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रविवार, 28 नवंबर 2010

काश ! पुस्तकें बोल पाती...........

पुस्तकों का सौभाग्य देखिए, कि कल तक जो लाईब्रेरियों में धूल फाँका करती थी, आज इस आधुनिक युग में उन्हे भी ड्राईंग रूप में स्थान मिलने लगा है. कोठी और बंगलों को तो छोडिये, अब तो एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवारों में भी कुछ सुन्दर आवरण पृ्ष्ठ और सुनहरी जिल्दों से सुसज्जित पुस्तकें करीने से शो पीस बनाकर रखने का रिवाज हो गया है. मैने ऎसी पुस्तकें अपने कईं जानकारों के यहाँ सजी धजी मुद्रा में शो-केस में लगी देखी हैं, जिन्हे छूने का भी कष्ट कोई नहीं करता. भडकीली जिल्दों से सुसज्जित बडी-बडी पुस्तकें आप वहाँ देख भर सकते हैं-----पढने का फैशन नहीं है; बस पढे-लिखे दिखने दिखाने का फैशन है. घर में बीसियों आर्ट पीस हैं तो पुस्तकें भी उन्ही की संगी साथी बन शोभा बढाती रहें, यही इन बडे घरों में इनकी सार्थकता है. घर के मालिक को न तो उनके नाम और लेखक का पता है और न उनकी विषयवस्तु से कोई परिचय है. फिर भी अपनी सौन्दर्यकृ्ति और सांस्कृ्तिक स्थिति के कारण घर में ठौर पा सकी हैं. ऎसी शोभाकारक पुस्तकें जीवन भर अछूती ही रहती हैं. बस झाडने-पौंछने के सिवा उन्हे कोई नहीं छूता, पढने की बात तो कोसों दूर है.

हमारे एक व्यापारी मित्र हैं, मैने एक बार उनके ड्राईंग रूम में करीने से सजी-धजी हू-बहू एक ही आकार-प्रकार की 20 पुस्तकें देखकर उनसे पूछ लिया कि क्या यें एक ही पुस्तक की बीस प्रतियाँ हैं या अलग-अलग पुस्तकें हैं, देखने में तो सब की सब एक जैसी लग रही हैं. उस भले आदमी नें बडे उपेक्षा भाव से जवाब दिया कि "ये किताबें इन्टीरियर डेकोरेटर नें सजाई हैं. ये भी एक तरह से आर्ट-पीस ही हैं. सिर्फ सजावट के लिए रखी गई हैं. इनटीरियर डेकोरेटर नें कह रखा है कि इनका स्थान न बदला जाए, इन्हे पढने के लिए नहीं ड्राईंगरूम की शोभा के लिए रखा गया है" . शायद वे पुस्तकें इनसाईकलोपीडिया की चमकदार जिल्दों से सजी बीस प्रतियाँ थी. बेचारा भला आदमी इनकी यथास्थिति में खलल क्यों पैदा करे.
यह सब देखकर मैं सोचने लगता हूँ कि जिस विद्याध्ययन को सर्वश्रेष्ठ ठहराया जाता है: "सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुसूत्तमम" और जिसके विषय में कहा गया है कि : "न चौरहार्य न च राजहार्य, न भ्रातृ्भाज्यं न च भारकारी"----वह पुस्तकें उत्तम नहीं रहती और भार क्यों बन जाती हैं ? खैर कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन यह तो मानना ही होगा कि पुस्तक संग्रह की चरम परिणति अच्छी नहीं होती. पुस्तक की पराकाष्ठा या परागति उसकी दुर्गति में निहित है. सचमुच यह बडे खेद का विषय है. क्या पुस्तकों को दुर्गति तक पहुँचाने के लिए ही हम पुस्तकें संकलित करते हैं.
पुस्तकों की व्यथा कथा कोई नहीं सुनता. रद्दीवाले की दुकान ही उनकी अन्तिम शरण स्थली है. दूसरी गति तो उनका नष्ट होना ही है. काश्! पुस्तकें बोल पाती, मुखर होती और घर से निकाले जाने पर अपना ज्ञान भी वे अपने साथ ले जाती---तब जाकर मानवजाति परम्परा प्राप्त ज्ञान से वंचित होकर पुस्तकों के महत्व को समझ पाती.
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

डाक्टर.....भगवान...और मेरा विद्रोही मन

कुछ दिन पहले का एक वाकया है. हालाँकि, आज के इस युग में ऎसे वाकये अपने आप में इतने साधारण है कि उस पर कोई ध्यान न दिया जाए, तो उसकी यह उपेक्षा किसी अपराध के दर्जे में खींच-तान कर भी दर्ज नहीं की जा सकती.परन्तु एक संवेदनशील व्यक्ति होने के नाते ऎसा कुछ देखना मन को सालता तो जरूर है.
हुआ ये कि,लगभग सप्ताह भर पहले की बात है, शायद मौसम में बदलाव की वजह रही होगी, लगातार दो तीन दिन हमें बुखार से जूझना पडा. वैसे तो मैं, ऎलोपैथी ईलाज से हमेशा से ही दूर रहता आया हूँ. मेरा विश्वास सिर्फ आयुर्वेद पर ही टिका है. लेकिन आजकल फैले डेंगू के प्रकोप की वजह से पत्नि इस जिद पर अडी रही कि चलकर एक बार डाक्टर को दिखा लिजिए. सो, न चाहते हुए भी इस बार उसकी जिद के आगे झुकना ही पडा और मन को मारते हुए पहुँच गये डाक्टर के पास.
डाक्टर वर्मा----एम.बी.बी.एस(एमडी)और भी जाने कौन-कौन सी डिग्रियाँ जिनके नाम से जुडी हुई है. शहर के नामी काबिल डाक्टरों में गिने जाते हैं. वहाँ पहुंचें तो देखा हमसे पहले ही कोई आठ-दस मरीज अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे हैं. बाहर काऊन्टर पर एक छुईमुई सी लडकी बैठी थी, जो हर आने वाले का नाम अपने रजिस्टर में दर्ज कर उसके हाथ में एक टोकन थमा देती. हमने भी उसके बही-खाते में अपना नाम लिखाया और टोकन थामे अपनी बारी का इन्तजार करने लगे. बैठे-बैठे कोई आधा घंटा बीत गया, लेकिन बारी है कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी और इधर मरीजों की भीड है कि बढती ही चली जा रही थी. घंटे भर बाद तो ये हालत थी कि बैठना तो दूर, बल्कि क्लीनिक में खडे होने भर की भी जगह नहीं थी. ऎसा लग रहा था कि मानो सारे शहर भर के मरीज इन्ही के यहाँ इकट्ठे हुए जा रहे हैं.
बहरहाल, हम कुनमुनाते हुए से बैठे इन्तजार करते रहे. बस अब हमारा नम्बर आने ही वाला था. हमसे पहले के मरीज की जाँच चल रही थी. हम अपनी सीट से उठकर, दरवाजे के पास खडे बारी की इन्तजार में ही थे, कि तभी एक 28-30 साल का एक नवयुवक बाहर से आया और बिना इधर उधर देखे, सीधा डाक्टर के केबिन में घुस गया. हमें कोफत तो बहुत हुई कि यहाँ हम पिछले डेढ घण्टे से बैठे इन्तजार किए जा रहे हैं और ये मुँह उठाये लाट साहब की तरह घुस गया. सचमुच इस देश में नियम, सिस्टम नाम की कोई चीज रह ही नहीं गई है. लेकिन भला किया भी क्या जा सकता था,सिवाए कुढने के. अब डाक्टर से लडने से तो रहे.
खैर, हम खडे खडे अपना ओर अधिक खून जलाते कि तभी उस लडके की आवाज सुनाई दी. हमें लगा कि वो डाक्टर को अपने साथ चलने के लिए कह रहा है. थोडा ध्यान दिया तो मालूम पडा कि अचानक से उसके पिता को रीढ की हड्डी में कोई समस्या हुई है, जिसकी वजह से वो बिस्तर से उठ पाने में भी असमर्थ है. इसलिए ही वो डाक्टर को अपने साथ चलने के लिए कह रहा था. लेकिन डाक्टर नें इस समय उसके साथ चलने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. उसका कहना था कि बाहर इतने मरीज बैठे हैं. फिलहाल उन्हे छोडकर मैं नहीं जा सकता. तुम उन्हे गाडी में डलवाकर यहीं ले लाओ. लेकिन युवक बारबार यही कहता रहा कि उसके पिता की हालत ऎसी है कि,वो इस समय अपने शरीर का कोई भी अंग नहीं हिला पा रहे हैं. पीठ इस कदर अकडी हुई है कि जरा सा हाथ लगाते ही दर्द से चिल्ला उठते हैं. हालत ऎसी नहीं है कि बिस्तर से एक इंच भी उठ पायें.
युवक के मुँह से निकला "प्लीज" शब्द कईं बार मेरे कानों तक पहुंचा, मगर बदले में डाक्टर की ओर से बार-बार सिर्फ यही सुनने को मिलता रहा, कि "नहीं मैं इस समय क्लीनिक छोडकर तुम्हारे साथ नहीं चल सकता. तुम उन्हे जैसे भी करके यहीं ले आओ".थोडी देर में युवक केबिन से बाहर निकल आया. उस समय उसके चेहरे पर छाई उदासी और लाचारी के भावों को कोई भी बडी आसानी से पढ सकता था.

