडे बुद्धिमान जुटेंगें तो शायद हमें भी उनसे कुछ सीखने को मिल जाए, शायद हमारी अल्पबुद्धि भी कुछ विस्तार पा जाए. सो, बनवारी लाल जी ने टिकट कटाई और चल पडे दिल्ली की ओर.....हालाँकि उन्हे इस सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए किसी की भी ओर से आमन्त्रित नहीं किया गया था......लेकिन फिर भी वो बेचारे अपना बेशकीमती समय बर्बाद करने का इरादा लिए चल पडे दिल वालों की नगरी दिल्ली की ओर. खैर जैसे तैसे खोजते खोजते वो उस आयोजन स्थल तक पहुँच ही गए. वहाँ पहुँचकर देखा तो माहौल बहुत अच्छा लगा. देश-विदेश से आए बडे बडे बुद्धिमान लोग एक बडी सी टेबल के चारो पर अपने अपने आसनों पर विराजमान आपस में किसी गम्भीर विषय पर विचारमग्न दिखाई दिए. हाँ कुछेक लोग ऎसे भी थे, जो कि आपस में हँसी ठिठोली में लगे हुए किन्तु बीच बीच में उपस्थित सदस्यों की ओर देखकर थोडी थोडी देर बाद अपनी मुंडी हिला दिया करते थे ओर फिर से अपनी हा-हा-ही-ही में मशगूल हो जाते.
अब समस्त बुद्धिमानों का आपसी विचार विमर्श चलता रहा, लेकिन अपने बनवारी लाल चुपचाप बैठे उन्हे सुनते रहे. हालाँकि वहाँ उपस्थित एक दो सज्जनों ने उन्हे कहा भी कि आप कुछ नहीं बोल रहे, आप भी अपने विचार रखें...........लेकिन बनवारी लाल जी तो गए ही सिर्फ ज्ञान प्रसाद लेने. वो भला क्या कहते. वैसे भी नीति यह कहती है कि ज्ञानियों की महफिल में अल्प बुद्धि वालों को हमेशा चुप ही रहना चाहिए वर्ना पोल खुलने का खतरा रहता है. सो, बनवारी लाल जी अपने बुद्धिमान होने का भ्रम बनाए रखने खातिर चुप्पी साधे बैठे रहे.
थोडी देर बाद सभा समाप्त हुई तो, आयोजकगण वहाँ उपस्थित सभी मेहमानों को भोजन का आग्रह करने लगे.
बनवारी लाल जी तो पहले ही उनके स्नेहभाव से अभिभूत थे, चाहकर भी उनके द्वारा बारम्बार किए गए इस विनम्र आग्रह को टाल न सके.......वैसे भी घर आए मेहमान का यथोचित आदर सत्कार करना न केवल इस देश में बल्कि सम्पूर्ण संसार में ही शिष्टता का आवश्यक अंग माना जाता है. ऊपर से बात यदि दिल्ली की हो, जिसे कि दिल वालों की नगरी कहा जाता है तो फिर तो कहने ही क्या.
खैर कहने का मतलब ये कि बनवारी लाल जी उनके द्वारा किए गए प्रेमपूर्वक आग्रह को टालने की धुष्टता न कर सके और भोजन पश्चात आयोजकगण की शिष्टता, मिलनसारिता एवं सत्कारभावना से अभिभूत सभी सदस्यों सहित विदा ली..........
अब यहाँ तक तो सब ठीक रहा.....किसी से कैसी भी कोई शिकायत नहीं बल्कि सच मानिए बनवारी प्रसन्न भाव से, पूरी तरह से आनन्दित हुए घर आए............चलिए ये अध्याय तो यहीं समाप्त हो जाता है.
लेकिन सम्मेलन के बहुत समय बाद की बात है कि एक दिन एक बुद्धिमान व्यक्ति उस सम्मेलन के औचित्य को लेकर कुछ सवाल खडे कर रहे थे तो भूलवश अपने बनवारी लाल जी का अचानक ही उधर को जाना हो गया. वहाँ प्रसंगवश उन्हे ये बात कहनी पडी कि "जी गलती से मैं भी उस सम्मेलन में उपस्थित था". बस इतना सुनना था कि वहाँ उपस्थित एक अन्य अशिष्ट, अभद्र व्यक्ति जो कि उस सम्मेलन मे भी उपस्थित थे लगे अपनी अशिष्टता का परिचय देने.....
कहने लगे कि " बनवारी लाल जी, आप सम्मेलन मे खाना तो बडे चपर-चपर कर खा रहे थे, अब आप अपने सम्मिलित होने को गलती बता रहे हैं".
हालाँकि अपने बनवारी लाल जी इतनी हैसियत रखते हैं कि बुद्धिमानी का नकाब पहले ऎसे औच्छे लोगों के पूरे खानदान को बरसों तक मुफ्त में घर बैठे खिला सकते हैं. लेकिन वो ठहरे सुसंस्कारित व्यक्ति,जो कि चाहकर भी उस स्तर पर नहीं उतर सकते जहाँ ये सभ्य समाज के तथाकथित सभ्य इन्सान खडे हैं.बनवारी लाल जी समझ नहीं पा रहे थे कि ऎसे घटिया लोगों को अपनी अशिष्टता का परिचय देने और अपनी औकात दिखाने से भला क्या हासिल हो जाता है...खैर ये तो वो लोग खुद जानें, हाँ इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि ऎसे लोगों के रहते इस दुनिया के भाग्य में अभी बहुत से दुर्दिन देखने बाकी है.......
खैर बेचारे बनवारी लाल जी अपनी आत्मा पर बोझ लिए इस प्रतीक्षा में बैठे हैं कि आयोजकगण अथवा वहाँ उपस्थित अन्य ज्ञानियों में से कोई उन्हे अपना पता अथवा बैंक एकाऊंट नम्बर ही भेज दे, ताकि उन्हे उस भोजन की मूल्यराशि चुकाई जा सके..........इस जीवन का क्या भरोसा, प्राण निकलते कोई देर थोडा लगा करती है......बिना कीमत चुकाए कल को मर मुरा गए तो पता नहीं उसके बदले में आगे चलकर क्या कुछ भुगतान करना पड जाए......
अब समस्त बुद्धिमानों का आपसी विचार विमर्श चलता रहा, लेकिन अपने बनवारी लाल चुपचाप बैठे उन्हे सुनते रहे. हालाँकि वहाँ उपस्थित एक दो सज्जनों ने उन्हे कहा भी कि आप कुछ नहीं बोल रहे, आप भी अपने विचार रखें...........लेकिन बनवारी लाल जी तो गए ही सिर्फ ज्ञान प्रसाद लेने. वो भला क्या कहते. वैसे भी नीति यह कहती है कि ज्ञानियों की महफिल में अल्प बुद्धि वालों को हमेशा चुप ही रहना चाहिए वर्ना पोल खुलने का खतरा रहता है. सो, बनवारी लाल जी अपने बुद्धिमान होने का भ्रम बनाए रखने खातिर चुप्पी साधे बैठे रहे.
थोडी देर बाद सभा समाप्त हुई तो, आयोजकगण वहाँ उपस्थित सभी मेहमानों को भोजन का आग्रह करने लगे.
बनवारी लाल जी तो पहले ही उनके स्नेहभाव से अभिभूत थे, चाहकर भी उनके द्वारा बारम्बार किए गए इस विनम्र आग्रह को टाल न सके.......वैसे भी घर आए मेहमान का यथोचित आदर सत्कार करना न केवल इस देश में बल्कि सम्पूर्ण संसार में ही शिष्टता का आवश्यक अंग माना जाता है. ऊपर से बात यदि दिल्ली की हो, जिसे कि दिल वालों की नगरी कहा जाता है तो फिर तो कहने ही क्या.
खैर कहने का मतलब ये कि बनवारी लाल जी उनके द्वारा किए गए प्रेमपूर्वक आग्रह को टालने की धुष्टता न कर सके और भोजन पश्चात आयोजकगण की शिष्टता, मिलनसारिता एवं सत्कारभावना से अभिभूत सभी सदस्यों सहित विदा ली..........
अब यहाँ तक तो सब ठीक रहा.....किसी से कैसी भी कोई शिकायत नहीं बल्कि सच मानिए बनवारी प्रसन्न भाव से, पूरी तरह से आनन्दित हुए घर आए............चलिए ये अध्याय तो यहीं समाप्त हो जाता है.
लेकिन सम्मेलन के बहुत समय बाद की बात है कि एक दिन एक बुद्धिमान व्यक्ति उस सम्मेलन के औचित्य को लेकर कुछ सवाल खडे कर रहे थे तो भूलवश अपने बनवारी लाल जी का अचानक ही उधर को जाना हो गया. वहाँ प्रसंगवश उन्हे ये बात कहनी पडी कि "जी गलती से मैं भी उस सम्मेलन में उपस्थित था". बस इतना सुनना था कि वहाँ उपस्थित एक अन्य अशिष्ट, अभद्र व्यक्ति जो कि उस सम्मेलन मे भी उपस्थित थे लगे अपनी अशिष्टता का परिचय देने.....
कहने लगे कि " बनवारी लाल जी, आप सम्मेलन मे खाना तो बडे चपर-चपर कर खा रहे थे, अब आप अपने सम्मिलित होने को गलती बता रहे हैं".
हालाँकि अपने बनवारी लाल जी इतनी हैसियत रखते हैं कि बुद्धिमानी का नकाब पहले ऎसे औच्छे लोगों के पूरे खानदान को बरसों तक मुफ्त में घर बैठे खिला सकते हैं. लेकिन वो ठहरे सुसंस्कारित व्यक्ति,जो कि चाहकर भी उस स्तर पर नहीं उतर सकते जहाँ ये सभ्य समाज के तथाकथित सभ्य इन्सान खडे हैं.बनवारी लाल जी समझ नहीं पा रहे थे कि ऎसे घटिया लोगों को अपनी अशिष्टता का परिचय देने और अपनी औकात दिखाने से भला क्या हासिल हो जाता है...खैर ये तो वो लोग खुद जानें, हाँ इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि ऎसे लोगों के रहते इस दुनिया के भाग्य में अभी बहुत से दुर्दिन देखने बाकी है.......
