| आजकल हिन्दी ब्लागिंग में लोग क्या पढ रहे हैं, यह ठीक से समझ में नहीं आता. अनुमान तो मेरा यही है कि,ज्यों-ज्यों ब्लागविद्या का विस्तार होता जाता है,पाठक गहरी चीजों से दूर होते जा रहे हैं. मगर, इन सुभाषितों में गंभीर कहे जा सकने वाला तो ऎसा कुछ भी नहीं है.लेकिन इनमें कुछ ऎसा जरूर है कि जो ह्रदय तथा बुद्धि को गुदगुदाना जानता हैं. इसलिए, मुझे थोडी आशा बनी रहती है है कि ये सुभाषित पढे जायेंगें....... 1. व्यवस्था घर की सुन्दरता है; संतोष घर की बरकत है; आतिथ्य घर की शान है; धर्मशीलता घर का कलश है---श्री ब्रह्मचैतन्य 2. आँखें सबने पाई हैं, लेकिन नजर किसी किसी ने------मैकिया वैली 3. जीवन के न्याय पर से मैं अपना विश्वास कैसे खो दूँ, जब कि मखमलों पर सोने वालों के स्वपन जमीन पर सोने वालों के स्वपनों से सुन्दरतर नहीं होते-----खलील जिब्रान 4. ईश्वर की चक्की बडी धीमे चलती है, मगर बारीक पीसती है----जर्मन कहावत 5. अच्छा पडोसी आशीर्वाद है और बुरा पडोसी अभिशाप---हैसिएड 6. अगर हम गिरते हैं तो अधिक अच्छी तरह से चलने का रहस्य सीख जाते हैं----अरविन्द 7. ईश्वर कभी बहरा नहीं होता, सिवाय जब कि आदमी का दिल ही गूँगा हो----क्वार्ल्स 8. हम जिसकी आराधना करते हैं वैसे हो जाते हैं. प्रार्थना का अर्थ इससे ज्यादा नहीं है-----महात्मा गाँधी 9. चिडियों की तरह हवा में उडना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इन्सान की तरह जमीन पर चलना सीखना है------राधाकृ्ष्णन 10. यह ज्यादा अक्लमन्दी की बात हो कि हम उस ईश्वर की बातें कम करें जिसे हम समझ नहीं सकते, और उन पारस्परिक लोगों की बातें ज्यादा करें जिन्हे हम समझ सकते हैं------खलील जिब्रान 11. स्वयं अपने प्रति सच्चे रहोगे तो गैर के प्रति झूठे नहीं हो सकोगे---स्वामी रामतीर्थ 12. जो मनचाहा बोलता है, उसे अनचाहा सुनना पडता है-----संस्कृत सूक्ति आप शायद ये भी पढना चाहें....भारतीय ज्योतिष और नवरात्रि पर्व |
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रविवार, 10 अक्टूबर 2010
क्या आप पढना चाहेंगें ? संडे सुभाषितं
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
दास्तान-ए-टाईम खोटीकार
पिछले कुछ दिनों से सोच रहे थे कि चाहे मजाक-मजाक में ही सही, ब्लागिंग की कृ्पा से अपण लेखक तो बन ही चुके हैं. समीर लाल जी नें व्यंग्यकार का ठप्पा भी लगा ही दिया है, तो क्यों न अब कहानीकार बनने की ओर कदम बढाया जाए. लो जी, कुछ दिन तक इसी पर विचार करते रहे और ज्यों ज्यों ये विचार मन में अपनी जडें जमाता गया, त्यों त्यों ही हमारा कहानी लिखने का इरादा मजबूत होता चला गया. सो, एक दिन इरादा बुलन्द करके हम कहानी लिखने बैठ गए, लेकिन ऊपरवाला ही जानता है कि कहानीकार बनने की चाह में हमें कितने पापड बेलने पडे, कितनी परेशानियों का सामना करना पडा. यूँ लगा कि मानो ईश्वर हमें कहानीकार बनने ही नहीं देना चाहता------.

बहरहाल हुआ ये कि हम धैर्य धारण करके कहानी लिखने बैठ तो गए......अभी कहानी लिखनी शुरू भर ही की थी, कि खट् से लाईन चली गई. ससुरा, मुहूर्त ही खराब हो गया. पंचाँग उठाकर देखा तो पता चला कि हम तो शुरूआत ही राहूकाल में कर बैठे. लेकिन भला अब किया भी क्या जा सकता था. सो, अब दिन भर इसी इन्तजार में बैठे रहे कि कब लाईट आए और कब हम लिखना शुरू करें. लेकिन बिजली विभाग वाले भी इतने भलेमानस कहाँ है कि जो एक बार बिजली बन्द कर उसे इतनी जल्दी शुरू कर दें. सारा दिन बीत गया. बिजली न आनी थी और न आई.
खैर, देर रात गए जैसे ही विद्युत विभाग की कृ्पा हुई तो हम झट से कम्पयूटर खोलकर बैठ गए.अब जैसे-तैसे कुछ लिखने की कौशिश की भी तो एक ओर हादसा हो गया. बडी मुश्किल से अभी दो एक पंक्तियाँ ही लिख पाए थे कि गली में सुकवि श्वानों नें अपना कवि सम्मेलन प्रारम्भ कर दिया. अब ऎसे में भला क्या तो दिमाग काम करता और क्या लिखा जाता. कुछ दिन लगातार ऎसे ही चलता रहे. दिन में विद्युत विभाग नाक में दम किए रखता और रात को जैसे ही कुछ लिखने बैठते तो गली भर के श्वान इकट्ठे हो कीर्तन शुरू कर देते. अब तो समझिए कि हद ही हो गई. हमने भी एक दिन आव देखा न ताव, बस पूरे गुस्से में आकर एक लट्ठ उठाया और रात भर मोहल्ले की गलियाँ घूम घूम कर उनकी ऎसी खातिरतवज्जो की, कि ससुरे अब हमारी गली तो गली बल्कि यूँ कहिए कि मोहल्ले में भी दिखाई नहीं पडेंगें.
खैर जी, जैसे तैसे करके हमने अपनी कहानी तो पूरी कर डाली, लेकिन ससुरी एक ओर समस्या खडी हो गई. हुआ ये कि कहानी की लम्बाई उम्मीद से कुछ क्या बल्कि बहुत ही अधिक हो गई. अब बडी भारी समस्या कि इस "भागवत महापुराण" के लिए पाठक कहां से मिले. ब्लागरों से तो ऎसी कोई उम्मीद करना ही फिजूल है कि इत्ती लम्बी कथा को कोई बाँचने बैठेगा. यहाँ तो लोग चार लाईनो की पोस्ट तक नहीं पढते, बल्कि उसपर भी बिना पढे वाह! वाह्! सुन्दर कथा जैसी टिप्पणी टिका जाते हैं, तो भला हमारी इस कहानी को कौन पढने बैठेगा!
अब लगता है कि हमने नाहक ही इत्ती मेहनत कर डाली. इससे अच्छा तो, इतने टाईम में चार छ: व्यंग्य छाप दिए होते या दस बीस कवितानुमा ही कुछ लिख दिए होते. टाईम भी बचता और "वाह-वाह" होती अलग से.......लेकिन शायद इसी को कहते हैं--टाईम खोटीकार.
बहरहाल अभी तो कहानी ड्राफ्ट में सेव करके रख छोडे हैं.....सोचते हैं, हिन्दी ब्लागिंग जब अपनी इस शैशवावस्था से बाहर निकल आएगी, तो छाप देंगें.........
तब तक आप इस माह का अपना राशीफल बाँच लीजिए.......
मासिक भविष्यफल----अक्तूबर 2010( मेष से कन्या राशी)
मासिक भविष्यफल---अक्तूबर 2010 (तुला से मीन राशी)

बहरहाल हुआ ये कि हम धैर्य धारण करके कहानी लिखने बैठ तो गए......अभी कहानी लिखनी शुरू भर ही की थी, कि खट् से लाईन चली गई. ससुरा, मुहूर्त ही खराब हो गया. पंचाँग उठाकर देखा तो पता चला कि हम तो शुरूआत ही राहूकाल में कर बैठे. लेकिन भला अब किया भी क्या जा सकता था. सो, अब दिन भर इसी इन्तजार में बैठे रहे कि कब लाईट आए और कब हम लिखना शुरू करें. लेकिन बिजली विभाग वाले भी इतने भलेमानस कहाँ है कि जो एक बार बिजली बन्द कर उसे इतनी जल्दी शुरू कर दें. सारा दिन बीत गया. बिजली न आनी थी और न आई.
खैर, देर रात गए जैसे ही विद्युत विभाग की कृ्पा हुई तो हम झट से कम्पयूटर खोलकर बैठ गए.अब जैसे-तैसे कुछ लिखने की कौशिश की भी तो एक ओर हादसा हो गया. बडी मुश्किल से अभी दो एक पंक्तियाँ ही लिख पाए थे कि गली में सुकवि श्वानों नें अपना कवि सम्मेलन प्रारम्भ कर दिया. अब ऎसे में भला क्या तो दिमाग काम करता और क्या लिखा जाता. कुछ दिन लगातार ऎसे ही चलता रहे. दिन में विद्युत विभाग नाक में दम किए रखता और रात को जैसे ही कुछ लिखने बैठते तो गली भर के श्वान इकट्ठे हो कीर्तन शुरू कर देते. अब तो समझिए कि हद ही हो गई. हमने भी एक दिन आव देखा न ताव, बस पूरे गुस्से में आकर एक लट्ठ उठाया और रात भर मोहल्ले की गलियाँ घूम घूम कर उनकी ऎसी खातिरतवज्जो की, कि ससुरे अब हमारी गली तो गली बल्कि यूँ कहिए कि मोहल्ले में भी दिखाई नहीं पडेंगें.
खैर जी, जैसे तैसे करके हमने अपनी कहानी तो पूरी कर डाली, लेकिन ससुरी एक ओर समस्या खडी हो गई. हुआ ये कि कहानी की लम्बाई उम्मीद से कुछ क्या बल्कि बहुत ही अधिक हो गई. अब बडी भारी समस्या कि इस "भागवत महापुराण" के लिए पाठक कहां से मिले. ब्लागरों से तो ऎसी कोई उम्मीद करना ही फिजूल है कि इत्ती लम्बी कथा को कोई बाँचने बैठेगा. यहाँ तो लोग चार लाईनो की पोस्ट तक नहीं पढते, बल्कि उसपर भी बिना पढे वाह! वाह्! सुन्दर कथा जैसी टिप्पणी टिका जाते हैं, तो भला हमारी इस कहानी को कौन पढने बैठेगा!
अब लगता है कि हमने नाहक ही इत्ती मेहनत कर डाली. इससे अच्छा तो, इतने टाईम में चार छ: व्यंग्य छाप दिए होते या दस बीस कवितानुमा ही कुछ लिख दिए होते. टाईम भी बचता और "वाह-वाह" होती अलग से.......लेकिन शायद इसी को कहते हैं--टाईम खोटीकार.
बहरहाल अभी तो कहानी ड्राफ्ट में सेव करके रख छोडे हैं.....सोचते हैं, हिन्दी ब्लागिंग जब अपनी इस शैशवावस्था से बाहर निकल आएगी, तो छाप देंगें.........
तब तक आप इस माह का अपना राशीफल बाँच लीजिए.......
मासिक भविष्यफल----अक्तूबर 2010( मेष से कन्या राशी)
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रविवार, 3 अक्टूबर 2010
संडे सुभाषितं
| आज ‘संडे सुभाषितं’ में पुन: आपके लिए प्रस्तुत हैं चन्द सूक्तियाँ…….जिनसे पता चलता हैं कि मनुष्य के जागृ्त मन नें पृ्थ्वी के विभिन्न खंडों में रहकर भी अनन्त युगों तक,जीवन से जूझकर और जीवन को अपनाकर अपने अनुभव द्वारा सत्य को किस प्रकार प्राप्त किया है और उसे किस अमर वाणी में व्यक्त किया है! बकौल सन्त ज्ञानेश्वर: "अमृ्त को कोई अधिकाधिक परोसता जाए,तो क्या कभी कोई कहता है कि 'बस!अब ओर नहीं चाहिए'?". सो,ये ज्ञानामृ्त आपको परोस रहा हूँ….ओर तब तक प्रत्येक रविवार आपको परोसा जाता रहेगा…जब तक कि आप स्वयं नहीं कह देते कि “बख्श दीजिए,बस अब ओर नहीं”:) 1. सच्ची मैत्री का नियम यह है कि जाने वाले मेहमान को जल्दी रूखसत करो और आने वाले का स्वागत करो----होमर 2. यौवन, धन-सम्पत्ति, प्रभुता और अविवेक---इनमें से प्रत्येक अनर्थकारक है, जहाँ चारों हों वहाँ क्या ठिकाना !—हितोपदेश 3. स्वानुभव की बातें शब्दज्ञान हैं; जब कि स्वानुभव आत्मज्ञान हैं, किसी के स्वानुभव की बातें कहने-सुनने से कोई आत्मज्ञानी नहीं हो जाता,वह सिर्फ शब्द-ज्ञानी भर है-----योगवशिष्ठ 4. इस तरह प्रार्थना कर मानों कोई पुरूषार्थ काम न आयेगा, और इस तरह पुरूषार्थ कर कि मानो कोई प्रार्थना काम न आयेगी----जर्मन कहावत 5. धन सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए इस्तेमाल की चीज है, उसे नागरिक प्रतिष्ठा और नैतिक उत्कृ्ष्टता का प्रतिनिधि नहीं बना देना चाहिए----विलियम पोर्टर दौलतमन्द बनने के लिए सिर्फ ईश्वर की ओर से पीठ फेरने की जरूरत है----फ्रांसीसी कहावत 6. एक ज्ञानी की मित्रता दुनिया भर के तमाम बेवकूफों की दोस्ती से बढकर है-----डैमोकिटस 7. अपने को बदल दो, तकदीर बदल जायेगी-----पुर्तगाली कहावत 8. अपने जीवन के हर क्षण मैं यह अनुभव करता हूँ कि ईश्वर मेरा इम्तिहान ले रहा है---महात्मा गाँधी 1 2 |
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
मनोविज्ञान का अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध
मनोविज्ञान ( Psychology ) का यदि अन्य विभिन्न विज्ञानों से सम्बन्ध प्रकट किया जाए तो उसका अपना कार्यक्षेत्र पहले से ओर भी स्पष्ट रूप से प्रकाशित होने लगता है.पूर्व के आलेखों( मनोविज्ञान--क्या, क्यों, कैसे ?)तथा (मानसिक क्रियाकलाप तथा उनके भेद (मनोविज्ञान भाग-2) में आपने पढा कि मनोविज्ञान उस शास्त्र का नाम है, जो कि मानसिक व्यापारों(Mental activities) की क्रमबद्ध समीक्षा करता है. इन समस्त मानसिक व्यापारों(क्रियाकलापों) को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं. (1) ज्ञान सम्बन्धी (2) संवेदन सम्बन्धी (3) क्रिया सम्बन्धी.