तभी टोकन बाँटती उस लडकी द्वारा हमें इशारा किया गया कि आप जाईये.......अब आपका नम्बर है. मैने दरवाजा खोल अन्दर कदम तो रख दिया मगर उस समय दिमाग में कुछ ऎसे प्रश्न जन्म ले बैठे, जो मुझसे अपना समाधान भी माँग रहे थे.पहला प्रश्न यह कि: ये कहना कितना सही है कि डाक्टर भगवान का प्रतिरूप होता है? जिस डाक्टर नें किसी की विवशता और कष्ट को जानते-समझते हुए भी, उसके साथ चलना गवारा न किया, क्या वो भगवान का प्रतिरूप हो सकता है? एक दुकानदार और डाक्टर में भला क्या अन्तर है? और इस सवाल के जवाब में जैसे मैं स्वयं अपने आप से ही कह रहा हूँ; यह शायद पैसे के प्रभुत्व का ही अभिशाप है. हालाँकि, उस समय मेरे विद्रोही मन में ओर भी बहुत कुछ चल रहा था.चाहता भी था कि डाक्टर से वो सब कह डालूँ-----मगर ? कह न पाया! 

मेरे निकट इस वाकये का एक पहलू और भी महत्वपूर्ण है कि वह युवक समाज के उस अति प्रतिष्ठित डाक्टर की इस प्रकार की अनपेक्षित प्रतिक्रिया से बच पाया. इस मायाचक्र से वह कैसे बच पाया, यह स्वयं अपने आप में मेरे लिए तो विस्मय का एक मायाचक्र ही है. वो डाक्टर उसकी विवशता को जानते-समझते हुए भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ; यह जानकर भी कि उसके पिता यहाँ आने में असमर्थ हैं, वो भीषण शारीरिक कष्ट से गुजर रहे हैं.
उसे भीतर ही भीतर चाहे जितना क्रोध आया हो, पर डाक्टर के प्रति उसकी कृतज्ञता अभंग रही....जाते समय भी वो डाक्टर का अभिवादन करके गया. मगर मैं ?
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

बुधवार, 24 नवंबर 2010

जो बुद्धि की कसौटी सहन कर सकता हो, वही असली धर्म है !!!

कुछ लोग हैं, जो मानते हैं कि बुद्धि और धर्म दोनों एक दूसरे के विपरीत तत्व है। इन दोनों के क्षेत्र बिल्कुल अलग-अलग है. बात है भी सही। क्योंकि जहाँ बुद्धि तर्क पर चलती है, वहीं धर्म श्रद्धा पर। लेकिन इतने पर भी बुद्धि खुद समझती है कि मेरी हद कहाँ तक है। इसलिए, यदि बुद्धि का प्रयोग करने से कोई विश्वास, कोई धर्म टूटता है तो उसे टूटने ही देना चाहिए। बुद्धि की कैंची से जो धर्म कट जाए, खंडित हो जाए---समझिए कि वह धर्म नालायक है। जो बुद्धि की कसौटी सहन कर सकता हो, वही असली धर्म है। लेकिन जो ये सोचने का अंग है, उसमें किसी धर्म के मानने वाले यदि यह कहें कि बुद्धि प्रयोग से हमारी परम्पराएं, हमारे विश्वास, हमारी धारणाएं खंडित होती है तो समझना चाहिए कि वें खंडित होने के लायक ही है।

बचपन में हमें कहा जाता था कि चोटी खुली रखने से ब्रह्महत्या का पाप लगता है। अब बचपन की बात है तो उस समय इतनी समझ भी कहाँ होती थी कि तर्क करने बैठें। सो जैसा कहा गया वैसा मान लिया। कुछ बडे हुए तो उसकी गम्भीरता समझ में आई और पूछ बैठे कि यदि चोटी न बाँधने से ही ब्रह्महत्या लग जाती है तो यदि कोई साक्षात ब्रह्महत्या कर दी जाए तो फिर कितना पाप लगेगा? बस, इसका किसी के पास् क्या जवाब होता। सो, टूट गई श्रद्धा। कहने का मतलब ये कि इस प्रकार की बेसिरपैर की बातों का बुद्धि से कोई सम्बंध नहीं है।
आज, चाहे कोई सा भी धर्म क्यों न हो, सबमें धर्म के नाम पर अनेक प्रकार की अन्धश्रद्धाएं, भान्ती-भान्ती की कुरीतियाँ ही देखने को मिल रही हैं। इन्सान धर्म की आड में चल रही इन कुप्रथाओं को ही वास्तविक धर्म समझने लगा है। अब यदि कोई व्यक्ति इनके विरूद्ध आवाज उठाता भी है तो लोग उसे निज धर्म का खंडन मानने लगते हैं। लोगों को सोचना चाहिए कि अगर ये प्रथायें बुद्धि प्रयोग से खंडित होती हैं, तो उन्हे खंडित होने दें। अब यदि कोई उसे निज धर्म का खंडन मानता है तो उन्हे यह भी समझ लेना चाहिए कि वास्तव में धर्म कभी खंडित होने वाला नहीं होता। ओर जो खंडित हो जाए, समझो वो धर्म ही नहीं है। इसलिए उसके विषय में दुख करने, क्रोधित होने का कोई कारण ही नहीं है।

धर्म में, जो नाना प्रकार के मसलन बली प्रथा, कुर्बानी जैसे गैर जरूरी तत्व शामिल हो गए हैं, उन्हे हटाया जाए और स्पष्ट कहा जाए कि वे जरूरी नहीं है। भिन्न भिन्न धर्मावलम्बी जो छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे का विरोध करते हैं, जरा जरा सी बात पर मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं, उन्हे ये समझना चाहिये कि अपनी कुरीतियों पर पर्दा डालने की बजाय, उसके बदले में सर्वमान्य नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित किया जाए और उसके अनुसार जीवन चलाने का प्रयास किया जाए। ऎसा करने पर ही लोगों में धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा विकसित होगी और समाज भी सही रूप में प्रगति कर सकेगा।
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धर्म यात्रा

रविवार, 21 नवंबर 2010

ब्लागर्स से......मनुज प्रकृति से शाकाहारी (संडे ज्ञान)

ब्लागर्स से:-

रंगों की पहचान अन्धे के बूते की बात नहीं हुआ करती. आँख है तो ही दृश्य है. दृश्य पर नेत्रहीन की आस्था असम्भव है. इन्द्रधनुष जन्मान्ध के लिए आविर्भूत नहीं होता. गाने के तराने, राग-रागनियों की स्वर लहरियाँ  वज्र-वधिर के लिए कोई अस्तित्व नहीं रखती. मल्हार बहरे के लिए नहीं गाया जाता, न वीणा झंकृत होती है....इसलिए अधर्म का चश्मा लगाए बैठे अक्ल के अन्धों पर अपना समय नष्ट  करने की अपेक्षा उन पाठकों को ध्यान में रखते हुए लिखा जाए, जिनकी अक्ल और आँखें दोनों सलामत हैं...... 
आज संडे ज्ञान में श्री धन्यकुमार जैन जी कि एक कविता की चन्द पंक्तियाँ (स्मरण-शक्ति के आधार पर)प्रस्तुत है......