खैर बेचारे बनवारी लाल जी अपनी आत्मा पर बोझ लिए इस प्रतीक्षा में बैठे हैं कि आयोजकगण अथवा वहाँ उपस्थित अन्य ज्ञानियों में से कोई उन्हे अपना पता अथवा बैंक एकाऊंट नम्बर ही भेज दे, ताकि उन्हे उस भोजन की मूल्यराशि चुकाई जा सके..........इस जीवन का क्या भरोसा, प्राण निकलते कोई देर थोडा लगा करती है......बिना कीमत चुकाए कल को मर मुरा गए तो पता नहीं उसके बदले में आगे चलकर क्या कुछ भुगतान करना पड जाए......
निवेदन:- जरूरत से ज्यादा समझदारी रखने वाले सज्जनों से करबद्ध निवेदन है कि वे इसे कृ्प्या हास्य न समझें.
बुधवार, 26 मई 2010
लगता है ब्लागजगत अब समझौतावादी हो गया है.........
मुझे लग रहा है कि अब इस ब्लागजगत में मठाधीशी, अनामी-बेनामी ब्लागर, तेरा धर्म-मेरा धर्म जैसी टपोरपंथी, अन्याय, वगैरह से लडने की शक्ति बिल्कुल ही चूक गई है, तभी तो कितने दिन हो गए ऎसी कोई धमाकेदार सी किसी को गरियाती हुई कोई पोस्ट नहीं दिखाई पडी. विश्वास नहीं हो रहा कि ये वही बीते कल वाला ब्लागजगत ही है या कि हम ही गलती से किसी ओर जगह चले आए हैं. हमें भी मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आखिर बात क्या है. माहौल में ये अजीब सी खामोशी क्यूं छाई हुई है भाई. इत्ते दिन बीतने के बाद भी कहीं से ऎसी कोई पोस्ट न पढने को मिले तो इसका मतलब ये समझा जाए कि समूचा ब्लागजगत अब समझौतावादी हो गया है. क्या आप लोगों नें भी देश की जनता की तरह बिगडे हालातों से समझौता करना सीख लिया है. उस गरीब जनता की तरह, जिसके लिए कि आशा की कोई भी किरण किसी भी क्षितिज पर शेष न रह पाई है.
अरे भाई! ऎसा कैसे चलेगा.....हमें तो ये खामोशी कुछ चुभने सी लगी है. लग ही नहीं रहा कि ये वही ब्लागजगत है. भाई कम से कम मन को इतना तो अहसास होते ही रहना चाहिए कि हम हिन्दी के ब्लागर हैं.......:-)
अरे भाई! ऎसा कैसे चलेगा.....हमें तो ये खामोशी कुछ चुभने सी लगी है. लग ही नहीं रहा कि ये वही ब्लागजगत है. भाई कम से कम मन को इतना तो अहसास होते ही रहना चाहिए कि हम हिन्दी के ब्लागर हैं.......:-)
रविवार, 16 मई 2010
इस सर्वसुलभ माध्यम का उपयोग निज एवं समाज के विकास के लिए किया जाए तो ही बेहतर है!!!!!!
ये ठीक है कि यहाँ ब्लागजगत में आज बहुत से ब्लागर इस प्रकार की शैली को अपना रहे हैं, जो आपस में विद्वेष और कटुता बढा रही है और लोगों को अच्छाई की अपेक्षा बुराई की ओर ले जा रही है। लेकिन इसमें भी मैं दोष पढने वाले व्यक्ति का ही अधिक मानता हूँ। क्यों कि आज व्यक्ति का दृ्ष्टिकोण ही इस प्रकार की भाषा को चाहता है। यह तो संसार है, इसमें अच्छा-बुरा सब कुछ है। वास्तव में देखा जाए तो अच्छा और बुरा कुछ भी नहीं। किसी चीज को अच्छे और बुरे की पदवी भी हमारा दृ्ष्टिकोण ही देता है। हम यहाँ हैं तो हमें अपनी रूचि के अनुसार विषयवस्तु और विचार को चुनना है। हमारी रूचि, हमारा दृ्ष्टिकोण ऎसा होना चाहिए कि जिससे हम उन्ही बातों को ग्रहण कर सकें जिनसें हमारा मन, बुद्धि, जीवन, समाज एवं राष्ट्र का विकास हो सके।
देखा जाए तो ब्लागिंग आज के युग में ज्ञान बढाने का एक सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम साधन बन चुका हैं। हमें चाहिए कि हम इसका अधिकाधिक लाभ उठा सकें, इसकी सार्थकता को समझने का प्रयास करें ताकि अपने एवं समाज के विकास में महती भूमिका अता कर सकें न कि सिर्फ फालतू के विवादों को जन्म देकर अपनी बेशकीमती उर्जा एवं अमूल्य समय को यूँ व्यर्थ में नष्ट किया जाए।
देखा जाए तो ब्लागिंग आज के युग में ज्ञान बढाने का एक सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम साधन बन चुका हैं। हमें चाहिए कि हम इसका अधिकाधिक लाभ उठा सकें, इसकी सार्थकता को समझने का प्रयास करें ताकि अपने एवं समाज के विकास में महती भूमिका अता कर सकें न कि सिर्फ फालतू के विवादों को जन्म देकर अपनी बेशकीमती उर्जा एवं अमूल्य समय को यूँ व्यर्थ में नष्ट किया जाए।
गूगल कृ्पा भई ब्लाग बनाया, लोग कहैं यह मेरा है
न यह तेरा न यह मेरा, चिडिया रैन बसेरा है!!
शुक्रवार, 14 मई 2010
सुना है, हिन्दी ब्लागजगत में चुनाव होने वाले हैं!!!!!!
जैसे ही खबर मिली कि हिन्दी चिट्ठाजगत में "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" चुनने के लिए चुनाव प्रक्रिया अपनाई जा रही है तो सुनते ही अपने ब्लागर मित्र श्री बनवारी लाल जी तुरन्त धमक पडे. पूछने लगे कि " पंडित जी! जरा एक मशविरा तो दीजिए"
"जी कहिए, आज किस बात पर मशविरा माँगा जा रहा है"
"पंडित जी! बात तो आप तक पहुँच ही चुकी होगी कि अपने यहाँ चिट्ठजगत में सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का चुनाव होने जा रहा है. उसके लिए उन सभी इच्छुक प्रत्याशियों से नाँमाकन पत्र भरने को कहा गया है, जो कि खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं"
"जी हाँ, कुछ ऎसा सुना तो है"
" तो बात ये है कि हमने इस चुनाव में भाग लेने का मन बनाया है. आपसे इसी मसलें पर मशविरा चाहिए था कि हमें चुनाव लड लेना चाहिए कि नहीं"
मैने उन्हे निहारा. जानना चाहता था कि वह इस समय किस श्रेणी का मजाक कर रहे थे. मैं मन ही मन में उनके द्वारा हिन्दी ब्लागिंग में दिए गए योगदान का आंकलन करने लगा. सब लोग अच्छे से जानते हैं कि बनवारी लाल जी का साहित्य की किसी भी विधा से लगभग वैसा ही सम्बंध रहा है, जैसा कि ईँट और कुत्ते में. अपनी दो बरस की ब्लागिंग में उन्होने ले देकर यही कोई पाँच सात तो पोस्ट लिखी हैं. उनमें भी या तो घटिया सी कोई तुकबन्दी रही या फिर बच्चों के चुटकुले ............बस ले देकर हिन्दी के विकास में उनका यही योगदान रहा है .
अब ऎसे निरीह ब्लागर के मुँह से टपके ये शब्द मुझे कोरा मजाक न लगते तो भला क्या लगते. अत: मैने तो सपाट राय दे डाली " अमां यार छोडो भी! यह चुनाव वनाव वाला झंझट आप जैसे भले आदमियों के लिए नहीं है.ओर अगर चुनाव लड भी लिया तो आपको वोट देगा कौन?"
सुनते ही बनवारी लाल जी उदास हो गए. मुँह लटक गया. शायद मैने उनके बढते कदमों में टंगडी जो मार दी थी. मुँह बिसूरकर बोले" पंडित जी! आपसे हमें यह उम्मीद नहीं थी. आपने तो हमारा दिल ही तोड दिया"
अब उनको भला कौन समझाता कि मुझे भी उनसे ऎसे प्रश्न की कोई उम्मीद नहीं थी. फिर भी मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. गलती के अहसास का दायित्व इस जमाने में प्राय: समझदार आदमी का ही होता है. मुझे लगा कि उडनातुर पतंगें को रोकना टोकना नहीं चाहिए. फिर भले ही वो जलती लौ पर भस्म होने ही क्यों न जा रहा हो. अब उडना तो उस बेचारे का स्वभाव ठहरा और जलना उसकी नियती. फिर ईश्वर के बनाए इस विधान में हम भला क्यों टाँग अडाएं. सो, मैने भूल सुधार करनी चाही " देख लीजिए! अगर जीतने का कोई चान्स वान्स हो तो!"