मनोविज्ञान जहाँ इन तीनों प्रकार के मानसिक व्यापारों का स्वरूप प्रकट करता है, वहीं इनमें से प्रत्येक भाग अपनी मीमांसा के लिए विज्ञान की किसी अन्य शाखा के अधीन रहता है. ज्ञान सम्बन्धी मानसिक व्यापारों की विशेष मीमांसा तर्कशास्त्र(Logic) का कार्य है.संवेदन सम्बन्धी मानसिक व्यापारों की विशेष मीमांसा सौन्दर्य शास्त्र का कार्य है तथा क्रिया सम्बन्धी मानसिक व्यापारों की विशेष मीमांसा का कार्य आचार/नीति-शास्त्र (Ethnology) के अधिकार क्षेत्र में आता है. अत: यह विज्ञान की ये तीनों शाखाएं (तर्कशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, आचार/नीति-शास्त्र) मनोविज्ञान के अन्तर्गत रहती हैं. मनोविज्ञान से इनका भेद कईं प्रकार से दर्शाया जा सकता है.
(1) मनोविज्ञान का कार्यक्षेत्र इन तीनों विज्ञानों से विस्तृ्त है.
(2) मनोविज्ञान वास्तविकता की दृ्ष्टि से मानसिक क्रियाकलापों की समीक्षा करता है अर्थात वह यह दिखलाने का प्रयत्न करता है कि इन क्रियाकलापों का वास्तविक स्वरूप क्या है और वें किस प्रकार एक दूसरे से संबद्ध है. मानसिक जीवन का उदय और विकास कैसे होता है ? सारे विचार में अस्ति की दृ्ष्टि प्रधान रहती है. परन्तु इस के अन्तर्गत उपरोक्त वर्णित तीनों प्रकार के विज्ञान अपने-अपने प्रतिपाद्य क्रियाकलापों की निर्णयात्मक दृ्ष्टि से समीक्षा करते हैं. तर्कशास्त्र (Logic) ज्ञान सम्बन्धी मानसिक क्रियायों की विवेचना सत्यासत्य निर्णय की दृ्ष्टि से करना चाहता है. वह यह बतलाना चाहता है कि हमें कैसे चिन्तन करना चाहिए ?. ताकि हमारा विचार सत्य विचार कहला सके.
नीतिशास्त्र (Ethnology) क्रियामूलक मानसिक क्रियायों की अच्छाई-बुराई की दृ्ष्टि से विवेचना करता है, उस की कार्य समाप्ति इसी में है कि वह हमें अच्छे, बुरे कर्मों का भेद बतला सके तथा आदर्श चरित्र गठन में हमारा सहायक बन सके.
इसी प्रकार सौन्दर्य शास्त्र (Aesthetics) भी सौन्दर्य तथा कुरूपता के भेद का निर्णय करता है. किसी वस्तु की सुन्दरता का अनुभव करते समय जो मानसिक दशा उपस्थित होती है या जिन भावों का उदय होता है, उन का सीधा निरूपण तो मनोविज्ञान के हाथ में है, परन्तु हम एक वस्तु को सुन्दर क्यों कहते हैं ?---इस बात का निर्णय सीधे तौर पर सौन्दर्य शास्त्र का कार्य है.
शरीर का आत्मा के साथ कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है, इस पर विस्तारपूर्वक चर्चा हम आगे के लेख में करेंगें. परन्तु यहाँ केवल हमें इतना स्मरण रखना चाहिए कि जितना अधिक हम को शरीर रचना आदि का ध्यान होगा, उतना ही अधिक हम मानसिक क्रियाकलापों को समझ सकेंगें. मनोविज्ञान नें शरीर और आत्मा का घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकार करते हुए "दैहिक मनोविज्ञान" ( Physical Psychology) की स्थापना की है, इसी प्रकार यदि अधिक दीर्घ दृ्ष्टि से देखा जाए तो जीवन विद्या (Biology) भी मनोविज्ञान के साथ अपना सम्बन्ध जोडती चली जाती है. जीवन विद्या चेतन पदार्थों का जड पदार्थों से भेद प्रकट करती है तथा जीवित पदार्थों अथवा प्राणियों के क्रियाकलापों का अध्ययन करती है. यह अध्ययन मानुषिक क्रियाकलापों के अध्ययन में बहुत कुछ सहायक हो सकता है.
क्रमश::.......
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मनोविज्ञान जहाँ इन तीनों प्रकार के मानसिक व्यापारों का स्वरूप प्रकट करता है, वहीं इनमें से प्रत्येक भाग अपनी मीमांसा के लिए विज्ञान की किसी अन्य शाखा के अधीन रहता है. ज्ञान सम्बन्धी मानसिक व्यापारों की विशेष मीमांसा तर्कशास्त्र(Logic) का कार्य है.संवेदन सम्बन्धी मानसिक व्यापारों की विशेष मीमांसा सौन्दर्य शास्त्र का कार्य है तथा क्रिया सम्बन्धी मानसिक व्यापारों की विशेष मीमांसा का कार्य आचार/नीति-शास्त्र (Ethnology) के अधिकार क्षेत्र में आता है. अत: यह विज्ञान की ये तीनों शाखाएं (तर्कशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, आचार/नीति-शास्त्र) मनोविज्ञान के अन्तर्गत रहती हैं. मनोविज्ञान से इनका भेद कईं प्रकार से दर्शाया जा सकता है.
(1) मनोविज्ञान का कार्यक्षेत्र इन तीनों विज्ञानों से विस्तृ्त है.
(2) मनोविज्ञान वास्तविकता की दृ्ष्टि से मानसिक क्रियाकलापों की समीक्षा करता है अर्थात वह यह दिखलाने का प्रयत्न करता है कि इन क्रियाकलापों का वास्तविक स्वरूप क्या है और वें किस प्रकार एक दूसरे से संबद्ध है. मानसिक जीवन का उदय और विकास कैसे होता है ? सारे विचार में अस्ति की दृ्ष्टि प्रधान रहती है. परन्तु इस के अन्तर्गत उपरोक्त वर्णित तीनों प्रकार के विज्ञान अपने-अपने प्रतिपाद्य क्रियाकलापों की निर्णयात्मक दृ्ष्टि से समीक्षा करते हैं. तर्कशास्त्र (Logic) ज्ञान सम्बन्धी मानसिक क्रियायों की विवेचना सत्यासत्य निर्णय की दृ्ष्टि से करना चाहता है. वह यह बतलाना चाहता है कि हमें कैसे चिन्तन करना चाहिए ?. ताकि हमारा विचार सत्य विचार कहला सके.
नीतिशास्त्र (Ethnology) क्रियामूलक मानसिक क्रियायों की अच्छाई-बुराई की दृ्ष्टि से विवेचना करता है, उस की कार्य समाप्ति इसी में है कि वह हमें अच्छे, बुरे कर्मों का भेद बतला सके तथा आदर्श चरित्र गठन में हमारा सहायक बन सके.
इसी प्रकार सौन्दर्य शास्त्र (Aesthetics) भी सौन्दर्य तथा कुरूपता के भेद का निर्णय करता है. किसी वस्तु की सुन्दरता का अनुभव करते समय जो मानसिक दशा उपस्थित होती है या जिन भावों का उदय होता है, उन का सीधा निरूपण तो मनोविज्ञान के हाथ में है, परन्तु हम एक वस्तु को सुन्दर क्यों कहते हैं ?---इस बात का निर्णय सीधे तौर पर सौन्दर्य शास्त्र का कार्य है.
शरीर का आत्मा के साथ कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है, इस पर विस्तारपूर्वक चर्चा हम आगे के लेख में करेंगें. परन्तु यहाँ केवल हमें इतना स्मरण रखना चाहिए कि जितना अधिक हम को शरीर रचना आदि का ध्यान होगा, उतना ही अधिक हम मानसिक क्रियाकलापों को समझ सकेंगें. मनोविज्ञान नें शरीर और आत्मा का घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकार करते हुए "दैहिक मनोविज्ञान" ( Physical Psychology) की स्थापना की है, इसी प्रकार यदि अधिक दीर्घ दृ्ष्टि से देखा जाए तो जीवन विद्या (Biology) भी मनोविज्ञान के साथ अपना सम्बन्ध जोडती चली जाती है. जीवन विद्या चेतन पदार्थों का जड पदार्थों से भेद प्रकट करती है तथा जीवित पदार्थों अथवा प्राणियों के क्रियाकलापों का अध्ययन करती है. यह अध्ययन मानुषिक क्रियाकलापों के अध्ययन में बहुत कुछ सहायक हो सकता है.क्रमश::.......