मनुज प्रकृति से शाकाहारी 
माँस उसे अनुकूल नहीं है !
पशु भी मानव जैसे प्राणी
वे मेवा फल फूल नहीं हैं !!

वे जीते हैं अपने श्रम पर
होती उनके नहीं दुकाने !
मोती देते उन्हे न सागर
हीरे देती उन्हे न खानें !!
नहीं उन्हे है आय कहीं से
और न उनके कोष कहीं हैं!
नहीं कहीं के "बैंकर" बकरे
नहीं, "क्लर्क" खरगोश कही हैं !!
स्वर्णाभरण न मिलते उनको
मिलते उन्हे दुकूल नहीं है !
अत: दु:खी को और सताना
मानव के अनुकूल नहीं है !!

कभी दीवाली होली में भी
मिलती उनको खीर नहीं है !
कभी ईद औ क्रिसमिस में भी
मिलता उन्हे पनीर नहीं है!!
फिर भी तृण से क्षुधा शान्त कर
वे संतोषी खेल रहे हैं !
नंगे तन पर धूप जेठ की
ठंड पूस की झेल रहे हैं !!
इतने पर भी चलें कभी वें
मानव के प्रतिकूल नहीं हैं !!
अत: स्वाद हित उन्हे निगलना
मानव के अनुकूल नहीं हैं !!
क्या नहीं मनुज को खेत लुटाते
गेहूँ, मक्का, धान, चने हैं !
औ फल देने हेतु किमिच्छिक
दानी से उद्यान तने है !!
अत: बना पकवान चखो तुम
फल खाकर सानन्द जियो तुम
मेवों से लो सभी विटामिन
बलवर्द्धक घी, दूध पियो तुम !!
तुम्हे पालने में असमर्था !
धरती माँ की धूल नहीं है!
अत: अन्न, फल, मेवे रहते
माँस तुम्हे अनुकूल नहीं है !!

शाकाहारी और अहिंसक
बनो धर्म का मूल यही है!
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!



ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

शनिवार, 20 नवंबर 2010

हिँसा में जो शक्ति है, वह प्रेम में कहाँ.......

लोग 'प्रेम' की बात करते हैं, 'अमन' की बात करते हैं, 'करूणा' की बात करते हैं, लेकिन मैं कहता हूँ कि हिँसा में जो शक्ति है, वह न तो प्रेम में है, न अमन में,न शान्ती में और न ही करूणा, दया जैसी किसी भावना में है!

अतीत में बडे-से-बडे पैगम्बरों और अवतारों नें आपको प्रेम करना सिखाया है----मानवता से, सत्य से. जो पुण्य है उससे प्रेम करने की शिक्षा उन्होने दी है, परन्तु आपने अपने कईं हजार वर्षों के निरन्तर चलन से यह प्रमाणित करने की कीशिश की है कि आपकी हिँसा अमर है, प्रेम नहीं. जोर देने पर आप प्रेम को एक बाह्य परदे की भान्ती सामयिक तौर पर ओढ सकते हैं, परन्तु स्वतन्त्रता मिलते ही आप उस नकाब को नोच फैंकना चाहते हैं और फिर से अपनी मनचाही क्रीडाओं में व्यस्त हो जाते हैं. उस समय आप हर पिछली लडाई से अधिक भयंकर एक और लडाई लडते हैं, हिँसा की कालोत्पन सैरगाहों में मानवी रक्त के सुर्ख फुवारे आकाश-शिखर पर विजय पाने की कौशिश में लग जाते हैं और किसी शाहजहाँ की आँख से प्रेम और वफा के नाम पर बहाये गये उस एक आँसू-----ताजमहल को जमे हुए सफेद लहू से बनाये गये पाषाणों का एक ढेर-मात्र बना दिया जाता है.
मुझे विश्वास है कि यह सब इसलिए नहीं होता है कि आपको 'इन्सानियत' से बैर है(क्योंकि आखिर इन्सान आप स्वयं ही तो हैं और अपना विनाश किसी को प्रिय नहीं होता), बल्कि शायद आप यह सब कुछ इसलिए करते हैं कि आपको प्रेम,करूणा, दया के उपदेशों से ही घृणा है. एक मासूम बालक की भान्ती-----आपके प्राकृतिक मासूमपन अथवा निर्विकार होने और इस परम विशाल प्रकृति के उस अनदेखे सिरजनहार के सम्मुख आपके और अपने बचपने का मैं निरापद रूप से कायल हूँ------आप अपनी जिद मनवाने के लिए अपने निजि नुक्सान की भी चिन्ता नहीं कर रहे. अत: मनोविज्ञानवेत्ताओं के आधुनिक शिक्षानुसार मैं आप पर धर्मोपदेशों के कोडे फटकारने के बजाय आप ही की जिद्द मान लेता हूँ. आपकी बात रखने के लिए, मैं आपसे कहता हूँ कि आप ही की भावना ठीक है. इसी को फलने-फूलने दीजिए.

इस पोस्ट के जरिये मैं आपको हिँसा का संदेश देना चाहता हूँ, घृणा का सन्देश देना चाहता हूँ------वहशीपन से, बर्बरता और पाशविकता और अमानुषिकता के प्रति हिँसा एवं घृणा का संदेश. आपको घृणा ही करनी है तो इनसे घृणा कीजिए, हिँसा करनी हो तो इनके प्रति कीजिए और इस प्रकार आप घृणा और हिँसा के पथ से ही सत्य-मार्ग पर आ जायेंगें. आपको आखिर हिँसा ही तो चाहिए---तो फिर कीजिए हिँसा. जी भर कर कीजिए.
हिँसा,वध और हर पुण्य-भावना का स्तीत्व नष्ट करने का आपका यह शौक जब अपनी चरम सीमा को पहुँच जाएगा तो उसका एकमात्र परिणाम हमारे एक मित्र के शब्दों में कहूँ, तो सिर्फ यही हो सकता है कि------"इन कातिल कौमों के घर भविष्य में बच्चों की जगह भेड, बकरियाँ ही पैदा हों---माँस के लोथडे ही इस कौम की कोख से जन्म लें; और फिर सारी की सारी कौम किसी पापी के जमीर की भान्ती, अपने ही आंतक और घृणा के मारे दरियायों में कूद-कूदकर मर जाए-----"

इन कटु शब्दों को लिखकर अगर मैने बुनियादी तौर पर इस परिणाम, इस हिंस्र पाशविकता, इस अमानुषिकता के विरूद्ध आपके ह्रदय में थोडी सी भी हिँसा पैदा कर दी हो, तो मैं अपने आपको कृतकार्य्य समझूँगा. निश्चय ही बर्बरता के प्रति की गई यह हिँसा आपको मानवता के निकटतर ले आएगी. मैं दिल से चाहता हूँ कि यहाँ लिखे गए इन कटु शब्दों की सान पर चढकर आपकी उस हिँसा की तलवार को इतनी तीखी धार मिल जाए कि फिर भविष्य में जब कभी किसी निरीह पशु की गर्दन तक आपका छुरा पहुँचने लगे, तो वही तेज कटार आपके उस उठते हुए हाथ को काट डाले, शब्दों का यह लोहा उस कटार के लोहे को कुण्ठित कर दे, तो मैं समझूंगा कि इस बारे में ब्लाग पर आकर हमारा ये सब लिखना सफल हुआ.
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ऊपर की पंक्तियाँ किसी धर्म विशेष को आधार में रखकर नहीं लिखी गई, बल्कि उन लोगों के लिए लिखी गई हैं जो हिँसा, क्रूरता, पाशविकता की प्रभुता में विश्वास रखते हैं.
उनके अतिरिक्त और लोग भी हैं जो दूसरी सीमा पर हैं, उस सीमा पर जहाँ मन के लड्डुओं के सिवा और कुछ है ही नहीं, जहाँ प्रेम के सोते फूटते हैं,जहाँ करूणा का सागर हिल्लोरे ले रहा हो, हठधर्मिता, कलुषता और निर्दयता  की दलदल से दूर.....उनके लिए होगी हमारी आगामी पोस्ट.
(प्रस्तुत पोस्ट अमित शर्मा जी की कल की इस पोस्ट की उपज हैं)
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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

न गुड सा मीठा, न नीम सा कडवा !!!