हमारी ओर से तनिक सी सकारात्मकता दिखाई देते ही बनवारी लाल जी का मुखारविन्द खिल उठा. बोले" जी क्यों नहीं, जब आप जैसे मित्र साथ हैं तो फिर जीतेंगें कैसे नहीं"
मैने मन ही मन माथा ठोंक लिया. गलतफहमी की भी कोई तो एक सीमा होनी ही चाहिए,लेकिन लगता है शायद ये तो सीमाओं को भी लाँघ चुके हैं. कहते हैं कि मूर्ख सिर्फ पागलखानों में ही नहीं पाए जाते और न ही वो गले में तख्ती लटकाए घूमते हैं कि "हम पागल हैं," उनकी तो हरकतें ही सब कुछ बयां कर डालती हैं. एक बार तो जी में आया कि इन्हे साफ साफ मना कर दिया जाए कि भाई ऎसे किसी भुलावे में मत रहिएगा, लेकिन शायद मेरे मित्र धर्म नें मुझे इस प्रकार की चुभती सी प्रतिक्रिया करने से रोक दिया. "चलिए हम तो आपको वोट दे ही देंगें लेकिन सिर्फ हमारी अकेले की वोट से तो जीत हार तय नहीं होने वाली,,,ओर लोगों की भी वोट मिले तब न"
" मिलेगी क्यों नहीं, आखिर हम में कमी क्या है? सभी ब्लागरों के साथ तो अपने मधुर सम्बंध है. सबने वोट देने का वायदा भी कर दिया है" जनाब का आत्मविश्वास पूरे उत्थान पर था.
हिन्दी ब्लागिंग के प्रचलित नियम कायदों के अनुसार तो इनमें कैसी भी कोई कमी नहीं थी, बल्कि एक आध गुण फालतू ही बेशक होगा. लेकिन बिना किसी सार्थक योगदान के "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" होने का भ्रम पाल बैठना भी तो किसी मूर्खता से कम नहीं कहा जा सकता. अब नासमझ आदमी को तो समझा भी लो लेकिन पागल या दीवाने को भला कौन समझाए. ब्लागिंग धर्म मुझे कोई कडक उत्तर देने से रोक रहा था लेकिन बनवारी लाल थे कि टस से मस ही नहीं हो रहे थे.
"पंडित जी, आप तो जानते ही हैं कि समूचे ब्लागजगत में हमारे से स्वच्छ छवि वाला ब्लागर मिलना भी मुश्किल है. आज तक न तो हमारा किसी विवाद में कोई हाथ रहा, न ही हमने कभी किसी का नाम लेकर कोई पोस्ट लिखी...ओर तो ओर किसी ओर ने भी कभी हमारा नाम लेकर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... आज तक कैसे भी करके हम अपनी छवि को दागदार होने से बचाए रखे हुए हैं..अब आप ही बताईये कि हमारे जैसे इतनी पाक साफ छवि वाले ब्लागर को कोई भला वोट क्यूं नहीं देगा ?"
अब इस बेचारे भले आदमी को कौन समझाए कि इसकी कोई छवि ही कहाँ हैं, जो दागदार या बेदाग होगी. लेकिन मालूम नहीं कि वो मित्रधर्म निभाने की विवशता रही या कि ब्लागिंग धर्म से च्युत होने का डर, कि हमने उनसे ओर कुछ कहना उचित ही नहीं समझा. सो, हमने उनकी योग्यता को स्वीकार करते हुए(बेशक ऊपरी मन से ही सही) अपना वोट उन्हे ही देने के वादे के साथ हाथ जोडकर उन्हे रूखसत किया.....
अब सोच रहे हैं कि कुछ दिनों के लिए नैट कनैक्शन कटवा दिया जाए या फिर कहीं घूमफिर आया जाए...तब तक ये "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" वाली चुनावी आपदा भी टल चुकी होगी वर्ना अभी तो चुनाव का आगाज ही हुआ है ओर ये बनवारी लाल ट्पक पडे, कल को पता नहीं कौन कौन अलाने फलाने ब्लागर मुँह उठाए वोट का दान माँगने चले आएंगें. अब जिसका समर्थन न किया वही नाम ले लेकर गरियाया करेगा.......सो, काहे को फोकट में दुश्मनी मोल लेनी.
इसलिए भाई हम तो चले हरिद्वार गंगा माई की शरण में, कुछेक पाप धो आएं...चुनाव निपटते ही आ जाएंगें. तब तक आप लोग लडो, भिडो, एक दूजे के खिलाफ नारेबाजी करो, आरोप-प्रत्यारोप लगाओ. जो भी कोई जीत जाएगा, उसी को हम भी "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" मान लेंगें....आखिर लोकतन्त्र भी तो यही कहता है!
"जी कहिए, आज किस बात पर मशविरा माँगा जा रहा है"
"पंडित जी! बात तो आप तक पहुँच ही चुकी होगी कि अपने यहाँ चिट्ठजगत में सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का चुनाव होने जा रहा है. उसके लिए उन सभी इच्छुक प्रत्याशियों से नाँमाकन पत्र भरने को कहा गया है, जो कि खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं"
"जी हाँ, कुछ ऎसा सुना तो है"
" तो बात ये है कि हमने इस चुनाव में भाग लेने का मन बनाया है. आपसे इसी मसलें पर मशविरा चाहिए था कि हमें चुनाव लड लेना चाहिए कि नहीं"
मैने उन्हे निहारा. जानना चाहता था कि वह इस समय किस श्रेणी का मजाक कर रहे थे. मैं मन ही मन में उनके द्वारा हिन्दी ब्लागिंग में दिए गए योगदान का आंकलन करने लगा. सब लोग अच्छे से जानते हैं कि बनवारी लाल जी का साहित्य की किसी भी विधा से लगभग वैसा ही सम्बंध रहा है, जैसा कि ईँट और कुत्ते में. अपनी दो बरस की ब्लागिंग में उन्होने ले देकर यही कोई पाँच सात तो पोस्ट लिखी हैं. उनमें भी या तो घटिया सी कोई तुकबन्दी रही या फिर बच्चों के चुटकुले ............बस ले देकर हिन्दी के विकास में उनका यही योगदान रहा है .
अब ऎसे निरीह ब्लागर के मुँह से टपके ये शब्द मुझे कोरा मजाक न लगते तो भला क्या लगते. अत: मैने तो सपाट राय दे डाली " अमां यार छोडो भी! यह चुनाव वनाव वाला झंझट आप जैसे भले आदमियों के लिए नहीं है.ओर अगर चुनाव लड भी लिया तो आपको वोट देगा कौन?"
सुनते ही बनवारी लाल जी उदास हो गए. मुँह लटक गया. शायद मैने उनके बढते कदमों में टंगडी जो मार दी थी. मुँह बिसूरकर बोले" पंडित जी! आपसे हमें यह उम्मीद नहीं थी. आपने तो हमारा दिल ही तोड दिया"
अब उनको भला कौन समझाता कि मुझे भी उनसे ऎसे प्रश्न की कोई उम्मीद नहीं थी. फिर भी मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. गलती के अहसास का दायित्व इस जमाने में प्राय: समझदार आदमी का ही होता है. मुझे लगा कि उडनातुर पतंगें को रोकना टोकना नहीं चाहिए. फिर भले ही वो जलती लौ पर भस्म होने ही क्यों न जा रहा हो. अब उडना तो उस बेचारे का स्वभाव ठहरा और जलना उसकी नियती. फिर ईश्वर के बनाए इस विधान में हम भला क्यों टाँग अडाएं. सो, मैने भूल सुधार करनी चाही " देख लीजिए! अगर जीतने का कोई चान्स वान्स हो तो!"
हमारी ओर से तनिक सी सकारात्मकता दिखाई देते ही बनवारी लाल जी का मुखारविन्द खिल उठा. बोले" जी क्यों नहीं, जब आप जैसे मित्र साथ हैं तो फिर जीतेंगें कैसे नहीं"
मैने मन ही मन माथा ठोंक लिया. गलतफहमी की भी कोई तो एक सीमा होनी ही चाहिए,लेकिन लगता है शायद ये तो सीमाओं को भी लाँघ चुके हैं. कहते हैं कि मूर्ख सिर्फ पागलखानों में ही नहीं पाए जाते और न ही वो गले में तख्ती लटकाए घूमते हैं कि "हम पागल हैं," उनकी तो हरकतें ही सब कुछ बयां कर डालती हैं. एक बार तो जी में आया कि इन्हे साफ साफ मना कर दिया जाए कि भाई ऎसे किसी भुलावे में मत रहिएगा, लेकिन शायद मेरे मित्र धर्म नें मुझे इस प्रकार की चुभती सी प्रतिक्रिया करने से रोक दिया. "चलिए हम तो आपको वोट दे ही देंगें लेकिन सिर्फ हमारी अकेले की वोट से तो जीत हार तय नहीं होने वाली,,,ओर लोगों की भी वोट मिले तब न"
" मिलेगी क्यों नहीं, आखिर हम में कमी क्या है? सभी ब्लागरों के साथ तो अपने मधुर सम्बंध है. सबने वोट देने का वायदा भी कर दिया है" जनाब का आत्मविश्वास पूरे उत्थान पर था.
हिन्दी ब्लागिंग के प्रचलित नियम कायदों के अनुसार तो इनमें कैसी भी कोई कमी नहीं थी, बल्कि एक आध गुण फालतू ही बेशक होगा. लेकिन बिना किसी सार्थक योगदान के "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" होने का भ्रम पाल बैठना भी तो किसी मूर्खता से कम नहीं कहा जा सकता. अब नासमझ आदमी को तो समझा भी लो लेकिन पागल या दीवाने को भला कौन समझाए. ब्लागिंग धर्म मुझे कोई कडक उत्तर देने से रोक रहा था लेकिन बनवारी लाल थे कि टस से मस ही नहीं हो रहे थे.
"पंडित जी, आप तो जानते ही हैं कि समूचे ब्लागजगत में हमारे से स्वच्छ छवि वाला ब्लागर मिलना भी मुश्किल है. आज तक न तो हमारा किसी विवाद में कोई हाथ रहा, न ही हमने कभी किसी का नाम लेकर कोई पोस्ट लिखी...ओर तो ओर किसी ओर ने भी कभी हमारा नाम लेकर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... आज तक कैसे भी करके हम अपनी छवि को दागदार होने से बचाए रखे हुए हैं..अब आप ही बताईये कि हमारे जैसे इतनी पाक साफ छवि वाले ब्लागर को कोई भला वोट क्यूं नहीं देगा ?"