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सोमवार, 27 सितंबर 2010
मानसिक क्रियाकलाप तथा उनके भेद (मनोविज्ञान भाग-2)
| मनुष्य की आत्मा का परिचय हमें मानसिक क्रियाकलापों द्वारा ही होता है. प्रत्येक क्षण हम अपने अन्दर किसी न किसी क्रियाकलाप की विद्यमानता पाते हैं. एक हलचल के पश्चात दूसरी, दूसरी के पश्चात तीसरी.….ऎसे ही प्रतिक्षण कोई न कोई मानसिक क्रिया हम सब के भीतर चलती ही रहती है. इन सभी मानसिक क्रियाकलापों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:---- 1. ज्ञान सम्बन्धी---जैसे कि प्रत्यक्ष-ज्ञान, स्मृ्ति, कल्पना आदि 2. भाव सम्बन्धी---जैसे सुख, दु:ख, प्रेम, हर्ष, उत्साह, ग्लानि, क्रोध इत्यादि 3. क्रिया सम्बन्धी--जैसे कि ध्यान, प्रयत्न, प्रवृ्तियाँ आदि मानसिक क्रियाकलापों के यह भेद उनकी पारस्परिक पृ्थकता का समर्थन नहीं करते. वे प्राय: हमारे मानसिक जीवन में सम्मिलित रूप में ही उपस्थित होते हैं. मान लीजिए.….बाजार में जाते हुए आप किसी कुष्टरोगी को देखते हैं, आपको उसकी स्थिति पर दु:ख होता है. तुरन्त उस की मदद करने का विचार मन में उठता है. विचार कर आप यह निश्चित करते हैं कि मुझे बेचारे इस दीन-हीन, रोगी की सहायता करनी चाहिए. इस निश्चयानुसार अपनी जेब से कुछ पैसे निकालकर उसकी आर्थिक सहायता कर देते हैं. इस उदाहरण में तीनों प्रकार की मानसिक क्रियायों का समावेश पाया जाता है. उस कुष्टरोगी को देखकर दु:ख का अनुभव, उसकी दु:ख निवृ्ति का चिन्तन तथा सहायता का प्रदान-----भाव, ज्ञान तथा क्रिया तीनों क्रियाकलापों का बोधक है. यद्यपि इन तीनों प्रकार के क्रियाकलापों का भेद प्रकट किया जा सकता है तथापि मानसिक जीवन में उनकी सर्वथा पृ्थकता सम्भव नहीं. जब भी हम मानसिक जीवन का अवलोकन करते हैं तो इनमें से किसी न किसी की प्रधानता अवश्य प्रकट होती है. क्रोध की दशा में भाव की प्रधानता, अध्ययन काल में ज्ञान की प्रधानता, इसी प्रकार किसी कार्य को करने की स्थिति में क्रिया की प्रधानता दिखती है. नीचे दिए गए चित्र द्वारा इस उपरोक्त कल्पना का भलीभान्ती स्पष्टीकरण हो जाता है...... क्रमश:……. अन्त में एक बात अपने पाठकों से कहना चाहूँगा, कि हालाँकि विषयगत रूचि न होने अथवा विषय की जानकारी के अभाव अथवा जटिल शब्दावली के कारण कुछ पाठकों को ये विषय थोडा बोझिल लग सकता है, किन्तु यदि आपने आरम्भिक एक दो पोस्टस को थोडा ध्यानपूर्वक समझने का प्रयास कर लिया तो आगामी पोस्टस में आप स्वयं मानने लगेंगें कि इससे सरल और सर्वोपयोगी विषय तो कोई है ही नहीं. यूँ भी, अपने सामाजिक व्यवहार को दक्षतापूर्ण चलाने तथा उसको अधिक शान्तिमय बनाने के लिए मनोविज्ञान से थोडा बहुत परिचय तो सब के लिए ही परम आवश्यक है. मनोविज्ञान---मन का विज्ञान या आत्मा का ?मनोविज्ञान----क्या, क्यों, कैसे ?आगामी पोस्ट में हम बात करेंगें "मनोविज्ञान की कार्यपद्धति तथा इसका अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध" के बारे में...... 2 3 |
रविवार, 26 सितंबर 2010
सुभाषितं.........(संडे ज्ञान)
सूक्तियाँ----जिनके स्वाध्याय से मानव मन की सुप्त शक्तियाँ उदबुद्ध होकर उत्साह, प्रकाश और पुरूषार्थ की प्रेरणा बनती हैं. इसमें किसी के लिए भी शंका की कोई गुंजाईश ही नहीं है कि सूक्तियाँ गुणकारी औषधियों के समान ही ह्रदय और मस्तिष्क पर विद्युत भरा प्रभाव डालती हैं. इनका स्वाध्याय मनुष्य की सर्वोतम कल्पनाओं को प्रेरित करने में समर्थ होता है.शताब्दियों का मानव अनुभव तथा गम्भीर चिन्तन के सूत्र जैसी इन सूक्तियों को धरा पर उपलब्ध अमृ्त यूँ ही नहीं कहा गया है.ये कालजयी सूक्तियाँ वास्तव में 'अ-मृ्त' ही तो होती हैं.......तो फिर, क्यों न "संडे ज्ञान" में पुन: आज फिर इसी अमृ्त का पान किया जाए....... स
1. मुझसे यदि कोई पूछे कि जीवन क्या है? तो मैं उसकी व्याख्या करूँगा---संस्कार संचय़...(विनोबा भावे)
2. जनता जितनी बुद्धि शून्य होती है, उसके नेता उतने ही ह्रदय हीन होते चले जाते हैं---(मैक्सिम गोर्की)
3. शब्दों का अर्थ नहीं, अनुभव देखना चाहिए---(शीलनाथ)
4. मानसिक अनुशासन की दृ्ष्टि से अखबार पढना हानिकर है. मन के लिए दस मिनट में चालीस बातें सोचने से बदतर भला क्या हो सकता है ?----(मंजर)
5. इन्सान के लिए ये बडे शर्म की बात है कि वह केवल अपने सभ्य,शरीफ पूर्वजों के कारण ही इज्जत चाहे, और खुद अपने सदगुणों से उसका हकदार बनने की कोशिश न करे---(अज्ञात)
6. जो लोग इतिहास के मजमून बनते हैं, उन्हे उसके लिखने की फुर्सत नहीं होती---(मैटरनिच)
7. दुनिया की हर बेहूदगी का इलाज या तो है या नहीं है;अगर इलाज है तो उसका पता लगाने की कोशिश करो, अगर नहीं है तो उसको धत्ता पिलाने की कोशिश करो---(अज्ञात)
8. हम उपदेश सुनते हैं मणभर,देते हैं टनभर लेकिन ग्रहण करते हैं कणभर---(अल्जर)
9. ऎ उपदेशक! अगर तेरे पास दैविक प्रेरणा का बिल्ला नहीं है तो चाहे तू बोल बोलकर अपनी जान तक दे दे, मगर सब फिजूल जायेगा---(रामकृ्ष्ण)
10. सम्प्रदायों में जो सबसे ओच्छा है वही उपदेशक का काम करेगा---(हजरत मोहम्मद)
11. अर्थ के आतुरों को न कोई गुरू होता है न बन्धु,कामातुरों को न भय होता है न लज्जा, विद्यातुरों को न सुख होता है न नींद,क्षुधातुरों को न स्वाद होता है न समय---(संस्कृ्त सूक्ति)
12. एक क्षण के बाद भी इस शरीर के रहने का क्या भरोसा! फिर भी जीवन की चिन्ता ऎसी है मानो,कल्पान्त तक जीना हो---(संस्कृ्त सूक्ति)
13. काहिल आदमी साँस तो लेता है,मगर जीता नहीं है---(सिसरो)
14. जीवन में जो कुछ भी है,सब पहेली है और एक पहेली का हल दूसरी पहेली है---(एमर्सन)
15. लोग अक्सर अपनी समझदारी की कमी की पूर्ती गुस्से से करते हैं---(डब्लू.आर. अल्जर)
16. अपने ह्रदय के विकारों को धोए बिना,दूसरों का भला करने के लिए दौडने वाला,जमाने भर को उपदेश देने वाला, कीचड से सने हाथों से दूसरे का मुँह पोंछने जाने वाले के मानिन्द है---(गुरू वशिष्ठ)
17.हमें इसकी क्या चिन्ता कि मोहम्मद अच्छे थे या बुद्ध ? क्या इससे मेरी अच्छाई या बुराई में परिवर्तन हो सकता है? आओ, हम लोग अपने लिए और अपनी जिम्मेदारी पर अच्छे बने---(स्वामी विवेकानन्द)
1. मुझसे यदि कोई पूछे कि जीवन क्या है? तो मैं उसकी व्याख्या करूँगा---संस्कार संचय़...(विनोबा भावे)
2. जनता जितनी बुद्धि शून्य होती है, उसके नेता उतने ही ह्रदय हीन होते चले जाते हैं---(मैक्सिम गोर्की)
3. शब्दों का अर्थ नहीं, अनुभव देखना चाहिए---(शीलनाथ)
4. मानसिक अनुशासन की दृ्ष्टि से अखबार पढना हानिकर है. मन के लिए दस मिनट में चालीस बातें सोचने से बदतर भला क्या हो सकता है ?----(मंजर)
5. इन्सान के लिए ये बडे शर्म की बात है कि वह केवल अपने सभ्य,शरीफ पूर्वजों के कारण ही इज्जत चाहे, और खुद अपने सदगुणों से उसका हकदार बनने की कोशिश न करे---(अज्ञात)
6. जो लोग इतिहास के मजमून बनते हैं, उन्हे उसके लिखने की फुर्सत नहीं होती---(मैटरनिच)
7. दुनिया की हर बेहूदगी का इलाज या तो है या नहीं है;अगर इलाज है तो उसका पता लगाने की कोशिश करो, अगर नहीं है तो उसको धत्ता पिलाने की कोशिश करो---(अज्ञात)
8. हम उपदेश सुनते हैं मणभर,देते हैं टनभर लेकिन ग्रहण करते हैं कणभर---(अल्जर)
9. ऎ उपदेशक! अगर तेरे पास दैविक प्रेरणा का बिल्ला नहीं है तो चाहे तू बोल बोलकर अपनी जान तक दे दे, मगर सब फिजूल जायेगा---(रामकृ्ष्ण)
10. सम्प्रदायों में जो सबसे ओच्छा है वही उपदेशक का काम करेगा---(हजरत मोहम्मद)
11. अर्थ के आतुरों को न कोई गुरू होता है न बन्धु,कामातुरों को न भय होता है न लज्जा, विद्यातुरों को न सुख होता है न नींद,क्षुधातुरों को न स्वाद होता है न समय---(संस्कृ्त सूक्ति)
12. एक क्षण के बाद भी इस शरीर के रहने का क्या भरोसा! फिर भी जीवन की चिन्ता ऎसी है मानो,कल्पान्त तक जीना हो---(संस्कृ्त सूक्ति)
13. काहिल आदमी साँस तो लेता है,मगर जीता नहीं है---(सिसरो)
14. जीवन में जो कुछ भी है,सब पहेली है और एक पहेली का हल दूसरी पहेली है---(एमर्सन)
15. लोग अक्सर अपनी समझदारी की कमी की पूर्ती गुस्से से करते हैं---(डब्लू.आर. अल्जर)
16. अपने ह्रदय के विकारों को धोए बिना,दूसरों का भला करने के लिए दौडने वाला,जमाने भर को उपदेश देने वाला, कीचड से सने हाथों से दूसरे का मुँह पोंछने जाने वाले के मानिन्द है---(गुरू वशिष्ठ)
17.हमें इसकी क्या चिन्ता कि मोहम्मद अच्छे थे या बुद्ध ? क्या इससे मेरी अच्छाई या बुराई में परिवर्तन हो सकता है? आओ, हम लोग अपने लिए और अपनी जिम्मेदारी पर अच्छे बने---(स्वामी विवेकानन्द)
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
मनोविज्ञान----क्या, क्यों, कैसे ?
मनोविज्ञान का सब से सरल लक्षण जो परम्परा से प्रामाणिक समझा गया है. यह है कि मनोविज्ञान उस शास्त्र का नाम है जो "आत्मा" का विवेचन करता है अर्थात आत्म-ज्ञान सम्बन्धी शास्त्र का नाम मनोविज्ञान है. इस लक्षण को वर्तमान आधुनिक विज्ञान के रंग से रंगे हुए मनोविज्ञानवेता स्वीकार नहीं करते. वे इस लक्षण में जो बडी आपत्ति देखते हैं, वह स्वयं "आत्मा" शब्द का प्रयोग है. उनके मतानुसार "आत्मा" एक विवादास्पद विषय है. आत्मा प्रकृ्ति से अतिरिक्त एक स्वतन्त्र सत्ता है या नहीं , इस प्रश्न पर दोनों प्रकार के विचार रखने वाले मनोविज्ञान के विद्वान रहे हैं. ऎसी दशा में मनोविज्ञान का लक्षण आत्मा शब्द के प्रयोग से करना प्रारम्भ में ही इस विज्ञान को विवादमय बना देता है.
इस आपत्ति से बचने के लिए कईं विचारकों नें मनोविज्ञान से तात्पर्य ऎसे शास्त्र से लिया है जो "मन" की विवेचना करे. परन्तु मन शब्द भी, आत्मा शब्द के समान वैसी ही कठनाई उपस्थित करता है. तर्क शास्त्र भी किसी अंश में मन(विचार) ही के साथ सम्बन्ध रखता है. ऎसी अवस्था में इन दोनों शास्त्रों का क्षेत्र-भेद आवश्यक प्रतीत होता है.
इन दोनों लक्षणों से अधिक स्पष्ट मनोविज्ञान का लक्षण वह है जो इसे "चेतना" (Consciousness) का विज्ञान कहता है. चेतना शब्द अधिक प्रचलित शब्द है. चेतना का यथार्थ भाव भी सुलभतया उपलब्ध है. सब मनुष्यों को अपने ज्ञान और निज की चेतना का साक्षात बोध होता है. उनकी सता में सन्देह असम्भव है, क्यों कि सन्देह स्वयं "चेतना" का प्रतिपादक है. ऎसी दशा में आत्मा शब्द के स्थान में चेतना शब्द का प्रयोग यद्यपि लक्षण को अधिक सरल तथा सुबोध बना देता है तथापि एक आपत्ति भी उपस्थित कर देता है.
प्रत्येक चेतना वैयक्तिक होने के कारण उसका ज्ञान भी वैयक्तिक होगा. परन्तु विज्ञान की दृ्ष्टि से हमें केवल वैयक्तिक चेतनता का अध्ययन अभीष्ट नहीं, अपितु उन व्यापक सिद्धान्तों के जानने की आवश्यकता है जो अनेक व्यक्तियों की चेष्टा पर घट सकें. यह तभी सम्भव है जब कि वैयक्तिक चेतना के साथ साथ सामूहिक चेतना का परिज्ञान भी हमें प्राप्त हो. ऎसी दशा में मनोविज्ञान का लक्षण और भी अधिक व्यापक होना चाहिए. अत: चेतना की अपेक्षा हमें किसी अधिक व्यापक परिभाषा का लक्षण में प्रयोग करना चाहिए.
बीते कुछ माह की बात है जब हमने इसी विषय पर आधारित एक आलेख मनोविज्ञान---मन का विज्ञान या आत्मा का ? आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया था, जिस पर हमें अभी तक भी जिज्ञासु पाठकों की ओर से प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो रही हैं. जिनमें से कुछ पाठकों नें इस विषय पर विस्तृ्त जानकारी देने की माँग भी रखी है. सो, स्नेही पाठकों की इच्छा को शिरोधार्य मानते हुए अब से कुछ समय निरन्तर इस विषय पर ही लिखने का प्रयास रहेगा.