चलिए, आज आपको एक कहानी सुनाते हैं. एक था सांप और एक थे ऋषि. साँप एक दिन ऋषि के पास जा बैठा और उनसे कुछ ज्ञान देने की प्रार्थना की. ऋषि नें उसे अहिंसा का उपदेश दिया. बस, उस दिन से साँप नें व्रत ले लिया कि अब वह किसी को न काटेगा. कुछ दिन बीते कि ऋषि अपनी तीर्थयात्रा पर चले गए और साँप के व्रत की बात आसपास सबको मालूम हो गई. अब हुआ ये कि वहाँ खेलते हुए बच्चे उस साँप को पकड लेते और घंण्टों तोडते मरोडते. एक दिन एक ग्वाले नें उसे पकडकर अपनी गाय के सींगों में बाँध दिया और दिन भर गाय झाडियों में सींग मारती घूमती रही. अब बेचारे साँप की तो आ गई शामत. बेचारा लहूलुहान होकर बडी मुश्किल से शाम को छूटा, पर दूसरे दिन बच्चों नें उसे फिर पकड लिया और उसके मुँह में रेत भर दिया.
उन बच्चों में कोई एक आध उदण्ड टाईप का लडका भी रहा होगा. उनमें से एक उसकी आँखों में सींक देकर अन्धा करने वाला ही था कि ऋषि उधर से आ निकले. देखते क्या हैं कि मोटा-मतंगा साँप लट्कर रस्सी हुआ पडा है और रूप एकदम से बटरूप!
खिन्न होकर बोले: " अरे यह क्या हुआ तुझे साँप?"
"महाराज, आपने ही तो अहिँसा का उपदेश दिया था!" साँप नें भक्ति-भाव से, पर कातर स्वर में कहा.
ऋषि समझ गये कि क्या हुआ है उसके साथ और बोले: "अरे मूर्ख, मैने यही तो कहा था कि काटना मत. पर यह कहाँ कहा था कि फुँकारना भी भूल जाना!"
साँप समझ गया और आज बहुत दिन बाद उसने फन उठाकर फुंकार मारी. बस, सारे खिलाडी नौ-दो-ग्यारह और उस दिन के बाद साँप अब व्रती भी और मौज में भी.
मतलब यह कि उदार रहो, कृपा करो, सबके साथ समानता निबाहो, पर सस्ते न बनो. अपना भेद न दो कि दूसरे सिरपर-से रास्ता करने की ठानें.
महाकवि कालिदास ने महाराज दिलीप के वर्णन में कहा है:---
"भीमकान्तैर्नृपगुणै: स: बभूवोजिविनाम
अदृ्श्यश्चाभिगभ्यश्च यादोरत्नैरिवार्णव: !!
दिलीप में भयंकरता भी थी और कमनीयता भी, इसलिए उसके आस-पास वाले न उसकी अवज्ञा कर सकते थे, न उपेक्षा; जैसे भयंकर जलजीवों के कारण लोग समुद्र को मथ नहीं सकते, पर रत्नों के कारण छोड भी नहीं पाते.
लोकभषा में भी तो कहते हैं कि 'न गुड सा मीठा, न नीम सा कडवा!" न ऎसा ही बन कि पल में निगला जाए और न ही ऎसा बन कि तुझे लोग थूक दें. 
क्या समझे ?
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बुधवार, 17 नवंबर 2010

शायद वो आदत से लाचार है.........

सुबह का वक्त--घर की छत पर बैठे, पुस्तक पढते हुए सर्दियों की हल्की गुनगुनी धूप का आनन्द लिया जा रहा है. थोडी देर में पुस्तक तो खत्म हो गई, लेकिन चाहने पर भी धूप से उठकर जाने का मन न हुआ. सो, बैठे-बैठे चाय की चुस्कियों के साथ धूप का आनन्द लिया जाने लगा. अब करने को कुछ काम तो था नहीं. दिमाग जरा किताब से हटकर खाली हुआ, तो स्वभाव के अनुसार उसे सोचने की फुर्सत मिली, पर वह सोचे क्या ?
भौं, भौं शब्द नें मस्तिष्क को राह दी, नजर घुमाकर देखा---सामने गली के मोड पर एक मकान की दहलीज में कुत्ता बैठा है और जो कोई भी सडक से गुजरता है, उस पर भौंकने लगता है. भौंकना उसकी आदत जो ठहरी!
अब दिमाग का सोचना कुत्ते से जा मिला. यह क्यों भौंकता है ? इसकी यह आदत क्यों है? आखिर यह कहता क्या है ? सवाल तो बहुत से हैं, पर जवाब तो किसी एक का भी नहीं. कुत्ता मेरी भाषा नहीं जानता कि मुझे बताये और मैं उसकी जुबान नहीं जानता कि उसे समझूँ. दोनों तरफ की इस नासमझी में अन्दाज को खुल के खेलने का अवसर तो मिला, पर अन्दाज भी कुछ नये सवाल पैदा करके ही रह गया.
क्या यह कुत्ता इसलिए भौंकता है कि वो शान्ती के साथ बैठना चाहता है और लोग इधर से उधर गुजरकर उसके 'अमन' में खलल डालते हैं ? या आने-जानें वालों से वो यह खतरा महसूस करता है कि लोग उसके मालिक के घर को लूट लेंगें और इसी लिए वह उन्हे भगाने की खातिर भौंकता है. क्या उसकी निगाह में हर आदमी चोर है? कुत्ता बराबर भौंके जा रहा है----भौं! भौं! भौं! और मैं बराबर सोचे जा रहा हूँ------क्यों, क्यों, क्यों ?

सोमवार, 15 नवंबर 2010

देश भक्ति बनाम ईश भक्ति

देश भक्ति बनाम ईश भक्ति

1. कोई मनुष्य सर्वरूप परमात्मा से अपनी अभेदता तब तक कदापि अनुभव नहीं कर सकता, जब तक कि समग्र राष्ट्र के साथ अभेदता उसके शरीर के रोम-रोम में जोश न मारती हो !

2. किसी व्यक्तिगत और स्थानीय धर्म को राष्ट्रीय धर्म से ऊँचा स्थान न देना चाहिए. इन धर्मों को ठीक अनुपात से रखना ही सुख प्रदान करता है!

3. राष्ट्र के लिए प्रयत्न करना ही विश्व की शक्तियों अर्थात देवताओं की आराधना करना है !

4. किसी देश में उस समय तक एकता और प्रेम नहीं हो सकता, जब तक कि उस देश के निवासी एक-दूसरे के दोषों पर जोर देते रहें !

5. कोई दुर्बल-चित्त मनुष्य, जो मुफ्तखोर आलसियों को पैसे की भीख देकर भले ही अपने आप को सराह ले कि उसने परलोक में अपनी आत्मा के उद्धार के लिए कुछ कर लिया है. यह बात सही हो या गलत, पर इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि उसने उस समय इस लोक में अपने राष्ट्र के पतन के लिए अवश्य कुछ कर डाला है !

6. कुछ लोग ऎसे हैं, जिनके लिए देश-भक्ति का अर्थ केवल भूतकाल के गये-बीते गौरव की निरन्तर डीँगें हाँकना भर है. ये दिवालिये साहूकार हैं, जो बहुत पुराने बहीखातों पर, जो कि अब व्यर्थ हैं, गहरी देखभाल करने में जुटे हैं !

7. किसी देश की उन्नति छोटे विचार के बडे आदमियों से नहीं, बडे विचार के छोटे आदमियों पर निर्भर हुआ करती है !

8. किसी भी मत अथवा धर्म को, जो आजकल के विज्ञान सम्बन्धी अन्वेषण के निरोग और शिष्ट परिणामों के साथ मेल नहीं खाता, किंचित अधिकार नहीं है कि वह अपने मूर्ख अनुयायियों पर जबरदस्ती करे या उन्हे अपना शिकार बनाये !

9. सत्य किसी व्यक्ति विशेष की सम्पति नहीं; सत्य किसी ईसा, मोहम्मद या कृष्ण की जागीर नहीं हैं; हमें इनके नाम से सत्य का प्रचार नहीं करना है. यह सत्य किसी भी मनुष्य विशेष की सम्पत्ति नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति की सम्पत्ति है !

10. चाहे कोई भी धर्म ग्रन्थ हो, यदि वह आपकी निर्बलता को दूर नहीं करता, यदि वह आपको मनुष्यता नहीं सिखा पाया, यदि वह आपके मन और आत्मा पर पडे बोझों को परे नहीं हटाता, तो यही बेहतर है कि उसे उठाकर कचरे के ढेर पर फैंक आओ !