अब इस बेचारे भले आदमी को कौन समझाए कि इसकी कोई छवि ही कहाँ हैं, जो दागदार या बेदाग होगी. लेकिन मालूम नहीं कि वो मित्रधर्म निभाने की विवशता रही या कि ब्लागिंग धर्म से च्युत होने का डर, कि हमने उनसे ओर कुछ कहना उचित ही नहीं समझा. सो, हमने उनकी योग्यता को स्वीकार करते हुए(बेशक ऊपरी मन से ही सही) अपना वोट उन्हे ही देने के वादे के साथ हाथ जोडकर उन्हे रूखसत किया.....
अब सोच रहे हैं कि कुछ दिनों के लिए नैट कनैक्शन कटवा दिया जाए या फिर कहीं घूमफिर आया जाए...तब तक ये "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" वाली चुनावी आपदा भी टल चुकी होगी वर्ना अभी तो चुनाव का आगाज ही हुआ है ओर ये बनवारी लाल ट्पक पडे, कल को पता नहीं कौन कौन अलाने फलाने ब्लागर मुँह उठाए वोट का दान माँगने चले आएंगें. अब जिसका समर्थन न किया वही नाम ले लेकर गरियाया करेगा.......सो, काहे को फोकट में दुश्मनी मोल लेनी.
इसलिए भाई हम तो चले हरिद्वार गंगा माई की शरण में, कुछेक पाप धो आएं...चुनाव निपटते ही आ जाएंगें. तब तक आप लोग लडो, भिडो, एक दूजे के खिलाफ नारेबाजी करो, आरोप-प्रत्यारोप लगाओ. जो भी कोई जीत जाएगा, उसी को हम भी "सर्वश्रेष्ठ ब्लागर" मान लेंगें....आखिर लोकतन्त्र भी तो यही कहता है!
शुक्रवार, 7 मई 2010
रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं!!!(हास्य-व्यंग्य)
धर्म, अधर्म का जितना ज्ञान हमें गुरूकुल में रहते "आचार्य" की पढाई के दौरान भी नहीं हुआ होगा, उससे कहीं अधिक ज्ञान हम इस ब्लागनगरी में रहते हासिल कर चुके हैं, वो भी सिर्फ चन्द महीनों में। सुबह शाम धर्म आख्ययान, प्रवचन सुनकर हमें तो ऎसा लगने लगा है कि मानों हमारे लिए तो ये समूचा संसार ही "धर्ममय"(धर्म+मय) हो गया है। सोते जागते, खाते पीते, नहाते धोते, उठते बैठते हमें हर चीज में धर्म के दर्शन होने लगे हैं। इधर-उधर,यहाँ-वहाँ, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे--हर जगह बस धर्म ही धर्म दिखाई देने लगा है। मत पूछिए कि हमारे जीवन में कहाँ कहाँ इस धर्म नें अपनी नाक घुसेड डाली है।
अभी कल की ही बात है, हमने अपनी धर्मपत्नि जी को बोला कि भार्ये! जल्दी से भोजन परोस दीजिए, बहुत जोर से भूख लगी है। तो धर्मपत्नि जी झट से बोल पडी कि " भोजन अभी कहाँ बना है, सुबह से तो गैस खत्म है, सिलेंडर लाते तो ही तो खाना बनता"। सुनते ही हमारे अन्दर का धर्म रूपी कीडा कुलबुलाने लगा और हमारे मुख से निकल गया कि " देवी! फलाने ब्लाग बाबा जी कहते हैं कि स्त्री के लिए कैसे भी करके पति की आज्ञा, उसकी इच्छापूर्ती का प्रबंध करना ही उसका धर्म होता है"। बस इतना सुनना था कि उसने वो रूप धारण किया कि उसने हमारी, उस ब्लाग बाबा और धर्म तीनों की ऎसी तैसी करने में तनिक भी देर न लगाई। ये हम जानते हैं, या फिर हमारा भगवान या अल्लाह जानता है कि हमने कैसे जान बचाई वर्ना आज आप यहाँ बैठकर हमारी ये दुखभरी "धर्मकथा" न सुन रहे होते।
और सुनिये अब तो इस धर्म ने हमें सपनों में आकर भी भयभीत करना आरम्भ कर दिया है। आज रात की ही बात है जब हमें एक बहुत ही विचित्र सा स्वपन दिखाई दिया। हमने क्या देखा कि हम लैपटोप सामने रखे बडे एकाग्रचित्त हो किसी ब्लाग बाबा जी के ब्लाग के जरिए धर्म का रसपान कर रहे हैं। तभी क्या होता है कि अचानक से सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित, दिव्य आभा युक्त दो दिव्यपुरूष हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं। उन दोनों के गलों में दो तख्तियाँ लटक रही थी, एक पर लिखा था धर्म और दूसरे पर अधर्म। जिस के गले में अधर्म की तख्ती लटक रही थी, उसकी ओर हमने बस एक हल्की सी उपेक्षापूर्ण निगाह भर डाली और धर्म की ओर देखकर झट से उनके चरणों में शाष्टाँग प्रणाम करने लगे। अभी उस धर्म रूपी दिव्यपुरूष नें हमें आशीर्वाद भी नहीं दिया था कि वो अधर्मपुरूष तो हमें गालियाँ बकने लगा। एक ही साँस में हमें मूर्ख, अज्ञानी, दंभी ओर न जाने हमें क्या क्या कह गया। क्रोध तो हमें बहुत आया लेकिन शालीनता का पल्लू न छोडते हुए हमने उनसे सिर्फ यही निवेदन किया कि "महोदय! आप हमें नाहक ही गालियाँ बके जा रहे हैं। हम अधर्म से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते। हमने अपने धर्म को पहचान लिया है। शुक्र है! उन ब्लागबाबाओं का जिन्होने हमारा धर्म से वास्तविक परिचय करा दिया है। अगर आप अपनी सलामती चाहते हैं तो तुरन्त पतली गली से निकल लीजिए वर्ना हम अपने धर्मदेव को कहकर आपकी वो ठुकाई कराएंगें कि आपसे भागते न बनेगा"।
"रे मूर्ख! धर्म तो हमारा नाम है। जिसे तूं धर्म समझे बैठा है, वो धर्म नहीं अधर्म है"---अधर्म चिल्लाया ।
"चलिए! अपना रास्ता नापिये। हम तुम्हारे झाँसे में आने वाले नहीं है। अरे! अब हम अज्ञानी नहीं रहे कि धर्म और अधर्म में भेद भी न कर सकें। पिछले साल भर में बडे बडे नामी ब्लाग बाबा वेद, पुराण, कुरआन घोंट घोंटकर हमें इतना धर्मामृ्त पिला चुके हैं कि हमारे तो कब के ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं"---इतना कहकर हमने एक दृ्ष्टि पास में ही खडे धर्मदेव पर डाली जो बस चुपचाप खडे हम दोनो की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। हमें उनकी ये मुस्कुराहट कुछ विचित्र सी लगी।
"वत्स! अब भी समझ जाओ। तुम क्यूं अपनी दीन दुनिया खराब करने पे तुले हो। जिन ब्लाग बाबाओं के तुम जो इतने गुणगान किए जा रहा हो, असल में वो लोग धर्म नहीं बल्कि अधर्म के उपासक हैं और जिसे तुम धर्मामृ्त कह रहे हो, वो अमृ्त नहीं बल्कि हलाहल विष है। जो न केवल तुम्हारे इस ब्लागजगत अपितु तुम्हारे समूचे समाज को ले डूबेगा। यदि अब भी न समझे तो तुम्हे जहन्नुम की आग में जलने से मैं भी न रोक पाऊँगा"। अब की बार अधर्म नें इतने मधुर स्वर में कहा कि एक बार तो मैं भी शंका में पड गया। फिर सोचा कि जरूर इसे मेरी विद्वता का अहसास हो गया है, तभी इसने बात करने की टोन बदल ली :-)।
अब मुझे भी जुबान की तल्खी छोड, उसके जैसी ही विनम्रता अख्तियार करनी पडी " देव्! मै कैसे मान लूँ कि आप जो कह रहे हैं, वो सही है"
इतना कहकर पहले तो मैने एक प्रश्नवाचक दृ्ष्टि पास में खडे धर्मदेव पर डाली ओर बिना अधर्मदेव के जवाब की प्रतीक्षा किए सीधे धर्म से ही संबोधित हुआ" हे धर्मदेव! आप चुप क्यों है। कुछ बोलते क्यों नहीं। कृ्प्या आप ही बताईये कि सत्य क्या है?"