दरअसल मनोविज्ञान अपने आप में एक ऎसा विषय है, जिसका अध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है. मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है. उसकी जीवन यात्रा की सफलता बहुत कुछ उसके सामाजिक कर्तव्यों को भलीभान्ती पालन करने पर आश्रित रहती है. मनुष्य अपने सामाजिक कर्तव्यों का पालन तब तक सफलतापूर्वक नहीं कर सकता, जब तक कि वह समाज निष्ठ अन्य व्यक्तियों के स्वभाव को समझ न लेवे. परन्तु यह कार्य पूर्णतया सिद्ध होना मनोविज्ञान के बिना असम्भव है. इस लिए सामाजिक व्यवहार को दक्षतापूर्ण चलाने तथा उसको अधिक शान्तीमय बनाने के लिए मनोविज्ञान से थोडा बहुत परिचय सब के लिए परम आवश्यक है.
तो, अब विषय को आगे बढाते हुए बात करते हैं कि आत्मा, मस्तिष्क और चेतना---इन तीनों शक्तियों को अस्वीकार करने के पश्चात अब मनोविज्ञान की सबसे नवीन परिभाषा यह है कि जो शास्त्र मानसिक व्यापारों का क्रमबद्ध विवेचन करे------वो मनोविज्ञान है. मानसिक व्यापार किसको कहते हैं ? इसे समझने के लिए हमें थोडी देर अपनी चेतना का अन्तरीय अवलोकन करना चाहिए.
मैं जब ध्यानमग्न होकर अपनी चेतना का अवलोकन करता हूँ तो मुझे वहाँ पर किसी न किसी मानसिक दशा की विद्यमानता नजर आती है. अपने अन्दर मैं या तो अनुभव करता हूँ कि मैं किसी बात का "ध्यान" कर रहा हूं, या किसी पदार्थ की प्राप्ति की मुझे "आशा" लग रही है या किसी विषय में मुझे "सन्देह" उत्पन हो रहा है या मुझ को अपने किसी कार्य के सम्बन्ध में "भय" उत्पन हो रहा है या अपने किसी मित्र का "स्मरण" करके मुझे "प्रसन्नता" हो रही है, या अपने किसी शारीरिक अथवा मानसिक "दु:ख" का अनुभव हो रहा है, इत्यादि इसी प्रकार की अनेक मानसिक अवस्थाओं में से कोई न कोई अवस्था इस समय मेरे अन्तरीय अवलोकन का विषय बन रही है. ध्यान, आशा, दु:ख, सुख, स्मरण, भय, सन्देह, इत्यादि यह सब मानसिक व्यापार हैं. इन सब मानसिक व्यापारों के साथ कोई न कोई विषय सम्बद्ध रहता है. जब मैं चिन्तन करता हूँ तो मेरा चिन्तन किसी विषय को लक्ष्य करके ही होता है. जब मैं कोई सुख, दु:ख अनुभव करता हूँ, तो वह सुख-दु:ख भी किसी विषय के कारणभूत होने से उत्पन होते हैं. उपरोक्त विचार से यह स्पष्ट विदित होता है कि मानसिक व्यापार और उनका विषय दोनों पृ्थक-पृ्थक ज्ञान गोचर हो सकते हैं. मनोविज्ञान केवल मानसिक व्यापारों का ही विवेचन करता है. मानसिक व्यापारों की व्याख्या, उनके परस्पर सम्बन्धों का दर्शाना तथा उन व्यापक नियमों का खोजना है, जिनके अधीन वे मानसिक व्यापार कार्य करते हैं. यही मनोविज्ञान शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है. मानसिक व्यापारों के "विषय" अन्य विज्ञानों द्वारा प्रतिपादित होते हैं.
मनोविज्ञान के इस लक्षण की सार्थकता:-
यह लक्षण क्यों अधिक सर्वप्रिय बन पाया, इस पर भी थोडा विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है. प्रथम तो 'व्यापार' शब्द का प्रयोग अति विस्तृ्त अर्थों में लिया जा सकता है, मनुष्य से लेकर सब प्राणियों तक के सम्बन्ध में मानसिक व्यापार शब्द का प्रयोग किया जा सकता है. यदि एक मनुष्य विषय के सन्निकर्ष पर किसी विशेष प्रतिक्रिया अथवा मानसिक व्यापार को प्रकट करता है तो लगभग वैसी ही प्रतिक्रिया या व्यापार पशु-पक्षी, कीट-पतंगें आदि भी प्रकट करते हैं. ऎसी दशा में मानसिक व्यापार का विवेचन मनोविज्ञान शास्त्र के क्षेत्र को बहुत विस्तृ्त बना देता है. जहाँ मानुषी चेतना का विवेचन वैयक्तिक था, वहीं मानसिक व्यापारों का अध्ययन व्यापक तथा सर्वनिष्ठ होने के कारण मनोविज्ञान को वास्तव में विज्ञान कहलाने का अधिकारी बना देता है. किसी शास्त्र को विज्ञान का नाम तभी दिया जा सकता है, जब वह अपने विषय सम्बन्धी घटनाओं का किन्ही सामान्य नियमों अथवा सिद्धान्तों की दृ्ष्टि से प्रतिपादन करे. मनोविज्ञान शास्त्र भी अन्य विज्ञानों के समान प्राणियों के मानसिक व्यापारों का विस्तृ्त अध्ययन करके कईं एक सामान्य नियमों की स्थापना करना चाहता है....
क्रमश:......... धर्म ज्योतिष की सार्थकता
इस आपत्ति से बचने के लिए कईं विचारकों नें मनोविज्ञान से तात्पर्य ऎसे शास्त्र से लिया है जो "मन" की विवेचना करे. परन्तु मन शब्द भी, आत्मा शब्द के समान वैसी ही कठनाई उपस्थित करता है. तर्क शास्त्र भी किसी अंश में मन(विचार) ही के साथ सम्बन्ध रखता है. ऎसी अवस्था में इन दोनों शास्त्रों का क्षेत्र-भेद आवश्यक प्रतीत होता है.
इन दोनों लक्षणों से अधिक स्पष्ट मनोविज्ञान का लक्षण वह है जो इसे "चेतना" (Consciousness) का विज्ञान कहता है. चेतना शब्द अधिक प्रचलित शब्द है. चेतना का यथार्थ भाव भी सुलभतया उपलब्ध है. सब मनुष्यों को अपने ज्ञान और निज की चेतना का साक्षात बोध होता है. उनकी सता में सन्देह असम्भव है, क्यों कि सन्देह स्वयं "चेतना" का प्रतिपादक है. ऎसी दशा में आत्मा शब्द के स्थान में चेतना शब्द का प्रयोग यद्यपि लक्षण को अधिक सरल तथा सुबोध बना देता है तथापि एक आपत्ति भी उपस्थित कर देता है.
प्रत्येक चेतना वैयक्तिक होने के कारण उसका ज्ञान भी वैयक्तिक होगा. परन्तु विज्ञान की दृ्ष्टि से हमें केवल वैयक्तिक चेतनता का अध्ययन अभीष्ट नहीं, अपितु उन व्यापक सिद्धान्तों के जानने की आवश्यकता है जो अनेक व्यक्तियों की चेष्टा पर घट सकें. यह तभी सम्भव है जब कि वैयक्तिक चेतना के साथ साथ सामूहिक चेतना का परिज्ञान भी हमें प्राप्त हो. ऎसी दशा में मनोविज्ञान का लक्षण और भी अधिक व्यापक होना चाहिए. अत: चेतना की अपेक्षा हमें किसी अधिक व्यापक परिभाषा का लक्षण में प्रयोग करना चाहिए.
बीते कुछ माह की बात है जब हमने इसी विषय पर आधारित एक आलेख मनोविज्ञान---मन का विज्ञान या आत्मा का ? आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया था, जिस पर हमें अभी तक भी जिज्ञासु पाठकों की ओर से प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो रही हैं. जिनमें से कुछ पाठकों नें इस विषय पर विस्तृ्त जानकारी देने की माँग भी रखी है. सो, स्नेही पाठकों की इच्छा को शिरोधार्य मानते हुए अब से कुछ समय निरन्तर इस विषय पर ही लिखने का प्रयास रहेगा.
दरअसल मनोविज्ञान अपने आप में एक ऎसा विषय है, जिसका अध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है. मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है. उसकी जीवन यात्रा की सफलता बहुत कुछ उसके सामाजिक कर्तव्यों को भलीभान्ती पालन करने पर आश्रित रहती है. मनुष्य अपने सामाजिक कर्तव्यों का पालन तब तक सफलतापूर्वक नहीं कर सकता, जब तक कि वह समाज निष्ठ अन्य व्यक्तियों के स्वभाव को समझ न लेवे. परन्तु यह कार्य पूर्णतया सिद्ध होना मनोविज्ञान के बिना असम्भव है. इस लिए सामाजिक व्यवहार को दक्षतापूर्ण चलाने तथा उसको अधिक शान्तीमय बनाने के लिए मनोविज्ञान से थोडा बहुत परिचय सब के लिए परम आवश्यक है.तो, अब विषय को आगे बढाते हुए बात करते हैं कि आत्मा, मस्तिष्क और चेतना---इन तीनों शक्तियों को अस्वीकार करने के पश्चात अब मनोविज्ञान की सबसे नवीन परिभाषा यह है कि जो शास्त्र मानसिक व्यापारों का क्रमबद्ध विवेचन करे------वो मनोविज्ञान है. मानसिक व्यापार किसको कहते हैं ? इसे समझने के लिए हमें थोडी देर अपनी चेतना का अन्तरीय अवलोकन करना चाहिए.
मैं जब ध्यानमग्न होकर अपनी चेतना का अवलोकन करता हूँ तो मुझे वहाँ पर किसी न किसी मानसिक दशा की विद्यमानता नजर आती है. अपने अन्दर मैं या तो अनुभव करता हूँ कि मैं किसी बात का "ध्यान" कर रहा हूं, या किसी पदार्थ की प्राप्ति की मुझे "आशा" लग रही है या किसी विषय में मुझे "सन्देह" उत्पन हो रहा है या मुझ को अपने किसी कार्य के सम्बन्ध में "भय" उत्पन हो रहा है या अपने किसी मित्र का "स्मरण" करके मुझे "प्रसन्नता" हो रही है, या अपने किसी शारीरिक अथवा मानसिक "दु:ख" का अनुभव हो रहा है, इत्यादि इसी प्रकार की अनेक मानसिक अवस्थाओं में से कोई न कोई अवस्था इस समय मेरे अन्तरीय अवलोकन का विषय बन रही है. ध्यान, आशा, दु:ख, सुख, स्मरण, भय, सन्देह, इत्यादि यह सब मानसिक व्यापार हैं. इन सब मानसिक व्यापारों के साथ कोई न कोई विषय सम्बद्ध रहता है. जब मैं चिन्तन करता हूँ तो मेरा चिन्तन किसी विषय को लक्ष्य करके ही होता है. जब मैं कोई सुख, दु:ख अनुभव करता हूँ, तो वह सुख-दु:ख भी किसी विषय के कारणभूत होने से उत्पन होते हैं. उपरोक्त विचार से यह स्पष्ट विदित होता है कि मानसिक व्यापार और उनका विषय दोनों पृ्थक-पृ्थक ज्ञान गोचर हो सकते हैं. मनोविज्ञान केवल मानसिक व्यापारों का ही विवेचन करता है. मानसिक व्यापारों की व्याख्या, उनके परस्पर सम्बन्धों का दर्शाना तथा उन व्यापक नियमों का खोजना है, जिनके अधीन वे मानसिक व्यापार कार्य करते हैं. यही मनोविज्ञान शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है. मानसिक व्यापारों के "विषय" अन्य विज्ञानों द्वारा प्रतिपादित होते हैं.
मनोविज्ञान के इस लक्षण की सार्थकता:-
यह लक्षण क्यों अधिक सर्वप्रिय बन पाया, इस पर भी थोडा विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है. प्रथम तो 'व्यापार' शब्द का प्रयोग अति विस्तृ्त अर्थों में लिया जा सकता है, मनुष्य से लेकर सब प्राणियों तक के सम्बन्ध में मानसिक व्यापार शब्द का प्रयोग किया जा सकता है. यदि एक मनुष्य विषय के सन्निकर्ष पर किसी विशेष प्रतिक्रिया अथवा मानसिक व्यापार को प्रकट करता है तो लगभग वैसी ही प्रतिक्रिया या व्यापार पशु-पक्षी, कीट-पतंगें आदि भी प्रकट करते हैं. ऎसी दशा में मानसिक व्यापार का विवेचन मनोविज्ञान शास्त्र के क्षेत्र को बहुत विस्तृ्त बना देता है. जहाँ मानुषी चेतना का विवेचन वैयक्तिक था, वहीं मानसिक व्यापारों का अध्ययन व्यापक तथा सर्वनिष्ठ होने के कारण मनोविज्ञान को वास्तव में विज्ञान कहलाने का अधिकारी बना देता है. किसी शास्त्र को विज्ञान का नाम तभी दिया जा सकता है, जब वह अपने विषय सम्बन्धी घटनाओं का किन्ही सामान्य नियमों अथवा सिद्धान्तों की दृ्ष्टि से प्रतिपादन करे. मनोविज्ञान शास्त्र भी अन्य विज्ञानों के समान प्राणियों के मानसिक व्यापारों का विस्तृ्त अध्ययन करके कईं एक सामान्य नियमों की स्थापना करना चाहता है....