11.  चाहे आप किसी एकान्त गुफा में कोई पाप करें, आप बिना किसी विलम्ब के यह देखकर चकित होंगें कि आपके पैरों तले की जमीन आपके विरूद्ध साक्षी देती है, आप बिना विलम्ब के देखेंगें कि उन्ही दीवारों और उन्ही वृ्क्षों के जुबान है और वे बोलते हैं ! आप प्रकृ्ति को धोखा नहीं दे सकते! यह एक सत्य है और यही दैवी विधान है !

रविवार, 14 नवंबर 2010

पठन मूर्खों की जमात

दुनिया में लकीर के फकीर स्वनामधन्य विद्वानों की कोई कमी नहीं. जहाँ-तहाँ यही लोग बिखरे पडे हैं. किसी भी शिक्षा या सिद्धान्त के तत्व में व्यवहार का जोड मिलाने के लिए ये लोग तैयार ही नहीं होते. जो किताब में लिखा है या जो गुरूओं नें बताया है, बस वही सत्य है, बाकी सब ?--प्रश्नचिन्ह!

इसी विषय में स्वामी रामकृ्ष्ण परमहँस के एक शिष्य की बडी मनोरंजक घटना याद आ रही है------स्वामी जी नें एक दिन अपने प्रवचन में कहा" सब प्राणियों में ईश्वर विद्यमान है. हमें उसका आदर करना चाहिए". बस एक शिष्य महोदय बाहर निकले तो सब प्राणियों को----गधा, घोडा, बैल, कुत्ते को भगवान समझकर नमस्कार करने लगे. इतनें में एक हाथी जो पागल हो गया था, चिंघाडता हुआ आया. उसका महावत हाथी पर ही बैठा बैठा उसे काबू में लाने की कौशिश में जुटा था. लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी. इसलिए वह चिल्ला-चिल्ला कर लोगों को आगाह कर रहा था---"बचो! भागो, भागो! हाथी पागल हो गया है!" लेकिन हमारे शिष्य महाशय क्यों भागने लगे? वे हाथ जोडकर और नतमस्तक होकर हाथी देव के आगे खडे हो गए, पर देवता नें उनकी पूजा की कोई परवाह नहीं की, ऎसी सूंड फटकारी कि वे कईं हाथ दूर जा गिरे और लहूलुहान हो गए. जब स्वामी रामकृ्ष्ण नें पूछा कि--"तुम भागे क्यूँ नहीं ? तो जवाब मिला कि "हाथी में तो ईश्वर है न, मैं उस ईश्वर के सामने से कैसे भाग सकता था ?". स्वामी जी नें मुस्कुराते हुए कहा, "पागल हाथी में जो ईश्वर था, उसकी बात तो तुमने मान ली, लेकिन उस महावत में बसा ईश्वर जो तुम्हे आगाह कर रहा था, उसकी बात क्यों नहीं मानी ?"

ऎसे ही पुस्तक कीटों की जो यहाँ एक श्रेणी पैदा हुई है, उसे "पठन मूर्ख" कहा जाता है. चाहे बेशक कितनी ही किताबें चाट डाली हों, कितने ही धर्मग्रन्थों का अध्ययन क्यूं न कर चुके हों लेकिन फिर भी कोरे के कोरे बने हुए हैं. कथनी-करनी का अन्तर देखिये कि शान्ती, प्रेम, सद्भावना, समरसता जैसे नाना प्रकार के विचार सब दिमाग में बसा रखे हैं, लेकिन उसमें इतना पक्का ताला लगा हुआ है कि कहीं गलती से भी कोई विचार प्रत्यक्ष जीवन और व्यवहार में काम न आ जाए.
दुनिया नव निर्माण करे ये मुर्दे गडे उखाड रहे हैं
नहीं समझते 'मूर्ख' अपनी जीती बाजी हार रहे हैं !!

बुधवार, 10 नवंबर 2010

जागती आँखों के सपने.............

कहते हैं कि अच्छी नींद वह होती है, जिसमें सपने नहीं आते. मैं तो अच्छी ही नींद सोता हूँ. कभी सपने आते भी हैं तो याद नहीं रहते, सवेरे कुछ ध्यान रहता है कि अच्छा सा सपना देखा था, पर क्या, यह याद नहीं आता. बस अच्छाई की जो छाप रहती है, उसी को लिए दिन-भर काट देता हूँ.
बचपन के सपने भी कुछ ऎसे ही होते हैं; जब जागे तो सपने की मिठास बनी रहे, और कुछ याद रहे या न रहे---यही तो चाहिए! अपनी कहूँ तो आप को एक रहस्य की बात बता दूँ-----मुझ में वह मिठास तो बनी ही हुई है; उसी के कारण मैने यह सोच लिया है कि असल में मेरा सब से बढिया सपना वह है जो मैं अब देखूँगा. आज देखूँगा कि कल देखूँगा कि परसों, यह तो कोई सवाल नहीं है; देखूँगा, बस यह विश्वास चाहिए और इसी के सहारे मैं जीवन में बराबर नयी स्फूर्ती और उमंग लेकर आगे बढा चलता हूँ. यह भी सवाल नहीं है कि वह सपना सो कर देखूँगा कि जागते-जागते देखूँगा. क्योंकि असल में सच्ची शक्ति उन्ही सपनों में होती है जो जागते जागते देखे जाते हैं. नींद में देखे गए सपने तो छाया से आ कर चले जाते हैं; जो सपने हम जागते-जागते देखते हैं, वे हमारे जीवन पर छा जाते हैं, उसे आगे चलाते हैं, उसे दिशा और गति देते हैं. जागती आँखों के सपने हमें ऎसे काम करने की शक्ति दे देते हैं जो हम से बिना उस शक्ति के कभी न हो सकते. ये जागते स्वपन असल में आदर्श होते हैं जिन पर हम चलते हैं; ऎसे स्वपन एक आदमी भी देखता है और समाज भी.

बरसों पहले की बात है, हमारे पडोस के मकान में एक सरदार फैमली रहा करती थी, जिनका एक बेहद ही प्यारा सा बच्चा था. बच्चों से अक्सर लोग पूछा करते हैं, " तुम बडे होकर क्या बनोगे?" वैसे ही इस से भी पूछते थे. और वह हमेशा एक ही जवाब देता था, जिस पर सब हंसते थे---"मैं पापा जी वाँगूं वड्डा बणना ए "( मैं डैडी की तरह बडा बनूँगा). पर सोचकर देखें तो हँसने की बात इस में कुछ नहीं है. बात यह है कि यही उस का सपना था. और सपना इसलिए था कि उसे बात-बात पर टोका जाता था कि 'बडे होकर यह करना' 'बडे होकर वह कर लेना', 'बडे होकर यह समझोगे' वगैरह वगैरह. उसने समझ लिया कि बडे हो जाना ही सब समस्यायों का हल है--बडे होते ही सब अडचनें दूर हो जाएंगी, सब ताकत मिल जाएगी, सब चीजें सुलभ हो जाएंगी! जो बनने में कुछ भी बनना सम्भव हो जाये, वही तो बनना चाहिए. बच्चे से कभी पूँछें कि तुम यह लोगे कि वह, तो वह सीधा जवाब थोडे ही देता है ? कहता है, "दोनो-----सब!"

सनातनी ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण ग्रन्थों से तो हमारा वास्ता शुरू से ही रहा है. पढने के लिए जब गुरूकुल भेज दिए गए, ग्रन्थों से पीछा तो तब भी न छूटा. इन्ही शास्त्रों, ग्रन्थों के बीच रहते हमने भी बचपन में कभी एक सपना देखा था. सपना ये था कि बडे होकर हम भी रामचरितमानस जैसा ही कोई ग्रन्थ लिखेंगें. थोडा बडा होने पर जब शरीर के साथ साथ बुद्धि भी विकसित हो बाल से युवा में परिवर्तित हुई तो जाकर समझ आई कि हम कितना मूर्खतापूर्ण स्वपन देख बैठे हैं. अब बचपन में बोया हुआ वो बीज अंकुरित हो भीतर कहीं गहरे अपनी जडे भी जमाने लगा था, सो उसे उखाड फैंकने का भी साहस न जुटा सके. महज इतना किया कि उसकी विशालता की सम्भावनाओं को समाप्त कर उसे बौनजाई रूप दे दिया. ग्रन्थलेखन का वो स्वपन अब महज एक किताब लेखन तक सिमट चुका था.