लेकिन धर्मदेव ने कोई जवाब न दिया ओर पूर्ववत ही उनके अधरों पर वही कुटिलतापूर्ण सी मुस्कान तैरती रही। उनकी इस मुस्कुराहट नें हमें ओर संशय में डाल दिया। फिर विचार आया कि कहीं ऎसा तो नहीं ये दोनों मिलकर हमारी परीक्षा ले रहे हों जैसी स्वर्गारोहण के समय धर्मराज युधिष्ठर की ली गई थी। मन में ये विचार आते ही हमारा दिल तो बल्लियों उछलने लगा और आँखों के सामने जन्नत की हूरें कत्थक नृ्त्य करती दिखाई देने लगी। बस अब तो हमने भी ठान लिया कि कैसे भी कर के हमें इस परीक्षा में उतीर्ण होना ही है।
इतने में अधर्म फिर बोल पडा "वत्स! क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि ये मिथ्यायुग है और तुम्हारा ये जो ब्लागसंसार है, जिसमें तुम दिन रात विचरते रहते हो, वो तो इसमें भी बडा मिथ्याजगत है, जहाँ एक से बढकर एक मिथ्याचारी छद्मभेष धारण किए अपना मायाजाल फैलाए बैठे हैं कि कोई मूर्ख फँसे तो उसे हलाल करें"।
अब तो हमारे भी मन में शंका अपने पैर पसारने लगी कि कहीं इनका कथन सत्य तो नहीं। फिर भी हमने अपने विश्वास की डोर को हाथ से न छूटने दिया। क्यों कि हमें अपने इन ब्लाग बाबाओं पर खुद से भी अधिक भरोसा था। धन्य हैं ये संत जिन्होने हमें सच्चे धर्म का मार्ग दिखलाया। जो लोग कहते हैं कि कलयुग में एक भी सच्चा सन्त मिलना दुर्लभ हैं तो मै उन्हे बताना चाहूँगा आप एक की बात करते हैं। यहाँ आकर देखिए आपको सन्तों की पूरी जमात मिलेगी जो डाक्टर, वैज्ञानिक, वकील जैसे पेशों से जुडे होते हुए भी बिना किसी स्वार्थ के दुनिया को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाने में तन-मन-धन से जुटे हुए हैं। अहोभाग्य इस ब्लागनगरी के वाशिन्दों का, जिन्हे ऎसी दिव्य विभूतियों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है।
खैर हम भी उस अधर्म के झाँसे में कहां आने वाले थे। सो हमने उनसे प्रमाण देने की डिमांड कर डाली:- "देव! यदि कुछ प्रमाण दें तो ही मैं आपके कथन पर विश्वास कर सकता हूँ"
"वत्स्! यदि तुम प्रमाण ही चाहते हो तो तुम्हे इसके लिए एक कार्य करना होगा"
"कहिए देव! मुझे क्या करना होगा"
"वत्स्! तुम इन ब्लाग बाबाओं के पास जाओ ओर उनसे पूछ कर आओ कि इस वाक्य "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ है।
"वाह्! देव! आप भी कमाल करते हैं। इतने साधारण से वाक्य का अर्थ तो मै ही बता देता हूँ। इसके लिए बाबाओं से पूछने की क्या जरूरत है। नाहक ही उन्हे परेशान करना। वो वेद और कुरआन के महाविद्वान, जो बिना किसी स्वार्थ के, विश्व बन्धुत्व की भावना लिए, दिन-रात समूचे ब्लागजगत में ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं--क्या वो इतना भी न जानते होंगें। लगता है आप शायद मजाक के मूड में हैं"
"वत्स! धर्म का कार्य किसी से परिहास करना नहीं होता अपितु उसे जीवन का सही मार्ग दिखाना होता है। जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही करो। एक बार जाओ तो सही"।
"चलिए, आप कहते हैं तो चला जाता हूँ"। इतना कहकर हम अनमने मन से उस वाक्य का अर्थ पूछने बाबा फन्ने खाँ ब्लागर के पास चले गये। उनसे कहा कि बाबा जी! मैं आपके ब्लाग सत्संग का एक नियमित पाठक हूँ. जबसे आप इस ब्लागजगत में अवतरित हुए हैं, आपकी हर पोस्ट पर अपने श्रद्धसुमुन अर्पित करने नियमित रूप से आ रहा हूँ! आज आपके पास अपनी एक जिज्ञासा के समाधान हेतु उपस्थित हुआ हूँ---शंका निवारण कर कृ्तार्थ कीजिए! "
बाबा फन्ने खाँ:- " अजी बोलिए शर्मा जी! क्या पूछना चाहते हैं"
जी गुरूदेव्! वैसे सवाल तो बहुत ही मामूली सा है..ओर मुझे भीतर से बहुत ही संकोच भी हो रहा है कि आप जैसे धर्ममर्मज्ञ विद्वान, जो कि कुरआन एवं पुराण को घोटकर पी चुके हैं ---उनसे इतने मामूली से प्रश्न का जवाब पूछ रहा हूँ!
बाबा फन्ने खाँ " शर्मा जी, आप निसंकोच होकर पूछिए! अल्लाह नें हमें इसी खातिर तो यहाँ भेजा है"
"जी! वो तो है! गुरूदेव मैं ये जानना चाहता था कि "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ होता है"
बाबा फन्ने खाँ" वत्स साहब! अल्लाह साक्षात शिव है। वो अनन्त है, सत्य है, सुन्दर है"।
"जी हाँ, आप बिल्कुल सत्य कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इस समय सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि धर्मो रक्षति रक्षत: का क्या अर्थ है"?
ब्लागर फन्ने खाँ " ऊपर वाला बडा नेकदिल है। सबका कल्याण चाहने वाला है। वो जिसे चाहे सिर्फ उसी को हिदायत देता है"।
"आप जो कह रहे हैं, सब सही है। लेकिन आज मैं जरा जल्दी में हूँ, आपके धर्मामृ्त का पान फिर किसी दिन करूँगा। आज तो आप बस मुझे उस वाक्य का अर्थ बता दीजिए"।
फन्ने खाँ:- " परमेश्वर ही सच्चा शिव अर्थात कल्याणकारी है"
"फन्ने खाँ जी, मैं आपसे कुछ पूछ रहा हूँ और आप कुछ का कुछ कहे जा रहे हैं। सीधे सीधे इसका अर्थ बता क्यूं नहीं देते। या कह दिजीए कि आपको इसका अर्थ पता नहीं है तो मैं किसी दूसरे बाबा जी के द्वारे जाऊँ" अब मुझे भी थोडी झुंझलाहट सी होने लगी थी।
फन्ने खाँ:- (कुछ देर सोचने के बाद) आप तो बडे नेकदिल इन्सान हैं। क्या कहा आपने? धर्मो रक्षति रक्षत:
"जी हाँ!" मैने थोडा खिजकर कहा
बाबा फन्ने खाँ(कुछ देर सोचकर) " जनाब इसका अर्थ होता है कि रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं"
बस इतना सुनना था कि, एकदम से ऎसा लगा मानो किसी नें एक ही झटके में मेरी आँखों पर पडे पर्दे को खींचकर फेंक दिया हो। मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही बर्तनों के खडखडाने और धर्मपत्नि के चिल्लाने की आवाज एकसाथ कानों में पडने लगी। मैं एकदम से हडबडा कर उठा । मालूम हुआ कि ये तो मैं सपना देख रहा था। इतने में ही धर्मपत्नि पास में आकर फिर से चिल्लाने लगी" आपको कुछ शर्म हया है कि नहीं! कितने दिन हो गये मुझे भौंकते कि कहीं से कुछ पैसों का इन्तजाम कर लो, पप्पू का स्कूल में एडमीशन कराना है। कितने दिनों से बिजली का बिल आया पडा है,कल जमा कराने की आखिरी तारीख है। लेकिन नहीं आपको इस मुए कम्पयूटर और इन बाबाओं से फुर्सत मिले तो ही तो घर गृ्हस्थी की ओर कुछ ध्यान दे पाओ। इन नासपीटों नें तुम्हारी बुद्धि का दिवाला निकाल के रख दिया है। न जाने इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में क्यों नहीं घुस रही कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता"।
इतना कहकर वो कुछ देर तक तो नथुने फुलाती वहीं खडी रही लेकिन मेरी ओर से कैसा भी कोई जवाब न पाकर गुस्से में पैर फटकारती हुई रसोई की ओर निकल गई। उसके बाद भी वो न जाने क्या कुछ बोलती रही, जिसे मैं सुन न पाया। क्यों कि मेरे कानों में तो अब तक सिर्फ यही शब्द गूंज रहे थे कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता।
(यह रचना इस से पूर्व वैशाखनन्दन सम्मान प्रतियोगिता में एक बार प्रकाशित की जा चुकी है. आज यहाँ इसे पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है)
अभी कल की ही बात है, हमने अपनी धर्मपत्नि जी को बोला कि भार्ये! जल्दी से भोजन परोस दीजिए, बहुत जोर से भूख लगी है। तो धर्मपत्नि जी झट से बोल पडी कि " भोजन अभी कहाँ बना है, सुबह से तो गैस खत्म है, सिलेंडर लाते तो ही तो खाना बनता"। सुनते ही हमारे अन्दर का धर्म रूपी कीडा कुलबुलाने लगा और हमारे मुख से निकल गया कि " देवी! फलाने ब्लाग बाबा जी कहते हैं कि स्त्री के लिए कैसे भी करके पति की आज्ञा, उसकी इच्छापूर्ती का प्रबंध करना ही उसका धर्म होता है"। बस इतना सुनना था कि उसने वो रूप धारण किया कि उसने हमारी, उस ब्लाग बाबा और धर्म तीनों की ऎसी तैसी करने में तनिक भी देर न लगाई। ये हम जानते हैं, या फिर हमारा भगवान या अल्लाह जानता है कि हमने कैसे जान बचाई वर्ना आज आप यहाँ बैठकर हमारी ये दुखभरी "धर्मकथा" न सुन रहे होते।