क्रमश:......... धर्म ज्योतिष की सार्थकता
रविवार, 19 सितंबर 2010
सुभाषितं-------(संडे ज्ञान)
| सूक्तियाँ, जिन्हे पढकर पता चलता है कि मनुष्य के जागृ्त मन नें पृ्थ्वी के विभिन्न खंडों में रहकर भी अनन्त युगों तक जीवन से जूझकर और जीवन को अपनाकर अपने अनुभव द्वारा सत्य को किस प्रकार प्राप्त किया है और उसे किस अमर वाणी में व्यक्त किया है.ये सूक्तियाँ नहीं मानव सन्तति का अक्षय भंडार और अखंड उतराधिकार हैं. यहाँ देश, काल,जाति और भाषा की सीमाओं से परे सारा विश्व ज्ञान के प्रकाश से उद्भासित,सत्य के बल से अनुप्राणित और सौन्दर्य के आकर्षण से एकाकार प्रतीत होता है.ज्ञान की यह कितनी बडी करामात है कि वह मानव मात्र में अभेद ही उत्पन नहीं करता,जीवन की मौलिक एकता का आधार सक्षर वाणी में व्यक्त करता है और इतिहास के पृ्ष्ठों पर अमरत्व की छाप लगा देता है. प्रस्तुत हैं चन्द सूक्तियाँ.......... अपना उल्लू सीधा करने के लिए शैतान भी धर्मशास्त्र के हवाले दे सकता है---(विलियम शैक्सपियर) हे मन! तुम पहले तो आदमी को खाई में धकेल देते हो और फिर उससे कहते हो कि "जिस हाल में ईश्वर नें तुझे डाल दिया है, उसमें संतुष्ठ रह"---(श्रीब्रह्मचैतन्य) अतिश्योक्ति वह सत्य है जो बौखलाई हुई हालत में रहती है----(खलील जिब्रान) लोहा और सोना समान है" यह सच्चे अर्थशास्त्र का मुख्य सूत्र है----(विनोबा) मेरे कहने पर आप पूर्ण विश्वास रखें" ऎसा कहने वाला व्यक्ति मानवजाति का कट्टर शत्रु है---(विवेकानन्द) हजार वर्ष तक बिना मन लगाए नमाज पढने और रोजा रखने के बजाय,एक कण के बराबर संसार के प्रति सच्ची अनासक्ति बढाना अधिक उत्तम है---(हुसैन बसराई) जहाँ अनुकरण है,वहाँ खाली दिखावट होगी,जहाँ खाली दिखावट है,वहाँ मूर्खता होगी—(जानसन) जो अपनी स्वतन्त्रता खोने से शुरूवात करते हैं,वे अपनी शक्ति खोकर समाप्ति करेंगें---(बर्कले) जिस क्षण तुम इच्छाओं से ऊपर उठ जाओगे,इच्छित वस्तु तुम्हारी तलाश करने लगेगी,यही नियम है---(स्वामी रामतीर्थ) दुष्ट आदमी को इज्जत देना, गोया बुखार के मरीज को तेज शराब पिलाना है---(प्लुटार्क) दुनिया में इज्जत के साथ जीने का सबसे छोटा और सबसे शर्तिया उपाय यह है कि हम जो कुछ बाहर से दिखना चाहते हैं वैसे ही वास्तव में हों भी---(सुकरात) तूफानी घोडे की रस्सी को ढील देकर उसे चाहे जहाँ जाने देने के लिए अधिक सामर्थ्य की जरूरत नहीं,यह तो कोई भी कर सकता है;मगर रस्सी खींचकर उसे खडा करने में कितने समर्थ हैं ?---(स्वामी विवेकानन्द) व्यक्ति की महता विचारकता में है. विस्तार के लिहाज से विश्व मुझे घेरकर एटम की तरह निगल जाता है; किन्तु विचार से मैं उसे निगल जाता हूँ----(पास्कल) मनुष्य को सदैव उद्योग तो करना ही चाहिए. फल उसी तरह मिलेगा. जिस तरह कि उस बिल्ली को मिलता है, जिसके अगर्चे गाय नहीं है मगर दूध रोज पीती है-----(संस्कृ्त सूक्ति) |
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
ब्लागर एकता जिन्दाबाद….."जिन्दाबाद-जिन्दाबाद”
सचमुच लोगों का भी कोई हाल नहीं है.देखिए अन्तर्र्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन हो गया, जिसमें हिन्दी ब्लागर संगठन बनाने जैसा कितना शानदार च जानदार सुझाव भी दे दिया गया, जिसका कि अधिकतर भई लोग समर्थन भी कर चुके हैं, लेकिन इत्ते दिन बीतने के बाद भी अभी तक इस सुझाव को असली जामा ही नहीं पहनाया जा रहा. लोग-बाग कितने जाहिल और नाकारा हो गये हैं. मजे ले लेकर बातें खूब करते हैं, पढते हैं, वाह वाह करते हैं लेकिन ब्लागर संगठन की शुरूआत करने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता. भला क्यों ? अरे भाई!एक विचार नें जन्म लिया है और आप ही लोग उसका भरपूर समर्थन भी कर रहे है तो फिर काहे नहीं उस विचार को मूर्तरूप दे रहे.भाई यह कोई गैरकानूनी काम तो है नहीं कि डरा जाए.मेरे विचार से भारतीय कानून में ऎसी कोई धारा भी नहीं है कि कोई संगठन खडा करने पर किसी दंड का प्रावधान हो,ओर न ही इसमें गूगल-वूगल या चिट्ठाजगत वगैरह किसी को भी कोई ऎतराज होना चाहिए,तो फिर अभी तक ऎसा कोई संगठन खडा क्यों नहीं किया जा सका. अरे भाई! सिर्फ सोचने भर से कुछ नहीं हुआ करता. खाली-पीली बौद्धिक-वैचारिक जुगाली से यदि यक्ष प्रश्नों का हल हुआ करता तो अब तक इस हिन्दी ब्लागजगत का क्या पूरे देश का कायापलट न हो चुका होता. हमें इस ब्लागिंग के अखाडे में आए हुए शायद दो बरस के करीब हो चुके हैं,लेकिन सोच रहे हैं कि इस तरफ अब तक हमारा ध्यान क्यूं नहीं गया.वैसे हमें याद आ रहा है कि बहुत पहले ताऊ द्वारा जब हमारा साक्षात्कार लिया गया था,उस समय ऎसे ही एक विचार नें हमारे मन में भी जन्म लिया था..लेकिन वो सिर्फ एक विचार भर था...एक ऎसा विचार जिसका जन्म शब्दों के इस अनन्त ब्राह्मंड में किसी क्षूद्र तारे की भान्ती सिर्फ नष्ट होने के लिए ही हुआ था.उसके बाद से हमने नहीं देखा कि यहाँ पुन:उस विचार को किसी नें जन्म दिया हो...मैं समझ नहीं पा रहा कि अब तक किसी द्वारा इस विषय पर गौर क्यूं नहीं किया गया ?न्यूटन से पहले पेड से फल गिरने पर भी किसी नें गौर नहीं किया था. आदिकाल से फल पेडों से जमीन पर ही तो गिर रहे थे,लेकिन किसी का उस तरफ ध्यान नहीं गया....मानो संसार जन्म-जन्मांतर से न्यूटन का ही इन्तजार कर रहा था कि कब वो आएं ओर पेड से फल गिरते देखकर दुनिया को गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त दें........ चलिए आगे बढने से पहले एक बात कहना चाहते हैं,कि भईया हम अगर किसी से बडे नहीं तो छोटे भी हरगिज नहीं हैं.बस आप हमें अपने समकक्ष ही समझ लीजिए. सो, उस लिहाज से हम एक मशविरा देना चाह रहे है. वैसे भी दुनिया में कौन किसी को डालर,पौंड दे रहा है,ले देकर सबके पास ये एक मशविरा ही तो हैं बाँटने के लिए. तो हम ये कह रहे थे कि संगठन खडा करने में ही बुद्धिमानी है और अब इसमें तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए.लेकिन एक छोटी सी शंका मन में जन्म ले रही है----वो ये कि संगठन बनने के बाद में चर्चा होगी कि प्रधान पद का चुनाव कैसे हो. प्रधान कौन बने? इस पर मतभेद होंगें.विद्वान लोग खेमों में बटेंगें.आपस में कीचड उछालेंगें. वाद विवाद होगा.इन सबसे अच्छा है कि प्रधान पद के लिए पहले से ही ऎसे किसी ब्लागर का चुनाव कर लिया जाए जो कि बृ्हस्पति के सदृ्श विद्वान,शुक्राचार्य की तरह चतुर,सनकादिक के जैसे मायाहीन, चाणक्य की तरह कूटनीतिज्ञ और भूमी के जैसे सहनशील हो----जिससे कि इस मंच को एक सुदृ्ड आधार प्रदान किया जा सके और कल को यह मुद्दा आपसी नौंक-झौंक, सिर फुटौव्वल का विषय न बन सके. (वैसे कुछ लोग ये भी कह सकते हैं कि यदि ऎसा कोई व्यक्ति आज की दुनिया में होता तो यहाँ ब्लागिंग में क्या वो झक मारने के लिए आता:)) खैर जो भी है,इसे सिर्फ हमारा सुझाव ही माना जाए, उस पर अमल करना न करना आप लोगों की मर्जी पर है.लेकिन इतना जरूर कहे देते है कि ये ऎसा सुझाव हैं,जिसमें प्रतिवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं है......सो,हमारे विचार से तो इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया जाना चाहिए. ऎसे ही कुछेक ओर समूह बनाए जा सकते हैं,जैसे कि "राष्ट्रीय सरकारी कर्मचारी ब्लागर्स संगठन"जिसका कार्य होगा समय समय पर संसद भवन के सामने सरकार के विरूद्ध नारे लगाना,ताकि सरकार को विवश किया जा सके कि वो "रिश्वत लेने" को कानूनन वैध घोषित करे.साथ ही सरकारी कर्मचरियों के कार्यकाल में आने वाली अन्य विभिन्न प्रकार की दिक्कत,परेशानियों को दूर करने हेतु कुछ सामूहिक प्रयास भी समय समय पर किए जाते रहें. "सम्मान जुटाऊ ब्लागर्स संगठन".इस समूह का कार्य होगा कि जब भी संगठन के किसी सदस्य के यहाँ कोई प्रभात फेरी, जागरण, कथा कीर्तन या फिर कोई जलूस वगैरह निकालने का प्रोग्राम हो तो ब्लागर्स की भीड जुटाकर अपने मोहल्ले,शहर के लोगों के सामने अपनी पहचान के झंडे गाडें जा सकें. अडोसी-पडोसी, नाते-रिश्तेदार भी देखकर दंग रह जाएं कि बन्दे का कितना भारी रसूख है.कितनी दूर दूर तक इनकी जान पहचान है........ हाँ तो भाईयो!अब हमने तो अपने सुझाव आप लोगों के सामने रख दिए.......वैसे सुझाव तो हमारे पास ओर भी बहुत सारे हैं,बिल्कुल थोक के भाव.लेकिन अभी इतने से ही काम चला लीजिए.पहले तो ये देखना बाकी हैं कि आप लोग इन सुझावों को असली जामा पहनाते भी हैं कि नहीं....खैर, हमरा काम तो था मशविरा देना,मानना न मानना आप की मर्जी......राम जी भली करें.बोलिए--"ब्लागर एकता जिन्दाबाद":) ज्ञानवाणी:-बाबा लीडरानन्द जी कह गए हैं कि दुनिया को बदलने की बडी बडी बातें करने वाले, लम्बी-लम्बी हाँकने वाले यदि पहले खुद में बदलाव ला सकें तो शायद ये दुनिया खुद-ब-खुद बदल जाए.......बिना किसी संगठन के !!! |
बुधवार, 15 सितंबर 2010
हे सूर्य! तुम जरा कुछ देर से आया करो........
सूर्य लालिमा लिए उदित होता है और बराबर बढता जाता है और इन्सान ? दिन भर अपने स्वार्थ साधन एवं दूसरों को मूंडनें की कोशिश में लगा रहता हैं. सूर्य दरअसल हम लोगों के सदगुणों को परखने आता है, सुबह से शाम तक परखता है और जब थक जाता है तो थोडी देर के लिए विश्राम करने चला जाता है. दूसरे दिन फिर सोचता है कि चलो बच्चों का अन्धेरा दूर करूँ, उनमें जागृ्ति लाऊँ, उजाले से उनका ह्रदय प्रकाशित कर दूँ. ओर यही कामना लेकर वह तरोताजा बना आता है.
हम लोगों नें उसकी यह चीज तो परख ली है. उसकी हर दिन की आशा को आशा न कह उषा, सवेरा, प्रभात, सुबह, प्रात:काल, दिन, उजाला, लालिमा वगैरह न जाने कैसे कैसे नाम जरूर इस्तेमाल करने लगे हैं. लेकिन मन के अन्धेरों को हम दूर नहीं करना चाहते. बस तिमिर को अन्दर सहेजे बैठे हैं. आज अगर हमारे वे पूर्वज होते जो इसका कारण जानने के लिए बराबर साधनाओं, तपस्यायों में जुटे रहते थे, उन्हे मैं बता देता और वें भी जान जाते कि अब उनके वंशज उलूक पूजक हो गए हैं.