और देखिए-----यह सपना हमारे साथ ऎसा चिपटा कि उसके बाद जब भी कभी सोच रखी तो सिर्फ किताब लिखने की, या स्वयं की ज्योतिष एवं आध्यात्म विषयक पत्रिका निकालने की. हालाँकि ज्योतिष पर सिद्धान्त, फलित एवं उपाय विषयक तीन पुस्तकें लगभग दो बरस पहले ही लिखी जा चुकी हैं, जिनमें हमारे अपने जीवन का ही नहीं बल्कि अपने पुरखों के भी ज्योतिषीय अनुभवों का सम्पूर्ण सत्व समाहित है. लेकिन फिर भी उन्हे कभी प्रकाशित करने का विचार ही नहीं बन पाया. बस लिखी और लिखकर रख छोडी. कारण, आत्म-प्रचार से दूर रहने की प्रवृति ही इस काम के सदैव आडे आती रही. लेकिन, निरन्तर अपने प्रिय शिष्यों के द्वारा किए जा रहे आग्रहवश, अपनी अनिच्छा को दरकिनार करना पडा. सो, आज वे तीनों पुस्तकें प्रकाशनाधीन है, जो कि ईश्वर नें चाहा तो बहुत जल्द ही आप लोगों के सामने होंगी.

अब आप लोग कहीं ये मत सोचिएगा कि हमारा ये सब लिखने का उदेश्य अपनी आने वाली पुस्तकों के बारे में सूचना देना या कि आत्म-प्रचार करना है. मुख्य विषय तो है-----इन्सान द्वारा इन जागती आँखों से देखे जाने वाले सपनों का. ये इन सपनों का ही तो कमाल है, कि देखते देखते पंडित से एक ब्लागर और ब्लागर से लेखक बनने की राह पर चल पडे हैं. मैने कहा न, सपनों में बडी ताकत होती है ? और यहाँ ब्लाग पर लिखने में भी यही सोचता हूँ कि जो लिखा, वह जब लिखा तब तो अच्छा ही समझ कर लिखा, पर सब से अच्छी तो वह पोस्ट होगी, जो आगे अभी लिखूँगा! ठीक वैसे ही जैसे मेरा सब से अच्छा सपना वह है जो मैं अभी आगे भविष्य में देखने वाला हूँ-----और बचपन से ही बस अभी-अभी देखने की उमंग में आज यहाँ तक चला आया हूँ !

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

गौरव

अपने केबिन में कुर्सी पर अपनी भीमकाय देह का बोझ डाले बैठा सरकारी वकील.
जिसके सबूट चरणों में एक गरीब सी दिखने वाली बुढिया अपने बेटे को बचाने के लिए गिरी पडी है.
वकील नें उस बुढिया से निगाह हटाकर मेरी ओर देखा तो उसकी आँखों में मुझे गौरव का अहसास हुआ. मगर न जाने क्यूँ मैं उससे आँख न मिला सका. मेरी गर्दन झुक गई !

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रविवार, 24 अक्टूबर 2010

राजनीतिज्ञ---(कुछ हल्का-फुल्का)

किसी समय की बात है, एक आदमी हुआ करता था. अब यह न पूछिए कि वह कौन था और कहाँ रहता था. कथा-कहानियों में यह आवश्यक नहीं है कि कथा के नायक का नाम, पता, बाप का नाम, निवास स्थान वगैरह का इस प्रकार वर्णन किया जाए, मानो वह किसी झूठे मुकद्दमे में जज के सामने गवाही देने गया है. हाँ तो आप केवल इतना ही समझ लीजिए कि एक व्यक्ति था और एक था उसका पुत्र. एक दिन उसके दिमाग में आया कि जरा अपने बेटे की मनोवृति का तो पता चले कि आखिर उसका झुकाव है किस ओर.
लो जी, उसने अपने पुत्र की मनोवृति का झुकाव जानने के लिए उसकी अनुपस्थिति में एक बोतल शराब, नोटों की एक गड्डी, और एक भगवतगीता उसकी मेज पर धर दिए. उसका विचार था कि यदि लडके नें नोटों की गड्डी उठा ली, तो मैं समझूँगा कि उसका झुकाव कोई बडा सेठ-साहुकार बनने की ओर है अर्थात उसे धन कमाने की चिन्ता होगी. यदि उसने भगवतगीता को उठा लिया तो उसका यह अर्थ होगा कि उसकी रूचि धर्म-कर्म, आध्यात्म की ओर है. अगर कहीं उसने शराब की बोतल उठा ली तो उसका परिणाम यही निकलता है कि वह एक अवारा, ऎबी, दुराचारी व्यक्ति सिद्ध होगा. अब वो व्यक्ति रात को जब घूम फिरकर लौटा तो देखता क्या है कि उसका सपूत बगल में भगवतगीता दबाए,नोटों की गड्ढी जेब के हवाले किए और शराब की बोतल खोलकर पैग पर पैग चढाए जा रहा है. देखते ही बन्दे नें माथा पकड लिया और समझ गया कि यो सपूत आगे चलकर जरूर राजनीतिज्ञ बनेगा..
आजकल राजनीतिज्ञ बनने के लिए इन तीनों साधनों का होना अनिवार्य है. यानि कि धन, शराब और धर्म, इन तीनों का घालमेल आवश्यक है. राजनेताओं नें इसी उपाय से देश भर पर अपना आतंक तथा अधिकार जमा रखा है. र्म ईमान, प्रतिज्ञा पालन, वचन की लाज, सहानुभूति, भ्रातृत्व आदि दैवी गुणों तो वर्तमान युग की राजनीति से इस कदर उड गए हैं कि जैसे गधे के सिर से सींग. धोखा, बेईमानी, विश्वाशघात, शोषण, लूट-खसोट आदि को नए नए तथा आकर्षक और मनमोहक नाम देकर राजनीति के क्षेत्र में चालू टकसाली सिक्के बना दिया गया है.
राजनीति महारानी की जय हो!!
आज जरा हल्का-फुल्का ही झेल जीजिए. हो सकता है कि आगामी पोस्ट आपकी उम्मीद से भी बढकर भारी भरकम रहे. बिल्कुल इस नेता जी की तरह :)

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

आप क्यूँ नहीं सोचते ?