और सुनिये अब तो इस धर्म ने हमें सपनों में आकर भी भयभीत करना आरम्भ कर दिया है। आज रात की ही बात है जब हमें एक बहुत ही विचित्र सा स्वपन दिखाई दिया। हमने क्या देखा कि हम लैपटोप सामने रखे बडे एकाग्रचित्त हो किसी ब्लाग बाबा जी के ब्लाग के जरिए धर्म का रसपान कर रहे हैं। तभी क्या होता है कि अचानक से सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित, दिव्य आभा युक्त दो दिव्यपुरूष हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं। उन दोनों के गलों में दो तख्तियाँ लटक रही थी, एक पर लिखा था धर्म और दूसरे पर अधर्म। जिस के गले में अधर्म की तख्ती लटक रही थी, उसकी ओर हमने बस एक हल्की सी उपेक्षापूर्ण निगाह भर डाली और धर्म की ओर देखकर झट से उनके चरणों में शाष्टाँग प्रणाम करने लगे। अभी उस धर्म रूपी दिव्यपुरूष नें हमें आशीर्वाद भी नहीं दिया था कि वो अधर्मपुरूष तो हमें गालियाँ बकने लगा। एक ही साँस में हमें मूर्ख, अज्ञानी, दंभी ओर न जाने हमें क्या क्या कह गया। क्रोध तो हमें बहुत आया लेकिन शालीनता का पल्लू न छोडते हुए हमने उनसे सिर्फ यही निवेदन किया कि "महोदय! आप हमें नाहक ही गालियाँ बके जा रहे हैं। हम अधर्म से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते। हमने अपने धर्म को पहचान लिया है। शुक्र है! उन ब्लागबाबाओं का जिन्होने हमारा धर्म से वास्तविक परिचय करा दिया है। अगर आप अपनी सलामती चाहते हैं तो तुरन्त पतली गली से निकल लीजिए वर्ना हम अपने धर्मदेव को कहकर आपकी वो ठुकाई कराएंगें कि आपसे भागते न बनेगा"।
"रे मूर्ख! धर्म तो हमारा नाम है। जिसे तूं धर्म समझे बैठा है, वो धर्म नहीं अधर्म है"---अधर्म चिल्लाया ।
"चलिए! अपना रास्ता नापिये। हम तुम्हारे झाँसे में आने वाले नहीं है। अरे! अब हम अज्ञानी नहीं रहे कि धर्म और अधर्म में भेद भी न कर सकें। पिछले साल भर में बडे बडे नामी ब्लाग बाबा वेद, पुराण, कुरआन घोंट घोंटकर हमें इतना धर्मामृ्त पिला चुके हैं कि हमारे तो कब के ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं"---इतना कहकर हमने एक दृ्ष्टि पास में ही खडे धर्मदेव पर डाली जो बस चुपचाप खडे हम दोनो की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। हमें उनकी ये मुस्कुराहट कुछ विचित्र सी लगी।
"वत्स! अब भी समझ जाओ। तुम क्यूं अपनी दीन दुनिया खराब करने पे तुले हो। जिन ब्लाग बाबाओं के तुम जो इतने गुणगान किए जा रहा हो, असल में वो लोग धर्म नहीं बल्कि अधर्म के उपासक हैं और जिसे तुम धर्मामृ्त कह रहे हो, वो अमृ्त नहीं बल्कि हलाहल विष है। जो न केवल तुम्हारे इस ब्लागजगत अपितु तुम्हारे समूचे समाज को ले डूबेगा। यदि अब भी न समझे तो तुम्हे जहन्नुम की आग में जलने से मैं भी न रोक पाऊँगा"। अब की बार अधर्म नें इतने मधुर स्वर में कहा कि एक बार तो मैं भी शंका में पड गया। फिर सोचा कि जरूर इसे मेरी विद्वता का अहसास हो गया है, तभी इसने बात करने की टोन बदल ली :-)।
अब मुझे भी जुबान की तल्खी छोड, उसके जैसी ही विनम्रता अख्तियार करनी पडी " देव्! मै कैसे मान लूँ कि आप जो कह रहे हैं, वो सही है"
इतना कहकर पहले तो मैने एक प्रश्नवाचक दृ्ष्टि पास में खडे धर्मदेव पर डाली ओर बिना अधर्मदेव के जवाब की प्रतीक्षा किए सीधे धर्म से ही संबोधित हुआ" हे धर्मदेव! आप चुप क्यों है। कुछ बोलते क्यों नहीं। कृ्प्या आप ही बताईये कि सत्य क्या है?"
लेकिन धर्मदेव ने कोई जवाब न दिया ओर पूर्ववत ही उनके अधरों पर वही कुटिलतापूर्ण सी मुस्कान तैरती रही। उनकी इस मुस्कुराहट नें हमें ओर संशय में डाल दिया। फिर विचार आया कि कहीं ऎसा तो नहीं ये दोनों मिलकर हमारी परीक्षा ले रहे हों जैसी स्वर्गारोहण के समय धर्मराज युधिष्ठर की ली गई थी। मन में ये विचार आते ही हमारा दिल तो बल्लियों उछलने लगा और आँखों के सामने जन्नत की हूरें कत्थक नृ्त्य करती दिखाई देने लगी। बस अब तो हमने भी ठान लिया कि कैसे भी कर के हमें इस परीक्षा में उतीर्ण होना ही है।
इतने में अधर्म फिर बोल पडा "वत्स! क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि ये मिथ्यायुग है और तुम्हारा ये जो ब्लागसंसार है, जिसमें तुम दिन रात विचरते रहते हो, वो तो इसमें भी बडा मिथ्याजगत है, जहाँ एक से बढकर एक मिथ्याचारी छद्मभेष धारण किए अपना मायाजाल फैलाए बैठे हैं कि कोई मूर्ख फँसे तो उसे हलाल करें"।
अब तो हमारे भी मन में शंका अपने पैर पसारने लगी कि कहीं इनका कथन सत्य तो नहीं। फिर भी हमने अपने विश्वास की डोर को हाथ से न छूटने दिया। क्यों कि हमें अपने इन ब्लाग बाबाओं पर खुद से भी अधिक भरोसा था। धन्य हैं ये संत जिन्होने हमें सच्चे धर्म का मार्ग दिखलाया। जो लोग कहते हैं कि कलयुग में एक भी सच्चा सन्त मिलना दुर्लभ हैं तो मै उन्हे बताना चाहूँगा आप एक की बात करते हैं। यहाँ आकर देखिए आपको सन्तों की पूरी जमात मिलेगी जो डाक्टर, वैज्ञानिक, वकील जैसे पेशों से जुडे होते हुए भी बिना किसी स्वार्थ के दुनिया को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाने में तन-मन-धन से जुटे हुए हैं। अहोभाग्य इस ब्लागनगरी के वाशिन्दों का, जिन्हे ऎसी दिव्य विभूतियों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है।
खैर हम भी उस अधर्म के झाँसे में कहां आने वाले थे। सो हमने उनसे प्रमाण देने की डिमांड कर डाली:- "देव! यदि कुछ प्रमाण दें तो ही मैं आपके कथन पर विश्वास कर सकता हूँ"
"वत्स्! यदि तुम प्रमाण ही चाहते हो तो तुम्हे इसके लिए एक कार्य करना होगा"
"कहिए देव! मुझे क्या करना होगा"
"वत्स्! तुम इन ब्लाग बाबाओं के पास जाओ ओर उनसे पूछ कर आओ कि इस वाक्य "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ है।
"वाह्! देव! आप भी कमाल करते हैं। इतने साधारण से वाक्य का अर्थ तो मै ही बता देता हूँ। इसके लिए बाबाओं से पूछने की क्या जरूरत है। नाहक ही उन्हे परेशान करना। वो वेद और कुरआन के महाविद्वान, जो बिना किसी स्वार्थ के, विश्व बन्धुत्व की भावना लिए, दिन-रात समूचे ब्लागजगत में ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं--क्या वो इतना भी न जानते होंगें। लगता है आप शायद मजाक के मूड में हैं"
"वत्स! धर्म का कार्य किसी से परिहास करना नहीं होता अपितु उसे जीवन का सही मार्ग दिखाना होता है। जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही करो। एक बार जाओ तो सही"।
"चलिए, आप कहते हैं तो चला जाता हूँ"। इतना कहकर हम अनमने मन से उस वाक्य का अर्थ पूछने बाबा फन्ने खाँ ब्लागर के पास चले गये। उनसे कहा कि बाबा जी! मैं आपके ब्लाग सत्संग का एक नियमित पाठक हूँ. जबसे आप इस ब्लागजगत में अवतरित हुए हैं, आपकी हर पोस्ट पर अपने श्रद्धसुमुन अर्पित करने नियमित रूप से आ रहा हूँ! आज आपके पास अपनी एक जिज्ञासा के समाधान हेतु उपस्थित हुआ हूँ---शंका निवारण कर कृ्तार्थ कीजिए! "
बाबा फन्ने खाँ:- " अजी बोलिए शर्मा जी! क्या पूछना चाहते हैं"
जी गुरूदेव्! वैसे सवाल तो बहुत ही मामूली सा है..ओर मुझे भीतर से बहुत ही संकोच भी हो रहा है कि आप जैसे धर्ममर्मज्ञ विद्वान, जो कि कुरआन एवं पुराण को घोटकर पी चुके हैं ---उनसे इतने मामूली से प्रश्न का जवाब पूछ रहा हूँ!
बाबा फन्ने खाँ " शर्मा जी, आप निसंकोच होकर पूछिए! अल्लाह नें हमें इसी खातिर तो यहाँ भेजा है"
"जी! वो तो है! गुरूदेव मैं ये जानना चाहता था कि "धर्मो रक्षति रक्षत:" का क्या अर्थ होता है"
बाबा फन्ने खाँ" वत्स साहब! अल्लाह साक्षात शिव है। वो अनन्त है, सत्य है, सुन्दर है"।
"जी हाँ, आप बिल्कुल सत्य कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इस समय सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि धर्मो रक्षति रक्षत: का क्या अर्थ है"?