हमें अब अन्धेरा अधिक प्रिय हो गया है. पर्दे के पीछे कोई कार्य बडी सफाई से हो सकता है और होता है. हम तो उसके रोज आने जाने से भी आजिज आ गए हैं. यदि वह कुछ देर करके आया करे और कुछ जल्दी चले जाया करे तो हम अधिक पसन्द करेंगें. तब हम उसके लिए धन्यवाद भी देंगें और यह भी बता देंगें कि वह घबराए नहीं, निश्चिंत रहे, हम प्रगति की ओर बढते जा रहे हैं................
हम लोगों नें उसकी यह चीज तो परख ली है. उसकी हर दिन की आशा को आशा न कह उषा, सवेरा, प्रभात, सुबह, प्रात:काल, दिन, उजाला, लालिमा वगैरह न जाने कैसे कैसे नाम जरूर इस्तेमाल करने लगे हैं. लेकिन मन के अन्धेरों को हम दूर नहीं करना चाहते. बस तिमिर को अन्दर सहेजे बैठे हैं. आज अगर हमारे वे पूर्वज होते जो इसका कारण जानने के लिए बराबर साधनाओं, तपस्यायों में जुटे रहते थे, उन्हे मैं बता देता और वें भी जान जाते कि अब उनके वंशज उलूक पूजक हो गए हैं.हमें अब अन्धेरा अधिक प्रिय हो गया है. पर्दे के पीछे कोई कार्य बडी सफाई से हो सकता है और होता है. हम तो उसके रोज आने जाने से भी आजिज आ गए हैं. यदि वह कुछ देर करके आया करे और कुछ जल्दी चले जाया करे तो हम अधिक पसन्द करेंगें. तब हम उसके लिए धन्यवाद भी देंगें और यह भी बता देंगें कि वह घबराए नहीं, निश्चिंत रहे, हम प्रगति की ओर बढते जा रहे हैं................
I Know the Better Course But I Follow The Worse
रविवार, 12 सितंबर 2010
सुभाषितं.........(संडे ज्ञान)
ह्रदय के आह्वान पर प्रेम, आत्मा के आह्वान पर धर्म और पेट के आह्वान पर क्रान्ति प्रकट होती है---(संस्कृ्त सुभाषित)
महान कार्य सम्पन्न होते हैं पर्वतों पर आसन जमाने से, सडकों पर धक्का-मुक्की करने या लाऊड-स्पीकरों पर चिल्लाने से नहीं-----(विलियम ब्लैक)
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
जो कल था, वही आज भी है.....और शायद आने वाले कल को भी यही सब रहने वाला है........
पिछले दो एक दिनों से कईं बार कुछ लिखने की इच्छा हुई लेकिन हर बार उस इच्छा का मैं दमन करता रहा. कईं बार तो कीबोर्ड तक हाथ बढाए भी और फिर मन मसोस कर वापिस रूक गया. एक दो बार शुरूआत भी की लेकिन बात कुछ बनी नहीं. हल्की और उथली बातें, ढीले वाक्य, विचारहीन, तर्कहीन थोथी दलीलें---शायद इतना खराब मैने जिन्दगी में कभी नहीं लिखा. नहीं जंचा, सो तुरन्त मिटा डाला. उसके बाद भी लिखने की जब इच्छा करता तभी एक नामी साहित्यकार का यह उपदेश स्मरण आ जाता-----it is better to plant cabbages then to write anything. यानि कुछ भी लिखने की बजाय घास छीलना कहीं ज्यादा अच्छा है. घास छीलने, हल जोतने या गायें-भैंसे चराने से मनुष्य का मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार का स्वास्थय ठीक रहता है. परन्तु ब्लाग लेखन से शारीरिक स्वास्थय की हानि के साथ साथ मानसिक पतन की भी बहुत गुंजाईश रहती है. आज हिन्दी-सेवा के नाम पर ईमानदारी और सच्चाई के साथ कुछ लिखते रहना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव सा हो गया है. मैं कहूँ कि लिखने से इसीलिए मुझे अरूचि हो रही है, तो साधुता का इतना बडा दम्भ मुझ मे नहीं है. पहले की अपेक्षा आज और भी अच्छी तरह से मैं अपनी कमजोरियाँ जानता हूँ. इसीलिए सिर्फ इस वाले ब्लाग पर कुछ लिखने से मेरे विरक्ति के जो भी कारण बन रहे हैं, वें निजि ही हो सकते हैं. जिन्हे पाठकों पर प्रकट करने का अभी समय नहीं है.
मेरा ख्याल था कि पिछले दो अढाई वर्षों में ये ब्लागिंग की दुनिया बहुत बदल गई है. परन्तु मेरी यह धारणा बिल्कुल गलत निकली. सारी चीजें ज्यों की त्यों हैं. बाकी दुनिया के साथ साथ ये ब्लाग संसार भी वैसे का वैसा ही चल रहा है. कहीं कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ. जो कल था, वही आज भी है.....और शायद आने वाले कल को भी यही सब रहने वाला है........
हालाँकि मैं स्वयं को ऎसी कैटेगरी का जीव मानता हूँ, जिसका अन्त: और बाह्य एक समान है. न किसी की टें टें से काम और न दुनिया के करूण क्रन्दण से मतलब; कहीं भूकम्प आए या आग लगे, किसी को सम्मान मिले या जूते पडें, अपना काम है अपने सोटे-लंगोटे में मस्त पडे रहना; न ऊधो के लेने में और न माधो के देने में. बस अपनी कल्पना के कल्पतरू के नीचे बैठकर अपनी विश्वामित्री सृ्ष्टि रचने में मस्त रहते हैं; सो भी तब, जब मौज आई, नहीं तो अपुण कल्पना करने का कष्ट भी नहीं करते.
क्या इन्सान इतना अहमक भी हो सकता है, इसका मैं ख्याल नहीं कर सकता था! लेकिन आज कल में ही ये जान पडा कि हम सभी में कोई न कोई ऎसी कमजोरी है, हम सब किसी न किसी ऎसे एक ही रोग से ग्रसित हैं, जिसे हम एक दूसरे में बर्दाश्त ही नहीं करते , वरन सदैव उस पर परदा डालने का प्रयास भी करते रहते हैं. यह कब तक होगा ? इसे कब तक बर्दाश्त किया जाता रहेगा ? हम सभी अपनी दुर्बलताओं से कब इतना ऊपर उठेंगें कि दूसरे की दुर्बलता हमारे लिए असह्य हो जाए ? इतनी असह्य की गुस्से में हम चीख पडें, इतना कि दुनिया हमारी आवाज सुन सके. वह दिन कब आएगा ? मैं पूछता हूँ, कब ?
मेरा ख्याल था कि पिछले दो अढाई वर्षों में ये ब्लागिंग की दुनिया बहुत बदल गई है. परन्तु मेरी यह धारणा बिल्कुल गलत निकली. सारी चीजें ज्यों की त्यों हैं. बाकी दुनिया के साथ साथ ये ब्लाग संसार भी वैसे का वैसा ही चल रहा है. कहीं कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ. जो कल था, वही आज भी है.....और शायद आने वाले कल को भी यही सब रहने वाला है........
हालाँकि मैं स्वयं को ऎसी कैटेगरी का जीव मानता हूँ, जिसका अन्त: और बाह्य एक समान है. न किसी की टें टें से काम और न दुनिया के करूण क्रन्दण से मतलब; कहीं भूकम्प आए या आग लगे, किसी को सम्मान मिले या जूते पडें, अपना काम है अपने सोटे-लंगोटे में मस्त पडे रहना; न ऊधो के लेने में और न माधो के देने में. बस अपनी कल्पना के कल्पतरू के नीचे बैठकर अपनी विश्वामित्री सृ्ष्टि रचने में मस्त रहते हैं; सो भी तब, जब मौज आई, नहीं तो अपुण कल्पना करने का कष्ट भी नहीं करते.
क्या इन्सान इतना अहमक भी हो सकता है, इसका मैं ख्याल नहीं कर सकता था! लेकिन आज कल में ही ये जान पडा कि हम सभी में कोई न कोई ऎसी कमजोरी है, हम सब किसी न किसी ऎसे एक ही रोग से ग्रसित हैं, जिसे हम एक दूसरे में बर्दाश्त ही नहीं करते , वरन सदैव उस पर परदा डालने का प्रयास भी करते रहते हैं. यह कब तक होगा ? इसे कब तक बर्दाश्त किया जाता रहेगा ? हम सभी अपनी दुर्बलताओं से कब इतना ऊपर उठेंगें कि दूसरे की दुर्बलता हमारे लिए असह्य हो जाए ? इतनी असह्य की गुस्से में हम चीख पडें, इतना कि दुनिया हमारी आवाज सुन सके. वह दिन कब आएगा ? मैं पूछता हूँ, कब ?
रविवार, 22 अगस्त 2010
आजकल तो ब्लागजगत में हास्य रस की ही धूम है......(बस यूँ ही)
आजकल ब्लागजगत में जिस रस की पोस्टें सबसे अधिक लिखी जा रही हैं, वह है हास्य-रस . अब यह बात दूसरी है कि लिखने वाला स्वयं उसे करूण या वीर रस समझता हो. लेकिन जब उनकी शैली हास्यास्पद लगे तो तब इन्हे हास्य रस के अन्तर्गत रखना ही ठीक समझा जाएगा.
हमारे एक ब्लागर बन्धु, जो रोजाना नियम से एक पोस्ट की सृ्ष्टि रचना करते हैं, उनकी लिखने की शैली इतनी जबरदस्त होती है कि क्या कहें! पाठक गम्भीर पोस्ट समझकर पढने आता है और महज चार पंक्तियाँ पढकर ही हँसता हुआ खिसक लेता है. यूँ भी एक आम पाठक भला इतना समझदार भी कहाँ होता है. वो तो लेखक के दो चार बुद्धिमान टाईप के यार मित्र हैं, जो पोस्ट को पूरा पढने का दम रखते हैं वर्ना आम पाठक में कहाँ दम कि वो इनकी पोस्ट को पूरा झेल सके. देखने में आता है कि ऎसे कुछ ब्लागरों को हमेशा शब्दों और भावों का अपच हुआ रहता है और तब वे मदारी के गोलों की भान्ती एक के बाद एक रन थ्रू निकलते चलते हैं. तब ऎसे में क्रम भंग हो जाए, मतलब कि कभी शब्द पहले निकल आए और भाव बाद में, और कभी भाव आगे निकल गए और शब्द कहीं मन में ही अटक गए तो कोई आश्चर्य की बात थोडे ही है.
ईमान धर्म की बात तो ये है कि ब्लाग लेखन स्वांत सुखाय होना चाहिए और ऎसा लिखा जाए कि पढने वाले की समझ में आए------ये सिद्धान्त बहुत पुराना हो चुका है. नया सिद्धान्त तो है कि बात ऎसी कहो जिसे कोई भले न समझे, उसका किसी को कोई लाभ हो या न हो, लेकिन टिप्पणी मिलनी चाहिए और दूसरी बात ये कि भाई बन्धुओं के प्रताप से पुरूस्कार उरस्कार मिलने के चाँस भी बने रहे. इससे उन्हे खुद को तो खुशी मिलेगी ही, साथ में हम जैसे तमाशबीन भी तनिक हास्य रस का आनन्द ले सकेंगें. इसलिए हमने निवेदन किया था कि आजकल ब्लागजगत में हास्य रस की धूम है. आगे चलकर जब कोई ब्लागिंग का इतिहास लिखेगा तो उसे हास्यास्पद रचनाओं की कमी न रहेगी और उसे यह मानना पडेगा कि ब्लागिंग के इस वर्तमान काल में इन हास्यास्पद रचनाओं को सराहने वाले भी जितने गुणग्राहक मिले, उतने पहले कभी न थे. आपने अभी तक ऎसी रचना न चेपी हो तो अब चेप लीजिए, टिप्पणी और पुरूस्कार देने वालों की यहाँ कोई कमी थोडे ही है....:)
चलते चलते आपकी नजर एक एक शेर अर्ज है:---
कहाँ हैं गुण के ग्राहक, जो गुण को देखते हैं
बस,जो हमको टीपते हैं, हम उनको टीपते हैं!!
हमारे एक ब्लागर बन्धु, जो रोजाना नियम से एक पोस्ट की सृ्ष्टि रचना करते हैं, उनकी लिखने की शैली इतनी जबरदस्त होती है कि क्या कहें! पाठक गम्भीर पोस्ट समझकर पढने आता है और महज चार पंक्तियाँ पढकर ही हँसता हुआ खिसक लेता है. यूँ भी एक आम पाठक भला इतना समझदार भी कहाँ होता है. वो तो लेखक के दो चार बुद्धिमान टाईप के यार मित्र हैं, जो पोस्ट को पूरा पढने का दम रखते हैं वर्ना आम पाठक में कहाँ दम कि वो इनकी पोस्ट को पूरा झेल सके. देखने में आता है कि ऎसे कुछ ब्लागरों को हमेशा शब्दों और भावों का अपच हुआ रहता है और तब वे मदारी के गोलों की भान्ती एक के बाद एक रन थ्रू निकलते चलते हैं. तब ऎसे में क्रम भंग हो जाए, मतलब कि कभी शब्द पहले निकल आए और भाव बाद में, और कभी भाव आगे निकल गए और शब्द कहीं मन में ही अटक गए तो कोई आश्चर्य की बात थोडे ही है.