पिछले दो दिनों से तबियत कुछ नासाज चल रही है. इसलिए नैट से जरा दूरी बनी रही. आज आए तो ही मालूम चल पाया कि इन दो दिनों में पुल से कितना पानी बह चुका है. खैर, बहना तो पानी का स्वभाव ठहरा. वो तो बहेगा ही. आप चाहे लाख जतन कर लें, चाहे कैसे भी बन्ध लगा लें, लेकिन वो फिर भी अपने बहने का रास्ता खोज ही लेगा. बहना तो उसका धर्म ठहरा तो वो अपना धर्म निभाएगा ही, चाहे मार्ग कैसा भी जटिलताओं भरा क्यों न हो. कोई इन्सान थोडे ही है कि अपने धर्म को लात मार बैठे.  
पता नहीं आपने कभी इस बारे में सोचा है या नहीं, पर देखा जाए तो बात वास्तव में सोचने की ही है. धर्म के बारे में आपने कभी तो सोचा होगा. आत्मा या परमात्मा भी कभी अपके सोचने का विषय रहा होगा. जीवन-मृत्यु, अज्ञान, पाखंड, विश्वास-अन्धविश्वास जैसी चीजों नें भी कभी आपको सोचने के लिए मजबूर किया होगा. मतलब यह कि और भी कईं विषय होंगें, जिनके बारे में आपने सोचा होगा-----चाहे मन मारे ही सोचा हो.
लेकिन मैं तो कहता हूँ कि इतना कुछ सोचने पर भी आपने कुछ नहीं सोचा, क्योंकि जो कुछ भी आपने सोचा, वह सोचा न सोचा एक बराबर है. इसलिए कि आपने शायद यह कभी नहीं सोचा कि अपने बारे में भी कभी फुरसत से सोचा जाये, कभी सोचा भी होगा तो उतनी गम्भीरता से नहीं सोचा होगा. क्यों कि अपने बारे में एक बार भी तनिक गम्भीरता से सोचा होता तो शायद जीवन में फिर दोबारा से सोचने की कभी नौबत ही न आती. इसी सिलसिले में एक कहानी याद आ गई. एक बार गुरू द्रोणाचार्य नें पांडव और कौरवादि अपने शिष्यों की धनुर्विद्या की परीक्षा लेने के लिए सामने वृक्ष पर एक मिट्टी का पक्षी रख दिया और अपने सभी शिष्यों को प्रत्यंचा चढाकर निशाना साधने का आदेश देकर पूछा कि तुम्हे सामने कौन-कौन सी वस्तुएँ दिखाई दे रही हैं. किसी नें पेड कहा, तो किसी नें पत्ते, आकाश आदि अन्य सभी चीजों का ब्यौरा सुना दिया. लेकिन जब अर्जुन से पूछा गया तो उसने बताया कि मुझे तो सिर्फ पक्षी ही दिखाई दे रहा है. आप सोचकर देखें तो आपको पता चल जाएगा कि अर्जुन का वास्तविक अभिप्राय यह था-----" मैं देख रहा हूँ कि मुझे क्या देखते रहना है" गर्ज यह कि जो कुछ हम सोचते हैं, उसे सोचना कहा जाए तो वास्तविकता में वह सोचने की परिधि में ही नहीं आता, क्योंकि गाय भैंसों की जुगाली से लेकर स्टीफन हाकिंस जैसों और अणु-परमाणु वगैरह वगैरह की अदभुतता सोचते हुए भी क्या कभी आप अपने बारे में सोचते हैं?--नहीं, बिल्कुल नहीं सोचते होगें. आँखिन सबको देखिया, आँखि न देखी जाये !
मेरा मानना है कि जहाँ इन्सान के सामने उसके विचारों के खोखलेपन का प्रश्न तनकर कुतुबमीनार की तरह खडा हो जाता है, वहाँ सोचने और नोचने की शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है. लेकिन मेरा विषय इस प्रकार के सोचने से सम्बन्धित नहीं है. अज्ञानी कहे जाने पर बाहर से उसका विरोध करते हुए भी यदि आप अपने भीतर एक अज्ञानी की हरकतों का आभास पाकर दार्शनिक मुद्रा अपनायें और यह सोचने की चेष्टा करें कि वास्तव में आप अज्ञानी हैं या नहीं, तब भी वह मेरे विषय से बाहर है.
वास्तविकता यह है कि हम आप सभी सोचते हैं, किसी गधे को भी एक विशेष दृष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य की सराहना करने के बारे में सोचते रहने से आप एक दार्शनिक कहला सकते हैं. पर मेरा संकेत इस सोचने की ओर नहीं है. ईश्वर की कृपा से आप अच्छे खासे दो पैरों वाले मनुष्य है------डार्विन के अनुसार बन्दर के एकदम "नूतनतम संस्करण"---और फिर मनुष्य होने के नाते आपके पास एक सिर भी तो है, ये अलग बात है कि उस सिर में विधाता नें कुछ भरा हो या न हो. वैसे इस दिशा में भी सोचना लाजिमी है, चाहे फिर आपका सोचना किसी की बडी नाक से टक्कर खा-खाकर पीछे उछलता रहे, चाहे कहीं किसी के लिखे हुए पर ही क्यों न अटक जाए. जब तक आप बे-सिर-पैर नहीं हैं और जब तक अपने जैसे सिर-पैर वालों में रहने का आपको जन्मसिद्ध अधिकार है, तबतक यह सब चलता ही रहेगा, लेकिन इतना सोचने पर भी कुछ सोचना बाकी रह जाता है. जैसे यह पोस्ट पढकर किसी अज्ञानी पर तरस खाकर आपका सोचना लाजिमी है. इस पर यदि आपको यह सोच हो जाये कि आप भी यदि "समझदारी" के भूत को अपने वश में कर लेते तो हम जैसों से कहीं अधिक समझदार होते, तो भी आश्चर्य के लिए गुंजाईश बाकी न रहती.
हाँ तो मैं कह रहा था कि इतना सब सोच लेने पर भी कुछ सोचना हमेशा बाकी रह जाता है. आप पूछेंगें कैसे ? पोस्ट पढते-पढते, ध्यान में न रहने  के कारण अगर कहीं पूछना भूल भी जाएं तो भी मैं कहूँगा कि सोचते समय आँख और कान बन्द रक्खे जाएं तो आपको खुद ब खुद समझ में आ जाएगा कि जिसे आप आजतक सोचना समझ रहे थे, दरअसल वो सोच थी ही नहीं, सोचने का सिर्फ एक नाटक भर था. असली सोच तो इससे आगे शुरू होती है. जिसके बारे में हम आजतक कभी सोच ही नहीं पाये.
चलिए छोडिये, आप भी सोचेंगें कि कहां की सोच बैठे. लेकिन बात हकीकत में सोचने की ही है. चाहे सोचकर आप बेशक उसे अनसोचा कर दें. यहाँ जो कुछ भी मैने लिखा है या आपके शब्दों में सोचा है, वह किसी "सोचनीय" स्थिति वाले व्यक्ति के बारे में सोचकर ही. लेकिन अब वह ख्यालों से ओझ हो चला है, इसलिए आगे क्या लिखूँ यह सोचने लगा तो फिर सोचता ही रह जाऊँगा. अब बताईये, आपने क्या सोचा ? :-)
चलते चलते:--
इस पोस्ट को लिखने के बाद जब हमने अपने एक मित्र को पढवाया और उनसे इसके बारे में जानना चाहा कि उन्हे ये पोस्ट कैसी लगी, तो मियाँ झट से बोल उठे---" अजी पोस्ट क्या है, निरा एकदम से कूडा है". यहाँ हमसे तनिक गलती हो गई, क्योंकि वो मित्र ठहरे महागम्भीर प्रकृ्ति वाले जीव. उन्हे ये नहीं मालूम कि ब्लागिंग में "ब्रिलियन्ट नोन्सेन्स" जैसी शैली में कुछ हास्य वगैरह भी लिखा जाता है. :-)

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

आओ भाई...शब्दों की जुगाली करें ( वादे वादे जायते तत्व बोध )

समाजवादी, राष्ट्रवादी, प्रगतिवादी, नारीवादी, गाँधीवादी, भौतिकवादी, तर्कवादी, संशयवादी, ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी, विज्ञानवादी, अज्ञानवादी, बकवादी तथा ओर इनसे अलग भी जितने टाईप के वादी होते होंगें, सब के सब आपको यहाँ हिन्दी ब्लागिंग में मिल जाएंगें. जब इस तरह तरह के भान्ती भान्ती मत, विचारधारा और विश्वासों से जुडे लोग जहाँ जुट जाएं, वहाँ बहस और विवाद के सिवा भला ओर क्या होगा ? अनेक बातों में घोरतम मतभेद होने पर भी "ब्लागिंग" में इस बात पर मतैक्य या सर्वसम्मति है कि "वादे वादे जायते तत्व बोध" अर्थात बात-बात में 'बात' निकल आती है. इसलिए अनेक अवसरों पर तुमुल संघर्ष हो जाने पर भी यहाँ सदैव वाद-विवाद का क्रम बना ही रहता है.

जब कभी विवाद के लिए कोई विषय नहीं भी रहता, तब भी बिना विषय के विवाद चलता रहता है. ओर नहीं तो लोग कम-ज्यादा टिप्पणियों को लेकर ही विवाद शुरू कर देते हैं. अब खाली बैठे भी भला क्या करें. मन बहलाने के लिए कुछ न कुछ तो चाहिए ही न! यूँ भी विवाद के लिए इससे सुलभ विषय ओर हो ही क्या सकता है ? हींग लगे न फटकरी और रंग चोखा.

अपने मनमौजी राम जी, भले आदमी है.....लेकिन सैकुलरी चश्मा पहनते हैं, जो कि आजकल के जमाने में वाजिब भी है. उनका मानना है कि जब तक हम अपने इतिहास, अपने पूर्वज, अपनी तहजीब, अपने धर्म, अपने संस्कार, तथा और तो और अपने आप से भी घृणा नहीं करने लगेंगें, तब तक कोई भी क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं ला सकते और न ही देश और समाज को ही पुरानेपन की गन्दगी से उबार सकेंगें.