ब्लागर फन्ने खाँ " ऊपर वाला बडा नेकदिल है। सबका कल्याण चाहने वाला है। वो जिसे चाहे सिर्फ उसी को हिदायत देता है"।
"आप जो कह रहे हैं, सब सही है। लेकिन आज मैं जरा जल्दी में हूँ, आपके धर्मामृ्त का पान फिर किसी दिन करूँगा। आज तो आप बस मुझे उस वाक्य का अर्थ बता दीजिए"।
फन्ने खाँ:- " परमेश्वर ही सच्चा शिव अर्थात कल्याणकारी है"
"फन्ने खाँ जी, मैं आपसे कुछ पूछ रहा हूँ और आप कुछ का कुछ कहे जा रहे हैं। सीधे सीधे इसका अर्थ बता क्यूं नहीं देते। या कह दिजीए कि आपको इसका अर्थ पता नहीं है तो मैं किसी दूसरे बाबा जी के द्वारे जाऊँ" अब मुझे भी थोडी झुंझलाहट सी होने लगी थी।
फन्ने खाँ:- (कुछ देर सोचने के बाद) आप तो बडे नेकदिल इन्सान हैं। क्या कहा आपने? धर्मो रक्षति रक्षत:
"जी हाँ!" मैने थोडा खिजकर कहा
बाबा फन्ने खाँ(कुछ देर सोचकर) " जनाब इसका अर्थ होता है कि रिक्शा चलाने वाले ही धर्म की रक्षा करते हैं"
बस इतना सुनना था कि, एकदम से ऎसा लगा मानो किसी नें एक ही झटके में मेरी आँखों पर पडे पर्दे को खींचकर फेंक दिया हो। मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही बर्तनों के खडखडाने और धर्मपत्नि के चिल्लाने की आवाज एकसाथ कानों में पडने लगी। मैं एकदम से हडबडा कर उठा । मालूम हुआ कि ये तो मैं सपना देख रहा था। इतने में ही धर्मपत्नि पास में आकर फिर से चिल्लाने लगी" आपको कुछ शर्म हया है कि नहीं! कितने दिन हो गये मुझे भौंकते कि कहीं से कुछ पैसों का इन्तजाम कर लो, पप्पू का स्कूल में एडमीशन कराना है। कितने दिनों से बिजली का बिल आया पडा है,कल जमा कराने की आखिरी तारीख है। लेकिन नहीं आपको इस मुए कम्पयूटर और इन बाबाओं से फुर्सत मिले तो ही तो घर गृ्हस्थी की ओर कुछ ध्यान दे पाओ। इन नासपीटों नें तुम्हारी बुद्धि का दिवाला निकाल के रख दिया है। न जाने इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में क्यों नहीं घुस रही कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता"।
इतना कहकर वो कुछ देर तक तो नथुने फुलाती वहीं खडी रही लेकिन मेरी ओर से कैसा भी कोई जवाब न पाकर गुस्से में पैर फटकारती हुई रसोई की ओर निकल गई। उसके बाद भी वो न जाने क्या कुछ बोलती रही, जिसे मैं सुन न पाया। क्यों कि मेरे कानों में तो अब तक सिर्फ यही शब्द गूंज रहे थे कि अपनी जिम्मेदारियों से बढकर इन्सान का कोई धर्म नहीं होता।
(यह रचना इस से पूर्व वैशाखनन्दन सम्मान प्रतियोगिता में एक बार प्रकाशित की जा चुकी है. आज यहाँ इसे पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है)
सोमवार, 3 मई 2010
हिन्दी ब्लागिंग और टिप्पणियों का हिसाब-किताब (हास्य कथा)
(दरवाजे पर दस्तक की आवाज)
ललित शर्मा:- अरी ओर भगवान! जरा देखना तो सही कौन नासपीटा इतनी सुबह सुबह दरवाजा खटकटा रहा है।
(इतनी देर में फिर से दरवाजे पर ठक ठक की आवाज सुनाई देने लगी)
ललित:- (खीझ कर) तुम मत सुनना! मुझे ही उठना पडेगा। हाँ भाई बोलो तो सही कौन हो। भई हमसे कोई गलती हो गई क्या जो इतनी सुबह सुबह दरवाजा ही तोडने पर तुले हो।
आगन्तुक:- अरे भाई पहले दरवाजा तो खोलिए! क्या बाहर से ही टालने का इरादा है।
ललित शर्मा:- ठहरिए आता हूँ!
"अरे वाह्! मिश्रा जी.....आईये आईये...धन्यभाग हमारे जो आप पधारे! आईये बैठिए...
मिश्रा जी आसन ग्रहण कर लेते हैं तो ललित जी अपनी धर्मपत्नि को आवाज लगाते हैं। "अरी ओ भागवान! जरा इधर तो आना..."
श्रीमति आती हैं तो ललित जी बडे हर्षित मन से उनका मिश्रा जी से परिचय कराते हैं।" देख आज हमारे ब्लागर मित्र मिश्रा जी आए हैं...जा जरा जल्दी बढिया से चाय-नाश्ते का प्रबन्ध कर.." सुनते ही श्रीमति जी रसोई की ओर प्रस्थान कर लेती हैं और इधर ललित जी अपने ब्लागर मित्र मिश्रा जी से वार्तालाप में व्यस्त हो जाते हैं।
"अच्छा मिश्रा जी! ये तो बताईये कि अचानक कैसे आना हो गया...न कोई सूचना, न फोन"
मिश्रा जी:- भई बात ये है कि हम आज आपसे अपना हिसाब किताब क्लियर करने आए हैं।
सुनते ही ललित जी हैरान, "हिसाब! अजी मिश्रा जी कैसा हिसाब ? हमने आपसे कौन सा लोन ले रखा है जो आप हमसे वसूल करने आए हैं।
अब पता नहीं इनके मन में क्या आया कि इन्होने धर्मपत्नि को आवाज देकर चाय नाश्ता भेजने से मना कर दिया। " जरा ठहर जाओ, चाय नाश्ता अभी मत भेजना..."
भई मिश्रा जी साफ साफ कहिए, हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि आप किस हिसाब किताब की बात कर रहे हैं"
मिश्रा जी अपनी जेब से एक नोटबुक निकालते हैं और उसके पन्ने उलटते हुए बोलते चले जाते हैं...."बात ये है कि पिछले कईं दिनों से मैं आपको फोन करके कहने भी वाला था, लेकिन फिर ये सोचकर रूक गया कि कुछ दिनों बाद मेरा रायपुर जाना होगा ही, सो उसी समय आमने सामने बैठ कर ही क्लियर कर लेंगें"
भई क्या क्लियर कर लेंगें ? कुछ पता तो चले....आप तो पहेलियाँ बुझाए चले जा रहे हैं"
"भई बताता हूँ, जरा रूकिए तो सही.....अच्छा ये बताईये कि ब्लागिंग में रहते हम लोगों को आपस में जुडे हुए एक साल से अधिक तो हो ही चुका है न ?"
"जी हाँ, बिल्कुल! आप तो हमारे नजदीकी मित्रों में से हैं"
"वो सब तो ठीक है! मित्रता अपनी जगह है और हिसाब किताब अपनी जगह"
"अरे! फिर वही बात! भाई कौन सा हिसाब किताब ?"
मिश्रा जी अपने हाथ में पकडी नोटबुक ललित शर्मा के आगे कर देते हैं। ये देखिए पिछले एक साल में हमने आपकी जिस जिस पोस्ट पर जब जब टिप्पणी की है, उन सबका हिसाब इसमें लिखा हुआ है। ये देखिए कुल 420 टिप्पणियाँ हमारे द्वारा की गई हैं, ओर ये इधर देखिए साल भर में हमारी पोस्टों पर आपने कुल कितनी टिप्पणियाँ की हैं, महज 136. अभी ले देकर आपकी तरफ हमारी 284 टिप्पणियाँ बकाया रहती हैं। लेकिन आप हैं कि लौटाने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी कुछ दिनों से हमारी किसी भी पोस्ट पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आ रही...जब कि हमारी टिप्पणी रोजाना आपको पहुँच रही है। भाई ऎसा कैसे चलेगा?
"अरे मिश्रा जी! क्या बताएं आपको, आजकल बस कुछ समय ही नहीं मिल पा रहा.......वर्ना आपकी पोस्ट पर हम न टिप्पयाएं, ऎसा भला कभी हो सकता है."
"अरे वाह्! ये भी खूब कही...हमारी पोस्ट पढने के लिए आपके पास समय नहीं होता....ओर बाकी दिन भर जो 365 ब्लागों की कमेन्ट सूची में आपकी ये बनवारी लाल सरीखी मूच्छों वाली फोटू चस्पा मिलती है, वो शायद कोई जादू मन्तर से लग जाती होगी"
"ओह हो! अजी छोडिए भी इन बातो को... कुछ ओर सुनाईये"
"अरे ऎसे कैसे छोड दें....क्या हमारा समय फालतू का है जो हम आपको टिप्पणियाँ देने में खर्च करते हैं? क्या सरकार की ओर से बिजली हमें मुफ्त में मिलती है या इन्टरनैट सेवा कम्पनी हमारे बाबा जी की है, जिसके पैसे नहीं लगते! अगर इस जमाने में हम यूँ ही फोकट में दिन भर इन्टरनैट पर घूम घूम कर ब्लागों पर टिप्पयाते रहे न तो जल्द ही किसी गुरूद्वारे की शरण लेनी पड जाएगी। अरे भाई हम इतना समय और पैसा जो नष्ट करते हैं सिर्फ इसीलिए न कि हमें बदले में उसका कुछ प्रतिफल मिले, चाहे टिप्पणी के बदले टिप्पणी ही सही। लेकिन आप हैं कि उसमें भी धोखाधडी किए जा रहे हैं. ये तो सरासर हिन्दी ब्लागिंग के मूल सिद्धान्तों को नकारना हुआ। अगर आप अब भी इन्कार करते हैं तो हमारे पास सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं, या तो हम आपके खिलाफ अपने ब्लाग पर दो चार गरियाती हुई पोस्टें लिख मारें या फिर अपनी "चन्गू-मन्गू ब्लागर एसोसियशन" में अपनी शिकायत दर्ज करवाएं। अब आप ही बताईये कि हम क्या करें"
"अरे छोडिए मिश्रा जी, अच्छा चलिए आज आपकी शिकायत दूर कर देते हैं। रात भर जागकर आज आपकी सभी टिप्पणियाँ लौटा देता हूँ। अब तो खुश!"......चलिए चाय पीते हैं.....ओ भागवान!
"जी! आई!" कहते ही भाभी जी चाय नाश्ता ले आई.......मानो चाय की प्लेट थामे इन्तजार में दरवाजे के बाहर ही खडी हों...
दोनों परम मित्रों नें चाय नाश्ता किया....कुछ देर इधर उधर की बातें की और फिर मिश्रा जी दुआ सलाम करके वापिसी के लिए निकल लिए...ओर इधर ललित शर्मा जी इनका हिसाब किताब चुकता करने लैपटोप खोलकर रात भर बैठे रहे....जब सारा ऋण चुकता हो गया तो अगले दिन ही उधर से मिश्रा जी का फोन भी आ गया...आभार व्यक्त करने हेतु!