ईमान धर्म की बात तो ये है कि ब्लाग लेखन स्वांत सुखाय होना चाहिए और ऎसा लिखा जाए कि पढने वाले की समझ में आए------ये सिद्धान्त बहुत पुराना हो चुका है. नया सिद्धान्त तो है कि बात ऎसी कहो जिसे कोई भले न समझे, उसका किसी को कोई लाभ हो या न हो, लेकिन टिप्पणी मिलनी चाहिए और दूसरी बात ये कि भाई बन्धुओं के प्रताप से पुरूस्कार उरस्कार मिलने के चाँस भी बने रहे. इससे उन्हे खुद को तो खुशी मिलेगी ही, साथ में हम जैसे तमाशबीन भी तनिक हास्य रस का आनन्द ले सकेंगें. इसलिए हमने निवेदन किया था कि आजकल ब्लागजगत में हास्य रस की धूम है. आगे चलकर जब कोई ब्लागिंग का इतिहास लिखेगा तो उसे हास्यास्पद रचनाओं की कमी न रहेगी और उसे यह मानना पडेगा कि ब्लागिंग के इस वर्तमान काल में इन हास्यास्पद रचनाओं को सराहने वाले भी जितने गुणग्राहक मिले, उतने पहले कभी न थे. आपने अभी तक ऎसी रचना न चेपी हो तो अब चेप लीजिए, टिप्पणी और पुरूस्कार देने वालों की यहाँ कोई कमी थोडे ही है....:)
चलते चलते आपकी नजर एक एक शेर अर्ज है:---
कहाँ हैं गुण के ग्राहक, जो गुण को देखते हैं
बस,जो हमको टीपते हैं, हम उनको टीपते हैं!!
शनिवार, 14 अगस्त 2010
ये 15 अगस्त क्या होता है ???
शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
क्या वाकई में रोग जीवाणुओं की वजह से होते हैं ???
बैक्टीरिया या वायरस का नाम सुनते ही कँपकँपी आना किसी के लिए भी स्वाभाविक है, क्यों कि हम सब की सामान्यत यह धारण है कि जीवाणु रोग उत्पति के कारण है,और इनका बढना बीमारी ही नहीं बल्कि महामारी का भी कारण हो सकता है. हमारे प्राचीन ग्रन्थों में इसकी काफी चर्चा है. छुआछूत,स्नान,मंजन,शौच,लघुशंका के बाद तथा प्रसव के बाद के नियम स्पष्ट बताए गए हैं. और साथ ही क्या क्या सावधानी भी बरतनी है,हमारे पूर्वजों को भलीभान्ती ज्ञात था. इसलिए इस पर विशद ज्ञान का भी वर्णन है. यह तो सर्वविदित है कि 1929 में अलेक्जैन्डर फ्लैमिंग नें पेनिसिलीन नाम के एन्टीबायोटिक की खोज की थी और उनकी यह खोज उनकी प्रयोगशाला में कुछ बैक्टीरिया के कल्चर के समय हुई.बैक्टीरिया के साथ साथ जीवाणु की एक ओर नस्ल है---भूखडी या फफूँद. एक बार फ्लेमिंग नें देखा कि स्टेफाईलोकोकाई बैक्टीरिया का उत्पादन कुछ स्थानों पर समाप्त हो गया है,क्यों कि वहाँ पर एक फफूँद उग आई है.वह फफूँद थी पेनिसिलीन नोटैम नामक फफूँद. उसे चिन्ता ही नहीं आश्चर्य भी हुआ कि आखिर उस फफूँद नें क्योंकर बैक्टीरिया का केवल बढना ही नहीं रोका,उसे पूरी तरह से नष्ट भी कर दिया. फिर उसी फफूँद से पैदा किया गया पेनिसिलीन जो लगभग 30 वर्षों तक जीवाणु जनित रोगों में अचूक रामबाण औषधी था.
असहयोग आन्दोलन के समय महात्मा गाँधी की पत्नि कस्तूरबा जब पूना जेल में थी तो इसी पेनिसिलीन के इन्जेक्शनों द्वारा ही उनके रोग पर काबू पाया गया. हर 6 घंटे बाद उन्हे ये इंजेक्शन लगाया जाता था और उस जमाने में इसके एक इंजेक्शन की कीमत थी--40 रूपए जो कि आज के हिसाब से 8-9 हजार रूपए के बराबर है.धीरे धीरे ये हुआ कि इस इंजेक्शन का प्रभाव न केवल कम होता चला गया बल्कि इसके कारण मृ्त्यु तक होने लगी.अगर आज किसी डाक्टर से पेनिसिलीन का इंजेक्शन लगाने को कह दिया जाए तो वह आपका मुँह ताकने लगेगा---क्यों कि वह जानता है कि यह अपने समय का रामबाण अब निष्प्रभावी ही नहीं,बल्कि घातक भी हो गया है.
एक फफूँद नें जीवित बैक्टीरिया को क्योंकर और कैसे नष्ट किया था ? और यहीं से उत्पत्ति हुई ऎसी दवाईयों की जो एक जीवित का उपयोग दूसरे जीवित को नष्ट करने के काम आए अर्थात ऎंटिबायोटिक.(ऎंटी--अर्थात विरूद्ध और बायो---जीवित या जीवन्त तथा इक्स---पदार्थ) आज अनेक प्रकार के फफूंद से नए नए ऎंटीबायोटिक बनाए जा रहे हैं. पर क्या हम इनसे रोग पैदा करने वाले जीवाणु या विषाणुओं को रोक सकेंगें ?
बैक्टिरिया एवं वायरस तो रहेंगें ही,क्यों कि वे भी सृ्ष्टि या प्रकृ्ति का एक अंग हैं.जब हम और आप वैज्ञानिकों के साथ मिलकर उन्हे नष्ट करने या मार डालने का प्रयास करते हैं तो वे भी अपने बचाव के लिए नए नए तरीके ईजाद कर लेते हैं---और फिर वैज्ञानिक ढूँढने लगते हैं इन नए परिवर्तित जीवाणुओं से निपटने का कोई नया उपचार. कौन नहीं जानता कि H.I.V की खोज पहली बार केवल 26 वर्ष पूर्व हुई थी. तब से इन 26 वर्षों में H.I.V नए नए प्रकारों में बँटता जा रहा है. H.I.V.-1, H.I.V -2 और अब आ गया है H.I.V-3. तो क्या ये अलग अलग वायरस हैं? या फिर वे ही अपना रूप, आकार, क्षमता घटाते बढाते जाते है.क्या केवल इतना सही नहीं है कि जब आप उन्हे मारेंगें,नष्ट करने का प्रयास करेंगें,तो वे भी अपना स्वरूप बदल लेंगें. हो सकता है कि वे नए रूप में भी आ जाएं. शायद आपको 1997 का "पागल गाय रोग" (Mad Cow Diseases) का पता होगा.गायों पर इसका हमला इसलिए नहीं हुआ कि वह कहीं सुदूर से आया था,बल्कि इस तरह के जीवाणु सुप्त अवस्था में गायों के शरीर के अन्दर ही रहते हैं और वे किसी प्रकार का कोई रोग नहीं उत्पन करते.
लेकिन जब आप शुद्ध शाकाहारी,घास-फूस खाने वाली गाय को माँसाहारी बना देंगें,जैसा इंग्लैंड में किया गया तो उनका बीमार होना निश्चित था. इन दूध देने वाली गायों को उनके भोजन में,माँस के लिए काटी गई गायों का अवशेष,जो वहाँ किसी काम में नहीं आ सकता था, खिलाया गया.(हमारे इस देश में इन्ही जानवरों की हड्डियों से कैल्शियम की गोली और रक्त से टानिक बनाया जाता है,जो हमारे विद्वान(?) डाक्टरों द्वारा जानबूझकर कितने ही भारतीयों के पेट में ठूँस दी जाती है).जब इन विलायती गायों नें अपने ही परिवार की गायों की हड्डी,खून,आँतें खाई तो निश्चित ही था कि उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होनी ही थी. और ऎसा हुआ भी----गायों को मस्तिष्क रोग हुआ और उनका माँस खाने से इन्सानों में भी हुआ. इंग्लैंड में उस समय इस रोग से कितनी ही मौतें हुई. अन्तोगत्वा लाखों गायों को काटकर गाड दिया गाय,क्यों कि उनका माँस खाने वाला पूरे विश्व में उस समय कोई तैयार नहीं था.
सन 1988 में हाँगकाँग में भी ऎसी ही घटना हुई---मुर्गियों में एक प्रकार का जीवाणु एवियन फ्लू का प्रकोप हुआ, जिससे कईं लोगों की मौत हुई. अभी कोई बहुत दिन नहीं हुए जब समूचे विश्व में बर्ड फ्लू और स्वाईन फ्लू नाम के नये वायरस का प्रकोप छाया रहा. न जाने कितने लोगों की मौत हुई और अन्तोगत्वा लाखों करोडों मुर्गियों,सूअरों को मारकर दफना दिया गया था. यहाँ भी कारण वही है कि मुर्गियों,सूअरों को उनके प्राकृ्तिक वातावरण और भोजन इत्यादि पर न रखकर उन्हे एक विशिष्ट पद्धति पर पाला गया था,जिसमें ऎंटीबायोटिक,हार्मोंन इत्यादि बहुतायत में प्रयोग किए जाते हैं. अब यह गायों,मुर्गियों,सूअरों की इच्छा(जो प्रकृ्ति के नियम पर आधारित है) पर निर्भर नहीं कि वे कब गर्भ धारण करेंगीं,या बच्चे,अंडें देगी. अब यह तो इनका मालिक या पशु चिकित्सक तय करेगा. बिना मुर्गे के अंडा.
काफी वर्षों से मुर्गीपालक वर्जिनियामाईसीन नामक एक दवा का प्रयोग करते रहे हैं जो चूजों की वृ्द्धि करता है. और इसका असर यह हुआ कि मुर्गी खाने वालों को ऎसे बैक्टिरिया ई-फैसियम से पाला पड रहा है जो हर किसी ऎंटिबायोटिक का प्रतिरोधी है. इतना ही नहीं गोश्त के माध्यम शरीर में पहुँचे ये जीवाणु मनुष्यों में जीवित ही नहीं रहते बल्कि फलते फूलते भी हैं और रोग पैदा करने की क्षमता भी रखते हैं.
इन जीवाणुऔ के कारण दुनिया के न जाने कितने मुल्कों में लाखों करोडों गायों,मुर्गियों,सूअरों को काटकर दफन कर दिया गया. पर क्या इन जीवाणुओं पर काबू पा लिया गया ? नहीं.
अभी तक तो हमारे देश में कसाईघरों में खून,आँत और हड्डियों का प्रयोग दवाओं के रूप में किया जाता रहा है. शायद ही आप विश्वास करें कि हड्डियों का चूरा दवा की गोली के रूप में 12000 रूपए किलो के हिसाब से बिक रहा है. गायं,भैंस और बकरे का खून जिसका कोई व्यवसायिक प्रयोग नहीं हैं--500 रूपए किलो है. जहाँ तक मेरा ज्ञान है दुनिया के सभी धर्मों में खून का प्रयोग वर्जित है, पर हमारे इस देश में शाकाहारी डाक्टर लिख रहे हैं और शाकाहारी यहाँ तक कि जैन धर्मावलंबी भी खा रहे हैं----इन गोलियों और टानिकों कों.
पिछले कुछ वर्षों में बढे जोडों की गठिया, जो अपने पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी थी.उसके बचाव के लिए नई और आधुनिक दो दवाएं हैं---ल्यूकोसीन और कोड्राइटम सल्फेट.ये दोनों दवाईयाँ जानवरों और मछलियों के अवशेष से बनाई जाती हैं और कीमत है 1500 से 45000 रू प्रति माह, जो तीन महीने खाकर तीन महीनें नहीं खानी हैं अर्थात साल भर में 6 माह का सेवन. शायद इनसे आपकी गठिया तो ठीक नहीं होगी लेकिन जेबें जरूर खाली हो जाएंगीं. अगर आप बहुत सम्पन्न हैं और जेब की कोई फिक्र नहीं हैं तो "पागल गाय रोग"(Mad cow disease) की सम्भावना अवश्य होगी. सोचिए क्या आप हर खाँसी, जुकाम, नजला पर एंटीबायोटिक सीधे या फिर कैल्शियम,टोनिक खाएंगें----या फिर खाएंगें स्वस्थ पूर्ण भोजन----भोजन या भोजन पूरक के बीच की पसन्द आपकी है.....
साभार:-डा. आर. सी. मिश्र, जिनके एक लेख के आधार पर ये पोस्ट लिखी गई है.