बेचारे दिन रात पश्चिम का "हनुमानचालीसा" बाँच रहे हैं, लेकिन आज तक अघाए नहीं. कहीं भी किसी ब्लाग पर धर्म, संस्कृति, आत्मा, परमात्मा, ज्योतिष, मन्त्र-तन्त्र,पूजा उपासना वगैरह का इन्होने नाम पढा नहीं कि इनकी हालात तो ऎसी हो जाती है कि क्या बतायें. बस तुरन्त ही ये उस ब्लागर से सींग फँसा बैठते हैं. उसके बाद बहस मुसाहिबे का कुछ ऎसा दौर शुरू होता है कि यूँ लगता है मानो एकदम से किसी नें मुर्दे में जान फूँक दी हो. उस समय ब्लागजगत की रौनक देखने वाली होती है, वर्ना तो ब्लागवाणी के जाने के बाद ब्लागिंग का सारा रस ही जाता रहा है, पूरे चिट्ठाजगत में हरदम मुर्दानी सी छाई रहती है.

अब "मनमौजी राम" जी, बेचारे जो पिछले कुछ दिनों से इसी खोजबीन में जुटे थे कि कहीं कोई ब्लागर आत्मा-परमात्मा, धर्म, संस्कृ्ति जैसी फालतू की मूर्खता पूर्ण हाँकता मिले तो उससे पंगा लिया जाए. कम से कम एक आध पोस्ट का जुगाड तो बने. अब लिखने के लिए आखिर रोज-रोज सामग्री लायें भी तो कहाँ से.

ऎ ल्यो! हम यहाँ बैठे ये सब लिख ही रहे हैं और मनमौजी राम जी की पोस्ट भी आ गई. शीर्षक तो चकाचक लगाया है---"आध्यात्मिक जुगाली" नाम से. अच्छा अब चलते हैं...देखें तो सही कि बन्धु आज किस से सींग फँसा बैठे :)

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

क्या रावण सचमुच मर चुका ?

युग बीते, समय बदला लेकिन आज भी राम और रावण की सेनाएं आमने-सामने खडी हैं. एक ओर सदाचार एवं सदवृति, दूसरी ओर अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अज्ञान, अहंकार और तमस.
विरथ राम और रथी रावण में आज भी युद्ध हो रहा है. निष्ठावान, कर्तव्य परायण, सदाचारी पीछे की पंक्ति में और अवसरवादी, भ्रष्टाचारी, पद लोलुप, दुराचारी उन्हे धक्का देकर जीवन के हरेक क्षेत्र में आगे बढकर अग्रिम पंक्ति में अग्रसर हैं. युद्ध चल रहा है....कईं युग बीत गए लेकिन आज तक न तो राम ही थका है और न रावण नें ही अपनी पराजय स्वीकार की है. युद्ध चलता रहा है, चल रहा है और प्रलयकाल तक भी ये युद्ध ऎसे ही चलता रहने वाला है
तो फिर राम-राज्य कब आएगा ? क्या आ पाएगा ? रावण के जीवित रहते भला राम-राज्य कभी आ सकता है ? नहीं! राम-राज्य तो तभी आ पायेगा, जब कि सचमुच रावण का अन्त हो जाए, वो भी लकडी और कागज के रावण का नहीं मन के रावण का, अहंकार के रावण का,  अज्ञान, दुर्बुद्धि और कुसंस्कारों के रावण का.
यदि आप चाहते हैं कि इस युद्ध में राम की विजय हो और रावण मारा जाए तो उसके लिए आवश्यकता है---राम के आदर्शों को चरितार्थ करने की. सिर्फ पुतला दहन से भला क्या होगा ?  कुछ नहीं.....भला ऎसे भी कहीं ये रावण मरने वाला है ? उसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि-------राम का व्यापक आदर्श कर्म-रूप में सामने लाया जाए. रामचरित का पाठ बहुत हो चुका, माला, धूप-दीप, फूल मात्र से राम की पूजा भी बहुत कर चुके. अब समय है कि उनके संकल्प, आदर्श और जीवन दर्शन को अपनाया जाए. स्वकर्मण अभ्यर्च के मन्त्र की आज घर-घर में आवश्यकता है. सत्वस्थ होकर ही ऊर्घ्व की ओर मानव बढ सकता है------अन्यथा नहीं !

अगर ये न कर पाए तो फिर करते रहिए हर साल यूँ ही इस कागजी रावण का दहन, मनाते रहिए विजयदशमी.......लेकिन ये रावण न आजतक मरा है और न ही कभी मर पाएगा....ये फिर भी आपको वहीं खडा मिलेगा, उसी जलते हुए श्मशान में अट्ठहास करता......

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

हो न हो जरूर पागल है वह !!!

वो बस कभी तो यूँ ही बिला वजह बैठा बैठा मुस्कुराने लगता है. कभी उसकी आँखे आकाश में टंगी रहती हैं, कभी एकदम से मुखडा माघ के मेघों की तरह गम्भीर बना लेता है. कान श्वान की भन्ती सजग हो उठते हैं, मानों स्वर्ग से कोई सूचना बेतार के तार से उसके पास आ रही हो. सुना है मुसलमानों के नबी हजरत मोहम्मद साहब के समीप वहिश्त से पैगामात आए करते थे, मगर उन्होने तो कुछ किया भी.ये भला क्या करेगा. बैठा कल्पनाओं में जितनी आनन्दानुभुति लेता है, व्यवहारिकता में उससे सौ गुणे घबडाता हैं.

ऎसे आदमी पागल होते हैं. अगर कोई अपने मतलब से, अपने स्वार्थ से मुस्कुराता है या ख्यालों में खोया है, तो वह ठीक है. कम से कम वह पागल तो हरगिज नहीं है. लेकिन अगर कोई बिला वजह के मुस्कुराता है, तो वह मुस्कुराहट का अपव्यय करता है. इस व्यापारिक युग में अपव्यय सबसे खराब चीज मानी जाती है. सो, मुस्कुराहट का भी अपव्यय नहीं होना चाहिए. जो फिजूल बिना कारण के मुस्कुराता है, बिना किसी मतलब के ख्यालों में खोया रहता है तो वह पागल नहीं तो भला ओर क्या है ?
खाने-पीने का भी उसका कोई हिसाब-किताब नहीं. जो मिला सो खा लिया. नहीं मिला, नहीं खाया. अपनी मौज में चाहे बैठे मुस्कुराते रहे चाहे गम्भीरता का पल्लू ओढ लिया. जरूर ही वह पागल है; वर्ना खाना तो आदमी को समय से तीनों टाईम खाना ही चाहिए. इसी दो वक्त की रोटी के लिए आदमी चोरी, डकैती, घूसघोरी, जालसाजी और तरह तरह की बेईमानियाँ करता फिरता है. इसी भोजन के लिए षडयन्त्र होते हैं, हत्याएं होती हैं, तख्तो ताज पलट दिए जाते हैं. भोजन ही तो जीवन की सार वस्तु है. उस भोजन की ओर से लापरवाह ? उस भोजन के बिना भी अलमस्त ? वह जरूर पागल है. यदि वह पागल नहीं होता तो भूख लगने पर समय से खाना तो खाता. लेकिन नहीं चाहे कितनी भी जोरदार भूख लगी हो, वो अकेले बैठे कभी मुस्कुराता रहता है, तो कभी किसी सोच में डूबा दिखाई देता है. जरूर वह पागल है !

मैं शाम-सवेरे, दिन-दोपहर उसे बराबर देखता रहता हूँ. वह हमेशा यूँ ही कभी मुस्कुराता मिलता है तो कभी किसी सोच में डूबा हुआ. मेरे ही घर में रहता है. हालाँकि वो हमारे परिवार का कोई सदस्य नहीं है, इसलिए ये भी नहीं कह सकता कि वो हमारा कोई अपना है. अब उसे पारिवारिक सदस्य भी कैसे कहूँ ? मगर वह मेरे ही साथ रहता है.
न जाने कौन है वो ?........
लोग कहते हैं कि वो "ब्लागर" है...लेकिन न जाने मुझे ऎसा क्यों लगता है कि वो जरूर कोई पागल है.
हाँ शायद " पागल " ही है वो........
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रफ़्तार