"हैल्लो! हाँ भाई ललित जी, आपकी टिप्पणियाँ वसूल पाई....इसके लिए आपका आभार. हाँ आगे से टिप्पणी साथ के साथ ही चुकता कर दिया करें. ज्यादा लम्बे चौडे हिसाब-किताब में गडबड होने का डर रहता है। अच्छा रखता हूँ, राम-राम्! भाभी जी को हमारी ओर से चरण स्पर्श कीजिएगा"
ललित जी नें फोन बन्द किया ही था कि साथ खडी उनकी श्रीमति जी पूछ बैठी--"अजी किसका फोन था?"
"वो कल जो आए थे अपने मिश्रा जी, उन्ही का था.....अरे हाँ याद आया" इतना कहते ही ललित जी नीचे को झुकने लगे.....अब पता नहीं उनकी कोई चीज गिर गई थी, जिसे कि वो उठाने के लिए झुके थे या फिर मिश्रा जी द्वारा फोन पर कहा गया अन्तिम वाक्य उन्हे याद आ गया था........राम जाने! :-)
ललित शर्मा:- अरी ओर भगवान! जरा देखना तो सही कौन नासपीटा इतनी सुबह सुबह दरवाजा खटकटा रहा है।
(इतनी देर में फिर से दरवाजे पर ठक ठक की आवाज सुनाई देने लगी)
ललित:- (खीझ कर) तुम मत सुनना! मुझे ही उठना पडेगा। हाँ भाई बोलो तो सही कौन हो। भई हमसे कोई गलती हो गई क्या जो इतनी सुबह सुबह दरवाजा ही तोडने पर तुले हो।
आगन्तुक:- अरे भाई पहले दरवाजा तो खोलिए! क्या बाहर से ही टालने का इरादा है।
ललित शर्मा:- ठहरिए आता हूँ!
"अरे वाह्! मिश्रा जी.....आईये आईये...धन्यभाग हमारे जो आप पधारे! आईये बैठिए...
मिश्रा जी आसन ग्रहण कर लेते हैं तो ललित जी अपनी धर्मपत्नि को आवाज लगाते हैं। "अरी ओ भागवान! जरा इधर तो आना..."
श्रीमति आती हैं तो ललित जी बडे हर्षित मन से उनका मिश्रा जी से परिचय कराते हैं।" देख आज हमारे ब्लागर मित्र मिश्रा जी आए हैं...जा जरा जल्दी बढिया से चाय-नाश्ते का प्रबन्ध कर.." सुनते ही श्रीमति जी रसोई की ओर प्रस्थान कर लेती हैं और इधर ललित जी अपने ब्लागर मित्र मिश्रा जी से वार्तालाप में व्यस्त हो जाते हैं।
"अच्छा मिश्रा जी! ये तो बताईये कि अचानक कैसे आना हो गया...न कोई सूचना, न फोन"
मिश्रा जी:- भई बात ये है कि हम आज आपसे अपना हिसाब किताब क्लियर करने आए हैं।
सुनते ही ललित जी हैरान, "हिसाब! अजी मिश्रा जी कैसा हिसाब ? हमने आपसे कौन सा लोन ले रखा है जो आप हमसे वसूल करने आए हैं।
अब पता नहीं इनके मन में क्या आया कि इन्होने धर्मपत्नि को आवाज देकर चाय नाश्ता भेजने से मना कर दिया। " जरा ठहर जाओ, चाय नाश्ता अभी मत भेजना..."
भई मिश्रा जी साफ साफ कहिए, हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि आप किस हिसाब किताब की बात कर रहे हैं"
मिश्रा जी अपनी जेब से एक नोटबुक निकालते हैं और उसके पन्ने उलटते हुए बोलते चले जाते हैं...."बात ये है कि पिछले कईं दिनों से मैं आपको फोन करके कहने भी वाला था, लेकिन फिर ये सोचकर रूक गया कि कुछ दिनों बाद मेरा रायपुर जाना होगा ही, सो उसी समय आमने सामने बैठ कर ही क्लियर कर लेंगें"
भई क्या क्लियर कर लेंगें ? कुछ पता तो चले....आप तो पहेलियाँ बुझाए चले जा रहे हैं"
"भई बताता हूँ, जरा रूकिए तो सही.....अच्छा ये बताईये कि ब्लागिंग में रहते हम लोगों को आपस में जुडे हुए एक साल से अधिक तो हो ही चुका है न ?"
"जी हाँ, बिल्कुल! आप तो हमारे नजदीकी मित्रों में से हैं"
"वो सब तो ठीक है! मित्रता अपनी जगह है और हिसाब किताब अपनी जगह"
"अरे! फिर वही बात! भाई कौन सा हिसाब किताब ?"
मिश्रा जी अपने हाथ में पकडी नोटबुक ललित शर्मा के आगे कर देते हैं। ये देखिए पिछले एक साल में हमने आपकी जिस जिस पोस्ट पर जब जब टिप्पणी की है, उन सबका हिसाब इसमें लिखा हुआ है। ये देखिए कुल 420 टिप्पणियाँ हमारे द्वारा की गई हैं, ओर ये इधर देखिए साल भर में हमारी पोस्टों पर आपने कुल कितनी टिप्पणियाँ की हैं, महज 136. अभी ले देकर आपकी तरफ हमारी 284 टिप्पणियाँ बकाया रहती हैं। लेकिन आप हैं कि लौटाने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी कुछ दिनों से हमारी किसी भी पोस्ट पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आ रही...जब कि हमारी टिप्पणी रोजाना आपको पहुँच रही है। भाई ऎसा कैसे चलेगा?
"अरे मिश्रा जी! क्या बताएं आपको, आजकल बस कुछ समय ही नहीं मिल पा रहा.......वर्ना आपकी पोस्ट पर हम न टिप्पयाएं, ऎसा भला कभी हो सकता है."
"अरे वाह्! ये भी खूब कही...हमारी पोस्ट पढने के लिए आपके पास समय नहीं होता....ओर बाकी दिन भर जो 365 ब्लागों की कमेन्ट सूची में आपकी ये बनवारी लाल सरीखी मूच्छों वाली फोटू चस्पा मिलती है, वो शायद कोई जादू मन्तर से लग जाती होगी"
"ओह हो! अजी छोडिए भी इन बातो को... कुछ ओर सुनाईये"
"अरे ऎसे कैसे छोड दें....क्या हमारा समय फालतू का है जो हम आपको टिप्पणियाँ देने में खर्च करते हैं? क्या सरकार की ओर से बिजली हमें मुफ्त में मिलती है या इन्टरनैट सेवा कम्पनी हमारे बाबा जी की है, जिसके पैसे नहीं लगते! अगर इस जमाने में हम यूँ ही फोकट में दिन भर इन्टरनैट पर घूम घूम कर ब्लागों पर टिप्पयाते रहे न तो जल्द ही किसी गुरूद्वारे की शरण लेनी पड जाएगी। अरे भाई हम इतना समय और पैसा जो नष्ट करते हैं सिर्फ इसीलिए न कि हमें बदले में उसका कुछ प्रतिफल मिले, चाहे टिप्पणी के बदले टिप्पणी ही सही। लेकिन आप हैं कि उसमें भी धोखाधडी किए जा रहे हैं. ये तो सरासर हिन्दी ब्लागिंग के मूल सिद्धान्तों को नकारना हुआ। अगर आप अब भी इन्कार करते हैं तो हमारे पास सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं, या तो हम आपके खिलाफ अपने ब्लाग पर दो चार गरियाती हुई पोस्टें लिख मारें या फिर अपनी "चन्गू-मन्गू ब्लागर एसोसियशन" में अपनी शिकायत दर्ज करवाएं। अब आप ही बताईये कि हम क्या करें"
"अरे छोडिए मिश्रा जी, अच्छा चलिए आज आपकी शिकायत दूर कर देते हैं। रात भर जागकर आज आपकी सभी टिप्पणियाँ लौटा देता हूँ। अब तो खुश!"......चलिए चाय पीते हैं.....ओ भागवान!
"जी! आई!" कहते ही भाभी जी चाय नाश्ता ले आई.......मानो चाय की प्लेट थामे इन्तजार में दरवाजे के बाहर ही खडी हों...
दोनों परम मित्रों नें चाय नाश्ता किया....कुछ देर इधर उधर की बातें की और फिर मिश्रा जी दुआ सलाम करके वापिसी के लिए निकल लिए...ओर इधर ललित शर्मा जी इनका हिसाब किताब चुकता करने लैपटोप खोलकर रात भर बैठे रहे....जब सारा ऋण चुकता हो गया तो अगले दिन ही उधर से मिश्रा जी का फोन भी आ गया...आभार व्यक्त करने हेतु!
"हैल्लो! हाँ भाई ललित जी, आपकी टिप्पणियाँ वसूल पाई....इसके लिए आपका आभार. हाँ आगे से टिप्पणी साथ के साथ ही चुकता कर दिया करें. ज्यादा लम्बे चौडे हिसाब-किताब में गडबड होने का डर रहता है। अच्छा रखता हूँ, राम-राम्! भाभी जी को हमारी ओर से चरण स्पर्श कीजिएगा"
ललित जी नें फोन बन्द किया ही था कि साथ खडी उनकी श्रीमति जी पूछ बैठी--"अजी किसका फोन था?"
"वो कल जो आए थे अपने मिश्रा जी, उन्ही का था.....अरे हाँ याद आया" इतना कहते ही ललित जी नीचे को झुकने लगे.....अब पता नहीं उनकी कोई चीज गिर गई थी, जिसे कि वो उठाने के लिए झुके थे या फिर मिश्रा जी द्वारा फोन पर कहा गया अन्तिम वाक्य उन्हे याद आ गया था........राम जाने! :-)
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