असहयोग आन्दोलन के समय महात्मा गाँधी की पत्नि कस्तूरबा जब पूना जेल में थी तो इसी पेनिसिलीन के इन्जेक्शनों द्वारा ही उनके रोग पर काबू पाया गया. हर 6 घंटे बाद उन्हे ये इंजेक्शन लगाया जाता था और उस जमाने में इसके एक इंजेक्शन की कीमत थी--40 रूपए जो कि आज के हिसाब से 8-9 हजार रूपए के बराबर है.धीरे धीरे ये हुआ कि इस इंजेक्शन का प्रभाव न केवल कम होता चला गया बल्कि इसके कारण मृ्त्यु तक होने लगी.अगर आज किसी डाक्टर से पेनिसिलीन का इंजेक्शन लगाने को कह दिया जाए तो वह आपका मुँह ताकने लगेगा---क्यों कि वह जानता है कि यह अपने समय का रामबाण अब निष्प्रभावी ही नहीं,बल्कि घातक भी हो गया है.
एक फफूँद नें जीवित बैक्टीरिया को क्योंकर और कैसे नष्ट किया था ? और यहीं से उत्पत्ति हुई ऎसी दवाईयों की जो एक जीवित का उपयोग दूसरे जीवित को नष्ट करने के काम आए अर्थात ऎंटिबायोटिक.(ऎंटी--अर्थात विरूद्ध और बायो---जीवित या जीवन्त तथा इक्स---पदार्थ) आज अनेक प्रकार के फफूंद से नए नए ऎंटीबायोटिक बनाए जा रहे हैं. पर क्या हम इनसे रोग पैदा करने वाले जीवाणु या विषाणुओं को रोक सकेंगें ?
बैक्टिरिया एवं वायरस तो रहेंगें ही,क्यों कि वे भी सृ्ष्टि या प्रकृ्ति का एक अंग हैं.जब हम और आप वैज्ञानिकों के साथ मिलकर उन्हे नष्ट करने या मार डालने का प्रयास करते हैं तो वे भी अपने बचाव के लिए नए नए तरीके ईजाद कर लेते हैं---और फिर वैज्ञानिक ढूँढने लगते हैं इन नए परिवर्तित जीवाणुओं से निपटने का कोई नया उपचार. कौन नहीं जानता कि H.I.V की खोज पहली बार केवल 26 वर्ष पूर्व हुई थी. तब से इन 26 वर्षों में H.I.V नए नए प्रकारों में बँटता जा रहा है. H.I.V.-1, H.I.V -2 और अब आ गया है H.I.V-3. तो क्या ये अलग अलग वायरस हैं? या फिर वे ही अपना रूप, आकार, क्षमता घटाते बढाते जाते है.क्या केवल इतना सही नहीं है कि जब आप उन्हे मारेंगें,नष्ट करने का प्रयास करेंगें,तो वे भी अपना स्वरूप बदल लेंगें. हो सकता है कि वे नए रूप में भी आ जाएं. शायद आपको 1997 का "पागल गाय रोग" (Mad Cow Diseases) का पता होगा.गायों पर इसका हमला इसलिए नहीं हुआ कि वह कहीं सुदूर से आया था,बल्कि इस तरह के जीवाणु सुप्त अवस्था में गायों के शरीर के अन्दर ही रहते हैं और वे किसी प्रकार का कोई रोग नहीं उत्पन करते.
लेकिन जब आप शुद्ध शाकाहारी,घास-फूस खाने वाली गाय को माँसाहारी बना देंगें,जैसा इंग्लैंड में किया गया तो उनका बीमार होना निश्चित था. इन दूध देने वाली गायों को उनके भोजन में,माँस के लिए काटी गई गायों का अवशेष,जो वहाँ किसी काम में नहीं आ सकता था, खिलाया गया.(हमारे इस देश में इन्ही जानवरों की हड्डियों से कैल्शियम की गोली और रक्त से टानिक बनाया जाता है,जो हमारे विद्वान(?) डाक्टरों द्वारा जानबूझकर कितने ही भारतीयों के पेट में ठूँस दी जाती है).जब इन विलायती गायों नें अपने ही परिवार की गायों की हड्डी,खून,आँतें खाई तो निश्चित ही था कि उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होनी ही थी. और ऎसा हुआ भी----गायों को मस्तिष्क रोग हुआ और उनका माँस खाने से इन्सानों में भी हुआ. इंग्लैंड में उस समय इस रोग से कितनी ही मौतें हुई. अन्तोगत्वा लाखों गायों को काटकर गाड दिया गाय,क्यों कि उनका माँस खाने वाला पूरे विश्व में उस समय कोई तैयार नहीं था.
सन 1988 में हाँगकाँग में भी ऎसी ही घटना हुई---मुर्गियों में एक प्रकार का जीवाणु एवियन फ्लू का प्रकोप हुआ, जिससे कईं लोगों की मौत हुई. अभी कोई बहुत दिन नहीं हुए जब समूचे विश्व में बर्ड फ्लू और स्वाईन फ्लू नाम के नये वायरस का प्रकोप छाया रहा. न जाने कितने लोगों की मौत हुई और अन्तोगत्वा लाखों करोडों मुर्गियों,सूअरों को मारकर दफना दिया गया था. यहाँ भी कारण वही है कि मुर्गियों,सूअरों को उनके प्राकृ्तिक वातावरण और भोजन इत्यादि पर न रखकर उन्हे एक विशिष्ट पद्धति पर पाला गया था,जिसमें ऎंटीबायोटिक,हार्मोंन इत्यादि बहुतायत में प्रयोग किए जाते हैं. अब यह गायों,मुर्गियों,सूअरों की इच्छा(जो प्रकृ्ति के नियम पर आधारित है) पर निर्भर नहीं कि वे कब गर्भ धारण करेंगीं,या बच्चे,अंडें देगी. अब यह तो इनका मालिक या पशु चिकित्सक तय करेगा. बिना मुर्गे के अंडा.
काफी वर्षों से मुर्गीपालक वर्जिनियामाईसीन नामक एक दवा का प्रयोग करते रहे हैं जो चूजों की वृ्द्धि करता है. और इसका असर यह हुआ कि मुर्गी खाने वालों को ऎसे बैक्टिरिया ई-फैसियम से पाला पड रहा है जो हर किसी ऎंटिबायोटिक का प्रतिरोधी है. इतना ही नहीं गोश्त के माध्यम शरीर में पहुँचे ये जीवाणु मनुष्यों में जीवित ही नहीं रहते बल्कि फलते फूलते भी हैं और रोग पैदा करने की क्षमता भी रखते हैं.
इन जीवाणुऔ के कारण दुनिया के न जाने कितने मुल्कों में लाखों करोडों गायों,मुर्गियों,सूअरों को काटकर दफन कर दिया गया. पर क्या इन जीवाणुओं पर काबू पा लिया गया ? नहीं.
अभी तक तो हमारे देश में कसाईघरों में खून,आँत और हड्डियों का प्रयोग दवाओं के रूप में किया जाता रहा है. शायद ही आप विश्वास करें कि हड्डियों का चूरा दवा की गोली के रूप में 12000 रूपए किलो के हिसाब से बिक रहा है. गायं,भैंस और बकरे का खून जिसका कोई व्यवसायिक प्रयोग नहीं हैं--500 रूपए किलो है. जहाँ तक मेरा ज्ञान है दुनिया के सभी धर्मों में खून का प्रयोग वर्जित है, पर हमारे इस देश में शाकाहारी डाक्टर लिख रहे हैं और शाकाहारी यहाँ तक कि जैन धर्मावलंबी भी खा रहे हैं----इन गोलियों और टानिकों कों.
पिछले कुछ वर्षों में बढे जोडों की गठिया, जो अपने पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी थी.उसके बचाव के लिए नई और आधुनिक दो दवाएं हैं---ल्यूकोसीन और कोड्राइटम सल्फेट.ये दोनों दवाईयाँ जानवरों और मछलियों के अवशेष से बनाई जाती हैं और कीमत है 1500 से 45000 रू प्रति माह, जो तीन महीने खाकर तीन महीनें नहीं खानी हैं अर्थात साल भर में 6 माह का सेवन. शायद इनसे आपकी गठिया तो ठीक नहीं होगी लेकिन जेबें जरूर खाली हो जाएंगीं. अगर आप बहुत सम्पन्न हैं और जेब की कोई फिक्र नहीं हैं तो "पागल गाय रोग"(Mad cow disease) की सम्भावना अवश्य होगी. सोचिए क्या आप हर खाँसी, जुकाम, नजला पर एंटीबायोटिक सीधे या फिर कैल्शियम,टोनिक खाएंगें----या फिर खाएंगें स्वस्थ पूर्ण भोजन----भोजन या भोजन पूरक के बीच की पसन्द आपकी है.....
साभार:-डा. आर. सी. मिश्र, जिनके एक लेख के आधार पर ये पोस्ट लिखी गई है.
रविवार, 8 अगस्त 2010
भय और अविश्वास भरा सफर.......
| पिछले सप्ताह की बात है, अचानक किसी आवश्यक कार्य से हिमाचल प्रदेश स्थित कांगडा जी जाने का कार्यक्रम बन गया.रात के समय ही हम गाडी में बैठे सफर के लिए निकल पडे. गाडी में हम कुल जमा चार लोग थे---एक मैं,एक हमारे यहाँ की नगरनिगम के पार्षद,एक व्यवसायी और चौथा ड्राईवर.हमारा ड्राईवर जो था, वो था एक मुसलमान युवक---नाम शायद जाहिद करके कुछ था. एक तो पहाडी रास्ता ऊपर से लम्बा सफर, घुमावदार सडकें.....अब किसी किसी मोड पर तो गाडी यूँ टर्न लेती कि एकदम से प्राण हलक में आ जाते.न मालूम ये पिछले कुछ दिनों से यहाँ ब्लागजगत में देखे जा रहे अधर्मी लम्पटों के आचरण का असर था या क्या था लेकिन उस ड्राईवर को देखते हुए हमारे दिमाग में कुछ अजीब से विचार जन्म लेने लगे. वो जिस स्पीड से गाडी चला रहा था और मोड पर जिस तेजी से टर्न ले रहा था---उसे देखते हुए लगा कि आज सही सलामत घर वापसी मुश्किल है.हमने उसे कईं बार कहा भी कि भाई जरा गाडी धीरे चलाओ,लेकिन वो पट्ठा कहाँ मानने वाला था.हमारे कहने का उसपर सिर्फ इतना असर होता कि मुश्किल से 2-3 किलोमीटर तक वो गाडी कहने मुताबिक चलाता, फिर थोडी देर में ही धीरे धीरे गाडी उसी पहले वाली स्पीड में ही पहुँच जाती.अब हमारा ये हाल था कि हमें उसकी शक्ल में साक्षात यमराज के दर्शन होने लगे. दिन भर दुनिया जहान के लोगों की जन्मपत्रियाँ बाँचते बाँचते इतना समय भी नहीं निकाल पाते कि कभी खुद की जन्मकुंडली के ग्रह-नक्षत्रों पे ही निगाह डाल लें.अपनी कुंडली देखे हुए भी शायद बरसों बीत गए होंगें.ये भी नहीं मालूम कि कहीं किसी "मारकेश" ग्रह की दशा ही न चल रही हो.अगर चलने से पहले अपनी कुंडली देख लेते तो जाने का प्रोग्राम कैंसिल न सही, कम से कम चलने से पहले "महामृ्त्युंजय" का जाप ही कर लिए होते.लेकिन अब भला क्या किया जा सकता था ? उसकी रफ्तार देख देखकर हमें तो सचमुच भय सा लगने लगा था.मन में उल्टे सीधे विचार आ रहे थे कि अगर कहीं इसने गाडी किसी खड्ड में गिरा दी तो एक ही समयावच्छेद से तीन तीन महान आत्माओं को सदगति प्रदान करने का महापुण्यफल इसके हाथों सिद्ध हो जाएगा और साथ ही दुनिया से कुछ काफिरों को खत्म करने का सबाब भी इसे मिल जाएगा. वाह रे ड्राईवर! तेरे तो दोनों हाथों में लड्डू हैं---पुण्य भी और सबाब भी.पर शुक्र है ऊपर वाले का कि ऎसा पाक ख्याल उसके दिमाग में नहीं आया.इसका कारण कदाचित हमारे ही कुछ पापकर्म रहे होगें,जिनका भुगतान करने को उसने हमें जीवनदान दे दिया.कम से कम मुझे तो कुछ ऎसा ही लगा........ |
शनिवार, 7 अगस्त 2010
चूल्हे पडे ब्लागिंग बाबा !!! -----(खटराग कथा)
| एक ब्लागिंग व्यसनी पति और उसकी पत्नि के मध्य होने वाले आपसी खटराग की बानगी देखिए, लेकिन आप लोग कहीं ऎसा वैसा भ्रम न पाल बैठें, सो पहले ही क्लियर किए देते हैं कि ये कोई हमारी आपबीती नहीं है :):------ इस खटराग कथा के नायक है मिश्राजी, जो दिन भर कम्पयूटर के आगे बैठे बस ब्लागिंग धर्म का निर्वहण करने में ही जुटे हैं.....इनकी बेचारी धर्मपत्नि जो कि इनके इस ब्लागोन्माद से बुरी तरह से आजिज आ चुकी है, चिढती, कुढती हुई सी इन्हे भोजन के लिए बुलाने आती है.”अजी अब तो खाना खा लीजिए, यूँ ही कब तक कम्पयूटर के आगे बैठे आँखें फुडवाते रहोगे” Technorati टैग्स: {टैग-समूह}बस यूँ ही,ब्लागिंग कथा |
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